﻿WEBVTT Pravachan Oi113 पूज्य लालचंदभाई का प्रवचन श्री समयसार गाथा १३ तारीख ०७-०२-१९८९, प्रवचन नंबर ११३

00:01:22.173 --> 00:01:34.305
यह समयसारजी शास्त्र है, परमागम शास्त्र है।
समयसार का अर्थ शुद्धात्मा है।

00:01:34.329 --> 00:01:50.153
जो शुद्धात्मा है वो स्वभाव दृष्टि
से देखो तो बंध का कारण नहीं है
और मोक्ष का कारण भी नहीं है,

00:01:50.177 --> 00:01:57.056
बंध का कर्ता भी नहीं है
और मोक्ष का कर्ता भी नहीं है,

00:01:57.080 --> 00:02:11.993
नवतत्त्व का कर्ता नहीं है
और नवतत्त्व उत्पन्न होने पर भी वो
नवतत्त्व के उत्पाद का कारण नहीं होता है।

00:02:12.017 --> 00:02:22.731
ये समयसार की १३वीं गाथा कोई अपूर्व है,
सम्यग्दर्शन की गाथा है।

00:02:22.755 --> 00:02:29.758
११वीं गाथा में भूतार्थ के आश्रय से
यानि अपना शुद्धात्मा जो है,

00:02:29.782 --> 00:02:44.713
जो परिणाममात्र से भिन्न सामान्य तत्त्व है,
सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ होने पर भी,

00:02:44.737 --> 00:02:59.269
सामान्य की दृष्टि से देखो तो
विशेष का उसमें अभाव है;
विशेष यानि परिणाम का जिसमें अभाव है।

00:02:59.293 --> 00:03:13.798
परिणाममात्र से आत्मा विभक्त
अर्थात् जुदा है, भिन्न है और अपने
अनंत गुणों से अभिन्न, एकत्व है।

00:03:13.822 --> 00:03:30.367
ऐसा शुद्धात्मा, अनंत-अनंतकाल बीता
चार गति में रुलते-रुलते,
उसमें अभूतार्थनय से तो नवतत्त्व को जाना,

00:03:30.391 --> 00:03:42.607
अभूतार्थनय से यानि असत्यार्थनय से
अर्थात् व्यवहारनय से नवतत्त्व को जाना।

00:03:42.631 --> 00:03:48.465
नवतत्त्व (को) व्यवहारनय से जाना।
कैसे जाना?

00:03:48.489 --> 00:04:00.958
कि (यह) आत्मा है,
जहाँ तक भेदज्ञान का अभाव है
तहाँ तक वो आत्मा अज्ञानी है

00:04:00.982 --> 00:04:09.878
और अज्ञानी है तहाँ तक वो पुण्य, पाप,
आस्रव, बंधतत्त्व का कर्ता है

00:04:09.902 --> 00:04:15.465
और पुण्य-पाप का परिणाम
ये आत्मा का कर्म है,

00:04:15.489 --> 00:04:30.873
ऐसे आत्मा को अशुद्ध पर्याय का कर्ता मानकर
अनंत-अनंतकाल से परिणमता है, एक बात।

00:04:30.897 --> 00:04:38.162
अभी एक दूसरी बात इससे सूक्ष्म है थोड़ी।

00:04:38.186 --> 00:04:56.331
जब ज्ञानी मिले तब वो ज्ञानी फरमाते हैं
कि प्रभु! तेरा आत्मा शुभाशुभभाव को करे
ये तेरा स्वभाव नहीं है, कर्तापन छोड़ दे।

00:04:56.355 --> 00:05:08.411
तू तो ज्ञानमय आत्मा है, दर्शनमय है
और जो ये परिणमता है तो
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप से परिणमता है,

00:05:08.435 --> 00:05:13.789
निश्चय रत्नत्रयरूप से परिणमता है
- संवर-निर्जरा-मोक्षरूप,

00:05:13.813 --> 00:05:22.833
और संवर-निर्जरा-मोक्षरूप परिणमता है
तो संवर-निर्जरा-मोक्ष का कर्ता है।

00:05:22.857 --> 00:05:31.282
उसको संवर-निर्जरा-मोक्ष हुआ नहीं (है),
ख्याल रखना।

00:05:31.306 --> 00:05:45.749
तो ऐसे परिणाम से सापेक्ष परिणमता है,
एक (बात), और परिणमता है
सो कर्ता और परिणाम सो कर्म;

00:05:45.773 --> 00:06:00.949
ऐसे परिणाम के साथ
कर्ता-कर्म के संबंध की बुद्धि रखकर
अभूतार्थनय से नवतत्त्व को जाना।

00:06:00.973 --> 00:06:11.100
बात जरा सूक्ष्म है मगर अमृत जैसी है।
ये १३वीं गाथा का रहस्य है।

00:06:11.124 --> 00:06:27.256
योगानुयोग आज अपने त्रिलोकनाथ भगवान
नेमिनाथ प्रभु का आज जन्म हुआ है,
जन्मदिन है, मांगलिक दिवस है। आहाहा!

00:06:27.280 --> 00:06:36.589
गिरनार पर उनकी दीक्षा थी
और ५४ या तो ५६ दिवस को ध्यान में
मग्न होकर केवलज्ञान हो गया।

00:06:36.613 --> 00:06:48.740
५६? ५६ दिवस लो। आहाहा!
ज्यादा नहीं ५६ दिवस में तो (केवलज्ञान),
दो महीने (भी) पूरे नहीं। आहाहा!

00:06:48.764 --> 00:06:58.038
शुक्लध्यान की श्रेणी लगाकर
ध्यान में मग्न हो गये और
केवलज्ञान का भड़का (विस्फोट) हो गया

00:06:58.062 --> 00:07:04.331
और समवशरण की रचना भी हुई
और दिव्यध्वनि भी खिरी।

00:07:04.355 --> 00:07:13.767
उसमें, नेमिनाथ भगवान की
दिव्यध्वनि में आया कि
अभूतार्थनय से नवतत्त्व को सब जानते हैं,

00:07:13.791 --> 00:07:22.180
मानते भी हैं,
ऐसे जानते और मानते होने पर भी
मिथ्यादृष्टि रह जाता है।

00:07:22.204 --> 00:07:33.193
क्या कहा?
ये आत्मा परद्रव्य का कर्ता-भोक्ता
तो है ही नहीं तीनकाल में,

00:07:33.217 --> 00:07:55.473
वो बात तो दूर रहो मगर पराश्रित परिणाम
और स्वाश्रित परिणाम वो भी सापेक्ष कथन
हैं भैया! जरा शांति से सुनना। आहाहा!

00:07:55.497 --> 00:08:04.780
ऐसे अभूतार्थनय से यानि
परिणाम को आत्मा के साथ सापेक्ष बनाकर,

00:08:04.804 --> 00:08:09.531
परिणाम का कर्ता मैं हूँ
और उसका फल मैं भोगता हूँ,

00:08:09.555 --> 00:08:18.296
संसार अवस्था में अकेला
आत्मा कर्मचेतना-कर्मफलचेतनारूप
परिणमता है और दुख भोगता है,

00:08:18.320 --> 00:08:23.820
ऐसा प्रवचनसार (गाथा १२३-१२४)
के अंदर पाठ है। आहाहा!

00:08:23.844 --> 00:08:30.553
और जब आत्मा की अनुभूति होती है
तब ज्ञान चेतनारूप परिणमता है,

00:08:30.577 --> 00:08:38.025
तो शुद्ध कर्मचेतना और शुद्ध
कर्मफलचेतना (रूप) आनंद को भोगता है।

00:08:38.049 --> 00:08:57.780
मगर ऐसा कर्ता-कर्म का सबंध परिणाम के
साथ आत्मा का है, वो व्यवहारनय का कथन है;
वो व्यवहारनय अभूतार्थ - झूठा है। आहाहा!

00:08:57.804 --> 00:09:09.029
आत्मा परिणाम से रहित है और
परिणाम आत्मा से रहित है; परस्पर
निरपेक्ष होने से कर्ता-कर्म की सिद्धि नहीं है।

00:09:09.053 --> 00:09:20.327
ऐसी बात सुनी नहीं है तूने कभी भी।
नवतत्त्व को अभूतार्थनय से जाना,
आ गया, सब आ गया (शास्त्र में)।

00:09:20.351 --> 00:09:26.216
अभूतार्थनय से यानि आत्मा परिणमता है
और आत्मा कर्ता है और आत्मा भोक्ता है;

00:09:26.240 --> 00:09:33.705
मगर आत्मा अकारक-अवेदक है
वो बात जगत ने सुनी नहीं है। आहाहा!

00:09:33.729 --> 00:09:44.002
तो परिणाम होता है कि नहीं साहब?
हाँ प्रभु! परिणाम तो होता है,
मगर परिणाम का करनेवाला तू नहीं है।

00:09:44.026 --> 00:09:54.269
तो शिष्य का प्रश्न आया कि परिणाम होता है,
आप 'हाँ' बोलते हो और करने की 'न' बोलते हो
- ये क्या बात है?

00:09:54.293 --> 00:10:02.545
न होवे तब तो मेरा प्रश्न नहीं है,
यदि परिणाम उत्पन्न ही नहीं होता है
तब तो मेरा प्रश्न नहीं है।

00:10:02.569 --> 00:10:19.647
मगर परिणाम उत्पन्न होने पर भी
और भगवान की हाजिरी होने पर भी,
भगवान कौन? समझे?

00:10:19.671 --> 00:10:32.847
इस (निज) परमात्मा की हाजिरी
में परिणाम उत्पन्न होता है,
परमात्मा से नहीं।

00:10:32.871 --> 00:10:47.945
परिणाम - नवतत्त्व उत्पन्न होते हैं
परंतु भगवान से नहीं; भगवान की
हाजिरी में होता है वो बात सही है।

00:10:47.969 --> 00:10:57.953
और जिसको भगवती दृष्टि हो गई,
वो तो जानते हैं कि परिणाम प्रगट
होता है, मैं करनेवाला नहीं हूँ।

00:10:57.977 --> 00:11:08.705
होता है, तो भी अकर्ता रहता है।
होने पर भी अकर्ता रहता है।

00:11:08.729 --> 00:11:13.767
तो अभूतार्थनय से तो परिणाम के
साथ कर्ता-कर्म सबंध है

00:11:13.791 --> 00:11:26.233
ऐसा व्यवहारनय से कथन बहुत आता है
मगर ११वीं गाथा में कहा कि
व्यवहारनय सब अभूतार्थ है। आहाहा!

00:11:26.257 --> 00:11:36.442
असत्यार्थ है, अविद्यमान अर्थ को
प्रसिद्ध करता है। कर्ता नहीं, फिर भी
आत्मा धर्म के परिणाम को करता है।

00:11:36.466 --> 00:11:45.336
धर्म के परिणाम को करता है कि
होते हुए धर्म के परिणाम को जानता है?

00:11:45.360 --> 00:11:49.847
अधर्म के परिणाम को करता है
कि अधर्म होता है उसको जानता है?

00:11:49.871 --> 00:12:00.194
धर्म का परिणाम होता है उसको करता है
कि जानता है? आहाहा!
कि मात्र जानता है, करनेवाला नहीं है।

00:12:00.218 --> 00:12:05.065
आत्मा को अब तू करनेवाला मत देख,
ज्ञाता को कर्तापने मत देख।

00:12:05.089 --> 00:12:14.145
ज्ञाता को कर्तापने मत देख,
परिणाम तो होता है, परिणाम होगा,

00:12:14.169 --> 00:12:22.527
अनादि-अनंत परिणाम तो होते रहते हैं और
आत्मा किया करता है, ऐसा है नहीं।

00:12:22.551 --> 00:12:29.038
होता है उसका करना हो सकता नहीं;
और नहीं होता हो
उसका भी करना हो सकता नहीं।

00:12:29.062 --> 00:12:31.794
होता है उसको भी जाने आहाहा!

