﻿WEBVTT

00:01:12.060 --> 00:01:17.649
और क्यों कर्ता नहीं है? (क्यों)
कि <b>तद्रूपो न भवति</b>
(समयसार जयसेनाचार्य टीका गाथा ३२०);

00:01:17.673 --> 00:01:25.643
उसरूप होता नहीं इसलिए
वो रागादि क्रिया करता नहीं।

00:01:25.667 --> 00:01:35.238
और मोक्ष की कारणभूत जो भावना,
निश्चय रत्नत्रय के परिणाम प्रगट होता है,

00:01:35.262 --> 00:01:38.763
उसको करता नहीं है क्योंकि
<b>तद्रूपो न भवति</b>।

00:01:38.787 --> 00:01:48.825
अर्थात् कि त्रिकाली द्रव्य
जो सामान्य है वह विषेशरूप
होता नहीं, विशेष में जाता नहीं।

00:01:48.849 --> 00:01:59.167
जो सामान्य स्वभाव छूट जाये
और स्वयं विशेषरूप हो जाये
तो-तो विशेष को कर सके।

00:01:59.191 --> 00:02:08.047
परंतु सामान्य अकारक जो स्वभाव है,
वह तो सामान्य स्वभाव से स्थित है;

00:02:08.071 --> 00:02:15.945
विशेष में क्रिया होती है, फिर भी
वह विशेष की क्रिया को करता
नहीं है, सम्यग्दर्शन आदि (को)।

00:02:15.969 --> 00:02:25.323
क्यों? (क्योंकि) <b>तद्रूपो न भवति</b>
- उसरूप होता नहीं इसलिए उसको करता नहीं।

00:02:25.347 --> 00:02:35.136
मात्र जानता है इतना कहा;
मात्र जानता है इतना कहा।

00:02:35.160 --> 00:02:49.092
अभी जैसे <b>तद्रूपो न भवति</b> है,
ऐसे आत्मा पर को जानता नहीं।

00:02:49.116 --> 00:02:54.287
मगर आत्मा तो आत्मा को ही अभेद
रूप से जानता है, पर को जानता नहीं।

00:02:54.311 --> 00:02:58.820
पर को क्यों जानता नहीं?
लोकालोक को क्यों जानता नहीं?

00:02:58.844 --> 00:03:11.189
आठ कर्म को, राग को क्यों जानता नहीं
अथवा भेद को क्यों जानता नहीं?

00:03:11.213 --> 00:03:20.523
जो परद्रव्य स्वरूप हैं भेद
(क्योंकि) <b>तद्रूपो न भवति</b>,
उनमें तन्मय होता नहीं।

00:03:20.547 --> 00:03:25.852
रागादि में, देहादि में या
लोकालोक में ज्ञान तन्मय होता नहीं।

00:03:25.876 --> 00:03:33.367
इसलिए ये ज्ञान तन्मय होता नहीं
इसलिए पर को जानता नहीं।

00:03:33.391 --> 00:03:44.332
और ज्ञान ज्ञायक को तन्मय होकर
जानता है। ज्ञान जानता तो है,
पर को नहीं (बल्कि) स्व को।

00:03:44.356 --> 00:03:50.923
पर में तन्मय होता नहीं इसलिए
पर को जानता नहीं और स्व में
तो तन्मय होकर जानता है।

00:03:50.947 --> 00:03:56.367
इसलिए यह ज्ञान आत्मा को ही जानता है,
पर को नहीं।

00:03:56.391 --> 00:04:09.989
ऐसे आत्मा आत्मा में तन्मय होकर आत्मा को
जानता है, तो ये ज्ञान आत्मा का कर्म होता
है और उसका कर्ता कहने में आता है।

00:04:10.013 --> 00:04:18.132
परंतु राग (का) तो कर्ता होता ही नहीं
क्योंकि उसमें तन्मय होता नहीं, इसलिए
कर्ता-कर्म राग के साथ नहीं है।

00:04:18.156 --> 00:04:25.620
कर्ता-कर्म कहना हो तो आत्मा के
साथ कहो। कर्ता-कर्म अधिकार जो
चलता है न, उस अपेक्षा से (कहो)।

00:04:25.644 --> 00:04:34.109
इसलिए तन्मय होता नहीं इसलिए जानता
नहीं है और तन्मय होता नहीं, इसलिए
पर का कर्ता नहीं (क्योंकि) परद्रव्य है।

00:04:34.133 --> 00:04:45.954
अभी एक विशेष इसमें है कि शास्त्र में तो
आता है कि साधक परिणाम को जानता है।

00:04:45.978 --> 00:04:59.634
१२वीं गाथा में आया, 'व्यवहार जाना हुआ
प्रयोजनवान है' परिणाम को जानता है,
तो ये सचमुच में भेद का कथन है।

