﻿WEBVTT

00:01:22.280 --> 00:01:32.576
यह श्री समयसार जी परमागम शास्त्र है।
उसका लास्ट का, अंतिम, परिशिष्ठ अधिकार है।

00:01:32.600 --> 00:01:40.056
उसमें २७१ नंबर का कलश है।
अमृतचंद्राचार्य भगवान ने लिखा (है)।

00:01:40.080 --> 00:01:51.856
उसके ऊपर अपने उपकारी पूज्य गुरुदेव ने व्याख्यान
किया है। उस व्याख्यान का स्पष्टीकरण चलता है।

00:01:51.880 --> 00:02:04.536
 ये, आत्मा की दो प्रकार की भूलें अनादिकाल से
चलती आ रही है। भूल समयवर्ती है।

00:02:04.560 --> 00:02:15.416
भूल त्रिकालवर्ती नहीं होती है। इसलिए आत्मभान
होने से वो भूल निकल जाती है, टल जाती है।

00:02:15.440 --> 00:02:28.336
दो प्रकार की भूलें क्या हैं? कि एक तो भगवान
जो आत्मा है अपना, वो स्वभाव से अकर्ता, ज्ञायक,

00:02:28.360 --> 00:02:38.176
ज्ञाता होने पर भी, परिणाम का कर्ता मानता है।
पर का कर्ता तो है ही नहीं।

00:02:38.200 --> 00:02:50.096
पर के करने की बात तो उपचार से भी निकल
गई है। व्यवहार से भी पर का कर्ता नहीं है।

00:02:50.120 --> 00:03:04.676
मगर जो परिणमता है, वो परिणाम का आत्मा
कर्ता है, ऐसा उपचार, अकर्ता आत्मा पर आता है।

00:03:04.700 --> 00:03:08.756
है उपचार का कथन।

00:03:08.780 --> 00:03:21.236
टोडरमलजी जी साहब ने कहा कि यथार्थ का नाम
निश्चय और उपचार का नाम व्यवहार, ऐसा कहा है, बस।

00:03:21.260 --> 00:03:33.016
दो बात कही सुनहरी। तो एक तो वो भूल हो गई
आत्मा की, अनंतकाल से, कि अपना जो परिणाम,

00:03:33.040 --> 00:03:40.656
पराश्रित हो या स्वाश्रित परिणाम हो,
कोई भी परिणाम हो, परिणाम मात्र!

00:03:40.680 --> 00:03:56.956
परिणाम का कर्ता परिणाम होने पर भी और आत्मा
अकर्ता होने पर भी, आत्मा को, ये देह मेरा परिणाम है

00:03:56.980 --> 00:04:04.776
और मैं उसको करता हूँ (ऐसा मानता है), क्योंकि दृष्टि
पर्याय पर है उसकी। अकर्तास्वभाव पर दृष्टि नहीं है,

00:04:04.800 --> 00:04:13.616
ऐसे उसको भ्राँति हो गई कि मैं परिणाम का
कर्ता हूँ, वो अज्ञान है, अध्यवसान है।

00:04:13.640 --> 00:04:25.536
वो अनंतदुःख का कारण है, कर्ताबुद्धि। वो प्रथम
में प्रथम छोड़ने लायक है, अकर्ता का लक्ष्य करके।

00:04:25.560 --> 00:04:32.616
एक तो यह भूल,
है अकर्ता मानता है कर्ता।

00:04:32.640 --> 00:04:51.056
दूसरी भूल, प्रत्येक जीव, प्रत्येक समय में स्व को
जानता होने पर भी, मैं परको जानता हूँ, ऐसा मानता है,

00:04:51.080 --> 00:05:00.496
उसका नाम भ्राँति है। जैसे परिणाम का कर्ता (परिणाम)
होने पर भी, परिणाम का मैं कर्ता हूँ, ऐसा माने,

00:05:00.520 --> 00:05:06.896
तो वो मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी, वो पापी है।

00:05:06.920 --> 00:05:16.896
मिथ्यात्व का नाम पाप है
और प्रत्येक जीव, भव्य हो कि अभव्य,

00:05:16.920 --> 00:05:23.616
एकेन्द्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इन्द्रिय,
पंचेन्द्रिय, संज्ञी, असंज्ञी, जीवमात्र,

00:05:23.640 --> 00:05:38.456
प्रत्येक समयमें प्रत्येक समय, स्व को जानता
होने पर भी मानता है कि मैं पर को जानता हूँ,

00:05:38.480 --> 00:05:47.096
उसका नाम भ्राँति है।
शास्त्रीय भाषा में उसका नाम अध्यवसान है,

00:05:47.120 --> 00:05:52.296
मिथ्यादर्शन है, मिथ्याज्ञान है, मिथ्याचारित्र है।

00:05:52.320 --> 00:06:02.096
तो अभी तीन महीने का कोर्स, पहले तो अकर्ता में
आना चाहिए और अकर्ता में जो उत्तीर्ण (पास) हो गया,

00:06:02.120 --> 00:06:10.696
(तो) दूसरा (कि) स्वप्रकाशक ज्ञान है,
पर को जानता नहीं है, जाननहार को ही जानता है।

00:06:10.720 --> 00:06:21.376
प्रत्येक समय, प्रत्येक जीव स्व को जानता ही है।
एक समय ऐसा नहीं कि कोई जीव अपने

00:06:21.400 --> 00:06:29.496
ज्ञायक आत्मा को जानता नहीं है, ऐसा एक
समय भी है नहीं। आनेवाला नहीं है।

00:06:29.520 --> 00:06:41.336
जो अपना भगवान आत्मा जानने में न आवे, तो आत्मा के
अंदर एक प्रमेयत्व नामका, ज्ञेयत्व नामका जो धर्म है,

00:06:41.360 --> 00:06:49.256
उसका नाश हो जाता है। तो धर्म का नाश तो कभी
होनेवाला नहीं है। इसलिए ज्ञायक आत्मा

00:06:49.280 --> 00:06:54.056
में प्रमेयत्व, ज्ञेयत्व नाम का
अपना धर्म है, निरपेक्ष,

00:06:54.080 --> 00:07:03.376
इसलिए अपनी ज्ञान की पर्याय में जानने में
आ रहा है और ज्ञानका जो धर्म जानना है,

00:07:03.400 --> 00:07:09.236
तो ज्ञान जानता है
और ज्ञायक जानने में आ रहा है।

00:07:09.260 --> 00:07:18.856
ऐसा ज्ञाता-ज्ञेय का (संबंध है)। है तो निश्चय,
भेद करो तो व्यवहार है। क्या कहा?

00:07:18.880 --> 00:07:32.376
समय-समय पर अपने उपयोग में, राग में नहीं...
राग तो अँधा है और राग जीव का परिणाम भी नहीं है।

00:07:32.400 --> 00:07:43.936
मगर जो उपयोग है लक्षण, वो समय-समय पर प्रगट
होता है और उस उपयोग में भगवान आत्मा,

00:07:43.960 --> 00:07:51.056
उपयोग में उपयोग है।
उपयोग में उपयोग आता नहीं है,

00:07:51.080 --> 00:07:57.536
उपयोग में उपयोग है। स्वीकार करता है,
तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:07:57.560 --> 00:08:10.076
तो अपना जो उपयोग है, उस उपयोग में भगवान आत्मा
जानने में आ रहा है, प्रत्येक जीव को प्रत्येक समय में,

00:08:10.100 --> 00:08:24.336
भव्य हो कि अभव्य हो। और आत्मा का ज्ञान जानता है
और ज्ञायक उसमें जानने में आता है, ऐसा। आहाहा!

00:08:24.360 --> 00:08:31.376
ऐसा फंक्शन अनादि-अनंत चालू है।
आहाहा! फंक्शन यानि प्रक्रिया।

00:08:31.400 --> 00:08:38.616
प्रकाश में सूर्य समय-समय
पर प्रसिद्ध हो रहा है।

00:08:38.640 --> 00:08:45.416
वो सूर्य को नहीं देखता है और प्रकाश के द्वारा
मकान को देखता है। यह दिखता है मेरे को (मकान),

00:08:45.440 --> 00:08:54.496
तो प्रकाश भी गया और प्रकाशक भी चला गया।
तो समय-समय पर प्रत्येक जीव, प्रत्येक समय में

00:08:54.520 --> 00:09:03.376
स्व को जानता हुआ ही परिणमता है,
मगर स्वीकार नहीं करता है।

00:09:03.400 --> 00:09:07.616
मानता (नहीं) है। दृष्टि पर (के ऊपर)
पर है ना, अनादिकाल से।

00:09:07.640 --> 00:09:16.056
तो मैं पर को जानता हूँ, उसका नाम भावबंध है।
भावबंध की पराकाष्ठा!

00:09:16.080 --> 00:09:22.156
बंध अधिकार में आचार्य भगवानने, समर्थ आचार्य हो गए
जिनका नाम तीसरे (मंगलम् कुंदकुंदाद्यो, नंबर पर है)।

00:09:22.180 --> 00:09:29.256
पर को जानना, पर को जानना अध्यवसान,
महापाप है। कौन कहे समर्थ आचार्य के बिना?

00:09:29.280 --> 00:09:32.376
उनका तीसरा नाम ही यथार्थ है।

00:09:32.400 --> 00:09:41.516
बंध अधिकार में कहा कि जैसे कोई आत्मा
ऐसा माने कि मैं पर को मार सकता हूँ,

00:09:41.540 --> 00:09:49.756
मार सकता हूँ, सुखी-दुःखी कर सकता हूँ,
हाथ हिला सकता हूँ, ये जीभ हिला सकता हूँ,

00:09:49.780 --> 00:09:54.616
शब्द निकाल सकता हूँ,
पर को मैं उपदेश दे सकता हूँ,

00:09:54.640 --> 00:10:04.196
वो पर का कर्ता मानता है और ये अध्यवसान,
भावबंध, मिथ्यात्व तो है ही।

00:10:04.220 --> 00:10:11.016
मगर एक दूसरा मिथ्यात्व का प्रकार,
अपूर्व, उन्होंने लिख दिया

00:10:11.040 --> 00:10:21.256
कि जो जिनागम में दूसरे शास्त्र में मिलना कठिन है।
है तो सही। आहाहा! सबमें है वो तो बात।

00:10:21.280 --> 00:10:33.136
आचार्य भगवान ने कहा जैसे मैं मार सकता हूँ, वो पाप है।
पर को मारने का अभिप्राय, श्रद्धा का दोष (है),

00:10:33.160 --> 00:10:38.576
ऐसे (ही) मैं पर को जानता हूँ (वह दोष है)।
किसको जानता हूँ?

