﻿WEBVTT

00:01:10.596 --> 00:01:25.059
श्री समयसार परमागम शास्त्र है। उसका
जीव नाम का अधिकार अभी चलता है।

00:01:25.083 --> 00:01:34.103
इस जीव का यानि
अपना शुद्धात्मा का स्वरूप
क्या है वो आज तक जीव ने जाना नहीं है।

00:01:34.127 --> 00:01:43.021
देह को जीव माना, कर्म को जीव
माना, पुण्य-पाप के जो परिणाम
उत्पन्न होते हैं उनको जीव माना,

00:01:43.045 --> 00:01:49.965
सुख-दुःख का जो वेदन होता है
उसको जीव माना (परंतु) वो जीव नहीं है।

00:01:49.989 --> 00:01:57.116
जीव देह से और पुण्य-पाप के
परिणाम से जुदा (भिन्न) जाननहार है;

00:01:57.140 --> 00:02:03.136
तो जाननहार जीव को एक
समयमात्र जीव ने जाना नहीं है।

00:02:03.160 --> 00:02:10.774
आत्मा ने अपना असली स्वरूप
क्या है, उसको जाना नहीं है।

00:02:10.798 --> 00:02:16.856
वो स्वांग आया उसको जीव जान लिया।
वो तो स्वांग है।

00:02:16.880 --> 00:02:23.881
जैसे नाटक में स्वांग आता है, वो स्वांग
तो अनेक प्रकार के धारण करता है।

00:02:23.905 --> 00:02:30.041
नाचनेवाला तो एक है और स्वांग
अनेक प्रकार के धारण करता है।

00:02:30.065 --> 00:02:40.503
राजा का अभिनय करता है, कभी
भिखारी का, कभी ऐसा-ऐसा शराबी
का, (ऐसे) बहुत स्वांग धारण करता है।

00:02:40.527 --> 00:02:50.903
तो स्वांग है वो स्वभाव से भिन्न है।
स्वांग निकल जाता है
और स्वभाव रह जाता है।

00:02:50.927 --> 00:02:56.950
तो तीनों काल अपना मूल स्वभाव
जो ज्ञाता-दृष्टा, ज्ञान-आनंद है....

00:02:56.974 --> 00:03:05.681
आनंदमयी आत्मा, ज्ञानमयी आत्मा है
- वो इसका असली मूल स्वरूप है।

00:03:05.705 --> 00:03:13.348
तो मूल स्वरूप को नहीं पहचाना और
मनुष्य की अवस्था हुई तो मैं मनुष्य हूँ,

00:03:13.372 --> 00:03:22.436
तिर्यंच की अवस्था हुई – कौआ,
कुत्ता तो मैं कौआ और मैं कुत्ता हूँ
और देव में गया तो मैं देव हूँ,

00:03:22.460 --> 00:03:27.454
स्त्री हुआ तो मैं स्त्री हूँ, पुरुष हुआ
तो मैं पुरुष हूँ (ऐसा मान लिया)।

00:03:27.478 --> 00:03:36.068
आत्मा स्त्री नहीं है, पुरुष नहीं है।
आत्मा तो स्त्री और पुरुष की
जो स्वांगरूप अवस्था है

00:03:36.092 --> 00:03:46.163
उससे भिन्न चिदानंद आत्मा
अंतर में विराजमान है। वो
अंतर्दृष्टि से दिखाई देता है।

00:03:46.187 --> 00:03:52.912
बहिर्दृष्टि से आत्मा दिखाई नहीं
देता है, देखने में आता नहीं है।

00:03:52.936 --> 00:04:02.454
जो बहिर्दृष्टि से यानि
इन्द्रियज्ञान से जो देखता है,
वो पर को देखता है।

00:04:02.478 --> 00:04:11.868
इन्द्रियज्ञान स्व को नहीं देखता है।
आँख, कान, नाक जो ये ज्ञान
का उघाड़ है भावेन्द्रिय...

00:04:11.892 --> 00:04:16.312
द्रव्येन्द्रिय क्या और भावेन्द्रिय
क्या (है) ये सुना ही नहीं जगत ने।

00:04:16.336 --> 00:04:26.125
द्रव्येन्द्रिय उसका नाम है जो ये (त्वचा)
स्पर्श इंद्रिय (है), ये जीभ है (रसना)
द्रव्येन्द्रिय, ये नाक है घ्राण इंद्रिय,

00:04:26.149 --> 00:04:32.699
ये (नेत्र) चक्षु इंद्रिय है; जड़-जड़ ये सब
जड़ है। ये पुद्गल की अवस्था है, अचेतन है।

00:04:32.723 --> 00:04:42.908
उसमें एक ज्ञान का उघाड़ होता है,
ज्ञान होता है क्षयोपशम ज्ञान
जिसमें जानने की क्रिया होती है।

00:04:42.932 --> 00:04:52.059
ये जानने की क्रिया
पर को प्रसिद्ध करती है तो पर
में आत्मबुद्धि कर लेता है आत्मा।

00:04:52.083 --> 00:04:59.845
इससे आत्मा जुदा है।
देह से जुदा, द्रव्येन्द्रिय से जुदा

00:04:59.869 --> 00:05:12.779
और देह को जाननेवाला जो ज्ञान (है),
देव-गुरु-शास्त्र को जाननेवाला जो ज्ञान
(है), उस (इन्द्रिय)ज्ञान से ज्ञान भिन्न है।

00:05:12.803 --> 00:05:19.565
सूक्ष्म बात है! कभी सुना ही नहीं है,
विचारा नहीं है कि मेरा स्वरूप क्या है।

00:05:19.589 --> 00:05:26.894
थोड़ा पुण्य कर लो,
व्रत करो, तप करो, यात्रा करो
धर्म हो जाएगा। भाई! ये धर्म नहीं है।

00:05:26.918 --> 00:05:34.308
ये कर्म है; कर्म से बंध होता है।
आहाहा! और धर्म से मोक्ष होता है।

00:05:34.332 --> 00:05:43.365
धर्म का अर्थ आत्मा के स्वभाव का नाम
धर्म है। पुण्य-पाप का जो परिणाम होता है,

00:05:43.389 --> 00:05:50.996
शुभ और अशुभ, वो आत्मा का
स्वभाव नहीं होने से वो धर्म नहीं है।

00:05:51.020 --> 00:06:00.352
और आत्मा का ज्ञान, आत्मा का श्रद्धान वो
आत्मा का स्वभाव होने से उसका नाम धर्म है।

00:06:00.376 --> 00:06:08.841
जिस धर्म के परिणाम से आत्मा को अभी
वर्तमान में आत्मिक शांति मिल जावे

00:06:08.865 --> 00:06:16.983
और भविष्य में भी पूरी शांति-आनंद प्रगट
हो जाये मोक्ष का, उसका नाम स्वभाव है।

00:06:17.007 --> 00:06:22.823
स्वभाव में सुख है;
विभाव में दुःख है।

00:06:22.847 --> 00:06:29.805
विभाव का अर्थ क्या कि कषाय
की तीव्रता और कषाय की मंदता।

00:06:29.829 --> 00:06:35.854
तीव्र कषाय वो पाप का परिणाम (है), उस
पाप के परिणाम में जीव दुःखी होता है;

00:06:35.878 --> 00:06:44.859
और कषाय की मंदता - पुण्य के
परिणाम, उसमें थोड़ा कम दुःखी
होता है मगर रहता है दुःखी (ही)।

00:06:44.883 --> 00:06:51.134
पाप के परिणाम में सुख नहीं (है) और
पुण्य के पारिणाम में (भी) सुख नहीं (है)।

00:06:51.158 --> 00:06:54.632
हिंसा, झूठ, चोरी का
परिणाम तो दुःखरूप है ही

00:06:54.656 --> 00:07:06.201
मगर अहिंसा आदि का परिणाम जो है
शुभराग, वो भी दुःखदायक है क्योंकि
वो आस्रव तत्त्व है। उसमें दुःख भरा है।

00:07:06.225 --> 00:07:12.125
उसमें किंचित् मात्र आत्मिक
सुख का स्वाद आता नहीं है।

00:07:12.149 --> 00:07:16.192
इसलिए पुण्य-पाप के परिणाम
से आत्मा भिन्न है

00:07:16.216 --> 00:07:23.988
और पुण्य-पाप के परिणाम को
जाननेवाला जो इन्द्रियज्ञान उससे
भी आत्मा जुदा (यानि) भिन्न है।

00:07:24.012 --> 00:07:32.200
ये अतीन्द्रियज्ञानमयी आत्मा
अंदर विराजमान है। अंदर
देखनेवालों को वो दिखाई देता है।

00:07:32.224 --> 00:07:39.905
देखनेवालों को दिखाई देता है।
जो देखे नहीं तो दिखाई नहीं देता है।
तो ये (परज्ञेय) दिखाई देते हैं।

00:07:39.929 --> 00:07:46.628
ये विषय गंभीर चलता है।
इन्द्रियज्ञान को जीतने की गाथा है।

00:07:46.652 --> 00:07:55.442
इन्द्रियज्ञान जीतने से मोह जीता जाता है।
आत्मा (की) निर्मोह दशा हो जाती है।

00:07:55.466 --> 00:08:04.263
निरागी दशा नहीं होती है परंतु निर्मोह दशा
होती है। वो गृहस्थ अवस्था में होती है।

00:08:04.287 --> 00:08:16.268
निरागी दशा तो जब वो घर-बार
छोड़कर, कुटुंब को छोड़कर जब
जंगल में जाकर साधु होता है.....

