﻿WEBVTT

00:01:04.751 --> 00:01:15.776
शुद्धात्मा का स्वरूप क्या है वो स्पष्टरूप
से आया है, बहुत स्पष्टरूप से आ गया है।

00:01:15.800 --> 00:01:22.649
बहुत से भी बहुत स्पष्टरूप से
आ गया है, एक बात।

00:01:22.673 --> 00:01:34.113
और यह शुद्धात्मा का अनुभव कैसे हो
सकता है, वो भी बात साफ इसमें आ गई है।

00:01:34.137 --> 00:01:42.953
किसी को पूछने की जरूरत नहीं पड़े, इतना
स्पष्टीकरण कुंदकुंदाचार्य भगवान (ने) खुद ने

00:01:42.977 --> 00:01:50.429
और टीकाकार अमृतचंद्राचार्य
भगवान ने भी किया है।

00:01:50.453 --> 00:02:02.644
तो आज नेमिनाथ भगवान
को केवलज्ञान होनेवाला है।

00:02:02.668 --> 00:02:22.908
तो आज की बात अभी तक जो आई, हमने
स्वाध्याय किया १३वीं गाथा का, उसके
निचोड़-साररूप आज बात आनेवाली है।

00:02:22.932 --> 00:02:35.516
ध्यान देकर सुनना! उपयोग बाहर
जाएगा तो ख्याल में नहीं आएगा।

00:02:35.540 --> 00:03:00.856
इतनी मानसिक एकाग्रता तो श्रोता को
होनी ही चाहिए। और अध्यात्म शास्त्र को
सुनने के लिए मानसिक एकाग्रता हो जाती है।

00:03:00.880 --> 00:03:18.542
रुचिवाले जीव का उपयोग बाहर नहीं जाता
है। सुनते-सुनते अंदर में कुछ, अंदर में वो
कार्य होता है; अकेला सुनना नहीं होता है।

00:03:18.566 --> 00:03:31.040
कोई-कोई अपूर्व मानसिक परिणति
भी आत्मा की ओर झुक जाती है।

00:03:31.064 --> 00:03:44.540
बाद में उस मानसिक ज्ञान का भी
व्यय होकर, भावेन्द्रिय का व्यय होकर
आत्मज्ञान होता है। ऐसी बात इसमें है।

00:03:44.564 --> 00:03:52.423
देखो! यह <b>बाह्य (स्थूल) दृष्टिसे
देखा जाए तो:- जीव-पुद्गलकी अनादि
बंधपर्यायके समीप जाकर</b>

00:03:52.447 --> 00:03:58.013
<b>एकरूपसे अनुभव करनेपर यह
नवतत्त्व भूतार्थ हैं, सत्यार्थ हैं,</b> हैं

00:03:58.037 --> 00:04:09.280
<b>और एक जीवद्रव्यके स्वभावके समीप जाकर
अनुभव करनेपर वे अभूतार्थ हैं, असत्यार्थ हैं;
(वे जीव के एकाकार स्वरूप में नहीं हैं;)</b>।

00:04:09.304 --> 00:04:21.094
यानि जीव का जो एक ज्ञायकभाव है,
उसको अंतर्दृष्टि से देखने से ये नवतत्त्व
का भेद दिखाई नहीं देता है।

00:04:21.118 --> 00:04:30.199
दिखाई नहीं देता है इसका कारण
क्या है? कि वो भेद, अभेद में भेद
नहीं है इसलिए दिखाई नहीं देता है।

00:04:30.223 --> 00:04:38.078
उसमें है पर्याय और दिखती नहीं है - ऐसा
नहीं है। पर्याय का ही उसमें अभाव है।

00:04:38.102 --> 00:04:49.657
पर्याय का पर्याय में सद्भाव है मगर
परिणाम का त्रिकाली सामान्य एकरूप
भगवान आत्मा में परिणाम का अभाव है।

00:04:49.681 --> 00:04:58.303
तो ऐसे शुद्धात्मा के सन्मुख जब
परिणति होती है, उपयोग आता है,
तो नौ का भेद अभूतार्थ है।

00:04:58.327 --> 00:05:09.753
अभूतार्थ यानि उसका लक्ष छूट जाता है।
वो बहिर्तत्त्व है। नवतत्त्व (बहिर्तत्त्व है)।

00:05:09.777 --> 00:05:18.114
अंतर में जाते ही वो बहिर्तत्त्व
दिखाई नहीं देता है। इतनी बात
चार line (पंक्ति) की तो हो गई।

00:05:18.138 --> 00:05:25.666
<b>इसलिये इन नव तत्त्वोंमें
भूतार्थनयसे एक जीव ही प्रकाशमान है। </b>
वहाँ तक आया था, अब आगे।

00:05:25.690 --> 00:05:40.495
<b>इसीप्रकार अंतर्दृष्टिसे देखा जाए
तो:- </b>बाह्य स्थूलदृष्टिसे (देखने) की
बात हो गई। अब अंतर्मुखदृष्टि से देखने से...

00:05:40.519 --> 00:06:04.312
अंतर्मुखदृष्टि का स्वरूप क्या है?
कि जो उपयोग बहिर्मुख था उस
उपयोग की जाति बदल जाती है।

00:06:04.336 --> 00:06:13.941
जो भावेन्द्रिय पूर्व पर्याय तक थी...
भावेन्द्रिय यानि पाँच इंद्रियों का
व्यापार तो पहले से ही बंद हो जाता है।

00:06:13.965 --> 00:06:21.118
चिंतवन के काल में पाँच इंद्रियों
का विषय, व्यापार बंद हो जाता है;

00:06:21.142 --> 00:06:33.850
क्षय नहीं होता है (बल्कि) बंद हो जाता
है, लब्ध हो जाता है और मानसिक
ज्ञान का व्यापार चालू होता है।

00:06:33.874 --> 00:06:46.255
तो ये बाद में मानसिक भावेन्द्रिय का
जो व्यापार (है) वो भी थोड़ी देर के
लिए अटक (रुक) जाता है।

00:06:46.279 --> 00:06:56.455
<b>मन पावे विश्राम।</b> (नाटक
समयसार, उत्थानिका १७), भावमन का,
भावमन का क्षय नहीं होता है।