00:10:38.600 --> 00:10:45.816
छहद्रव्य को जानता हूँ। जो सर्वज्ञ भगवान ने कहा,
ऐसे जो छहद्रव्य हैं, अस्तिरूप से,

00:10:45.840 --> 00:10:53.136
उनको मैं जानता हूँ, वह पापी मिथ्यादृष्टि (है)।
अध्यवसान हो गया उसको, एकत्व हो गया,

00:10:53.160 --> 00:11:00.976
अपने को, अपने को जानता है स्व को और मानता है
पर को, इसका नाम भ्राँति, अज्ञान, मिथ्यादर्शन है।

00:11:01.000 --> 00:11:08.376
तो सचमुच जिसको आत्मा का अनुभव करना हो,
तो उसको दो भूल टालनी (मिटानी) चाहिए

00:11:08.400 --> 00:11:17.016
कि मैं तो ज्ञाता हूँ, कर्ता (नहीं हूँ)। परिणाम
होने योग्य होता है और जाननहार जानने में

00:11:17.040 --> 00:11:22.656
आता है, समय-समय पर।
ये भेदज्ञान की बात है।

00:11:22.680 --> 00:11:32.176
करने की बात तो दूर रहो, मगर अभी जानने के
प्रकार की वो बात गुरुदेव ने बताई।

00:11:32.200 --> 00:11:41.016
कि (क्या) आत्मा पर को जानता है? समय-समय
पर जानने में आता है ज्ञान अथवा ज्ञायक।

00:11:41.040 --> 00:11:48.076
भेद से ज्ञान जानने में आता है। अभेद से ज्ञायक
जानने में आ रहा है, प्रत्येक समय।

00:11:48.100 --> 00:11:58.016
एक समय ऐसा नहीं है कि जो आत्मा जानने में नहीं आवे।
आहाहा! ऐसा फंक्शन, प्रक्रिया, अनादि-अनंत चालू है।

00:11:58.040 --> 00:12:01.456
स्वीकार करता है तो शुद्धोपयोग,
सम्यग्दर्शन हो जाता है।

00:12:01.480 --> 00:12:06.976
और मैं पर को जानता हूँ, (इसमें) मिथ्यादर्शन तो है,
अनंतकाल से, वो चालू रहता है।

00:12:07.000 --> 00:12:13.176
तो पर को जानने का बंद कर दे। यानि अभिप्राय में
छोड़ दे, (ऐसा मान) कि मैं पर को जानता नहीं हूँ।

00:12:13.200 --> 00:12:20.696
पर को जाननेवाला दूसरा है और स्व को जाननेवाला
दूसरा है। पर को जाननेवाला इन्द्रियज्ञान है।

00:12:20.720 --> 00:12:30.156
मैं पर को नहीं जानता हूँ। मैं तो मेरे आत्मा को ही
जानता हूँ। आहाहा! ऐसी अपूर्व चीज़ इसमें आ गई।

00:12:30.180 --> 00:12:36.136
अपने भाग्यवशात् ये व्याख्यान छप गया।
(कैसेट) टेप में तो था,

00:12:36.160 --> 00:12:44.656
मगर छपकर निकल (गया), बाहर में निकल गया।
११वें भाग का है। उसका ये कॉपी है। आहाहा!

00:12:44.680 --> 00:12:56.956
ट्रू कॉपी है। गुरुदेव के शब्द की ट्रू कॉपी। एक भी
शब्द आगे-पीछे, अधिक-कम, विपरीति बिल्कुल है नहीं।

00:12:56.980 --> 00:13:03.776
कोई निकाल लेना शब्द और कोई शब्द डाल देना,
ओहोहो! वो तो महापापी है।

00:13:03.800 --> 00:13:12.096
ज्ञानावरणीय का कर्म-बंध उसको हो जाता है।
ज्ञानी की वाणी में फेरफार करना, वो महापाप है।

00:13:12.120 --> 00:13:22.376
अभी पैरेग्राफ चलता है,
<b>ज्ञेयों के आकार की झलक ज्ञान में आने पर,</b>

00:13:22.400 --> 00:13:32.376
<b>ज्ञेयों के आकार की झलक ज्ञान में आने पर,
ज्ञान ज्ञेयाकार दिखता है,</b> क्या कहा?,

00:13:32.400 --> 00:13:43.056
ज्ञेयाकार, ये ज्ञान, ज्ञेयाकार हो गया, ऐसा दिखता है।
<b>परंतु यह ज्ञान की ही कल्लोलें हैं।</b>

00:13:43.080 --> 00:13:49.856
ज्ञेय की तरंगें नहीं हैं।
<b>देखो, ज्ञान ज्ञेयाकार है- ऐसा नहीं,</b>

00:13:49.880 --> 00:13:58.116
<b>वह तो ज्ञेय को जानने के प्रति वैसे ज्ञानाकाररूप
ज्ञान स्वयं ही हुआ है।</b> आहाहा!

00:13:58.140 --> 00:14:05.176
क्या कहते हैं? तो वो ज्ञान है, अपना आत्मा उसमें
जानने में आ रहा है, इसलिए वो ज्ञानाकार ही है।

00:14:05.200 --> 00:14:12.376
मगर ज्ञेय के लक्ष्यवाला ऐसा मानता है कि
ये मेरा ज्ञान, ज्ञेयाकार हो गया।

00:14:12.400 --> 00:14:21.936
ज्ञेयका जो स्वरूप है, ऐसा मैं हो गया। रागको जाना तो
मैं रागी हो गया, वो तो गलती है। रागी हुआ नहीं है।

00:14:21.960 --> 00:14:30.736
वो तो ज्ञानमय है और ज्ञानमय ही रहनेवाला है।
कभी तीनकाल में रागमय होनेवाला है ही नहीं।

00:14:30.760 --> 00:14:33.856
आहाहा! भ्राँति है तेरी।

00:14:33.880 --> 00:14:40.076
<b>वह तो ज्ञेय को जानने के प्रति
वैसे ज्ञानाकाररूप ज्ञान स्वयं ही हुआ है,</b>

00:14:40.100 --> 00:14:46.936
स्वयं अपने से, अपने को जानता है।
आत्मा, आत्मा को जानते हुए ही परिणमता है।

00:14:46.960 --> 00:14:52.796
पर को जानता हुआ परिणमता ही नहीं है।
पर को जाननेवाला इन्द्रियज्ञान है

00:14:52.820 --> 00:14:57.656
और स्व को जाननेवाला स्व-संवेदनज्ञान,
आत्मज्ञान है।

00:14:57.680 --> 00:15:02.256
<b>वह तो ज्ञेय को जानने के प्रति वैसे
ज्ञानाकार से ज्ञान स्वयं ही हुआ है,</b>

00:15:02.280 --> 00:15:09.656
<b>उसमें ज्ञेय का कुछ है ही नहीं।</b>
इसका अर्थ, ज्ञेय, ज्ञान का कर्ता तो नहीं है

00:15:09.680 --> 00:15:18.376
मगर ज्ञान की उत्पत्ति में परज्ञेय निमित्त भी नहीं है।
निमित्त से निरपेक्ष उपादान काम करता है।

00:15:18.400 --> 00:15:22.496
शास्त्र निमित्त नहीं है, आत्मज्ञान की उत्पत्ति में।

00:15:22.520 --> 00:15:31.176
अरे! जिनवाणी में तो जगह-जगह लिखा है कि
ज्ञान में निमित्त है, वो भूतनैगमनय का कथन है।

00:15:31.200 --> 00:15:38.856
जहाँ तक शास्त्र प्रति, जिनवाणी प्रति लक्ष्य रहता है,
तहाँ तक आत्मज्ञान प्रगट नहीं होता है।

00:15:38.880 --> 00:15:47.256
हाँ! जिनवाणी ने कहा कि मेरा लक्ष्य छोड़ दे,
उसने माना। जिनवाणी ने कहा, उसने मान लिया।

00:15:47.280 --> 00:15:53.336
जिनवाणी का लक्ष्य, द्रव्यश्रुत का लक्ष्य छोड़ दिया
और आत्मा का लक्ष्य किया,

00:15:53.360 --> 00:16:01.136
तो भावश्रुतज्ञान में आत्मा का अनुभव हो गया,
तो कहा जाता है कि शास्त्र से आत्मज्ञान हुआ

00:16:01.160 --> 00:16:08.976
क्योंकि भूतनैगमनय लागू पड़ती है।
यानि एक समय के पहले वो शास्त्र पढ़ता था।

00:16:09.000 --> 00:16:14.736
शास्त्र का लक्ष्य छूट गया। छोड़ा नहीं, छूट गया।
इधर (आत्मा) का लक्ष्य आता है तो

00:16:14.760 --> 00:16:20.896
(शास्त्र का लक्ष्य) छूट जाता है, तो अनुभूति
होती है। आहाहा! समयसार मेरा उपकारी है।

00:16:20.920 --> 00:16:27.396
द्रव्यश्रुत वाणी, जिनेन्द्र भगवान की वाणी को (मैं)
नमस्कार करता (हूँ) क्योंकि आपकी, आहाहा!

00:16:27.420 --> 00:16:33.616
कृपा से, गुरु की कृपा से, जिनवाणी की कृपा से,
मेरे को आत्मदर्शन हुआ, तो आपने ही आत्मा दिया (है)।

00:16:33.640 --> 00:16:36.896
आपसे ही मुझे आत्मज्ञान हो गया।

00:16:36.920 --> 00:16:42.296
ऐसे उपकारी जीव,
उपकार भूलता नहीं है, मगर सचमुच तो

00:16:42.320 --> 00:16:48.456
निमित्त से उपादान में कार्य होता नहीं है।
तीन काल में नहीं होता है।

00:16:48.480 --> 00:16:55.496
निमित्त से निरपेक्ष उपादान कार्य करता है। उपादान के
कार्य में निमित्त की बिल्कुल अपेक्षा नहीं है।

00:16:55.520 --> 00:17:04.856
निमित्त अकिंचित्कर है। है, निमित्त भले हो,
मगर निमित्त कर्ता बनता नहीं है।

00:17:04.880 --> 00:17:11.296
<b>वह तो ज्ञेय को जानने के प्रति...
यह ज्ञेय का उसमे कुछ भी नहीं।</b>

00:17:11.320 --> 00:17:20.296
<b>ज्ञेय ज्ञानमे घुसा है, आया है, ऐसा है ही नहीं।
अर्थात् ज्ञान, ज्ञेयरूप होता है</b>

00:17:20.320 --> 00:17:31.896
<b>ऐसा है ही नहीं है।
ऐसा है ही नहीं है।</b> आहाहा!