00:04:59.658 --> 00:05:03.678
अभेद से तो अभेद आत्मा को जानता है।

00:05:03.702 --> 00:05:24.252
जब थोड़ा भी भेद पड़ता है
तो पर को जानता है, ऐसा
व्यवहार खड़ा हो जाता है।

00:05:24.276 --> 00:05:32.887
फिर से कहूँ, फिर से।
अच्छी बात है, इसलिए।

00:05:32.911 --> 00:05:42.100
साधक अपने में उत्पन्न होते हुये
परिणाम को जानता है, वह
भेद में आता है तो जानता है।

00:05:42.124 --> 00:05:53.327
अभेद में रहता है तो
परद्रव्य को जानता नहीं;
परिणाम कहो या परद्रव्य कहो।

00:05:53.351 --> 00:05:58.407
यह विचार क्यों आया आज?

00:05:58.431 --> 00:06:05.078
कि माइलधवल में है कि निश्चय
से ज्ञान आत्मा को जानता है

00:06:05.102 --> 00:06:19.389
और व्यवहारनय से देखने में आये
तो मतिज्ञान आदि के जो भेद
पड़ते हैं वे पर को जानते हैं।

00:06:19.413 --> 00:06:29.825
ज्ञान जब अंतर्मुख होकर एकाकार होता है,
शुद्धोपयोग में लीन हो जाता है तो
उसमें, अभेद में भेद दिखता नहीं है।

00:06:29.849 --> 00:06:34.216
तो फिर भेद दिखता नहीं
इसलिए भेद को जानता नहीं।

00:06:34.240 --> 00:06:44.634
और उपयोग जब छूटता है,
सम्यग्दर्शन तो रहता है मगर भेद में
आता है जब, तब पर को जानता है।

00:06:44.658 --> 00:06:56.554
द्रव्य और पर्याय के निर्विकल्पध्यान के
समय जो अनन्यपना और अभेदपना है,
उस समय पर को जानता नहीं।

00:06:56.578 --> 00:07:00.069
मुमुक्षु: यही सही स्वरूप है आत्मा का?
पू. लालचंदभाई: बराबर है!

00:07:00.093 --> 00:07:03.074
और पर को जानता है वह कब आया?
कि भेद पड़े तो।

00:07:03.098 --> 00:07:07.620
मुमुक्षु: ये तो दोष हुआ न?
पू. लालचंदभाई: द्रव्य और पर्याय
के मध्य भेद पड़ गया

00:07:07.644 --> 00:07:12.758
तो सविकल्पदशा में आया,
तब पर को जानता है।

00:07:12.782 --> 00:07:20.305
ऐसे व्यवहार से, मतिश्रुत पर को जानता है,
केवलज्ञान भी पर को जानता है,
यह बात सच्ची है।

00:07:20.329 --> 00:07:26.234
इतना भेद करो आप, आत्मा से केवलज्ञान
को भिन्न करो तो उस केवलज्ञान में
पर जानने में आयेगा आपको।

00:07:26.258 --> 00:07:39.443
पर उस केवलज्ञान को आत्मामय
कर दो तो स्व जानने में आएगा,
आत्मा जानने में आयेगा।

00:07:39.467 --> 00:07:49.225
इसलिए साधक की सविकल्पदशा का
कथन भी शास्त्र में आते हैं, तब इतना
समझना कि यह भेद का कथन है।

00:07:49.249 --> 00:07:53.034
सम्यग्दर्शन रहता है
परंतु चारित्र का दोष आता है।

00:07:53.058 --> 00:07:57.465
मुमुक्षु: उसको दोष समझना।
पू. लालचंदभाई: गुण नहीं, दोष है।

00:07:57.489 --> 00:08:04.380
'व्यवहार जाना हुआ प्रयोजनवान'
(समयसार गाथा १२ का शीर्षक)
दोष है, गुण नहीं।

00:08:04.404 --> 00:08:19.860
निर्विकल्पध्यान छूट गया,
निश्चय धर्मध्यान छूट गया (और)
व्यवहार धर्मध्यान आ गया।

00:08:19.884 --> 00:08:26.869
परिणति है, यह गौण है।
मगर उस शुद्धोपयोग को जो
हम निश्चय धर्मध्यान कहते हैं, ऐसे।

00:08:26.893 --> 00:08:36.847
मुमुक्षु: दोष हुआ न वो तो?
पू. लालचंदभाई: दोष हुआ। आहाहा!