00:08:16.292 --> 00:08:23.546
साधु यानि आत्मा को निरंतर साधे
उसका नाम साधु है।

00:08:23.570 --> 00:08:33.968
साधु का अर्थ क्या है? कि निरंतर
अपने शुद्धात्मा की साधना करे,
शुद्धोपयोग के द्वारा स्वरूप में लीन हो जावे,

00:08:33.992 --> 00:08:44.144
जहाँ संकल्प और विकल्प का
उत्थान होवे नहीं, ऐसी निर्विकल्प ध्यानस्थ
अवस्था का नाम मुनि यानि साधु है।

00:08:44.168 --> 00:08:47.993
वो तो अलग अपूर्व दशा है कोई।

00:08:48.017 --> 00:08:55.489
इसके पहले, साधु होने के पहले,
मोक्ष होने के पहले जीव साधु होता है

00:08:55.513 --> 00:09:04.435
और साधु होने के पहले जीव साधक होता है
- गृहस्थ अविरत सम्यग्दृष्टि, शास्त्रीय शब्द है।

00:09:04.459 --> 00:09:13.976
ऐसा जो शुद्धात्मा का दर्शन होता है
गृहस्थ अवस्था में, तो शुद्धात्मा
के दर्शन का नाम ही धर्म है।

00:09:14.000 --> 00:09:22.649
धर्म का अर्थ <b>वत्थुसहावो धम्मो</b>
(कार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा ४७६)। वस्तु
का जो स्वभाव है उसका नाम धर्म है।

00:09:22.673 --> 00:09:32.060
जैसे नींबू का स्वभाव खट्टा है।
तो खट्टापना वो नींबू का स्वभाव,
स्वभाव का अर्थ धर्म।

00:09:32.084 --> 00:09:38.203
स्वभाव का (अर्थ) धर्म। धर्म (अर्थात्)
ये संवर-निर्जरा मोक्ष की बात नहीं है।

00:09:38.227 --> 00:09:44.072
वस्तु का जो स्वभाव है उसका
नाम वस्तु का धर्म कहा जाता है।

00:09:44.096 --> 00:09:51.496
जैसे शक्कर का स्वभाव मीठापना -
Sweetness (है) तो ये शक्कर का स्वभाव है।

00:09:51.520 --> 00:09:58.470
और अफ़ीम का स्वभाव कड़वा है; वो
उसका स्वभाव होने से उसका धर्म है।

00:09:58.494 --> 00:10:06.377
ऐसे ही ये आत्मा नाम का एक पदार्थ है।
जैसे नींबू, शक्कर, अफ़ीम
ये सब पदार्थ हैं जगत के,

00:10:06.401 --> 00:10:13.918
ये पुद्गल की जाति हैं, मूर्तिक हैं; और
ये आत्मा है (ये) अरूपी, अमूर्तिक है।

00:10:13.942 --> 00:10:23.354
मगर जैसे नींबू में खटास भरी है,
शक्कर में मिठास भरी है, अफीम में
कड़वाहट भरपूर-भरचक भरी है,

00:10:23.378 --> 00:10:32.296
ऐसे ही भगवान आत्मा वस्तु होने
से उसमें ज्ञान-आनंद भरा है,
छलोछल भरा है। आहाहा!

00:10:32.320 --> 00:10:35.861
जैसे पानी का लोटा,
वो पानी से भरा है।

00:10:35.885 --> 00:10:47.219
ऐसे ये काशीघाट का लोटा है,
इसमें आत्मा का ज्ञान और आनंद
अंदर छलोछल भरा है, शक्तिरूप से है।

00:10:47.243 --> 00:10:56.379
ऐसा आत्मा का स्वभाव है उसके सन्मुख होकर
जब आत्मा का ज्ञान-भान-अनुभव होता है,

00:10:56.403 --> 00:11:03.110
तो जो शक्ति में ज्ञान और आनंद था,
उस ज्ञान और आनंद का ज्वार आता है।

00:11:03.134 --> 00:11:09.466
जैसे समुद्र में ज्वार आता है - लहर,
ऐसे परिणाम प्रगट हो जाता है।

00:11:09.490 --> 00:11:16.502
ये जो परिणाम प्रगट होता है ज्ञान-आनंद
का वो आत्मा का स्वभाव है।

00:11:16.526 --> 00:11:24.717
वो स्वभाव होने से धर्म है।
वो धर्म होने से अतीन्द्रिय सुख
का स्वाद आता है उसमें। आहाहा!

00:11:24.741 --> 00:11:33.168
ऐसे आत्मा को आत्मा ने
आज तक कभी एक सेकंड, एक समय
मात्र (के लिए भी) आत्मा को जाना नहीं है।

00:11:33.192 --> 00:11:44.013
अनात्मा को आत्मा माना, पर को
आत्मा माना मगर पर को आत्मा मानने
से आत्मा चार गति के दुःख भोगता है।

00:11:44.037 --> 00:11:51.887
उस दुःख से छूटने का उपाय (ये
है कि) अपने स्वरूप को पहचानो

00:11:51.911 --> 00:12:00.957
और अपने स्वरूप में एकाग्र होकर
उसका ध्यान करने से आत्मा में
आनंद बाहर में प्रगट होता है।

00:12:00.981 --> 00:12:04.621
ज्ञान-आनंद भरा है वो बाहर निकलता है।

00:12:04.645 --> 00:12:14.444
ऐसे इस आत्मा का स्वरूप बतानेवाला
एक परमागम शास्त्र, समयसार शास्त्र है;

00:12:14.468 --> 00:12:21.403
जो आज से दो हजार साल
पहले कुंदकुंदाचार्य भगवान
ने ताड़पत्र पर लिखा है।

00:12:21.427 --> 00:12:27.135
उसकी टीका है और उसका अनुवाद चलता है।

00:12:27.159 --> 00:12:34.635
इंद्रिय को जीतने का प्रयोग।
इंद्रिय को जीतने से क्या होता है?
कि आत्मभान होता है।

00:12:34.659 --> 00:12:41.624
तो इंद्रिय को कैसे जीता जाए?
कि आँख बंद कर दूँ?

00:12:41.648 --> 00:12:46.556
देखना ही बंद कर दूँ,
तो इंद्रिय की जीत हो गई? नहीं!

00:12:46.580 --> 00:12:56.905
कान के अंदर लकड़ी की डट्टी
लगा दें तो इंद्रियजीत होता नहीं है।
वो अलग type (प्रकार) है।

00:12:56.929 --> 00:13:04.823
वो तो परवस्तु है मगर अंदर का जो उघाड़ है
वो बहिर्मुख जाता है वो मेरा धर्म नहीं,

00:13:04.847 --> 00:13:10.106
मेरा स्वभाव नहीं, मेरा परिणाम
भी नहीं है। उससे मैं भिन्न हूँ।

00:13:10.130 --> 00:13:21.024
इस भिन्न का भान होता है तो उसका
व्यापार अटक जाता है और नया व्यापार अंदर
में शुरू हो जाता है उसका नाम अनुभूति है।

00:13:21.048 --> 00:13:28.912
ये बात कैसे होवे आत्मा को, वो बताते हैं।

00:13:28.936 --> 00:13:36.682
<b>तीनों इन्द्रियों को जीतकर </b>
यानि द्रव्येन्द्रिय, भावेन्द्रिय और
भावेन्द्रिय के विषय-

00:13:36.706 --> 00:13:47.766
बाहर के पदार्थ, उन तीन को जीतने
से यानि तीन का लक्ष छोड़ने से.... जीतने
का अर्थ क्या है? उसका लक्ष छोड़ देना।

00:13:47.790 --> 00:13:53.046
ये द्रव्येन्द्रिय आँख मेरी है
(ऐसी) बुद्धि छोड़ देना।

00:13:53.070 --> 00:14:00.298
आँख का स्वामी पुद्गल है,
मैं उसका स्वामी (नहीं हूँ),
(वो) मेरी चीज नहीं है।

00:14:00.322 --> 00:14:12.560
और क्षयोपशम ज्ञान का जो उघाड़ है
वो ज्ञान व्यवहारज्ञान है, उसका
स्वामी ज्ञेय है, उसका स्वामी मैं नहीं हूँ।

00:14:12.584 --> 00:14:20.620
ऐसे उसका लक्ष छोड़कर और
उसको इंद्रिय (के) द्वारा जो जानने
में आता है उसका लक्ष छोड़कर,

00:14:20.644 --> 00:14:27.114
उन तीनों का लक्ष छोड़कर
अंतरध्यान में आत्मा आता है
तब आत्मा का दर्शन हो जाता है।

00:14:27.138 --> 00:14:33.888
तो ज्ञेय और <b>ज्ञेयज्ञायक-संकर
नामक दोष</b>... ज्ञायक तो शुद्धात्मा है

00:14:33.912 --> 00:14:43.105
और जो इन्द्रियज्ञान - उघाड़ है
उसका नाम ज्ञेय है। ज्ञेय भिन्न है
और जाननेवाला भिन्न है।

00:14:43.129 --> 00:14:47.298
वो जो जाननेवाला आत्मा (है,
वो) अतीन्द्रियज्ञानमयी है

00:14:47.322 --> 00:14:58.366
और ज्ञेय यानि जो इन्द्रियज्ञान का
व्यापार अंदर में उत्पन्न होता है-
बहिर्मुख, वो ज्ञान नहीं है मगर ज्ञेय है।