00:17:31.920 --> 00:17:38.416
ज्ञेय से ज्ञान होता है, शास्त्र से ज्ञान (होता है)।
भाई! वो व्यवहारनय का कथन है।

00:17:38.440 --> 00:17:44.736
कुशास्त्र ज्ञान में निमित्त होता नहीं है,
सत्शास्त्र निमित्त होता है।

00:17:44.760 --> 00:17:49.316
तो निमित्त का आँकड़ा देने के
लिए ऐसा कहा जाता है

00:17:49.340 --> 00:17:55.616
और अनुभव होने के पहले वो देव-गुरु-शास्त्र
का लक्ष्य, उसको होता ही है।

00:17:55.640 --> 00:18:01.536
देशना-लब्धि सुनता है, शास्त्र पढ़ता है,
मगर शास्त्र में आया

00:18:01.560 --> 00:18:10.616
कि <b>परलक्ष्य अभावात्, चंचलता रहितम्,
(अचलम्) ज्ञानम्।</b> ज्ञान का लक्षण बताया,

00:18:10.640 --> 00:18:18.176
<b>परलक्ष्य अभावात्,</b> यानि शास्त्र के
लक्ष्य से ज्ञान उत्पन्न होता नहीं है।

00:18:18.200 --> 00:18:24.496
<b>परलक्ष्य अभावात्, चंचलता रहितम्
अचलम् ज्ञानम्।</b> ज्ञान, आत्मज्ञान अचल है।

00:18:24.520 --> 00:18:28.136
इसमें चंचलता नहीं है।
मानसिक-ज्ञान में चंचलता है।

00:18:28.160 --> 00:18:34.576
आत्मिकज्ञान, जैसे आत्मा स्थिर है, ऐसे आत्मा का
ज्ञान भी स्थिर हो जाता है। अखंड हो जाता है।

00:18:34.600 --> 00:18:40.696
<b>ऐसा है ही नहीं; अर्थात् ज्ञान,
ज्ञेयरूप होता है- ऐसा है ही नहीं।</b>

00:18:40.720 --> 00:18:51.856
<b>ज्ञान, ज्ञानाकार ही है, ज्ञान, ज्ञानाकार ही है,
ये ज्ञान की ही कल्लोलें हैं।</b>

00:18:51.880 --> 00:18:55.456
वे ज्ञान की ही तरंगे हैं।
ज्ञान की ही पर्याय है।

00:18:55.480 --> 00:19:00.536
ज्ञान की ही पर्याय, भेद अपेक्षा से
ज्ञान की पर्याय को जानती है

00:19:00.560 --> 00:19:06.236
और ज्ञान की पर्याय अभेद अपेक्षा से
अभेद आत्मा को जानती है। आहाहा!

00:19:06.260 --> 00:19:13.936
पर्याय सहित, हो। आहाहा! पर्याय रहित
होने पर भी पर्याय सहित का ज्ञान होता है।

00:19:13.960 --> 00:19:22.196
पर्याय रहित का श्रद्धान और पर्याय
सहित का ज्ञान, समय एक। आहाहा!

00:19:22.220 --> 00:19:32.416
उसमें निश्चय-व्यवहार सम्यक्एकांतपूर्वक अनेकांत
सब आ जाता है। कोई दोष नहीं है। निर्दोष कथन है।

00:19:32.440 --> 00:19:40.296
<b>आहाहा! कैसा भेदज्ञान कराया है!</b>
गुरुदेव को प्रमोद आ गया! आहाहा!

00:19:40.320 --> 00:19:48.736
इस कलश में आचार्य भगवान ने कैसा भेदज्ञान
कराया है। <b>वीतरागमार्ग बहुत सूक्ष्म है, भाई!</b>

00:19:48.760 --> 00:20:00.736
आहाहा! <b>ज़रा धीरज रखकर सुन।</b> धीरज
रखकर सुन यानि तेरा पक्ष एक बाजू अभी रख दे।

00:20:00.760 --> 00:20:07.616
समुद्र में बाद में फेंकना।
जो यह सही लगे तो वो फेंक देना।

00:20:07.640 --> 00:20:11.076
जहाँ तक यह सही न लगे तहाँ तक रख,
बाजू में रख। तेरा जो पक्ष है

00:20:11.100 --> 00:20:19.296
तेरा जो पक्ष है कि मैं पर का कर्ता हूँ और मैं पर का
ज्ञाता हूँ, ऐसे पक्ष को एक बाजू थोड़ा टाइम रख

00:20:19.320 --> 00:20:25.376
और हमारी बात धीरज से सुन। और (अगर)
हमारी बात तुझको जँचे और आत्मानुभव हो जाए,

00:20:25.400 --> 00:20:34.736
तो तेरे पक्ष को समुद्र में डाल देना। यानि बात,
बाद में जयपुर में आवे ही नहीं। समझे? आहाहा!

00:20:34.760 --> 00:20:42.536
<b>कैसा भेदज्ञान कराया है! वीतरागमार्ग
बहुत सूक्ष्म है, भाई! ज़रा धीरज रखकर सुन।</b>

00:20:42.560 --> 00:20:52.816
शांति से सुन, मध्यस्थ होकर सुन! पक्षपात छोड़कर
सुन! आत्महित करने के लिए सुन! आहाहा!

00:20:52.840 --> 00:21:03.976
दूसरे को समझाने के लिए मत सुन।
मैं सुन लूँ, बाद में दूसरे को समझा दूँ, ऐसा है नहीं।

00:21:04.000 --> 00:21:14.336
उसका तो ध्येय फिर गया। उसका तो ध्येय क्या हुआ? मैं
समझूँ और दूसरे को समझाऊँ, ध्येय फिर गया। आहाहा!

00:21:14.360 --> 00:21:23.576
ध्येय फिरा, तो ध्यान भी फिर गया, आशय अलग है।
मेरे को तो मेरा आत्मा का कल्याण करना है।

00:21:23.600 --> 00:21:29.816
जो फ़रमाते हैं ज्ञानी, उसको
समझने की मैं कोशिश करता हूँ।

00:21:29.840 --> 00:21:33.576
मेरे लिए समझना है,
दूसरे के लिए नहीं समझना (है)।

00:21:33.600 --> 00:21:41.856
<b>ज़रा धीर होकर सुन। कहते हैं- आत्मा,
पर का कुछ करे</b> रागादि का, देहादि का,

00:21:41.880 --> 00:21:49.456
जड़-कर्म का, आयुष्य बाँधे, भविष्य का...
भविष्य का आयुष्य तो बाँधता है कि नहीं?

00:21:49.480 --> 00:21:57.996
क्योंकि मोक्ष नहीं होता है,
तो स्वर्ग का आयुष्य तो बाँधता है कि नहीं?

00:21:58.020 --> 00:22:06.596
कि नहीं बाँधता है। बाँधनेवाला जुदा है, नहीं
बाँधनेवाला अंदर में जुदा रह जाता है।

00:22:06.620 --> 00:22:13.796
बंधन में राग का कार्य है, मेरा कार्य नहीं है। राग
निमित्त होता है, भगवान आत्मा निमित्त-कर्ता भी नहीं।

00:22:13.820 --> 00:22:18.536
उपादान-कर्ता तो नहीं है कर्म के बंध में,
मगर निमित्त-कर्ता भी

00:22:18.560 --> 00:22:23.296
नहीं है। निमित्त-कर्ता,
अज्ञानी का अज्ञानभाव है। आहाहा!

00:22:23.320 --> 00:22:31.496
<b>कुछ करे या पर से आत्मा में कुछ हो,</b>
कर्म के उदय से अंदर में कुछ हो जावे,

00:22:31.520 --> 00:22:40.016
<b>कुछ हो, यह बात तो जाने दे।</b>
शास्त्र से ज्ञान हुआ, ज्ञेय से ज्ञान हुआ,

00:22:40.040 --> 00:22:47.416
वो तो बात सब अभूतार्थनय की है।
<b>यह बात तो है ही नहीं</b>

00:22:47.440 --> 00:22:58.056
यानि दो पदार्थ के बीच में कर्ता-कर्म संबंध तो
है ही नहीं। निमित्त-नैमित्तिक संबंध भी है ही नहीं

00:22:58.080 --> 00:23:04.676
और ज्ञाता-ज्ञेय संबंध भी है ही नहीं।
अंदर में ज्ञाता-ज्ञेय का संबंध है,

00:23:04.700 --> 00:23:07.496
पर के साथ ज्ञाता-ज्ञेय का संबंध नहीं। आहाहा!

00:23:07.520 --> 00:23:16.056
कहाँ ले जाना है? अंदर में ले जाने की बात है।
अध्यात्म-शिविर है ना।

00:23:16.080 --> 00:23:24.716
इस शिविर का नाम अध्यात्म रखा, अध्यात्म।
यानि आत्मा की बात इधर आयेगी,

00:23:24.740 --> 00:23:37.116
आहाहा! विकथा की सख्त मनाई है। पर की पंचायत
(गपशप) में पड़ा। आहाहा! कषाय उत्पन्न होती है,

00:23:37.140 --> 00:23:46.296
... पर को कुछ बदल नहीं सकता । कुछ कर तो
सकता नहीं। बस! मुफ़्त में दुखी होता है।

00:23:46.320 --> 00:23:49.116
आहाहा! नुकसान उसको होता है।

00:23:49.140 --> 00:23:57.376
<b>यह बात तो है नहीं परंतु पर ज्ञान की
पर्याय,</b> परंतु पर ज्ञान की पर्यायमे ज्ञात हो,

00:23:57.400 --> 00:24:06.016
लेकिन परपदार्थ ज्ञानकी पर्यायमें ज्ञात हो,
<b>ज्ञान पर को जाने</b>

00:24:06.040 --> 00:24:14.936
और <b>परज्ञेय ज्ञान की पर्यायमे आ जाए,</b> (घुस
जाय) <b>प्रविष्ट होते हैं- ऐसा है नहीं।</b> तीन बात।

00:24:14.960 --> 00:24:24.356
फिर से। फिर से। हमारे प्रेमचंद जी कहें
फिर से कहो। समझे? आहाहा!

