WEBVTT

00:01:04.560 --> 00:01:09.920
श्रोताओं को साथ रखकर उसे कोई विचार करना नहीं है। 

00:01:09.944 --> 00:01:21.520
श्रोताओं को खड़ा रखते हैं कि चलो बैठो अपन 
चर्चा करते हैं। चूना सफेद है कि भींत (दीवार) सफेद है?
अपन विचार करते हैं। आहाहा!

00:01:21.544 --> 00:01:33.440
जीतुभाई! अपन साथ बैठकर विचार करते हैं। 
ऐसा है कि खड़ा रखे न तो सुनने तो 
बैठे। 'तू गलत है, दीवार सफेद नहीं है'

00:01:33.464 --> 00:01:40.960
(यदि ऐसा कहें) तो वो भाग जाय। तो भाग जाये, वो
भी ज्ञानी को स्वीकार्य नहीं और गलत 
माने वो भी सहनीय नहीं। 

00:01:40.984 --> 00:01:52.560
सच माने वो स्वीकार्य है। तो सुने तो सच माने। 
कोई तो पकड़ेगा न, सभी न पकड़ें तो कुछ नहीं। 

00:01:52.584 --> 00:02:00.360
विचार करते हैं.., ऐसा कहते हैं। <b>'यहाँ विचार किया 
जाता है:-'</b>, विचार किया जाता है। 

00:02:00.384 --> 00:02:06.600
<b>'यदि कलई...'</b> अर्थात् चूना, <b>'दीवार-आदि
परद्रव्य की हो तो...'</b>,

00:02:06.624 --> 00:02:13.720
अर्थात् दीवार सफेद हो गई हो <b>'तो 
क्या हो...'</b> ये अपन विचार करते हैं। 

00:02:13.744 --> 00:02:23.400
कारण कि तू कहता है कि दीवार सफेद हो गई है। 
'तुम गलत हो'- ऐसा उन्होंने नहीं कहा। बैठ, विचार करते हैं अपन। 

00:02:23.424 --> 00:02:30.760
विचार करते हैं, दोनों परस्पर विचार करते हैं। फिर अंत में 
तुम्हें उचित लगे तो हमारी बात सच्ची मानना। 

00:02:30.784 --> 00:02:44.560
विचार करते हैं। आहाहा! ज्ञानी किसी का तिरस्कार नहीं करते।
कहेंगे आगे। ज्ञानी तो भाई, आहा! वो तो करुणा के सागर हैं। 

00:02:44.584 --> 00:02:49.080
करोड़पति आया हो तो उसको नहीं 
कहते कि कहाँ से आये हो और क्या?

00:02:49.104 --> 00:02:52.480
परन्तु मैले-कुचैले कपड़ोंवाला कोई हो, थका हुआ हो,

00:02:52.504 --> 00:03:03.400
हिंदीभाषी भाई पांच सौ किलोमीटर दूर से आया
हो, मैला-कुचैला एकदम, दाढ़ी रखी हुई हो। 
आये दर्शन करने के लिए,

00:03:03.424 --> 00:03:11.040
"भाई!" ऐसे प्रेम से (कहे), "भाई! कहाँ से आते हो?"
इतने में तो उसकी थकान उतर जाती है! आहाहा! 

00:03:11.064 --> 00:03:21.120
(उसको ऐसा लगता है कि) आहा! ऐसे महापुरष! हम तो जानते (नहीं)
थे कि वहाँ कैसा होगा और दर्शन करने जायेंगे
तो अनुमति लेनी पड़ती होगी न? क्या होगा?

00:03:21.144 --> 00:03:24.480
ये तो हमने जितनी बातें सुनी थी, वो सब झूठी (निकली)!

00:03:24.504 --> 00:03:28.360
ये महापुरष तो कहते हैं कि, "भाई...! 
कहाँ से आते हो?" 

00:03:28.384 --> 00:03:37.440
तहाँ तो उसका सवासेर खून बढ़ जाता है! हमारी 
गुजराती भाषा में। कि इस गाँव से हम आते हैं।

00:03:37.464 --> 00:03:47.840
"दोपहर को तीन से चार व्याख्यान है हों!
सुनना।" वाह! सत्कार दिया।

00:03:47.864 --> 00:03:54.960
आनेवाले को, मुमुक्षु जीव को सत्कार दिया। 
क्योंकि सभी आत्मा भगवान हैं। आहाहा!

