﻿WEBVTT

00:01:22.831 --> 00:01:36.705
यह श्री प्रवचनसार परमागम
शास्त्र है, जो दिव्यध्वनि का सार है,
ऐसा गुरुदेव फरमाते थे।

00:01:36.729 --> 00:01:44.860
उसकी गाथा नम्बर ११४ है,
११४ एक सौ चौदह।

00:01:44.884 --> 00:02:00.803
हिन्दी में क्या एक सौ चौदह न?
एक सौ चौदह, ११४ गाथा।
उसका मथाला - शीर्षक है, headline उसकी।

00:02:00.827 --> 00:02:06.194
<b>अब, एक ही द्रव्यके </b>
एक द्रव्य है, एक।

00:02:06.218 --> 00:02:17.145
द्रव्य तो एक ही है, <b>अन्यपना
और अनन्यपना होनेमें जो
विरोध है, उसे दूर करते हैं। </b>

00:02:17.169 --> 00:02:26.043
अर्थात् दूर करते हैं।
अच्छा! हिन्दी में।

00:02:26.067 --> 00:02:35.314
क्या कहा? <b>अब, एक ही
द्रव्यके अन्यपना और अनन्यपना
होनेमें जो विरोध है, </b>

00:02:35.338 --> 00:02:40.714
विरोध दिखता है ऊपर-ऊपर से
तो भी सचमुच विरोध नहीं है।

00:02:40.738 --> 00:02:50.456
एक पदार्थ अन्य भी है और अनन्य
भी है। दो शब्द विरूद्ध जैसे लगते
हैं मगर (उनमें) विरोध नहीं है।

00:02:50.480 --> 00:02:54.096
उसमें अविरोध कैसे है वो बताते हैं।

00:02:54.120 --> 00:03:05.189
<b> उसे दूर करते हैं। (अर्थात्
उसमें विरोध नहीं आता, यह
बतलाते हैं):- </b>गाथा ११४,

00:03:05.213 --> 00:03:11.923
उसका <b>अन्वयार्थ</b>, कुंदकुंदाचार्य
भगवान की मूल गाथा का शब्दार्थ।

00:03:11.947 --> 00:03:24.456
<b>द्रव्यार्थिक (नय) से सब
द्रव्य है; और पर्यायार्थिक (नय)
से वह (द्रव्य) अन्य-अन्य है, </b>

00:03:24.480 --> 00:03:29.443
पर्याय से देखो तो अन्य-अन्य हैं
और पर्याय को गौण करके देखो,

00:03:29.467 --> 00:03:34.883
पर्याय को मत देखो तो द्रव्य तो वो
ही का वो ही, वो ही का वो ही है।

00:03:34.907 --> 00:03:43.780
जैसे सोना है, उसकी आकृति है। आकृति
से देखो तो सोना अन्य-अन्य लगता है।

00:03:43.804 --> 00:03:51.856
सोना है, वह अन्य-अन्यरूप लगता है
और आकृति की दृष्टि देखना बंद करो,

00:03:51.880 --> 00:04:01.834
उस पर्याय को देखना बंद करो
तो सभी परिणामों में सोना तो
अनन्य यानि जैसा है वैसा ही है।

00:04:01.858 --> 00:04:04.411
कोई सोने में फर्क पड़ता नहीं है।

00:04:04.435 --> 00:04:15.918
पर्याय से अन्य-अन्य दिखता है; द्रव्यदृष्टि से
देखो तो द्रव्य वैसा का वैसा, वैसा का वैसा,
कोई भी पर्याय में देखो तो वैसा का वैसा है।

00:04:15.942 --> 00:04:27.571
<b>क्योंकि उस समय तन्मय होनेसे
(द्रव्य पर्यायोंसे) अनन्य है॥११४॥ </b>
उसकी टीका, बहुत ऊँची बात है उसमें।

00:04:27.595 --> 00:04:37.767
आत्मा का दर्शन करने की उसमें विधि
बताई है, कला है आत्मदर्शन करने की।

00:04:37.791 --> 00:04:45.580
<b>टीका:- वास्तवमें सभी वस्तु</b>,
छहद्रव्य की पहले बात करते हैं,
उसमें जीव को उतारते हैं।

00:04:45.604 --> 00:04:54.398
<b>वास्तवमें सभी वस्तु सामान्य-
विशेषात्मक</b>, द्रव्य-पर्यायस्वरूप हैं।

00:04:54.422 --> 00:05:05.687
द्रव्य बिना पर्याय नहीं होती है और
पर्याय बिना द्रव्य नहीं होता है, ऐसे
परस्पर सापेक्ष द्रव्य का नाम पदार्थ है।

00:05:05.711 --> 00:05:12.576
<b>सामान्य-विशेषात्मक होनेसे
वस्तुका स्वरूप देखनेवालोंके </b>

00:05:12.600 --> 00:05:23.589
<b>क्रमशः (१) सामान्य और
(२) विशेषको जाननेवाली दो आँखें हैं</b>।

00:05:23.613 --> 00:05:28.145
एक आँख से देखो तो द्रव्य
दिखता है और दूसरी आँख से
देखो तो पर्याय दिखती है।

00:05:28.169 --> 00:05:32.056
क्रम-क्रम से देखो तो यह
द्रव्य है (और) यह पर्याय है।

00:05:32.080 --> 00:05:37.625
द्रव्य को देखनेवाली द्रव्यार्थिकनय है;
पर्याय को देखनेवाली पर्यायार्थिकनय है।

00:05:37.649 --> 00:05:43.856
दो नय हैं, भगवान ने दो नय कहे।
दो नय कहे इसका कारण क्या (है)?

00:05:43.880 --> 00:05:50.349
कि आत्मा दोरूप है - द्रव्यरूप
भी है और पर्यायरूप भी है।

00:05:50.373 --> 00:05:54.838
वो टिकता भी है और
परिणाम से पलटता भी है।

00:05:54.862 --> 00:06:02.407
तो टिकता है, ऐसा ज्ञान करने
के लिए द्रव्यार्थिकनय है;

00:06:02.431 --> 00:06:08.780
और परिणाम से जो वस्तु
पलटती है, तो उसका ज्ञान करने
के लिए पर्यायार्थिकनय है।

00:06:08.804 --> 00:06:15.100
दो नय सर्वज्ञ भगवान के ज्ञान में आये
हैं और वस्तु भी दो पहलूवाली है।

00:06:15.124 --> 00:06:23.767
एकांत से पर्यायरूप है ऐसा भी नहीं
(और) एकांत से द्रव्यरूप है ऐसा भी
नहीं, सामान्य-विशेषात्मक पूरा पदार्थ है।

00:06:23.791 --> 00:06:28.251
<b>(१) सामान्य और (२)
विशेषको जाननेवाली दो आँखें हैं :-</b>

00:06:28.275 --> 00:06:42.700
दो आँखें हैं, तीसरी आँख नहीं है।
क्या कहा? पर को जाने ऐसी
कोई आँख तीसरी है ही नहीं।

00:06:42.724 --> 00:06:48.980
पदार्थ सामान्य-विषेशरूप है तो
उसको, दो को जाननेवाली दो नय हैं;

00:06:49.004 --> 00:06:51.060
एक द्रव्यार्थिकनय है
और एक (पर्यायार्थिकनय)।

00:06:51.084 --> 00:06:57.411
जिसको अपनी साधना करनी हो,
आत्मदर्शन करना हो उसके लिए यह बात है।

00:06:57.435 --> 00:07:03.887
प्रमाण के बाहर जाना नहीं और प्रमाण
में अटकना नहीं, वो बात इसमें आएगी।

00:07:03.911 --> 00:07:07.896
<b>(१) द्रव्यार्थिक और
(२) पर्यायार्थिक</b>, दो नय हैं।

00:07:07.920 --> 00:07:17.647
<b>इनमेंसे </b>टीका चलती है
अभी, <b>इनमेंसे </b>
सामान्य-विशेषस्वरूप जो वस्तु है;

00:07:17.671 --> 00:07:26.607
वो एक द्रव्यार्थिकनय सामान्य
को देखती है (और) पर्यायार्थिकनय
उसके विशेष को देखती है।

00:07:26.631 --> 00:07:35.229
जो द्रव्य का विशेष हो, द्रव्य की
पर्याय होनी चाहिए न? ये (माइक्रोफ़ोन
मेरा) द्रव्य की पर्याय कहाँ है?

00:07:35.253 --> 00:07:39.896
ये (नोकर्म मेरा) द्रव्य की पर्याय है?
अपने आत्मा की पर्याय कहाँ है ये?