00:14:58.390 --> 00:15:09.084
उस ज्ञेय से ज्ञान भिन्न है।
इन्द्रियज्ञान को सारा जगत ज्ञान
मानता है मगर (वो) ज्ञान नहीं है।

00:15:09.108 --> 00:15:21.373
ज्ञान की व्याख्या ऐसी है कि जो ज्ञान
आत्मा को प्रसिद्ध करे उसका नाम ज्ञान है।

00:15:21.397 --> 00:15:29.398
सूर्य को प्रसिद्ध करे
उसका नाम ही प्रकाश है।

00:15:29.422 --> 00:15:40.057
वो जो प्रकाश पृथ्वी को प्रसिद्ध करे
और सूर्य को प्रसिद्ध नहीं करे,
तो वो प्रकाश ही नहीं (है)।

00:15:40.081 --> 00:15:47.400
ऐसे जो ज्ञान है वो आत्मा का है, वो
आत्मा को प्रसिद्ध करे तो ज्ञान है।

00:15:47.424 --> 00:15:54.392
और इन्द्रियज्ञान जो है बहिर्मुख,
वो आत्मा को प्रसिद्ध नहीं करता,
पर को प्रसिद्ध करता है।

00:15:54.416 --> 00:16:03.959
तो पर को प्रसिद्ध करनेवाला जो ज्ञान है,
वो अज्ञान है। ज्ञेय है अर्थात् अ-ज्ञान है।

00:16:03.983 --> 00:16:12.970
अज्ञान यानि आत्मा को प्रसिद्ध न करे
उसका नाम अ-ज्ञान है।

00:16:12.994 --> 00:16:25.506
तो इन <b>(तीनों को) जीतकर, ज्ञेय
ज्ञायक-संकर नामक दोष आता था सो सब दूर
होने से</b> भेदविज्ञान हो गया। भेदज्ञान हुआ।

00:16:25.530 --> 00:16:30.367
जैसे कपड़ा मैला है (ऐसा कहा
जाता है किन्तु) कपड़ा मैला नहीं है।

00:16:30.391 --> 00:16:42.554
सचमुच (तो) कपड़े की अवस्था मलिन है
और इससे सूक्ष्म में जाओ तो मिट्टी
मलिन है। क्या कहा? रमणीकभाई!

00:16:42.578 --> 00:16:50.495
कपड़ा मैला हुआ – माता ऐसा कहे
(कि) कपड़ा धोना है, साफ करना है।

00:16:50.519 --> 00:17:01.574
तो कपड़ा मैला है - ऐसे मैल के संयोग-संबंध
से कपड़ा सफेद होने पर भी,

00:17:01.598 --> 00:17:13.792
सफेद और स्वच्छ होने पर भी
मिट्टी का संयोग देखकर कपड़े को मैला
कहना वो उपचार-व्यवहार का कथन है;

00:17:13.816 --> 00:17:16.055
सचमुच कपड़ा मैला नहीं है।

00:17:16.079 --> 00:17:23.956
दिखाई देता है जो ऊपर-ऊपर,
ऊपरी-ऊपरी (दृष्टि) से (जो)
दिखायी देता है वो कपड़ा नहीं है।

00:17:23.980 --> 00:17:33.650
कपड़ा इससे भीतर में सफेद
और स्वच्छ है; दूध जैसा सफेद है।

00:17:33.674 --> 00:17:44.582
मगर व्यवहारनय से देखो
तो कपड़े की अवस्था मलिन हुई
है, वो व्यवहारनय का कथन है।

00:17:44.606 --> 00:17:56.280
सचमुच वो जो अवस्था है वो मिट्टी की
है क्योंकि कपड़े की जाति की अवस्था
का नाम कपड़े की अवस्था कहा जाए।

00:17:56.304 --> 00:18:00.787
कपड़ा सफेद है और अवस्था मलिन है,
तो जाति उसकी (कपड़े की) नहीं है।

00:18:00.811 --> 00:18:05.795
तो मलिन भाव (का) मिलान करो
तो (वो) मिट्टी के साथ मिलता है।

00:18:05.819 --> 00:18:11.003
तो (वो) मिट्टी का विशेष है,
मिट्टी की अवस्था है, सचमुच
(वो) कपड़े की अवस्था नहीं है।

00:18:11.027 --> 00:18:24.736
कपड़े की अवस्था कपड़े से जुदी (पृथक)
नहीं पड़ती है और जो जुदी पड़े तो (वो)
कपड़े की अवस्था नहीं है। बराबर?

00:18:24.760 --> 00:18:31.265
बहनों को तो ये अनुभव है, कपड़े का।
इसलिए उनको दृष्टांत ऐसा दिया। हें?

00:18:31.289 --> 00:18:39.398
जुदा पड़ जाता है ना? जो मैल निकल
जाता है.... अगर (वो) कपड़े की
अवस्था हो तो निकलना नहीं चाहिए।

00:18:39.422 --> 00:18:48.509
आत्मा में से ज्ञान नहीं निकलता है।
आत्मा में से राग-द्वेष, सुख-दुःख निकल जाता
है इसलिए (वो) आत्मा की अवस्था नहीं है;

00:18:48.533 --> 00:18:56.736
और इन्द्रियज्ञान भी निकल जाता है इसलिए
(वो भी) आत्मा की अवस्था नहीं है। आहाहा!

00:18:56.760 --> 00:18:59.709
रमणीकभाई! ये अभ्यास करने जैसा है।

00:18:59.733 --> 00:19:08.758
मुमुक्षु: जुदी पड़ती है वह मेरी (चीज) नहीं।
पू. लालचंदभाई: जुदी पड़ जाती है
वह चीज मेरी नहीं है। ये देह चला जाता है।

00:19:08.782 --> 00:19:13.074
इस देह को जला देंगे कि नहीं सब? आहाहा!

00:19:13.098 --> 00:19:18.514
तो देह को जला देते हैं और
देह तो निकल जाती है, (देह का) वियोग
होता है तो देह मेरी चीज नहीं है।

00:19:18.538 --> 00:19:26.407
ऐसे आठ कर्म का अभाव हो जाता है,
जब सिद्ध-परमात्मदशा प्रगट होती है
तब आठ कर्म का अभाव हो जाता है।

00:19:26.431 --> 00:19:29.118
इसलिए आठ कर्म आत्मा की चीज नहीं है।

00:19:29.142 --> 00:19:35.487
और पुण्य या पाप के परिणाम भी, जब
यथाख्यात् चारित्र हो जाता है - केवलज्ञान,

00:19:35.511 --> 00:19:39.718
तब ये पुण्य-पाप निकल जाते हैं,
तो वो मेरी चीज नहीं है।

00:19:39.742 --> 00:19:47.718
ऐसे इन्द्रियज्ञान, जब केवलज्ञान प्रगट
होता है तो (वो भी) निकल जाता है।
निकल जाए वो मेरी चीज नहीं है।

00:19:47.742 --> 00:19:56.798
और ऐसे ही कपड़े की अवस्था मलिन है,
वो निकल जाती है इसलिए (वो अवस्था)
मेरी नहीं है और कपड़े की जाति नहीं है।

00:19:56.822 --> 00:20:06.043
कपड़ा सफेद है और अवस्था
मलिन है - ऐसा होता नहीं है।
जैसा सामान्य वैसा विशेष होना चाहिए।

00:20:06.067 --> 00:20:16.656
तो ये मैल निकल जाता है, तो कपड़ा मैला
है ऐसा कहना वो उपचार का, व्यवहार
का कथन है यानि झूठा कथन है।

00:20:16.680 --> 00:20:19.932
कपड़े को सफेद कहना - वो सच्चा कथन है।

00:20:19.956 --> 00:20:29.749
ऐसे आत्मा को रागी कहना
- ये झूठा कथन है। आत्मा ज्ञानमय
है, रागमय नहीं है। आहाहा!

00:20:29.773 --> 00:20:33.443
राग पर दृष्टि है तो रागी दिखाई देता है।

00:20:33.467 --> 00:20:42.065
जब वो दृष्टि पलटती है और ज्ञायक
पर दृष्टि जाती है तो मैं तो जाननहार
हूँ, रागी मैं नहीं हूँ। आहाहा!

00:20:42.089 --> 00:20:53.780
ऐसा भेदज्ञान करने से आत्मा का अनुभव
होता है। उस अनुभव का नाम धर्म है।
उसका नाम धर्मध्यान और शुक्लध्यान है।

00:20:53.804 --> 00:21:04.700
ऐसे आचार्य महाराज (की)
भेदज्ञान की बंसी बजती है कि
भगवान आत्मा भिन्न और राग भिन्न है।

00:21:04.724 --> 00:21:12.674
अतीन्द्रियज्ञानमय निज परमात्मा भिन्न है
और जो इन्द्रियज्ञान ज्ञेय है वो भिन्न है।

00:21:12.698 --> 00:21:21.465
ज्ञान भिन्न और ज्ञेय भिन्न।
ज्ञान भिन्न और राग भिन्न। आहाहा!
ज्ञान यानि ये ज्ञानमयी आत्मा।

00:21:21.489 --> 00:21:29.336
ऐसे वह <b>सब दूर होनेसे </b>
एकत्वबुद्धि छूट गई।
इन्द्रियज्ञान मेरा नहीं है।

00:21:29.360 --> 00:21:46.216
ममत्व(बुद्धि) छूट गई।
क्या कहा?