00:06:56.479 --> 00:07:13.294
भावमन का क्षय होवे तो तो केवलज्ञान होता
है और (यदि) भावमन का उपयोगात्मक
व्यापार चालू रहे तो अनुभूति नहीं हुई है।

00:07:13.318 --> 00:07:30.008
तो ये जो भावमन का व्यापार पूर्व पर्याय
तक था, उस भावमन में भी आत्मा ही आया था
और अतीन्द्रियज्ञान में (भी) आत्मा ही आ जाता है।

00:07:30.032 --> 00:07:33.572
भावमन का विषय छहद्रव्य नहीं रहता है।

00:07:33.596 --> 00:07:42.509
पूर्व पर्याय की संधि की बात चलती है,
जिसका व्यय होकर अनुभूति होती है।

00:07:42.533 --> 00:07:47.612
भावमन का विषय छहद्रव्य
नहीं रहता है, छूट जाता है।

00:07:47.636 --> 00:07:58.951
नवतत्त्व, भेद, मानसिकज्ञान में
भेद जानने में नहीं आता है।
मानसिकज्ञान में भी (नहीं आता)।

00:07:58.975 --> 00:08:18.875
मानसिकज्ञान में अकेला ज्ञायक परमात्मा
जिसका अभी एक समय के बाद प्रत्यक्ष अनुभव
होनेवाला है, उसके पूर्व परोक्ष अनुभूति होती है।

00:08:18.899 --> 00:08:26.187
ऐसी <b>अंतर्दृष्टिसे देखा जाए तो:- </b>
ऐसा पाठ है। इसका क्या अर्थ?

00:08:26.211 --> 00:08:39.154
कि जो अनादिकाल से उपयोग
बहिर्मुख था, उसमें आत्मा का
दर्शन बिल्कुल आता नहीं है।

00:08:39.178 --> 00:08:49.270
अब अंतर्मुख ज्ञान होता है, वो
ज्ञान की जाति पलट जाती है।

00:08:49.294 --> 00:08:57.393
भावेन्द्रिय का व्यय होकर
अतीन्द्रियज्ञान का उत्पाद होता है, नया।

00:08:57.417 --> 00:09:13.410
अनादि से ऐसा अतीन्द्रियज्ञान का
उत्पाद नहीं था। ऐसे अतीन्द्रियज्ञान
का उत्पाद होता है, सहज।

00:09:13.434 --> 00:09:28.961
उस अंतर्मुखदृष्टि में, उस
ज्ञान के भावश्रुतज्ञान में 'अकेला
शुद्धात्मा, उपादेयतत्त्व वही मैं हूँ’

00:09:28.985 --> 00:09:42.880
- उसमें शुद्धात्मा का प्रत्यक्ष
अनुभव होता है। उस ज्ञान के
परिणाम का नाम स्वप्रकाशक ज्ञान है।

00:09:42.904 --> 00:09:56.991
उस ज्ञान की पर्याय का नाम परप्रकाशक
नहीं है, स्वपरप्रकाशक भी नहीं है;
अकेला स्वप्रकाशक है।

00:09:57.015 --> 00:10:02.381
बात पहले सुन लेना। बाद में तर्क
करना कि सामर्थ्य स्वपरप्रकाशक का (है)।

00:10:02.405 --> 00:10:09.466
अभी वो बात deposit (जमा)
रखकर क्या बात चलती है -
उसको ख्याल में पहले ले लेना।

00:10:09.490 --> 00:10:18.790
बाद में सब विचार करके
बैठाना। कोई परेशानी नहीं (उसमें)।

00:10:18.814 --> 00:10:32.060
यह ज्ञान अंतर्मुख होता है
तो भावश्रुतज्ञान जिसका नाम है,
मानसिकज्ञान का नाम द्रव्यश्रुत है

00:10:32.084 --> 00:10:41.772
और जो ज्ञान शुद्धात्मा को प्रसिद्ध
करता है, आत्मख्याति है न, (टीका का)
नाम, आत्मा की प्रसिद्धि होती है।

00:10:41.796 --> 00:10:53.052
इन्द्रियज्ञान में आत्मा की प्रसिद्धि नहीं
होती है (बल्कि) आत्मा तिरोभूत हो जाता है।

00:10:53.076 --> 00:11:05.153
ऐसे अंतर्मुख ज्ञान में
भगवान आत्मा का दर्शन होता है,
उसका नाम स्वप्रकाशक ज्ञान है।

00:11:05.177 --> 00:11:14.982
स्वप्रकाशक लक्षण से
शुद्धात्मा की प्रसिद्धि होती है।

00:11:15.006 --> 00:11:25.944
और निर्विकल्पध्यान के काल में ही,
एक तो स्वप्रकाशक ज्ञान की व्याख्या की,

00:11:25.968 --> 00:11:47.615
(और) दूसरा उस ही निर्विकल्पध्यान
में उस ही समय, काल भेद नहीं, निश्चय से
स्वपरप्रकाशक की पर्याय प्रगट होती है।

00:11:47.639 --> 00:12:00.019
पहले निश्चय से स्वप्रकाशक
कहा, जिसमें उपादेयतत्त्व, ज्ञायक की
अहंबुद्धि आ गई उसके द्वारा।

00:12:00.043 --> 00:12:15.921
उस ही समय ज्ञान का स्वभाव सविकल्प
होने से; सविकल्प का अर्थ राग नहीं, खंडज्ञान
की बात नहीं है, अतीन्द्रियज्ञान की बात है।

00:12:15.945 --> 00:12:22.265
केवलज्ञान की पर्याय भी सविकल्प है।
आहाहा!