00:12:31.818 --> 00:12:36.332
प्रगट होता है उसको जाने, बढ़े परिणाम,
शुद्धि की वृद्धि उसको भी जाने;

00:12:36.356 --> 00:12:41.372
जाने जाने और जाने,
और पूर्ण मोक्ष हो तो भी जाने।

00:12:41.396 --> 00:12:47.065
जाने,
परंतु करना आत्मा के स्वभाव में नहीं है।
आहाहा!

00:12:47.089 --> 00:12:55.554
उपयोग में भी करना नहीं (है),
शुद्धोपयोग में भी करना नहीं (है)
और शुद्धात्मा ज्ञायक में भी करना नहीं।

00:12:55.578 --> 00:12:59.989
जानना, जानना, जानना, जानना,
जाननस्वभाव से भरा हुआ भगवान आत्मा है।

00:13:00.013 --> 00:13:07.469
द्रव्य, गुण और पर्याय में जानने का स्वभाव,
शक्ति की व्यक्ति- शक्ति में भी जानना,
व्यक्ति में भी जानना।

00:13:07.493 --> 00:13:14.785
कि शक्ति में जानना और व्यक्ति में करना?
है नहीं! आहाहा!

00:13:14.809 --> 00:13:19.758
सम्यग्दर्शन क्यों प्रगट नहीं होता?
- ये प्रश्न है बहुत लोगों का।

00:13:19.782 --> 00:13:26.909
परंतु परिणाम को सापेक्ष देखते हुए
कर्ताबुद्धि रह गई। आहाहा!

00:13:26.933 --> 00:13:33.118
एक बिल्कुल नया मुमुक्षु है।
थोड़ी चर्चा हुई। आहाहा!

00:13:33.142 --> 00:13:41.332
निरपेक्ष परिणाम
और निरपेक्ष परिणाम की उत्पत्ति
परिणाम से होती है - ऐसा देखो,

00:13:41.356 --> 00:13:50.972
परिणाम की उत्पत्ति मेरे से होती है
ऐसा अब मत देख।
तब कहा, ये सापेक्ष है न?

00:13:50.996 --> 00:13:56.212
कि भाई आप जो सापेक्ष कहते हैं न,
उसमें तो कर्ताबुद्धि आ जाती है।

00:13:56.236 --> 00:14:02.292
अरे! तू नया (है)
अभी तेरे को ४५ साल का अभ्यास नहीं,

00:14:02.316 --> 00:14:08.109
गुरुदेव का इतना परिचय नहीं,
बाहरगाँव का लड़का,
हिंदी भाषी, यह तू क्या बोलता है?

00:14:08.133 --> 00:14:11.518
(उसने कहा) कि हाँ भाई!
सापेक्ष में तो कर्ताबुद्धि हो जाती है।

00:14:11.542 --> 00:14:17.398
अच्छा! निरपेक्ष में?
कि ज्ञाता हो जाता है।
आहाहा! देखो!

00:14:17.422 --> 00:14:28.625
ये भूतार्थनय से नवतत्त्व जाने, पर्याय!
पर्याय का विशेषण है भूतार्थ,
खीमचंदजी! मूल में है।

00:14:28.649 --> 00:14:35.718
और उसका फल सम्यग्दर्शन (है) नियम से।
ओहो!

00:14:35.742 --> 00:14:45.612
परिणाम को सत्-अहेतुक जाने,
स्वद्रव्य से नहीं (होता) और परद्रव्य से
भी नहीं (होता), निरपेक्ष (होता है)। आहाहा!

00:14:45.636 --> 00:14:49.483
स्वकाल उसका है।
आहाहा!

00:14:49.507 --> 00:14:56.732
उत्पन्न होने का स्वकाल है उसका;
जन्मक्षण है। आहाहा!

00:14:56.756 --> 00:15:08.714
उत्पाद होता है और व्यय भी होता है;
(मैं) करता हूँ, उत्पन्न करता हूँ और
उन पर्यायों को टालता हूँ - ऐसा है नहीं।

00:15:08.738 --> 00:15:12.723
इन सब व्यवहारनय के कथनों का
कोई पार (सीमा) नहीं।

00:15:12.747 --> 00:15:21.923
मगर एक ११वीं गाथा लिखकर
कमाल कर दिया! दृष्टि दे दी हमको (कि)
व्यवहारनय पूरा ही अभूतार्थ है। आहाहा!

00:15:21.947 --> 00:15:31.616
जितना जिनवाणी में सर्वज्ञ भगवान
ने व्यवहार कहा, वो किसने कहा?
नवतत्त्व किसने कहे?

00:15:31.640 --> 00:15:37.198
दूसरे स्थान पर तो है ही नहीं,
कहनेवाले तो सर्वज्ञ भगवान हैं कि नहीं?

00:15:37.222 --> 00:15:44.185
सर्वज्ञ भगवान का कहा हुए व्यवहार
सर्वज्ञ भगवान की वाणी में आया,

00:15:44.209 --> 00:15:52.047
कि उस व्यवहार का अवलंबन-लक्ष छोड़ दे,
परिणाम परिणाम से होता है,
तेरे से होता नहीं है। आहाहा!

00:15:52.071 --> 00:15:59.776
धर्म के परिणाम धर्मी नहीं करता है,
अधर्म की बात तो (दूर रही)।

00:15:59.800 --> 00:16:09.047
हाँ! धर्म का परिणाम निश्चित होता है,
उसको निश्चित जानता है परंतु करता नहीं है।

00:16:09.071 --> 00:16:17.780
जानता है, वो भी थोड़े टाइम कहना पड़ता है
क्योंकि कर्ता नहीं है
इसलिए तू उसका ज्ञाता है।

00:16:17.804 --> 00:16:20.523
कर्तापने की बुद्धि छोड़ दे।
आहाहा!

00:16:20.547 --> 00:16:27.958
भाईसाहब भोपालवाले! नाम भूल गया।
राजमलजी! हाँ! मुम्बई गए थे।

00:16:27.982 --> 00:16:34.572
कर्ता नहीं है भैया, तू ज्ञाता है।
अच्छा! ज्ञाता तो है कि नहीं?
कि हाँ, ज्ञाता है।

00:16:34.596 --> 00:16:37.154
दो-चार महिने वो ज्ञाता है,
कर्ता नहीं है।

00:16:37.178 --> 00:16:46.083
फिर गुरु के पास आया कि साहब
आपने कहा कि राग का, परिणाम का
मैं कर्ता नहीं हूँ, मैं तो ज्ञाता हूँ।

00:16:46.107 --> 00:16:52.212
तो अभी अनुभव क्यों नहीं होता है मेरे को?
शिष्य पूछने आया गुरु के पास।

00:16:52.236 --> 00:16:58.189
(गुरु ने कहा) कि वो तो पहले
school (कक्षा) का पाठ था,
अभी दूसरा एक पाठ बाकी (रह गया)।

00:16:58.213 --> 00:17:02.580
साहब! एक ही (पाठ) है कि दूसरा,
तीसरा, चौथा पाठ (भी) है?
कि नहीं! दो ही पाठ हैं।

00:17:02.604 --> 00:17:08.714
एक पाठ में तू pass (उत्तीर्ण) हो गया।
परीक्षा ली गुरु ने। समझे?

00:17:08.738 --> 00:17:15.745
परीक्षा लेकर समझा, ओहो!
रुचिवाला जीव है,
आत्मार्थी लगता है पक्का। आहाहा!

00:17:15.769 --> 00:17:25.874
अभी दूसरा पाठ सुन ले कि
तू उसका ज्ञाता नहीं है,
भेद का ज्ञाता नहीं है, भेद का।

00:17:25.898 --> 00:17:33.754
भेद को ज्ञेय बनाने से
ध्येय और ज्ञेय बनाने से रागी प्राणी को राग
की उत्पत्ति, विकल्प की उत्पत्ति होती है।

00:17:33.778 --> 00:17:38.452
तो क्या करना साहब?
कि भेद को,
पर्याय को जानना बंद कर दे।

00:17:38.476 --> 00:17:43.229
कि साहब कथंचित् कि सर्वथा?
कि सर्वथा बंद कर दे।

00:17:43.253 --> 00:17:46.883
तो साहब सर्वथा बंद कर दूँ
तो स्याद्वाद में कोई बाधा आयेगी?

00:17:46.907 --> 00:17:59.514
कि नहीं!
स्याद्वाद का जन्म होगा,
स्याद्वाद जरूर जन्मेगा। आहाहा!

00:17:59.538 --> 00:18:08.225
अच्छा साहब!
गुरु के पास से चला गया। तीन दिन में
तो वापस आया, ज्यादा टाइम नहीं लगा उसको।

00:18:08.249 --> 00:18:11.314
पक गया था,
पक गया (था)।

00:18:11.338 --> 00:18:17.340
तीन दिन के बाद आ गया
और लकड़ी जैसे पड़ती है न,
लकड़ी सीधी, लकड़ी तो सीधी पड़ती है न?

00:18:17.364 --> 00:18:19.940
आड़ी-टेढ़ी लकड़ी नहीं होती है।

00:18:19.964 --> 00:18:31.527
तो सीधा गुरु को वंदन कर दिया। आहाहा!
प्रभु! आपने आत्मा दिया। आहाहा!

00:18:31.551 --> 00:18:36.020
ऐसा नहीं कहा कि
मेरे से मैं प्रगट हुआ। आहाहा!

00:18:36.044 --> 00:18:38.305
સજ્જન ઉપકારને ઓળવતો નથી
(सज्जन उपकार को कभी भूलता नहीं है)।

00:18:38.329 --> 00:18:45.140
हिन्दी नहीं आता है इसलिए गुजराती (में कहा)।
સજ્જન ઉપકારને ઓળવતો નથી,
इसका हिन्दी क्या?

00:18:45.164 --> 00:18:53.176
मुमुक्षु: सज्जन उपकार को नहीं भूलते।
पू. लालचंदभाई: हाँ! सज्जन उपकार
को कभी भूलता नहीं है। आहाहा!

00:18:53.200 --> 00:18:56.309
गुरु समझ गया।
बस! काम हो गया?

00:18:56.333 --> 00:19:02.056
कि हाँ! आपकी कृपा से काम (हो गया)।
दो ही पाठ? बोले दो ही पाठ,
बस! आहाहा!

00:19:02.080 --> 00:19:09.989
अभूतार्थनय से नवतत्त्व जाना,
आत्मा के साथ पर्याय का संबंध रखा
और पर्याय के साथ आत्मा का संबंध रखा,

00:19:10.013 --> 00:19:16.109
इससे आगे चलकर पर्याय के साथ
कर्म का संबंध रखा और
कर्म के साथ पर्याय का संबंध रखा,

00:19:16.133 --> 00:19:22.309
इससे आगे नौ कर्म के साथ
पर्याय का संबंध रखा, इससे आगे
लोकालोक के साथ संबंध रखा। आहाहा!