00:24:24.380 --> 00:24:32.376
आहाहा! पक्का करने के लिए, समझने में तो आवे,
मगर फिर से ज़रा। दोबारा कहो ऐसा, दोबारा कहो।

00:24:32.400 --> 00:24:36.936
यह मोस्ट इम्पोर्टेन्ट बात है।
दो लाइन में लिखी है।

00:24:36.960 --> 00:24:41.416
आपकी पास है उसमें लाइन बना देना,
लाल लाइन बना देना। आहाहा!

00:24:41.440 --> 00:24:45.536
क्या कहते हैं फ़रमाते हैं,
अनुभवी पुरुष?

00:24:45.560 --> 00:24:55.816
<b>पर ज्ञान की पर्याय में ज्ञात होते हैं,</b>
रागादि पर, देहादि पर, देव-गुरु-शास्त्र पर,

00:24:55.840 --> 00:25:07.096
अपने ज्ञान में जानने में आवें, ऐसा है नहीं।
ज्ञान पर को जाने, ऐसा भी है नहीं।

00:25:07.120 --> 00:25:14.616
अभी अंदर का जो ज्ञेय-ज्ञायक का जो व्यवहार है
ना, उसका निषेध करके निश्चय में चला जाता है।

00:25:14.640 --> 00:25:18.976
ज्ञेय-ज्ञायक का व्यवहार है,
वो व्यवहार अभूतार्थ है।

00:25:19.000 --> 00:25:29.016
लेकिन.... ये सूक्ष्म है। थोड़ा कठिन तो पड़े सबको।
मालूम है सब हमको। मालूम पड़ता है, क्या करें?

00:25:29.040 --> 00:25:35.996
इसमें लिखा है, गुरुदेव ने फ़रमाया है तो समझना
तो चाहिए ना? समझने की कोशिश करनी चाहिए।

00:25:36.020 --> 00:25:44.376
देर लगे तो भी ऐसा (ना) तो नहीं करना।
ज्ञानी के वचन के सामने, ऐसा (ना) नहीं करना।

00:25:44.400 --> 00:25:54.216
और समझने के बिना ऐसा (हाँ) भी नहीं करना। आहाहा!
मगर ऐसा (ना) तो नहीं करना, बस इतना है।

00:25:54.240 --> 00:26:04.616
क्या कहा? कि रागादि और
पुद्गलादि परपदार्थ ज्ञान के अंदर

00:26:04.640 --> 00:26:08.736
जानने में आते हैं, ये जानने में आते हैं,
ये जानने में आते हैं।

00:26:08.760 --> 00:26:12.256
ये जानने में आते हैं कि ज्ञायक जानने में आता है?
तेरी बुद्धि कहाँ गई?

00:26:12.280 --> 00:26:15.616
यह जानने में आता है तुझे कि
तेरा आत्मा जानने में आता है?

00:26:15.640 --> 00:26:17.756
यह जानने में आता है, राग तुझे जानने में आता है,

00:26:17.780 --> 00:26:24.136
कि राग जानने में आता है, उस समय तेरा आत्मा
जानने में आता है, यह ले ना। उसका क्या काम है?

00:26:24.160 --> 00:26:31.516
आहाहा! व्यवहार के पक्षवाले जीव को,
आहाहा! ऐसा ही लगता है

00:26:31.540 --> 00:26:37.096
कि भले मेरा आत्मा जानने में नहीं आता (है) मगर यह
(राग) तो जानने में आता है ना। यह जानने में आता है,

00:26:37.120 --> 00:26:45.816
उसके पक्ष से तेरा आत्मा जानने में आते हुए भी,
तेरा आत्मा तुझे प्रत्यक्ष होता नहीं (है)।

00:26:45.840 --> 00:26:49.496
राग प्रत्यक्ष हो जाता है। आहाहा!

00:26:49.520 --> 00:26:59.656
 डेढ़ लाइन हैं, अमृत जैसी हैं।
पर, ज्ञान की पर्याय में जानने में आवे, ऐसा नहीं है

00:26:59.680 --> 00:27:05.976
और आत्मा जानने में नहीं आवे, ऐसा नहीं है।

00:27:06.000 --> 00:27:11.776
आत्मा तो जानने में आवे, आवे, आवे
और पर जानने में आता ही नहीं (है)।

00:27:11.800 --> 00:27:18.656
ऐसा अस्ति-नास्ति-अनेकांत कर ले ना,
काम हो जाएगा तेरा। आहाहा!

00:27:18.680 --> 00:27:25.496
जो तन्मय होकर जानने में आता है, उसका निषेध
करता है और जो भिन्न हैं, रागादि, देहादि,

00:27:25.520 --> 00:27:31.296
वो मेरे ज्ञान में जानने में आते हैं।
लक्ष्य उसके ऊपर (लक्ष्य) है, ज्ञेय पर लक्ष्य है।

00:27:31.320 --> 00:27:41.416
<b>पर ज्ञान की पर्याय में ज्ञात होते हैं, ज्ञान पर को
जानता है,</b> अरे! ज्ञान पर को जाने कि स्व को जाने?

00:27:41.440 --> 00:27:50.336
मान्यता है कि मैं पर को जानता हूँ। पर जानने में
आता है और मैं पर को जानता हूँ। दोनों ही भूल हैं।

00:27:50.360 --> 00:27:58.016
<b>और परज्ञेय</b> अभी यह बात सूक्ष्म है।
वो थोड़ा प्रश्न में करना, प्रश्न-उत्तर में।

00:27:58.040 --> 00:28:04.636
आहाहा! खुलासा आएगा ज़्यादा। आहाहा!
समझ में न आवे तो। समझ में आ जावे, ऐसी बात है।

00:28:04.660 --> 00:28:11.836
नहीं आवे, ऐसी बात नहीं है। संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव हैं,
सर्वज्ञ स्वभावी, भगवान आत्मा हैं, सब।

00:28:11.860 --> 00:28:14.956
आहाहा! पर्याय को मत देखो। आहाहा!

00:28:14.980 --> 00:28:21.616
राग को मत देख, गौण कर दे। कर्म को, राग को,
कर्मकृत राग को गौण कर दे। आहाहा!

00:28:21.640 --> 00:28:31.316
<b>पर ज्ञान की पर्याय में ज्ञात होते हैं, ज्ञान पर को
जानता है और परज्ञेय ज्ञान की पर्याय में आते हैं,</b>

00:28:31.340 --> 00:28:42.656
रागादि ज्ञान की पर्याय में आ जावें, क्रोध आ जावे, दुःख
की पर्याय ज्ञान की पर्याय में आ जावे, ऐसा है ही नहीं।

00:28:42.680 --> 00:28:52.656
आहाहा! मगर जो मानता है कि मैं पर को जानता हूँ और
पर दुख, ज्ञान की पर्याय में आ गया,आत्मा में आ गया,

00:28:52.680 --> 00:28:58.416
उसको एकत्व हो गया, विभक्त नहीं हुआ।
एकत्व-विभक्त की बात चलती है।

00:28:58.440 --> 00:29:04.776
<b>ज्ञान की (पर्याय में पर ज्ञेय) प्रविष्ट होते हैं-
ऐसा है नहीं।</b> वस्तु-द्रव्य,

00:29:04.800 --> 00:29:15.496
<b>वस्तु-द्रव्य एक ज्ञायकभावरूप है, वह स्वयं
ज्ञान की पर्यायरूप, जाननक्रियारूप होता है,</b>

00:29:15.520 --> 00:29:23.656
ये ज्ञायकभाव है, अपने को जाने,
ऐसी ज्ञान की क्रिया समय-समय पर होती है।

00:29:23.680 --> 00:29:28.636
पर को जाने, ऐसी ज्ञान की पर्याय होती नहीं है।
अरे! क्या कहें?

00:29:28.660 --> 00:29:36.576
तो स्वपरप्रकाशकका क्या होगा? कि व्यवहारमय हो गया
और स्वपरप्रकाशकका पक्ष करे,तो अज्ञानमय हो गया।

00:29:36.600 --> 00:29:43.776
<b>वस्तु-द्रव्य एक ज्ञायकभावरूप है,
वह स्वयं ज्ञान की पर्यायरूप,</b>

00:29:43.800 --> 00:29:49.936
जाननक्रियारूप होता है, वह अपनी
स्वपरप्रकाशक की क्रिया है।

00:29:49.960 --> 00:29:57.656
स्वपर की प्रकाशक की क्रिया यानि ज्ञायक भी
जानने में आता है और परपदार्थ का प्रतिभास होता है।

00:29:57.680 --> 00:30:04.236
परपदार्थ जानने में आता है, ऐसा नहीं,
परपदार्थ का प्रतिभास होता है। दर्पण में जैसे

00:30:04.260 --> 00:30:11.216
अग्नि और बर्फ का प्रतिभास होता है, ऐसे (ही)
अपनी ज्ञान की स्वच्छ पर्याय में अपना ज्ञायक

00:30:11.240 --> 00:30:15.316
ज्ञानानंद परमात्मा भी जानने में (आता है),
प्रतिभासित होता है

00:30:15.340 --> 00:30:19.176
और वो भी प्रतिभासित होता है।
इस अपेक्षा से स्वपरप्रकाशक,

00:30:19.200 --> 00:30:29.316
और <b>क्रिया है। उसमें पर ज्ञात होते हैं-</b>
उसमें स्वपरप्रकाशक में, स्वपरप्रकाशक लिया है ना?

00:30:29.340 --> 00:30:35.096
उसमें पर जानने में आता है,
<b>ऐसा कहना, वह व्यवहार है</b>,

00:30:35.120 --> 00:30:41.816
आहाहा! स्वपरप्रकाशक में पर जानने में आता है,
ऐसा कहना व्यवहार है।

00:30:41.840 --> 00:30:50.436
सचमुच तो स्व और पर जिसमें प्रतिभासित होते हैं,
ऐसी एक ज्ञान की पर्याय जानने में आती है।

00:30:50.460 --> 00:30:58.656
ज्ञान की पर्याय में द्विरूपता है। स्व और पर का
प्रतिभास होवे, तो दो को ज्ञान नहीं जानता है।

00:30:58.680 --> 00:31:04.256
स्व का प्रतिभास और पर का प्रतिभास
दो को ज्ञान नहीं जानता है।

00:31:04.280 --> 00:31:09.296
दो (का) जिसमें प्रतिभास होता है,
ऐसी एक ज्ञान की पर्याय जानने में आती है।

00:31:09.320 --> 00:31:13.656
आहाहा! ऐसा है, सूक्ष्म तो है थोड़ा।

00:31:13.680 --> 00:31:22.816
<b>पर ज्ञात नहीं होता, ऐसा कहना वह व्यवहार
है,</b> पर जानने में आता है,ऐसा कहना वह व्यवहार है। <b>बस!</b>

00:31:22.840 --> 00:31:32.876
<b>पर ज्ञात नहीं होता, अपनी जाननक्रिया
जाननेरूप है, वह ज्ञात होती है!</b> आहाहा!