00:12:22.289 --> 00:12:35.618
सविकल्प का क्या अर्थ है? कि
जिस ज्ञान ने ज्ञायक को जाना उस
ही समय अतीन्द्रिय आनंद आता है।

00:12:35.642 --> 00:12:43.611
सिद्ध भगवान की जाति का आनंद।

00:12:43.635 --> 00:12:54.414
क्या कहा? कि जो ज्ञायक का
दर्शन हुआ अतीन्द्रियज्ञान में, उस ही
समय अतीन्द्रिय आनंद प्रगट होता है।

00:12:54.438 --> 00:13:04.814
अतीन्द्रियज्ञानमय आत्मा का दर्शन होने
से जैसा अतीन्द्रियज्ञानमय महापदार्थ है,

00:13:04.838 --> 00:13:15.074
ऐसा ही, उसकी जाति का अतीन्द्रियज्ञान नया
प्रगट होता है। तो उसका नाम तो स्वप्रकाशक है।

00:13:15.098 --> 00:13:27.366
मगर उस ही समय आनंद की पर्याय
प्रगट होती है, तो आनंद का परिणाम
भी उस ज्ञान में जानने में आता है।

00:13:27.390 --> 00:13:41.153
द्रव्य भी जानने में आया और द्रव्याश्रित
आनंद भी जानने में आया तो ज्ञान की
अपेक्षा से ज्ञान ने ज्ञायक और ज्ञान को जाना,

00:13:41.177 --> 00:13:51.073
और भेद की अपेक्षा से ज्ञान ने आनंद
को भी जाना। तो ज्ञान है स्व और
आनंद है पर; अंदर का स्व-पर है।

00:13:51.097 --> 00:13:56.739
बाहर के स्व-पर की बात आएगी,
घबराना नहीं। हमारी बात आएगी
कि नहीं आएगी? आएगी।

00:13:56.763 --> 00:14:06.293
आहिस्ते-आहिस्ते सब आएगा।
आहाहा! समझने जैसी बात है।

00:14:06.317 --> 00:14:14.451
आज केवलज्ञान का दिवस है। आहाहा!
भगवान को केवलज्ञान प्रगट होनेवाला है आज।

00:14:14.475 --> 00:14:19.688
आहार-दान है न, बाद में
तो केवलज्ञान (होगा)। आहाहा!

00:14:19.712 --> 00:14:31.107
क्या कहा? कि अंतर्मुख दृष्टि से
देखने से, ऐसा शब्द है। इसकी
एक लाइन की चलती है बात।

00:14:31.131 --> 00:14:37.959
<b>अंतर्दृष्टिसे देखा जाए तो:- </b>
अंदर में क्या दिखाई देता है?

00:14:37.983 --> 00:14:44.064
गुजराती में तो एकदम आवे, शुं देखाय
छे? अंदर में क्या दिखाई देता है?

00:14:44.088 --> 00:14:50.015
उसमें तो, हिंदी में तो शब्द जरा
व्यवस्थित करना पड़े। आहाहा!

00:14:50.039 --> 00:14:56.372
अंदर में जब उपयोग गया तो
उसमें क्या दिखाई देता है? आहाहा!

00:14:56.396 --> 00:15:05.254
तीनलोक का नाथ, भगवान सर्वज्ञस्वभावी
भगवान आत्मा का दर्शन होता है।

00:15:05.278 --> 00:15:17.399
तब उस समय एक अपूर्व,
अनंतकाल से नहीं आया हुआ
अतीन्द्रिय आनंद वो भी प्रगट होता है।

00:15:17.423 --> 00:15:22.248
वो भी ज्ञान उसको जानता है।
तो द्रव्य को जाने

00:15:22.272 --> 00:15:34.668
और ज्ञान ज्ञान को भी जाने भेद अपेक्षा से
अंदर में और आनंद को भी जाने - उसका
नाम निश्चय से स्वपरप्रकाशक है।

00:15:34.692 --> 00:15:54.810
१. स्वप्रकाशक
२. अकेला 'स्वपरप्रकाशक' नहीं; 'निश्चय से
स्वपरप्रकाशक’, जिसमें पर की अपेक्षा (है ही नहीं)।

00:15:54.834 --> 00:16:03.266
आहाहा! अंदर के निर्विकल्पध्यान
के काल की बात चलती है।

00:16:03.290 --> 00:16:19.758
उपयोग अंदर में है उस समय
स्वप्रकाशक और स्वप्रकाशकपूर्वक
स्वपरप्रकाशक ज्ञान प्रगट हो जाता है।

00:16:19.782 --> 00:16:32.508
और बाद में बाहर निकलता है -
सविकल्पदशा आती है, तो एक तो
निश्चय स्वपरप्रकाशक प्रगट हो गया।

00:16:32.532 --> 00:16:41.313
तो निश्चय स्वपरप्रकाशक जिसको
प्रगट हुआ है, ख्याल रखना -

00:16:41.337 --> 00:16:48.097
१. स्वप्रकाशक
२. निश्चय से स्वपरप्रकाशक

00:16:48.121 --> 00:16:55.431
ऐसे साधक को सविकल्पदशा
में आत्मा भी जानने में आ रहा है

00:16:55.455 --> 00:17:05.142
और उपकारी देव-गुरु-शास्त्र वो
भी जानने में आये तो उसका नाम
'व्यवहार से स्वपरप्रकाशक' (है)।

00:17:05.166 --> 00:17:14.783
ये तीनों प्रकार सम्यग्ज्ञानी की
दशा में होते हैं। आहाहा!
मुमुक्षु: फिर से।

00:17:14.807 --> 00:17:21.853
पू. लालचंदभाई: फिर से। इसमें क्या है?
अपने तो आत्मा की भावना ही चलती है न।

00:17:21.877 --> 00:17:29.140
मुमुक्षु: पुनरोक्ति दोष इसमें नहीं है।
पू. लालचंदभाई: इसमें पुनरोक्ति
दोष नहीं आता है। आहाहा!

00:17:29.164 --> 00:17:37.029
फिर से, क्या कहा? <b>अंतर्दृष्टिसे देखा
जाए तो:-</b> अंदर में क्या दिखाई दिया?

00:17:37.053 --> 00:17:44.275
और कैसे दिखाई दिया? ये कैसे स्वप्रकाशक
है? और कैसे स्वपरप्रकाशक (है)? आहाहा!

00:17:44.299 --> 00:17:57.643
ये स्वपरप्रकाशक की बात की बहुत
चर्चा चलती है। इसलिए खुलासा है। आहाहा!

