﻿WEBVTT

00:01:14.642 --> 00:01:22.296
मुमुक्षु: आपने जो २७१ वाँ
कलश चलाया है उसके
संदर्भ में सेंकड़ों प्रश्न आ चुके हैं।

00:01:22.320 --> 00:01:25.862
अगर आप एक महीने रहें
तो भी वो पूरे नहीं होंगे।

00:01:25.886 --> 00:01:28.982
प्रश्नकर्ता भाईयों से निवेदन हैं
कि जितने आ गए हैं

00:01:29.006 --> 00:01:36.600
उन प्रश्नों को ही ध्यान से सुनें तो
उनमें ही उनका उत्तर आ जाएगा।
अभी कृपया नए चिट्ठी न भेजें।

00:01:36.624 --> 00:01:44.574
पहला प्रश्न इस प्रकार है (कि)
ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञातारूप तीनों भावों सहित
वस्तु है।

00:01:44.598 --> 00:01:49.134
तो ये व्यवहारनय का विषय है
या निश्चयनय का विषय है?

00:01:49.158 --> 00:01:56.578
पू. लालचंदभाई: ज्ञानप्रधान निश्चय है,
दृष्टिप्रधान निश्चय नहीं है।

00:01:56.602 --> 00:02:02.960
दृष्टिप्रधान निश्चय में
तो परिणाममात्र से आत्मा भिन्न है।

00:02:02.984 --> 00:02:09.885
ऐसा जब दृष्टि का विषय दृष्टि में आवे
तब उपयोग अभिमुख हो जाता है।

00:02:09.909 --> 00:02:19.538
तो अभिमुख होने से आत्मा का
जब अनुभव होता है, तब मैं ही ज्ञाता,
मैं ही ज्ञान और मैं ही ज्ञेय

00:02:19.562 --> 00:02:25.520
ऐसा अभेदरूप अनुभव हो जाता है,
उसका नाम ज्ञेय है।

00:02:25.544 --> 00:02:31.218
ध्येयपूर्वक अनुभव के काल में
ज्ञेय होता ही है।

00:02:31.242 --> 00:02:38.200
अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय जो
अभेद है वो दृष्टि का विषय नहीं है;

00:02:38.224 --> 00:02:45.982
मगर दृष्टिपूर्वक ज्ञान प्रगट होता है,
सम्यग्ज्ञान, उसमें अभेद
- ऐसी अनुभूति होती है,

00:02:46.006 --> 00:02:53.274
ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय की,
ध्यान-ध्याता-ध्येय की एकता हो जाती है।

00:02:53.298 --> 00:02:56.631
मुमुक्षु: ज्ञानप्रधान निश्चय का विषय है
ये पूरा?
पू. लालचंदभाई: ज्ञानप्रधान निश्चय।

00:02:56.655 --> 00:03:00.907
मुमुक्षु: ज्ञानप्रधान निश्चय का विषय है?
पू. लालचंदभाई: हाँ! अथवा वो ज्ञेय बन गया।

00:03:00.931 --> 00:03:07.747
आत्मा अनंतकाल से ज्ञेय नहीं बना था, उस
ज्ञेय के अंदर <b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्</b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०),

00:03:07.771 --> 00:03:13.738
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यं</b> (तत्त्वार्थसूत्र,
अध्याय ५, सूत्र ३८) सब आ जाता है, ज्ञेय है।

00:03:13.762 --> 00:03:19.547
मुमुक्षु: निश्चयनय - ऐसे दो भेद तो कहीं
पढ़े नहीं कि ज्ञानप्रधान निश्चय अलग होता
है (और) दृष्टिप्रधान निश्चय अलग होता है?

00:03:19.571 --> 00:03:24.609
पू. लालचंदभाई: होता है,
बहुत होता है, बहुत आता है।
बहुत आता है, नय लगाकर।

00:03:24.633 --> 00:03:28.222
नहीं आता है ऐसा नहीं है;
आता है।

00:03:28.246 --> 00:03:36.096
जैसे प्रवचनसार (गाथा १८९) में तो 
वहाँ तक आया कि राग आत्मा में होता है, 
वह शुद्धनय का विषय है।

00:03:36.120 --> 00:03:38.374
बोलो! तो क्या करें?

00:03:38.398 --> 00:03:49.198
तो पर में नहीं होता है, पर से नहीं होता है,
एक द्रव्य में होता है इसलिए
ज्ञानप्रधान कथन से ऐसा पहले आता है।

00:03:49.222 --> 00:03:53.111
(मगर) श्रद्धा का विषय नहीं है (वो)।

00:03:53.135 --> 00:04:03.151
मुमुक्षु: त्रिकाली ज्ञायक स्वभाव
का स्वचतुष्टय और पर्याय स्वभाव का
स्वचतुष्टय क्या भिन्न-भिन्न है?