00:07:39.920 --> 00:07:44.003
आत्मा की पर्याय आत्मा
के बाहर होती नहीं है।

00:07:44.027 --> 00:07:49.034
तो सामान्य स्वरूप एक और एक
विशेषस्वरूप, ऐसे दो स्वरूप हैं।

00:07:49.058 --> 00:07:55.256
तो दो को देखनेवाली,
जाननेवाली दो नय हैं।

00:07:55.280 --> 00:08:05.278
<b>इनमेंसे पर्यार्यार्थिक
चक्षुको सर्वथा बन्द करके</b>,
यह मुद्दे की चीज आई।

00:08:05.302 --> 00:08:11.069
पहले कहा कि वस्तु द्रव्यरूप भी है
और पर्यायरूप भी है।

00:08:11.093 --> 00:08:15.776
एकांत से द्रव्यरूप भी नहीं,
एकांत से पर्यायरूप भी नहीं है।

00:08:15.800 --> 00:08:29.500
प्रमाणज्ञान का विषय स्थाप दिया,
पदार्थ की सिद्धि तो हो गयी।
अभी प्रयोजन की सिद्धि कैसे हो?

00:08:29.524 --> 00:08:43.247
किरण भैया! 'ये सोनगढ़ के
संत पर्याय को मानते नहीं हैं!’
(अरे!) उड़ाते नहीं हैं, कौन उड़ाये भैया?

00:08:43.271 --> 00:08:50.434
तेरे को (कुछ) मालूम नहीं है।
वस्तु सामान्य-विशेषस्वरूप है,
प्रमाणज्ञान का विषय है।

00:08:50.458 --> 00:09:04.149
प्रमाणज्ञान का विषय उपादेय नहीं है।
प्रमाणज्ञान में एक सामान्य और एक
विशेष, उसमें हेय-उपादेय करना है।

00:09:04.173 --> 00:09:10.176
वो बताते हैं आचार्य भगवान कि
<b>इनमेंसे पर्यायार्थिक चक्षुको </b>

00:09:10.200 --> 00:09:17.785
यानि जो उत्पाद-व्यय होता है परिणाम में,
उसको जाननेवाली जो नय है,

00:09:17.809 --> 00:09:31.629
चक्षु यानि नय, उसको
<b>सर्वथा बन्द करके</b> आहाहा!
उसको जानना सर्वथा बंद कर दे।

00:09:31.653 --> 00:09:43.732
तो शिष्य का प्रश्न आता है ऐसा कि
हम उपादेयरूप न जाने तो-तो ठीक है
मगर हम हेयरूप जाने कि नहीं जाने?

00:09:43.756 --> 00:09:50.363
कि जानना ही बंद कर दे तो
हेयरूप-उपादेय का कहाँ भेद आया?

00:09:50.387 --> 00:09:57.025
शिष्य का प्रश्न है, आशंका, कि उस पर्याय
में उपादेयरूप पर्याय को नहीं जाने,

00:09:57.049 --> 00:10:02.323
मगर ये पर्याय हेय है (ऐसा) हेयरूप
जाने? कि नहीं! जानना बंद कर दे!

00:10:02.347 --> 00:10:16.452
अच्छा! तीसरा प्रश्न आया शिष्य का
(कि) उपादेयरूप भी छोड़ो, हेयरूप भी छोड़ो
मगर पर्याय ज्ञेयरूप तो है कि नहीं? आहाहा!

00:10:16.476 --> 00:10:29.389
जहाँ तक तेरे ज्ञान में वो
पर्याय ज्ञेयरूप भासती है, तहाँ
तक भगवान आत्मा ज्ञेय नहीं होगा।

00:10:29.413 --> 00:10:34.816
क्या कहा? ये अमृतचन्द्राचार्य
की अमृतमयी टीका है।

00:10:34.840 --> 00:10:44.558
उसमें लिखा, उसमें फरमान आया,
सर्वज्ञ भगवान का फरमान है कि द्रव्य
-पर्यायस्वरूप वस्तु द्रव्य-पर्यायस्वरूप है।

00:10:44.582 --> 00:10:55.007
मगर तेरे को जो आत्मदर्शन करना
हो तो, तेरा हित करना हो तो,

00:10:55.031 --> 00:11:10.856
तेरे को निश्चय मोक्षमार्ग प्रगट करना
हो तो, तेरे को सुखी होना हो तो,
तो परिणाम को जानने का बंद कर दे।

00:11:10.880 --> 00:11:18.780
कथंचित् बंद करूँ और कथंचित् खुला
रखूँ, थोड़ी? ऐसा नहीं, 'सर्वथा' शब्द है।

00:11:18.804 --> 00:11:29.003
कि जैन-दर्शन में 'सर्वथा' होता है?
कि (हाँ!) सर्वथा होता है। ये सर्वज्ञ
भगवान का आगम है, उसमें लिखा है।

00:11:29.027 --> 00:11:37.029
किरण भैया! 'सर्वथा' लिखा है कि नहीं
टीका में देखो तो? है कि नहीं वहाँ?
है? अच्छा!

00:11:37.053 --> 00:11:47.376
यह सोनगढ़ का नहीं है, वो
तो भगवान की बात है। आहाहा!

00:11:47.400 --> 00:11:56.883
इसलिए कभी-कभी गुरुदेव बोलते हैं,
"बोलो भाई! संस्कृत में है कि
नहीं 'सर्वथा' शब्द?" आहाहा!

00:11:56.907 --> 00:12:06.763
उसको पर्याय का पक्ष (है);
करने के बहाने भी पक्ष, और
जानने के बहाने भी पक्ष रह गया है।

00:12:06.787 --> 00:12:18.803
एक बार पर्याय को जानना बंद कर दे
और आत्मा को जाननेवाली चक्षु जो
बंद है अनंतकाल से, उसको खोल दे।

00:12:18.827 --> 00:12:25.652
उसमें आत्मबुद्धि कर दे, अंदर
में अहम् कर दे कि मैं ज्ञायक हूँ।

00:12:25.676 --> 00:12:31.283
बाद में पर्याय को जान, तो
पर्याय में अहंबुद्धि नहीं होगी।

00:12:31.307 --> 00:12:40.238
मगर द्रव्य को जानना बंद करके
पर्याय को जानता है तो पर्याय में
आत्मबुद्धि, मिथ्याबुद्धि होती ही है।

00:12:40.262 --> 00:12:43.709
कहीं न कहीं श्रद्धा का विषय तो बनता है।

00:12:43.733 --> 00:12:50.829
यदि शुद्धात्मा - सामान्य श्रद्धा का
विषय नहीं बने; तो विशेष (पर्याय)
श्रद्धा का विषय बन जाता है,

00:12:50.853 --> 00:13:00.238
उसका नाम पर्यायदृष्टि, मिथ्यादृष्टि
है, पर्यायदृष्टि सो मिथ्यादृष्टि है।

00:13:00.262 --> 00:13:14.532
ये प्रयोग की बात है। जो अपना
२७१ नंबर का कलश चला न, उसकी
पुष्टि के लिए ये है। ये पुष्टि के लिए गाथा है।

00:13:14.556 --> 00:13:23.896
तेरे परिणाम को जानना सर्वथा बंद कर दे।
दूसरे को, ये बाहर में क्या होता है, आहाहा!

00:13:23.920 --> 00:13:31.194
उसको तू जानता ही नहीं है, तो
इसलिए उसको जानना बंद कर
दे (ऐसा) हम कहते ही नहीं हैं।

00:13:31.218 --> 00:13:39.132
पाटनी जी! आप वहाँ क्यों बैठ गए?
पाटनी जी हैं कि नहीं? पाटनी जी
नहीं हैं। अच्छा! कोई दूसरे हैं।

00:13:39.156 --> 00:13:48.092
क्या कहा? कि भगवान आत्मा जो है
द्रव्य, एक अनंतगुण का पिंड ध्रुव परमात्मा

00:13:48.116 --> 00:13:55.909
और दूसरा उसमें परिणाम होता है
समय-समय पर, उत्पाद-व्यय, उत्पाद
-व्यय, उत्पाद-व्यय धारावाहिक होता है।

00:13:55.933 --> 00:14:05.389
द्रव्य टिकता है और परिणाम
पलटता है, ऐसा जोड़ा (युगल) है,
जोड़ा, जोड़का आहाहा! गुजराती में।

00:14:05.413 --> 00:14:16.052
तो उसमें से आचार्य भगवान आत्मदर्शन
करने की विधि बताते हैं कि परिणाम तो है।

00:14:16.076 --> 00:14:26.069
हम 'परिणाम नहीं है', ऐसा नहीं कहते हैं
मगर परिणाम को जानना बंद कर दे।

00:14:26.093 --> 00:14:31.429
क्षण भर (के लिए) बंद कर दे।
थोड़ी देर के लिए बंद कर दे।

00:14:31.453 --> 00:14:35.972
बाद में हम ही कहेंगे कि पर्याय
को जानने की आँख खोल दे।

00:14:35.996 --> 00:14:48.585
हम ही कहेंगे थोड़ी देर के बाद,
अनुभव करने के बाद। पहले तो हमको
अनुभव कराना है, द्रव्यदृष्टि कराना है।

00:14:48.609 --> 00:14:58.012
<b>चक्षुको सर्वथा बन्द करके
जब मात्र खुली हुई </b>only,
मात्र, फक्त <b>खुली हुई</b>,

00:14:58.036 --> 00:15:14.287
जो अनंतकाल से बंद थी <b>चक्षु</b>,
ज्ञायक को देखनेवाला ज्ञान अनंतकाल
से बंद रखा था, वो क्यों नहीं खुलता था?