00:31:32.900 --> 00:31:37.016
स्व-पर दो जानने में नहीं आता है।
कहा जाता है दो जानने में आता है

00:31:37.040 --> 00:31:42.176
तो स्वपरप्रकाशक के नाम में भी भ्राँति हो गई।

00:31:42.200 --> 00:31:47.976
ऐसा कल बाबूजी का आया था, उसमें वो कहा

00:31:48.000 --> 00:31:55.016
कि स्वपरप्रकाशक के नाम में भी, आहाहा!
जीव भ्राँति कर लेता है। आहाहा!

00:31:55.040 --> 00:32:01.776
<b>अपनी जाननक्रिया जाननेरूप है,
वह ज्ञात होती है!</b>

00:32:01.800 --> 00:32:09.256
अपनी, ज्ञान की क्रिया किसकी है? ज्ञेय की है
कि आत्मा की? आत्मा की है। ज्ञान आत्मा का है।

00:32:09.280 --> 00:32:17.076
'आत्मा का ज्ञान होने से, ज्ञान वह आत्मा है।'
आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान वह (आत्मा है)। आहाहा!

00:32:17.100 --> 00:32:25.696
नींबू की खटास होने से खटास वह नींबू है।
नींबू की खटास होने से खटास वह नींबू है।

00:32:25.720 --> 00:32:35.616
पर नींबू डाला दाल में, तो दाल खट्टी हो गई।
ये खटास दाल की है, तो खटास दालमय हो गई।

00:32:35.640 --> 00:32:44.536
मगर खटास दालमय होती नहीं है। (नींबू) नींबूमय
(खटास को) छोड़ता ही नहीं है। आहाहा! समझे?

00:32:44.560 --> 00:32:54.756
नींबू की खटास होने से खटास नींबू ही है।
खटास और नींबू कहाँ जुदा है? एक (ही) है। आहाहा!

00:32:54.780 --> 00:33:00.536
ध्येय तत्व सिद्ध होता है। जिसको
ध्येय का पक्ष आ गया हो ना, पक्ष हों!

00:33:00.560 --> 00:33:05.676
उसको ये ज्ञेय की बात जचती नहीं है।
मेरे को सब मालूम है। आहाहा!

00:33:05.700 --> 00:33:10.136
ये पर्याय से सहित क्यों कहते हो आप?
गुरुदेव ने तो पर्याय से रहित कहा है।

00:33:10.160 --> 00:33:15.896
अरे! रहित भी कहा है और सहित भी कहा है।
दो बात उस पुरुष ने किया है।

00:33:15.920 --> 00:33:21.096
ज्ञान-गोष्ठी में शुरुआत में आया है कि
पर्यायसे आत्मा अनन्य अभेद है।

00:33:21.120 --> 00:33:29.096
ज्ञानगोष्ठी है ना, इधर से छपा हुआ। आहाहा! पर
पक्षवालों को ख्याल में नहीं आता है। पक्ष जहर है।

00:33:29.120 --> 00:33:42.736
आत्मा का पक्ष जहर है। वो समाज का या संस्था का या
मंडल का या गाँव का पक्ष तो जहर का बाप है। आहाहा!

00:33:42.760 --> 00:33:48.716
पंडितजी:- सही बात है!
उत्तर:- सही बात है! पंडितजी बोलते हैं, सही बात है।

00:33:48.740 --> 00:33:53.656
आहाहा! कौन किसका और किसका मंडल?
और किसका मुमुक्षु मंडल?

00:33:53.680 --> 00:34:03.016
और किसका प्रमुख और किसका ट्रस्टी? आहाहा!
और किसका? ये कम्प्युटर का मालिक कौन है?

00:34:03.040 --> 00:34:08.936
पाटनी जी साहब! आहाहा! भ्राँति है सब।

00:34:08.960 --> 00:34:16.216
अरे! इधर तो कहते हैं कि दृष्टि के
विषय का जो पक्ष आ गया, उससे क्या?

00:34:16.240 --> 00:34:22.656
आचार्य भगवान फ़रमाते हैं, जो दृष्टि के
विषय की मास्टरी जिनके पास है,

00:34:22.680 --> 00:34:30.376
उन्होंने कहा कि दृष्टि का विषय तेरे पास आ गया
कि मैं शुद्ध हूँ, अभेद हूँ, चिन्मात्र हूँ, ज्ञायक हूँ,

00:34:30.400 --> 00:34:37.556
उससे क्या? वो तो विकल्प है, वो तो पक्ष का
विकल्प (है) यानि अनंतानुबंधी का राग है।

00:34:37.700 --> 00:34:44.416
आहाहा! मिथ्यात्व तो गया नहीं
और आत्मज्ञान तो हुआ नहीं।

00:34:44.440 --> 00:34:50.816
आहाहा! पक्ष के नाम (चढ़ गया)। हाँ! इतना है।
पक्ष में आ जाता है, मगर आ जाता है।

00:34:50.840 --> 00:34:56.856
टिकता पक्ष नहीं है। स्वभाव का पक्ष आता है,
उसको पक्ष टिकता नहीं है

00:34:56.880 --> 00:35:00.776
और व्यवहार का पक्ष आता है,
वो तो टिक जाता है, वहाँ।

00:35:00.800 --> 00:35:09.016
आहाहा! व्यवहार का पक्ष आया और पक्षातिक्रान्त
हो (जाये), ऐसा नहीं बनेगा। व्यवहार का निषेध आवे,

00:35:09.040 --> 00:35:18.736
निश्चय का पक्ष आ जावे, तो पक्षातिक्रान्त होने
का चांस (संभावना) है, चांस (संभावना) है।

00:35:18.760 --> 00:35:29.076
<b>पर ज्ञात नहीं होता,</b> ओहो! परपदार्थ
जानने में नहीं आता। ये भगवान महावीर, ये प्रतिमा जी है।

00:35:29.100 --> 00:35:37.056
इधर उनकी प्रतिष्ठा हुई थी और मैं उस
टाइम इधर आया था। गोदीका जी सेठ ने

00:35:37.080 --> 00:35:43.436
सोलह लाख रुपए उस टाइम में खर्च किये थे।
सोलह लाख रुपया! उस टाइम का सोलह लाख!

00:35:43.461 --> 00:35:52.816
आज तो दो-तीन करोड़ हो गया। आहाहा! कितने
साल हुए, लगभग? चौबीस साल पहले की बात है।

00:35:52.840 --> 00:36:00.576
चौबीस साल पहले की बात है। गुरुदेव इधर आये थे,
 पधारे थे और यहाँ उस समय ज़रा तकलीफ़ थी।

00:36:00.600 --> 00:36:03.996
कर्फ्यू चलता था। उस समय में मैं आया था यहाँ।

00:36:04.020 --> 00:36:11.976
उस समय गुरुदेव का व्याख्यान आया। आहाहा! 
भगवान की प्रतिष्ठा, भगवान की प्रतिष्ठा के अवसर में,

00:36:12.000 --> 00:36:19.456
उपयोग में आत्मा प्रतिष्ठित हो जावे, ऐसी बात 
उन्होंने कह दी। क्या कहा? सूक्ष्म बात करता हूँ।

00:36:19.480 --> 00:36:24.296
आहाहा! यह कान से प्रत्यक्ष सुनी हुई बात है।

00:36:24.320 --> 00:36:34.656
गुरुदेव ने व्याख्यान में कहा कि निर्मल पर्याय का 
कर्ता (आत्मा) उपचार से भी नहीं है।

00:36:34.680 --> 00:36:43.016
निर्मल पर्याय का कर्ता उपचार से है, व्यवहार से है, 
परिणमता है, तो कर्ता है, ऐसा कहा जाता है।

00:36:43.040 --> 00:36:52.976
मगर शुद्धोपयोग में बाधक है, इसलिए उपचार से (भी)
कर्ता नहीं है, ऐसी बात आयी। मेरे को बहुत हर्ष आ गया,

00:36:53.000 --> 00:37:01.236
प्रमोद आ गया। तो वहाँ ठहरे थे वहाँ, जहाँ, वहाँ मैं
 गया, मेरे प्रमोद (को) जाहिर करने के लिए। आहाहा!

00:37:01.260 --> 00:37:07.696
मगर बहुत आदमी बैठे थे। वहाँ बातचीत, 
ऐसी स्थूल बातचीत चलती थी।

00:37:07.720 --> 00:37:14.516
(तो) मैंने कहा कि ये अवसर ठीक नहीं है। तो मैं 
चला आया। आहाहा! चौबीस साल पहले की बात!

00:37:14.540 --> 00:37:23.976
सम्यग्दर्शन का कर्ता उपचार से भी नहीं है
 क्योंकि वो कर्ता, पर्याय का कर्ता पर्याय है

00:37:24.000 --> 00:37:28.316
और आत्माको कर्ता कहना उपचार है।
 वहाँ रुक जाता है,

00:37:28.340 --> 00:37:32.596
तो सम्यग्दर्शन तो टिकता है, 
मगर शुद्धोपयोग होता नहीं है।

00:37:32.620 --> 00:37:41.236
इसलिए उपचार का निषेध करके शुद्धोपयोग में 
आ जाता है, सम्यग्दृष्टि। आहाहा! ऐसा है। ऐसा है।

00:37:41.260 --> 00:37:47.976
ऐसा नियमसार का परमार्थ प्रतिक्रमण है। 
उसमें भी, कर्ता नहीं, कारयिता नहीं, अनुमोदक नहीं,

00:37:48.000 --> 00:37:54.396
कारण भी नहीं हूँ मैं। समर्थ आचार्य भगवान!
 कर्ताबुद्धि तो निकल गयी है। आहाहा!

00:37:54.420 --> 00:37:59.256
मैं कर्ता नहीं हूँ इस परिणाम का, 
यह कहने का अवसर तो है नहीं।

00:37:59.280 --> 00:38:04.836
अकर्ता तो हो गया तो भी मैं कर्ता नहीं हूँ 
(ऐसा कहना), उसका क्या कारण (है)? आहाहा!