00:08:36.871 --> 00:08:44.794
अब, द्रव्य और पर्याय का भेद दिखता है,
तब बाहर में मिथ्यात्व कर्म का बंध होता है।

00:08:44.818 --> 00:08:57.389
यह क्या?
यह जरा ले लें शास्त्र के साथ। अभी यह
चलता है विषय, भेद-अभेद का विषय चलता है।

00:08:57.413 --> 00:09:02.167
विचार तो आता है न, सब विचार तो
आता है न! स्वाध्याय किसलिए करते हैं?

00:09:02.191 --> 00:09:06.714
विचार करने के लिए है न,
(सिर्फ) पढ़ने में कोई मज़ा नहीं है!

00:09:06.738 --> 00:09:13.558
ये लेख है वह मिथ्यादृष्टि का है।

00:09:13.582 --> 00:09:22.487
क्योंकि ये जो ज्ञान में ज्ञायक का उसको
भेद दिखता है, अर्थात् ज्ञान में ज्ञायक तन्मय
होकर जानने में आता नहीं, भेद पड़ गया।

00:09:22.511 --> 00:09:24.856
मुमुक्षु: पूरा अभेद ज्ञेय जानने में आना चाहिए।
पू. लालचंदभाई: जानने में आना चाहिए।

00:09:24.880 --> 00:09:31.687
उसके बदले उसको ज्ञान और ज्ञायक
का भेद पड़ गया, तो ज्ञान पर को जानने में
रुक गया। भेद में पर जानने में आता है।

00:09:31.711 --> 00:09:36.652
अज्ञानी को भेद पड़ता है तो पर
जानने में आता है। समझ में आया?

00:09:36.676 --> 00:09:41.003
इसमें तो अनुभव नहीं, साध्य की सिद्धि
नहीं। साध्य की सिद्धि नहीं तो क्या है?

00:09:41.027 --> 00:09:51.976
मिथ्यात्व का कर्म-बंध होता है, इतने में भी!
यह विचार पहले आया (और) बाद में
वो विचार आए कि ऐसा कैसे है?

00:09:52.000 --> 00:10:01.723
ये यथार्थ है क्योंकि अनन्य नहीं हुआ न,
ज्ञेय नहीं हुआ न, अभेद ज्ञेय नहीं हुआ न।

00:10:01.747 --> 00:10:07.180
मुमुक्षु: ज्ञेय तो अभेद ही होता है।
पू. लालचंदभाई: ज्ञेय अभेद ही होता है,
ज्ञेय में दो भेद नहीं हैं।

00:10:07.204 --> 00:10:16.896
द्रव्य और पर्याय (ऐसे) दो ज्ञेय नहीं हैं।
मुमुक्षु: एक ज्ञेय है, एक ही ज्ञेय है,
एक अभेद ज्ञेय है।

00:10:16.920 --> 00:10:19.696
पू. लालचंदभाई: एक अभेद ज्ञेय है।
मुमुक्षु: हाँ! ज्ञेय अभेद ही होता है।

00:10:19.720 --> 00:10:24.154
पू. लालचंदभाई: ज्ञेय अभेद ही होता है।
मुमुक्षु: अभेद होता है तो ही ज्ञेय होता है।
पू. लालचंदभाई: (तो ही) ज्ञेय होता है।

00:10:24.178 --> 00:10:29.727
मुमुक्षु: अभेद है। भेद में ज्ञेय नहीं है?
पू. लालचंदभाई: भेद में ज्ञेय नहीं है।
आहाहा!

00:10:29.751 --> 00:10:37.660
मुमुक्षु: आहाहा! भाई बहुत उत्तम बात है।
ये सेटिका की गाथा में लिया है।
सेटिका की गाथा में लिया है।

00:10:37.684 --> 00:10:44.416
पू. लालचंदभाई: लिया है न! लिया है।
मुमुक्षु: कि वहाँ भेद पड़ता है
इसलिए मिथ्यात्व कर्म का बंध होता है।

00:10:44.440 --> 00:10:47.220
और मिथ्यात्व जाने के बाद जितना
भेद पड़ता है उसमें रागादि होते हैं।

00:10:47.244 --> 00:10:52.025
पू. लालचंदभाई: उतना रागादि होता है
वो बंध का कारण है। वो दोष है न?
मुमुक्षु: यहाँ न्याय का विचार करें तो।

00:10:52.049 --> 00:10:58.123
पू. लालचंदभाई: हाँ तो उसमें तो
इतना ही मैंने लिया है न, कि ये इसमें
कर्म का बंध क्यों होता है, मिथ्यात्व का?

00:10:58.147 --> 00:11:03.136
कि वो अभेद हुआ नहीं है।
ज्ञायक और ज्ञान को जुदा रखा।

00:11:03.160 --> 00:11:08.087
एक ज्ञेय, अभेद ज्ञेय होना चाहिए न?
वो नहीं हुआ। नहीं हुआ तो क्या होता है?