00:17:57.667 --> 00:18:03.644
फिर से। क्या? कि अंतर्दृष्टि से देखने
से बहिर्मुखदृष्टि चली गई, बंद हो गई।

00:18:03.668 --> 00:18:10.410
व्यापार, इन्द्रियज्ञान का व्यापार थोड़े
समय के लिए बंद हो जाता है।

00:18:10.434 --> 00:18:17.031
इन्द्रियज्ञान का, भावेन्द्रिय का
क्षय नहीं होता है; आहाहा!
क्षय हो तो केवलज्ञान होगा।

00:18:17.055 --> 00:18:30.672
(नेमिनाथ भगवान को) आज होगा, आज
होगा। और जिसको आत्मदर्शन हुआ
(है) उसको भी होनेवाला है। आहाहा!

00:18:30.696 --> 00:18:37.483
तो अंदर का स्वप्रकाशक, उपादेय
की मुख्यता (से) है। फिर से आया न?

00:18:37.507 --> 00:18:45.654
उपादेय की मुख्यता से स्वप्रकाशक है
और जानने की मुख्यता से स्वपरप्रकाशक है,

00:18:45.678 --> 00:18:52.294
मगर निश्चय स्वपरप्रकाशक है,
ख्याल में रखना। आहाहा!

00:18:52.318 --> 00:18:58.088
और बाद में वो साधक सविकल्पदशा में आया,
निर्विकल्पध्यान तो लंबा चलता नहीं (है),

00:18:58.112 --> 00:19:04.088
(क्योंकि) शुरुआत का है न, शुरुआत। आहाहा!

00:19:04.112 --> 00:19:11.478
तो सविकल्पदशा में आया तो
अतीन्द्रियज्ञान की परिणति तो चालू है।

00:19:11.502 --> 00:19:19.450
उपयोग नहीं रहा मगर परिणति (चालू
है), परिणति छूटती नहीं है। आहाहा!

00:19:19.474 --> 00:19:25.913
उस परिणति में भगवान आत्मा
का दर्शन निरंतर चालू है।

00:19:25.937 --> 00:19:37.716
खाते, पीते, सोते, बैठते, उठते, गृहस्थी में,
व्यापार-रोजगार में, राजा हो, चक्रवर्ती हो कोई,
तो भी वो परिणति छूटती नहीं (है)। आहाहा!

00:19:37.740 --> 00:19:42.484
भरत महाराजा की परिणति छूटी नहीं। आहाहा!

00:19:42.508 --> 00:19:54.490
६०,००० वर्ष सुना है, कुछ फेरफार
(आगे-पीछे) हो तो समझ लेना। ६०,०००
वर्ष तक तो लड़ाई में गए। आहाहा!

00:19:54.514 --> 00:20:05.342
तो भी निरंतर अछिन्न धारावाही ज्ञान से
आत्मा का अनुभव चालू है, परिणतिरूप।

00:20:05.366 --> 00:20:12.178
उपयोगात्मक (तो) कभी-कभी उपयोग,
ऐसा लिखा है न रहस्यपूर्ण चिट्ठी में।

00:20:12.202 --> 00:20:22.133
लंबे अंतराल में, लंबे काल में गृहस्थ
को भी अनुभव होता है। लंबे काल की
व्याख्या, टाइम नहीं लिखा। समझ गए?

00:20:22.157 --> 00:20:32.315
क्योंकि सबको एक सरीखा नहीं होता। वह
केवलीगम्य है और अनुभवगम्य है, दो बात।

00:20:32.339 --> 00:20:37.684
तो निश्चय से स्वपरप्रकाशक
ज्ञान उत्पन्न हुआ अंदर में;

00:20:37.708 --> 00:20:49.120
और सविकल्पदशा में आया तो आत्मा को
भी जानता है और अपने गुरु को भी
जाना कि आप हमारे उपकारी हैं, आहाहा!

00:20:49.144 --> 00:20:55.754
देव-शास्त्र-गुरु को भी जाना, उसका
नाम व्यवहारनय से स्वपरप्रकाशक है।

00:20:55.778 --> 00:21:08.127
व्यवहार क्यों कहा? कि एक तो
आत्मा स्व में लिया और पर में परद्रव्य
लिया तो व्यवहार हो गया। आहाहा!

00:21:08.151 --> 00:21:19.566
ऐसा (१)स्वप्रकाशक-निश्चय, जानने के लिए
अंदर के अंदर (२)(निश्चय) स्वपरप्रकाशक,

00:21:19.590 --> 00:21:30.696
और बाहर निकले तो
(३)व्यवहार स्वपरप्रकाशक - ऐसी
दशा साधक की होती है - एक बात।

00:21:30.720 --> 00:21:40.842
दूसरी बात - मुनिराज की बात तो
क्या करें, क्या कहें? वो तो अपूर्व है।

00:21:40.866 --> 00:22:05.232
मगर चतुर्थ गुणस्थानवाले,
पंचम गुणस्थानवाले गृहस्थ को भी
कभी-कभी निर्विकल्पध्यान तो आता है।

00:22:05.256 --> 00:22:18.436
तब किसी दफा निर्विकल्पध्यान में
केवलज्ञान का दर्शन हो जाता है। आहाहा!

00:22:18.460 --> 00:22:29.451
किसका केवलज्ञान? इस आत्मा
की भावी पर्याय जो उत्पन्न होनेवाली है,

00:22:29.475 --> 00:22:43.955
उस केवलज्ञान परिणत आत्मा का दर्शन कभी
-कभी हो जाता है। वो बात तीन जगह पर है।

00:22:43.979 --> 00:22:51.968
शास्त्र का आधार देने से श्रद्धा बनती है।

00:22:51.992 --> 00:22:57.674
एक तो श्रीमद् राजचंद्रजी में आता
है - विचारदशासे केवलज्ञान हुआ है,
इच्छादशासे केवलज्ञान हुआ है,

00:22:57.698 --> 00:23:00.454
मुख्य नयके हेतुसे केवलज्ञान वर्तता है
(श्रीमद् राजचन्द्र, पत्र ४९३) - (ऐसा) आता है।

00:23:00.478 --> 00:23:09.858
वे एकावतारी पुरुष हैं। गृहस्थ भी एकावतारी
होता है। ये पंचमकाल की बात है, हों!