00:15:14.311 --> 00:15:23.154
कि पर्यायार्थिकचक्षु का प्रेम हो गया था,
जानने का लोभ, अनंतानुबंधी का।

00:15:23.178 --> 00:15:30.558
वो (पर्यायार्थिकचक्षु) खुली रखी (थी), तो
वो (द्रव्यार्थिकचक्षु) बंद अनंतकाल से है;
आत्मदर्शन हुआ ही नहीं उसको, अज्ञानी को।

00:15:30.582 --> 00:15:37.558
अनादि मिथ्यादृष्टि की बात करता हूँ,
सादि मिथ्यादृष्टि की बात गौण है।

00:15:37.582 --> 00:15:44.580
तो फरमाते हैं कि परिणाम जो है,
जिस परिणाम में छहद्रव्य जानने में आते हैं,

00:15:44.604 --> 00:15:51.798
नवतत्त्व जानने में आते हैं, चौदह गुणस्थान-
मार्गणास्थान-जीवसमास जानने में आते हैं,

00:15:51.822 --> 00:15:59.674
जिस ज्ञान की पर्याय में आठ कर्म, उसके
भेद १४८ कर्म की प्रकृति घाति-आघाति,

00:15:59.698 --> 00:16:10.576
वो जो तेरी ज्ञान की पर्याय में
परद्रव्य जानने में आ रहा है; उस ज्ञान
की पर्याय को जानना बंद कर दे। आहाहा!

00:16:10.600 --> 00:16:18.456
क्या कहा? जो तेरी ज्ञान की पर्याय
में परपदार्थ जानने में आ रहा है,

00:16:18.480 --> 00:16:28.252
ऐसा जो परिणाम,
पर्याय प्रगट होती है तेरे पास, उस
परिणाम को जानना सर्वथा बंद कर दे।

00:16:28.276 --> 00:16:38.389
'सर्वथा बंद करे तो ज्ञान
का नाश होगा, अँधा हो जाएगा'
ऐसा तर्क होता है, तर्क तो होता है।

00:16:38.413 --> 00:16:46.914
अरे! अभी अँधा है तू! द्रव्य को
देखता नहीं है और पर्याय में देखकर,
पर्यायदृष्टि तेरी हो गयी,

00:16:46.938 --> 00:16:53.549
मिथ्यादृष्टि, वो (द्रव्यार्थिक) आँख
बंद है तेरी, अभी अँधा है।
अभी तू देखनेवाला हो जाएगा।

00:16:53.573 --> 00:17:03.634
हमारी बात सुनकर, ख्याल में
लेकर अंतर्मुहूर्त तक प्रयोग कर।

00:17:03.658 --> 00:17:08.176
(तो कहें) कि आँख खुलेगी या
नहीं खुलेगी? कि खुल जाएगी।

00:17:08.200 --> 00:17:15.132
एक आँख बंद कर तो दूसरी
आँख खुल जाएगी, ऐसा switch
board (स्विच बोर्ड) है अंदर में।

00:17:15.156 --> 00:17:24.132
एक जो बंद थी द्रव्यार्थिकचक्षु,
दर्शन नहीं हुआ था आत्मा का,
वो (द्रव्यार्थिकचक्षु) बंद रखा था।

00:17:24.156 --> 00:17:32.194
और ये (पर्यायार्थिक) आँख खुली रखी थी
भेद-प्रभेद को जानने के लिए, पर
को जानने के लिए खुली रखी थी।

00:17:32.218 --> 00:17:39.612
अभी पर (द्रव्य) को जानना तू
बंद कर दे। पर यानि अध्यात्म में
पर - परिणाम को पर कहते हैं।

00:17:39.636 --> 00:17:48.634
नवतत्त्व के भेद का नाम परद्रव्य है,
छहद्रव्य तो परद्रव्य हैं ही, प्रसिद्धरूप।

00:17:48.658 --> 00:17:56.847
वह नवतत्त्व का जो भेद है, सात तत्त्व,
नौ पदार्थ, वो भी सर्वज्ञ भगवान की
वाणी में परद्रव्य (कहने में) आए हैं।

00:17:56.871 --> 00:18:04.763
उसको जो जाननेवाली ज्ञान की पर्याय
- कितना भी अभ्यास कर लिया
ग्यारह अंग तक का

00:18:04.787 --> 00:18:13.914
(और वो सब) ज्ञान में जानने में
आते थे - ऐसी उस ज्ञान की
पर्याय को जानना बंद कर दे। आहाहा!

00:18:13.938 --> 00:18:30.700
और वो बंद करके <b>मात्र
खुली हुई</b> एक आँख<b> द्रव्यार्थिक
चक्षुके द्वारा देखा जाता है तब</b>

00:18:30.724 --> 00:18:39.376
उस पर्याय को जानना बंद करके, सामान्य
स्वभाव को जब ज्ञान जानता है, देखता है,

00:18:39.400 --> 00:18:49.927
विशेष को जानना विशेष ने बंद कर दिया
और विशेष सामान्य की ओर झुक गया
तो उसका ज्ञान का नाम बदल गया।

00:18:49.951 --> 00:18:57.096
क्या कहा? पर्याय को जो ज्ञान जानता
था, उसका नाम पर्यायार्थिकनय है।

00:18:57.120 --> 00:19:07.096
उस पर्याय को जाननेवाला ज्ञान
वहाँ से वापस इधर आया, आत्मा
की - सामान्य की ओर।

00:19:07.120 --> 00:19:19.092
उसका जानना बंद कर दिया और
सामान्य तत्त्व शुद्धात्मा चिदानंद है, उसकी
ओर विशेष आ गया, पर्याय इधर आ गयी।

00:19:19.116 --> 00:19:26.376
उधर जानना बंद किया तो पर्याय ने,
ज्ञान की पर्याय ने अपने शुद्धात्मा को,

00:19:26.400 --> 00:19:36.189
सामान्य को, द्रव्य को जानने
की जो प्रवृत्ति हो गयी, तो उस
पर्याय का नाम द्रव्यार्थिकनय है।

00:19:36.213 --> 00:19:50.745
द्रव्य+अर्थ+नय - जिस ज्ञान का
प्रयोजन द्रव्य सामान्य को जानना है उस
ज्ञान के अंश का नाम द्रव्यार्थिकनय है।

00:19:50.769 --> 00:20:03.496
द्रव्य+अर्थ+नय; नय अर्थात् ज्ञान, अर्थ
यानि प्रयोजन, जिस ज्ञान का प्रयोजन अपना
सामान्य चिदानंद आत्मा को जानने का है,

00:20:03.520 --> 00:20:11.443
ऐसी ज्ञान की पर्याय का नाम
द्रव्यार्थिकनय है। वो आँख खुल गयी।

00:20:11.467 --> 00:20:17.398
<b>देखा जाता है तब </b>
तब क्या दिखाई देता है?

00:20:17.422 --> 00:20:29.709
<b>तब नारकपना, तिर्यंचपना, मनुष्यपना,
देवपना और सिद्धपना - पर्यायस्वरूप
विशेषोंमें</b>, सामान्य तो विशेष में रहता है।

00:20:29.733 --> 00:20:38.385
सामान्य तत्त्व द्रव्य सामान्य है,
वो अपने जो चार और एक पाँच
पर्याय कहीं - चार संसारिक पर्याय,

00:20:38.409 --> 00:20:50.163
चार गति और एक पंचमगति सिद्ध
की पर्याय - वो पाँच जो विशेष
पर्यायें हैं उनमें रहनेवाला (तो) एक है।

00:20:50.187 --> 00:20:59.683
एक पाँच के अंदर रहता है
परंतु पाँचरूप होता नहीं है।
सामान्य, विशेषरूप होता नहीं है।

00:20:59.707 --> 00:21:09.438
सोना है ना सोना, कई आकृति
बनें उसके। वो आकृति में (तो) रहता
है मगर आकृतिरूप होता नहीं है।

00:21:09.462 --> 00:21:16.234
जो आकृतिरूप हो जावे तो परिणाम
के नाश से द्रव्य का नाश हो जाता है।

00:21:16.258 --> 00:21:23.118
रहता है परिणाम के मध्य में, नवतत्त्व के
परिणाम के मध्य में सामान्य रहता है।

00:21:23.142 --> 00:21:29.598
नवतत्त्व विशेष हैं, पर्याय के धर्म हैं।
उसमें सामान्य रहता है।

00:21:29.622 --> 00:21:41.518
ऐसे चार नर-नारकादि पर्याय, देव,
तिर्यंच और सिद्धगति पाँच पर्याय, विशेष।

00:21:41.542 --> 00:21:50.243
<b>पर्यायस्वरूप विशेषोंमें रहनेवाले</b>,
वो भगवान आत्मा कहाँ मिलता है?