00:21:46.240 --> 00:21:54.327
ये चिदानंद भगवान आत्मा अंतर्दृष्टि
से दिखाई देता है और बहिर्दृष्टि
से रूपी पदार्थ दिखाई देते हैं।

00:21:54.351 --> 00:22:05.705
जो दिखाई देता है उसमें अहम् कर लेता है।
देह दिखे तो देह मेरा, कुटुंब दिखे तो
कुटुंब मेरा, मोटर, बंगला, पैसा। आहाहा!

00:22:05.729 --> 00:22:11.340
ये दुकान दिखे मीठाभाई की
कपड़े की, तो मेरी।

00:22:11.364 --> 00:22:17.607
और 'प्रणाम-संकल्प' (बिल्डिंग)
में ready-made (बना-बनाया)
की दुकान दिखे तो दुकान मेरी।

00:22:17.631 --> 00:22:21.878
नरेंद्रभाई कहें मेरी।
नरेंद्रभाई की दुकान नहीं है।

00:22:21.902 --> 00:22:30.572
ये बहिर्दृष्टि से जो देखने में आता है
उसमें मोह कर लेता है, मेरापना।
वो चीज मेरी होती नहीं है।

00:22:30.596 --> 00:22:36.754
मेरेपने की मिथ्याबुद्धि होती है (उससे)
वो दुःखी होता है। मोह से दुःखी होता है।

00:22:36.778 --> 00:22:45.203
मोह छूट जाता है तो आत्मा सुखी हो जाता
है। ऐसे ये भगवान बनने का मंत्र है।

00:22:45.227 --> 00:22:50.118
ये समयसार है ना वो
सबको परमात्मा बना देता है।

00:22:50.142 --> 00:22:58.638
बहिरात्मा में से अंतरात्मा में आता है
और अंतरात्मा में आए तो
अल्पकाल में परमात्मा बन जाता है।

00:22:58.662 --> 00:23:08.745
चार गति में भटकना है इसके
लिए समयसार नहीं है। छूटना हो
दुःख से, इसके लिए ये है शास्त्र।

00:23:08.769 --> 00:23:15.785
(जिसको) गति प्रिय है उसके लिए
समयसार निमित्त नहीं पड़ता है। आहाहा!

00:23:15.809 --> 00:23:22.589
ऐसे <b>संकर नामक
दोष आता था सो सब दूर होनेसे
एकत्वमें टंकोत्कीर्ण </b>

00:23:22.613 --> 00:23:33.692
एकत्व यानि आत्मा एकरूप है,
ज्ञान-दर्शनमय है आत्मा।
ज्ञान-दर्शनवाला नहीं, ज्ञान-दर्शनमय है।

00:23:33.716 --> 00:23:43.172
'मय' अनन्य एकरूप तादात्म्य है।
आत्मा ज्ञान-आनंद से तादात्म्य है और राग
-द्वेष तो संयोग-संबंध है, निकल जाता है।

00:23:43.196 --> 00:23:49.043
और इन्द्रियज्ञान भी संयोग-संबंध है,
(वो भी) निकल जाता है। उसके साथ
आत्मा का तादात्म्य संबंध (नहीं है)।

00:23:49.067 --> 00:23:56.203
तादात्म्य संबंध किसको कहें? कि तीनों
काल उसके साथ रहे और जुदा पड़े (नहीं)।

00:23:56.227 --> 00:24:03.332
शक्कर और मिठास उसके साथ... शक्कर
का मिठास के साथ तादात्म्य संबंध है।

00:24:03.356 --> 00:24:10.892
वो जुदा पड़ती नहीं है। लेबोरेटरी में
भेजो कि भाई इसमें से मिठास निकाल
दो, तो मिठास नहीं निकलती है।

00:24:10.916 --> 00:24:19.754
मिठास निकल जाये तो शक्कर ही रहती
नहीं है। हाँ! मैल निकल जाता है क्योंकि
मैल के साथ शक्कर का संयोग-संबंध है।

00:24:19.778 --> 00:24:31.754
जैसे कपड़े के साथ मैल का संयोग-संबंध है
मगर कपड़े के साथ जो सफेदपना
है, श्वेतपना है, वो तो तादात्म्यसंबंध है।

00:24:31.778 --> 00:24:44.172
कपड़े का मैल निकलता है मगर श्वेतपना,
सफेदपना कपड़े का, (उनका) तादात्म्य-तद्रूप-
अनन्य संबंध है; वो सफेदपना निकलता नहीं है।

00:24:44.196 --> 00:24:49.074
ऐसे आत्मा में से अज्ञान निकल जाता
है (मगर) ज्ञान निकलता नहीं है।

00:24:49.098 --> 00:24:56.416
अज्ञान दूर हो जाता है मगर ज्ञान
आत्मा से दूर होता नहीं है। आहाहा!

00:24:56.440 --> 00:25:02.318
ऐसे <b>एकत्वमें टंकोत्कीर्ण </b>
एकत्व यानि एकपना, एकपना।

00:25:02.342 --> 00:25:08.474
एकत्व यानि एकपना है।
आत्मा एक का दो नहीं होता है।

00:25:08.498 --> 00:25:14.416
आत्मा अपना एकरूप जो है उसको
छोड़कर दोरूप नहीं होता है।

00:25:14.440 --> 00:25:18.416
कभी मनुष्य हो गया तो कभी देव हो
गया और कभी पुण्यवाला हो गया;

00:25:18.440 --> 00:25:23.056
तीन काल में आत्मा पुण्य-पापरूप
होता ही नहीं है। वो तो अलग चीज है।

00:25:23.080 --> 00:25:29.052
मान्यता कर ली है, एकत्वबुद्धि। वो भूल
निकल जाती है तो आत्मा एकत्व(रूप) है;

00:25:29.076 --> 00:25:33.678
एक हूँ,
मैं एक हूँ - ऐसा भान आ जाता है।

00:25:33.702 --> 00:25:41.056
<b>एकत्वमें टंकोत्कीर्ण और ज्ञानस्वभावके
द्वारा </b>टंकोत्कीर्ण यानि वैसा का वैसा।

00:25:41.080 --> 00:25:46.678
जैसे ये प्रतिमाजी है। एक बार गढ़ी तो
वो प्रतिमा वैसी की वैसी रहती है।

00:25:46.702 --> 00:25:52.687
कुछ उसमें बढ़-घट होती नहीं है।
ऐसे ये आत्मा है (ये) चैतन्य-प्रतिमा है।

00:25:52.711 --> 00:26:00.154
उसे तो कारीगर गढ़ता है
(मगर) इसको कोई गढ़नेवाला
नहीं है। अघटित घाट है यह तो।

00:26:00.178 --> 00:26:08.576
अनादि-अनंत चैतन्य परमात्मा
जैसा का तैसा है। नरक में जाए,
निगोद में जाए, देव में जाए, आहाहा!

00:26:08.600 --> 00:26:16.616
तो भी भगवान आत्मा अपना
टंकोत्कीर्ण स्वभाव छोड़ता नहीं है।
उसमें बढ़-घट होती नहीं है आत्मा में।

00:26:16.640 --> 00:26:23.083
जिसमें बढ़-घट होती है वो आत्मा
नहीं है; वो परभाव है, परद्रव्य है।

00:26:23.107 --> 00:26:29.736
परद्रव्य में बढ़-घट होती है,
स्वद्रव्य में बढ़-घट नहीं होती है।

00:26:29.760 --> 00:26:39.838
ऐसे <b>टंकोत्कीर्ण और ज्ञान
स्वभावके द्वारा </b>यानि अपना जो ज्ञान
स्वभाव त्रिकाली सामान्य है ज्ञायक वो मैं हूँ

00:26:39.862 --> 00:26:45.945
- इसके द्वारा <b>सर्व अन्यद्रव्योंसे
परमार्थ से भिन्न </b>आहाहा!

00:26:45.969 --> 00:26:51.185
इस भगवान आत्मा के अलावा.. ये
भगवान है अंदर विराजमान है। आहाहा!

00:26:51.209 --> 00:27:01.665
देह-देवल में... ये देवल है देव का,
उसमें चैतन्य-प्रतिमा अलग है। आहाहा!
वैसा का वैसा अंदर विराजमान है।

00:27:01.689 --> 00:27:08.123
भगवान का दर्शन करने से धर्म होता
है। बालक को माता कहे कि मंदिर जाना

00:27:08.147 --> 00:27:14.336
और प्रभु का, भगवान का दर्शन
रोज करना तो तुझे धर्म होगा।

00:27:14.360 --> 00:27:22.932
भगवान का दर्शन करने से धर्म होगा
वो वाक्य सच्चा है, वो वाक्य सच्चा है।

00:27:22.956 --> 00:27:33.554
मगर भगवान तो एक प्रकार का अंदर में है,
उस भगवान का दर्शन करने से धर्म होता है।

00:27:33.578 --> 00:27:39.936
इन परमात्मा का दर्शन करने से
पुण्य होता है, धर्म होता नहीं है।

00:27:39.960 --> 00:27:52.172
तो भी वो परमात्मा अपने स्वरूप
को स्मरण में लाने के लिए निमित्त हैं
इसलिए उन भगवान के दर्शन की विधि चलती है।

00:27:52.196 --> 00:27:55.198
ये क्यों दर्शन करने को आते हैं?