00:19:22.333 --> 00:19:27.825
अभूतार्थनय का कथन है।

00:19:27.849 --> 00:19:31.998
<b>नास्ति सर्वोऽपि सम्बन्धः परद्रव्यात्मतत्त्वयोः</b> 
(समयसार कलश २००)

00:19:32.022 --> 00:19:35.354
यह आत्मा का परद्रव्य के साथ
कोई संबंध (नहीं है)।

00:19:35.378 --> 00:19:40.038
परद्रव्य अर्थात्,
अध्यात्म में परद्रव्य क्या है मालूम है?

00:19:40.062 --> 00:19:46.407
अध्यात्म में परद्रव्य किसे कहते हैं?
परिणाम का नाम परद्रव्य है।

00:19:46.431 --> 00:19:53.856
अरे! छहद्रव्य का नाम परद्रव्य है
ये तो सुना,
परंतु परिणाम का नाम परद्रव्य?

00:19:53.880 --> 00:19:59.203
कि हाँ! परद्रव्य है।
तीन-तीन आचार्य भगवान ने कहा है,
एक आचार्य ने नहीं।

00:19:59.227 --> 00:20:04.567
कुन्दकुन्द आचार्य भगवान ने
परिणाम को परद्रव्य, परभाव, हेय कहा
(नियमसार, गाथा ५०),

00:20:04.591 --> 00:20:08.340
अमृतचंद्र आचार्य ने कलश में ये
परद्रव्य कहा है

00:20:08.364 --> 00:20:16.536
और नियमसार के टीकाकार भावी तीर्थंकर
उन्होंने भी परिणाम को परद्रव्य कहा।

00:20:16.560 --> 00:20:25.096
परिणाम, परद्रव्य के साथ, परद्रव्य;
परिणाम, परद्रव्य के साथ
कर्ता-कर्म सबंध नहीं है

00:20:25.120 --> 00:20:29.754
और निमित्त-नैमित्तिक (संबंध) नहीं है
और ज्ञाता-ज्ञेय संबंध भी नहीं है।

00:20:29.778 --> 00:20:37.380
अभेदरूप से ज्ञाता-ज्ञेय सबंध
तो आत्मा के साथ है,
वो भी अभेदभाव से है। आहाहा!

00:20:37.404 --> 00:20:41.127
तो ये अभूतार्थनय से
जानते-जानते अनंतकाल गया

00:20:41.151 --> 00:20:47.505
परंतु भूतार्थनय से आत्मा को,
परिणाम को नहीं जाना
तो आत्मा के अंदर कर्तादृष्टि रह गई।

00:20:47.529 --> 00:20:54.140
परिणाम सत् स्वतंत्र-अहेतुक है।
परिणाम होता है। आहाहा!

00:20:54.164 --> 00:21:01.527
होता है, मैं करनेवाला नहीं हूँ,
मैं अकर्ता ऐसा ज्ञायक हूँ।
जानन-जानन, आहाहा!

00:21:01.551 --> 00:21:08.927
जाननहार हूँ, ज्ञाता हूँ और कर्ता नहीं हूँ।
आहाहा!

00:21:08.951 --> 00:21:19.185
जाननेवाला हूँ और करनेवाला नहीं
- इसका नाम द्रव्य का निश्चय है।

00:21:19.209 --> 00:21:25.323
क्या कहा?
दृष्टि का विषय।

00:21:25.347 --> 00:21:38.932
ज्ञायक हूँ। ज्ञायक हूँ ऐसे कहो या
जाननेवाला हूँ ऐसा कहो, त्रिकाली द्रव्य;
और ज्ञाता हूँ ऐसा कहो एक ही बात है।

00:21:38.956 --> 00:21:48.643
वो द्रव्य का निश्चय - द्रव्य का निश्चय आने
के बाद पर्याय का निश्चय जहाँ तक नहीं
होता है, तहाँ तक अनुभूति नहीं होती है।

00:21:48.667 --> 00:21:56.252
द्रव्य का निश्चय और पर्याय का निश्चय
दो साथ में रहते हैं, साथ में एक समय
में उत्पन्न होते हैं तब अनुभूति होती है।

00:21:56.276 --> 00:22:01.189
बिजली में भी दो wire (तार) रहते हैं न
तब current (विद्युत धारा) आता है, ऐसा है।

00:22:01.213 --> 00:22:09.429
अभी पर्याय का निश्चय क्या?
पर्याय, ज्ञान की पर्याय पर को जानती है,
स्व-पर को जानती है, आहाहा!

00:22:09.453 --> 00:22:14.532
ये ज्ञान की पर्याय का व्यवहार हो गया।

00:22:14.556 --> 00:22:21.225
ये सब बात समयसार में आई (है), हो!
मेरे घर की बात नहीं है,
है तो आत्मा के घर की बात। आहाहा!

00:22:21.249 --> 00:22:30.465
कि ज्ञान की पर्याय का निश्चय क्या? कि
ज्ञान की पर्याय में अकेला ज्ञायक जानने में
आता है, पर जानने में नहीं आता है। आहाहा!

00:22:30.489 --> 00:22:34.012
<b>जाननहार जानने में आता है</b>
और <b>वास्तव में पर जानने में नहीं आता</b>
(सिद्धांतोनी सरवाणी बोल नंबर १),

00:22:34.036 --> 00:22:43.687
ऐसे अस्ति-नास्ति अनेकांत द्वारा
सम्यक् एकांत
ऐसे शुद्धात्मा की अनुभूति हो जाती है।

00:22:43.711 --> 00:22:51.669
पर को मैं जानता हूँ। भाई!
एक बार आत्मा को जान ले
और जानने के बाद परिणाम को जान।

00:22:51.693 --> 00:22:59.603
आत्मा को जानकर परिणाम को जान
और परिणाम को जानने के बाद
द्रव्य-पर्याय दोनों को जान।

00:22:59.627 --> 00:23:04.318
इससे आगे तो जाना ही मना है।

00:23:04.342 --> 00:23:09.096
एक प्रवचनसार की गाथा (११४) है।

00:23:09.120 --> 00:23:20.625
आचार्य भगवान ने फरमाया कि
तेरे में परिणाम जो उत्पन्न होता है,
उसको जानना सर्वथा बंद कर दे।

00:23:20.649 --> 00:23:27.852
कि साहब सर्वथा?
कि हाँ! सर्वथा बंद कर दे।
तो ज्ञान का नाश नहीं होगा?

00:23:27.876 --> 00:23:30.265
कि नहीं!
ज्ञान की उत्पत्ति होगी।

00:23:30.289 --> 00:23:34.358
अरे!
जानना बंद करूँ और ज्ञान प्रगट होगा?

00:23:34.382 --> 00:23:43.794
कि हाँ!
ये कला है, परिणाम को जाना, जानते-जानते,
इंद्रियज्ञान से जानते-जानते अनंतकाल गया!

00:23:43.818 --> 00:23:49.834
बंद कर दे जानने का;
भेद को जानने का सर्वथा बंद कर दे

00:23:49.858 --> 00:23:59.180
और द्रव्यार्थिक चक्षु उघाड़कर आत्मा को देख,
तेरे को दर्शन हो जायेगा - स्वप्रकाशक कहा।

00:23:59.204 --> 00:24:08.278
तो शिष्य ने क्षमा माँगी कि प्रभु!
मैंने बहुत अपराध किया आज तक।

00:24:08.302 --> 00:24:16.047
सचमुच तो आत्मा का अपराध किया,
व्यवहारनय से आपका भी अपराध किया
कि आपकी बात मैंने सुनी नहीं।

00:24:16.071 --> 00:24:26.545
मेरा अपराध क्षमा कर दो प्रभु।
आज तक मेरी भूल ऐसी हो गई
कि पहले मैं परिणाम को जानता,

00:24:26.569 --> 00:24:37.020
जानते-जानते बाद में द्रव्य - आत्मा जणित
(जानने में आ) जायेगा (ऐसा मानता था) और
क्रमभंग किया, मैंने किया, मैंने क्रमभंग किया।

00:24:37.044 --> 00:24:47.358
आचार्य भगवान ने कहा कि
अनुक्रम में आ जा अभी, अनुक्रम!
One by one (एक के बाद एक) एक साथ दो नहीं।

00:24:47.382 --> 00:24:52.816
कि स्वपरप्रकाशक?
तू सुन शांति से जरा धीरज रखकर सुन!

00:24:52.840 --> 00:25:01.518
स्वपरप्रकाशक का व्यवहार का पक्ष है
हमको मालूम है, सब मालूम है,
ज्ञानी को सब मालूम होता है। आहाहा!

00:25:01.542 --> 00:25:10.807
तो प्रभु! आचार्य भगवान ने कहा (कि)
अनुक्रम में आ जा। क्रमभंग तूने किया।
आहाहा!

00:25:10.831 --> 00:25:16.603
भाईसाहब! कलकत्तावाले नाम
भूल गया। तखतराज जी! आहाहा!

00:25:16.627 --> 00:25:21.012
कलकत्ता में इनके घर पर खाने गये थे।
बहुत पुराने हैं अपने।

00:25:21.036 --> 00:25:29.967
तखतराज जी साहब!
ये अंदर की बात समझने जैसी है।
आहाहा!

00:25:29.991 --> 00:25:40.376
अंदर की बात है, बाहर की बात नहीं है।
प्रभु! मैंने बहुत दोष किया,
अपराध किया, क्षमा करो!

00:25:40.400 --> 00:25:43.283
आप कहते हैं कि अनुक्रम में आ जा।

00:25:43.307 --> 00:25:48.354
मैंने क्रमभंग करके पहले पर्याय को जाना
(सोचा कि) द्रव्य तो जणित जायेगा
आहिस्ते-आहिस्ते।

00:25:48.378 --> 00:25:54.514
ऐसा नहीं होता है!
अनुक्रम में आ जा;
पहले आत्मा को जान,

00:25:54.538 --> 00:25:59.140
बाद (में) आत्माश्रित
या पराश्रित परिणाम को जान,

00:25:59.164 --> 00:26:03.109
आगे कुछ (और) है?
कि हाँ! एक साथ
द्रव्य-पर्याय दोनों को जान।

00:26:03.133 --> 00:26:10.376
निश्चयनय, व्यवहारनय और प्रमाण
तीनों इसमें आ गए। क्या कहा?

00:26:10.400 --> 00:26:23.932
फिर से। खीमचंदजी साहब! कि
पहला व्यवहार कि पहला निश्चय?
आहाहा! पहला निश्चय होता है।

00:26:23.956 --> 00:26:33.154
निश्चय क्या? कि पहले परिणाम को
जानना बंद कर दे; व्यवहारनय से तू
जानता है, वो सर्वथा बंद कर दे। आहाहा!

00:26:33.178 --> 00:26:38.869
निर्दयरूप से बंद कर दे,
व्यवहार का निषेध कर निर्दयरूप से हो!

00:26:38.893 --> 00:26:45.096
दया नहीं करना,
मिथ्यात्व पर दया करने जैसी चीज नहीं है।

00:26:45.120 --> 00:26:56.474
आहाहा! परिणाम को सर्वथा बंद करके
तेरे शुद्धात्मा को जान
अंतर्मुख होकर, दर्शन होगा।

00:26:56.498 --> 00:27:05.798
और दर्शन हुआ, दर्शन होने के बाद वो
ज्यादा टाइम निर्विकल्पध्यान रहता नहीं है,

00:27:05.822 --> 00:27:12.358
तो सविकल्प में आते हैं तो (समयसार)
बारहवीं गाथा खड़ी हो गई (कि)
<b>व्यवहारनय जाना हुआ प्रयोजनवान</b>।

00:27:12.382 --> 00:27:18.843
तो पहले निश्चय, बाद में परिणाम को
जानना व्यवहार, दो आए, अभी तीसरा क्या?