00:11:08.111 --> 00:11:15.638
मिथ्यात्व (का) बंध होता है, कर्म (का),
दर्शनमोह बंधता है बाहर में।

00:11:15.662 --> 00:11:20.772
और अभेद होकर वापस भेद में आवे
तो चारित्रमोह बंधता है।

00:11:20.796 --> 00:11:28.469
मुमुक्षु: सही है! दोष तो दोष ही है न?
पू. लालचंदभाई: दोष तो दोष ही है न!

00:11:28.493 --> 00:11:35.158
मुमुक्षु: एक बाजू आप कहते हैं कि
मिथ्यात्व गलता है और एक बाजू आप
कहते हैं कि मिथ्यात्व बँधता है, वो क्या है?

00:11:35.182 --> 00:11:41.323
पू. लालचंदभाई: हाँ!
वो गलता है वो अलग बात है
और बँधता है वो अलग बात है।

00:11:41.347 --> 00:11:47.856
आत्मा आत्मा को जानता है अर्थात्
पर को जानता नहीं, तो पर को
जाननेवाला जो तीव्र मिथ्यात्व था

00:11:47.880 --> 00:11:55.749
वह 'जाननहार ही जानने में आता है’ तो
पर को जानने का तीव्र मिथ्यात्व-बंध (का)
अनुभाग कम होने लगा, यहाँ भाव-अनुभाग।

00:11:55.773 --> 00:11:59.629
समझ गए? और आत्मा आत्मा को
जानता है तो पक्ष में आया कि नहीं?

00:11:59.653 --> 00:12:04.505
तो पक्ष में आया तो इतना
मिथ्यात्व तीव्र नहीं होता है यहाँ,
मंद होता है, मिथ्यात्व गलता है।

00:12:04.529 --> 00:12:07.927
मुमुक्षु: यहाँ तक भी मिथ्यात्व है।
पू. लालचंदभाई: है!
मुमुक्षु: ऐसा कहकर अनुभव कराना है।

00:12:07.951 --> 00:12:13.514
पू. लालचंदभाई: अनुभव कराना है, बस, बस।

00:12:13.538 --> 00:12:23.558
मिथ्यात्व गलता है, ये तो पर की अपेक्षा
से अंदर आया तो इतना तो तीव्र मिथ्यात्व
तो जाता ही है न, होता ही नहीं है न फिर।

00:12:23.582 --> 00:12:26.660
निषेध आया न पर को जानने का?
पक्ष में आया कि नहीं?

00:12:26.684 --> 00:12:34.856
तो पक्ष में आया, स्वभाव के पक्ष में आये
तो मिथ्यात्व तो है अभी, परंतु वह
गल रहा है। वो टल जाएगा, टले।

00:12:34.880 --> 00:12:45.918
मुमुक्षु: अभेद होगा तो टल जाएगा।
पू. लालचंदभाई: टल जाएगा।

00:12:45.942 --> 00:12:50.763
मति-श्रुतज्ञान का भेद पड़ता है,
वह पर को जानता है। ओहोहो!

00:12:50.787 --> 00:12:57.394
अभेद हो जाये मतिश्रुत तो-तो ज्ञान हो गया;
तो मति-श्रुत नहीं रहा, वहाँ ज्ञान लिखा है।

00:12:57.418 --> 00:13:05.345
निश्चय से ज्ञान आत्मा को जानता है और
व्यवहारनय से मति-श्रुत आदि के पाँच भेद -

00:13:05.369 --> 00:13:09.892
मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय,
केवलज्ञान - भेद पड़ें तो पर को जाने।

00:13:09.916 --> 00:13:15.772
ऐसे ११वीं गाथा में अभेद हो गया।
१२वीं गाथा में भेद आया फिर से, तो
व्यवहार जाना हुआ प्रयोजनवान (कहा)।

00:13:15.796 --> 00:13:24.149
दोष है बस। ११वीं गाथा में नहीं आया था
तब तक मिथ्यात्व का बंध (था)।

00:13:24.173 --> 00:13:34.345
११वीं में आया (तो) मिथ्यात्व गया, १२वीं
में आया तो चारित्रमोह का बंध (हुआ)।

00:13:34.369 --> 00:13:40.892
मगर ज्ञान ज्ञायक को जाने तब तन्मय
होकर जाने, दूर रहकर न जान सके!