00:27:55.222 --> 00:28:11.229
एक बार ऐसा हुआ चिमनभाई! कि
मैं इंदौर गया था। तो वहाँ एक १०-१५
किलोमिटर दूर एक मंदिर नया बना था।

00:28:11.253 --> 00:28:17.380
तो वहाँ का आमंत्रण आया कि
आप जीमकर (भोजन करके) शाम
को घूमने को, फिरने को आओ।

00:28:17.404 --> 00:28:22.518
उस तरफ आओ हमारा मंदिर देखने के लिए,
दर्शन करने के लिए। अच्छा, मैंने कहा।

00:28:22.542 --> 00:28:32.398
तो (मैं) ५-१० मुमुक्षु के साथ वहाँ गया।
वो भाई भी सब उस हिसाब से (वहाँ)
थे, वहाँ के रहनेवाले लोग भी।

00:28:32.422 --> 00:28:47.243
दर्शन किये, सब बैठे तो बात
निकली कि ये प्रतिमा का दर्शन करने
का क्या कारण है? ऐसा किसी ने पूछा।

00:28:47.267 --> 00:28:55.949
ये प्रतिमा-भगवान का दर्शन
करने से क्या लाभ होता है?
मैंने कहा कि आत्मलाभ होता है।

00:28:55.973 --> 00:28:59.394
आत्मलाभ होता है?
हाँ! आत्मलाभ होता है।

00:28:59.418 --> 00:29:10.172
कैसे? कैसे होता है? तो उसके
लिए मैंने दृष्टांत एक दिया कि एक
जंगल के अंदर सिंहनी है ना, सिंहनी?

00:29:10.196 --> 00:29:19.314
जैसे गीर के जंगल में सिंह-सिंहनी
रहते हैं ना। तो उसकी प्रसूति हुई।
हाँ! प्रसूति हुई तो उसके बच्चे हुए।

00:29:19.338 --> 00:29:24.932
तो दो-तीन बच्चों में से एक बच्चा
अलग हो गया, अलग पड़ गया।

00:29:24.956 --> 00:29:30.514
तो वो भेड़ों के साथ, चरवाहे के साथ
(जाकर) उसमें (झुंड में) मिल गया।

00:29:30.538 --> 00:29:40.136
तो वो भी बड़ा होने लगा भेड़ों के साथ।
तो भेड़ों के साथ रहने से, जिसको देखे
'ऐसा ही मैं हूँ' - ऐसी भ्रांति हो गई।

00:29:40.160 --> 00:29:46.660
अपना स्वरूप तो भूल गया।
मैं सिंह हूँ वो भूल गया।

00:29:46.684 --> 00:29:53.736
जिसको देखता है उसके साथ रमता है
-खेलता है तो "मैं भी भेड़ हूँ"। आहाहा!

00:29:53.760 --> 00:30:00.896
घेटा, आप घेटा को क्या कहते हैं,
घेटा? भेड़-भेड़। भेड़ कहते हैं।

00:30:00.920 --> 00:30:10.358
हाँ! वो ऊन होती है ना
उसके ऊपर, ऊन। हाँ! भेड़, भेड़।

00:30:10.382 --> 00:30:17.803
भेड़ समझ में आया ना, भेड़? अच्छा! तो
ऐसा हुआ वो बड़ा होता गया धीरे-धीरे-धीरे।

00:30:17.827 --> 00:30:27.412
उस चरवाहे ने सोचा कि वो भटक
गया है तो उसको भी साथ में रखता हूँ।
तो थोड़ा-थोड़ा बड़ा होने लगा।

00:30:27.436 --> 00:30:34.985
एक दफे क्या हुआ कि जंगल में
सब जाते थे, उसके सामने एक टेकरी थी।

00:30:35.009 --> 00:30:38.709
वहाँ टेकरी पर सिंह आया।
सिंह ने उसको देखा।

00:30:38.733 --> 00:30:45.927
अरे! ये तो मेरी जाति का बच्चा सिंह, ये
भेड़ की जाति में कहाँ मिश्रित हो गया है?

00:30:45.951 --> 00:30:50.465
वे तो भेड़ हैं और ये तो सिंह है;
मेरी जाति का बच्चा है।

00:30:50.489 --> 00:30:57.580
अब इसको छुड़ाना कैसे उसमें से?
उसको (बच्चे को) भ्रांति तो हो गई,
वो तो भ्रांति हो गई थी ना।

00:30:57.604 --> 00:31:06.296
भेड़ तो हुआ (नहीं था)।
सिंह तो सिंह का बच्चा था। सिंह
का बच्चा तो सिंह का बच्चा होता है।

00:31:06.320 --> 00:31:12.278
तो उसने वहाँ से उसकी भाषा में एक
दहाड़ मारी, आवाज दी उसकी भाषा में।

00:31:12.302 --> 00:31:17.074
तो वो सिंह की वृत्ति तो बैठी (ही) थी
अंदर, वृत्ति। वृत्ति उठी, देखा।

00:31:17.098 --> 00:31:27.180
उसने कहा वहाँ से कि
"पहले तू मेरे सामने देख। मेरे सामने
देखने के बाद तू तेरे सामने देखना।"

00:31:27.204 --> 00:31:29.994
तो ऐसा किया (वहाँ देखा) उसने, ऐसा करके
(वहाँ देखकर) ऐसा किया (स्वयं को देखा)।

00:31:30.018 --> 00:31:36.363
अरे! मैं तो सिंह हूँ! कूदकर निकल
गया बाहर। समझे? बाहर निकल गया।

00:31:36.387 --> 00:31:39.532
मुमुक्षु: अपनी शक्ति का ख्याल आ गया।
पू. लालचंदभाई: ख्याल आ गया।

00:31:39.556 --> 00:31:49.558
ऐसे ये जो प्रतिमा का व्यवहार है,
(वो) सही है। उसमें क्या फायदा होता है?

00:31:49.582 --> 00:32:02.118
कि चौबीस घंटा व्यापार-रोजगार में पड़ा हो
आत्मा, उसमें चौबीस घंटे में कोई सुबह में
आता है तो कोई शाम को दर्शन करने को आता है।

00:32:02.142 --> 00:32:08.789
तो उस प्रतिमा को देखकर जो चौबीस घंटे
में अपने आत्मा का विस्मरण हो गया था,

00:32:08.813 --> 00:32:14.372
जैसे सिंह के बच्चे को स्वरूप का
विस्मरण (हो गया था)। था तो सिंह।

00:32:14.396 --> 00:32:19.749
था तो सिंह मगर भेड़-मेंढा है
- ऐसी भ्रांति हो गई।

00:32:19.773 --> 00:32:24.780
तो चौबीस घंटे में मैं व्यापारी हूँ,
मैं व्यापारी हूँ, मैं व्यापारी हूँ,
मैं व्यापारी हूँ, भ्रांति हो गई।

00:32:24.804 --> 00:32:29.927
मैं मनुष्य हूँ, मनुष्य हूँ, मैं पैसा
कमानेवाला हूँ (ऐसी) भ्रांति हो गई थी।

00:32:29.951 --> 00:32:35.456
तो मंदिरजी में आया दर्शन करने को,
आहाहा! परमात्मा के दर्शन करता है।

00:32:35.480 --> 00:32:41.460
"हे अरिहंत परमात्मा! जैसा आपका
स्वरूप है ऐसा (ही) मेरा स्वरूप है।"

00:32:41.484 --> 00:32:48.323
उनके दर्शन करने से अपने
स्वरूप का स्मरण आता है।

00:32:48.347 --> 00:32:55.798
उस स्वरूप का स्मरण आते-आते, वहीं
दर्शन करते-करते सम्यग्दर्शन हो जाता है।

00:32:55.822 --> 00:33:01.487
उस प्रतिमा का दर्शन सम्यग्दर्शन का
निमित्त कारण है, ऐसा आगम में लिखा है।

00:33:01.511 --> 00:33:08.247
सही है! क्योंकि उसको देखने के बाद,
अरिहंत के द्रव्य-गुण-पर्याय
को जानने के बाद,

00:33:08.271 --> 00:33:16.234
आत्मा जब अपने द्रव्य-गुण-पर्याय को
जानता है (तो) उसका मोह क्षय हो जाता
है। उसके साथ मिलान कर लेता है।

00:33:16.258 --> 00:33:22.016
जैसे सिंह ने कहा कि मेरे सामने देख,
सिंह ने कहा कि मेरे सामने देख।

00:33:22.040 --> 00:33:30.683
ऐसे (ही) भगवान ने कहा कि मेरे
सामने देख और बाद में भगवान ने
कहा कि (अब तू) तेरे सामने देख;

00:33:30.707 --> 00:33:35.083
तो जैसा मैं ऐसा तू।
ऐसा सिंह ने देखा। आहाहा!

00:33:35.107 --> 00:33:40.576
ऐसा जब देखता है तो कूदकर, संसार
से बाहर (निकलकर) सिद्ध हो जाता है।

00:33:40.600 --> 00:33:46.776
जैसे बच्चा निकल गया ना, ऐसे ये आत्मा
चार गति छोड़ देता है, अल्पकाल में।

00:33:46.800 --> 00:33:53.372
ऐसा निमित्त है वो। ऐसे ही फिजूल
नहीं है (जिनेन्द्र का दर्शन)।

00:33:53.396 --> 00:33:57.852
मुमुक्षु: श्रीमद्जी ने कहा था कि
जिन-प्रतिमा स्वरूप का कारण

00:33:57.876 --> 00:34:03.549
और ध्यान का कार्य है, ऐसी जो
जिन-प्रतिमा, उससे लाखों लोग विमुख हुए।
पू. लालचंदभाई: बराबर!