00:27:18.867 --> 00:27:23.203
कि द्रव्य, पर्याय को युगपद् जानना
उसका नाम प्रमाण।

00:27:23.227 --> 00:27:29.420
सब अंदर ही है, अंदर।
प्रमाण, निश्चयनय, व्यवहारनय अंदर है,
बाहर तो कुछ है नहीं। आहाहा!

00:27:29.444 --> 00:27:35.536
<b>प्रमाण से बाहर जाना नहीं और
प्रमाण में अटकना नहीं</b> 
(सिद्धांतोनी सरवाणी बोल नंबर ३)। ये बैठे हैं।

00:27:35.560 --> 00:27:45.776
अर्चना आयी है कि नहीं आयी?
नहीं आयी। अच्छा!
जयपुर में कहा था। गजब की बात है!

00:27:45.800 --> 00:27:51.172
प्रमाण की बाहर हैं सब ...
ये ऐसा करता है, ये वैसा करता है,
अरे! छोड़ न माथा-फोड़ी!

00:27:51.196 --> 00:28:00.843
तेरे साथ partnership (साझेदारी) कहाँ है?
debit note (उधार-पत्र) या
credit note (जमा-पत्र) तेरे पर आएगी नहीं।

00:28:00.867 --> 00:28:07.696
भाईसाहब! आप computer (कंप्युटर)
का व्यापार करते हैं; किसी को नफ़ा
होता है तो credit note देता है?

00:28:07.720 --> 00:28:15.363
किशोरभाई, credit note भेजता है किसी को?
नहीं भेजते हैं
क्योंकि partnership है ही नहीं। आहाहा!

00:28:15.387 --> 00:28:23.732
परपदार्थ, परजीव कितना भी
भावरूप से परिणमे, अपने को
उसके साथ कोई नाता कुछ है नहीं।

00:28:23.756 --> 00:28:27.892
प्रमाण से बाहर जाना नहीं
और अभी प्रमाण में आकर

00:28:27.916 --> 00:28:32.434
यानि द्रव्य-पर्याय स्वरूप वस्तु है,
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्</b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय ५, सूत्र ३०) है,

00:28:32.458 --> 00:28:35.585
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यं</b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय ५, सूत्र ३८) है। आहाहा!

00:28:35.609 --> 00:28:42.100
अकेला समयसार पढ़ा है या
तत्त्वार्थसूत्र पढ़ा है?
सुन तो सही! आहाहा!

00:28:42.124 --> 00:28:45.598
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्,
गुणपर्ययवत् द्रव्यं</b>

00:28:45.622 --> 00:28:49.540
पदार्थ की सिद्धि है,
इसमें प्रयोजन की सिद्धि नहीं है।

00:28:49.564 --> 00:28:54.247
प्रयोजन की सिद्धि के लिए
नय में आना पड़ता है। आहाहा!

00:28:54.271 --> 00:28:58.154
ज्ञायक हूँ और प्रमत्त-अप्रमत्तरूप
मैं नहीं हूँ

00:28:58.178 --> 00:29:06.740
ऐसा अस्ति-नास्ति अनेकांत नय-विभाग
से करके परिणाम का लक्ष छोड़कर
द्रव्यदृष्टि हो जाती है, अनुभव होता है।

00:29:06.764 --> 00:29:12.047
अनुभव के बाद परिणाम को भी जानता है
और द्रव्य-पर्याय को भी ज्ञान जानता है।

00:29:12.071 --> 00:29:17.767
ज्ञान जानता है,
मैं जानता हूँ ऐसा मत कहो!
आहाहा!

00:29:17.791 --> 00:29:22.132
'मैं' तो मेरे में रहने दो!
ज्ञान काम करता है तो जानता हूँ मैं।

00:29:22.156 --> 00:29:30.212
ज्ञान का काम तो जानना है,
उसको कोई रोक सकता नहीं,
ज्ञान का स्वभाव जानना है।

00:29:30.236 --> 00:29:38.674
ख्याल रखना!
ज्ञान का स्वभाव जानना है
और करना (नहीं है)।

00:29:38.698 --> 00:29:43.332
सम्यग्दर्शन करना है,
इतना तो ज्ञान का कार्य है कि नहीं?

00:29:43.356 --> 00:29:50.896
अरे भाई! करने की बात छोड़ दे अभी!
जानना, जानना, जानना, जानना है।

00:29:50.920 --> 00:30:01.029
शुद्धि प्रगट हो (उसको) जान,
वृद्धि हो- निर्जरा, देवचंद जी! जान,
मोक्ष हुआ जानता है ज्ञान। आहाहा!

00:30:01.053 --> 00:30:08.878
ऐसा जानना आत्मा का कार्य है,
करना तो कार्य नहीं है।

00:30:08.902 --> 00:30:18.207
ये बात जो १३वीं गाथा में (है कि)
पर्याय को निरपेक्षपने जान तो तेरे को
कर्ताबुद्धि छूट जायेगी। समझे!

00:30:18.231 --> 00:30:23.616
पर्याय सत्-अहेतुक है,
परिणाम स्वयं होता है
तो कर्ताबुद्धि छूट जाती है;

00:30:23.640 --> 00:30:28.012
अकर्ता ऐसे ज्ञायक पर दृष्टि आने पर
अनुभव हो जाता है।

00:30:28.036 --> 00:30:37.647
और ये १३वीं गाथा में
जो निरपेक्ष बात चली अपनी,
सात दिन से चलती है। हें? आहाहा!

00:30:37.671 --> 00:30:42.972
अभी उसके आधार पर एक
वह ११ भाग निकल चुके हैं न?

00:30:42.996 --> 00:30:50.647
प्रवचन रत्नाकर - गुरुदेव के व्याख्यान।
ये रमणभाई बैठे हैं। आहाहा!
उन्होंने बनाया है सब।

00:30:50.671 --> 00:30:55.789
बनाया नहीं बन गया, उसको जानते हैं,
वो भी जानते हैं, जाननहार है वो,
सब जाननहार हैं।

00:30:55.813 --> 00:30:58.092
इधर बैठनेवाला कोई करनेवाला नहीं है।

00:30:58.116 --> 00:31:02.945
गुरु का शिष्य करनेवाला नहीं होता है,
गुरु का शिष्य जाननेवाला रहता है

00:31:02.969 --> 00:31:08.834
और (जो) करता है वो गुरु का शिष्य है नहीं।
कर्ताबुद्धि छोड़ दो!

00:31:08.858 --> 00:31:10.700
मुमुक्षु: इसलिए तो आज
तीर्थंकर का जन्म हो गया।

00:31:10.724 --> 00:31:18.305
पू. लालचंदभाई: हाँ! तीर्थंकर का जन्म हुआ,
तो वाणी में ऐसा ही आया है।
भगवान की वाणी में आत्मा ज्ञानमय,

00:31:18.329 --> 00:31:25.647
<b>आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम्।</b>
<b>परभावस्य कर्तात्मा मोहऽयं व्यवहारिणाम् ॥६२॥</b>
(समयसार कलश ६२)।

00:31:25.671 --> 00:31:33.758
ये तो पाठशाला में बच्चे पढ़ते हैं न?
इसलिए श्लोक की कुछ कीमत नहीं लगती है
लोगों को। बाकी कीमती है। आहाहा!

00:31:33.782 --> 00:31:40.194
एक श्लोक बस है, बहुत है,
बहुत हो गया! आहाहा!

00:31:40.218 --> 00:31:46.096
यह (प्रवचन रत्नाकर भाग १ गुजराती)
बारहवाँ, बारह नंबर का page (पृष्ठ) है
वो मैं पढ़ता हूँ, गुरुदेव की वाणी है।

00:31:46.120 --> 00:31:53.318
वो १३वीं गाथा जो है न,
उसके अनुसंधान में ये मिल गया मेरे को,
साक्षीरूप। आहाहा!

00:31:53.342 --> 00:32:01.927
कभी-कभी मेरे पर कष्ट आता है,
बाहर का उपसर्ग, तब गुरु मेरी
सहायता में आ जाते हैं। स्वयं आ जाते हैं।

00:32:01.951 --> 00:32:08.114
मुमुक्षु: High court का (उच्च न्यायालय)
फैसला! Supreme (सर्वोच्च न्यायालय)!
पू. लालचंदभाई: देखो सुनो!

00:32:08.138 --> 00:32:17.216
<b>भाई! सूक्ष्म बात है!
नियमसार की दूसरी गाथा में
(टीका में) कहा हैं कि</b>

00:32:17.240 --> 00:32:24.696
<b>भगवान आत्मा की सम्यग्दर्शन की
पर्याय स्व-द्रव्य के आश्रय से उत्पन्न होती है।</b>
(प्रवचन रत्नाकर भाग १ पृष्ठ १२)

00:32:24.720 --> 00:32:31.749
अर्थात् उत्पन्न होती है तब
उसका लक्ष स्वद्रव्य ऊपर होता है
परंतु परद्रव्य ऊपर होता नहीं;

00:32:31.773 --> 00:32:36.638
ये तो इसमें लिखा नहीं?
ये इसमें लिखा है! आहाहा!

00:32:36.662 --> 00:32:46.029
ये आयेगा इसमें, इसमें ही आयेगा।
तू जरा पढ़ने की आदत सही रख,
तू निरपेक्ष जान। आहाहा!

00:32:46.053 --> 00:32:49.838
ये
 <b>स्वद्रव्य के आश्रय से उत्पन्न होती है,
उसको व्यवहार की अपेक्षा नहीं है।</b> 

00:32:49.862 --> 00:32:58.629
यानि व्यवहार रत्नत्रय का परिणाम हो,
देव-गुरु-शास्त्र के श्रद्धान का
शुभभाव हो तो शुद्ध पर्याय प्रगट होती है,

00:32:58.653 --> 00:33:07.434
ऐसी अपेक्षा है नहीं,
निरपेक्ष पर्याय प्रगट होती है, यानि पर
से निरपेक्ष और स्व से सापेक्ष, इतना लिया।

00:33:07.458 --> 00:33:14.932
अभी वो भी आहिस्ते-आहिस्ते,
धीमे-धीमे। आहाहा!

00:33:14.956 --> 00:33:25.705
व्यवहार रत्नत्रय है इसलिए
निश्चय रत्नत्रय प्रगट होता है? (ऐसा)
तीनकाल में नहीं है, निरपेक्ष है! आहाहा!

00:33:25.729 --> 00:33:32.296
उसको तेरे <b>व्यवहार की अपेक्षा नहीं है</b>,
व्यवहार अर्थात् व्यवहार रत्नत्रय की
अपेक्षा उसको नहीं है, एक बात।

00:33:32.320 --> 00:33:40.127
<b>निरपेक्षपने,</b>
निरपेक्षपने यानि पर से निरपेक्षपने
<b>स्व के आश्रय से होता है।</b> 

00:33:40.151 --> 00:33:47.585
यानि स्व से सापेक्ष, पर से निरपेक्ष।
आहिस्ते-आहिस्ते-आहिस्ते समझाते हैं।
आहिस्ते-आहिस्ते समझाते हैं।

00:33:47.609 --> 00:33:54.412
(अज्ञानी कहता है) हाँ! मेरा आया,
सापेक्ष तो आया! अभी पूर्णविराम नहीं हुआ,
जल्दी मत कर। आहाहा!

00:33:54.436 --> 00:34:04.798
तेरा नहीं आयेगा,
तेरा तो आनेवाला है ही नहीं।
आहाहा!