00:21:50.267 --> 00:21:55.820
कि उसका जो परिणाम है पाँच प्रकार
का उसके अंदर ही रहता है।

00:21:55.844 --> 00:22:06.043
सामान्य तत्त्व उसके अंदर ही रहता है।
पाँच परिणाम के बाहर सामान्य रहता नहीं
है और सामान्य पाँचरूप होता नहीं है।

00:22:06.067 --> 00:22:21.123
पाँच एकरूप होता नहीं है, पाँच
पाँचरूप रहता है और एक एकरूप रहता
है। यह आत्मदर्शन करने की विधि है।

00:22:21.147 --> 00:22:29.740
ऐसा एक बनाव बना, दृष्टांत है।
दो भाई थे, दो भाई।
साधारण स्थिति, गरीब एकदम।

00:22:29.764 --> 00:22:40.105
उसमें एक भाई अन्यमति का साधु
हो गया, अन्यमति का तापसी हो
गया तो बाहर जाकर तपस्या करे।

00:22:40.129 --> 00:22:49.629
तो उसको कोई ऋद्धि मिल गई
और वो दूसरा आदमी, भाई था
वो गरीब झोपड़ी में रहता था।

00:22:49.653 --> 00:22:57.785
तो एक बार वो आया मिलने के लिए। उसने
तो गले लगा लिया, स्वागत किया, बिठाया।

00:22:57.809 --> 00:23:04.345
उसने कहा कि ये तेरी स्थिति
कंगाल देखकर (के) मेरे को
दया आती है। तो मैं क्या करूँ?

00:23:04.369 --> 00:23:11.798
मेरे पास पैसा तो नहीं है कि मैं
बंगला लूँ, मोटर लूँ और आपका
स्वागत करूँ, एयर कंडिशन में बैठाऊँ।

00:23:11.822 --> 00:23:21.207
मेरे पास तो कुछ है नहीं। ये झोपड़ी है
मेरे पास तो और रोटी और शाक खाता हूँ।
दूसरा कुछ मिष्ठान तो मिलता ही नहीं है।

00:23:21.231 --> 00:23:30.536
मेरे पास पैसा ही नहीं है। तो उसने
कहा कि मेरे को तेरे ऊपर दया
आती है। (तो) कोई रास्ता बताओ?

00:23:30.560 --> 00:23:36.660
कि देख कि एक मैं पन्ना (कागज)
लिखकर देता हूँ, मंत्र।

00:23:36.684 --> 00:23:45.407
वो मंत्र पढ़कर लोहे पर पानी डाल
देना तो लोहा सोना बन जाएगा।

00:23:45.431 --> 00:23:53.038
अच्छा! तो-तो कमी कहाँ रहेगी?
तो-तो बंगला ही बंगला। बहुत खुश हुआ।

00:23:53.062 --> 00:24:00.652
ले लिया पत्र। पत्र लेकर वो
ताला-चाबी में बंद कर दिया।

00:24:00.676 --> 00:24:05.803
एक वर्ष हुआ, दो वर्ष हुए।
वो (दूसरा भाई वापस) आया कि
अभी तो मोटर मेरे को लेने को आएगी।

00:24:05.827 --> 00:24:12.216
मेरा भाई तो ऐसा होगा, वैसा होगा।
वो ही झोपड़ी। समझ में आया?
कि भैया क्या हुआ?

00:24:12.240 --> 00:24:22.589
मेरा मंत्र झूठा है कि क्या है? कि नहीं!
बराबर ताला-चाबी में मैंने रखा है,
बंद रखा है। समझ में आया? आहाहा!

00:24:22.613 --> 00:24:30.305
सोना बनाने की विधि मिल
गयी तो भी प्रयोग किया नहीं।

00:24:30.329 --> 00:24:41.403
ऐसे भगवान बनने की विधि का शास्त्र,
मंत्र तो सबके पास मिल गया
मगर वो प्रयोग करता नहीं है।

00:24:41.427 --> 00:24:47.038
ये परमात्मा बनने का,
आत्मदर्शन का पाठ है।

00:24:47.062 --> 00:24:52.905
गुरुदेव तो इस विषय में ऐसा कहते
हैं कि जो वो काम करता है
उसको आत्मदर्शन होगा ही होगा।

00:24:52.929 --> 00:24:54.927
उसके ऊपर व्याख्यान छप गए हैं।

00:24:54.951 --> 00:25:03.203
वो एक पुस्तक है
'अध्यात्म-प्रवचन-रत्नत्रय' १३ व्याख्यान,
उसमें उनके व्याख्यान भी हैं, छप गए हैं।

00:25:03.227 --> 00:25:09.252
३२० गाथा, ११४ (गाथा) और २७१ (कलश)।
१३ व्याख्यान हैं, तेरहपंथ है न?

00:25:09.276 --> 00:25:19.078
१३ व्याख्यान उसमें छप गए हैं।
पढ़े कौन? आहाहा! चौबीसों घंटा ...

00:25:19.102 --> 00:25:26.780
मुमुक्षु: हिन्दी में भी है वो किताब मिलता है।
पू. लालचंदभाई: हाँ! हिन्दी में भी मिलता है।
बोलो! भाई कहते हैं कि हिंदी में भी है।

00:25:26.804 --> 00:25:34.118
मुमुक्षु: स्टॉल पर रखी है।
पू. लालचंदभाई: स्टॉल पर रखी है?
अच्छा! बोलो! मिलती है। आहाहा!

00:25:34.142 --> 00:25:48.567
मगर ताले-चाबी में रखने के
लिए खरीदना नहीं। श्रीराम जी!
परमात्मा बनने का शास्त्र है वो,

00:25:48.591 --> 00:25:55.056
अशरीरी बनने का, सिद्ध बनने का
शास्त्र है, कुंदकुंद की वाणी! आहाहा!

00:25:55.080 --> 00:26:02.758
जिनका तीसरा नाम है, आहाहा!
महावीर (भगवान) के बाद में,
गौतम के बाद तीसरा नाम (है)।

00:26:02.782 --> 00:26:11.985
वो फरमाते हैं कि पर्याय के
<b>विशेषोंमें रहनेवाले एक
जीवसामान्यको देखनेवाले </b>

00:26:12.009 --> 00:26:20.665
द्रव्यार्थिकनय की आँख खुली, उपयोग
अंदर में गया (तो) अकेला सामान्य का,
चिदानंद भगवान आत्मा का दर्शन होता है।

00:26:20.689 --> 00:26:25.305
उसमें कोई चार (गति की) और पाँचवी
सिद्ध पर्याय भी दिखती नहीं है।

00:26:25.329 --> 00:26:31.780
नर-नारकादि की पर्याय तो दिखती नहीं है
मगर सिद्ध पर्याय भी दिखती नहीं है।

00:26:31.804 --> 00:26:41.278
कोई पर्याय ही दिखती नहीं है क्योंकि
पर्याय को देखनेवाली आँख सर्वथा बंद
हो गयी इसलिए पर्याय दिखती नहीं है।

00:26:41.302 --> 00:26:50.776
पर्याय नहीं है, ऐसा नहीं; पर्याय तो है
मगर पर्याय को देखना बंद कर दे।

00:26:50.800 --> 00:26:56.758
थोड़े टाइम के लिए, अन्तःमुहूर्त के लिए।

00:26:56.782 --> 00:27:04.692
तो <b>जीवसामान्यको देखनेवाले
और विशेषोंको न देखनेवाले</b>,

00:27:04.716 --> 00:27:08.580
सामान्य तो दिखता है और विशेष दिखता नहीं।

00:27:08.604 --> 00:27:12.976
सामान्य का अवलोकन करता हुआ और
विशेष का अवलोकन नहीं करता हुआ,

00:27:13.000 --> 00:27:17.852
सामान्य का अवलोकन करता हुआ और
विशेष का अवलोकन नहीं करता हुआ,
गुजराती में

00:27:17.876 --> 00:27:22.536
सामान्यने अवलोकतो अने
विशेषने नहि अवलोकतो।

00:27:22.560 --> 00:27:28.385
विशेष को जानना बंद हो गया और
भगवान आत्मा का दर्शन हो गया उसको।

00:27:28.409 --> 00:27:32.274
उसका नाम
<b>सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:</b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय १, सूत्र १) है।

00:27:32.298 --> 00:27:39.634
आत्मा को जाने बिना तीनकाल में कोई
भी क्रिया भले करे - पाँच लाख का दान

00:27:39.658 --> 00:27:49.020
और ये प्रतिष्ठा आनेवाली है तो उसमें दस
लाख रुपया लगावे - तो (भी) धर्म नहीं होगा।

00:27:49.044 --> 00:27:54.527
पैसा, लोभ कषाय कम करने का भाव
आता है मगर वो शुभभाव है भैया।

00:27:54.551 --> 00:28:01.265
आत्मा के दर्शन के बिना भव का
अंत होता नहीं (है)। ये एक ही बात है।

00:28:01.289 --> 00:28:09.474
<b>विशेषोंको न देखनेवाले</b>,
सामान्य को देखनेवाला और विशेष
को देखने की चक्षु बंद हो गयी।

00:28:09.498 --> 00:28:13.883
<b>जीवोंको 'वह सब जीव द्रव्य है'</b>।

00:28:13.907 --> 00:28:20.296
जो सामान्य को देखा तो अंदर में जो
सामान्य जीव है, पारिणामिकरूप है

