﻿WEBVTT

00:00:43.885 --> 00:01:03.220
श्री समयसार परमागम शास्त्र, उसका प्रथम
जीव नाम का अधिकार, गाथा-३। उसका भावार्थ।

00:01:03.240 --> 00:01:15.476
<b>निश्चय से सर्व पदार्थ अपने अपने स्वभाव में
स्थित रहते हुए ही शोभा पाते हैं।</b>

00:01:15.520 --> 00:01:24.136
<b>परंतु जीव नामक पदार्थ की अनादि काल से
पुद्गलकर्म के साथ निमित्तरूप बंध-अवस्था है;</b>

00:01:24.160 --> 00:01:36.056
<b>उससे इस जीव में विसंवाद खड़ा होता है।</b>

00:01:36.080 --> 00:01:44.296
झगड़ा, दुःखदायक स्थिति खड़ी होती है।
<b>अतः वह शोभा को प्राप्त नहीं होता।</b>जीव।

00:01:44.320 --> 00:01:52.656
दूसरे के साथ सम्बन्ध होता है उसमें जीव का
बिल्कुल हित नहीं है। अहित होता है, ऐसा।

00:01:52.680 --> 00:02:01.896
<b>इसलिये वास्तव में विचार किया जाये तो
एकत्व ही सुन्दर है; उससे यह जीव शोभा को प्राप्त होता है।</b>

00:02:01.920 --> 00:02:11.047
यहाँ छहों द्रव्य की बात की थी।
छहों द्रव्य एकपने में रहें तो शोभा पाते हैं।

00:02:11.071 --> 00:02:23.016
द्रव्य-गुण-पर्याय ये सात प्रकार से बात की है।
ऊपर जो कहा निश्चय से सर्व पदार्थ,
निश्चय से यानि ज्ञेय प्रधान निश्चय है।

00:02:23.040 --> 00:02:38.776
<b>अब, उस एकत्व की असुलभता बताते हैं:- </b>गाथा-४

00:02:38.800 --> 00:02:50.416
<b>है सर्व श्रुत-परिचित-अनुभूत, कामभोगबंधन की कथा।
पर से जुदा एकत्व की, उपलब्धि केवल सुलभ ना।।</b>

00:02:50.440 --> 00:02:55.456
अर्थात् दुर्लभ है।

00:02:55.480 --> 00:03:09.936
<b>टीका:- इस समस्त जीवलोक को,</b>यानि लोक में
रहे हुए जीवों को <b>कामभोग संबंधी कथा,</b> यानि भाव,

00:03:09.960 --> 00:03:22.296
करना और भोगना अथवा कर्मचेतना और
कर्मफलचेतना, इस संबंधी जो भाव व्यवसाय स्वरुप

00:03:22.320 --> 00:03:31.176
<b>एकत्व से विरुद्ध होने से अत्यंत
विसंवाद करानेवाली है।</b> सर्वथा दुःखदायक है।

00:03:31.200 --> 00:03:42.496
<b>(आत्मा का अत्यंत अनिष्ट करनेवाली है)</b>
काम और भोग की कथा। भावार्थ में काम का
अर्थ किया है। विषयों की इच्छा

00:03:42.520 --> 00:03:52.606
और भोग यानि उनको, विषयों को भोगना।
करना और भोगना मतलब पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छा

00:03:52.630 --> 00:04:00.856
और पदार्थ को भोगने की इच्छा।
परपदार्थ को प्राप्त करना और परपदार्थ को
भोगना ऐसी जो काम और भोग।

00:04:00.880 --> 00:04:08.176
काम का अर्थ यथार्थ में इच्छा होता है।
इच्छा अर्थात् विषयों की इच्छा ऐसा कहा,

00:04:08.200 --> 00:04:12.576
और भोग अर्थात् उनको भोगना,
मतलब विषयों को भोगना।

00:04:12.600 --> 00:04:23.456
वह कथा जीव का अहित करनेवाली है। <b>तथापि,
पहले अनंत बार सुनने में आई है,</b> क्या कहा?

00:04:23.480 --> 00:04:32.216
कि काम और भोग की कथा, कर्तापना और
भोगना, कर्ताबुद्धि और भोक्ताबुद्धि

00:04:32.240 --> 00:04:37.536
वह बात अनंतकाल से पूर्व में उसके सुनने में आई है।

00:04:37.560 --> 00:04:42.776
आता ज्ञाता है यह बात उसके सुनने में आई नहीं, ऐसा।

00:04:42.800 --> 00:04:49.296
करना और भोगना ये बात ही उसके...
उसके श्रवण में ये आती रहती है।

00:04:49.320 --> 00:04:54.056
पहले श्रवण लिया। <b>अनंतबार परिचय में आई है</b>

00:04:54.080 --> 00:05:00.696
आत्मा को अज्ञानदशा में करना और भोगना, यह उसे परिचित है।

00:05:00.720 --> 00:05:07.856
आत्मा कर्ता नहीं और भोक्ता नहीं, यह बात
अपरिचित है, उसे परिचय में आई
नहीं और सुनने में आई नहीं।

00:05:07.880 --> 00:05:17.056
<b>और अनंतबार अनुभव में भी आ
चुकी है।</b> कर्ताबुद्धि और भोक्ताबुद्धि
अनंत अनंत अनंतकाल पूर्व,

00:05:17.080 --> 00:05:26.856
पूर्व की बात करते हैं। भविष्यकाल में यह उसे
सुनने में आएगी और परिचय में आएगी

00:05:26.880 --> 00:05:33.676
और अनुभव में आएगी- ऐसा लिखा नहीं है।
पूर्वकाल में ये संस्कार उसे अनादि के हैं,

00:05:33.700 --> 00:05:39.176
करना और भोगना। आत्मा ज्ञाता है-
यह बात सुनी तो नहीं है,

00:05:39.200 --> 00:05:46.776
उसका परिचय भी किया नहीं और
ज्ञान का एकत्व और अनुभव भी किया नहीं।

00:05:46.800 --> 00:05:53.296
<b>कैसा है जीव लोक?</b>
राग को करना और राग के फल को भोगना।

00:05:53.320 --> 00:06:00.896
कर्मचेतना और कर्मफलचेतना अनादिकाल की है।
यह बात नई नहीं है ऐसा।

00:06:00.920 --> 00:06:20.696
राग को करना ऐसा उसे अभ्यास और अध्यास है।
और दुःख को भोगना ये भी उसे अभ्यास है।

00:06:20.720 --> 00:06:27.456
राग और राग के फल से भिन्न आत्मा है-
यह बात सुनी नहीं है। <b>कैसा है जीव लोक?</b>

00:06:27.480 --> 00:06:35.456
अर्थात् लोक में रहे हुए जीव कैसे हैं?
<b>जो संसाररूपी चक्र के मध्य में स्थित है...,</b>

00:06:35.480 --> 00:06:44.516
संसाररूपी चक्र की व्याख्या करते हैं।
<b>निरन्तर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावरूप</b>

00:06:44.540 --> 00:06:51.256
<b>अनंत परावर्तनों के कारण</b> द्रव्य परावर्तन,
क्षेत्र परावर्तन, काल परावर्तन, भव और भाव।

00:06:51.280 --> 00:06:58.816
ओहोहो..! उस परावर्तन की जब बात
सुनते हैं तब ऐसा होता है
कि कितना काल व्यतीत हो गया,

00:06:58.840 --> 00:07:15.136
आहाहा! जैसे कि क्षेत्र परावर्तन की बात
हम करें तो लोकाकाश के एक एक
प्रदेश पर क्रम क्रम से जन्मा और मरा।

00:07:15.160 --> 00:07:24.856
फिर, पहले प्रदेश के बाद यदि तीसरे प्रदेश पर
आकर जन्मा-मरा हो और रखड़े
तो फिर से दूसरे प्रदेश पर आना चाहिए...

00:07:24.880 --> 00:07:31.056
ओहोहोहो! काल अनंत..अनंत..अनंत..
अनंत..अनंतकाल गया परावर्तन का।

00:07:31.080 --> 00:07:41.656
ऐसे एक परमाणु, क्षेत्र, अवसर्पिणी और
उत्सर्पिणी उसके एक एक समय में जन्मना
और मरना क्रम से।

00:07:41.680 --> 00:07:46.276
क्रम भंग करे तो वापस फिर से चक्कर, फिर से चक्कर..
मुमुक्षु:- वह गिनती में ही नहीं आता।

00:07:46.300 --> 00:07:50.416
उत्तर:- गिनती न हो सके, ऐसा समुद्र चला गया,
ऐसा कहते हैं।

00:07:50.440 --> 00:07:58.776
<b>अनंत परावर्तनों के कारण</b> आहा!
एक परावर्तन नहीं, एक अर्धपुद्गल
परावर्तन में कितना काल जाय?

00:07:58.800 --> 00:08:05.816
एक पुद्गल परावर्तन में कितना काल जाय?
और अनंत पुद्गल परावर्तन (किये)!

00:08:05.840 --> 00:08:12.336
<b>भ्रमण को प्राप्त हुआ है,</b> अनंतकाल से चारगति में भटकता है।

00:08:12.360 --> 00:08:22.856
<b>समस्त विश्व को एकछत्र राज्य से वश
करनेवाला महा मोहरूपी भूत जिसके पास
बैल की भांति भार वहन कराता है,</b>

00:08:22.880 --> 00:08:29.756
शांति से बैठ सके नहीं। कर्ता-भोक्ता,
कर्ता-भोक्ता, करना, ऐसा करना,
ऐसा करना, इसके बाद ऐसा करना,

00:08:29.780 --> 00:08:35.616
इसप्रकार निरंतर जाल, संकल्प और
विकल्प की उत्पन्न होती रहती है।

00:08:35.640 --> 00:08:43.276
<b>समस्त विश्व को</b> एक मोहराजा का राज है, ऐसा कहते हैं।

00:08:43.300 --> 00:08:53.976
मोहराजा जिसके हृदय में ज्ञान में अज्ञान में
आया वह मोह उसे सुख से बैठने देता नहीं।

00:08:54.000 --> 00:09:01.936
उसके पास बैल की... गुरुदेव तो बैल का
उदाहरण देते हैं। ऐसे.. करे, अभ्यस्त होता है...