00:34:03.573 --> 00:34:13.580
मुमुक्षु: स्थानकवासी संप्रदाय मे।
पू. लालचंदभाई: हाँ! विमुख हुए। विमुख
हुए। बस! श्रीमद् का वाक्य बराबर है।

00:34:13.604 --> 00:34:21.216
आहाहा! ये तो परमात्मा हैं ना
अपने स्वरूप को स्मरण करने के लिए
हैं। वो तो अपने स्वरूप में लीन हैं।

00:34:21.240 --> 00:34:24.243
वो तो कोई कहते नहीं हैं
कि तू तेरे को देख।

00:34:24.267 --> 00:34:29.807
मगर उनको देखने से, अपने स्वरूप
का जो विस्मरण हुआ था व्यापार में,
चौबीस घंटे में... आहाहा!

00:34:29.831 --> 00:34:37.838
आत्मा को याद ही नहीं करता था।
मगर मंदिर में आने से थोड़ी कषाय
की शांति होती है, मंदता होती है।

00:34:37.862 --> 00:34:43.727
व्यापार का तो (कषाय नहीं),
ग्राहक तो है नहीं वहाँ कोई। हें?

00:34:43.751 --> 00:34:55.398
दाल का ग्राहक मंदिर में तो आता नहीं है।
हें? दुकान पर आएगा। ये दाल
के व्यापारी हैं, बड़े व्यापारी हैं।

00:34:55.422 --> 00:35:01.363
यहाँ तो कोई है नहीं ग्राहक।
यहाँ तो प्रभु का दर्शन करता है।
दर्शन करके, आहाहा!

00:35:01.387 --> 00:35:08.256
आप अरिहंत हैं, व्यक्तरूप अरिहंत हो गए।
मैं शक्तिरूप सिद्ध हूँ, अरिहंत हूँ। आहाहा!

00:35:08.280 --> 00:35:15.434
मैं अपने स्वरूप को भूल गया हूँ।
प्रभु! आपका जैसा स्वरूप (है)
वैसा ही मेरा स्वरूप है।

00:35:15.458 --> 00:35:22.194
आपकी जाति और मेरी जाति एक है।
आपकी जाति और मेरी जाति में फर्क नहीं है।

00:35:22.218 --> 00:35:29.154
भले भेड़ के बीच में वो बच्चा आ गया
लेकिन सिंह ने कहा कि ये मेरी जाति
(का) है, भेड़ की जाति (का) नहीं है।

00:35:29.178 --> 00:35:41.212
मैं सिद्ध समान आत्मा हूँ, तो
उनका दर्शन करने से अनुभव होता है।

00:35:41.236 --> 00:35:44.678
अच्छा! भगवान की प्रतिमा (का
दर्शन) करो, पूजा करो तो शुभभाव हो।

00:35:44.702 --> 00:35:51.705
शुभभाव नहीं, ज्ञान होता है आत्मा का।
आहाहा! शुभभाव को गौण कर दो,
पुण्य बंधता है उसको गौण कर दे।

00:35:51.729 --> 00:35:59.736
पुण्य बंधता है इसलिए मैं मंदिर में जाता
नहीं हूँ। मैं मेरे स्वरूप का स्मरण करने
के लिए प्रतिमा के सामने खड़ा होता हूँ।

00:35:59.760 --> 00:36:12.007
प्रभु! जैसा आपका स्वरूप (है) वैसा
मेरा स्वरूप है! इस(के) लिए प्रतिमा है।
शुभभाव के लिए प्रतिमा नहीं है। आहाहा!

00:36:12.031 --> 00:36:22.616
ऐसे भेदज्ञान का मंत्र चलता है कि
अतीन्द्रियज्ञानमयी आत्मा भिन्न है और पर
को प्रसिद्ध करनेवाला इन्द्रियज्ञान भिन्न है।

00:36:22.640 --> 00:36:27.349
ज्ञेय भिन्न और ज्ञान भिन्न।
आहाहा!

00:36:27.373 --> 00:36:36.420
ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान; यानि
इन्द्रियज्ञान व्यवहारज्ञान है और भगवान
आत्मा अतीन्द्रियज्ञानमयी - ये निश्चयज्ञान है।

00:36:36.444 --> 00:36:43.780
निश्चयज्ञान से व्यवहारज्ञान भिन्न है।
व्यवहारज्ञान कहो, अज्ञान कहो
(या) ज्ञेय कहो। आहाहा!

00:36:43.804 --> 00:36:56.283
ऐसे <b>ज्ञानस्वभावके द्वारा सर्व
अन्यद्रव्योंसे </b>अन्य द्रव्यों से यानि
पुण्य-पाप के परिणाम से, इन्द्रियज्ञान से,

00:36:56.307 --> 00:37:01.745
नव तत्त्व का जो भेद है,
उससे अलग-भिन्न हूँ आत्मा।

00:37:01.769 --> 00:37:10.883
गुणस्थान, चौदह मार्गणास्थान,
उन परिणाममात्र से मेरा आत्मा भिन्न है।
वो अन्य द्रव्य है, स्वद्रव्य नहीं है।

00:37:10.907 --> 00:37:19.767
<b>अन्यद्रव्योंसे परमार्थ से भिन्न</b>,
परमार्थ से यानि सचमुच भिन्न <b>ऐसे
अपने आत्माका अनुभव करता है</b>,

00:37:19.791 --> 00:37:32.665
जब आत्मा इन्द्रियज्ञान का लक्ष
छोड़कर अतीन्द्रियज्ञानमयी आत्मा
में उपयोग लगाता है। आहाहा!

00:37:32.689 --> 00:37:45.909
आत्मा में, उपयोग आत्मा में लगाता है
उसका नाम योग है और उपयोग
आत्मा में लग जाए उसका नाम योगी है।

00:37:45.933 --> 00:37:57.012
आत्मा है उसके प्रति उपयोग जब लगता
है, तो उपयोग को आत्मा की ओर
झुककर लगाना उसका नाम योग है;

00:37:57.036 --> 00:38:09.296
और उसका अनन्य अनुभव होना,
उसका नाम योगी है। आहाहा!
योगी है, ध्यानी है, ज्ञानी है।

00:38:09.320 --> 00:38:23.012
ऐसे जब अपने आत्मा को आत्मा अनुभवता
है.... पुण्य-पाप का अनुभव तो अनंतबार किया,
पुण्य-पाप का अनुभव करके आज तक तो दुःखी हुआ।

00:38:23.036 --> 00:38:31.145
अब पुण्य-पाप के अनुभव को छोड़कर
इस जाननेवाले को जान ले। आहाहा!

00:38:31.169 --> 00:38:40.363
कि मैं तो जाननहार हूँ; मैं पुण्य-पाप
का करनेवाला नहीं हूँ और पुण्य-
पाप का जाननेवाला भी मैं नहीं हूँ।

00:38:40.387 --> 00:38:50.607
करनेवाला तो नहीं हूँ (मगर) जाननेवाला
(भी) मैं नहीं हूँ। उसको जाननेवाला जुदा है।

00:38:50.631 --> 00:39:00.914
पुण्य-पाप को करनेवाला जुदा है
और पुण्य-पाप को जाननेवाला भी
जुदा है; उससे मैं जुदा हूँ। आहाहा!

00:39:00.938 --> 00:39:07.714
क्या कहा? कि पुण्य-पाप का परिणाम
जो विकार भाव है, उसको करनेवाला पुद्गल है;

00:39:07.738 --> 00:39:15.127
मैं उसे करनेवाला नहीं हूँ,
इसलिए मैं अकर्ता हूँ।

00:39:15.151 --> 00:39:23.616
पुण्य-पाप को करनेवाला द्रव्यकर्म
है; मैं उसको करनेवाला नहीं हूँ,
इसलिए मैं अकर्ता हूँ।

00:39:23.640 --> 00:39:29.394
और उसको जाननेवाला इन्द्रियज्ञान है;
मैं (उसका) जाननेवाला भी नहीं हूँ।

00:39:29.418 --> 00:39:35.456
उससे मैं जुदा जाननेवाले को
जानता हूँ वो मैं हूँ। मेरे जानने
का विषय पुण्य-पाप नहीं है।

00:39:35.480 --> 00:39:43.794
करने का विषय पुण्य-पाप नहीं है
और जानने का विषय भी पुण्य-पाप
नहीं है; जानने का विषय मेरा आत्मा है।

00:39:43.818 --> 00:39:49.843
मेरे आत्मा को जानने से मेरे को शांति होती है।

00:39:49.867 --> 00:39:57.292
ऐसे <b>अपने आत्माका अनुभव करता है </b>
एक-एक शब्द का ये विस्तार चलता है। आहाहा!

00:39:57.316 --> 00:40:03.496
<b>स्वयं के </b>यानि अपने आत्मा को 
जब आत्मा अनुभव करता है, <b>वह</b>,

00:40:03.520 --> 00:40:10.723
<b> वह </b>वह साधक आत्मा, अनुभवी 
आत्मा <b>'जितेन्द्रिय जिन' है। </b>आहाहा!

00:40:10.747 --> 00:40:20.083
इन्द्रियज्ञान से अधिक आत्मा को, 
अतीन्द्रियज्ञानमयी आत्मा को अनुभव 
में लिया तो जिन हो गया। आहाहा!

00:40:20.107 --> 00:40:32.874
इसका नाम ईषत् जिन है, छोटा जिन; बड़ा 
जिन नहीं हुआ (अभी) मगर जिन की जाति है।

00:40:32.898 --> 00:40:41.083
ये अरिहंत की जाति प्रगट हो गई। 
अरिहंत होने के पहले, अरिहंत 
का छोटा जिन हो गया। आहाहा!

