﻿WEBVTT

00:00:15.743 --> 00:00:25.536
चली थी वहाँ, राजकोट! वहाँ
जीव के द्वारा भाया जाता है ऐसा कहा है।

00:00:25.560 --> 00:00:33.359
वहाँ तो ऐसी बात है कि अपना भगवान जो
ध्रुव परम स्वभाव है परम पारिणामिकभाव...

00:00:33.383 --> 00:00:38.359
ये ही या गया पृष्ठ, हाथ में आया...

00:00:38.383 --> 00:00:43.216
३२० गाथा है न, वो जयसेन आचार्य
की टीका, उसका गुजराती बनाया।

00:00:43.240 --> 00:00:46.936
राजकोट में माँग की, बहुत सूक्ष्म है।
बहुत सूक्ष्म भाव है!

00:00:46.960 --> 00:00:50.656
राजकोट में माँग की तो फिर यहाँ (सोनगढ़) आदमी
को भेजा था (गुजराती अनुवाद के लिए)।

00:00:50.680 --> 00:00:55.416
हिन्दी (टीका में) से (हम) इतनी बात नहीं कर सकते
और संस्कृत में से (भी) हम इतनी नहीं कर सकते,

00:00:55.440 --> 00:01:00.776
गुजराती हो तो स्पष्ट करूँ।
तो फिर गुजराती बनाया (हिम्मत)भाई ने।

00:01:00.800 --> 00:01:04.056
बहुत सूक्ष्म है! आठ व्याख्यान हुए थे।

00:01:04.080 --> 00:01:12.256
तो उसमें तो वहाँ तक कहा है उसमें,
जयसेन आचार्य की टीका -

00:01:12.280 --> 00:01:18.536
कि भगवान आत्मा
जो परम पारिणामिक ध्रुव स्वभाव है,

00:01:18.560 --> 00:01:24.984
वो उसमें तो, उसमें तो
बंध भाव नहीं, मोक्ष भाव नहीं,

00:01:25.008 --> 00:01:31.936
मोक्षमार्ग की पर्याय नहीं,
बंध के कारणरूप पर्याय नहीं।

00:01:31.960 --> 00:01:38.856
ये चार पर्याय से रहित ध्रुव
स्वभाव वो आत्मा है, आत्मा है।

00:01:38.880 --> 00:01:46.000
ध्रुव स्वभाव वह आत्मा है, ऐसा कहा।
उत्पाद-व्यय, वह परमार्थ आत्मा नहीं।

00:01:46.024 --> 00:01:49.625
उत्पाद-व्यय - मोक्ष की
पर्याय भी उत्पाद-व्यय है,

00:01:49.649 --> 00:01:53.546
मोक्षमार्ग की पर्याय उत्पाद-व्यय है,
बंध भी उत्पाद-व्यय है,

00:01:53.570 --> 00:01:56.256
बंध का मार्ग उत्पाद-व्यय है।
वह तो (एक) समय (की) पर्याय है।

00:01:56.280 --> 00:02:03.996
उस पर्याय रहित जो त्रिकाली द्रव्य है
वह जीव का वास्तविक, असली स्वरूप है।

00:02:04.020 --> 00:02:07.056
मुमुक्षु: वाह गुरुदेव!
पूज्य गुरुदेवश्री: समझ में आया?

00:02:07.080 --> 00:02:17.216
है न, उसमें है वह, हों! उसमें है।

00:02:17.240 --> 00:02:27.946
<b>(शुद्धपारिणामिक भाव) बंध की कारणभूत
जो क्रिया-रागादिपरिणति, उस रूप नहीं है। </b>

00:02:27.970 --> 00:02:35.456
<b> मोक्ष की कारणभूत जो क्रिया-
शुद्धभावना परिणति, उस रूप भी नहीं है। </b>

00:02:35.480 --> 00:02:41.136
उसमें है नहीं।
जयसेन आचार्य की टीका की बात है।

00:02:41.160 --> 00:02:44.496
बहुत सूक्ष्म बात है!
बहुत सूक्ष्म है! देखो!

00:02:44.520 --> 00:02:52.176
<b>सिद्धांत में कहा है कि
शुद्धपारिणामिक(भाव) निष्क्रिय है। </b>

00:02:52.200 --> 00:02:55.946
त्रिकाल भाव, ध्रुव भाव निष्क्रिय है -

00:02:55.970 --> 00:03:00.766
उसमें मोक्ष की पर्याय की क्रिया नहीं है,
मोक्षमार्ग की क्रिया नहीं है।

00:03:00.790 --> 00:03:05.106
सम्यग्दर्शन-ज्ञान के परिणाम,
ध्रुव निष्क्रिय ध्रुव चैतन्य है,

00:03:05.130 --> 00:03:07.536
उसमें है नहीं। समझ में आया?