00:13:40.916 --> 00:13:45.407
तद्रूपो-लीन, तद्रूप लीन हो जाता है।
मुमुक्षु: तद्रूप होकर जाने।

00:13:45.431 --> 00:13:49.456
पू. लालचंदभाई: तद्रूप होकर,
उसरूप होकर, आत्मारूप होकर।
मुमुक्षु: ज्ञायक ज्ञायक ही है।

00:13:49.480 --> 00:13:54.252
पू. लालचंदभाई: <b>ज्ञायक ज्ञायक ही है</b>।
<b>आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान वह
आत्मा ही है </b>(समयसार गाथा ३५६-३६५)।

00:13:54.276 --> 00:13:57.514
अब इस ज्ञान को आत्मा क्यों कहा?
अभेद की अपेक्षा से।

00:13:57.538 --> 00:14:01.256
मुमुक्षु: अभेद ज्ञेय की अपेक्षा से।
पू. लालचंदभाई: अभेद ज्ञेय की अपेक्षा से।

00:14:01.280 --> 00:14:03.025
मुमुक्षु: फिर ज्ञान नहीं रहा, 
फिर (तो) आत्मा हो गया।

00:14:03.049 --> 00:14:09.429
पू. लालचंदभाई: हाँ! आत्मा हो गया। 
ज्ञान रहे तो-तो भेद पड़ेगा।
मुमुक्षु: इसमें साध्य की सिद्धि नहीं।

00:14:09.453 --> 00:14:18.176
पू. लालचंदभाई: नहीं। 
वह ज्ञान आत्मापने होता है।
मुमुक्षु: यह सुबह में कलश लिया था बेन ने।

00:14:18.200 --> 00:14:24.260
पू. लालचंदभाई: लिया था?
मुमुक्षु: नियमसार का कलश था न १०९। 
द्रव्य-गुण-पर्याय को जानता है।

00:14:24.284 --> 00:14:31.358
पू. लालचंदभाई: हाँ! अभी आया था वो ही। 
मुमुक्षु: पंचरत्न की गाथा है।
पू. लालचंदभाई: हाँ! बराबर है। यह ज्ञेय है।

00:14:31.382 --> 00:14:39.998
यह कलश अपने यहाँ बहुत अच्छा चला था। 
बहुत अच्छा!

00:14:40.022 --> 00:14:44.892
धुन चलती थी, 
उसमें बाहर निकलें तो कलेश-कलेश।

00:14:44.916 --> 00:14:49.012
भरतभाई को कहना पड़ा (कि) 
कुछ अच्छा नहीं लगता। आहाहा!

00:14:49.036 --> 00:15:05.332
कैसा कलश! उसका घोलन चले 
उसमें विघ्न हो जाता है। वास्तव में 
एकांत का विषय है ऐसा तो।

00:15:05.356 --> 00:15:07.967
समपरिणाम के जीव वह एकांत ही है।

00:15:07.991 --> 00:15:18.105
ऐसा एकांत अर्थात् समपरिणाम 
के जीव चर्चा करते हों; 
सर्वार्थसिद्धि में एकांत ही है सभी को।

00:15:18.129 --> 00:15:24.145
मुमुक्षु: यहाँ भी आता है, 
श्रीमद् के पत्र में आता है। ... 
अभी ही दो दिन पहले (पढ़ा हमने)।

00:15:24.169 --> 00:15:30.532
समभाववाले जीव हों, 
समान रुचिवाले तो उनके साथ 
चर्चा (करना) वह एकांत ही है।

00:15:30.556 --> 00:15:37.638
पू. लालचंदभाई: एकांत ही है। 
बराबर है! ऐसा ही है, वह एकांत है।

00:15:37.662 --> 00:15:50.220
उसमें दखल न हो ना कुछ। 
समविचारवाले जीव हों। आहाहा!

00:15:50.244 --> 00:15:55.136
रेस में जो घोड़े उतरते हैं न, 
वो एकदम दौड़ते हैं, भागने 
में ज्यादा फर्क नहीं होता है।

00:15:55.160 --> 00:16:01.656
नहीं तो इन टट्टुओं को रेस 
में उतारो तो? वहाँ चलें (क्या) टट्टू? 
मुमुक्षु: नहीं चले।

00:16:01.680 --> 00:16:20.216
पू. लालचंदभाई: ऐसा, ऐसा है ये। 
समविचार के जीव, साम्यपरिणामी, सौम्यप्रकृति!

00:16:20.240 --> 00:16:23.949
मुमुक्षु: आज सुबह में भी बहुत अच्छा चला। 
पू. लालचंदभाई: कलश।

00:16:23.973 --> 00:16:26.958
मुमुक्षु: एक ध्येय को जानने पर 
एक अभेद ज्ञेय जानने में आता है; 
पू. लालचंदभाई: हा, बराबर!

00:16:26.982 --> 00:16:37.496
मुमुक्षु: तब दो सत् नहीं, तब एक सत् है।
पू. लालचंदभाई: तब अनुभूति होती है। 
मुमुक्षु: हाँ! तब। बहुत अच्छा है!