00:40:41.107 --> 00:40:50.980
मोह को जीत लिया, इन्द्रियज्ञान को जीत 
लिया, निर्मोही हो गया, अतीन्द्रियज्ञानमयी हो 
गया, तो 'जितेन्द्रिय जिन' (हो गया)। आहाहा!

00:40:51.004 --> 00:40:55.092
into-comma (उद्धरण में - ‘ ‘) में लिखा है। 
<b>'जितेन्द्रिय जिन'। </b>आहाहा!

00:40:55.116 --> 00:41:08.238
जिसने आत्मा का अनुभव किया उसका नाम 
जिन है। आहाहा! जैन नहीं, जिन है। आहाहा!

00:41:08.262 --> 00:41:14.674
'जिन' तो ये अरिहंत की 
जाति का हो गया। आहाहा!

00:41:14.698 --> 00:41:21.220
जितेन्द्रिय जिन, इंद्रिय को जीत लिया 
इसलिए उसका नाम जिन हो गया।

00:41:21.244 --> 00:41:28.252
<b>ज्ञानस्वभाव अन्य अचेतन द्रव्योंमें 
नहीं है</b>, यानि जो चैतन्य परमात्मा है,

00:41:28.276 --> 00:41:35.945
ज्ञानस्वभावी आत्मा है, वो अन्य अचेतन 
देह आदि, पुद्गल आदि, पैसा आदि,

00:41:35.969 --> 00:41:44.372
ये धन-धान्य आदि, ये हीरा-मोती-माणिक आदि 
वो अचेतन हैं, उनमें चेतन परमात्मा नहीं है।

00:41:44.396 --> 00:41:50.132
उससे भगवान आत्मा अलग है। 
<b>अन्य अचेतन द्रव्योंमें नहीं है</b>,

00:41:50.156 --> 00:41:56.692
और पुण्य और पाप का परिणाम (भी) 
अचेतन है, उसमें आत्मा नहीं है। आहाहा!

00:41:56.716 --> 00:42:04.892
हिंसा-अहिंसा का परिणाम जो आस्रव तत्त्व 
है अचेतन, उसमें चेतन आत्मा नहीं है।

00:42:04.916 --> 00:42:10.518
<b>इसलिए उसके द्वारा आत्मा 
सबसे अधिक, </b>सर्व से जुदा,

00:42:10.542 --> 00:42:22.696
<b>अधिक </b>यानि उससे जुदा 
मैं हूँ। आहाहा! <b>भिन्न ही है। 
सबसे अधिक, भिन्न ही है। </b>

00:42:22.720 --> 00:42:31.474
<b>कैसा है यह ज्ञानस्वभाव? </b>
जो पर से अलग हो गया और दृष्टि में ज्ञान
स्वभाव आ गया, वो ज्ञानस्वभाव कैसा है?

00:42:31.498 --> 00:42:37.243
ये ज्ञानस्वभाव जो दृष्टि में आया, 
ये कैसा है? वो दृष्टिवंत बताते हैं।

00:42:37.267 --> 00:42:44.020
जिसको सम्यग्दृष्टि, 
सच्ची दृष्टि हो गई, सम्यक् यानि 
सच्ची-समीचीन, सच्ची दृष्टि हो गई;

00:42:44.044 --> 00:42:53.372
जैसा आत्मा है ऐसे आत्मा की दृष्टि, 
अनुभव में आ गया, तो 
वो फरमाते हैं अनुभवी

00:42:53.396 --> 00:43:03.847
<b>कैसा है यह ज्ञानस्वभाव? </b>
आत्मा जो अनुभव में आया.... अनुभव में 
आने के बाद शास्त्र लिखते हैं। आहाहा!

00:43:03.871 --> 00:43:13.954
अज्ञानी लिखता है ना, वो बही-खाते 
(चोपड़ा) लिखता है। अज्ञानी शास्त्र 
नहीं लिख सकता है। आहाहा!

00:43:13.978 --> 00:43:20.287
बही-खाते तो बहुत हैं, हजारों, लाखों, 
करोड़ों मगर शास्त्र, आहाहा!

00:43:20.311 --> 00:43:24.949
वो तो आत्मा (का) अनुभवी 
(ही) लिख सकता है।

00:43:24.973 --> 00:43:33.909
<b>कैसा है यह ज्ञानस्वभाव? </b>
ये जो अनुभव में आया, पर से जुदा, 
इस आत्मा का स्वभाव क्या है?

00:43:33.933 --> 00:43:39.887
<b>इस विश्व के (समस्त पदार्थोंके) 
ऊपर तिरता हुआ</b> सारा जो विश्व है,

00:43:39.911 --> 00:43:46.118
बाहर का विश्व है, इससे <b>तिरता</b> 
यानि जुदा, <b>तिरता</b> यानि जुदा।

00:43:46.142 --> 00:43:53.598
जैसे लकड़ी है पानी में तैरती है 
मगर पानी से अलग रहती है। वो 
लकड़ी पानीमय होती नहीं है।

00:43:53.622 --> 00:43:58.625
वो ऊपर-ऊपर तैरती है; वो पानीमय 
होती नहीं है। वो डूबती नहीं है।

00:43:58.649 --> 00:44:04.972
पानी के ऊपर होने पर भी वो पानी में 
घुस जाती नहीं है। ऊपर-ऊपर तैरती है।

00:44:04.996 --> 00:44:13.767
ऐसे <b>इस विश्व के (समस्त पदार्थोंके) 
ऊपर तिरता हुआ (उन्हें जानता हुआ 
भी उनरूप न होता हुआ), </b>आहाहा!

00:44:13.791 --> 00:44:23.909
ये सारा विश्व ज्ञान के अंदर ज्ञेय होने पर 
भी वो आत्मा विश्वरूप यानि अनेकरूप 
होता नहीं है; विश्व का अर्थ अनेक।

00:44:23.933 --> 00:44:31.269
आत्मा एकपना छोड़ता नहीं और अनेक
रूप होता नहीं है त्रिकाल में। अच्छा!

00:44:31.293 --> 00:44:38.118
एक बाहर के विश्व से तो जुदा है 
मगर एक अंदर के विश्व से 
(भी) जुदा है, अंदर का (विश्व)।

00:44:38.142 --> 00:44:44.203
अंदर का विश्व क्या है? कि 
आत्मा अभेद सामान्य एक है।

00:44:44.227 --> 00:44:53.914
उसकी जो अवस्था होती है, अनंत गुण 
की अनंत पर्याय - वो अंदर का विश्व है; 
उस विश्व से भी आत्मा जुदा है। आहाहा!

00:44:53.938 --> 00:45:00.585
दो प्रकार के विश्व हैं। एक बाहर का 
(और) एक अंतरंग का, अंदर का विश्व;

00:45:00.609 --> 00:45:10.834
(उन) दो विश्वों से आत्मा जुदा अभेद 
सामान्य एकरूप है। आहाहा!

00:45:10.858 --> 00:45:19.167
फिर से, अंदर का विश्व। जो 
क्रोध-मान-माया-लोभ, व्रत-अव्रत, दया
-दान, हिंसा-अहिंसा का जो परिणाम होता है

00:45:19.191 --> 00:45:23.740
अथवा जो गुणस्थान का परिणाम होता 
है, मार्गणास्थान का परिणाम होता है,

00:45:23.764 --> 00:45:32.069
उत्पाद-व्यय, उत्पाद-व्यय, उत्पाद-व्यय, 
उत्पाद-व्यय होती है ना, पर्याय, वो पर्याय है 
न, अनेकरूप है और द्रव्य तो एकरूप है।

00:45:32.093 --> 00:45:42.709
पर्याय अनेकरूप है। 
तो विश्व का अर्थ अनेकपना, जहाँ 
अनेकपना हो उसका नाम विश्व है।

00:45:42.733 --> 00:45:50.936
जैसे ये छह द्रव्य से भरा हुआ लोक है, 
वो अनेक हो गया ना - अनंत जीव, 
अनंत पुद्गल परमाणु, सारा विश्व।

00:45:50.960 --> 00:45:58.465
इस विश्व से जुदा - 
बाहर के विश्व से (जैसे) जुदा है, ऐसे 
अंदर के विश्व से भी आत्मा जुदा है।

00:45:58.489 --> 00:46:06.118
विश्व में अनेकपना है, मेरे में 
अनेकपना नहीं है। मैं तो एक 
टंकोत्कीर्ण परमात्मा हूँ। आहाहा!

00:46:06.142 --> 00:46:17.216
एकोहम्! एकोहम्! मैं एक हूँ, 
अनेक भाव मेरा नहीं है।

00:46:17.240 --> 00:46:24.229
एक अविनाशी है और अनेक जो 
परिणाम प्रगट होता है, वो तो 
नाशवान है। नाशवान मैं नहीं हूँ।

00:46:24.253 --> 00:46:31.300
पर्यायदृष्टि छूट गई, द्रव्यदृष्टि हो गई, 
अनुभव हो गया; अनुभव के बाद 
(पूछा कि) ये ज्ञानस्वभाव कैसा है?

00:46:31.324 --> 00:46:37.083
तो कहे कि सारे विश्व से जुदा है। विश्व 
दिखायी देता है मगर विश्वमय होता नहीं है।

00:46:37.107 --> 00:46:47.563
ऐसे अनंत पर्यायें ज्ञान में ज्ञेयरूप 
दिखायी देती हैं मगर ज्ञान 
अनेकरूप होता नहीं है। आहाहा!