00:38:04.860 --> 00:38:10.336
बहुत मंथन चला, बहुत मंथन चला, आहाहा! 
श्रवणबेलगोला में था, दो महीने।

00:38:10.360 --> 00:38:19.336
वहाँ भाव आ गया, वो तो उपचार से कर्ता का निषेध 
कर दिया है कि निश्चय मोक्षमार्ग का आत्मा कर्ता है,

00:38:19.360 --> 00:38:26.496
ऐसा जो उपचार आता था, उपचार से मैं कर्ता नहीं 
हूँ, अकर्ता हूँ, तो शुद्धोपयोग हो जाता है। आहाहा!

00:38:26.520 --> 00:38:33.396
श्रेणी के सन्मुख आ जाता है। इस काल में श्रेणी 
नहीं है, बाकी (नहीं तो ऐसे निषेध से) श्रेणी आ जावे।

00:38:33.420 --> 00:38:39.996
उपचार से भी निर्मल पर्याय का कर्ता नहीं है 
क्योंकि आत्मा अकर्ता है। पर्याय का कर्ता पर्याय है।

00:38:40.020 --> 00:38:47.816
मैं कर्ता नहीं हूँ। मेरे को कर्ता कहना उपचार है।आहाहा!
 दूसरेके भाव को दूसरे का कहता है, व्यवहारनय।

00:38:47.840 --> 00:38:55.296
करे पर्याय को पर्याय और कहा साधक उसको करता है,
 निर्मल पर्याय को, उपचार से भी कर्ता नहीं (है)। आहाहा!

00:38:55.320 --> 00:39:00.796
ऐसी सूक्ष्म बात, चौबीस साल पहले 
इधर निकली थी, जयपुर में। आहाहा!

00:39:00.820 --> 00:39:09.336
<b>पर जाननेमें नहीं आता।</b> आहाहा! 
वो कठिन पड़ता है (कि) पर जानने में नहीं आता है।

00:39:09.360 --> 00:39:16.176
मेरे ऊपर बहुत उपसर्ग आया। समझे? उपसर्ग 
करनेवाला भी उधर सोनगढ़ में से निकला। आहाहा!

00:39:16.200 --> 00:39:21.136
बहुत उपसर्ग आया। क्या ये घड़ी नहीं जानने में 
आती है? देखो भैया! कितना बजा है?

00:39:21.160 --> 00:39:31.976
कि साहब! आठ को सत्तावन मिनट बजे हैं। तो क्या 
नहीं जानने में आई घड़ी? आहाहा! देखो भैया! ऐसा है।

00:39:32.000 --> 00:39:40.256
और आत्मा पर को नहीं जानता है, तो केवली 
भगवान को वो मानता नहीं है। ऐसा कहें। आहाहा!

00:39:40.280 --> 00:39:46.456
अज्ञानी की तो कोई मर्यादा होती नहीं है। 
समझते नहीं हैं। क्या करें? आहाहा!

00:39:46.480 --> 00:39:50.336
कौन जानता है? 
वो इन्द्रियज्ञान जानता है। मैं नहीं जानता हूँ।

00:39:50.360 --> 00:39:55.936
आत्मा, आत्मा को जानता है, इन्द्रियज्ञान पर को
 जानता है। दो भाग पड़ गया। चले जा। आहाहा!

00:39:55.960 --> 00:40:08.536
<b>पर जाननेमें नहीं आता, अपनी जाननक्रिया
 जाननेरूप है, वह जानने में आती है!</b>

00:40:08.560 --> 00:40:16.736
भेद अपेक्षा से। प्रदीपजी! वो भेद का कथन 
समझाने के लिए (है), है तो अभेद! क्या कहा?

00:40:16.760 --> 00:40:23.136
ज्ञान की पर्याय और ज्ञायक, 
ज्ञेय की अपेक्षा से अभेद ही है।

00:40:23.160 --> 00:40:31.696
तो भी समझाने के लिए कहा जाता है कि पर जाननेमें 
आता नहीं है, ज्ञान की पर्याय जानने में आती है

00:40:31.720 --> 00:40:39.676
क्योंकि अनार्य जीवों को अनार्य भाषा बिना, 
अभेद में भेद किए बिना समझा सकते नहीं।

00:40:39.700 --> 00:40:45.796
लेकिन भेद ग्रहण करने योग्य नहीं है। ज्ञानकी पर्याय ही
 जानने में आती है और ज्ञायक जानने में नहीं आता है,

00:40:45.820 --> 00:40:53.636
ये भेद का अवलंबन उसने किया। वो समझा नहीं।
 भेद के द्वारा अभेद में पहुँचाना था। आहाहा!

00:40:53.660 --> 00:41:01.396
कुछ न कुछ तर्क-वितर्क में चढ़ जाता है, आशय 
समझता नहीं है कि आशय ज्ञानी का ऊँचा है।

00:41:01.420 --> 00:41:07.736
ज्ञान की पर्याय को जो जानता है, तो ज्ञान की पर्याय और
 आत्मा अभेद होने से आत्मा जणित (जानने में आ) जाता है।

00:41:07.760 --> 00:41:11.896
आहाहा! पर्यायदृष्टि नहीं होती है।

00:41:11.920 --> 00:41:21.576
 <b>पर जानने में नहीं आता है, अपनी जाननक्रिया
 जाननेरूप है।</b> अपनी, हो! आत्मा को जानने की क्रिया,

00:41:21.600 --> 00:41:28.936
 इन्द्रियज्ञान की बात नहीं। आहाहा! इंद्रियज्ञान
 तो ज्ञान ही नहीं है, वो तो उसका नाम ज्ञेय है।

00:41:28.960 --> 00:41:39.216
मोहराजा ने रखा नाम ज्ञान और सर्वज्ञ भगवान ने कहा 
कि वो ज्ञेय है। समझे? आहाहा! ऐसे आठ कर्म हैं ज्ञेय,

00:41:39.240 --> 00:41:50.236
आठ कर्म हैं ज्ञेय और अज्ञानी जीव ने नाम रखा निमित्त।
 तो आठ कर्म इकट्ठा हुआ, उनकी सभा भरी।

00:41:50.260 --> 00:41:57.336
तो कहें कि हमारा नाम बिगाड़ दिया है, अज्ञानी ने।
 हम तो ज्ञेय हैं, निमित्त तो हैं ही नहीं। तो क्या करें?

00:41:57.360 --> 00:42:03.936
 तो प्रतिनिधि ने ठराव किया कि पाँच परमाणु 
इधर से जाओ सीमंधर भगवान के पास।

00:42:03.960 --> 00:42:12.476
फैसला लाओ कि हमारा नाम निमित्त है कि हमारा
 नाम ज्ञेय है। परज्ञेय! पर निमित्त है कि ज्ञेय है?

00:42:12.500 --> 00:42:21.736
वहाँ जाते ही सर्वज्ञ भगवान की वाणी में आया कि यहाँ 
तक क्यों आये? हमारी ब्रांच ऑफिस तो सोनगढ़ में है।

00:42:21.760 --> 00:42:29.296
तो सोनगढ़ का कोई मानता नहीं है इसलिए हम इधर
 आपके पास (आये हैं)। जाओ! आपका नाम ज्ञेय है,

00:42:29.320 --> 00:42:35.456
निमित्त नहीं है। जगत में कोई निमित्त जैसी 
बात ही नहीं हैं। सब उपादान हैं। जा!

00:42:35.480 --> 00:42:40.416
आहाहा! ये तो नैमित्तिक जिसको 
होता है, स्वभाव से च्युत होकर के

00:42:40.440 --> 00:42:47.256
राग होता है, तो परपदार्थ ज्ञेय होने पर भी 
नैमित्तिक की अपेक्षा से (उसको) निमित्त

00:42:47.280 --> 00:42:52.496
कहा जाता है। लक्ष्य वहाँ है, तो। आहाहा! ऐसी बात है।

00:42:52.520 --> 00:42:58.896
गुरुदेव का एक अभिनंदन ग्रंथ निकला था, 
उसमें मैंने वो लेख लिखा था। आहाहा!

00:42:58.920 --> 00:43:06.216
बहुत साल पहले की बात है। ७५वीं जन्मजयंती।
 मुंबई में है ना, तो बड़ा पुस्तक अभिनंदन का,

00:43:06.240 --> 00:43:13.256
उसमें ये लेख है। आहाहा! पाँच परमाणु गए वहाँ (विदेह 
क्षेत्र) कि साहब! हमारा नाम निमित्त है कि ज्ञेय है?

00:43:13.280 --> 00:43:22.556
तो ज्ञानी उसको निमित्त जानता है कि ज्ञेय? 
आठ कर्म ज्ञेय हैं।

00:43:22.580 --> 00:43:27.616
जो ज्ञेय हैं, तो निमित्त छूट गया, 
तो इधर नैमित्तिक राग भी

00:43:27.640 --> 00:43:33.556
छूट गया। इधर ज्ञान हो गया, ज्ञान का ज्ञेय 
व्यवहारनय से कहा जाता है। आहाहा!

00:43:33.580 --> 00:43:38.976
मुमुक्षु:- इधर निमित्त नहीं है। ज्ञेय को ही निमित्त कहा?
उत्तर:- ये ज्ञेय ही है। निमित्त नहीं है,

00:43:39.000 --> 00:43:44.416
ये ज्ञेय ही है। निमित्त मत लगाओ। 
निमित्त लगाने से नैमित्तिक इधर आ जाएगा।

00:43:44.440 --> 00:43:52.016
अभी नैमित्तिक की उत्पत्ति ही नहीं हो, तो (अगर) ज्ञेय 
मानो, तो इधर ज्ञान होगा। ज्ञेय जानो तो इधर ज्ञान होगा।

00:43:52.040 --> 00:43:57.296
निमित्त मानो तो इधर राग की 
नैमित्तिक अवस्था उत्पन्न होगी।

00:43:57.320 --> 00:44:03.536
आहाहा! सूक्ष्म बात है! 
अंदर में जाने की बात है। आहाहा!

00:44:03.560 --> 00:44:08.776
तो निमित्त का कथन तो बहुत आता है। कर्म की बात!

00:44:08.800 --> 00:44:15.856
अरे भाई! ये नैमित्तिक की सिद्धि करने के लिए 
उसका लक्ष्य पर ऊपर है। उसका आश्रय करता है,

00:44:15.880 --> 00:44:22.536
तो नैमित्तिक की अपेक्षा से (उसका) उपचार वहाँ 
आता है, नैमित्तिक का उपचार निमित्त पर आता है

00:44:22.560 --> 00:44:24.996
कि निमित्त है, इधर नैमित्तिक है। आहाहा!

