﻿WEBVTT

00:00:14.937 --> 00:00:24.309
विस्तार करे तो विषय मिलेगा उसको। 
विस्तार करेगा तो विषय में चली जाएगी।
वो विस्तार नहीं करना, संकोच करना।

00:00:24.333 --> 00:00:33.339
और ज्ञान जो इंद्रियों के माध्यम से 
बाहर जाता था, उसको संकोच 
करके स्वरूप सन्मुख करना।

00:00:33.363 --> 00:00:41.486
ये बहुत-बहुत बढ़िया procedure (विधि) 
सम्यग्दर्शन का, ये रहस्यपूर्ण चिट्ठी (में है)।

00:00:41.510 --> 00:00:44.776
(समयसार आत्मख्याति टीका की) 
१४४ गाथा में भी है।

00:00:44.800 --> 00:00:55.576
पर ये बहुत ही बढ़िया - 
पश्चात् और तत्पश्चात् वो, 
बहुत-बहुत मार्मिक प्रकरण है वो।

00:00:55.600 --> 00:01:05.143
देखो! विजय जी! सन् १९७६ या १९७७, 
शायद जिस वर्ष युवा-फेडरेशन का गठन 
हुआ था गुरुदेव के सानिध्य में

00:01:05.167 --> 00:01:12.543
(जिसमें) एक-एक रुपये में हम लोग उसके 
जैन युवा-फेडरेशन के सदस्य बने थे सोनगढ़ में,
 उसकी एक रुपये fees (शुल्क) थी।

00:01:12.567 --> 00:01:26.846
और जब बना, जिस दिन बना था उस ही दिन, 
उस ही दिन ये रहस्यपूर्ण चिट्ठी के ऊपर, 
जो प्रवचन-मंडप है,

00:01:26.870 --> 00:01:30.639
जो आजकल सोनगढ़ में वो जो 
प्रदर्शनी बना दी है गुरुदेव की,

00:01:30.663 --> 00:01:41.539
उस हॉल में लालचंदभाई के प्रवचन ये 
रहस्यपूर्ण चिट्ठी में पश्चात् और तत्पश्चात् 
(का प्रकरण) उसपर हुए थे।

00:01:41.563 --> 00:01:53.076
तो प्रवचन के बाद पंडित लोग 
उनके पैरों में गिर गए (थे)। 
इतना मार्मिक प्रवचन उनका हुआ था उसपर।

00:01:53.100 --> 00:02:05.243
और ये जो ब्रह्मचारी हैं न अभिनंदन जी, 
इन्होंने अपने टेप-रिकॉर्डर में 
उसको रिकार्ड किया था।

00:02:05.267 --> 00:02:17.153
पर दिया नहीं किसी को उन्होंने। 
वो कहते हैं (कि) दे देंगे, दे देंगे, 
दे देंगे (मगर) फिर दिया नहीं।

00:02:17.177 --> 00:02:24.943
फिर आखिर में ५-७ साल पहले मैंने फिर 
माँगा उनसे। तो कहें (कि) अब खो गया, 
वो पता नहीं कहाँ है अब।

00:02:24.967 --> 00:02:31.676
इतना मार्मिक था! 
इतना मार्मिक कि पंडितों के आँसू झर गए। 
इतना जोरदार प्रवचन था।

00:02:31.700 --> 00:02:37.076
लालचंदभाई तो मतलब क्या (कि) 
जिनको गुरुदेव ने वहाँ, आपको पता है?

00:02:37.100 --> 00:02:42.033
परमागम मंदिर के पंच कल्याणक में 
भगवान के माता-पिता बने थे।

00:02:42.057 --> 00:02:49.913
और वहाँ मंच पर गुरुदेव ने उनको 
निर्मल-दृष्टि से कहकर संबोधित किया था। 
हाँ! निर्मल दृष्टि।

00:02:49.937 --> 00:03:00.209
लालचंदभाई की दृष्टि निर्मल है, 
ऐसा ४० हजार आदमी की सभा में 
(गुरुदेव ने) कहा था। समझ में आया?

00:03:00.233 --> 00:03:04.626
इससे क्या शिक्षा लेना? 
अपने तो अपना काम (करना)। पदम् जी!

00:03:04.650 --> 00:03:12.736
अपना काम कैसे हो? 
ये तो चले गए अपना-अपना काम करके। 
हमारा काम कैसे हो - ये देखना है।

00:03:12.760 --> 00:03:13.760