00:28:20.320 --> 00:28:29.856
और अनंतगुण को देखा वो भी
सामान्य में गर्भित है। वो भी एक अपेक्षा
से सामान्य है, वो पारिणामिकभाव है।

00:28:29.880 --> 00:28:35.789
द्रव्य के अंदर रहनेवाले अनंतगुण
वो भी सामान्य में गर्भित हो गए।

00:28:35.813 --> 00:28:41.998
अथवा गुण को भी सामान्य कहें,
पर्याय उसकी विशेष, गुण
को भी सामान्य कहा जाता है।

00:28:42.022 --> 00:28:49.514
मगर इधर सामान्य एकरूप अनंत
गुण का पिंड सामान्य, ध्रुव परमात्मा है।

00:28:49.538 --> 00:28:55.914
<b>जीवोंको 'वह सब जीव द्रव्य है' </b>
पर्याय को देखना बंद हो गया
तो पर्यायदृष्टि छूट गयी,

00:28:55.938 --> 00:29:09.083
पर्याय में अहंबुद्धि छूट गयी, पर्याय में
ममता छूट गयी, पर्याय के अंदर मोह छूट गया,
कर्ताबुद्धि छूट गयी, ज्ञाताबुद्धि छूट गयी।

00:29:09.107 --> 00:29:22.323
पर्यायदृष्टि छूटी और द्रव्यदृष्टि हो गयी।
द्रव्यदृष्टि - वो दिव्यदृष्टि है, वो
दिव्यता है, उसमें आनंद आता है।

00:29:22.347 --> 00:29:32.549
<b>'वह सब जीव द्रव्य है'
ऐसा भासित होता है</b>,
भाव-भासन होता है ऐसा प्रत्यक्ष।

00:29:32.573 --> 00:29:38.740
जो पर्याय को जानना बंद कर दे और
सामान्य को जाननेवाली चक्षु खोल दे

00:29:38.764 --> 00:29:43.616
कि 'सामान्य जानने में आता है, विशेष
जानने में नहीं आता है'। आहाहा!

00:29:43.640 --> 00:29:48.563
यह अस्ति-नास्ति अनेकांत है, भेदज्ञान है।
जाननहार जानने में आता है

00:29:48.587 --> 00:29:57.972
और पर जानने में नहीं आता है, भेदज्ञान
है उसमें। बाद में परिणाम को जान।

00:29:57.996 --> 00:30:08.007
दो को जान (वो) बाद में आयेगा। क्रमभंग
किया है? अभी अनुक्रम में आ जा।

00:30:08.031 --> 00:30:18.198
लायक शिष्य, उसको पश्चाताप होता
(है कि) हे सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा!
मैंने क्रमभंग किया है।

00:30:18.222 --> 00:30:29.332
क्रमभंग यानि पहले द्रव्य को
देखना चाहिए, वो देखा नहीं और पर्याय
को देखने में रुक गया, वो क्रमभंग हो गया।

00:30:29.356 --> 00:30:37.309
अभी आपकी वाणी से मालूम हुआ,
मेरी भूल मेरे को मालूम हो गई।
अभी मैं अनुक्रम में आता हूँ।

00:30:37.333 --> 00:30:42.843
अनुक्रम में यानि पहले द्रव्य को
देखूँगा, बाद में पर्याय को देखूँगा।

00:30:42.867 --> 00:30:52.296
बाद में दोनों को देखूँगा, प्रमाण से।
प्रमाण से दो दिखते हैं, नय से एक दिखता है।

00:30:52.320 --> 00:30:54.336
आहाहा! सब तीनों बातें इसमें हैं।

00:30:54.360 --> 00:31:01.927
द्रव्यार्थिकनय, पर्यायार्थिकनय और
दो को एक साथ जानना, वो
प्रमाणज्ञान, तीनों बातें इसमें हैं।

00:31:01.951 --> 00:31:05.709
कोई निकाली नहीं है मगर अनुक्रम है।

00:31:05.733 --> 00:31:13.700
पहले सामान्य को देखो, बाद में विशेष को
देखो, बाद में सामान्य-विशेष को देखो।

00:31:13.724 --> 00:31:19.114
तो पहले तो अनंतकाल से
प्रमाण के बाहर भटकता है।

00:31:19.138 --> 00:31:25.540
देखो! आत्मा के पास तो पर को
जाननेवाली चक्षु ही नहीं है। आहाहा!

00:31:25.564 --> 00:31:30.305
अंदर में वर्तुल (मर्यादा) में भी नहीं
आया, प्रमाण में भी नहीं आया!

00:31:30.329 --> 00:31:35.949
और कदाचित् प्रमाण में आ जाये तो पक्ष
हो गया, द्रव्य-पर्यायस्वरूप वस्तु है,

00:31:35.973 --> 00:31:37.825
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्</b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०) है,

00:31:37.849 --> 00:31:38.980
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यम्</b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय ५, सूत्र ३८) है।

00:31:39.004 --> 00:31:42.496
कौन न बोलता है भैया?
कौन न बोलता है?

00:31:42.520 --> 00:31:53.140
प्रमाणज्ञान का विषय तो है मगर
प्रमाणज्ञान पदार्थ का स्वरूप है, वो
पदार्थ की सिद्धि करता है प्रमाणज्ञान।

00:31:53.164 --> 00:32:00.643
अपने प्रयोजन की सिद्धि तो
उसमें से, प्रमाण में से
हेय-उपादेय निकालना चाहिए।

00:32:00.667 --> 00:32:05.994
प्रमाण के अंदर ही हेय-उपादेय हैं।
बाहर कहाँ हेय-उपादेय हैं?

00:32:06.018 --> 00:32:12.776
छहद्रव्य हेय भी नहीं हैं (और) उपादेय भी
नहीं हैं। सचमुच (तो) ज्ञेय भी नहीं हैं।

00:32:12.800 --> 00:32:25.354
परमार्थ से तो वो ज्ञेय नहीं हैं,
परमार्थ से तो इधर (स्व) ज्ञेय (है)।
वो आ गया सब।

00:32:25.378 --> 00:32:32.127
<b>ऐसा भासित होता है। </b>
मेरा भगवान सामान्य आत्मा मेरे
को अंदर में दर्शन हो गया आज।

00:32:32.151 --> 00:32:39.896
कैसे दर्शन हो गया तेरे को? कि
अनंतकाल से मैंने क्रमभंग किया
था कि पर्याय को पहले देखूँ,

00:32:39.920 --> 00:32:46.420
पर्याय को देखते-देखते द्रव्य
का दर्शन हो जाएगा। अट्ठाईस
मूलगुण, पाँच महाव्रत, आहाहा!

00:32:46.444 --> 00:32:55.278
आठ कर्म, १४८ कर्म की प्रकृति,
गुणस्थान, मार्गणास्थान देखते-
देखते कभी दर्शन हो जाएगा। आहाहा!

00:32:55.302 --> 00:33:07.585
तीनकाल में होनेवाला नहीं है।
विद्वान हो जाएगा मगर ज्ञानी नहीं होगा।

00:33:07.609 --> 00:33:16.736
छाबड़ा जी! सही है बात?
बराबर है? अच्छा! बोलो! यहाँ के
मंत्री हैं न वो बोलते हैं, बराबर है।

00:33:16.760 --> 00:33:29.029
स्मारक के (मंत्री)! एक मंत्री वहाँ बैठे
हैं, बड़े मंत्री प्रदीपभाई। आहाहा!

00:33:29.053 --> 00:33:36.456
प्रमाण तक तो अनंतबार आया।
पहले तो प्रमाण में आना ही मुश्किल है।

00:33:36.480 --> 00:33:44.856
मगर प्रमाण में अटक जाता है जीव,
प्रमाण में से नय निकाल नहीं सकता है।

00:33:44.880 --> 00:34:04.856
कार्तिकेयानुप्रेक्षा नाम का एक शास्त्र है,
उसमें लिखा है कि प्रमाण में से जो कोई जीव
निश्चयनय निकालता है वो जिनवचन में कुशल है।

00:34:04.880 --> 00:34:16.100
प्रमाण में से व्यवहार निकालता
है वो तो मूढ़, मिथ्यादृष्टि है।

00:34:16.124 --> 00:34:22.198
प्रमाण में से तो व्यवहार निकालना
एकदम सरल, सुगम है।

00:34:22.222 --> 00:34:30.380
मगर प्रमाण में से निश्चयनय का सामान्य
तत्त्व निकाल लेना, खींच लेना, आहाहा!

00:34:30.404 --> 00:34:45.345
दूध में से घी निकालना कठिन है। दूध
में से छाँछ निकालना तो आसान है।
छाँछ समझे ना?

00:34:45.369 --> 00:34:54.687
ऐसे कार्तिकेयानुप्रेक्षा (नामक)
शास्त्र है, उसमें कहाँ लिखा है
वो मेरे को मालूम नहीं है। समझे?