00:44:25.020 --> 00:44:33.336
निमित्त-नैमित्तिक संबंध, वो ही संसार है। अरे! परके
 साथ ज्ञाता-ज्ञेय के संबंध का व्यवहार का जो पक्ष हो,

00:44:33.360 --> 00:44:40.296
तो वो भी संसार है। तो निमित्त-नैमित्तिक
 बात तो स्थूल में चली गयी। आहाहा!

00:44:40.320 --> 00:44:46.356
पैंतालीस साल के बाद चलती है ना बात।
 सूक्ष्म है बात! सूक्ष्म का अर्थ?

00:44:46.380 --> 00:44:53.936
नहीं समझ में आएगी, ऐसा नहीं जानना। 
उपयोग को सूक्ष्म करके, बराबर एकाग्र होकर,

00:44:53.960 --> 00:45:01.156
समझने की कोशिश करने से समझ में आ जाता है।
 नहीं समझ में आवे (क्या) इसलिए लिखा है?

00:45:01.180 --> 00:45:08.216
(क्या इसलिए) शास्त्र लिखा है समयसार, टीका 
समयसार की? तो नहीं कोई समझेगा इसलिए लिखा है?

00:45:08.240 --> 00:45:16.376
कि समझनेवाला होगा, इसलिए लिखा है। 
हमारे लिए लिखा है। समयसार में ऊपर हमारा नाम है।

00:45:16.400 --> 00:45:21.776
जो वाँचे-पढ़े, उसका नाम लिखा है।
 भारिल्ल जी पढ़ें, तो भारिल्ल जी का नाम है। ,

00:45:21.800 --> 00:45:26.416
पाटनी जी पढ़ें, तो उनका नाम है, ऊपर।
 हम पढ़ें तो हमारा नाम है। आहाहा!

00:45:26.440 --> 00:45:34.496
आहाहा! वो धर्म-पिता का पत्र आया है मेरे ऊपर, ४१५।
 ४१५ (गाथाएँ अर्थात्) पत्र, मेरे नाम पर आये हैं।

00:45:34.520 --> 00:45:42.896
आहाहा! कि तू भगवान है। 
तू रागी (नहीं है)। तुझे कर्म का बंध हुआ नहीं,

00:45:42.920 --> 00:45:50.536
होनेवाला नहीं। तू अबंध मुक्त परमात्मा है। 
दृष्टि दे तो पर्याय में मुक्ति हो जाएगी।

00:45:50.560 --> 00:46:11.756
<b>भगवान! तू इतना और ऐसा ही है। दूसरे
 प्रकार से मानेगा तो तेरे स्वभाव का घात होगा।</b>

00:46:11.780 --> 00:46:17.296
 मैं पर का कर्ता हूँ और पर का ज्ञाता हूँ,
 तो तेरे स्वभाव का घात होगा।

00:46:17.320 --> 00:46:23.956
सम्यग्दर्शन धर्म प्रगट नहीं होगा। कषाय प्रगट होगी।
 मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र (होगा)। आहाहा!

00:46:23.980 --> 00:46:29.456
जाननेवाला जानने में आता है, ऐसा ले ना।
 थोड़ी देर तू ट्राई तो कर, कोशिश तो कर।

00:46:29.480 --> 00:46:39.336
आहाहा! कल स्टीकर दिया था ना सबको। आहाहा!
 अगर स्टीकर खत्म हो गए हों तो छपा लेना।

00:46:39.360 --> 00:46:47.776
इधर ही बनता है, स्टीकर बहुत। आहाहा! कोमलचंद
 भाई को कहा कि प्रभावना करने जैसी चीज़ है।

00:46:47.800 --> 00:46:56.936
 बहुत सुनहरा वाक्य लिखा है, टोडरमलजी साहब ने। सभी 
शास्त्रों का उकेल (समाधान) करने की चाबी दी है, चाबी।

00:46:56.960 --> 00:47:08.556
हाँ! देखो! ये है। आहाहा! क्या लिखा है 
मोक्षमार्ग प्रकाशक में? यह चाबी है। आहाहा!

00:47:08.580 --> 00:47:15.296
ताला खुल जाएगा। कपाट खुल जाएगा, अंदर का। 
राग और आत्मा की एकता टूट जाएगी

00:47:15.320 --> 00:47:21.296
और ज्ञान और आत्मा की एकता कथंचित् 
होकर अनुभव हो जाता है। आहाहा!

00:47:21.320 --> 00:47:32.056
<b>निश्चयनय से जो निरूपण किया हो, आगम में, 
परमागम में, निश्चयनय से जो निरूपण किया हो,</b>

00:47:32.080 --> 00:47:40.896
<b>उसको सत्यार्थ मानकर,</b> मानकर हो! 
लिखा है। श्रद्धा में लेकर, मानकर शब्द है।

00:47:40.920 --> 00:47:43.296
ऐसे ही अकेला जानकर नहीं।

00:47:43.320 --> 00:47:55.436
आहाहा! <b>सत्यार्थ मानकर उसका तो श्रद्धान अंगीकार
 करना</b> कि आत्मा अकर्ता है, कर्ता है ही नहीं। समझे?

00:47:55.460 --> 00:48:01.876
ऐसा श्रद्धान कर लेना। 
<b>और व्यवहारनय से जो निरूपण किया हो</b>,

00:48:01.900 --> 00:48:09.936
कि आत्मा, भेदज्ञान का अभाव हो तो राग का कर्ता है
 और भेदज्ञान का सद्भाव हो तो वीतरागभाव का कर्ता है।

00:48:09.960 --> 00:48:17.116
समझे? अकर्ता को कर्ता कहना वो व्यवहार है। 
<b>व्यवहारनय से जो निरूपण किया हो,</b>

00:48:17.140 --> 00:48:25.016
<b>उसको असत्यार्थ मानकर</b> आहाहा! 
सत्यार्थ मान लिया है ना? राग का कर्ता आत्मा है,

00:48:25.040 --> 00:48:33.776
ऐसा माना है ना? वही संसार है। प्रदीपजी! 
राग का कर्ता आत्मा नहीं है। आहाहा! बिठाना चाहिए,

00:48:33.800 --> 00:48:44.856
अपने हित के लिए संत की वाणी है वो। अनुभवी 
पुरुष थे। <b>असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोड़ना।</b>

00:48:44.880 --> 00:48:51.816
आहाहा! कि भैया, कर्म बंधता है, उसमें 
आत्मा निमित्त तो है, भले कर्ता नहीं।

00:48:51.840 --> 00:48:59.536
वो असत्यार्थ कथन है, व्यवहारनय का कथन है।
 ऐसा समझने से आत्मा का लाभ होता है।

00:48:59.560 --> 00:49:12.136
दूसरा <b>मैं जाननहार हूँ, मैं करनार नहीं हूँ।</b> 
दूसरा है-मैं जाननहार हूँ, मैं करनार नहीं हूँ।

00:49:12.160 --> 00:49:26.516
जाननार ही, जाननार ही, स्व-पर दो नहीं। जाननार ही 
जानने में आता है, वास्तव में पर जानने में नहीं आता।

00:49:26.540 --> 00:49:35.516
आहाहा! मंत्र है, मंत्र है। आहाहा! जहर उतर
 जाएगा मिथ्यात्व का, अज्ञान का, ऐसा मंत्र है।

00:49:35.540 --> 00:49:45.176
डॉक्टर साहब ने खीसा (जेब) में रखा है।
 बराबर है! माल है उसमें। मंत्र है ना? आहाहा!

00:49:45.200 --> 00:49:51.016
संत का, संत का मंत्र है, ज्ञानी का मंत्र है।

00:49:51.040 --> 00:50:01.176
अपना पक्ष छोड़ देना चाहिए। पक्ष मारता है, 
जीव को। तत्व में पक्ष मारता है।

00:50:01.200 --> 00:50:09.056
<b>भगवान! तू इतना और ऐसा ही है। दूसरे
 प्रकार से मानेगा तो तेरे स्वभाव का घात होगा।</b>

00:50:09.080 --> 00:50:12.976
अभी आगे, एक थोड़ी और सूक्ष्म बात आती है।

00:50:13.000 --> 00:50:24.096
शांति रखना और ज्ञानी के वचन पर श्रद्धान करना। 
समझे? ज्ञानी अन्यथा कथन करते नहीं है।

00:50:24.120 --> 00:50:35.176
<b>सर्वज्ञ परमेश्वर कहते हैं,</b> गुरुदेव सर्वज्ञ की साक्षी 
देकर कहते हैं कि सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा फ़रमाते हैं,

00:50:35.200 --> 00:50:46.536
<b>लोकालोक जानने में आवे, ऐसी तेरी पर्याय
 नहीं है;</b> परपदार्थ जानने में आ जावे तेरे को,

00:50:46.560 --> 00:50:58.376
ऐसी तेरी ज्ञान की पर्याय नहीं है। थोड़ी बात सूक्ष्म तो है,
 मगर अमृत जैसी है। भेदज्ञान की बात चलती है।

00:50:58.400 --> 00:51:06.216
आहाहा! एकांत नहीं है, सम्यक्एकांत है।
 सब ख्याल में है। आहाहा!

00:51:06.240 --> 00:51:10.736
हमारे ऊपर भी वो ही (आक्षेप) आया था
कि लालूभाई सर्वज्ञ भगवान को उड़ाते हैं

00:51:10.760 --> 00:51:15.976
कि (भगवान) पर को जानते नहीं है। तो सर्वज्ञ 
भगवान तो लोकालोक को जानते हैं। आहाहा! बहुत।

00:51:16.000 --> 00:51:21.936
आहाहा! बहुत उपसर्ग आया मेरे ऊपर।
 दो साल तो (मैं) मौन रह गया। आहाहा!

00:51:21.960 --> 00:51:28.416
कोई टेका (सहयोग) देनेवाला है नहीं। 
उस टाइम नहीं था, उस टाइम। अभी तो हैं। आहाहा!

00:51:28.440 --> 00:51:33.156
पंडितजी:- आपके वहाँ क्या 
उपसर्ग आएगा जो यहाँ आता है?