00:03:54.984 --> 00:04:02.080
किसी को पर्याय से मत देखो। 
(कोई) स्त्री नहीं है और पुरुष भी नहीं है। 

00:04:02.104 --> 00:04:09.240
कोई धनवान नहीं है और कोई गरीब भी नहीं है। 
कोई राजा या रंक नहीं है, सभी आत्मा भगवान हैं। 

00:04:09.264 --> 00:04:16.720
सुनने के लिए आया है तो कुछ
भी दो शब्द लेकर अपने गाँव जायेगा। 

00:04:16.744 --> 00:04:21.560
खाली हाथ आया है, खाली मुट्ठी से
आया है और भरी मुट्ठी से जायेगा। 

00:04:21.584 --> 00:04:30.300
जन्मता है तब, आहाहा! आया था खाली मुट्ठी,
खाली हाथ और कुछ भी तत्व लेकर जायेगा।

00:04:30.324 --> 00:04:39.160
इसलिए आचार्य भगवान कहते हैं कि चलो विचार करते हैं,
बैठो। बिठाते हैं अब उसे। अज्ञानी जीव को 
बिठाते हैं। चलो विचार करते हैं। 

00:04:39.184 --> 00:04:45.680
<b>यदि कलई</b>, तुझे ऐसा लगता है कि दीवार 
सफेद हो गयी, तो चलो विचार करते हैं। 

00:04:45.704 --> 00:04:50.280
<b>यदि कलई दीवार आदि परद्रव्य की हो
तो क्या हो वह प्रथम विचार करते हैं:-</b>

00:04:50.304 --> 00:04:55.920
<b>'जिसका जो होता है वह वही होता है,...'</b>
महासिद्धांत! आहाहा!

00:04:55.944 --> 00:05:13.000
<b>'जिसका जो होता है वह वही होता है,'</b> जैसे कि सफेदी 
चूने की होने से सफेदी वह चूना ही है। 

00:05:13.024 --> 00:05:18.960
खट्टापन नीम्बू का होने से खट्टापन 
वह नीम्बू ही है। कि दाल है? 

00:05:18.984 --> 00:05:32.640
दाल में डाला हुआ नीम्बू, दाल में डाला हुआ नीम्बू। 
जो खट्टापन है वो दाल का है कि नीम्बू का है?
सच बोलना सभी। 

00:05:32.664 --> 00:05:45.320
दाल खट्टी नहीं है? नहीं। दाल खट्टी नहीं है तो
दीवार सफेद नहीं है। तो ज्ञान पर को जानता नहीं है। 
आहाहा! वहां सभी को ले जाना है। 

00:05:45.344 --> 00:05:54.600
कहने में आता है कि दाल खट्टी है, पर वास्तव में दाल
खट्टी नहीं है, सब्ज़ी खट्टी नहीं है। नीम्बू खट्टा है। 

00:05:54.624 --> 00:06:07.520
<b>'जिसका जो होता है वह वही होता है...'</b>
महा सिद्धांत! आहाहा! मिठास गुड़ की
होने से, हो जाने से नहीं। 

00:06:07.544 --> 00:06:19.320
मिठास गुड़ की होने से, हो जाने से नहीं,
होने से। मिठास वह गुड़ ही है। 
मिठास वह गुड़ ही है। 

00:06:19.344 --> 00:06:25.200
अब मिठास तो एक उसका असाधारण गुण 
था। किन्तु गुण पर से गुणी पर ले गये।

00:06:25.224 --> 00:06:41.000
मिठास गुड़ की होने से, मिठास वह गुड़ ही है। 
मिठास पर से गुड़ पर ले गये। 
मिठास पर से (गुड़ पर ले गये)। 

00:06:41.024 --> 00:06:52.040
इसप्रकार आत्मा का ज्ञान होने से, आत्मा का ज्ञान 
हो जाने से नहीं। आत्मा का ज्ञान होने से सभी 
आत्मा को आत्मा का ज्ञान होता है। 

00:06:52.064 --> 00:07:00.720
सभी आत्माओं को वर्तमान में, कुत्ते, बिल्लियों को,
एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय को, निगोद के जीवों को 

00:07:00.744 --> 00:07:14.440
जो ज्ञान प्रगट होता है वह ज्ञेय का नहीं 
परन्तु ज्ञायक का है, आत्मा का है। 
‘<b>जिसका जो होता है वह वही होता है</b>’ महा सिद्धांत!