00:34:54.711 --> 00:35:02.127
लिखा है कि प्रमाणज्ञान का जो
विषय द्रव्य-पर्यायस्वरूप वस्तु है,
सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ है,

00:35:02.151 --> 00:35:17.394
उसमें से जो कोई निश्चयनय निकालता है यानि
निश्चयनय का विषय अपने परमात्मा सामान्य
तत्त्व को निकालता है, वो जिनवचन में कुशल है।

00:35:17.418 --> 00:35:25.123
और नहीं निकालता है, वह कैसा है
आप समझ लेना। समझे? आहाहा!

00:35:25.147 --> 00:35:31.820
ग्यारह अंग पढ़ डाले, आहाहा!
तो भी प्रमाण में तो आ गया। आहाहा!

00:35:31.844 --> 00:35:44.087
प्रमाण का विषय तो द्रव्यलिंगी मुनि के
पास है और भावलिंगी मुनि ने प्रमाण
में से सामान्य निकाला (है)। आहाहा!

00:35:44.111 --> 00:35:49.580
तो भावलिंग आ गया।
आहाहा! इतनी भूल है।

00:35:49.604 --> 00:35:57.536
प्रमाण तक तो अनंतबार आया
आत्मा। प्रमाण में आना कोई
(बड़ी बात नहीं), साधारण बात है।

00:35:57.560 --> 00:36:08.567
वो तो इतने शास्त्र हैं। ओहोहो! देखो!
तत्त्वार्थसूत्र में लिखा कि पाँचभाव जो
हैं न वो जीव के भाव हैं, असाधारण।

00:36:08.591 --> 00:36:15.236
हें? बोलो! वो श्रद्धा करने के 
काबिल है? ज्ञान का विषय है।

00:36:15.260 --> 00:36:24.429
प्रमाणज्ञान में आए पाँचों ही भाव, 
एक द्रव्यरूप और चार भाव पर्यायरूप। 
आहाहा!

00:36:24.453 --> 00:36:31.092
गुरुजी! पाँचभाव असाधारण हैं 
तो चार तो पर्यायरूप भाव हैं,

00:36:31.116 --> 00:36:36.665
उदय, उपशम, क्षयोपशम, क्षायिक और 
एक पारिणामिकभाव द्रव्यरूप सामान्य है।

00:36:36.689 --> 00:36:41.914
तो उसमें से पाँचभाव तक 
तो आ गया, द्रव्यलिंगी मुनि।

00:36:41.938 --> 00:36:54.007
पाँचभाव तो स्वीकार किए 
मगर पाँच में से एक निकालना 
आया नहीं, उसको आता नहीं है।

00:36:54.031 --> 00:37:01.763
तो पाँचभाव को, प्रमाणज्ञान को उपादेय 
मान लिया, ऐसा ही मैं हूँ, ऐसा ही मैं 
हूँ, ऐसा ही हूँ मैं, मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ।

00:37:01.787 --> 00:37:15.820
मगर प्रमाणज्ञान में से, पाँचभाव में से 
चार भाव हेय हैं, परभाव हैं, परस्वभाव 
हैं, परद्रव्य हैं, कर्मकृत हैं। आहाहा!

00:37:15.844 --> 00:37:21.083
सब आगम के वचन हैं, हो! सब आगम 
की बात है, परमागम में लिखा है।

00:37:21.107 --> 00:37:30.683
चार भाव जो हैं पर्यायरूप वो कर्मकृत 
हैं, विभावरूप हैं इसलिए हेय हैं;

00:37:30.707 --> 00:37:35.536
और एक परमपारिणामिक शुद्धात्मा 
(वह) एक ही उपादेय है। आहाहा!

00:37:35.560 --> 00:37:44.909
वो खींचना नहीं आया, आया नहीं 
उसको। विद्वान हो गया (परंतु) ज्ञानी 
नहीं हुआ। ऐसे अनंत-अनंतकाल बीता।

00:37:44.933 --> 00:37:51.549
अभ्यास तो प्रमाण का, 
पदार्थ का बहुत किया मगर 
उसमें से (निश्चयनय) निकालना,

00:37:51.573 --> 00:38:03.434
प्रमाणज्ञान में से निश्चयनय का विषय 
निकालता है, वो जिनवचन में कुशल है।

00:38:03.458 --> 00:38:15.340
वो चीज इसमें लिखी है कि पाँच प्रकार 
की जो पर्याय है विशेषरूप, उसमें जो 
एक सामान्य तत्त्व है, उसको तू देख ले।

00:38:15.364 --> 00:38:20.567
वो कब दिखे? कि जब पर्याय 
को जानना सर्वथा बंद कर दे।

00:38:20.591 --> 00:38:27.238
कि साहब! कथंचित् बंद कर 
दूँ तो? कथंचित् की बात नहीं, 
सर्वथा बंद कर दे। आहाहा!

00:38:27.262 --> 00:38:32.505
तो अँधा हो जाऊँगा। 
कि नहीं, देखता (देखना शुरू) हो 
जाएगा। अभी अँधा है तू।

00:38:32.529 --> 00:38:42.456
आत्मा का जो दर्शन नहीं होता है, 
उसका नाम ही अज्ञानी कहो कि 
अंधदृष्टि कहो, एक ही बात है। आहाहा!

00:38:42.480 --> 00:38:48.834
आचार्य भगवान ने कमाल कर दिया 
११४ गाथा में।

00:38:48.858 --> 00:38:56.203
<b>'वह सब जीव द्रव्य है' 
ऐसा भासित होता है। और जब 
द्रव्यार्थिक चक्षुको सर्वथा बन्द करके </b>

00:38:56.227 --> 00:39:04.403
यानि उपयोग वहाँ से हट जाता है। 
परिणति रह गयी, परिणति चिपक 
गयी, परिणति छूटती नहीं है अंदर में।

00:39:04.427 --> 00:39:12.114
परिणति कहो कि लब्ध कहो; पर्याय, 
ज्ञान की अपेक्षा से लब्ध है, चारित्र 
की अपेक्षा से परिणति। ठीक है!

00:39:12.138 --> 00:39:20.923
वो जो अनंतकाल से शुद्धोपयोग 
नहीं हुआ था ऐसा अतीन्द्रियज्ञान के 
उपयोग, उपयोग में आत्मा का दर्शन हुआ।

00:39:20.947 --> 00:39:31.927
उपयोग भले छूट गया मगर लब्ध ज्ञान, 
वो आत्मा को जाननेवाला चालू रह गया।

00:39:31.951 --> 00:39:36.700
और बाहर में आया तो इंद्रियज्ञान 
का व्यापार चालू हो गया।

00:39:36.724 --> 00:39:47.038
तो आचार्य भगवान फरमाते हैं कि 
अभी तेरा उपयोग बाहर आया तो 
उसको जानना अभी बंद कर दे।

00:39:47.062 --> 00:39:53.269
बंद करके <b>मात्र खुली हुई पर्यायार्थिक 
चक्षुके द्वारा देखा जाता है</b>।

00:39:53.293 --> 00:39:59.843
अभी द्रव्य का दर्शन तो हो गया, 
उसमें अहंबुद्धि हो गयी।

00:39:59.867 --> 00:40:09.603
अहंबुद्धि द्रव्य सामान्य में होने के बाद 
जो पर्याय को जानता है तो पर्यायदृष्टि 
नहीं होती है, पर्याय का ज्ञाता होता है।

00:40:09.627 --> 00:40:16.074
पहले पर्यायदृष्टि थी, पर्याय में 
अहंबुद्धि थी, पर्याय में स्वामित्वबुद्धि थी,

00:40:16.098 --> 00:40:21.692
पर्याय में कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति थी, 
वो सब अज्ञान चला गया।

00:40:21.716 --> 00:40:33.603
अभी पर्याय को जानता है, जाना हुआ प्रयोजनवान 
है मगर पर्याय में अहम् आता नहीं 
है क्योंकि अहम् तो एक जगह (पर) होता है।

00:40:33.627 --> 00:40:38.629
लक्ष एक जगह (पर) होता है। 
लक्ष दो जगह पर (होता नहीं)।

00:40:38.653 --> 00:40:45.607
स्वपरप्रकाशक में भी लक्ष तो एक 
जगह पर रहता है, लक्ष दो प्रकार (का) 
होता (नहीं है), लक्ष का एक ही प्रकार है।

00:40:45.631 --> 00:40:53.772
या तो परपदार्थ का लक्ष करे तो 
अज्ञानी; और स्वपदार्थ का, आत्मा 
का लक्ष करे तो ज्ञानी बनता है।

00:40:53.796 --> 00:40:59.714
<b>पर्यायार्थिक चक्षुके 
द्वारा देखा जाता है </b>पर्याय,

00:40:59.738 --> 00:41:09.105
<b>तब जीवद्रव्यमें रहनेवाले 
नारकपना, तिर्यंचपना, मनुष्यपना, 
देवपना और सिद्धपना </b>

00:41:09.129 --> 00:41:15.456
इन पाँच पर्यायों को जानता है 
कि पाँच पर्यायें हैं, ऐसे खरगोश 
के सींग (जैसा असंभव) नहीं हैं।

00:41:15.480 --> 00:41:18.878
सांख्यमति (जैसा) कहते हैं 
ऐसी चीज नहीं है।

00:41:18.902 --> 00:41:27.380
द्रव्य में अहम् करके पर्याय को 
जानता है मगर पर्याय के 
प्रति जानने में उदासीन है।

00:41:27.404 --> 00:41:34.918
पर्याय को जानने की रुचि नहीं है, 
जानने का भाव नहीं है; 
जणित (जानने में आ) जाती है।

00:41:34.942 --> 00:41:39.109
पर्याय जणित (जानने में आ) जाये 
तो भी पर्याय का लक्ष नहीं है।

00:41:39.133 --> 00:41:44.069
पर्याय का लक्ष किए बिना 
पर्याय जानने में आती है।

00:41:44.093 --> 00:41:48.456
पर्याय को जानने के लिए पर्याय 
का लक्ष करना पड़ता नहीं है

00:41:48.480 --> 00:41:53.687
क्योंकि पर्याय का लक्ष करे 
तो द्रव्य का लक्ष छूट जाता है 
(और) मिथ्यादृष्टि हो जाता है।

00:41:53.711 --> 00:42:03.452
थोड़ी सूक्ष्म बात है! 
थोड़ी सूक्ष्म बात है!