00:23:09.882 --> 00:23:16.807
ये श्रीमद् राजचंद्रजी पंचमकाल के जीव,
जन्मे पंचमकाल में, एकावतारी हैं।

00:23:16.831 --> 00:23:23.305
सोगानी जी एकावतारी हैं। आहाहा!

00:23:23.329 --> 00:23:35.124
ऐसे कोई-कोई जीव भी, गृहस्थ अवस्था
में भी एकावतारी हो सकते हैं। आहाहा!

00:23:35.148 --> 00:23:42.420
'ना' की बात नहीं है इधर।
'हाँ' की बात है। आहाहा!

00:23:42.444 --> 00:23:56.748
तो एक तो श्रीमद् राजचंद्रजी में है
ये बात। दूसरा अपने समयसार में
भावार्थ में दो-तीन जगह पर ऐसा है।

00:23:56.772 --> 00:24:01.951
अभी मेरे पास वो पुस्तक नहीं (है),
नहीं तो मैं आधार भी आपको बता दूँ।

00:24:01.975 --> 00:24:08.560
है, समयसार में है।
जयचंद पंडितजी ने वो लिखा है। आहाहा!

00:24:08.584 --> 00:24:19.877
और गुरुदेव ने कहा कि ये श्रुतज्ञान
की पर्याय केवलज्ञान को बुलाती है
'आओ, आओ, इधर आओ', समझे?

00:24:19.901 --> 00:24:31.935
और एक बार रात्रि को चर्चा में
गुरुदेव ने वो प्रश्न लिया अपनेआप (ही)।

00:24:31.959 --> 00:24:45.158
उन्होंने फरमाया कि सम्यग्दृष्टि को भी
कभी-कभी केवलज्ञान का दर्शन होता है।

00:24:45.182 --> 00:24:54.867
तो रात्रि चर्चा थी न, तो एक भाई ने कहा
कि वह तो दृष्टि की अपेक्षा से है न?
कि नहीं! ज्ञान की अपेक्षा से कहता हूँ।

00:24:54.891 --> 00:25:00.666
अरे! श्रुतज्ञान में केवलज्ञान का दर्शन?
हाँ! होता है।

00:25:00.690 --> 00:25:12.134
वो बैठना कठिन है, मालूम है हमको,
हमको सब मालूम है। आहाहा! मगर
(ऐसी) स्थिति है, ज्ञानी ने फरमाया है।

00:25:12.158 --> 00:25:19.216
और तीसरी बात, एक
नागसेन मुनि हो गए, भावलिंगी संत।

00:25:19.240 --> 00:25:27.571
उनका एक तत्त्वानुशासन नाम
का शास्त्र है। उसमें वो फरमाते हैं।

00:25:27.595 --> 00:25:34.850
कल तो मेरे पास वो कॉपी थी
कागज में, मगर आज वो (नहीं लाए)।
नियमसार में कल रखी थी।

00:25:34.874 --> 00:25:39.363
कल कहना था मगर कल पंद्रह
मिनट का टाइम था तो टाइम नहीं रहा

00:25:39.387 --> 00:25:46.867
और आज टाइम रहा तो वो पत्र,
वो शास्त्र मेरे पास नहीं है। आहाहा!

00:25:46.891 --> 00:25:57.725
तत्त्वानुशासन शास्त्र में नागसेन मुनि
भावलिंगी संत फरमाते हैं कि, आहाहा!

00:25:57.749 --> 00:26:06.755
कभी-कभी हमको तो अरिहंत का दर्शन होता
है। तो शिष्य ने कहा कि ये क्या बात है?

00:26:06.779 --> 00:26:15.739
अभी अरिहंत तो हैं नहीं,
अरिहंत तो हैं नहीं। आहाहा!

00:26:15.763 --> 00:26:26.911
वो प्रवचनसार की ८० नंबर की गाथा की
थोड़ी इसमें संधि है। जरा सुनना! आहाहा!

00:26:26.935 --> 00:26:39.057
शिष्य ने कहा कि ये तो पंचमकाल है। अभी तो
केवलज्ञान का तो सद्भाव इस क्षेत्र में नहीं
है, महाविदेहक्षेत्र में है वो अलग बात है।

00:26:39.081 --> 00:26:50.562
तो आचार्य भगवान फरमाते हैं कि
वो बात झूठ-मूठ नहीं है, मृगजल
जैसी झूठ-मूठ (नहीं है)। आहाहा!

00:26:50.586 --> 00:27:05.161
भाव-अरिहंत का दर्शन होता है। क्या?
भाव-अरिहंत का दर्शन (होता है)। आहाहा!

00:27:05.185 --> 00:27:13.443
तो ऐसी अलौकिक बात, कोई अपूर्व बात है!

00:27:13.467 --> 00:27:20.966
और दूसरा एक नय प्रज्ञापन नाम
का शास्त्र छपा था इधर से, राजकोट से।

00:27:20.990 --> 00:27:23.656
तीस साल पहले की बात है।

00:27:23.680 --> 00:27:33.348
गुरुदेव के व्याख्यान, गुरुदेव
के प्रवचनसार के (व्याख्यान में)
आखिरी परिशिष्ट में ४७ नय हैं।

00:27:33.372 --> 00:27:41.770
समयसार में ४७ शक्तियाँ हैं, प्रवचनसार (के)
४७ नय के व्याख्यान हैं (प्रज्ञापन नाम मे)।

00:27:41.794 --> 00:27:50.548
और ये ४७ नय में से १४वें नंबर
का नय एक द्रव्यनय है।

00:27:50.572 --> 00:28:01.491
वो जयपुर से 'वीतराग-विज्ञान' निकलता है।
निकलता है कि नहीं? उसमें स्पष्टीकरण आया था।

00:28:01.515 --> 00:28:10.473
१४वें नंबर पर द्रव्यनय है, द्रव्यनय।
द्रव्यनय का ऐसा है स्वरूप

00:28:10.497 --> 00:28:18.555
कि भूत और भावी पर्याय का वर्तमान में
दर्शन हो जाता है। आहाहा! क्या कहा?

00:28:18.579 --> 00:28:26.778
यह ज्ञान की ताकत, अतीन्द्रियज्ञान
की ताकत कोई अचिंत्य है। आहाहा!