00:34:04.822 --> 00:34:16.407
<b>निरपेक्षपने स्व के आश्रय से होता है।
सम्यग्दर्शन की पर्याय को,
वस्तु जो उपादेय है उसका आश्रय है</b>,

00:34:16.431 --> 00:34:23.549
उसका आश्रय, ज्ञायक का आश्रय है,
<b>ऐसा कहना,</b> ऐसा कहना

00:34:23.573 --> 00:34:34.345
<b>ये तो इसकी तरफ पर्याय ढली है</b> न,
 <b>उस अपेक्षा से कहने में आता है</b>।
आहाहा!

00:34:34.369 --> 00:34:42.296
जिसको निर्विकल्पध्यान में
ज्ञायक दृष्टि में आया,
उसको सब निरपेक्ष जानने में आता है।

00:34:42.320 --> 00:34:51.540
सापेक्ष से कहना पड़ता है
वह भी उसको रुचता नहीं
परंतु क्या करें? आहाहा!

00:34:51.564 --> 00:35:01.629
<b>इस अपेक्षा से ये कहने में आता है;
नहीं तो ये सम्यग्दर्शन की पर्याय को षट्कारक
के परिणमन में पर की तो अपेक्षा नहीं है,</b> 

00:35:01.653 --> 00:35:08.998
पर अर्थात् कौन?
व्यवहार रत्नत्रय का परिणाम पर (है),
देव-गुरु-शास्त्र की बात दूर है। आहाहा!

00:35:09.022 --> 00:35:16.127
चेतनजी!
उसकी तो बात दूर है
मगर

00:35:16.151 --> 00:35:24.469
 <b>ये सम्यग्दर्शन की पर्याय के षट्कारक
के परिणमन में पर की अपेक्षा नहीं परंतु
द्रव्य-गुण की भी अपेक्षा नहीं।</b> आहाहा!

00:35:24.493 --> 00:35:37.825
रमणभाई! आहाहा! श्रद्धा नाम का
त्रिकाली गुण, उसकी अपेक्षा बिना
श्रद्धा की पर्याय प्रगट होती है। आहाहा!

00:35:37.849 --> 00:35:49.856
सत् की पराकाष्ठा है!
जिसे पर्याय सत् बैठी
उसकी कर्ताबुद्धि छूट जायेगी। आहाहा!

00:35:49.880 --> 00:35:54.767
<b>द्रव्य-गुण की भी अपेक्षा नहीं।
एक समय की विकारी पर्याय भी</b>,

00:35:54.791 --> 00:36:00.665
अभी निर्विकारी पर्याय का उल्लेख करके
अभी विकारी पर्याय,
विकारी तो सापेक्ष होता है न?

00:36:00.689 --> 00:36:10.060
निर्विकारी को निरपेक्ष कहो तो कहो,
मगर राग की पर्याय होती है उसमें
तो निरपेक्ष आप नहीं कह सकते हो।

00:36:10.084 --> 00:36:17.016
सुन, जरा शांति से सुन! आहाहा!
पराधीन दृष्टि तेरी हुई है।

00:36:17.040 --> 00:36:23.576
<b>एक समय की विकारी पर्याय भी
अपने षट्कारक से परिणमकर
विकारपने होती है।</b>

00:36:23.600 --> 00:36:29.358
<b>उसको भी द्रव्य या गुण के
कारण की अपेक्षा नहीं;</b>
आहाहा!

00:36:29.382 --> 00:36:36.136
मिथ्यात्व के परिणाम, आहाहा!
इसका कारण भगवान आत्मा नहीं;

00:36:36.160 --> 00:36:45.154
कारणपने आत्मा को मत देख,
कर्तापने आत्मा को मत देख, उसको देखेगा
तब तक मिथ्यात्व का अभाव नहीं होगा। आहाहा!

00:36:45.178 --> 00:36:53.683
ये दोष हुआ है उसका मैं कारण हूँ
(ऐसा) रहने दे अभी! आहाहा! गुरु मिले।

00:36:53.707 --> 00:36:57.309
...<b>भी अपने षट्कारक से परिणमन
कर के विकारपने होती है। उसको भी</b>,

00:36:57.333 --> 00:37:05.656
उसको भी, राग को भी,
मिथ्यात्व, अव्रत, कषाय और योग
चारों प्रकार ले लेना। आहाहा!

00:37:05.680 --> 00:37:09.949
<b>उसको भी द्रव्य या गुण के
कारण की अपेक्षा नहीं है;</b> 

00:37:09.973 --> 00:37:17.892
<b>कारण कि द्रव्य-गुण में विकार है ही नहीं।
विकारी पर्याय को पर कारकों
की भी अपेक्षा नहीं।</b>

00:37:17.916 --> 00:37:26.563
दर्शनमोह के उदय से मिथ्यात्व होता है
और चारित्रमोह के उदय से राग होता है,
ऐसा है नहीं!

00:37:26.587 --> 00:37:31.100
राग होता है
तब उसको निमित्त कहने में (आता है)।
यहाँ (अपनी पर्याय) से शुरू करो,

00:37:31.124 --> 00:37:36.936
यहाँ होता है
तब उसको निमित्त कहने में आता है।
आहाहा!

00:37:36.960 --> 00:37:45.705
<b>विकारी पर्याय को परकारको की भी 
अपेक्षा नहीं। वो एक समय की स्वतंत्र 
पर्याय</b> राग<b>,</b> हों!

00:37:45.729 --> 00:37:54.216
<b>स्वतंत्र पर्याय स्वयं अपने 
कर्ता-कर्म आदि से होती है।</b> 
कर्ता भी पर्याय और कर्म भी पर्याय;

00:37:54.240 --> 00:37:59.847
पर्याय का कारण भी पर्याय 
और पर्याय का कार्य भी पर्याय।

00:37:59.871 --> 00:38:07.852
ऐसे जब द्रव्य ऊपर दृष्टि पड़ने पर 
पर्याय सत् जानने में आती है, उसको 
सम्यग्ज्ञान कहने में आता है। आहाहा!

00:38:07.876 --> 00:38:13.625
मुमुक्षु: बहुत जगह पर गुरुदेव ने ऐसा कहा है?
पू. लालचंदभाई: हाँ! बहुत जगह पर आया है, 
बहुत जगह।

00:38:13.649 --> 00:38:19.540
वैसे तो ११ शास्त्र लिखे हैं न? 
कहते थे कि मेरा तो काम हो गया। आहाहा!

00:38:19.564 --> 00:38:28.207
मेरा तो काम हो गया, 
दूसरे का हो तो हो परंतु मेरा तो क्या 
घोंटना हुआ है! आहाहा! (ऐसा) कहते थे।

00:38:28.231 --> 00:38:36.798
<b>अपने कर्ता-कर्म आदि से होती है। 
वह पर्याय का कर्ता पर्याय स्वयं, करण स्वयं, 
वगैरह छहकारक स्वयं है।</b> आहाहा!

00:38:36.822 --> 00:38:45.229
आत्मा तो निराला, 
ये निराला होकर और निर्मल दृष्टि से 
ज्ञायक को जानते-जानते परिणाम होते हैं,

00:38:45.253 --> 00:38:50.798
ऐसा जानता है, 
मैं करता हूँ ऐसा जानता नहीं है; 
मैं करता हूँ, यह अज्ञान है। आहाहा!

00:38:50.822 --> 00:38:56.736
द्रव्य को जानने से पर्याय जानने में आती है, 
सत्पने, उसका नाम सम्यग्ज्ञान है। आहाहा!

00:38:56.760 --> 00:39:03.109
फिर उसके साथ कर्म के उदय आदि को 
भी सापेक्षपने ज्ञान जानता है। आहाहा!

00:39:03.133 --> 00:39:09.980
सब जाने, जानने की छूट है, 
करने की सख्त मनाई है।

00:39:10.004 --> 00:39:13.967
आज ये नेमिनाथ भगवान का जन्म है।

00:39:13.991 --> 00:39:19.816
सब अंदर से भाव से संकल्प करो कि 
<b>मैं जाननहार हूँ</b> और <b>मैं करनार 
नहीं</b> (सिद्धांतोनी सरवाणी बोल नंबर १)।

00:39:19.840 --> 00:39:26.376
सबको सम्यग्दर्शन नहीं हो तो ले जाना 
हमारे पास से (ऐसा) ज्ञानी कहते हैं।

00:39:26.400 --> 00:39:30.043
कर्ताबुद्धि छोड़ो, 
कर्ताबुद्धि को छोड़ो।

00:39:30.067 --> 00:39:33.567
जाननहार, जाननहार, 
जाननहार, जाननहार, जाननहार।

00:39:33.591 --> 00:39:38.385
जाननहार तीनों काल? 
कि तीनों काल जाननेवाला है, 
एक समय भी करनेवाला नहीं है।

00:39:38.409 --> 00:39:46.798
करनेवाला मानता है 
वह ज्ञान का अज्ञान कर देता है। 
ज्ञान का अज्ञान कर देता है। आहाहा!

00:39:46.822 --> 00:39:54.900
आज का मांगलिक दिन है। हो! 
आहाहा!

00:39:54.924 --> 00:40:00.269
<b>उस पर्याय का कर्ता पर्याय स्वयं, 
करण स्वयं, वगैरह छह कारक स्वयं है।</b> 
अब आगे थोड़ा।

00:40:00.293 --> 00:40:09.865
<b>बंध अधिकार में आता है 
कि द्रव्य अहेतुक, गुण अहेतुक</b>, 
अहेतुक यानि कारण उसका नहीं।

00:40:09.889 --> 00:40:23.798
<b>पर्याय अहेतुक। पर्याय जो सत्स्वभाव है 
वह स्वतंत्र और निरपेक्ष है।</b> दो शब्द, 
पर्याय - स्वतंत्र और निरपेक्ष। आहाहा!

00:40:23.822 --> 00:40:33.456
कि साहब! व्यवहार से तो सापेक्ष है न? 
परंतु निरपेक्ष तो निश्चय अभी करता नहीं, 
वहाँ सापेक्ष की बात तेरी आई! आहाहा!

00:40:33.480 --> 00:40:38.896
उसको सापेक्ष बिना रुचता नहीं। 
सापेक्ष हो तो अच्छा!

00:40:38.920 --> 00:40:46.594
कुछ अनेकांत हो, स्याद्वाद हो 
नहीं तो एकांत हो जाएगा। अरे! 
सम्यक् एकांत हो जायेगा, सुन तो सही! आहाहा!

00:40:46.618 --> 00:40:59.487
प्रभु! समय आया है। 
'ना' मत कहना अभी। ये भगवान 
यहाँ जन्मे हैं नेमिनाथ प्रभु आज। आहाहा!

00:40:59.511 --> 00:41:04.323
<b>वह स्वतंत्र और निरपेक्ष है। 
अपेक्षा से कथन करने में आता है</b>।

00:41:04.347 --> 00:41:23.394
यह कोहिनूर का हीरा! 
अपेक्षा से तो, अपेक्षा से कथन करने 
में आते हैं, बाकी वस्तु ऐसी है (नहीं)।

00:41:23.418 --> 00:41:30.860
कोहिनूर का हीरा! क्या? 
अपेक्षा से कथन करने में आता है।

00:41:30.884 --> 00:41:38.278
वह (तो) कथनमात्र है, ऐसा है नहीं। 
जैसा व्यवहारनय बात करता है 
वैसा स्वभाव है नहीं।

00:41:38.302 --> 00:41:42.638
यह पर्याय ऐसे है और इससे होती है, 
इससे होती है। आहाहा!