00:16:37.520 --> 00:16:44.323
मुमुक्षु: ये नीलम, 
यह एक जैनदर्शन का रहस्य है।

00:16:44.347 --> 00:16:53.052
पर्याय से रहित तू श्रद्धान कर, 
ऐसा कहें, पर्याय तेरे में नहीं, 
नास्ति है हों! जोर से कहें।

00:16:53.076 --> 00:17:02.176
सर्वथा भिन्न? कि हाँ सर्वथा भिन्न! 
ऐसा जहाँ श्रद्धा का विषय श्रद्धा में 
आया (तो) यहाँ पर्याय से सहित हो गया।

00:17:02.200 --> 00:17:08.652
साहब! वो तो पर्याय से सहित हुआ। 
आपने कहा रहितपना, मैं तो सहित हुआ। 
कि जा! तुझे सम्यग्दर्शन हो गया।

00:17:08.676 --> 00:17:20.972
मुमुक्षु: बहुत अच्छा! बराबर! 
गुरु को भी यही कहना था। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! गुरु को यही कहना था।

00:17:20.996 --> 00:17:24.300
अर्थात् कोई जीव प्राप्त करता है 
इसका कारण यह है।

00:17:24.324 --> 00:17:34.554
रहित, बड़ी मुश्किल से तो रहित 
का पाठ पक्का किया और जहाँ हमने सहित 
की बात करें तो वह स्वीकारता नहीं है।

00:17:34.578 --> 00:17:45.443
(यह) पक्ष का मार्ग नहीं है। 
कहा भाई! ये समझने जैसी बात है 
चिमनभाई हो! शांतिभाई के पिताजी।

00:17:45.467 --> 00:17:58.225
हाँ, भाई! समझने जैसी बात है। 
(चिमनभाई ने कहा कि) पर्याय से रहित 
ही होता है, सहित होता ही नहीं आत्मा।

00:17:58.249 --> 00:18:04.598
पक्ष में आ जाता है, दृष्टि के विषय तक 
आया जीव परंतु पक्ष में आ गया।

00:18:04.622 --> 00:18:07.025
मुमुक्षु: सांख्यमति हो गया, आपने कहा। 
पू. लालचंदभाई: सांख्यमति।

00:18:07.049 --> 00:18:11.100
मुमुक्षु: सांख्यमति है, 
अकेले रहित के पक्ष में हो तो।

00:18:11.124 --> 00:18:20.376
पू. लालचंदभाई: रहितपूर्वक सहित होता है 
तब जैनदर्शन, तब जैन होता है। सांख्यमति 
रहता नहीं और बौद्ध (भी) रहता नहीं।

00:18:20.400 --> 00:18:24.540
मुमुक्षु: कोई अद्भुत है यह दर्शन! 
पू. लालचंदभाई: बौद्ध भी न रहे 
और सांख्यमति भी नहीं रहे।

00:18:24.564 --> 00:18:37.252
जैन हो जाये, सच्चा जैन। 
पर्याय के पक्षवाला बौद्धमति है, द्रव्य के 
पक्षवाला सांख्यमति है और अनुभवी जैन है।

00:18:37.276 --> 00:18:55.225
यह कलश है ये।
बहन ने कहा अभी (कि) यह पक्ष का मार्ग 
नहीं है। बोलीं, बराबर है! पक्ष का मार्ग नहीं।

00:18:55.249 --> 00:19:01.029
मुमुक्षु: ये तो जैन बनने का मार्ग है। 
पू. लालचंदभाई: जैन बनने का मार्ग है। 
पक्ष आता है इतनी बात सच्ची है।

00:19:01.053 --> 00:19:06.194
व्यवहार का पक्ष छूटता है, 
निश्चय के पक्ष में आता है परंतु 
पक्षातिक्रांत हो जाए।

00:19:06.218 --> 00:19:11.949
जब ज्ञेय होता है न तब पक्षातिक्रांत होता है। 
मुमुक्षु: यही शब्द आज सुबह में लिए।

00:19:11.973 --> 00:19:19.198
पू. लालचंदभाई: यही, बराबर (है) न? 
ज्ञेय होता है तब पक्षातिक्रांत कहलाता है। 
यह रहस्य है।

00:19:19.222 --> 00:19:24.114
मुमुक्षु: आपने यह रहस्य खोला है 
बस - ध्येय पूर्वक ज्ञेय।

00:19:24.138 --> 00:19:28.296
पू. लालचंदभाई: आठ साल पहले 
और हकार आया इसको अंदर से।

00:19:28.320 --> 00:19:35.256
जरा भी आज तक, आज की तारीख 
तक इसको शंका तो नहीं हुई,