00:07:14.464 --> 00:07:26.840
अब <b>'जिसका जो होता है वह वही होता है'</b>, कोई शक्कर का 
दृष्टांत लेता है, कोई नीम्बू का दृष्टांत लेता है। दृष्टांत भी
आत्मा का देते हैं। दृष्टांत भी आत्मा (को समझने के लिए है)। 

00:07:26.864 --> 00:07:43.440
क्योंकि नीम्बू और गुड़ है न, वह तो क्षणिक 
पर्याय है। वह तो मूल द्रव्य नहीं है। 
इसलिए वह तो बदल जाती है। 

00:07:43.464 --> 00:07:51.920
गुड़ हो वह अफीम बन जाये और अफीम 
हो वह गुड़ हो जाये। वरना गुड़ और 
अफीम, ये तो पर्यायार्थिक नय का विषय है। 

00:07:51.944 --> 00:08:00.400
यहाँ तो कहते हैं कि, दृष्टांत में ऐसा 
देते हैं कि..., समझाना है आत्मा 
और दृष्टांत देते हैं आत्मा का। 

00:08:00.424 --> 00:08:11.440
परन्तु समझाना है आत्मा तो 
दृष्टांत आत्मा का कैसे?
कहते हैं कि तुझे समझ आयेगा। तुझे समझ आयेगा। 

00:08:11.464 --> 00:08:20.880
<b>'जैसे...'</b>, जैसे अर्थात् दृष्टांत। <b>'जैसे आत्मा का ज्ञान 
होने से...'</b>, ज्ञान हो जाने से नहीं। आहाहा!

00:08:20.904 --> 00:08:34.320
आत्मा ज्ञानमय है। और आत्मा में आत्मा का
ज्ञान प्रगट होता ही रहता है। और प्रगटा हुआ
ज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध करता रहता है। 

00:08:34.344 --> 00:08:47.800
आत्मा में से आत्मा का ज्ञान प्रगट होता है। 
ये ज्ञान आत्मा के साथ तन्मय है। इसलिए ये 
ज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध करते हुए उदयरूप होता है। 

00:08:47.824 --> 00:08:58.040
इसलिए कहते है कि <b>'जैसे आत्मा का ज्ञान होने से...'</b>
आत्मा का पैसा है और आत्मा का देह है? शरीर है?

00:08:58.064 --> 00:09:06.680
ये मकान, ये नया बनाया वह मीठाभाई का 
मकान है? आहाहा! वह तो पुद्गल का है। 
वह कहाँ उनका है। 

00:09:06.704 --> 00:09:23.960
<b>'जैसे आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान वह आत्मा ही है।'</b>
वह पर्याय है कि द्रव्य है?
यहाँ पर ज्ञान अर्थात् त्रिकाली नहीं लेना। 

00:09:23.980 --> 00:09:32.960
किन्तु आत्मा का ज्ञान होने से, जो प्रगट होता हुआ ज्ञान
जिसे लक्षण कहने में आता है वह आत्मा का है। 

00:09:32.984 --> 00:09:43.800
ज्ञान शास्त्र का नहीं होता। ज्ञान प्रतिमाजी का 
नहीं होता। प्रतिमाजी का ज्ञान ही नहीं होता है। 
ज्ञान तो आत्मा का ही होता है।

00:09:43.824 --> 00:09:50.400
किन्तु प्रतिमाजी का निमित्त देखकर प्रतिमाजी का 
ज्ञान हुआ, ऐसा व्यवहार करने में आता है।

00:09:50.424 --> 00:09:54.800
तो चलो विचार करते हैं 
कि ज्ञान प्रतिमाजी का हुआ है 
या आत्मा का? बोलो। 

00:09:55.824 --> 00:10:02.120
हैं? ये क्या? मैं रोज दर्शन करने जाता हूँ 
तो प्रतिमाजी तो मुझे जानने में आती है। आहा! 

00:10:02.144 --> 00:10:15.040
ये तेरी थोड़ी-सी भूल है। 
होता है निज प्रतिमा का ज्ञान और 
भासित होता है उसका ज्ञान। आहाहा! 

00:10:15.064 --> 00:10:27.560
समझने जैसी बात है। समझ में आये ऐसी है। समझेगा
इसलिए शास्त्र लिखा है या नहीं समझे इसलिए?
भले थोड़ा समझे। उसकी कोई बात नहीं।

00:10:27.584 --> 00:10:34.760
पर समझेगा इसलिए शास्त्र लिखे गये न?
या कोई नहीं समझेगा इसलिए शास्त्र लिख डाले?