00:28:26.802 --> 00:28:38.608
शंका नहीं करना। समझने के लिए
आशंका की छूट है, समझने के
लिए (आशंका की छूट है)। आहाहा!

00:28:38.632 --> 00:28:53.809
तो इस द्रव्यनय का स्वरूप ऐसा है कि भावी
पर्याय(रूप) जो परिणमित होनेवाला है द्रव्य,
ऐसे द्रव्य का दर्शन अभी हो जाता है। आहाहा!

00:28:53.833 --> 00:29:07.349
और आगे चलकर स्व का तो ख्याल आता है
मगर पर का भी ख्याल आ जाता है। आहाहा!

00:29:07.373 --> 00:29:25.842
अपूर्व चीज है! ज्ञान की ताकत! 
दूसरे जीव के भी भावी (भविष्य) का 
ख्याल आता है। ज्ञानी गंभीर होता है।

00:29:25.866 --> 00:29:33.721
एक को कहना और एक को नहीं 
कहना तो खलबलाहट हो जाती है। 
इसलिए (ज्ञानी) बोलते नहीं हैं। आहाहा!

00:29:33.745 --> 00:29:40.827
श्रीमद् राजचंद्रजी हो गए। अरे! एक समय 
की पर्याय की क्या सामर्थ्य और ताकत है

00:29:40.851 --> 00:29:47.142
- उसका (ही) विश्वास न आवे तो 
आत्मा का विश्वास कहाँ से आवे?

00:29:47.166 --> 00:29:55.838
श्रीमद् राजचंद्रजी ने एक दफा 
वानर-बंदर; हिंदी में क्या कहते हैं? बंदर।

00:29:55.862 --> 00:30:09.200
बंदर पेड़ पर बैठा था। देखा (और) बंदर 
को कहा, बंदर को कहा, जैसे सिंह 
महाराज को कहा था न मुनिराज ने।

00:30:09.224 --> 00:30:17.041
(तो कहा) बंदर जी, आपकी सिद्ध 
पर्याय होने के लिए थोड़ी देर लगेगी।

00:30:17.065 --> 00:30:26.271
सिद्ध पर्याय का दर्शन (हो गया) तिर्यंच 
की। अरे! चमड़ी तिर्यंच की है, 
आत्मा तिर्यंच कहाँ है? आहाहा!

00:30:26.295 --> 00:30:35.344
भगवान आत्मा अंदर विराजमान है। 
उसकी भावी पर्याय जो अंदर में पड़ी है,

00:30:35.368 --> 00:30:44.449
उसमें से निकलनेवाली है, उस निकलनेवाली 
पर्याय का दर्शन अभी हो जाता है। आहाहा!

00:30:44.473 --> 00:30:56.705
बहुत आधार अभी देने हैं, बाकी हैं। 
शास्त्र का आधार मैं देता हूँ। आहाहा! 
धीरे-धीरे, बात गंभीर है थोड़ी। आहाहा!

00:30:56.729 --> 00:31:06.774
बंदर को कहा कि सिद्ध पर्याय होने 
के लिए थोड़ा टाइम लगेगा तेरे को, 
उतावल (जल्दी) नहीं करना। आहाहा!

00:31:06.798 --> 00:31:18.570
और दूसरे दिन अंबालालभाई की धर्मपत्नी; 
श्रीमद्जी तो जंगल में, खेत (वाड़ी) में रहते थे।

00:31:18.594 --> 00:31:27.264
तो वहाँ रोजाना टिफ़िन लेकर वो 
बहन आती थी। तो एक बार क्या हुआ!

00:31:27.288 --> 00:31:34.589
कोई मेहमान आ गए, कोई। 
गृहस्थी में तो टाइम लगता है न। 
तो थोड़ा एक घंटा, डेढ़ घंटा लेट हो गईं।

00:31:34.613 --> 00:31:46.329
तो श्रीमद्जी तो बैठे थे और अंबालालभाई ने 
उसको-धर्मपत्नी को कहा, "बहुत देर हो गई। 
कृपालुदेव के आहार का टाइम हो गया।"

00:31:46.353 --> 00:31:59.554
आहाहा! श्रीमद्जी ने कहा, "भैया! उसके प्रति 
गुस्सा मत करो। वह मोक्ष जानेवाला जीव है।"

00:31:59.578 --> 00:32:06.877
भाई! सम्यग्दर्शन तो था नहीं, नौ 
तत्त्व का नाम आता नहीं था। आहाहा!

00:32:06.901 --> 00:32:12.305
मुमुक्षु: आठवें भव में मोक्ष होगा। 
पू. लालचंदभाई: ऐसा कुछ है, आठ भव। बोलो!

00:32:12.329 --> 00:32:21.063
आठवें भव में उसका मोक्ष होनेवाला है। 
ये श्रुतज्ञान की ताकत कोई अचिंत्य है।

00:32:21.087 --> 00:32:25.730
अभी एक शास्त्र का आधार देता हूँ।

00:32:25.754 --> 00:32:46.639
एक माइल्लधवल ने लिखा है 'नयचक्र’, 
जिसका अनुवाद कैलाशचंद्रजी पंडित 
ने थोड़ा विस्तार किया है हिंदी टीका में।

00:32:46.663 --> 00:32:51.773
तो इस शास्त्र में ऐसी 
बात आई है, एक श्लोक है

00:32:51.797 --> 00:33:01.652
कि जैसे केवलज्ञान में भूत, 
भविष्य और वर्तमान की पर्याय 
केवलज्ञान में जानने में आती हैं;

00:33:01.676 --> 00:33:07.945
आज केवलज्ञान का दिवस है न? 
आज केवलज्ञान का दिवस है।

00:33:07.969 --> 00:33:18.314
अपने को केवली का दर्शन आज 
होगा, नेमिनाथ भगवान के केवलज्ञान 
का दर्शन आज होगा। आहाहा!