00:09:01.960 --> 00:09:08.996
और सिर पर जुआठा (गाड़ी, हल की लकड़ी जो बैल के
कंधे पर रहती है) डाले और उसपर पड़े भार।
इसप्रकार अज्ञान अंधकार से,

00:09:09.020 --> 00:09:18.816
मोह से, मूर्छा से असावधान दशा से भूत की
भांति मोह को और मोह से <b>मोह रूपी भूत</b>

00:09:18.840 --> 00:09:24.416
<b>जिसके पास</b> यानि जीव के पास से
<b>बैल की भांति भार वहाँ कराता है;</b>

00:09:24.440 --> 00:09:27.656
<b>जोर से प्रगट हुए</b> अब दूसरा,

00:09:27.680 --> 00:09:34.056
<b>जोर से प्रगट हुए तृष्णारूपी रोग के
दाह से जिसको अंतरंग में पीड़ा प्रगट हुई है,</b>

00:09:34.080 --> 00:09:41.616
शांति नहीं है इसलिए पांच इन्द्रियों के विषय की
ओर झुक झुककर उस दुःख को टालना चाहता है।

00:09:41.640 --> 00:09:47.896
और प्रायः दुःख डबल होता है।
ये दुःख को टालने की विधि ही गलत है।

00:09:47.920 --> 00:09:56.856
क्योंकि भूख की इच्छा हुई तो भोजन कर ले तो
उस समय भूख का दुःख टलता है, शांति होती है।

00:09:56.880 --> 00:10:06.216
इसीप्रकार देखने की, सूंघने की, स्पर्श करने की, अनेक
प्रकार की जो दुःखभरी है कल्पना, उसको... देखो आगे कहते हैं।

00:10:06.240 --> 00:10:12.576
अब जो इस रोग से दाह हुई है, अंदर आग लगी है,

00:10:12.600 --> 00:10:15.376
<b>जिसको अंतरंग में पीड़ा प्रगट हुई है,</b>

00:10:15.400 --> 00:10:25.256
<b>आकुलित हो होकर मृगजल की भांति विषयग्राम को
(इन्द्रियविषयों के समूह को) जिसने घेरा डाल रखा है,</b>

00:10:25.280 --> 00:10:33.996
उसकी शांति के लिए इन्द्रिय के विषय तरफ,
इंद्रियज्ञान इन्द्रिय के विषय की तरफ झुकता
है और अपनी शांति खोजता है।

00:10:34.020 --> 00:10:42.036
किन्तु कहीं उसको शांति मिलती नहीं।
क्षणिक शांति दिखती है, उसमें भी उसे भ्रान्ति होती है।

00:10:42.060 --> 00:10:45.616
मुमुक्षु:- भ्रान्ति होती है।
उत्तर:- वह भ्रान्ति का कारण है उल्टा।

00:10:45.640 --> 00:10:56.596
<b>और वह परस्पर आचार्यत्व भी करता है।</b>
लो! यें जीव पूरे अज्ञानी हैं
ये परस्पर अचार्यत्व करते हैं,

00:10:56.620 --> 00:11:12.456
उपदेश देते हैं। एकदम उल्टा रस्ता है।

00:11:12.480 --> 00:11:28.176
सुख प्राप्त करते सुख टलता है आया था न!
सुख प्राप्त करते सुख टलता है, लेश यह लक्ष्य में लहो।

00:11:28.200 --> 00:11:39.256
एक जरा तो तू लक्ष्य में ले कि तू सुख के लिए
झपट्टा मारता है चारों तरफ। कमाना, भोगना,
मोटर लेनी, बंगला लेना,

00:11:39.280 --> 00:11:48.136
कपड़े अच्छे, वगैरह अनेक अनेक प्रकार से
तू सुख के लिये प्राप्ति (प्रयत्न) करता है परंतु सुख टलता है।

00:11:48.160 --> 00:11:52.176
सुख आता नहीं है और अतीन्द्रिय सुख टल जाता है।

00:11:52.200 --> 00:11:59.796
सुख प्राप्त करते इन्द्रियसुख प्राप्त करते
सुख टलता है। वास्तविक आत्मिक सुख तुझे मिलता नहीं।

00:11:59.820 --> 00:12:05.136
"लेश ये लक्ष्य में लो।" ज़रा तो लक्ष्य में ले
कि इसमें सुख नहीं है, ऐसा।

00:12:05.160 --> 00:12:10.176
<b>परस्पर अचार्यत्व भी करता है।</b> यह संसार का चित्र देते हैं।

00:12:10.200 --> 00:12:17.036
मुमुक्षु:-चित्र देते हैं।
उत्तर: चित्रकारी है संसार की। सावधान करते हैं। देख तू, अब चेत, ऐसा।

00:12:17.060 --> 00:12:22.376
समयसार तेरे हाथ में आया है।
तुझे उपदेशक मिले हैं।

00:12:22.400 --> 00:12:33.256
सुनानेवाले मिले हमारे जैसे आचार्य। ऐसा।
तू हमारी बात को लक्ष्य में ले और ज़रा,
भेदज्ञान करके आत्मा के सन्मुख हो।

00:12:33.280 --> 00:12:37.176
सुखी होना हो तो दूसरा कोई उपाय है नहीं।

00:12:37.200 --> 00:12:48.216
<b>परस्पर अचार्यत्व भी करता है।</b> ऎसा।
अज्ञानी के पास जो है, वो देता है। कहता है कि यात्रा करो,
उदाहरण के लिए, सामायिक बाँधकर बैठ जाओ दो घड़ी,

00:12:48.240 --> 00:12:59.256
शुद्ध आहार खाओ, समझ गए?
छना हुआ पानी पीओ कुँए का, नल का नहीं...
वगैरह वगैरह अनेक प्रकार से वो ये उपदेश देते हैं।

00:12:59.280 --> 00:13:08.936
ऐसा  करो तो धर्म होता है, ऐसा करो तो,
पुण्य करो तो धर्म होता है। उपवास करो,
वर्षीतप करो तो धर्म होता है। आहाहा!

00:13:08.960 --> 00:13:14.976
काम भोग की कथा हैं सब।
करने का ही उपदेश देता है अज्ञानी।

00:13:15.000 --> 00:13:24.816
आत्मा कर्ता नहीं है, मात्र ज्ञाता है-
यह उपदेश दे सकता नहीं क्योंकि वह जानता नहीं।

00:13:24.840 --> 00:13:33.496
अज्ञान से अँधा हो गया है।
बिलकुल अंध हो गया है।

00:13:33.520 --> 00:13:43.816
ज्ञानी के और अज्ञानी के उपदेश में बड़ा अंतर है।
एक करने का उपदेश देता है।

00:13:43.840 --> 00:13:51.136
दूसरा कहता है कि आत्मा जाननहार है, करनेवाला नहीं।
यह उपदेश का भी अंतर है बड़ा।

00:13:51.160 --> 00:14:01.056
एक राग की क्रिया करने का उपदेश देता है,
दूसरा कहता है कि वीतराग भाव से धर्म होता है,
राग से धर्म नहीं होता।

00:14:01.080 --> 00:14:09.236
<b>परस्पर आचार्यत्व भी करता है।</b> देखो!
<b>(अर्थात् दूसरों से कहकर उसी प्रकार अंगीकार करवाता है)।</b>

00:14:09.260 --> 00:14:13.656
स्वयं करता है और दूसरों से करवाता है।
जो करते हों, उन्हें अनुमोदन भी देता है।

00:14:13.680 --> 00:14:23.696
<b>इसलिए काम भोग की कथा</b>, कथा मतलब
(उसका) स्वरुप, अनुभव <b>तो सबके लिए सुलभ है।</b>

00:14:23.720 --> 00:14:45.696
आहाहा! बिना प्रयत्न के ये मिलता है,
और सच्चा सुख तो प्रयत्न से मिलता है, किन्तु
यह सुलभ है, दुर्लभ नहीं है।

00:14:45.720 --> 00:14:52.256
शुद्ध आत्मा का अनुभव दुर्लभ है। यह तो सुलभ है।

00:14:52.280 --> 00:14:57.136
मुमुक्षु:- क्योंकि उस प्रकार का ही अनुभव है,
परिचित है इसलिए सुलभ है।

00:14:57.160 --> 00:15:02.736
उत्तर:- उसको सुख से (आसानी से) प्राप्त होता रहता है,
बिना मेहनत के। और उपदेशक भी ऐसे मिले।

00:15:02.760 --> 00:15:10.276
जीव नवीन क्या करे?
उपदेशक भी ऐसे मिले। जीव क्या नवीन करे?

00:15:10.300 --> 00:15:16.736
वें जो करते हों, सामायिक करो,
प्रतिक्रमण करो, यात्रा करो, चौविहार करो,
हरितकाय का त्याग करो आज चौदस है,

00:15:16.760 --> 00:15:25.136
दृष्टांत के लिए। ऐसे उपदेश! करने का ही उपदेश।
त्याग के नाम पर भी कर्ताबुद्धि।

00:15:25.160 --> 00:15:35.016
आहाहा! बहुत हो तो क्रोध छोड़ो, मान छोड़ो,
माया छोड़ो आहाहा! छोड़ो..! समझ गये!

00:15:35.040 --> 00:15:38.936
जैसे कि ग्रहण किया हो और घुस गया हो आत्मा में क्रोध!

00:15:38.960 --> 00:15:46.976
आहाहा! क्रोध आत्मा में घुस गया है,
इसलिए दुःखी होता है, इसलिए उस क्रोध को छोड़ो तो धर्म होगा।

00:15:47.000 --> 00:16:02.776
आत्मा <b>अपोहक</b> है।
क्रोध के अभाव स्वभाव से आत्मा रहा हुआ है।
आहा! त्याग-उपादान शून्यत्व शक्ति है।

00:16:02.800 --> 00:16:13.456
ग्रहण और त्याग आत्मा के स्वभाव में नहीं है।
<b>किन्तु अब कहते हैं कि ये सुलभ है।</b>

00:16:13.480 --> 00:16:21.816
अब, दुर्लभ की बात करते हैं,
<b>किन्तु निर्मल भेदज्ञानरुपी प्रकाश से</b>
निर्मल शब्द क्यों प्रयोग किया?