00:10:34.784 --> 00:10:44.320
जरा सूक्ष्म तो है। विषय थोड़ा सूक्ष्म तो है। 

00:10:44.344 --> 00:10:52.080
पर यहाँ तत्व की रूचि वाले जीव हैं 
इसलिए समझ में आयेगा। न समझ में आये ऐसा कुछ नहीं है।  

00:10:52.104 --> 00:11:02.800
<b>'जैसे आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान 
वह आत्मा ही है।'</b> वह पर्याय नहीं है। 
ज्ञान वह आत्मा ही है, अभेद कर दिया। 

00:11:02.824 --> 00:11:10.320
अभेदनय से उस पर्याय को आत्मा कहा जाता है। 
भेदनय से पर्याय है। 

00:11:10.344 --> 00:11:14.400
पर पर्याय दिखती है तब 
तक आत्मा नहीं दिखेगा। 

00:11:14.424 --> 00:11:23.160
ज्ञेय दिखते हैं तब तक तो आत्मा नहीं दिखेगा। 
किन्तु पर्याय जानने में आयेगी तब 
तक जाननहार जानने में नहीं आयेगा।

00:11:23.184 --> 00:11:29.040
और जहाँ जाननहार जानने में आयेगा
वहां पर्याय नहीं दिखेगी। 

00:11:29.064 --> 00:11:38.560
वह पर्याय स्वयं आत्मा हो जाती है। 
अनुभूति स्वयं आत्मा हो जाती है। 
श्रुतज्ञान आत्मा होता है। 

00:11:38.584 --> 00:11:46.920
धीरे धीरे अपन लेंगे तो समझ आयेगा।
बाकी इसमें कुछ नहीं।
नहीं समझ आयेगा, ये (मान्यता) तो निकाल देना। 

00:11:46.944 --> 00:11:53.840
नहीं समझ आयेगा, ये (मान्यता) तो निकाल देना।
आत्मा को नहीं समझ में आयेगा तो किसको समझ में आयेगा। आहाहा!

00:11:53.860 --> 00:12:01.840
<b>'जैसे आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान वह आत्मा ही है।'</b>
ये पर्याय की बात करते हैं। गुण की बात नहीं है। 

00:12:01.864 --> 00:12:09.400
गुण की बात करके गुण को आत्मा कहना वह
दृष्टि के विषय में अभेद करके आत्मा कहा। 
वह ज्ञान-लक्षण ले लिया। 

00:12:09.424 --> 00:12:21.640
यहाँ तो पर्याय ज्ञायक को जानती है इसलिए 
पर्याय वह आत्मा है, ज्ञायक हो जाती है। 
पर्याय रहती नहीं। आहाहा!

00:12:21.664 --> 00:12:33.360
‘<b>जैसे आत्मा का ज्ञान होने से 
ज्ञान वह आत्मा ही है
(-पृथक् द्रव्य नहीं);</b>' लो!

00:12:33.384 --> 00:12:43.000
ज्ञान और आत्मा भिन्न नहीं हैं।
जैसे सफेद और चूना- ये दो वस्तु हैं कि एक?
एक ही वस्तु है।

00:12:43.024 --> 00:12:46.320
सफेद कहो कि चूना कहो, दोनों एक ही वस्तु है। 

00:12:46.344 --> 00:12:51.880
गुण भेद से उसे सफेद कहा जाता है और 
अभेद से उसे चूना कहा जाता है। 

00:12:51.904 --> 00:13:03.800
इसीतरह गुण भेद से जो ज्ञान की पर्याय आत्मा को
प्रसिद्ध करती है, उसे ज्ञान की पर्याय भी 
कहने में आता है और अभेद से उसे आत्मा कहने में आता है। आहाहा!

00:13:03.824 --> 00:13:15.440
वह ज्ञान की पर्याय जानने में आती है, वह व्यवहार है 
और उस ज्ञान की पर्याय में पर पदार्थ जानने में आते हैं 
वह अज्ञान है। 

00:13:15.464 --> 00:13:21.280
हाय! हाय! व्यवहार गया हमारा?
कहते हैं तेरा व्यवहार होता नहीं तुझे। आहाहा!

00:13:21.304 --> 00:13:30.640
महा अपूर्व समयसार शास्त्र है। 
ऐसे कोई अलौकिक क्षण में यह शास्त्र लिखा गया है, 

00:13:30.664 --> 00:13:38.640
कि जो आज तक कई जीवों को 
सम्यग्दर्शन में मुख्यरूप से निमित्त हुआ है। 

00:13:38.664 --> 00:13:44.600
पूज्य गुरुदेव को यह शास्त्र निमित्त हुआ 
ये तो हम सभी जानते हैं। 

00:13:44.624 --> 00:13:51.200
किन्तु पूर्व में टोडरमलजी साहब,
राजमलजी, बनारसीदासजी, दीपचंदजी

00:13:51.224 --> 00:13:58.000
अनेक अनेक विद्वान, ज्ञानी हो गए, 
उनको समयसार शास्त्र निमित्त हुआ है। 

00:13:58.024 --> 00:14:14.120
कोई अतिशय है। इस शास्त्र में कोई अतिशय है। 
हे ग्रंथाधिराज! तेरे में भाव ब्रह्मांड के भरे..
आहाहा!