00:33:18.338 --> 00:33:26.356
तो माइल्लधवल (द्वारा रचित 
नयचक्र) के अंदर एक श्लोक है कि 
जैसे केवली भगवान, परमात्मा,

00:33:26.380 --> 00:33:35.760
सर्वज्ञ देवाधिदेव अरिहंत 
तीनकाल-तीनलोक को वो जानते हैं,

00:33:35.784 --> 00:33:47.134
ऐसे ही नयज्ञान-श्रुतज्ञान में भूत, 
भविष्य और वर्तमान जानने में आ जाता है।

00:33:47.158 --> 00:33:57.840
उपयोगात्मक हो न हो वो बात 
अभी नहीं लेना, क्योंकि केवली 
भगवान को तो प्रत्यक्ष उपयोगात्मक है;

00:33:57.864 --> 00:34:08.729
और साधक को तो ये तीनकाल
-तीनलोक का ज्ञान, ज्ञान में 
तो है मगर उपयोगात्मक नहीं है

00:34:08.753 --> 00:34:18.702
और कभी-कभी किसी का ख्याल में आ 
जावे तो उसको आ जाता है कि आठ 
भव में वो बहन मोक्ष में जायेगी। आहाहा!

00:34:18.726 --> 00:34:31.319
सम्यग्दर्शन नहीं था (बहन को)। प्रभु! जरा 
धीरज, शांति से बैठाने की बात है। आहाहा!

00:34:31.343 --> 00:34:43.643
वो वाद-विवाद का विषय (या) 
तकरार का विषय नहीं है। तकरार 
समाप्त करने का काल है ये।

00:34:43.667 --> 00:34:48.499
तो ऐसे आचार्य भगवान समयसार 
की १३वीं गाथा में फरमाते हैं कि

00:34:48.523 --> 00:34:54.476
<b>अंतर्दृष्टिसे देखा जाए तो:-</b> 
आहाहा! यह बात चलती है।

00:34:54.500 --> 00:35:08.555
एक शब्द है, <b>इसप्रकार अंतर्दृष्टिसे 
देखा जाए तो:- ज्ञायक भाव जीव 
है</b>, ज्ञायकभाव जीव है। आहाहा!

00:35:08.579 --> 00:35:21.118
<b>और जीवके विकारका हेतु अजीव है; </b>
जीव के जो परिणाम होते हैं, परिणाम।

00:35:21.142 --> 00:35:28.650
आत्मा परिणामी है; 
परिणामी द्रव्य ज्ञेय है।

00:35:28.674 --> 00:35:35.770
परिणामी द्रव्य ज्ञेय है, हेय भी नहीं 
और उपादेय भी नहीं (है)। आहाहा!

00:35:35.794 --> 00:35:50.785
कल रात प्रदीप झांझरी आया था। 
उसके साथ थोड़ी बातचीत हुई थी 
तो अभी याद आ गया। आहाहा!

00:35:50.809 --> 00:36:05.859
ये शशिभाई भी थे और प्रदीप का छोटा 
भाई भी था। आहाहा! प्रदीप का नाम क्यों 
आता है, उसमें भी थोड़ा (रहस्य) है। आहाहा!

00:36:05.883 --> 00:36:13.699
उसकी धर्मपत्नी का नाम अर्चना है, जो 
अपने बाबूजी की लड़की (है)। आहाहा!

00:36:13.723 --> 00:36:21.204
उसका थोड़ा-थोड़ा विचार आया। तो कहा 
परिणामी द्रव्य, परिणामी; द्रव्य परिणामी है।

00:36:21.228 --> 00:36:26.536
अन्यमति कहते हैं कि सर्वथा 
अपरिणामी ऐसी चीज नहीं है।

00:36:26.560 --> 00:36:33.405
परिणामी है; परिणमता है समय-समय पर 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०) है।

00:36:33.429 --> 00:36:38.882
तो परिणामी द्रव्य ज्ञेय है; हेय भी 
नहीं (है) और उपादेय भी नहीं (है)।

00:36:38.906 --> 00:36:47.917
तो परिणामी द्रव्य में ही उपादेयतत्त्व 
और हेयतत्त्व है, अंदर में ही।

00:36:47.941 --> 00:36:55.128
परिणामी द्रव्य ज्ञेय एक है, 
ज्ञेय एक है। देवचंदजी! आहाहा!

00:36:55.152 --> 00:37:05.355
परिणामी द्रव्य ज्ञेय एक है; 
सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ 
वो एक ज्ञेय है, परिणामी द्रव्य।

00:37:05.379 --> 00:37:16.334
उसमें अपरिणामी भी है और परिणाम भी है। 
तो अपरिणामी उपादेय है और परिणाम हेय है।

00:37:16.358 --> 00:37:29.043
प्रदीप है कि नहीं इधर? आया है? नहीं आया? 
अच्छा! (मुमुक्षु:-सामने बैठा है।) अच्छा!

00:37:29.067 --> 00:37:34.691
क्या कहा? कि परिणामी द्रव्य है।

00:37:34.715 --> 00:37:46.285
पर्याय सापेक्ष द्रव्य का नाम 
परिणामी है और पर्याय निरपेक्ष 
द्रव्य का नाम अपरिणामी है। ओहो!

00:37:46.309 --> 00:37:58.120
परिणामी में से अपरिणामी निकाल 
ले। आहाहा! वो अपरिणामी 
सामान्य शुद्धात्मा उपादेय है।

00:37:58.144 --> 00:38:04.458
जब उपादेयतत्त्व पर दृष्टि आती 
है तब निर्विकल्पध्यान आ जाता है,

00:38:04.482 --> 00:38:08.882
तब परिणाम का लक्ष छूट जाता है, 
परिणाम का लक्ष (छूट जाता है)।

00:38:08.906 --> 00:38:15.922
परिणाम तो है, परिणाम 
अलोकाकाश में नहीं गया; आहाहा!

00:38:15.946 --> 00:38:24.356
मगर परिणाम का लक्ष छूट जाता है, 
द्रव्य का लक्ष आता है तो अनुभव होता है।

00:38:24.380 --> 00:38:30.699
तो इधर चलती है बात कि 
<b>ज्ञायक भाव जीव है</b>,

00:38:30.723 --> 00:38:38.212
<b>ज्ञायकभाव जीव है और 
जीवके विकार </b>ये पुद्गल का 
विकार नहीं है, जीव का विकार।

00:38:38.236 --> 00:38:47.327
<b>विकार</b> यानि कषाय की बात 
नहीं है; विशेष कार्य, <b>विकार</b> 
का अर्थ विशेष कार्य। आहाहा!