00:16:21.840 --> 00:16:26.496
शुद्ध आत्मा का जो अनुभव होता है, उसका नाम भेदज्ञान है।

00:16:26.520 --> 00:16:36.536
राग से भिन्न प्रत्यक्ष शुद्धात्मा का अनुभव
होना, उसका नाम निर्मल भेदज्ञान है।
निश्चय भेदज्ञान की बात की।

00:16:36.560 --> 00:16:40.416
<b>निर्मल भेदज्ञानरुपी प्रकाश से
स्पष्ट भिन्न दिखाई देनेवाला</b>

00:16:40.440 --> 00:16:53.216
गृहस्थ अवस्था में राग से भिन्न- स्पष्ट,
प्रत्यक्ष, राग से मेरा आत्मा भिन्न है-
ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

00:16:53.240 --> 00:17:06.776
दुःख से मेरा आत्मा भिन्न है।
दुःख के समय दुःख से भिन्नता का एहसास हो जाता है।
दुःख टले तो दुःख से भिन्न है- ऐसा नहीं।

00:17:06.800 --> 00:17:17.416
दुःख से रहित ही है आत्मा।
यानि दुःख से रहित है इसलिए दुःख से
भिन्न आत्मा की उपलब्धि हो सकती है। ऐसा।

00:17:17.440 --> 00:17:23.616
राग, द्वेष, सुख-दुःख के परिणाम अभूतार्थ
होने से अनुभूति हो सकती है। (वें) भले रहें।

00:17:23.640 --> 00:17:30.736
मुमुक्षु:- मेरे में नहीं हैं न!
उत्तर:- मेरे में नहीं हैं, बस।

00:17:30.760 --> 00:17:54.816
स्वभाव और विभाव का भेदज्ञान मूल है।
झलकता है किन्तु वो राग आत्मा में आता नहीं।

00:17:54.840 --> 00:18:10.696
दुःख झलकता है किन्तु दुःख
आत्मा में प्रवेश करता नहीं, आहाहा!

00:18:10.720 --> 00:18:22.816
स्पष्ट भिन्न, ऐसा। प्रत्यक्ष भिन्न।
परोक्ष भिन्न नहीं। अनुभव के काल में
प्रत्यक्ष भिन्नता होती है। ऐसा।

00:18:22.840 --> 00:18:31.816
<b>निर्मल भेदज्ञानरुपी प्रकाश से स्पष्ट
भिन्न दिखाई देनेवाला यह</b> यह,

00:18:31.840 --> 00:18:45.136
<b>मात्र भिन्न आत्मा का एकत्व ही-
जो कि सदा प्रगटरूप से अंतरंग में प्रकाशमान है</b> आहाहा!

00:18:45.160 --> 00:18:53.296
एक शुद्धात्मा चिदानंद आत्मा एक ज्ञायकभाव,
सदा भिन्नपने रहा हुआ है, ऐसा।

00:18:53.320 --> 00:19:05.056
सदा अत्यंत भिन्नपने रहा हुआ,
सर्वथा भिन्नपने रहा हुआ है। राग-द्वेष, सुख-दुःख के
साथ कथंचित् भिन्न-अभिन्न- ऐसा प्रकार नहीं है।

00:19:05.080 --> 00:19:12.016
मुमुक्षु:- नहीं है। ठीक।
उत्तर:- भेदज्ञान से पहले भी भिन्नता रही हुई है।

00:19:12.040 --> 00:19:22.776
और भिन्नता का एहसास होना उसका नाम भेदज्ञान
सच्चा, निर्मल अनुभूति है।

00:19:22.800 --> 00:19:34.416
यह आबाल-गोपाल सबको अनुभव में आता है।

00:19:34.440 --> 00:20:02.996
<b>अंतरंग में प्रकाशमान है तथापि कषायचक्र
के साथ एकरूप जैसा किया जाता है, इसलिए</b>

00:20:03.020 --> 00:20:11.776
अर्थात् मानने में आता होने से। है तो कषाय और
भगवान आत्मा भिन्न, किन्तु भेदज्ञान का अभाव है

00:20:11.800 --> 00:20:22.176
इसलिए जैसे मैं कषायी- रागी हो गया, ऐसे
उसके साथ एकत्वपना मानता है।
एकरूप जैसा करने में आता है। एकरूप होता नहीं है।

00:20:22.200 --> 00:20:36.296
ज्ञान और राग हैं तो भिन्न ही,
पर जैसे वें एक अभिन्न ही हों।
अभिन्न का कारण भी क्रोध का प्रतिभास है।

00:20:36.320 --> 00:20:51.936
क्रोध का प्रतिभास देखकर क्रोध जैसे मेरे में हुआ...
क्रोध का मात्र प्रतिभास है। और
वो प्रतिभास होता है वो भिन्न का प्रतिभास होता है।

00:20:51.960 --> 00:21:06.336
क्रोध भिन्न है। क्रोध ज्ञान में जानने में आता है
उस समय, आहाहा! जिसमें जानने में आता है, वो ज्ञेयाकार
ज्ञान की अवस्था तो मेरी है

00:21:06.360 --> 00:21:12.736
और क्रोध तो ज्ञेय है, भिन्न है,
निमित्तभूत ज्ञेय है। आहाहा! तो तो भेदज्ञान हो जाय।

00:21:12.760 --> 00:21:17.136
किन्तु क्रोध का प्रतिभास देखकर क्रोध मेरे में आ गया...
मुमुक्षु:- वह भ्रान्ति हो गई।

00:21:17.160 --> 00:21:27.336
उत्तर:- भ्रान्ति हो गई बस।
स्फटिकमणि में लाल फूल की झलकन का प्रतिभास
देखकर स्फटिकमणि लाल हो गई।

00:21:27.360 --> 00:21:41.016
स्फटिकमणि लाल हुई हो और लाल माने
तो तो सच्ची बात है। किन्तु लाल हुई नहीं है,
लालपना तो फूल में है और स्वच्छता तो स्फटिकमणि की है।

00:21:41.040 --> 00:21:48.776
इसप्रकार ज्ञान की स्वच्छता है और क्रोध की (झलकन) तो
ज्ञेयभूत है, बाहर का पदार्थ है, मलिनभाव।

00:21:48.800 --> 00:22:02.936
स्वच्छ और मलिन- दो तत्व भिन्न-भिन्न हैं।
<b>एकरूप जैसा किया जाता है, इसलिए</b> मतलब मानने में
आता होने से, एकपने की मान्यता हो गई है।

00:22:02.960 --> 00:22:13.296
<b>अत्यंत तिरोभाव को प्राप्त हुआ है,</b> क्या कहते हैं?
<b>जो कि सदा प्रगटरूप से अंतरंग में प्रकाशमान है तथापि,</b>

00:22:13.320 --> 00:22:21.616
जो भगवान आत्मा साक्षात हाज़िर है तो भी,
उसके ऊपर लक्ष्य नहीं है और कषाय के ऊपर लक्ष्य है।

00:22:21.640 --> 00:22:27.536
इसलिए कषाय के लक्ष्य से जैसे मैं कषायी हो गया,
दुःखी हो गया, रागी हो गया, मनुष्य हो गया,

00:22:27.560 --> 00:22:34.296
ऐसे अनंतकाल से स्व और पर (के)
भेदज्ञान के अभाव से एकता करता है।

00:22:34.320 --> 00:22:41.216
एकता करता होने से <b>अत्यंत
तिरोभाव को प्राप्त हुआ है</b> अभाव नहीं हुआ है।
मुमुक्षु:- तिरोभाव।

00:22:41.240 --> 00:22:51.916
उत्तर:- है तो भगवान आत्मा वर्तमान मौजूद,
उसका लक्ष्य क्रोध पर है तब भी।
पर वह प्रगट तिरोभाव को प्राप्त हुआ है।

00:22:51.940 --> 00:22:58.536
आच्छादित हो गया है। दृष्टि में आता नहीं,
ओझल। है फिर भी दिखता नहीं।

00:22:58.560 --> 00:23:09.136
समुद्र के किनारे एक तिनका मात्र आँख में आड़े आया
(तो) पूरा समुद्र तिरोभूत हो गया। दिखता नहीं।

00:23:09.160 --> 00:23:21.216
दिखता नहीं इसलिए समुद्र नहीं है ऐसा नहीं, है।
तिरोभूत मतलब वह वस्तु होने पर भी
उसकी नजर में आती नहीं, उसका नाम तिरोभूत हो गया।

00:23:21.240 --> 00:23:30.776
अनुभव हो तो आविर्भाव हो।
तिरोभूत और आविर्भाव, वह ज्ञान की पर्याय का विशेषण है।

00:23:30.800 --> 00:23:36.216
भगवान आत्मा तिरोभाव हुआ (था)
और (अब) आविर्भाव हुआ, ऐसा नहीं है।

00:23:36.240 --> 00:23:43.136
जानने में नहीं आता था, उसका नाम तिरोभाव और
जानने में आया तो आविर्भाव। बस इतना ही है।

00:23:43.160 --> 00:23:46.616
<b>अत्यंत तिरोभाव को प्राप्त हुआ है, (ढक रहा है)</b>

00:23:46.640 --> 00:23:52.536
आत्मा का स्वरुप दिखता नहीं, होने पर भी दिखता नहीं।

00:23:52.560 --> 00:24:08.456
<b>वह</b>, अब दो कारण देते हैं। वह सदा अंतरंग में
प्रगट है भगवान आत्मा (फिर भी) दिखता नहीं,
तिरोभूत हो गया है।

00:24:08.480 --> 00:24:19.376
उसके दो कारण देते हैं। एक निश्चय कारण
और दूसरा व्यवहार कारण। निश्चय कारण क्या है?