00:41:42.662 --> 00:41:48.332
एक कार्य में दो कारण तो 
कम से कम चाहिए (ऐसा मानता है)। 
आहाहा!

00:41:48.356 --> 00:41:56.332
एक कार्य में दूसरे कारण की अपेक्षा है नहीं। 
सुन तो सही तू! आहाहा!

00:41:56.356 --> 00:42:03.998
मिथ्यात्व की पर्याय दर्शनमोह के 
उदय की अपेक्षा बिना होती है।

00:42:04.022 --> 00:42:09.829
तो स्वभाव हो जाएगा? 
कि पर्याय का विभाव-स्वभाव हो जायेगा, 
हमको इष्ट है, पर्याय का (विभाव-स्वभाव)।

00:42:09.853 --> 00:42:16.389
हाँ! नियमसार में लिखा है। 
पर्याय का विभाव-स्वभाव है; 
विभाव-स्वभाव यानि धर्म।

00:42:16.413 --> 00:42:24.203
स्वभाव अर्थात् सम्यग्दर्शन गुण - ऐसा 
नहीं समझना, स्वभाव का अर्थ पर्याय 
का धर्म, पर्याय के धर्म का नाम स्वभाव है।

00:42:24.227 --> 00:42:26.189
<b>गुणाः स्वभावा भवन्ति</b>
(आलापपद्धतिः, श्री देवसेनाचार्य, सूत्र ११९),

00:42:26.213 --> 00:42:29.043
<b>स्वभावा गुणा न भवन्ति</b> 
(आलापपद्धतिः, श्री देवसेनाचार्य, सूत्र ११८)।

00:42:29.067 --> 00:42:32.620
गुणों को स्वभाव कहने में आता है, 
मगर स्वभाव को गुण कहने में नहीं आता।

00:42:32.644 --> 00:42:41.029
स्वभाव को धर्म कहने में आता है, 
'नित्य-अनित्य' गुण नहीं अपितु धर्म है। 
आहाहा!

00:42:41.053 --> 00:42:44.132
अपेक्षा से कथन करने में आता है, 
दूसरा तो उपाय (है नहीं)।

00:42:44.156 --> 00:42:52.927
समझाने के लिए अपेक्षा से कथन करने में 
आता है मगर जैसा कथन है ऐसा समझना नहीं।

00:42:52.951 --> 00:43:07.363
तखतराजजी! आहाहा! 
प्रभु का जन्मदिन है न आज! 
मांगलिक दिवस है।

00:43:07.387 --> 00:43:17.896
<b>अपेक्षा से कथन करने में 
आता है कि पर्याय को द्रव्य उपादेय है।</b> 
पर्याय को शुद्धात्मा उपादेय है।

00:43:17.920 --> 00:43:25.843
जब पर्याय आत्मा को उपादेय करे कि 
ज्ञायकभाव हूँ, ज्ञायकभाव वो मैं हूँ; 
उसका नाम उपादेय हुआ न?

00:43:25.867 --> 00:43:32.843
देह, वो मैं हूँ और राग वह मैं वो छूट गया, 
पर्याय में क्या आया? 
कि ज्ञायकभाव मैं हूँ। आहाहा!

00:43:32.867 --> 00:43:40.025
तो ज्ञायकभाव मैं हूँ, तो पर्याय में 
सम्यग्दर्शन हुआ ऐसा नहीं है,

00:43:40.049 --> 00:43:45.007
सम्यग्दर्शन हुआ 
तब ऐसा भाव आया कि वो मैं हूँ।

00:43:45.031 --> 00:43:54.700
पर्याय से ले न तू, वहाँ से क्यों लेता है? 
आहाहा! सूक्ष्म बात है!

00:43:54.724 --> 00:44:00.287
<b>कि पर्याय को</b> स्वद्रव्य <b>
उपादेय है। फक्त पर्याय,</b> खुलासा 
करते हैं, गुरुदेव खुलासा करते हैं।

00:44:00.311 --> 00:44:09.136
<b>फक्त पर्याय द्रव्य बाजू ढली,</b> 
जो पर्याय बहिर्मुख थी 
वह पर्याय अंतर्मुख हुई। आहाहा!

00:44:09.160 --> 00:44:18.349
मनसुखभाई! 
वो जो पर्याय बहिर्मुख थी वह पर्याय 
अंतर्मुख ढली, झुकी अंदर में, अंतर में।

00:44:18.373 --> 00:44:28.043
<b>फक्त पर्याय द्रव्य बाजू ढली 
अर्थात् आश्रय लिया</b>। 
इसने आश्रय लिया और उसने आश्रय दिया।

00:44:28.067 --> 00:44:35.038
पारिणामिकभाव कहता है कि 
तू मुझे रहने दे, 
मैं किसी को आश्रय देता नहीं।

00:44:35.062 --> 00:44:45.549
पर्याय कहती है (कि) 
मुझे विवेक तो करने दो। 
एक बार कह दे, दूसरी बार कहना मत।

00:44:45.573 --> 00:44:52.616
अद्भुत से अद्भुत! द्रव्यानुयोग 
अति सूक्ष्म और गंभीर है। आहाहा!

00:44:52.640 --> 00:45:01.492
अपनी योग्यता और गुरुगम! 
दो चीज - अपनी योग्यता और 
गुरुगम से समझ में आए ऐसा है।

00:45:01.516 --> 00:45:05.016
मुमुक्षु: ज्ञानी का जन्म 
निरपेक्ष पक्ष को बताने के लिए है? 
पू. लालचंदभाई: बताने के लिए है।

00:45:05.040 --> 00:45:12.336
सापेक्ष बतानेवाले तो बहुत हैं। 
निरपेक्ष बतानेवाले तो विरले कहीं-कहीं 
किसी-किसी जगह पर (मिलते हैं)। आहाहा!

00:45:12.360 --> 00:45:19.034
ये गुरुदेव आए इसलिए बात बाहर आई। 
आहाहा! बाकी हम तो कुछ जानते नहीं थे।

00:45:19.058 --> 00:45:27.696
हम तो स्थानकवासी, 
प्रतिमा को भी नहीं मानते। समझ गए? 
आहाहा! सच्चाई, हकीकत जो है वह है।

00:45:27.720 --> 00:45:34.505
मगर योगानुयोग गुरुदेव का भेंटा हुआ! 
आहाहा!

00:45:34.529 --> 00:45:42.829
'यह पुण्यतत्त्व कषाय की मन्दता है'। 
अरे! हम जिससे धर्म मानते हैं और ये 
पुरुष (उसको) 'कषाय की मन्दता' कहते हैं।

00:45:42.853 --> 00:45:50.509
अरे! 'कषाय' विशेषण लगाया पुण्य को! 
यह क्या? भड़क उठे हम। आहाहा!

00:45:50.533 --> 00:46:02.883
कषाय की मंदता, 
व्यवहार धर्म नहीं, ख्याल रखना। 
जोखिम है व्यवहार धर्म कहने में।

00:46:02.907 --> 00:46:08.318
वो तो पकड़ लेगा (कि) व्यवहार धर्म तो है न, 
भले निश्चय धर्म बाद में होगा, 
व्यवहार धर्म तो हो गया कि नहीं?

00:46:08.342 --> 00:46:22.909
कषाय की मन्दता है ऐसा कह ना! 
व्यवहार धर्म कहाँ है? निश्चय के 
बिना व्यवहार नाम आता नहीं। आहाहा!

00:46:22.933 --> 00:46:32.940
सत्य तो बाहर आया है कोई! आहाहा! 
अलौकिक सत्य बाहर आया है। 
लायक जीव का काम हो जाए।

00:46:32.964 --> 00:46:37.625
यह जब कषाय की मन्दता है ऐसा कहा 
तो खलबली अंदर में हो गई। आहाहा!

00:46:37.649 --> 00:46:42.940
हम मार्ग भूले, 
हम मार्ग भूले हैं और न्याय से बात (है)।

00:46:42.964 --> 00:46:48.629
तीव्र कषाय को पाप कहते हैं और 
मंद कषाय को पुण्य कहते हैं, 
धर्म-बर्म (नहीं है)।

00:46:48.653 --> 00:46:57.456
आगे कषाय विशेषण हो (तो) 
उसमें धर्म कहाँ से हो? धर्म तो अकषाय 
परिणाम हो, इतना तो ख्याल आता है न?

00:46:57.480 --> 00:47:06.607
व्यवहार धर्म मत बोलना, 
कषाय की मन्दता है। वह दुःख का 
कारण वर्तमान में है और भविष्य में भी (है)।

00:47:06.631 --> 00:47:17.029
परंपरा (से) दुःख का कारण है, 
उसमें सुख का कारण है नहीं; और स्वयं 
बंधरूप है और बंध का कारण होता है। आहाहा!

00:47:17.053 --> 00:47:24.220
पुण्यतत्त्व बंधरूप है और बंध का कारण, 
निमित्त कारण है। आहाहा!

00:47:24.244 --> 00:47:31.496
<b>पर्याय द्रव्य बाजू ढली अर्थात् आश्रय लिया, 
अभेद हुई ऐसा कहने में आता है। 
ऐसा वस्तु का स्वतंत्र स्वरूप है</b>
(कानजी स्वामी-हीरक जयन्ती अभिनन्दन ग्रंथ)।

00:47:31.520 --> 00:47:44.940
ये गुरुदेव का व्याख्यान (है)। 
३:३० से ४:३० हाँ, ४:३० तक है, टाईम है। 
अभी दूसरा पारा चालू होता है।

00:47:44.964 --> 00:47:50.220
१३ नंबर की गाथा का एक पारा पूरा हो गया 
(अभी) दूसरा पारा।

00:47:50.244 --> 00:47:58.012
<b>बाह्य (स्थूल) दृष्टिसे देखा जाये तो:-</b> 
यानि भेदज्ञान छोड़कर, बाह्य स्थूल दृष्टि,

00:47:58.036 --> 00:48:03.518
एकत्वबुद्धि करके देखें तो जीव और अजीव 
हैं तो भिन्न-भिन्न,

00:48:03.542 --> 00:48:11.003
तो भी <b>बाह्य (स्थूल) दृष्टिसे</b>, 
एकत्व करके <b>देखा जाये तो:- जीव-पुद्गलकी 
अनादि बन्धपर्यायके समीप जाकर</b> 

00:48:11.027 --> 00:48:19.398
बंध के समीप जाकर हों! 
मुक्ति के समीप जाकर नहीं। 
ख्याल रखना। आहाहा!

00:48:19.422 --> 00:48:22.572
<b>बन्धपर्यायके समीप जाकर 
एकरूपसे अनुभव करनेपर</b> 

00:48:22.596 --> 00:48:30.314
जीव और अजीव जैसे एक हैं, 
ऐसा उसको <b>अनुभव करनेपर</b> 
अर्थात् ऐसा जानने पर और ऐसा मानने पर,

00:48:30.338 --> 00:48:37.394
<b>यह नवतत्त्व भूतार्थ हैं,</b> आहाहा! 
भूतार्थ की सिद्धि भी कब की?

00:48:37.418 --> 00:48:45.194
समझने जैसा (है) यह तो समयसार है। 
आहाहा!

00:48:45.218 --> 00:48:53.829
कि जीव और अजीव का लक्ष करके, 
एकत्वबुद्धि करके परिणमता है 
इसलिए नवतत्त्व उत्पन्न होते हैं।

00:48:53.853 --> 00:49:07.585
नहीं तो नवतत्त्व का जन्म नहीं होता। 
है जरा सूक्ष्म बात। आहाहा!