00:04:03.175 --> 00:04:11.254
पू. लालचंदभाई: द्रव्यस्वभाव जो
ज्ञायक है ध्रुव, उसके अंदर द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भाव (है)।

00:04:11.278 --> 00:04:20.520
द्रव्य के अंदर वो गुण-भेद,
गुण-गुणी का भेद नहीं है। क्षेत्र के
अंदर पदार्थ-भेद, प्रदेश-भेद नहीं है।

00:04:20.544 --> 00:04:25.005
काल की अपेक्षा से भूतकाल,
वर्तमान, त्रिकाल ऐसा भेद नहीं है।

00:04:25.029 --> 00:04:28.880
भाव की अपेक्षा से गुण और
गुण के बीच में भेद नहीं है।

00:04:28.904 --> 00:04:38.289
ऐसा अभेद सामान्य शुद्धनय का
विषय जो उपादेय (है) वो ज्ञायक,
स्वचतुष्टय कहा जाता है।

00:04:38.313 --> 00:04:44.022
और पर्याय से सहित आत्मा परिणामी
हो वह भी स्वचतुष्टय होता है।

00:04:44.046 --> 00:04:47.191
द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव,
परिणामी आत्मा।

00:04:47.215 --> 00:04:51.147
पहले अपरिणामी कहा,
बाद में आत्मा परिणमता है।

00:04:51.171 --> 00:05:01.080
वो भी स्वचतुष्टय, जैसे केवली भगवान
स्वचतुष्टय से परिणमते हैं न अनंत ज्ञान,
अनंत दर्शन, अनंत सुख, ऐसा हो जाता है।

00:05:01.104 --> 00:05:06.098
मुमुक्षु: पर्याय का चतुष्टय और
द्रव्य का चतुष्टय अलग-अलग है कि
एक ही वस्तु में ये दोनों चीजें है?

00:05:06.122 --> 00:05:13.365
पू. लालचंदभाई: द्रव्य सामान्य है
और पर्याय विशेष है;
एक दूसरे में इसका अभाव है।

00:05:13.389 --> 00:05:23.231
द्रव्य में पर्याय की नास्ति और
पर्याय में द्रव्य की नास्ति ऐसा है,
अस्ति-नास्ति अनेकांत।

00:05:23.255 --> 00:05:29.991
मुमुक्षु: निर्विकल्पप्रमाण और
सविकल्पप्रमाण का स्वरूप स्पष्ट कीजिये?

00:05:30.015 --> 00:05:36.240
पू. लालचंदभाई: निर्विकल्पप्रमाण का
अर्थ तो ऐसा है कि जब ज्ञायक के
सन्मुख आत्मा आता है

00:05:36.264 --> 00:05:44.916
और अनुभव का काल है, तब
अंदर में आत्मा स्व है (अर्थात्) ज्ञायक

00:05:44.940 --> 00:05:51.582
और आनंद आदि पर हैं,
अथवा ज्ञान स्व है,
आनंद आदि पर्यायें पर हैं।

00:05:51.606 --> 00:06:00.356
वह स्व-पर को निश्चय से
स्वपरप्रकाशक - सारा प्रमाण का
विषय (कहा), निर्विकल्पप्रमाण हो गया वो।

00:06:00.380 --> 00:06:07.907
और बाहर में आता है तो
सविकल्पप्रमाण भी होता है।
सविकल्पप्रमाण में भेद की अपेक्षा आती है।

00:06:07.931 --> 00:06:17.698
उसको निर्विकल्प अभेद होता है
और प्रमाणज्ञान में दो प्रकार हैं;
एक अध्यात्मप्रमाण और एक आगमप्रमाण।

00:06:17.722 --> 00:06:25.080
अध्यात्मप्रमाण में
द्रव्य-गुण-पर्याय शुद्ध होती है,
वो अध्यात्मप्रमाण का विषय है।

00:06:25.104 --> 00:06:32.720
और आगमप्रमाण में साधक को
थोड़ा राग रहता है, वो भी प्रमाण
के विषय में गर्भित हो जाता है।

00:06:32.744 --> 00:06:38.542
साधक को वीतरागभाव भी है,
थोड़ा रागभाव भी है वो भी
प्रमाणज्ञान के अंदर आ जाता है

00:06:38.566 --> 00:06:43.151
- ये आगमप्रमाण कहा जाता है।
यह प्रवचनसार की शैली है।

00:06:43.175 --> 00:06:48.529
मुमुक्षु: अध्यात्मप्रमाण वो
निर्विकल्पप्रमाण है और
आगमप्रमाण वो सविकल्पप्रमाण है?