00:19:35.280 --> 00:19:43.305
परंतु आशंका भी इसने 
किसी दिन मेरे पास खड़ी नहीं की। 
आज तक आठ सालों में।

00:19:43.329 --> 00:19:45.985
मुमुक्षु: आज तक क्या? 
अनंतकाल यही रहनेवाला है।

00:19:46.009 --> 00:19:51.652
पू. लालचंदभाई: क्योंकि ऐसा स्वरूप है, 
ऐसा स्वरूप है।

00:19:51.676 --> 00:19:56.096
मुमुक्षु: पक्षातिक्रांत स्वरूप है। 
पक्ष में रहना ये स्वरूप नहीं।
पू. लालचंदभाई: स्वरूप नहीं।

00:19:56.120 --> 00:20:01.936
मुमुक्षु: आपने कहा था प्रवचन में कि
परिणाम को मैं करता नहीं 
क्योंकि मैं अपरिणामी हूँ।

00:20:01.960 --> 00:20:07.252
परिणाम को मैं जानता नहीं क्योंकि मैं 
परिणामी हूँ। ले! परिणामी को जानता हूँ।

00:20:07.276 --> 00:20:12.020
पू. लालचंदभाई: हाँ! परिणामी को। 
परिणाम को नहीं।

00:20:12.044 --> 00:20:15.100
मुमुक्षु: परिणाम को जाने 
तो-तो सविकल्पदशा है। आहाहा!

00:20:15.124 --> 00:20:21.167
(तब तो) परद्रव्य को जानता है ये। 
परिणामी को जानता है (ये सही है)।

00:20:21.191 --> 00:20:24.736
पू. लालचंदभाई: परिणाम को 
क्यों करता नहीं मैं? 
मुमुक्षु: क्योंकि अपरिणामी हूँ।

00:20:24.760 --> 00:20:26.296
पू. लालचंदभाई: और परिणाम को 
क्यों जानता नहीं?

00:20:26.320 --> 00:20:30.483
मुमुक्षु: क्योंकि मैं परिणामी हूँ 
और परिणामी को जानता हूँ। 
पू. लालचंदभाई: आहाहा! बोलो!

00:20:30.507 --> 00:20:42.656
मुमुक्षु: ये नयी लगी बात।
पू. लालचंदभाई: रहस्यवाली बात है। 
यह बात कोई विरले के पल्ले पड़ती है।

00:20:42.680 --> 00:20:45.696
या तो इस बाजू ढल जाये 
या तो उस बाजू ढल जाये। 
मुमुक्षु: balance (संतुलन) नहीं रहता।

00:20:45.720 --> 00:20:54.327
पू. लालचंदभाई: balance नहीं रहता।
मुमुक्षु: balance रहना चाहिए।

00:20:54.351 --> 00:20:59.474
आपकी कृपा से ध्येय पूर्वक ज्ञेय की 
बात बहुत सरल हो गयी है। सब 
जीवों को समझ में आ सके (ऐसा है)।

00:20:59.498 --> 00:21:04.092
पू. लालचंदभाई: समझ में आ सके ऐसा 
होता है। ऐसा होता है। ये ख्याल में आवे।

00:21:04.116 --> 00:21:07.776
मुमुक्षु: ख्याल में लेनेवाला 
भी महाभाग्यशाली है। 
पू. लालचंदभाई: महाभाग्यशाली हो। आहाहा!

00:21:07.800 --> 00:21:12.412
उसको वास्तव में, वह मध्यस्थ हुआ है, 
सविकल्प में मध्यस्थ हुआ है। 
मुमुक्षु: मध्यस्थ हुआ है। बराबर!

00:21:12.436 --> 00:21:17.434
पू. लालचंदभाई: सविकल्प में हो! 
मुमुक्षु: हाँ जी! सविकल्प में। 
पू. लालचंदभाई: बहन भी सहमत है। वाह!

00:21:17.458 --> 00:21:23.229
सविकल्प-मध्यस्थ। 
सविकल्प-स्वसंवेदन आता है न? 
मुमुक्षु: हाँ! सविकल्प-मध्यस्थ,

00:21:23.253 --> 00:21:25.652
बाद में निर्विकल्प में मध्यस्थ होगा।

00:21:25.676 --> 00:21:30.594
पहले सविकल्प में (मध्यस्थ) होना चाहिए, 
बाद में निर्विकल्प में होगा। 
पू. लालचंदभाई: बात बराबर है!

00:21:30.618 --> 00:21:38.363
मुमुक्षु: जब सविकल्प-स्वसंवेदन हो सकता है 
तो फिर सविकल्प-मध्यस्थ नहीं हो सकता है?
पू. लालचंदभाई: हो सकता, हो सकता है।

00:21:38.387 --> 00:21:41.780
मुमुक्षु: होता ही है न। 
उसकी समझ में आता है। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! तो समझ में आ गया.....