00:49:07.609 --> 00:49:14.883
यह टीका है अलौकिक। 
अमृतचंद्र आचार्य की टीका 
'न भूतो न भविष्यति'।

00:49:14.907 --> 00:49:18.900
ऐसी टीका कोई द्रव्यानुयोग में है नहीं।

00:49:18.924 --> 00:49:27.114
भावलिंगी संत तो बहुत हुए 
मगर इस प्रकार की योग्यता, 
इस प्रकार का क्षयोपशम (नहीं है)।

00:49:27.138 --> 00:49:30.994
स्थिरता तो सबको तीन कषाय के 
अभाव पूर्वक का आनंद में एक जैसी है।

00:49:31.018 --> 00:49:40.043
आनंद में सब भावलिंगी एक जैसे होते हैं, 
मगर कोई विशिष्ट प्रकार! आहाहा!

00:49:40.067 --> 00:49:50.856
ये स्व-पर के (हित में) हेतु हो, 
ऐसे जीव तो कम होते हैं। आहाहा! 
तीर्थंकर भगवान उत्कृष्ट! आहाहा!

00:49:50.880 --> 00:49:55.216
इन दो की एकता करके देखें तो 
<b>नवतत्त्व भूतार्थ हैं</b>।

00:49:55.240 --> 00:50:04.780
ऐसा नहीं कहा, ऐसा नहीं कहा कि 
एकत्व करता है तो पुण्य-पाप-आस्रव-बंध चार 
तत्त्व भूतार्थ हैं, ऐसा नहीं कहा, ख्याल रखना!

00:50:04.804 --> 00:50:18.718
<b>नवतत्त्व भूतार्थ हैं</b> क्योंकि चार 
के सद्भाव में, और चार के अभाव में 
तीन प्रगट होते हैं, यानि नौ हो गए।

00:50:18.742 --> 00:50:21.354
<b>यह नवतत्त्व भूतार्थ हैं, सत्यार्थ हैं</b>।

00:50:21.378 --> 00:50:28.087
जहाँ तक भेदज्ञान नहीं है, एकत्व करता है, 
तहाँ तक ये नौ तत्त्वरूप परिणमता है।

00:50:28.111 --> 00:50:32.216
<b>और एक जीवद्रव्यके 
स्वभावके समीप जाकर।</b>

00:50:32.240 --> 00:50:38.927
वो बंधपर्याय के समीप जाकर देखता था 
तो आत्मा नौरूप ही दिखता था।

00:50:38.951 --> 00:50:48.238
आत्मा, आत्मा है तो एक मगर 
एकरुप न दिखकर के नौरूप दिखता था।

00:50:48.262 --> 00:50:53.314
क्यों दिखता था नौ रूप? 
यह बंध के समीप जाकर देखता है,

00:50:53.338 --> 00:51:02.607
निमित्त के संग (से) देखता है, 
निमित्त का लक्ष करके देखता है, 
इसलिए नौ भेद उसको दिखते हैं। आहाहा!

00:51:02.631 --> 00:51:06.336
मुमुक्षु: निमित्त तो होता है न - 
ऐसा कहते हैं न? निमित्त तो होता है न?

00:51:06.360 --> 00:51:10.834
पू. लालचंदभाई: आहाहा! 
वास्तव में क्या कहें?

00:51:10.858 --> 00:51:17.914
एक बार की बात है। अभी तो 
मैं मुंबई गया था इसलिए वाँचन नहीं करता।

00:51:17.938 --> 00:51:25.714
मैं पहले तो इधर राजकोट में वाँचता 
(प्रवचन करता) था। बाद में तो अभी 
१५ साल से मैं नहीं वाँचता हूँ मंदिर में।

00:51:25.738 --> 00:51:35.478
पहले वाँचते थे तब क्या हुआ? 
एक बार की बात है कि एक बार बात 
ऐसी आई वाँचन में, कुदरती आ गई।

00:51:35.502 --> 00:51:38.452
मैंने कहा कि <b>इस जगत में 
कोई निमित्त नहीं है</b>,

00:51:38.476 --> 00:51:48.905
इस जगत में सब उपादान हैं, 
जगत में निमित्त नहीं है - ऐसा कहकर छोड़ 
दिया। ऐसा (कोई) स्पष्टीकरण नहीं किया।

00:51:48.929 --> 00:51:57.189
तो हम दो-चार (लोग) रविवार को 
घूमने बाहर जाते थे तत्त्व-चर्चा हेतु - 
चंदूभाई डॉक्टर, मोदी साहब, मोदी साहब थे।

00:51:57.213 --> 00:52:05.429
मोदी साहब ने कहा, पूछा कि, 
‘लालचंदभाई! यह आपने क्या कहा? 
कि निमित्त जगत में नहीं है कोई?’

00:52:05.453 --> 00:52:12.216
कि नहीं है निमित्त; सब ज्ञेय हैं। 
निमित्त तो कोई है ही नहीं।

00:52:12.240 --> 00:52:19.327
‘ये क्या कहा आपने?’ 
कि ये निमित्त तो एक 
व्यक्तिगत की अपेक्षा से निमित्त है।

00:52:19.351 --> 00:52:23.380
समष्टीगत की अपेक्षा से सब ज्ञेय हैं, 
कोई निमित्त नहीं है।

00:52:23.404 --> 00:52:28.332
निमित्त, जिसको निमित्त लगता है 
उसको नैमित्तिक पर्याय प्रगट होती है।

00:52:28.356 --> 00:52:32.905
निमित्त नहीं लगे और उपादान लगे, 
सब उपादान ज्ञेय हैं 
तो इधर ज्ञान प्रगट हो जाता है।

00:52:32.929 --> 00:52:37.758
मुमुक्षु: बराबर, 
नैमित्तिक पर्याय उत्पन्न नहीं होती।

00:52:37.782 --> 00:52:42.367
पू. लालचंदभाई: ऐसा कहा था। भाई का 
अभी प्रश्न आया न, निमित्त तो है कि नहीं? 
मुमुक्षु: नहीं।

00:52:42.391 --> 00:52:46.780
पू. लालचंदभाई: निमित्त है कि ज्ञेय है? 
वो भी ज्ञेय, 
व्यवहार-ज्ञेय है कि निश्चय-ज्ञेय है?

00:52:46.804 --> 00:52:52.216
मुमुक्षु: व्यवहार। 
पू. लालचंदभाई: वो व्यवहार-ज्ञेय कब है? 
कि निश्चय-ज्ञेय जानने के बाद। आहाहा!

00:52:52.240 --> 00:53:05.563
लंबी-चौड़ी बात है अंतर की सब। 
मुमुक्षु: निमित्ताधीन दृष्टि छूट गयी। 
पू. लालचंदभाई: इष्ट है, सबकी छूट जाए! आहाहा!

00:53:05.587 --> 00:53:13.567
सबकी छूट जाए तो सबको ज्ञान होगा न, 
वो ज्ञेयपने जानने में आएगा। 
छहद्रव्य ज्ञेय हैं कि निमित्त?

00:53:13.592 --> 00:53:14.683
मुमुक्षु: ज्ञेय हैं।

00:53:14.707 --> 00:53:19.549
पू. लालचंदभाई: सिद्ध भगवान को 
छहद्रव्य जानने में आते हैं ज्ञान में, 
वो ज्ञेय हैं कि निमित्त?

00:53:19.573 --> 00:53:25.189
ऐसे सम्यग्दर्शन होने के बाद 
सब निमित्त हैं कि ज्ञेय हैं? 
सब ज्ञेय हैं। आहाहा!

00:53:25.213 --> 00:53:30.158
श्रुतज्ञान में सब ज्ञेयपने जानने में आते हैं, 
जैसे केवली को जानने में आये ऐसे, 
व्यवहार। आहाहा!

00:53:30.182 --> 00:53:34.612
निश्चय से तो यह ज्ञेय एक ही है।

00:53:34.636 --> 00:53:43.020
यह तो 'निमित्त नहीं' 
यह बात जब कही तब मोदी साहब बोले 
कि, ‘भाई! आज क्या यह वाँचन में कहा?

00:53:43.044 --> 00:53:45.607
निमित्त नहीं?' 
(पू. लालचंदभाई:) निमित्त तो है नहीं कहीं।

00:53:45.631 --> 00:53:49.745
(मोदी साहब:) तो क्या है? 
(पू. लालचंदभाई:) (कि) सब ज्ञेय हैं। 
आहाहा!

00:53:49.769 --> 00:53:59.967
एक बार ऐसा बनाव बना 
७५वीं जन्म-जयंती थी मुंबई में। 
गुरुदेव की ७५वीं जन्मजयंती। समझे? ७५वीं।

00:53:59.991 --> 00:54:06.505
तो एक अभिनंदन-ग्रंथ निकलता था, 
तो सब विद्वानों को कोई न कोई लेख देना (था)।

00:54:06.529 --> 00:54:11.980
ऐसा उस टाइम मैंने ये लेख दिया एक।

00:54:12.004 --> 00:54:23.625
उसमें ऐसा लिखा कि ये जो आठ कर्म हैं न, 
<b>आठ कर्म, वो ज्ञेय हैं निमित्त नहीं हैं</b>।
(कानजी स्वामी-हीरक जयन्ती अभिनन्दन ग्रंथ)

00:54:23.649 --> 00:54:33.474
'निमित्त' तो अज्ञानी उसका नाम बिगाड़ता है, 
नाम बिगाड़ दिया उसने, 
अज्ञानी ने नाम बिगाड़ दिया है।

00:54:33.498 --> 00:54:38.345
तो एक कर्म जाति है, आठ कर्म। 
समझे?

00:54:38.369 --> 00:54:43.127
तो ये कर्मों की एक सभा भरी, 
कर्म की

00:54:43.151 --> 00:54:48.572
कि ये सोनगढ़ के संत कहते हैं 
कि आठ कर्म ज्ञेय है

00:54:48.596 --> 00:54:57.629
और सारा जगत कहता है कि निमित्त है, 
तो हमारा नाम बिगाड़ दिया - 
सचमुच हम ज्ञेय हैं कि निमित्त हैं?

00:54:57.653 --> 00:55:04.785
तो ऐसा करो कि अपने 
पाँच परमाणुओं को सीमंधर भगवान 
के पास भेजो फैसला लेने के लिए

00:55:04.809 --> 00:55:11.700
क्योंकि वो (सोनगढ़ नामक) 
इधर branch (शाखा) तो है, 
लेकिन उसको कोई मानता नहीं है।

00:55:11.724 --> 00:55:18.283
कोई है न, अति सयाना, 
कि सोनगढ़ की बात हम नहीं मंजूर करेंगे, 
सीमंधर भगवान पास से जाकर आओ, फैसला करो।

00:55:18.307 --> 00:55:26.052
तो पाँच परमाणु (को) जाने में 
तो टाइम (तो) लगता नहीं है। 
गए सामने, सीमंधर भगवान के सामने।

00:55:26.076 --> 00:55:32.452
(सीमंधर भगवान:) अच्छा! 
इधर तक धक्का खाया आपने? 
हमारी branch तो सोनगढ़ में थी।

00:55:32.476 --> 00:55:39.709
(पाँच परमाणु:) कि साहब! 
सोनगढ़ का थोड़े जीव मानते हैं, 
सब मानते नहीं (हैं)।

00:55:39.733 --> 00:55:47.358
ये लिखा है उसमें। हों! लिखा है। तो अच्छा! 
(पाँच परमाणु:) तो साहब! 
हमारा नाम क्या है आप फरमाओ?