00:38:47.351 --> 00:38:55.131
आशीष भी आ गया है। अच्छा है! विकार 
यानि विशेष कार्य, इसका अर्थ है (इधर)।

00:38:55.155 --> 00:39:01.933
जैसे विभाव शब्द आता है न? 
तो विशेष भाव (लेना), विभाव 
का अर्थ कषाय (ही) नहीं लेना।

00:39:01.957 --> 00:39:11.802
<b>ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे, तहां समजवुं तेह;</b>
<b>त्यां-त्यां ते ते आचरे, आत्मार्थी जन एह</b> 
(आत्मसिद्धि शास्त्र, गाथा ८)

00:39:11.826 --> 00:39:33.535
<b>तो:- ज्ञायकभाव जीव है...</b>, 
<b>ज्ञायकभाव जीव है और जीवके विकार... </b>

00:39:33.559 --> 00:39:37.182
ये पुद्गल का विकार नहीं लेना। 
जीव का विशेष है।

00:39:37.206 --> 00:39:43.817
जीव सामान्य भी है और जीव 
के परिणाम का नाम विशेष है।

00:39:43.841 --> 00:39:54.059
परिणाम विशेष में उत्पाद-व्यय 
होता है। सामान्य में उत्पाद-व्यय 
नहीं होता, वो तो ध्रुवतत्त्व है। आहाहा!

00:39:54.083 --> 00:39:57.319
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्।</b>

00:39:57.343 --> 00:40:05.712
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>है न? 
वो हेय (भी) नहीं है और उपादेय भी नहीं है;

00:40:05.736 --> 00:40:15.147
वो ज्ञेय है। आहाहा! क्या कहा? कि 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>है पदार्थ।

00:40:15.171 --> 00:40:23.610
तत्त्वार्थ सूत्र जी में है न सब? तो वो 
ज्ञेय है, उसमें (से) ध्रुवतत्त्व निकाल लो।

00:40:23.634 --> 00:40:31.162
तो ध्रुव में उपादेयबुद्धि आ गई तो परिणाम 
का लक्ष छूट गया तो परिणाम हेय हो गया।

00:40:31.186 --> 00:40:39.424
हेय का नाम (अर्थ) उसका लक्ष 
छूटता है। हेय द्वेषवाचक नहीं है और 
उपादेय रागवाचक नहीं है। आहाहा!

00:40:39.448 --> 00:40:47.506
वीतराग मार्ग में राग-द्वेष की 
बात तो है ही नहीं। आहाहा!

00:40:47.530 --> 00:40:53.194
तो अन्तर्दृष्टि से देखो तो परिणामी 
में अपरिणामी भी है और परिणाम भी है।

00:40:53.218 --> 00:40:59.826
अपरिणामी उपादेय है। यह सोगानीजी की 
भाषा (में) बहुत है, मैं ए-परिणामी हूँ।

00:40:59.850 --> 00:41:13.132
परिणाम को परिणाम में रहने 
दो। सोगानीजी ने रखा तो सही 
अलोकाकाश में भेजा नहीं है। आहाहा!

00:41:13.156 --> 00:41:19.630
परिणाम को परिणाम में रहने दो, मैं 
(तो) ए-परिणामी हूँ! 'ए' शब्द बोलते थे।

00:41:19.654 --> 00:41:26.037
ए-परिणामी, अपरिणामी के बदले 
मैं तो ए-परिणामी हूँ। आहाहा!

00:41:26.061 --> 00:41:30.577
एक बार माटुंगा में 
गुरुदेव का व्याख्यान था।

00:41:30.601 --> 00:41:40.966
मोदी साहब भी थे और मोदी साहब 
के परिचयवाले वीरनगरवाले, 
वीरचंद्र पानाचंद नाम है (वो भी थे)।

00:41:40.990 --> 00:41:47.022
साथ में उनके बंगले (पर) 
गए थे। वो (सोगानीजी से) 
अंतिम मुलाकात बम्बई में (हुई)।

00:41:47.046 --> 00:41:50.970
बाद में (वो) कलकत्ता गए 
और वहाँ स्वर्गवास हो गया।

00:41:50.994 --> 00:42:00.047
तो वहाँ एक भाई ने ध्यान का विषय 
पूछा कि आत्मा का ध्यान कैसे करें?

00:42:00.071 --> 00:42:11.570
उसके उत्तर में (सोगानीजी ने) कहा, 
"मैं किसका ध्यान करूँ? मैं तो ध्येयरूप 
हूँ। पर्याय मेरा ध्यान करे तो करे।"

00:42:11.594 --> 00:42:20.053
यानि कितनी, पर्याय की (और) 
ध्यान की भी उपेक्षा और 
आत्मा की अपेक्षा। आहाहा!

00:42:20.077 --> 00:42:24.030
एकावतारी पुरुष थे। 
आहाहा! अभी स्वर्ग में हैं।

00:42:24.054 --> 00:42:38.983
गुरुदेव फरमाते हैं कि जब हम तीर्थंकर 
होंगे, होनेवाले और दीक्षा लेंगे-मुनि 
अवस्था, तब "नमः सिद्धेभ्यः" करेंगे,

00:42:39.007 --> 00:42:43.921
तब हमारा नमस्कार उनको (सोगानीजी को) 
पहुँचेगा, वे (तब) सिद्ध में होंगे। आहाहा!

00:42:43.945 --> 00:42:50.720
यह सुनी हुई बात है प्रत्यक्ष, हों! 
गुरुदेव की कही हुई बात है। आहाहा!

00:42:50.744 --> 00:43:02.646
तात्त्विक बात को पचाना बहुत 
कठिन है। पात्र जीव को पचती है, 
नहीं तो अजीर्ण (हो जाता है)।

00:43:02.670 --> 00:43:04.386
मुमुक्षु: आज अजीर्ण नहीं होगा, 
केवलज्ञान का दिवस है।

00:43:04.410 --> 00:43:14.548
पू. लालचंदभाई: (आज) 
केवलज्ञान का दिवस है। आहाहा! 
तो जीव, ज्ञायकभाव <b>जीव है...</b>

00:43:14.572 --> 00:43:20.799
जिनवाणी स्तुति।