00:03:07.560 --> 00:03:16.516
<b>परमार्थ दृष्टि से देखने पर यह जीव न तो उपजता है,
न मरता है, न बंध ही करता है, न मोक्ष ही प्राप्त करता है -</b>

00:03:16.540 --> 00:03:26.016
<b>ऐसा श्री जिनेन्द्र भगवान कहते हैं</b>,
(गाथा ६८) परमात्मप्रकाश में। आहाहा!

00:03:26.040 --> 00:03:34.626
यहाँ तो (गाथा ८७ में) भगवान आत्मा, यहाँ तो पर से
भिन्न बताते हैं अभी तो। समझ में आया?

00:03:34.650 --> 00:03:41.976
अभी पर से भिन्न, मेरी पर्याय मेरे से और
उसकी पर्याय उससे, इतना निर्णय करना न आये;

00:03:42.000 --> 00:03:46.296
उसे विकारी और अविकारी पर्याय से मेरी 
चीज बिल्कुल भिन्न है (यह उसे कैसे समझ में आये?)

00:03:46.320 --> 00:03:58.856
भिन्न है द्रव्यस्वभाव, वह सम्यग्दर्शन का विषय है।
निष्क्रिय ध्रुव वह सम्यग्दर्शन का विषय है।

00:03:58.880 --> 00:04:04.496
मोक्ष और मोक्ष का मार्ग वे सब
सम्यग्दर्शन के विषय नहीं हैं। बहुत सूक्ष्म है।

00:04:04.520 --> 00:04:11.856
वहाँ तुम्हारे <b>लालभाई</b> हैं न, राजकोट में।
<b>लालचंदभाई - बहुत सूक्ष्म अभ्यासी हैं।</b>

00:04:11.880 --> 00:04:14.806
<b>बहुत सूक्ष्म! बहुत अच्छे अभ्यासी!</b>

00:04:14.830 --> 00:04:19.096
<b>सूक्ष्म में सूक्ष्म माँगते हैं वहाँ जाते हैं तो,
सूक्ष्म में सूक्ष्म बात लाओ। </b>

00:04:19.120 --> 00:04:22.244
<b>तो (हमने पूछा) बोलो भाई, कौन कौनसी गाथा? </b>

00:04:22.270 --> 00:04:25.616
<b>तो (लालचंदभाई ने) लिखा - यह गाथा, 
यह गाथा, यह गाथा। बहुत अभ्यासी!</b>

00:04:25.640 --> 00:04:30.056
मुमुक्षु: जी हाँ! सार-सार गाथा!
पूज्य गुरुदेवश्री: हाँ, सार-सार, ख्याल है, ... है न, बहुत।

00:04:30.080 --> 00:04:34.948
परमात्मप्रकाश में से...<b>बहुत
सूक्ष्म अभ्यासी। बहुत आत्मार्थी।</b>

00:04:34.972 --> 00:04:43.816
<b>बहुत अंतर में मंथन बहुत है।
वहाँ (राजकोट में) वाँचन करते हैं।</b>  

00:04:43.840 --> 00:04:47.616
यहाँ आते हैं न,
रविवार आता है तो आते हैं, परसों।

00:04:47.640 --> 00:04:54.226
कल शनिवार, कल शनिवार है न,
रविवार को आते हैं - इस रविवार को।

00:04:54.250 --> 00:04:57.056
और सूक्ष्म माँगते हैं वहाँ राजकोट जाते हैं तो।

00:04:57.080 --> 00:05:05.176
३०० घर हैं ३०० अपने
श्वेताम्बर में से दिगम्बर हुए, ३००।

00:05:05.200 --> 00:05:12.576
यहाँ कहते हैं भगवान,
दर्पण की अवस्था तो अपने से,

00:05:12.600 --> 00:05:21.456
अपने द्वारा, अपने में, षट्कारक से हुई है।
वह मोर के कारण बिल्कुल नहीं।

00:05:21.480 --> 00:05:25.783
मोर की अवस्था दर्पण के कारण
बिल्कुल नहीं -- यह तो फिर भी लोगों को बैठता है

00:05:25.807 --> 00:05:31.776
- ठीक भाईसाहब, यह तो अभी ठीक।
कि मोर की अवस्था दर्पण के कारण (नहीं)।

00:05:31.800 --> 00:05:36.196
लेकिन दर्पण में अवस्था -
यदि मोर न हो तो नहीं बन सकती!

00:05:36.220 --> 00:05:41.776
तो मोर आया, तो दर्पण की अवस्था का
परिणमन उसके (मोर के) कारण हुआ?

00:05:41.800 --> 00:05:48.146
उसके अस्तित्व के कारण हुआ?
बिल्कुल नहीं!

00:05:48.170 --> 00:05:53.876
अपनी उस पर्याय के अस्तित्व के कारण
वह परिणमन दर्पण में अपने से हुआ है।

00:05:53.900 --> 00:06:01.036
मोर है इसलिए हुआ है, मोर का अस्तित्व सामने
है इसलिए हुआ है - बिल्कुल झूठी बात है।

00:06:01.060 --> 00:06:12.128
मोर की पर्याय का सत्, सत् (मोर) में;
और दर्पण की पर्याय का सत्, दर्पण में।