00:42:03.476 --> 00:42:11.812
क्या कहा? कि आत्मा का दर्शन 
तो हो गया। सम्यग्दर्शन-ज्ञान तो प्रगट 
हो गया। अंदर में ठहर नहीं सकता है।

00:42:11.836 --> 00:42:18.798
अनादि मिथ्यादृष्टि जीव है। 
समझे? क्षयोपशम सम्यग्दर्शन 
भी होता है कितनों को।

00:42:18.822 --> 00:42:24.420
किसी को, अनादि मिथ्यादृष्टि को 
उपशम होता है। प्रथमोपशम हो गया 
तो क्षयोपशम इधर भी होता है।

00:42:24.444 --> 00:42:31.047
तो बाहर आता है उपयोग, तो ये 
पर्याय तो जानने में आती है, पर्याय तो।

00:42:31.071 --> 00:42:38.363
मगर पर्याय का ज्ञान होने पर 
भी पर्याय का लक्ष नहीं है।

00:42:38.387 --> 00:42:45.300
पर्याय के लक्ष से पर्याय का ज्ञान 
नहीं होता है; द्रव्य के लक्ष से 
पर्याय का ज्ञान हो जाता है।

00:42:45.324 --> 00:42:50.389
लक्ष छूटता नहीं है और पर्याय 
जणित (जानने में आ) जाती है।

00:42:50.413 --> 00:42:56.420
अहम् छूटता नहीं है इधर 
(द्रव्य) से और पर्याय जानने में 
आवे तो भी अहम् होता नहीं है।

00:42:56.444 --> 00:43:02.936
इसलिए पर्याय का लक्ष नहीं है। पर्याय 
जानने पर भी पर्याय का लक्ष नहीं रहता है।

00:43:02.960 --> 00:43:08.358
अंदर की ये बात है। 
किरीट भैया! समझ में आया कुछ?

00:43:08.382 --> 00:43:16.189
क्या कहा? जब आत्मा का दर्शन हुआ, 
अंदर में निर्विकल्पध्यान में टिकता नहीं है

00:43:16.213 --> 00:43:22.207
और उपयोग इंद्रियज्ञान का बाहर चला गया, 
इंद्रियज्ञान का व्यापार चालू हो गया,

00:43:22.231 --> 00:43:25.874
इंद्रियज्ञान लब्ध (रूप) था न 
वो उपयोगरूप हो गया,

00:43:25.898 --> 00:43:37.136
तो इंद्रियज्ञान में जो पर्याय जानने में 
आती है मगर पर्याय का लक्ष नहीं है 
ज्ञानी को, लक्ष तो एक जगह पर रहता है।

00:43:37.160 --> 00:43:43.349
ज्ञान दो का और लक्ष एक का। 
लक्ष छूटता नहीं है। पर्याय का ज्ञाता है।

00:43:43.373 --> 00:43:50.314
पर्याय जानने में आती है 
मगर पर्याय का लक्ष जो होवे, तो 
लक्ष इधर से (द्रव्य से) छूट जाता है।

00:43:50.338 --> 00:43:54.425
लक्ष दो जगह पर नहीं रहता है; 
लक्ष एक जगह पर (ही) रहता है।

00:43:54.449 --> 00:44:03.447
अज्ञानी का लक्ष पर्याय पर है; साधक 
का लक्ष तीनों काल जहाँ तक साधक 
रहता है, तहाँ तक ये लक्ष द्रव्य पर है।

00:44:03.471 --> 00:44:09.856
अरिहंत हों तो भी लक्ष द्रव्य पर, सिद्ध 
हों तो भी (लक्ष द्रव्य पर)। आहाहा! 
सादि अनंतकाल लक्ष छूटता नहीं है।

00:44:09.880 --> 00:44:19.154
लक्ष छूटता नहीं है तो सम्यग्दर्शन टिकता है, 
लक्ष छूट जाता है तो सम्यग्दर्शन चला जाता है।

00:44:19.178 --> 00:44:23.825
लक्ष (तो) अंदर का है 
और पर्याय का ज्ञान होता है।

00:44:23.849 --> 00:44:28.976
कितनी पर्याय वीतराग हो गईं, कितना राग 
है, कितनी शुद्धि है, कितनी अशुद्धि है,

00:44:29.000 --> 00:44:37.816
वो सब उसको जानने में आ रहा है 
मगर लक्ष नहीं है वहाँ। आहाहा!

00:44:37.840 --> 00:44:46.816
वो आदेय (आदरणीय) नहीं है, उपादेय 
नहीं है, उसके आश्रय से ज्ञान नहीं 
होता है, पर्याय ... नहीं होता है।

00:44:46.840 --> 00:44:58.038
पर्याय के आश्रय से पर्याय का ज्ञान 
नहीं होता है; द्रव्य के आश्रय से 
पर्याय का ज्ञान हो जाता है।

00:44:58.062 --> 00:45:03.460
द्रव्य में अहंबुद्धि हुई तो पर्याय का ज्ञान 
तो होता है क्योंकि ज्ञान सविकल्प है।

00:45:03.484 --> 00:45:09.923
पर्याय को जानता है कि ये पर्याय हुई 
मगर उस पर्याय का लक्ष नहीं है; 
लक्ष बिना जानता है।

00:45:09.947 --> 00:45:16.323
जैसे केवली भगवान लोकालोक को जानते हैं 
मगर लोकालोक का लक्ष नहीं है।

00:45:16.347 --> 00:45:28.176
ऐसे श्रुतज्ञानी, ऐसे श्रुतज्ञानी का लक्ष 
पर ऊपर जाता ही नहीं है; लक्ष बिना 
जणित (जानने में आ) जाता है। आहाहा!

00:45:28.200 --> 00:45:39.207
राग जणित (जानने में आ) जाता है परंतु राग 
का लक्ष करके राग का ज्ञान नहीं होता है।

00:45:39.231 --> 00:45:42.443
<b>अचलं परलक्ष्येऽभावाच्चंचलता
-रहितं </b>(परम अध्यात्म तरंगिणी - 
समयसार कलश ४२ की टीका) आहाहा!

00:45:42.467 --> 00:45:50.207
श्रुतज्ञानी का लक्ष तो आत्मा पर है। 
इंद्रियज्ञान पर को जानता है, 
मैं तो पर को जानता नहीं हूँ।

00:45:50.231 --> 00:45:52.185
तो भी जणित (जानने में आ) जाता है, 
तो जणित (जानने में आ) जाता है।

00:45:52.209 --> 00:45:56.212
लक्ष नहीं है (उस पर), 
(उसकी) उपेक्षा है, उदासीनता है। आहाहा!

00:45:56.236 --> 00:46:02.825
पर को जानने की अभिलाषा नहीं है 
क्योंकि पर को जानने से 
शुद्धि की वृद्धि नहीं होती है।

00:46:02.849 --> 00:46:14.554
आत्मा में स्थिरता जितने प्रमाण में होती है 
उतने प्रमाण में निर्जरा होती है।

00:46:14.578 --> 00:46:20.732
पाँच मिनिट बाकी हैं, 
३.५० तक पूरा करना है।

00:46:20.756 --> 00:46:29.492
क्या कहा? द्रव्य को जानने का 
चक्षु बंद किया और पर्याय को जानता है 
तो पर्याय पाँच प्रकार की है, तो जानता है।

00:46:29.516 --> 00:46:41.523
<b>सिद्धपना - पर्यायस्वरूप अनेक 
विशेषोंको देखनेवाले और सामान्यको 
न देखनेवाले जीवोंको</b>,

00:46:41.547 --> 00:46:48.616
क्योंकि जो पर्याय विशेष को देखती है 
वो पर्याय सामान्य को देखती नहीं है।

00:46:48.640 --> 00:46:59.780
वो विशेष को देखनेवाला इंद्रियज्ञान हो गया, 
वो सामान्य को देखता नहीं। 
आहाहा! क्या कहा?