00:24:19.400 --> 00:24:26.896
<b>वह- अपने में अनात्मज्ञता होने से</b> अर्थात्
अनात्मा को आत्मा मानने की भूल स्वयं करता है।

00:24:26.920 --> 00:24:40.416
वह क्षणिक उपादान की भूल स्वयं की है।
वह निश्चय कारण है। और आत्मज्ञानी
गुरु की संगति नहीं की- वह व्यवहार कारण है,

00:24:40.440 --> 00:24:47.616
दूसरा कारण। <b>(स्वयं आत्मा को न जानने से)</b>
<b>अपने में अनात्मज्ञता होने से</b>

00:24:47.640 --> 00:24:55.136
अर्थात् आत्मा होने पर भी उसके प्रति लक्ष्य नहीं
करने से, मतलब उसे निग्लेक्ट करने से।

00:24:55.160 --> 00:25:07.576
<b>(स्वयं आत्मा को न जानने से)</b> इतना अर्थ किया।
<b>अनात्मज्ञता</b> ऐसा। अन-आत्मज्ञता।

00:25:07.600 --> 00:25:24.776
<b>(स्वयं आत्मा को न जानने से),</b>
स्वयं स्वयं को नहीं जानने से- ये
निश्चयकारण। एक समय की पर्याय की भूल।

00:25:24.800 --> 00:25:40.776
उसकी योग्यता। अज्ञान की उत्पत्ति किसी
कर्म के उदय से नहीं हुई। स्वयं स्वयं को भूलता है।

00:25:40.800 --> 00:25:48.496
मुमुक्षु:- अपने को भूल कर हैरान हो गया।
उत्तर:- वह आप कव्वाली में (गाते हो)
शुरुआत में आता है। बहुत अच्छा आता है।

00:25:48.520 --> 00:25:51.576
मुमुक्षु:- भूला है स्वयं आत्मा को...

00:25:51.600 --> 00:25:52.880
उत्तर:- हें.. स्वयं आत्मा को.. वह ये।
भूला है स्वयं आत्मा को।

00:25:52.880 --> 00:26:04.696
स्वयं अपने को भूल गया बस। उसकी भूल किसी दूसरे ने
करवाई नहीं है किसी ने। वह मूल कारण है ये।

00:26:04.720 --> 00:26:16.496
और अब, अब निमित्त की प्रधानता से बात करते हैं।
<b>और अन्य आत्मा को जाननेवालों की
संगति-सेवा न करने से,</b>

00:26:16.520 --> 00:26:25.776
अब जो आत्मानुभवी पुरुष हैं, उनके समागम का
यदि योग हो जाय, तो तो वें उसको स्वरुप का कुछ ख्याल देवें।

00:26:25.800 --> 00:26:36.776
स्वयं स्वयं से अज्ञान है और जो ज्ञानी हैं
उनके पास जाता नहीं। उनकी बात सुनता
नहीं, देशनालब्धि सुनता नहीं।

00:26:36.800 --> 00:26:48.416
दो कारण हैं। एक मूल कारण और दूसरा
उत्तर कारण। मूल कारण यानि पर्याय की योग्यता।

00:26:48.440 --> 00:27:04.896
<b>और अन्य आत्मा को जाननेवालों की</b>
आत्मा को जाननेवालों की <b>संगति</b>-
समागम, <b>सेवा न करने से,</b>

00:27:04.920 --> 00:27:13.216
सेवा का अर्थ समागम नहीं (किया), उसका नाम सेवा
नहीं की। सेवा नहीं की (का) मतलब
पैर दबाता नहीं, ऐसा नहीं।

00:27:13.240 --> 00:27:23.736
उनके संग में ही आता नहीं।
उनसे दूर ही वर्तता है। समवशरण हो न,
समवशरण भगवान का, उसमें भी कितने नहीं जाते।

00:27:23.760 --> 00:27:29.496
उसके घर के कुटुंब के पाँच जाएँ और
पाँच कहें (कि) हमे नहीं आना। बोलो!

00:27:29.520 --> 00:27:41.016
स्वयं स्वयं से आत्मज्ञान नहीं किया और
तीर्थंकर का समोशरण आया उसमें भी
नहीं गया, ऐसा। वक्रता की है न अनंतकाल से।

00:27:41.040 --> 00:27:51.496
<b>संगति-सेवा न करने से, न तो पहले</b>,
आहाहा! <b>कभी सुना है,</b>
पर तीर्थंकर की सभा में गया था न!

00:27:51.520 --> 00:27:56.456
रुचिपूर्वक सुना नहीं। इस कान से
सुना और उस कान से निकाल दिया।

00:27:56.480 --> 00:28:01.616
विषय सेवन करने गया था वह,
विषय का सेवन करने गया था।

00:28:01.640 --> 00:28:19.736
श्रोत्र इंद्रिय का जो विषय है, शब्द की
पर्याय, जैसे कि कोई भजन, कीर्तन
कोई... दृष्टांत के तौर पर सिनेमा का आये...

00:28:19.760 --> 00:28:26.616
क्या कहते हैं उसे? गाना। वो सुनता है न,
वह विषय का सेवन किया उसने।

00:28:26.640 --> 00:28:38.476
ऐसे इस तीर्थंकर की सभा में इसने
(कर्णेन्द्रिय का) पोषण किया। इन्द्रियज्ञान का पोषण
करने गया था वह। अच्छा लगे.. सुहाना लगे..,

00:28:38.500 --> 00:28:46.056
वहाँ का अतिशय इसप्रकार का.. शांति लगे..,
समझ गए? इन्द्रिय के विषय का पोषण किया उसने।

00:28:46.080 --> 00:28:53.176
इस इन्द्रियज्ञान से सुनना मेरा
स्वभाव नहीं है- ये ख्याल में नहीं आया।

00:28:53.200 --> 00:28:56.936
मेरे कान नहीं हैं और भाव इन्द्रिय का
भी मेरे में अभाव है।

00:28:56.960 --> 00:29:07.896
इसलिए भाव इन्द्रिय द्वारा मैं द्रव्यश्रुत को
सुनूँ- यह मेरा स्वभाव नहीं है।
आहाहा! कान नहीं हैं इसलिए सुनता नहीं,

00:29:07.920 --> 00:29:15.656
आँख नहीं हैं इसलिए देखता नहीं,
नाक नहीं है इसलिए सूंघता नहीं,
जीभ नहीं है इसलिए स्वाद को चखता नहीं,

00:29:15.680 --> 00:29:30.336
और चमड़ी नहीं है मेरे, इसलिए स्पर्श कर
सकता नहीं हूँ किसी पदार्थ को। आहाहा!
वह विषय का सेवन करने गया था।

00:29:30.360 --> 00:29:43.056
<b>न तो पहले कभी सुना है</b> हों!
पूर्व काल की बात करते हैं। अनंत-अनंतकाल
गया कभी सुनने में आया नहीं।

00:29:43.080 --> 00:29:54.376
राग से आत्मा भिन्न है यह बात जीवों ने
सुनी नहीं है। दुःख के काल में दुःख का
भोक्ता नहीं है आत्मा। यह बात सुनी नहीं है।

00:29:54.400 --> 00:30:02.256
नया आयुष्य बंधता है, तब नए आयुष्य के
कर्म को बाँधने वाला आत्मा नहीं है।

00:30:02.280 --> 00:30:11.216
और बंधता है, उसमें निमित्तपना भी
आत्मा का नहीं है। ऐसी बात उसने सुनी नहीं है। आहाहा!

00:30:11.240 --> 00:30:19.376
<b>न पहले कभी परिचय में आया है</b>,
यह आत्मतत्व परिचय में, अनुभव में आया नहीं।

00:30:19.400 --> 00:30:23.856
<b>और न पहले कभी अनुभव में आया है।</b>
आत्मा का स्वरुप अनुभव में आया नहीं।

00:30:23.880 --> 00:30:27.856
करना और भोगना, करना और भोगना।
करना... कुछ करना तो चाहिए न,

00:30:27.880 --> 00:30:36.976
पुरुषार्थ तो करना चाहिए न। आहाहा!
किन्तु आत्मा को जानना, अनुभवना,
वही सम्यक पुरुषार्थ है।

00:30:37.000 --> 00:30:45.976
वह जयपुर के विद्वान ने पूछा था,
विद्यार्थी था बेचारा,
पुरुषार्थ की व्याख्या क्या? यहाँ।

00:30:46.000 --> 00:30:53.736
मैंने कहा शुद्धात्मा को लक्ष्य में लेकर
उसका अनुभव करना, उसका नाम पुरुषार्थ कहलाता है।

00:30:53.760 --> 00:31:04.656
<b>इसलिए भिन्न आत्मा का एकत्व
सुलभ नहीं है।</b> आया था न मूल में..

00:31:04.680 --> 00:31:12.096
"<b>ण सुलहो विहतस्स</b>" गुरुदेव
यह वाक्य बोलते हैं। सुलभ नहीं है।

00:31:12.120 --> 00:31:21.056
पुण्य-पाप से भिन्न आत्मा है
ये बात प्रगट होनी, प्राप्त होनी
असाधारण है, सुलभ नहीं है।

00:31:21.080 --> 00:31:26.696
अशक्य नहीं है। <b>सुलभ नहीं </b>शब्द
का प्रयोग किया मतलब दुर्लभ है, दुर्लभ है।

00:31:26.720 --> 00:31:30.496
मुमुक्षु:- अलभ्य नहीं है।
उत्तर:- अलभ्य नहीं है, लभ्य है।

00:31:30.520 --> 00:31:42.176
<b>भावार्थ:- इस लोक में सर्व जीव
संसाररूपी चक्र पर चढ़कर पंच
परावर्तन रूप भ्रमण करते हैं।</b>

00:31:42.200 --> 00:31:50.936
<b>वहाँ उन्हें मोहकर्मोदयरुपी पिशाच के
द्वारा जोता जाता है,</b> भूत आया था न भूत.. वो ये।

00:31:50.960 --> 00:32:01.536
<b>पिशाच</b>- उसकी उपमा देते हैं।
<b>इसलिए वें विषयों की तृष्णारुपी दाह से पीड़ित होते हैं;</b>

00:32:01.560 --> 00:32:05.256
विषयों को जानने की इच्छा होती ही रहती है।

00:32:05.280 --> 00:32:15.056
इन विषय और कषाय की व्याख्या की है
मोक्षमार्ग प्रकाशक में; विषय अर्थात् पर को जानने की इच्छा।

00:32:15.080 --> 00:32:25.816
कषाय मतलब कषाय अनुसार करने की इच्छा।
विषय और कषाय।

00:32:25.840 --> 00:32:36.176
जानने कि इच्छा और करने की इच्छा।
जानने कि इच्छा होती है, वो विषय का सेवन करता है