00:14:14.144 --> 00:14:25.960
ग्रंथाधिराज, ग्रन्थ नहीं पर ग्रन्थ का अधिपति। 
आहाहा! हे ग्रंथाधिराज!
तेरे में भाव ब्रह्मांड के भरे!

00:14:25.984 --> 00:14:36.800
और मेरे में भी भाव ब्रह्मांड के भरे (हैं)- ऐसा
तूने बताया और मैंने जाना, तो मेरे में भी
भाव ब्रह्मांड के हैं, ऐसा अनुभव में आया। आहाहा!

00:14:36.824 --> 00:14:44.360
<b>'जैसे आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान वह आत्मा ही है...'</b> पर्याय नहीं। 

00:14:44.384 --> 00:14:53.920
सफेद है वह चूना ही है। 
सफेद है वह उसकी पर्याय है,
ऐसा कहना वो व्यवहार है। 

00:14:53.944 --> 00:15:00.160
पर वो व्यवहार भी अभूतार्थ ह। उसे 
भी अभेद करके चूना तो चूना ही है। 

00:15:00.184 --> 00:15:06.440
पृथक् द्रव्य नहीं। द्रव्य और पर्याय एक है,
एक सत्ता। द्रव्य से पर्याय भिन्न नहीं है। 

00:15:06.464 --> 00:15:16.040
दृष्टि (की) अपेक्षा से भिन्न और 
ज्ञान (की) अपेक्षा से अभिन्न।
ये स्याद्वाद है, ये अनेकांत है। आहा!

00:15:16.064 --> 00:15:20.840
<b>'ऐसा तात्विक सम्बन्ध...'</b> लो!
ऐसा तात्विक सम्बन्ध। 

00:15:20.864 --> 00:15:29.840
जिसका जो होता है वह वही होता है। जैसे ज्ञान 
आत्मा का होने से ज्ञान वह आत्मा ही है। 
ये उसका तात्विक सम्बन्ध। 

00:15:29.864 --> 00:15:34.040
अंदर का सम्बन्ध उसको तात्विक 
सम्बन्ध कहने में आता है। 

00:15:34.064 --> 00:15:40.040
बाहर के साथ सम्बन्ध किया, वो 
व्यवहार भी नहीं किन्तु अज्ञान है। 

00:15:40.064 --> 00:15:46.520
निश्चय जानने के बाद व्यवहार आता है,
वो बाद की बात है। आहाहा!

00:15:46.544 --> 00:15:54.400
<b>'ऐसा तात्विक सम्बन्ध जीवित 
(अर्थात् विद्यमान) होने से...'</b>,
विद्यमान होने से अनादिअनंत। 

00:15:54.424 --> 00:16:06.920
ये सम्बन्ध छूटता ही नहीं। आत्मा का 
ज्ञान कभी आत्मा से भिन्न पड़ सकता 
नहीं। और जो भिन्न पड़ता है वो आत्मा नहीं है। 

00:16:06.944 --> 00:16:13.680
शरीर जुदा पड़ता है इसलिए शरीर आत्मा नहीं। 
कर्म जुदा हो जाते हैं इसलिए कर्म आत्मा नहीं। 

00:16:13.704 --> 00:16:17.600
पुण्य-पाप के परिणाम का अभाव 
होता है इसलिए वो आत्मा नहीं है। 

00:16:17.624 --> 00:16:22.680
पर आत्मा का ज्ञान और आत्मा, 
ये कभी भिन्न पड़ सकते नहीं। 

00:16:22.704 --> 00:16:27.880
चूना और चूने का सफेद स्वभाव- 
ये कभी जुदा हो सकते नहीं। 

00:16:27.904 --> 00:16:35.840
दीवार भिन्न पड़ सकती है किन्तु चूने का सफेद 
भाव वो चूने के साथ तन्मय है। 

00:16:35.864 --> 00:16:43.119
उसीप्रकार आत्मा और आत्मा का ज्ञान वो तादात्म्य 
है। तन्मय है। इसलिए ज्ञान वह आत्मा का है। 
बोलो परम उपकारी श्री सद्गुरु देव की जय हो!