00:55:47.382 --> 00:55:51.474
(सीमंधर भगवान:) कि तुम्हारा नाम ज्ञेय है। 
तुम्हारा नाम निमित्त नहीं है।

00:55:51.498 --> 00:55:56.887
निमित्त तो वो अज्ञानी 
जीव मूर्ख तेरा नाम बिगाड़ता है।

00:55:56.911 --> 00:56:00.429
अच्छा! इधर आए वो पाँच परमाणु, 
सभा भरी।

00:56:00.453 --> 00:56:06.705
(पाँच परमाणु:) हमारा नाम ज्ञेय है 
(ऐसा) जाहिर हो जाओ। 
हमारा नाम निमित्त नहीं है।

00:56:06.729 --> 00:56:13.763
तो निमित्त का लक्ष छूटकर ज्ञान 
का लक्ष आते ही वो ज्ञेय दिखाई देगा।
निमित्त दिखाई देगा नहीं।

00:56:13.787 --> 00:56:17.634
वो तो नैमित्तिकरूप से परिणमता है 
वहाँ तक निमित्त है।

00:56:17.658 --> 00:56:22.043
(जब) जाननेरूप परिणमता है 
तब निमित्त कहाँ है? 
वह तो ज्ञान का ज्ञेय है।

00:56:22.067 --> 00:56:33.247
आठ कर्म हों! 
निमित्त नहीं है। रमणभाई! 
निमित्ताधीन दृष्टिवाले को निमित्त दिखता है।

00:56:33.271 --> 00:56:38.900
निमित्ताधीन दृष्टिवाले को -
निमित्त तो है न? 
निमित्त तो है न?

00:56:38.924 --> 00:56:48.629
स्वभावदृष्टिवाले को 
जगत के अंदर सब ज्ञेय हैं। आहाहा! 
कोई इष्ट नहीं और कोई अनिष्ट नहीं है।

00:56:48.653 --> 00:56:57.007
वो दूसरा पारा है उसमें क्या कहा? 
कि जब एकत्वबुद्धि करता है तो 
<b>नवतत्त्व भूतार्थ हैं, सत्यार्थ हैं,</b> 

00:56:57.031 --> 00:57:01.607
मगर जब <b>एक जीवद्रव्यके स्वभावके</b> 
ओर देखे तो।

00:57:01.631 --> 00:57:06.207
अजीव की ओर देखो 
तो नवतत्त्व खड़ा हो जाएगा।

00:57:06.231 --> 00:57:11.296
मगर एक जीवद्रव्य के स्वभाव की ओर देखे 
तो <b>स्वभावके समीप जाकर</b>।

00:57:11.320 --> 00:57:14.745
उसमें बंध पर्याय के समीप जाकर। 
आहाहा!

00:57:14.769 --> 00:57:22.060
निमित्त की तरफ लक्ष करेगा 
तो नवतत्त्व दिखेगा; ज्ञायक तरफ 
लक्ष करेगा तो नवतत्त्व नहीं दिखेगा।

00:57:22.084 --> 00:57:26.305
<b>एक जीवद्रव्यके स्वभावके समीप 
जाकर अनुभव करनेपर वे अभूतार्थ हैं,</b> 

00:57:26.329 --> 00:57:33.478
नवतत्त्व कोई दिखते नहीं। 
नवतत्त्व की उत्पत्ति ही नहीं होती है।

00:57:33.502 --> 00:57:37.452
राग की उत्पत्ति हो तो 
वीतरागभाव की उत्पत्ति हो।

00:57:37.476 --> 00:57:47.367
राग की ही उत्पत्ति नहीं होती है 
तो वीतरागभाव भी दिखता नहीं, 
वीतरागी प्रतिमा दिखती है। आहाहा!

00:57:47.391 --> 00:57:49.643
अजब-गजब की बात है!

00:57:49.667 --> 00:57:55.758
वीतरागी-द्रव्य ऊपर दृष्टि पड़ने 
पर वीतराग होता है, ऐसी पर्याय 
प्रगट हो तो जानने में आती है कि नहीं?

00:57:55.782 --> 00:57:59.514
तुझे पर्याय को जानने की भावना अभी भी है। 
आहाहा!

00:57:59.538 --> 00:58:06.220
अरे! द्रव्य को जान न, पर्याय तो सहज में 
जणित (जानने में आ) जाएगी। 
उसमें पुरुषार्थ नहीं आता है।

00:58:06.244 --> 00:58:10.500
पुरुषार्थ द्रव्यस्वभाव को, 
सामान्य को जानने में, 
स्वभाव को (जानने में) पुरुषार्थ है।

00:58:10.524 --> 00:58:15.985
विशेष तो सहज जानने में आ जाता है। 
आहाहा!

00:58:16.009 --> 00:58:17.985
<b>अनुभव करनेपर 
यह नवतत्त्व भूतार्थ हैं,</b> 

00:58:18.009 --> 00:58:27.256
जीवद्रव्यके स्वभावके समीप जाकर देखो तो 
सब निमित्त-नैमित्तिक संबंध से उत्पन्न हुआ 
भेद, नौ का भेद, वो भेद अभूतार्थ है।

00:58:27.280 --> 00:58:31.114
अभेद में भेद दिखता नहीं, 
अभेद की दृष्टि में भेद दिखता नहीं है।

00:58:31.138 --> 00:58:36.909
अभेद में भेद नहीं है 
और अभेद की दृष्टि हुई 
उसमें भेद दिखता नहीं है।

00:58:36.933 --> 00:58:39.558
वो अभेद हुआ 
 उसमें भी भेद दिखता नहीं है।

00:58:39.582 --> 00:58:45.972
तीनों में भी भेद दिखता नहीं है; 
त्रिकालीद्रव्य में भेद नहीं है, 
दृष्टि हुई उसमें भेद नहीं है,

00:58:45.996 --> 00:58:55.754
दृष्टि और द्रव्य अभेद करके 
उसमें भी नौ (भेद) नहीं है। आहाहा! 
अलौकिक चीज है। समयसार है ये तो।

00:58:55.778 --> 00:58:59.736
<b>(वे जीवके एकाकार 
स्वरूपमें नहीं हैं;)</b> 

00:58:59.760 --> 00:59:10.883
अपने आत्मा का जो एकाकार स्वरूप 
ज्ञानानंद परमात्मा है उसमें नौ का भेद है 
(नहीं), है नहीं इसलिए दिखता नहीं है।

00:59:10.907 --> 00:59:16.945
अभेद में भेद दिखाई देता नहीं है। 
एक ३७ नंबर का श्लोक है बहुत अच्छा।

00:59:16.969 --> 00:59:24.803
इसके अनुसंधान में थोड़ा (उसको लेते हैं)। 
आहाहा! आज एक घंटा मिल गया हमको 
इसलिए जरा।

00:59:24.827 --> 00:59:40.274
क्योंकि कार्यक्रम है न, इसलिए। 
नहीं तो एक घंटा करें 
मगर कार्यक्रम चलता है न।

00:59:40.298 --> 00:59:47.114
३७ नंबर का श्लोक है अजीव अधिकार का। 
२९ बोल का उकरड़ा (कूड़े का ढेर) 
कहते हैं न सब।

00:59:47.138 --> 00:59:52.887
उसके पीछे एक श्लोक बनाया 
अमृतचंद्राचार्य ने। मार्मिक श्लोक है!

00:59:52.911 --> 01:00:07.812
<b>जो वर्णादिक अथवा रागमोहादिक 
भाव कहे [सर्वे एव] वे सब ही</b>, 
सर्वे एव, सर्वे एव,

01:00:07.836 --> 01:00:17.394
<b>वे सब ही इस पुरुष (आत्मा) से</b> 
यानि इस शुद्धात्मा से, पुरुष यानि आत्मा, 
स्त्री-पुरुष की बात नहीं है।

01:00:17.418 --> 01:00:22.363
<b>इस पुरुष (आत्मा) से</b> 
आत्मा से <b>भिन्न हैं;</b>

01:00:22.387 --> 01:00:28.292
यह चौदह गुणस्थान, चौदह मार्गणास्थान, 
चौदह जीवसमास हैं? कि हैं।

01:00:28.316 --> 01:00:37.980
हैं को कौन 'ना' बोलता है? 
मगर मेरे से भिन्न हैं। छहद्रव्य हैं? 
कि हैं मगर मेरे से भिन्न हैं। आहाहा!

01:00:38.004 --> 01:00:45.723
वाद-विवाद से पार नहीं पड़ेगा। आहाहा! 
<b>इसलिये अन्तर्दृष्टिसे देखनेवालेको</b> 

01:00:45.747 --> 01:00:55.274
ये जीव के स्वभाव के समीप जाकर देखे तो, 
इसका खुलासा है। आहाहा!

01:00:55.298 --> 01:01:01.887
<b>अन्तर्दृष्टिसे देखनेवालेको</b> 
अंतर्दृष्टिसे देखे उसको, उसको, ऐसा।

01:01:01.911 --> 01:01:09.456
दूसरे को नहीं, खबर नहीं पड़े। 
<b>अन्तर्दृष्टिसे देखनेवालेको 
यह सब दिखाई नहीं देते</b>।

01:01:09.480 --> 01:01:13.678
लेकिन होने पर भी नहीं दिखते? 
आहाहा!

01:01:13.702 --> 01:01:20.665
हों तो हों, हों तो हों, 
परंतु अंतर्दृष्टि से देखें तो 
अकेला चिदानंद भगवान आत्मा,

01:01:20.689 --> 01:01:24.487
ध्रुव परमात्मा जानने में आता है, 
उत्पाद-व्यय जानने में आते नहीं।

01:01:24.511 --> 01:01:27.785
<b>यह सब दिखाई नहीं देते</b>, 
तब क्या दिखाई देता है?

01:01:27.809 --> 01:01:34.576
ये सब दिखते नहीं, तो क्या दिखता है? 
<b>मात्र</b>, only (सिर्फ), फक्त।

01:01:34.600 --> 01:01:46.469
मात्र यानि only, फक्त 
<b>एक सर्वोपरि तत्त्व ही दिखाई देता है</b> 
आहाहा!

01:01:46.493 --> 01:01:55.474
सर्वोपरि तत्त्व उसका अर्थ 
<b>केवल एक चैतन्यभावस्वरूप 
अभेदरूप आत्मा ही दिखाई देता है।</b> 

01:01:55.498 --> 01:01:59.816
अभेद में भेद दिखता नहीं 
क्योंकि भेद उसमें है नहीं

01:01:59.840 --> 01:02:07.443
और भेद की दृष्टि करने पर अभेद दिखता नहीं 
और अभेद की दृष्टि में भेद दिखता नहीं। 
आहाहा!

01:02:07.467 --> 01:02:13.918
प्रमाण से भेदाभेद जानने में आता है 
वो विषय अलग है। ये विषय, 
ये (तो) अनुभव करने के लिए है।

01:02:13.942 --> 01:02:18.589
अनुभव होने के बाद भेदाभेद की बात 
करना, पहले अभेद की बात तो कर!

01:02:18.613 --> 01:02:25.945
कि भेदाभेद तो जानें कि ये भेदाभेद हैं? 
परंतु भेदाभेद कौन जाने? 
कि (जब) भेद को न जाने तब।

01:02:25.969 --> 01:02:37.622
(पहले) अभेद को जाने, 
बाद में भेदाभेद का ज्ञान 
उसको प्रमाण से होता है। समय हो गया।