00:32:36.200 --> 00:32:49.776
और करने की इच्छा होती है, वो कषाय का सेवन करता है।
विषय-कषाय की व्याख्या बहुत सुन्दर की है।

00:32:49.800 --> 00:32:59.736
जयसेनाचार्य भगवान विषय-कषाय
शब्द बहुत उपयोग करते हैं जब तब।

00:32:59.760 --> 00:33:15.376
<b>इसलिए वें विषयों की तृष्णारुपी दाह से
पीड़ित होते हैं; और उस दाह का इलाज</b>

00:33:15.400 --> 00:33:28.176
<b>इन्द्रियों के रूपादि विषयों को जानकार</b>
देखो! स्पष्ट किया ये, <b>इसलिए वें... इसलिए...
इलाज इन्द्रियों के रूपादि</b>,

00:33:28.200 --> 00:33:35.056
स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द।
<b>रूपादि विषयों को जानकार उनकी ओर दौड़ते हैं;</b>

00:33:35.080 --> 00:33:44.496
आहाहा! उसमें जुड़ जाते हैं।
उयोग उसमें जुड़ता है। उपयोग आत्मा में
जुड़ना चाहिए उसके बदले पर के लक्ष्य में चला गया।

00:33:44.520 --> 00:33:52.536
आहाहा! इसलिए जाननहार जानने में आता है,
वास्तव में पर जानने में नहीं आता-
इसमें विषय को जीतने की बात है।

00:33:52.560 --> 00:34:03.676
मुमुक्षु:- जीतने की बात है।
उत्तर:- <b>आत्मा वास्तव में पर को जानता नहीं</b>-
इसमें विषयों को जीतने का बोध समाया हुआ है

00:34:03.700 --> 00:34:20.176
मुमुक्षु:- हाँ जी! सही है।

00:34:20.200 --> 00:34:28.656
उत्तर:- और वास्तव में आत्मा अकर्ता है,
इसलिए कर्ता नहीं- ये कषाय जीतने का बोध है।

00:34:28.680 --> 00:34:34.176
विषय और कषाय जीते बिना सम्यग्दर्शन होता ही नहीं।

00:34:34.200 --> 00:34:44.096
और बाद में अस्थिरता के विषय और कषाय,
वें कर्ता के कर्म में नहीं जाते किन्तु ज्ञाता के
ज्ञान में ज्ञेय में चले जाते हैं।

00:34:44.120 --> 00:34:57.136
बाद में अस्थिरता से शास्त्र सुनने की
इच्छा होती है, प्रतिमा के दर्शन करने की इच्छा होती है।

00:34:57.160 --> 00:35:08.836
परन्तु अज्ञानमय इच्छा का अभाव है।
मंदिर जाकर दर्शन करने की इच्छा
हुई, वह विषय है। छूट नहीं है उसकी।

00:35:08.860 --> 00:35:16.936
मुमुक्षु:- नहीं नहीं।
उत्तर:- किन्तु, टिका नहीं जाता साधक से तो
इसप्रकार की अस्थिरता की इच्छा उत्पन्न होती है।

00:35:16.960 --> 00:35:21.656
अबुद्धिपूर्वक इच्छा उत्पन्न होती है।
बुद्धिपूर्वक नहीं है।

00:35:21.680 --> 00:35:27.296
वो एकत्वबुद्धि नहीं है।
मुमुक्षु:- हाँ, मतलब अबुद्धिपूर्वक।
उत्तर:- इसलिए अबुद्धिपूर्वक कहलाता है, ऐसा।

00:35:27.320 --> 00:35:32.776
स्वयं इच्छा को जानता है पर उस इच्छा की इच्छा नहीं है।

00:35:32.800 --> 00:35:38.976
उससे मुझे लाभ होगा, मैं मंदिर जाऊं
तो मुझे धर्म होगा- ये बुद्धि मिथ्यात्व की चली गई।

00:35:39.000 --> 00:35:47.256
अंदर स्वरुप में टिका नहीं जाता और
अभी इन्द्रियज्ञान को..., इन्द्रियज्ञान को जीत लिया है

00:35:47.280 --> 00:35:56.336
अर्थात् इन्द्रियज्ञान का स्वामीपना छूट गया
परन्तु इन्द्रियज्ञान छूटा नहीं अभी।
इसलिए वह इन्द्रियज्ञान अपने खेल करता है।

00:35:56.360 --> 00:36:03.296
अनादिकाल की भेद वासित बुद्धि है न अभी।
क्षायिक केवलज्ञान नहीं होता तब तक ऐसा होता रहता है।

00:36:03.320 --> 00:36:16.656
आहाहा! पर को जानने की इच्छा होती है
वह विषय है, उसमें ठगा गया।

00:36:16.680 --> 00:36:28.296
पर को मैं जानता नहीं- इसमें विषयों पर जीत हो जाएगी।
और मैं पर का कर्ता नहीं हूँ- इसमें कषाय पर जीत हो जाएगी।

00:36:28.320 --> 00:36:31.916
यह विषय और कषाय को जीतने की चाबी और कला है, बहन!

00:36:31.940 --> 00:36:35.636
मुमुक्षु:- यह मंत्र है विषय और कषाय को जीतने का।
उत्तर:- जीतने का मंत्र है।

00:36:35.660 --> 00:36:47.336
यह मंत्र जो है वह स्टीकर में लिखा हुआ है।
मुमुक्षु:- हाँ, सुवर्ण अक्षर में लिखा हुआ है।

00:36:47.360 --> 00:36:56.776
उत्तर:- सुवर्ण अक्षर में लिखा हुआ है।
"मैं जाननहार हूँ और करनेवाला नहीं"
इसमें कषाय पर जीत हो जाती है।

00:36:56.800 --> 00:37:05.816
और "वास्तव में जाननहार जानने में आता है
और वास्तव में पर जानने में नहीं आता"
इसमें विषय पर जीत हो जाती है।

00:37:05.840 --> 00:37:19.856
आहाहा! ये दो बात ही हैं। ये दो ही बात हैं।
अनादी की ये दो बात हैं। शास्त्र का आधार मिला न!

00:37:19.880 --> 00:37:31.416
विषय और कषाय को जीतो।
पर को जानता नहीं उसमें विषय पर जीत हो जाती है।

00:37:31.440 --> 00:37:37.776
पर का मैं कर्ता नहीं हूँ, राग का कर्ता नहीं हूँ,
इसमें कषाय पर जीत हो जाती है। आहाहा!

00:37:37.800 --> 00:37:43.216
मुमुक्षु:- सही है, बहुत सुन्दर। एकदम सही बात है।

00:37:43.240 --> 00:37:48.336
उत्तर:- और विषय को जीते बिना
अनुभव होता नहीं।
मुमुक्षु:- होता नहीं।

00:37:48.360 --> 00:37:55.336
उत्तर:- और कषाय को जीते बिना अनुभव होता नहीं।
उसको जीतने के दो प्रकार हैं। आहाहा!

00:37:55.360 --> 00:37:58.756
मुमुक्षु:- पर को जानना बंद नहीं करेगा तब
तक अनुभव नहीं होगा।

00:37:58.780 --> 00:38:07.696
उत्तर:- हाँ.. तब तक वो विषय नहीं अटकेगा।
और करने का अभिप्राय नहीं छूटेगा
तब तक कषाय नहीं छूटेंगी।

00:38:07.720 --> 00:38:15.136
करने का अभिप्राय छूटने पर कषाय का अभाव
हो जाता है। फिर कषाय होती हैं,

00:38:15.160 --> 00:38:23.776
आहाहा! वह तो उनका ज्ञाता रहता है,
उनका कर्ता बनता नहीं। रागी तो पुद्गल है।

00:38:23.800 --> 00:38:35.656
आहाहा! ये विषय-कषाय को जीतने का स्टीकर में से
निकला लो...हें। उस स्टीकर में दो ही मंत्र हैं।

00:38:35.680 --> 00:38:39.796
मुमुक्षु:- दो ही मंत्र हैं।
उत्तर:- विषय को जीतने का और कषाय को जीतने का।

00:38:39.820 --> 00:38:42.316
मुमुक्षु:- विषय-कषाय को जीतना यह ही धर्म है।

00:38:42.340 --> 00:38:47.516
उत्तर:- हाँ... "जाननहार जानने में आता है वास्तव में
पर जानने में नहीं आता" इसमें विषय पर जीत हो जाती है।

00:38:47.540 --> 00:38:55.216
मुमुक्षु:- सही।
उत्तर:- और, "जाननहार हूँ और करनेवाला नहीं" आहाहा!

00:38:55.240 --> 00:39:05.496
एक में जीव का वास्तविक स्वरुप लक्ष्य में आता है
और जो वास्तविक स्वरुप लक्ष्य में आया वह अनुभव में आता है।

00:39:05.520 --> 00:39:10.736
इसलिए संवर होता है।
मुमुक्षु:- संवर होता है।

00:39:10.760 --> 00:39:24.616
उत्तर:- "जाननहार हूँ और करनेवाला नहीं"- ये द्रव्य का निश्चय है।

00:39:24.640 --> 00:39:31.416
"जाननहार जानने में आता है वास्तव में पर जानने में नहीं आता"-
ये ज्ञान की पर्याय का निश्चय है।

00:39:31.440 --> 00:39:35.896
दोनो बात आगम से प्रसिद्ध हैं। आहाहा!

00:39:35.920 --> 00:40:03.976
<b>इन्द्रियों के रूपादि विषयों को जानकार</b>
उसमें से निकला ये सब। जानने की इच्छा।

00:40:04.000 --> 00:40:09.936
<b>उनकी ओर दौड़ते हैं; तथा परस्पर भी
विषयों का ही उपदेश करते हैं।</b>

00:40:09.960 --> 00:40:17.496
आहाहा! आत्मा जाननेवाला है।
पर को जानना तो चाहिए न, जानना तो स्वभाव है,

00:40:17.520 --> 00:40:32.896
आहाहा! वह विषयों से व्यावृत्त होता नहीं।
आहाहा! विषयों को जीता जा सकता नहीं उसमें।
बहुत भरा है हों!