00:21:41.804 --> 00:21:45.367
मुमुक्षु: वो ही न, 
उसी का नाम सविकल्प-मध्यस्थता है। 
पू. लालचंदभाई: सविकल्प-मध्यस्थता (में) आ गया,

00:21:45.391 --> 00:21:48.789
बाद में निर्विकल्प-मध्यस्थ हो जाता है।

00:21:48.813 --> 00:21:55.203
क्योंकि ख्याल में तो आता है न कि 
इस तरह से, अनुभव के काल में इस 
प्रकार से द्रव्य-गुण-पर्याय से अभेद,

00:21:55.227 --> 00:21:58.847
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०) 
से अभेद ज्ञेय होता है।

00:21:58.871 --> 00:22:03.016
तब उसने समयसार भी पढ़ लिया 
और प्रवचनसार भी पढ़ लिया।

00:22:03.040 --> 00:22:09.323
तत्त्वार्थ सूत्र तो आ गया प्रवचनसार के 
पेटे में। आहाहा! सब पढ़ लिया (उसने)।

00:22:09.347 --> 00:22:13.629
सांख्यमति नहीं हुआ, 
बौद्धमति नहीं हुआ, जैन हो गया।
मुमुक्षु: आहाहा!

00:22:13.653 --> 00:22:31.043
जैन हो गया। प्रभु! 
आपके प्रताप से जैन हो गया, बस। 
पू. लालचंदभाई: चलो आगे।

00:22:31.067 --> 00:22:35.118
मुमुक्षु: इसलिए वो बात आपने कही न, 
तद्रूपो न भवति...
पू. लालचंदभाई: हा।

00:22:35.142 --> 00:22:37.865
मुमुक्षु: उन दोनों में न्याय एक जैसा ही है। 
पू. लालचंदभाई: दोनों में, हा, दोनों में।

00:22:37.889 --> 00:22:42.136
मुमुक्षु: कर्ता नहीं हूँ क्योंकि तद्रूप 
नहीं होता है इसलिए कर्ता नहीं हूँ।

00:22:42.160 --> 00:22:45.736
पू. लालचंदभाई: हा। 
और देहादि परपदार्थों को, 
लोकालोक को क्यों नहीं जानता?

00:22:45.760 --> 00:22:47.203
मुमुक्षु: तद्रूपो न भवति। 
पू. लालचंदभाई: कि तद्रूपो न भवति।

00:22:47.227 --> 00:22:51.060
तन्मय होता नहीं या तद्रूपो (न भवति), 
उसका वाच्य तो एक ही है न।

00:22:51.084 --> 00:22:58.856
शब्द के प्रमाण से इसका जो अर्थ हम 
करते हैं, घटाते हैं, ये अर्थ तो एक ही है न।

00:22:58.880 --> 00:23:02.074
तद्रूपो न भवति, उसरूप होता नहीं 
इसलिए करता नहीं।

00:23:02.098 --> 00:23:06.336
और तन्मय होता नहीं और उसरूप होता 
नहीं इसलिए जानता नहीं, ऐसे।

00:23:06.360 --> 00:23:15.798
मुमुक्षु: अर्थात् इन दोनों में न्याय एक जैसा है। 
पू. लालचंदभाई: न्याय, ये आज ही आया, 
यह दूसरा न्याय आज ही आया।

00:23:15.822 --> 00:23:20.309
मुमुक्षु: दोनों न्याय 
उनके जयसेन आचार्य के ही हैं।

00:23:20.333 --> 00:23:23.123
पू. लालचंदभाई: जयसेन आचार्य, 
जयसेन आचार्य (के हैं) दोनों न्याय।

00:23:23.147 --> 00:23:27.545
एक ३२० गाथा में है 
और एक सेटिका की गाथा में है।

00:23:27.569 --> 00:23:34.487
तन्मय होता नहीं इसलिए पर को 
जानता नहीं; और जानता है ऐसा कहना 
वो व्यवहार है। तन्मय नहीं होता इसलिए।

00:23:34.511 --> 00:23:46.514
और आत्मा में तन्मय होकर जानता है 
इसलिए निश्चय है। तन्मय ऊपर 
ही पूरा वजन उन्होंने दिया है।

00:23:46.538 --> 00:23:55.598
ये अभी अचानक से ही आ 
गए दोनों। वो पहले (वाला) तो 
लेते थे, दूसरा (ये) आज आया।

00:23:55.622 --> 00:24:02.194
भाई के साथ बात की न, 
उसके अनुसंधान में आ गया।

00:24:02.218 --> 00:24:07.138
मैंने भाई को कहा कि 
आत्मा जाननहार है, करनेवाला नहीं है।