00:46:59.804 --> 00:47:04.212
<b>विशेषोंको देखनेवाले और 
सामान्यको न देखनेवाले</b>।

00:47:04.236 --> 00:47:07.674
वो सामान्य को देखती है 
और विशेष को देखती नहीं।

00:47:07.698 --> 00:47:18.345
ये विशेष को देखती है, 
ये ज्ञान सामान्य को देखती नहीं। 
बहन! ऐसी बात है! आहाहा!

00:47:18.369 --> 00:47:28.794
क्या कहा? कि विशेष को जानते हैं 
मगर उस ज्ञान सामान्य को नहीं जानते हैं।

00:47:28.818 --> 00:47:35.114
 <b>और सामान्यको न देखनेवाले 
जीवोंको (वह जीव द्रव्य) 
अन्य-अन्य भासित होता है, </b>

00:47:35.138 --> 00:47:42.945
विशेष को देखो तो आत्मा अन्य-अन्य 
नर-नारकादि पर्यायरूप 
अनेक-अनेकरूप दिखाई देता है।

00:47:42.969 --> 00:47:53.487
<b>क्योंकि द्रव्य उन-उन विशेषोंके 
समय तन्मय होनेसे उन-उन विशेषोंसे 
अनन्य है, </b>वो पर्याय आत्मा से अनन्य है।

00:47:53.511 --> 00:48:00.016
तो पर्याय को देखता है, नारकादि पर्याय, 
मनुष्य आदि पर्याय को जो जानता है,

00:48:00.040 --> 00:48:06.852
वो सामान्य को उस समय नहीं जानता 
है क्योंकि वो चक्षु बंद हो गयी है।

00:48:06.876 --> 00:48:14.852
कोई अलौकिक बात है! 
अलौकिक बात! वचनातीत बात है।

00:48:14.876 --> 00:48:21.483
देखो! अभी उसके लिए 
एक दृष्टांत देते हैं, दृष्टांत।

00:48:21.507 --> 00:48:35.678
<b>कण्डे, घास, पत्ते और काष्ठमय 
अग्निकी भाँति। </b>कंडे का क्या 
अर्थ होता है? छाणा, अच्छा!

00:48:35.702 --> 00:48:41.656
जो <b>घास, </b>तो 
बराबर, सूखा घास और <b>पत्ते </b>सूखे पत्ते

00:48:41.680 --> 00:48:55.514
और <b>काष्ठमय </b>लकड़ीमय <b>अग्निकी 
भाँति</b>, जो अग्नि काष्ठ को जलाती है, तो 
वो अग्नि काष्ठमय दिखाई देती है, अनन्य है।

00:48:55.538 --> 00:48:59.367
अग्नि काष्ठमय, पत्तेमय दिखाई देती है।

00:48:59.391 --> 00:49:11.745
<b>(जैसे घास, लकड़ी इत्यादिकी अग्नि 
उस-उस समय घासमय, लकड़ीमय इत्यादि 
होनेसे घास, लकड़ी इत्यादिसे अनन्य है, </b>

00:49:11.769 --> 00:49:22.154
अग्नि वो जो-जो पदार्थ है, उसको जलाती 
है, उस समय उस पदार्थ से अनन्य है।

00:49:22.178 --> 00:49:33.914
<b>उसीप्रकार द्रव्य उन-उन 
पर्यायरूप विशेषोंके समय तन्मय होनेसे 
उनसे अनन्य है - पृथक् नहीं है।) </b>

00:49:33.938 --> 00:49:42.887
पर्याय से देखो तो वो द्रव्य उसरूप हो गया 
और द्रव्य से देखो तो उसरूप हुआ नहीं है।

00:49:42.911 --> 00:49:47.572
अन्य भी है और अनन्य भी है; 
पर्याय से देखो तो अन्य-अन्य है

00:49:47.596 --> 00:49:51.865
और द्रव्य से देखो तो वो ही का वो 
ही, वो ही का वो ही, वो है का वो ही।

00:49:51.889 --> 00:49:56.883
सब में अग्नि, सब में अग्नि, सब में अग्नि, 
अग्नि-अग्नि एक जैसी है।

00:49:56.907 --> 00:50:02.838
निमित्त अलग-अलग होता है 
(मगर) अग्नि तो एक होती है।

00:50:02.862 --> 00:50:08.207
<b>और जब उन द्रव्यार्थिक 
और पर्यायार्थिक दोनों आँखोंको 
एक ही साथ खोलकर</b>,

00:50:08.231 --> 00:50:10.540
अभी दोनों आँखें खोलो एक साथ।

00:50:10.564 --> 00:50:17.789
पहले क्रम पड़ा था अभी दो आँखों से देखो 
तो सामान्य-विशेष एक साथ दिखाई देते हैं।

00:50:17.813 --> 00:50:23.078
अक्रम, प्रमाण से अक्रम हैं 
द्रव्य-पर्याय; नय से क्रम है।

00:50:23.102 --> 00:50:33.212
नय से देखो तो क्रम पड़ता है; प्रमाण से 
देखो तो द्रव्य-पर्याय एक साथ युगपद्। 
युगपद् का ग्राहक है प्रमाणज्ञान।

00:50:33.236 --> 00:50:43.625
नय में मुख्य-गौण होता है; प्रमाण में 
मुख्य-गौण होता नहीं है। आहाहा! ऐसा है।

00:50:43.649 --> 00:50:47.678
<b>और जब उन द्रव्यार्थिक 
और पर्यायार्थिक दोनों आँखोंको 
एक ही साथ खोलकर</b>

00:50:47.702 --> 00:50:53.905
<b>उनके द्वारा और इनके द्वारा (द्रव्यार्थिक 
तथा पर्यायार्थिक चक्षुओंके) देखा जाता है</b>

00:50:53.929 --> 00:51:02.674
<b>तब नारकपना, तिर्यंचपना, 
मनुष्यपना, देवपना और सिद्धपना 
पर्यायोंमें रहनेवाला जीवसामान्य</b>

00:51:02.698 --> 00:51:07.225
<b>तथा जीवसामान्यमें रहनेवाला नारकपना, 
तिर्यंचपना, मनुष्यपना, देवपना</b>

00:51:07.249 --> 00:51:12.274
<b>और सिद्धत्वपर्यायस्वरूप 
विशेष तुल्यकालमें ही (एक ही साथ)</b>,

00:51:12.298 --> 00:51:22.683
प्रमाण में एक ही साथ द्रव्य-पर्याय 
जानने में आते हैं, क्रम नहीं पड़ता है। 
<b>दिखाई देते हैं। </b>

00:51:22.707 --> 00:51:28.412
ऐसे प्रमाण से एक साथ द्रव्य-पर्याय 
दिखती है और नय से क्रम पड़ता है।

00:51:28.436 --> 00:51:40.474
मगर प्रमाण में से पहले, प्रमाण में से पहले 
नय में आना चाहिए और नयपूर्वक 
प्रमाण होता है तो प्रमाण सम्यग्ज्ञान है।

00:51:40.498 --> 00:51:49.154
पहले सामान्य प्रमाण, विकल्पात्मक प्रमाण, 
अनुभव के पहले द्रव्य-पर्यायस्वरूप वस्तु 
को जानो तो पर से जुदा पड़ गया।

00:51:49.178 --> 00:51:53.794
पर से एकदम जुदा पड़ गया। प्रमाण 
से बाहर मेरी कोई चीज है नहीं।

00:51:53.818 --> 00:52:01.834
प्रमाण में आया और प्रमाण के पक्ष 
में अटकना नहीं। तो क्या करना?

00:52:01.858 --> 00:52:06.460
कि कार्तिकेयानुप्रेक्षा (में) 
स्वामी कार्तिकेय फरमाते हैं

00:52:06.484 --> 00:52:15.985
कि प्रमाण में से जो कोई 
जीव निश्चयनय निकालता है वो 
जिनवचन में कुशल है। आहाहा!

00:52:16.009 --> 00:52:24.265
तो नय से निकाला (और) भगवान आत्मा का 
दर्शन कर लिया। बाद में अनुक्रम में आ गया।

00:52:24.289 --> 00:52:31.336
अनुक्रम - पहले द्रव्य को जानो, बाद में 
पर्याय को जानो, जाना कि पर्याय है; 
ना नहीं है, जानने में आता है।

00:52:31.360 --> 00:52:39.300
और युगपद् साथ में जानो तो 
द्रव्य-पर्याय एक समय में जानने में 
आता है, उसमें कोई क्रम नहीं पड़ता (है)।

00:52:39.324 --> 00:52:43.234
एक साथ जानने में आये 
उसका नाम प्रमाणज्ञान है।

00:52:43.258 --> 00:52:50.696
ऐसे इस गाथा के ऊपर 
व्याख्यान हो गए है। और इधर भी 
स्टॉल में यह पुस्तक इधर मिलती है।

00:52:50.720 --> 00:52:55.283
हमारे पास भी है गुजराती में। 
उसको पढ़ लेना।

00:52:55.307 --> 00:53:01.843
अपनी प्रयोजनभूत बात इसमें है। 
प्रमाण में से नय निकालकर 
आत्मदर्शन हो जाता है।

00:53:01.867 --> 00:53:06.218
टाइम हो गया।