00:40:32.920 --> 00:40:38.136
<b>परस्पर भी विषयों का ही उपदेश करते हैं।</b> ऐसा।

00:40:38.160 --> 00:40:45.256
कि जानना तो चाहिए न!
जाना हुआ तो प्रयोजनवान है न! पर्याय तो है न!
पर्याय अवस्तु थोड़ी है, जाननी तो चाहिए न!

00:40:45.280 --> 00:40:51.816
समझ में आया?
आहाहा! वह विषय को जीत सकता नहीं।

00:40:51.840 --> 00:40:59.976
विषय के आधीन हुआ बावला है,
विषय के आधीन हुआ, जानने के बहाने के नीचे बावला,

00:41:00.000 --> 00:41:10.376
और करने के बहाने के नीचे भी बावला हो गया है,
पागल मूर्ख, मूढ़ है, मोही है, अज्ञानी है।

00:41:10.400 --> 00:41:17.316
<b>आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम् ।
परभावस्य कर्तात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम् ।।</b>

00:41:17.340 --> 00:41:26.696
उसमें ऐसा लिखा है कि <b>मैं परभाव को करता हूँ</b> (ऐसा माने)
वह जीव मूढ़ है, मोही है, अज्ञानी है।
तीन शब्द उपयोग किये हैं।

00:41:26.720 --> 00:41:32.536
करता हूँ और जानता हूँ, दोनों समान दोष हैं।
मुमुक्षु:- सही, एकदम सही।

00:41:32.560 --> 00:41:39.016
उत्तर:- आहाहा! कि नैमित्तिकभूत
तेरा ज्ञान जानने में आता है। क्रोध तुझे जानने में नहीं आता।

00:41:39.040 --> 00:41:44.256
क्रोध तो भिन्न है, तुझे कहाँ से ज्ञात हो?
उसमें तन्मय होता नहीं तू।

00:41:44.280 --> 00:41:54.816
आहाहा! नैमित्तिकभूत ज्ञान में तन्मय हुआ
अर्थात् आत्मा को जानने पर क्रोध भिन्न है ऐसा जानने में आता है।

00:41:54.840 --> 00:42:01.816
ज्ञान को जानने पर ज्ञेय भिन्न हैं ऐसा ज्ञात होगा।

00:42:01.840 --> 00:42:12.316
ज्ञान के ऊपर नजर रखते हुए नैमित्तिक ज्ञान की पर्याय
को जानने पर निमित्तभूत ज्ञेय भिन्न हैं, ऐसा तुझे ज्ञात होगा।

00:42:12.340 --> 00:42:16.656
मुमुक्षु:- सही एकदम सही।

00:42:16.680 --> 00:42:27.096
मुमुक्षु:- जैसे ज्ञान को जानने पर ज्ञानी अभिन्नपने
जानने में आता है, ऐसे ही ज्ञान को जानने पर सभी ज्ञेय-
क्रोधादि भिन्न हैं, ऐसा जानने में आता है।

00:42:27.120 --> 00:42:32.376
उत्तर:- ऐसा जानने में आता है। लोकालोक भिन्न हैं
ऐसा ज्ञात हो जाता है तुझे। आहाहा!

00:42:32.400 --> 00:42:40.256
स्वरुप को छोड़े बिना
और परपदार्थ का लक्ष्य किये बिना परपदार्थ जानने में आते हैं।
उसका नाम वह ज्ञाता हुआ कहलाता है।

00:42:40.280 --> 00:42:44.376
परपदार्थ के लक्ष्य से ज्ञाता नहीं हुआ जाता।
मुमुक्षु:- नहीं हुआ जाता।

00:42:44.400 --> 00:42:51.936
उत्तर:- वह तो विषय-कषाय की प्रवृत्ति हुई वह तो।
उसमें ज्ञाता कहाँ से हुआ? आहा!

00:42:51.960 --> 00:43:00.696
संतों के दो शब्द, विषय और कषाय...,
हम मोरबी गए थे तब बहुत इसकी चर्चा की थी।

00:43:00.720 --> 00:43:06.976
यहाँ मूल तो मैं स्वाध्याय करता था।
स्वाध्याय करते हुए विषय-कषाय का बहुत विचार आया।

00:43:07.000 --> 00:43:13.696
ओहोहो! यह सुन्दर बात की है।
मोरबी में खूब उसका स्पष्टीकरण किया।

00:43:13.720 --> 00:43:27.656
विषय और कषाय का स्पष्टीकरण।
वह आज फिर से याद आया। स्मरण हुआ वापस।
मुमुक्षु:- सूत्र में घटाया।

00:43:27.680 --> 00:43:34.196
मुमुक्षु:- "मैं जाननहार हूँ करनेवाला नहीं। जाननहार
जानने में आता है, पर जानने में नहीं आता"-
उसमें घटाया विषय-कषाय को।

00:43:34.220 --> 00:43:39.816
उत्तर:- हाँ, उसमें ही।
मुमुक्षु:- उसमें से निकला ये।
उत्तर:- उसमें से निकला। उस मंत्र में ही हैं दोनों बात।

00:43:39.840 --> 00:43:47.936
कि मैं पर को जानता नहीं, उसमें विषय पर जीत हो जाएगी
और करता नहीं उसमें कषाय पर जीत हो जाएगी।

00:43:47.960 --> 00:43:51.896
मोह पर जीत हो जाएगी। उसमें मोह के नाश का उपाय है।

00:43:51.920 --> 00:44:10.936
<b>इसप्रकार</b>,<b>इसप्रकार काम</b> अर्थात् (विषयों की इच्छा),
जानने की इच्छा। विषयों को जानने की
इच्छा उसका नाम काम है।

00:44:10.960 --> 00:44:21.776
<b>तथा भोग</b> मतलब उनको- विषयों को
भोगने की इच्छा। दोनों में इच्छा लेनी।
जानने की इच्छा और भोगने की इच्छा ऐसा।

00:44:21.800 --> 00:44:31.816
इन दोनों <b>की कथा तो</b> आहाहा! अनंत बार दो का भाव..
<b>अनंत बार सुनी, परिचय में प्राप्त की
और उसी का अनुभव किया, इसलिए वह सुलभ है।</b>

00:44:31.840 --> 00:44:42.016
<b>किन्तु सर्व परद्रव्यों से भिन्न</b> आहाहा!
पर्याय मात्र परद्रव्य उससे भिन्न है आत्मा।

00:44:42.040 --> 00:44:51.216
वो परद्रव्य है। उससे भिन्न
<b>एक चैतन्यचमत्कारस्वरुप अपने
आत्मा की कथा का ज्ञान</b> अर्थात् भाव का ज्ञान।

00:44:51.240 --> 00:44:56.976
<b>अपने को तो अपने से कभी नहीं हुआ,</b>
पूर्व की बात कर रहे हैं न!

00:44:57.000 --> 00:45:06.456
<b>और जिन्हें वह ज्ञान हुआ है</b>, पर से भिन्न
आत्मा का अनुभव <b>उनकी कभी सेवा नहीं की;</b>

00:45:06.480 --> 00:45:12.216
सेवा मतलब परिचय किया नहीं
और उनके ऊपर श्रद्धा रखकर सुना नहीं।

00:45:12.240 --> 00:45:22.576
वह उनके ऊपर श्रद्धा रखे न, तब उनको निमित्त कहा जाता है।
तब उसकी योग्यता का पलटा उसप्रकार का सहज आता है।

00:45:22.600 --> 00:45:34.736
श्रद्धापूर्वक सुनता है न, उन पर विश्वास
रखकर सुनता है न, उनके ऊपर विश्वास-
वह इन्डाइरेक्ट आत्मा पर विश्वास किया उसने।

00:45:34.760 --> 00:45:38.576
सर्वज्ञ के ऊपर विश्वास वह
(स्वयं के) आत्मा पर विश्वास,

00:45:38.600 --> 00:45:42.376
ज्ञानी पर विश्वास
वह स्वयं के आत्मा पर विश्वास आया।

00:45:42.400 --> 00:45:57.456
एक बार परीक्षा करना कि यह ज्ञानी है या नहीं?
परीक्षा करने की छूट है।

00:45:57.480 --> 00:46:08.256
एक बार परीक्षा हो जाये (कि) यह ज्ञानी है, बस।
फिर शंका-आशंका नहीं होती।

00:46:08.280 --> 00:46:31.216
आहाहा! ज्ञानी के प्रति निःशंकता
एक बड़ा अपेक्षित गुण है। है व्यवहार

00:46:31.240 --> 00:46:49.256
किन्तु निश्चय के अनुकूल व्यवहार है।
अभी इस काल में ऐसे श्रद्धालु जीव कम हैं। बिलकुल शुद्ध।

00:46:49.280 --> 00:47:20.896
<b>किन्तु सर्व परद्रव्यों से भिन्न एक
चैतन्यचमत्कारस्वरुप अपने आत्मा की
कथा का ज्ञान अपने को तो अपने से कभी नहीं हुआ,</b>

00:47:20.920 --> 00:47:30.216
<b>और जिन्हें वह ज्ञान हुआ है उनकी कभी सेवा नहीं की;</b>
उनका परिचय नहीं किया ऐसा। समागम नहीं किया।

00:47:30.240 --> 00:47:35.536
श्रीमद्जी ने सत्समागम पर बहुत वजन दिया है।
सत्समागम के दो प्रकार हैं।

00:47:35.560 --> 00:47:44.176
सत् चित् आत्मा है उसका समागम किया नहीं, (यह) निश्चय।
और जिन्होंने आत्मा को जाना उनका परिचय भी किया नहीं,

00:47:44.200 --> 00:47:52.216
वो व्यवहार। <b>इसलिए उसकी कथा न तो कभी सुनी,
न उसका परिचय किया और न उसका अनुभव किया।</b>

00:47:52.240 --> 00:47:58.936
<b>इसलिए उसकी प्राप्ति सुलभ नहीं, दुर्लभ है।</b> आहाहा!