00:51:33.180 --> 00:51:38.216
उत्तर:- यहाँ तो बहुत आते हैं। 
हमारे वहाँ तो कुछ नहीं, आपकी अपेक्षा से।

00:51:38.240 --> 00:51:46.136
तो उपसर्ग के टाइम में अपने को शांति 
रखना चाहिए और तो कोई उपाय है ही नहीं।

00:51:46.160 --> 00:51:54.916
एक ऐसा बनाव बन गया। बहुत साल, ६० साल 
पहले की बात मैं कहता हूँ। मेरी बीस साल की उम्र थी।

00:51:54.940 --> 00:52:01.296
उस टाइम गाँधी जी की आंदोलन (चणवण),
 प्रवृत्ति चलती थी ना, स्वराज्य की। आहाहा!

00:52:01.320 --> 00:52:06.936
तो उसमें एक हरिजन बंधु निकलता था।
 गाँधी जी ने अपने हाथ से लिखा है।

00:52:06.960 --> 00:52:13.456
तो उसमें एक का पत्र आया, कार्यकर्ता (का),
 कोई गाँव से कि मैं नीचवान हूँ,

00:52:13.480 --> 00:52:21.476
मगर ये गाँव के लोग मेरे को ये आरोप देते हैं, ऐसा
 ही करता है, ऐसा करता है। तो मेरे को क्या करना?

00:52:21.500 --> 00:52:27.736
कृपा करके मार्गदर्शन मेरे को दो। 
तो गाँधी जी ने लिखा

00:52:27.760 --> 00:52:38.116
 कि, जो तेरे पर आक्षेप करे, ईर्ष्या करे, कादव (कीचड़) 
उछाले। कादव समझे ना? हाँ! कीचड़ उछाले, बहुत करे,

00:52:38.140 --> 00:52:46.636
तब तेरे को मौन रहना, उसको उत्तर नहीं देना। 
जवाब नहीं देना, अपने आप वो मर जाएगा।

00:52:46.660 --> 00:52:50.156
मर जाएगा यानि वो आदमी मर जाएगा, ऐसा नहीं।

00:52:50.180 --> 00:52:59.656
उसकी प्रवृत्ति, खुराक मत दे। तू खुराक मत दे।
 (वो) विरोध करता है, उसका बचाव मत कर।

00:52:59.680 --> 00:53:08.256
झूठा आक्षेप करे (तो क्या) उसके ऊपर बचाव नहीं
 करना? कि नहीं, बचाव नहीं करना। शांति से बैठ।

00:53:08.280 --> 00:53:14.176
दो-चार दिन, आठ दिन, पाँच दिन, पन्द्रह दिन, 
छह महीने में वो विरोध मिट जाएगा।

00:53:14.200 --> 00:53:19.656
गुरुदेव की वो ही रीति थी, 
वो ही रीति गुरुदेव ने अपनाई थी।

00:53:19.680 --> 00:53:23.336
विरोधियों को बिल्कुल उत्तर नहीं देना। आहाहा!

00:53:23.360 --> 00:53:30.196
एक दफ़े गुरुदेव ने, मुंबई में ऐसा हुआ। मुंबई में 
(गुरुदेव) पधारे थे। तो एक समाचार-पत्रवाला था,

00:53:30.220 --> 00:53:34.196
उसको पैसा देते थे। प्रजातंत्र या ऐसा नाम था।

00:53:34.220 --> 00:53:41.116
तो वो गुरुदेव के विरुद्ध बहुत लिखे, बहिनश्री
 के बारे में बहुत दफ़े कीचड़ उछाले। समझे?

00:53:41.140 --> 00:53:48.756
कोई पढ़ नहीं सके मुमुक्षु, ऐसा। उसको तो पैसा
 देते थे। गुरुदेव ने पेपर पढ़ा। सब को बुलाया।

00:53:48.780 --> 00:53:57.016
एक पैसा उसको नहीं देना, जो लिखना 
हो तो लिखे। हाँ! जो लिखता है, ऐसा है,

00:53:57.040 --> 00:54:05.836
तो सुधार लेना और लिखता है, ऐसा नहीं है, तो अपने
 को कुछ नहीं। अपने को कुछ नहीं करना। आहाहा!

00:54:05.860 --> 00:54:11.336
तो अपने आप वो विरोध खत्म हो गया। 
बाद में बनाव तो कोई कुदरती ऐसा है ना

00:54:11.360 --> 00:54:18.296
कि ज्ञानी का जो विरोध करता है, उसका फल बहुत, 
कभी उदय में आवे तो एक भव में आ जाता है।

00:54:18.320 --> 00:54:23.656
कैंसर हो गया (उसको), मर गया। 
जयंतीभाई! मुंबई में यह बनाव बना। आहाहा!

00:54:23.680 --> 00:54:32.456
ऐसे गुरुदेव के ऊपर आक्षेप आया था। एक बहुत
 छोटी उम्र में, १८-२० साल की उम्र में, पालेज में। समझे?

00:54:32.480 --> 00:54:42.736
 तो वो तो निर्दोष छूट गए, ये तो निर्दोष ही थे। मगर 
बनाव ऐसा बना कि उस जीव का खून हो गया। आहाहा!

00:54:42.760 --> 00:54:50.876
ऐसा पर का, पर (के ऊपर) पर आक्षेप करना,
 कीचड़ उछालना, वह मुमुक्षु का कार्य नहीं है।

00:54:50.900 --> 00:54:55.036
पंडित जी ने कहा हमारे ऊपर बहुत 
उपसर्ग आता है। शांत रहना। बस!

00:54:55.060 --> 00:55:00.376
वही उपाय है, दूसरा उपाय नहीं है। एक तरफी युद्ध 
विराम कर देना। एक तरफी युद्ध विराम कर देना।

00:55:00.400 --> 00:55:06.496
एक तरफी। रशिया ने ऐसा काम किया। एकतरफी..

00:55:06.520 --> 00:55:12.536
कि अपने अणुबम बंद करो तो ही समाधान (होगा)। 
(कहें) कि नहीं, हमें तो अब (युद्ध) नहीं करना है।

00:55:12.560 --> 00:55:18.816
अच्छा! वो रशिया चला गया। एक तरफ ठहराव
 हो गया। हम अणुबम का कार्यक्रम बंद करते हैं।

00:55:18.840 --> 00:55:25.336
हमको लड़ाई नहीं करनी है। समझे? एकतरफी 
युद्ध विराम किया तो वो भी शांत हो गए अभी।

00:55:25.360 --> 00:55:33.536
ऐसे ये पंडित जी कहते हैं कि बहुत उपसर्ग आवे, 
शांत रहना। विरोधियों के सामने विरोध नहीं करना।

00:55:33.560 --> 00:55:40.476
बस शांत रहना। वही उपाय है। अपनी कषाय 
बढ़े नहीं, अपनी कषाय (रूप) प्रवृत्ति होवे नहीं।

00:55:40.500 --> 00:55:46.416
अपना काम चल जाए और विरोध नहीं करें, 
तो वो अपने आप बंद हो जाएगा।

00:55:46.440 --> 00:55:53.236
ऐसा एक बनाव दूसरा हुआ कि सास-बहु। 
सास-बहु हमारे वहाँ सास-बहु कहते हैं ना।

00:55:53.260 --> 00:56:01.076
हाँ! तो सास बहुत गाली देवे। नभाई (गालियाँ देवे)
 ऐसे बहुत-बहुत कोई पार नहीं, ऐसी गाली दे।

00:56:01.100 --> 00:56:08.116
तो वो भी गाली देवे सामने (बहू), वो भी 
कम नहीं (थी)। बहू भी सामने बोले। अच्छा!

00:56:08.140 --> 00:56:18.456
तो एक दफ़े ऐसा हुआ कि अब इसका क्या करना?
 तो एक ज्योतिषी के पास गई वो बहू।

00:56:18.480 --> 00:56:24.596
ये क्या करना? (सास) मेरे को बहुत डाँटती है। 
तो (कहें) कि देख! एक मंत्र देता हूँ, तेरे को।

00:56:24.620 --> 00:56:31.256
उस मंत्र का बराबर पालन करना। समझे?
 एक धागा दिया, उसमें गाँठ, गाँठ मार दी।

00:56:31.280 --> 00:56:42.056
जब सासु बोले, तब मुँह में रख देना और दो दाँत के बीच
 में बराबर दबाये रखना। ढीला नहीं करना, दबाये रखना।

00:56:42.080 --> 00:56:49.616
अच्छा! ऐसा करूँ मैं? तो वो तो सासु का काम 
तो चालू हो गया। मगर वो (बहू) बोली ही नहीं।

00:56:49.640 --> 00:56:55.816
अरे! बोलती भी नहीं है, बोल ना कुछ। नभाई  (है क्या)? 
(गालियाँ देवे) बोलती नहीं है, मौन हो जाती है।

00:56:55.840 --> 00:57:02.056
वो दो दिन, चार दिन, आठ दिन हुआ, थक गई वो 
(सास)। थक गई, सामने (से कोई) प्रतिकार ही नहीं।

00:57:02.080 --> 00:57:07.336
ऐसे विरोधियों के सामने विरोध
 नहीं करना, अपना बचाव भी

00:57:07.360 --> 00:57:14.696
नहीं करना। तुम झूठा है और मैं सच्चा हूँ, ऐसा नहीं
 करना। वो होने दो। आहाहा! उपसर्ग तो आता है।

00:57:14.720 --> 00:57:22.056
आहाहा! ज्ञानी पर आता है। हें? साधक, मुनिराज पर
 भी आता है। पार्श्वनाथ भगवान पर नहीं आया था?

00:57:22.080 --> 00:57:30.516
उपसर्ग तो आता है, उसमें क्या? शांत रहो, बस।
अपने को अपनी प्रवृत्ति मस्ती से करना, बस!

00:57:30.540 --> 00:57:34.576
वही उपाय, दूसरा कोई उपाय नहीं है। आहाहा!

00:57:34.600 --> 00:57:38.256
क्योंकि गुरुदेव की गैरहाज़िरी है, 
(अब) अपनी जवाबदारी है।

00:57:38.280 --> 00:57:46.696
अपनी यानि पंडित जी की जवाबदारी ज़्यादा है। 
समझे? हाँ! गंभीर हो जाना दूसरा कोई उपाय नहीं।

00:57:46.720 --> 00:57:56.356
देखो! एक बात सूक्ष्म आती है। 
टाइम हो गया। सवा नौ हो गया।

00:57:56.380 --> 00:58:05.016
कल! कल! हमें तो टाइम बताया ना, गुरुदेव ने 
सिखाया है। टाइम पर काम करना, सब।

00:58:05.040 --> 00:58:06.040