00:46:47.587 --> 00:46:57.772
अंदर में अनेकरूप जो पर्याय दिखती हैं, वो 
ज्ञेय है और ध्येय तो एक है। ज्ञेय अनेक 
हैं (परंतु) ध्येय तो (एक ही है)। आहाहा!

00:46:57.796 --> 00:47:10.256
मैं तो ध्येय का ध्यान करता हूँ, 
ज्ञेय का ध्यान करता नहीं हूँ। 
अंदर की बात है। रमणीकभाई!

00:47:10.280 --> 00:47:16.318
जैनदर्शन हो गया! 
अनेक हैं पर्याय और आत्मा 
एकरूप है। कौन ना बोलता है?

00:47:16.342 --> 00:47:20.452
मगर मैं अनेकरूप हूँ कि 
मैं एकरूप हूँ? आहाहा!

00:47:20.476 --> 00:47:31.927
अनेक की अस्ति, मेरे में नास्ति, 
ऐसी मेरी एकरूप अस्ति - ऐसी 
मस्ती उसका नाम अनुभव है।

00:47:31.951 --> 00:47:37.216
अनेक की अस्ति है। पर्यायें अनेक 
(हैं), अनंत पर्यायें (हैं)। कौन ना बोलता है?

00:47:37.240 --> 00:47:45.852
अनंत गुण हैं, तो अनंत गुण की अवस्था 
भी समय-समय स्वयं प्रगट होती है; 
आत्मा करनेवाला नहीं है। आहाहा!

00:47:45.876 --> 00:47:53.576
नैसर्गिक है वो, पर्याय का उत्पाद नैसर्गिक 
है। आत्मा उत्पाद का उत्पादक नहीं है।

00:47:53.600 --> 00:48:00.896
सचमुच (तो) उत्पादक का 
जाननेवाला भी नहीं है। वो तो 
बात है सूक्ष्म, लोहा काटे छैनी।

00:48:00.920 --> 00:48:04.714
मुमुक्षु: स्वतंत्र शक्ति से, 
उसके गुण की स्वतंत्र शक्ति से। 
पू. लालचंदभाई: स्वतंत्र शक्ति है।

00:48:04.738 --> 00:48:08.483
गुण पर्याय का कर्ता नहीं है, 
द्रव्य पर्याय का कर्ता नहीं है।

00:48:08.507 --> 00:48:18.354
पर्याय स्वयं सत् अहेतुक स्वकाल 
में प्रगट होती है और व्यय हो जाती 
है। ऐसा अंदर का विश्वपना (है)।

00:48:18.378 --> 00:48:24.887
पर्याय अनंत हैं; अनंत गुण हैं तो 
अनंत पर्याय समयवर्ती प्रगट होती हैं।

00:48:24.911 --> 00:48:33.736
मगर जो अनंत पर्यायें प्रगट होती हैं, उनकी 
अस्ति है मगर मेरे में (उनकी) नास्ति है। 
एक में अनेक का अभाव है।

00:48:33.760 --> 00:48:42.163
अनेक अनेकरूप से है मगर अनेक 
एकरूप होता नहीं है और एक अनेक
रूप होता नहीं है। अंदर का विभाग है।

00:48:42.187 --> 00:48:45.154
मुमुक्षु: वो मेरे में नहीं है। 
पू. लालचंदभाई: मेरे में नहीं है बस इतना।

00:48:45.178 --> 00:48:52.945
देह है (मगर) मेरे में नहीं है; मेरा नहीं 
है देह। ये कुटुंब-कबीला है, है 
(मगर) मेरे में नहीं है वो; मेरा नहीं है।

00:48:52.969 --> 00:49:01.780
मेरे में नहीं है इसलिए मेरा नहीं है। ऐसे 
अनंत पर्याय हैं मगर मेरे में नहीं हैं।

00:49:01.804 --> 00:49:05.985
मेरे में नहीं हैं इसलिए मेरी चीज नहीं 
है; इसलिए ममत्व होता नहीं है।

00:49:06.009 --> 00:49:11.847
पर्यायदृष्टि छूट जाती है 
और द्रव्यदृष्टि हो जाती है।

00:49:11.871 --> 00:49:19.176
मुमुक्षु: master-key 
(सर्व - कुंची) आपने दे दी।

00:49:19.200 --> 00:49:23.545
पू. लालचंदभाई: ये तो 
कुंदकुंदाचार्य भगवान की देन 
है - शुद्धात्मा हथेली में बताते हैं।

00:49:23.569 --> 00:49:31.136
(आचार्य कहते हैं कि) मैं हथेली 
में बताऊँ (तो) तेरा काम क्या? 
कि रुचि की आँख खोलना।

00:49:31.160 --> 00:49:36.825
रुचि की आँख खोलो तो (शुद्धात्मा) 
दिखाई देगा। इन आँखों से 
नहीं दिखायी देगा। आहाहा!

00:49:36.849 --> 00:49:40.314
रुचि, अंदर रुचि चाहिए (कि) मेरे 
को आत्मा का दर्शन करना है।

00:49:40.338 --> 00:49:44.758
वो रुचि उत्पन्न हुई तो अंदर 
का ज्ञान-चक्षु खुल जाता है।

00:49:44.782 --> 00:49:53.954
वो ज्ञान-चक्षु खुलने से आत्मा 
का अनुभव हो जाता है।

00:49:53.978 --> 00:49:59.696
<b>कैसा है यह ज्ञानस्वभाव? </b>
उसका विस्तार है। <b>इस 
विश्व के ऊपर तिरता </b>

00:49:59.720 --> 00:50:05.194
तिरता यानि जुदा, इस विश्व से 
जुदा। विश्व है, विश्व सिद्ध किया।

00:50:05.218 --> 00:50:14.429
छह द्रव्य हैं। छह द्रव्य को 
नहीं माने तो वो सर्वज्ञ को 
नहीं मानता है। जैनमति नहीं है।

00:50:14.453 --> 00:50:21.492
अर्थात् <b>(उन्हें जानता हुआ भी उन
रूप न होता हुआ), प्रत्यक्ष उद्योतपनेसे 
सदा अन्तरंङ्गमें प्रकाशमान </b>आहाहा!

00:50:21.516 --> 00:50:30.154
जाज्वल्यमान-ज्योति है। 
आहाहा! कहते हैं प्रत्यक्ष है 
आत्मा, परोक्ष नहीं है। है, प्रगट है।

00:50:30.178 --> 00:50:40.487
<b>प्रत्यक्ष उद्योतपनेसे </b>
प्रकाशमानपने से <b>सदा </b>तीनों 
काल, हमेशा अंतरंग में प्रकाशमान है।

00:50:40.511 --> 00:50:49.380
जाज्वल्यमान-ज्योति, चैतन्य-ज्योति, 
जगमगाती-ज्योति प्रगट है। क्यों 
दिखती नहीं है? कि तू देखता नहीं है।

00:50:49.404 --> 00:50:53.536
क्यों दिखती नहीं है? कि तू देखता 
नहीं है! तू इधर देखता है।

00:50:53.560 --> 00:51:06.163
वो तो अंतरंग में है, तू बाहर देखता है। 
आहाहा! ये वस्तु बाहर नहीं है, अंदर में 
है। <b>अंतरंङ्ग में प्रकाशमान</b>।

00:51:06.187 --> 00:51:11.492
वो जैन साहब के घर से हैं, शिकोहाबाद 
से आए हैं। बहुत प्रमोद आता है।

00:51:11.516 --> 00:51:18.572
सुनकर बहुत अंदर से प्रमोद आता 
है, उछाला आता है। आहाहा!

00:51:18.596 --> 00:51:24.283
<b>प्रकाशमान, अविनश्वर </b>
नाशवान मैं नहीं हूँ; मैं तो 
अनादि-अनंत। आहाहा!

00:51:24.307 --> 00:51:31.727
<b>अविनश्वर </b>नाश होता है 
वो मेरी चीज नहीं है। 
<b>स्वतःसिद्ध </b>आहाहा!

00:51:31.751 --> 00:51:41.127
मैं तो अनादि-अनंत स्वतःसिद्ध हूँ। वो 
पाँच पदार्थ इकट्ठे हों और आत्मा बन 
जाए ऐसा आत्मा का स्वरूप नहीं है।

00:51:41.151 --> 00:51:48.807
किसी संयोग से जिसकी उत्पत्ति नहीं है 
वह वियोग से नाश होता नहीं है - ऐसा 
श्रीमद् (राजचन्द्रजी) का वचन है। आहाहा!

00:51:48.831 --> 00:51:50.905
(समयसार कि) 
छठ्ठी गाथा में भी है वो।

00:51:50.929 --> 00:52:01.656
<b>स्वतःसिद्ध </b>आत्मा स्वतःसिद्ध 
है और <b>परमार्थसत् </b>आहाहा! 
परमार्थ से सत् है यानि त्रिकाल सत् है।

00:52:01.680 --> 00:52:06.403
वो व्यवहारिक सत् हैं--संवर
-निर्जरा और मोक्ष, (परंतु) 
ये तो परमार्थ से सत् है।

00:52:06.427 --> 00:52:10.945
ये द्रव्य के विशेषण चलते हैं। 
आत्मा के विशेषण चलते हैं।

00:52:10.969 --> 00:52:18.429
वो पर्याय विश्वरूप है वो तो 
मेरे में नहीं है, तो मैं कैसा हूँ? 
परमार्थ सत् है। आहाहा!

00:52:18.453 --> 00:52:31.440
आत्मा ऐसा भगवान ज्ञानस्वभाव है। उसका 
लक्ष करो तो संसार का नाश हो जाएगा।