00:47:58.960 --> 00:48:16.136
अब कहते हैं कि वह <b>सुलभ नहीं दुर्लभ है</b>,
किन्तु मैं ऐसे एकत्व आत्मा की बात तुम्हें कहूँगा।

00:48:16.160 --> 00:48:25.456
<b>अब आचार्य कहते हैं कि इसीलिये</b> उसको
परिचय नहीं है, सुना नहीं है, अनुभव नहीं है। <b>इसीलिये</b>

00:48:25.480 --> 00:48:33.984
<b>जीवों को उस भिन्न आत्मा का एकत्व</b> अर्थात्
एकपना <b>बतलाते हैं:-</b>

00:48:34.008 --> 00:48:40.736
इसमें एकत्व को दर्शाते हैं ऐसा कहा।
फिर एकत्व-विभक्त शब्द जोड़ेंगे।

00:48:40.760 --> 00:48:46.116
अभी तो मैंने एकत्व दर्शाया।
मुमुक्षु:- एकत्व की उपलब्धि सुलभ नहीं है न।

00:48:46.140 --> 00:48:53.896
उत्तर:- सुलभ नहीं है। लिखा है न ऊपर। नीचे लिखा है,
<b>दर्शाऊँ एक विभक्त को</b>
जो अंदर है वही उसका शीर्षक रखा।

00:48:53.920 --> 00:49:05.636
<b>दर्शाऊँ एक विभक्त को, आत्मा तने निज विभव से।
दर्शाऊँ तो करना प्रमाण, न छल ग्रहो स्खलना बने।।५।।</b>

00:49:05.660 --> 00:49:10.096
एकत्व आत्मा को बताने का मैंने व्यवसाय किया है।
आहाहा!

00:49:10.120 --> 00:49:22.976
अब धीरे, धीरे, धीरे, धीरे, धीरे चढ़ती हुई दशा से,
अब आता है। समयसार शुरू होनेवाला है।
उसकी पूर्व भूमिका बाँधते हैं।

00:49:23.000 --> 00:49:34.896
मैं क्या दर्शाऊँगा? कि एकत्व आत्मा को दर्शाऊँगा।
इसमें अकेला एक विभक्त ऐसा।

00:49:34.920 --> 00:49:47.616
विभक्त मतलब अलग,
ऐसे आत्मा की बात मैं दर्शाऊँगा।

00:49:47.640 --> 00:49:55.016
बाद में अस्ति-नास्ति से दो बात,
एकत्व और विभक्त की बात करेंगे। वह छट्टी गाथा में आयेगा।

00:49:55.040 --> 00:50:07.696
पाँचवी गाथा में आया, लो! एकत्व विभक्त। देखो!
बहन! इसमें, उसमें नहीं है। हरिगीत में नहीं है।
हरिगीत में नहीं है ये। उसमें है।

00:50:07.720 --> 00:50:19.336
अन्वयार्थ में है, देखो! पाँचवी गाथा में
<b>तं एयत्तविहत्तं</b> संस्कृत में है देखो।

00:50:19.360 --> 00:50:26.456
मुमुक्षु:- है न!
उत्तर:- है। <b>तं एयत्तविहत्तं</b> एकत्व और विभक्त
शब्द पड़ा है।

00:50:26.480 --> 00:50:35.276
मुमुक्षु:- उसमें हरिगीत में है न, हरिगीत में
भी है भाई, एक विभक्त अर्थात् एकत्व।

00:50:35.300 --> 00:50:45.436
उत्तर:- हाँ, ठीक है। एक अर्थात् एकत्व सही है।
पर यह शब्द बहुत अच्छा है।
मुमुक्षु:- बहुत अच्छा है।

00:50:45.460 --> 00:50:52.776
उत्तर:- यह शब्द बहुत अच्छा है।
एकत्व और विभक्त, यें स्पष्ट हैं दोनों।
मुमुक्षु:- संस्कृत की गाथा में भी है।

00:50:52.800 --> 00:51:01.656
उत्तर:- इसमें देखो <b>तं एयत्तविहत्तं</b> संस्कृत का।
मैं गाथा का अर्थ करता हूँ। <b>अर्थ</b>, टीका से पहले।

00:51:01.680 --> 00:51:10.736
टीका से पहले, <b>[तम्] </b> अर्थात् उस। <b>[एकत्वविभक्तं]</b>
<b>एकत्व-विभक्त आत्मा को</b>। ऐसा।

00:51:10.760 --> 00:51:17.416
भेदज्ञान शुरू हुआ यहाँ से।
मैं एकत्व-विभक्त आत्मा को कहूँगा।

00:51:17.440 --> 00:51:36.376
एकत्व की सिद्धि विभक्त से होती है।
अस्ति-नास्ति अनेकांत, यह अनेकांत का स्वरुप है।

00:51:36.400 --> 00:51:47.416
यह नय सप्तभंगी है। फूलचंदजी
सिद्धांत शास्त्री ने इसका स्पष्टीकरण अच्छा किया है।

00:51:47.440 --> 00:51:51.896
उनका नयचक्र है छोटा।
मुमुक्षु:- जैनतत्व मीमांसा में है।

00:51:51.920 --> 00:51:59.896
उत्तर:- जैनतत्व मीमांसा में! समझ गए?
एक प्रमाण सप्तभंगी अलग और नय सप्तभंगी अलग।

00:51:59.920 --> 00:52:06.496
और आचार्य भगवान ने यहाँ
नय सप्तभंगी से बात शुरू की है।

00:52:06.520 --> 00:52:15.336
नय सप्तभंगी में अनंत गुणों से एकपना
और अनंत पर्याय से विभक्तपना।

00:52:15.360 --> 00:52:24.496
कोई पर्याय बाकी नहीं।
क्योंकि श्रद्धा का विषय देना है।

00:52:24.520 --> 00:52:36.536
ज्ञान के विषय तक आया और प्रमाण
सप्तभंगी तक आया कि स्व-द्रव्य, क्षेत्र, काल,
भाव उसमें पर-द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव की नास्ति (है)।

00:52:36.560 --> 00:52:43.596
मतलब यहाँ द्रव्य-गुण-पर्याय आया
किन्तु वह श्रद्धा का विषय नहीं है, ज्ञान का विषय है।

00:52:43.620 --> 00:52:46.856
और ज्ञान के विषय में से श्रद्धा का
विषय निकालना चाहिए।

00:52:46.880 --> 00:52:54.616
मतलब प्रमाण में से जो निश्चयनय निकालता है
वह जिनवचन में (कुशल है)। वह ये बात आई।

00:52:54.640 --> 00:53:05.816
अब हम गहराई में आ रहे हैं।
अब इस समयसार की जो गहराई है
उसमें हम आ गए हैं, समझ गए?

00:53:05.840 --> 00:53:13.976
अभी तक वो प्रमाण का द्रव्य दिया उन्होंने,
सात बोल से प्रमाण का द्रव्य दिया।

00:53:14.000 --> 00:53:21.156
वह ज्ञेयप्रधान कथन है।
ज्ञानप्रधान कथन है।
प्रमाणज्ञान का विषय आया।

00:53:21.180 --> 00:53:29.816
प्रमाणज्ञान के विषय में द्रव्य-पर्याय दोनों हैं।
कर्म और नोकर्म वें तो एकदम भिन्न हैं, समझ गए?

00:53:29.840 --> 00:53:40.336
अब प्रमाणज्ञान के विषय में भी
निर्विकारी और विकारी दो पर्याय ली।

00:53:40.360 --> 00:53:45.476
क्योंकि पहले कहा है कि ऐसा
आत्मा को अनादिकाल से अनुभव नहीं है।

00:53:45.500 --> 00:53:53.296
बंध की कथा उसने जानी है। इसलिए वें
भी प्रमत्त और अप्रमत्त दोनों ले लेंगे।
विकार-अविकार से रहित, ऐसे।

00:53:53.320 --> 00:53:59.856
देखो! <b>एकत्वविभक्त आत्मा को</b>,
स्व से एकत्व और पर से विभक्त, (अर्थात्) भिन्न।

00:53:59.880 --> 00:54:04.856
दूसरी रीति से कहें तो
स्वद्रव्य और परद्रव्य की भिन्नता।

00:54:04.880 --> 00:54:13.056
<b>मैं आत्मा के निज वैभव से दिखाता हूँ;</b>
डंके की चोट पर कहते हैं कि मैंने आत्मा को देखा है,

00:54:13.080 --> 00:54:17.916
दर्शन किये हैं और आत्मा के ऊपर
लक्ष्य रखकर मैं आत्मा की बात करता हूँ।

00:54:17.940 --> 00:54:20.736
स्वयं स्वयं के अनुभव की साक्षी दी।

00:54:20.760 --> 00:54:30.676
मैंने सुना है और शास्त्र लिखता हूँ, ऐसा
न कहकर... फिर स्वयं टीकाकार कहेंगे व्यवहार की बात।

00:54:30.700 --> 00:54:38.056
स्वयं तो निश्चय का धमाका किया।
मुझे आत्मा का अनुभव हो गया है। बेन,

00:54:38.080 --> 00:54:47.156
स्वयं धमाका किया। निज वैभव से मैं कहता हूँ।
आत्मा का स्वरुप मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है,

00:54:47.180 --> 00:54:57.116
अनुभव कर रहा हूँ, अनुभव मुझे चालू है, ऐसा कहते हैं।
चालू अनुभव में मेरी कलम चलती है। ऐसा कहते हैं।

00:54:57.140 --> 00:55:05.416
मुमुक्षु:- एकदम सही। बहुत सुन्दर।
उत्तर:- सीधी निश्चय की ही बात की।

00:55:05.440 --> 00:55:13.376
मैंने सर्वज्ञ की परंपरा में, मेरे गुरु ने कहा और
मैंने सुना और मुझे आत्मा का ज्ञान हुआ है, ऐसा नहीं।

00:55:13.400 --> 00:55:17.196
व्यवहार की बात को गौण करके निश्चय की बात की।

00:55:17.220 --> 00:55:22.096
अब निश्चय की बात उन्होंने की तो
अमृतचन्द्राचार्य ने व्यवहार जोड़ दिया।
मुमुक्षु:- हाँ, है तो ऐसे ही।

00:55:22.120 --> 00:55:33.096
उत्तर:- सर्वज्ञ की परंपरा, और मेरे गुरु पर्यंत,
और उनकी कृपा से, और मुझे शुद्ध आत्मा का
उपदेश मिला और मैंने अनुभव किया।

00:55:33.120 --> 00:55:45.496
<b>एकत्व-विभक्त आत्मा को मैं आत्मा के निज वैभव से</b>
आहाहा! मेरा निज वैभव
तो आनंद का अनुभव, वह निज वैभव है।

00:55:45.520 --> 00:55:53.176
<b>दिखाता हूँ;</b> मैं दिखाता हूँ, ऐसा। तुझे हथेली में
दिखाता हूँ कि ये आत्मा का स्वरुप है।

00:55:53.200 --> 00:55:58.216
देख दिखाता हूँ, आँख खोलकर रखना रूचि की।
रूचि की आँख खुली रखना।

00:55:58.240 --> 00:56:04.736
दूसरा तुझे कुछ करना नहीं है।
<b>यदि मैं दिखाऊँ तो</b>, ऐसा।

00:56:04.760 --> 00:56:13.416
मैं दिखाऊं तो तुझे दिखेगा। दिखेगा तो अनुभव से
प्रमाण करना। सुनकर प्रमाण मत करना।

00:56:13.440 --> 00:56:17.216
मुमुक्षु:- नहीं, नहीं।
उत्तर:- सुनकर प्रमाण नहीं हो सकता।

00:56:17.240 --> 00:56:24.216
देखो, सुनकर प्रमाण नहीं होता क्योंकि
इन्द्रियज्ञान में प्रमाणता नहीं है।

00:56:24.240 --> 00:56:32.416
क्योंकि इन्द्रियज्ञान में प्रत्यक्ष आत्मा का
अनुभव नहीं है। इसलिए तू अनुभव से प्रमाण करना।

00:56:32.440 --> 00:56:39.336
आहाहा! अनुभवी की बात अनुभव से प्रमाण होती है।

00:56:39.360 --> 00:56:47.336
शक्कर मीठी है। जिसने शक्कर खाई
वो कहता है कि शक्कर मीठी है। देखो! यह शक्कर?

00:56:47.360 --> 00:56:52.996
तो कहता है हाँ, मीठी है। नहीं...नहीं।

00:56:53.020 --> 00:56:59.136
दूसरा अभी आयेगा फिटकरी का ढेला
लेकर इससे अच्छा, तो तू उसे शक्कर मान लेगा।

00:56:59.160 --> 00:57:05.456
पर मैं तुझे शक्कर बताता हूँ मीठी है।
तू जीभ पर रखकर प्रमाण करना।

00:57:05.480 --> 00:57:12.016
फिर ठग आएगा फिटकरी का
ढेला लेकर तो धोखा नहीं खाएगा तू।

00:57:12.040 --> 00:57:20.336
आहाहा! ऐसी संधि की है,
गुरु-शिष्य की संधि की है।

00:57:20.360 --> 00:57:25.956
इसमें ऐसा रहस्य है कि यह समयसार
जो भाव से पढ़ेगा उसको अनुभव होगा।

00:57:25.980 --> 00:57:31.856
मुमुक्षु:- होगा ही।
उत्तर:- यह बात है। वह.. वह स्वयं को.. स्वयं को
दूसरे जीवों का ज्ञान हो गया है।

00:57:31.880 --> 00:57:40.416
भविष्य के पात्र जीवों का ज्ञान हो गया है। नहीं होता?
मुमुक्षु:- हाँ होता है न साहेब।

00:57:40.440 --> 00:57:54.296
उत्तर:- भवान्तर का स्वयं का और दूसरों का
ज्ञान होता है, ज्ञानी को। आहाहा!

00:57:54.320 --> 00:58:03.896
<b>दिखाऊं तो प्रमाण करना, और यदि कहीं
चूक जाऊं</b> मतलब किसी व्याकरण में, मात्रा में,

00:58:03.920 --> 00:58:10.096
शब्द की परंपरा में, कहीं शाब्दिक
दोष हों तो वह तू ग्रहण मत करना।

00:58:10.120 --> 00:58:13.736
अनुभव प्रधान शास्त्र है।
अनुभव से प्रमाण करना।

00:58:13.760 --> 00:58:23.256
<b>तो छल नहीं ग्रहण करना।</b> ऐसा कहा।
इसमें तुम व्याकरण और मात्रा और पद की,
ये और वो आदि बहुत प्रकार होते हैं।

00:58:23.280 --> 00:58:33.496
उसके ऊपर लक्ष्य मत करना। शब्द म्लेच्छ मत होना,
शब्द म्लेच्छ मत होना, नहीं तो रह जाएगा।

00:58:33.520 --> 00:58:41.176
लो, पांचवी गाथा शुरू होगी। टाइम हो गया।

00:58:41.200 --> 00:58:55.536
मैं अपने निज वैभव से लिखता हूँ शास्त्र। आहाहा!

00:58:55.560 --> 00:59:05.296
मुमुक्षु:- अनुभव चालू है।
उत्तर:- चालू है यह।

00:59:05.320 --> 00:59:18.336
लिखने की क्रिया जड़ की है।
विकल्प उठता है वह जड़ की क्रिया है।
आहाहा! उससे भिन्न जाननहार जानने में आता है।

00:59:18.360 --> 00:59:26.296
क्योंकि जो एक बार अनुभव में आया
वह <b>ज्ञात:</b> ज्ञायकपने जानने में आया

00:59:26.320 --> 00:59:33.256
वह तो सर्व अवस्था में ज्ञायकपने,
जाननहारपने ज्ञात हो रहा है। आहाहा!

00:59:33.280 --> 00:59:41.136
वह जानना छूटता नहीं और जानने में आ रहा है
इसलिए आनंद आ रहा है।

00:59:41.160 --> 00:59:47.936
क्योंकि ज्ञान और अतीन्द्रिय आनंद के
अविनाभावी संबंध है।

00:59:47.960 --> 01:00:08.416
विषय-कषाय की बात, आज अच्छी निकली।
मुमुक्षु:- अच्छी निकली।

01:00:08.440 --> 01:00:19.376
उत्तर: पर को मैं जानता नहीं। भाई! यह बात सत्य है।
विषय को जीतने का तुझे प्रकार बताते हैं।

01:00:19.400 --> 01:00:26.736
तू विषय को नहीं जीत सका.. 'मैं पर को जानता हूँ'-
वो तो विषय आधीन हो गया, वो तो है अनंतकाल से।

01:00:26.760 --> 01:00:31.016
आहाहा! वह तो काम-भोग-बंधन की कथा है।

01:00:31.040 --> 01:00:37.976
मुमुक्षु:- दुःखरूप है।
उत्तर:- दुःखरूप है। मैं पर को जानता हूँ और
पर को करता हूँ, ये काम-भोग-बंधन की कथा है।

01:00:38.000 --> 01:00:46.256
मुमुक्षु:- इसमें ही अनंत परावर्तन हुए हैं।
उत्तर:- यह स्टीकर है न!
मुमुक्षु:- जी भाई, मुक्ति का कारण है।

01:00:46.280 --> 01:00:53.376
उत्तर:- ये बस। महामंत्र है!
आज यह बात उसमें घटित की न हमने।

01:00:53.400 --> 01:00:56.196
घटित हुई, एकदम घटित हुई,
बिलकुल शुद्ध घटित हुई हों!

01:00:56.220 --> 01:01:02.576
मुमुक्षु:- बिलकुल शुद्ध पूरी। सहजपने ही घटी इसमें।
उत्तर:- हाँ, सहजपने घटी।

01:01:02.600 --> 01:01:08.456
कोई प्रकार उसका लेकर नहीं।
यह आया इसमें से। आहाहा!

01:01:08.480 --> 01:01:16.036
विषयों की तरफ झुकता है। दाह होती है इसलिए
दाह मिटाने के लिए विषयों की तरफ झुकता है।

01:01:16.060 --> 01:01:22.256
आहाहा! जानने की इच्छा बंद कर दे।

01:01:22.280 --> 01:01:26.656
टोडरमल साहब ने बहुत अच्छी बात की है।
विषय और कषाय की व्याख्या की है।

01:01:26.680 --> 01:01:33.936
पर को जानने की इच्छा, वह विषय। और कषाय
अनुसार करने की इच्छा, वह कषाय।

01:01:33.960 --> 01:01:45.096
विषय और कषाय की व्याख्या की। इच्छा है,
दोनों में इच्छा है। करने की इच्छा और जानने की इच्छा।

01:01:45.120 --> 01:02:05.576
यथार्थपने जो पर को जानता नहीं, (उसमें) विषय पर जीत होती है।
मुमुक्षु:- विषय पर जीत होती है।

01:02:05.600 --> 01:02:10.676
उत्तर:- विषय पर जीत हो जाने पर कषाय पर भी जीत हो जाएगी।
क्योंकि जानता नहीं, तो करना?

01:02:10.700 --> 01:02:14.536
इसको मैं जानता नहीं तो इसको करने की कहाँ बात रही।

01:02:14.560 --> 01:02:20.336
राग को जानता ही नहीं तो राग को करने की बात कहाँ रही।

01:02:20.360 --> 01:02:28.736
आहाहा! जाने हुए का श्रद्धान होता है।
जानना बंद होगा तो श्रद्धा नहीं होगी, मिथ्या।

01:02:28.760 --> 01:02:43.216
यह बात उन्होंने ली है कि इन्द्रियज्ञान
जिसको जानता है उसे अपना मानता है।

01:02:43.240 --> 01:02:54.016
यहाँ से संसार खड़ा हुआ।
मुमुक्षु:- मोक्षमार्ग प्रकाशक में लिखा है।

01:02:54.040 --> 01:02:57.936
उत्तर:- मोक्षमार्गप्रकाशक की ही बात कर रहा हूँ।
बात उन्होंने बहुत अच्छी ली है।

01:02:57.960 --> 01:03:06.136
इन्द्रियज्ञान अमूर्तिक ऐसे आत्मा को तो
जानता नहीं और जिसको जानता है मूर्तिक आदि देहादि को,

01:03:06.160 --> 01:03:11.656
उनको अपना माने बिना रहता नहीं।
बहुत अच्छा वाक्य है। सुनेहरा!

01:03:11.680 --> 01:03:14.680
बोलो परम उपकारी पूज्य सद्गुरुदेव की जय हो!