00:06:48.553 --> 00:06:52.596
पू. लालचंदभाई: ऐसा नहीं,
ऐसा नहीं, ऐसा नहीं। आहाहा!

00:06:52.620 --> 00:07:02.027
निर्विकल्पप्रमाण में तो ये सारा
स्वचतुष्टय अभेद स्वपरप्रकाशक अंदर
में है (सब) एक जाति का प्रमाण (है);

00:07:02.051 --> 00:07:05.254
द्रव्य शुद्ध और पर्याय भी शुद्ध।

00:07:05.278 --> 00:07:12.227
और आगमप्रमाण में राग की पर्याय की योग्यता
शामिल करके आगमप्रमाण कहा जाता है।

00:07:12.251 --> 00:07:15.960
थोड़ा (राग) है न,
अभी वीतराग नहीं हुआ न, इसलिए।

00:07:15.984 --> 00:07:19.936
मुमुक्षु: निर्विकल्प और सविकल्प ऐसे
दो भेद किस आधार पर किये गए हैं?

00:07:19.960 --> 00:07:24.367
पू. लालचंदभाई: निर्विकल्प
यानि निर्विकल्प में तो अंदर में गया,
तो निर्विकल्प।

00:07:24.391 --> 00:07:29.809
बाहर में आया तो सविकल्पप्रमाण।

00:07:29.833 --> 00:07:36.231
मुमुक्षु: एक और प्रश्न है कि
निर्विकल्प स्वानुभूति मतिज्ञान में
होती है कि श्रुतज्ञान में?

00:07:36.255 --> 00:07:39.111
पू. लालचंदभाई: श्रुतज्ञान में होती है।

00:07:39.135 --> 00:07:47.947
मुमुक्षु: मतिज्ञान में क्यों नहीं होती?
पू. लालचंदभाई: मतिज्ञान कमजोर है,
बहुत बलवान नहीं है।

00:07:47.971 --> 00:07:57.005
पहले मतिज्ञान (आत्मा के) सन्मुख होता है,
बाद में मतिज्ञान लब्धरूप हो जाता है;
और श्रुतज्ञान विशेष तर्कनारूप है।

00:07:57.029 --> 00:08:05.676
तो उस श्रुतज्ञान के अंदर नय का
विकल्प छूट जाता है, अर्थात् अनुभूति हुई।

00:08:05.700 --> 00:08:16.616
मुमुक्षु: कल के प्रवचन में आया था
(कि) लोक में जितने द्रव्य हैं वे मेरे ज्ञेय
और मैं उसका ज्ञायक, ऐसा नहीं जानना।

00:08:16.640 --> 00:08:22.929
यदि ऐसा सर्वथा मानेंगे, तो सर्वज्ञता
का जो लक्षण आगम में कहा है

00:08:22.953 --> 00:08:28.254
(कि) केवली भगवान लोकालोक को
जानते हैं तो ये कथन कैसे सिद्ध होगा?

00:08:28.278 --> 00:08:34.812
पू. लालचंदभाई: यह कथन
व्यवहारनय का है। अभी चलती है
बात (कि) आत्मा का अनुभव कैसे हो?

00:08:34.836 --> 00:08:43.247
तो आत्मा ज्ञाता और लोकालोक
मेरा ज्ञेय, ऐसे पक्ष में पड़ जाता है
तो उपयोग परसन्मुख हो जाता है।

00:08:43.271 --> 00:08:51.300
लोकालोक मेरे ज्ञान का ज्ञेय ही नहीं है;
मेरा आत्मा ही ज्ञेय है, ऐसा करने से
(अनुभूति होती है), निश्चय का कथन है।

00:08:51.324 --> 00:08:57.354
निश्चयनय यानि सत्यार्थ कथन है,
अनुभव के काल में ऐसा होता है।
उससे ही अनुभव होता है।

00:08:57.378 --> 00:09:04.269
स्व-पर दो को जानता है ऐसा नहीं है।
बाकी केवली भगवान लोकालोक को
जानते हैं वो व्यवहारनय का कथन है।

00:09:04.293 --> 00:09:08.558
सर्वथा नहीं है,
झूठ है ऐसी बात नहीं है।

00:09:08.582 --> 00:09:16.976
उसका खुलासा अभी आया था
कि स्वपरप्रकाशक है तो भी
स्व-पर (का) जो प्रतिभास रहता है,

00:09:17.000 --> 00:09:22.856
ऐसी अपनी ज्ञान की पर्याय जानने में आती है;
तो उसमें लोकालोक का ज्ञान आ जाता है।

00:09:22.880 --> 00:09:29.434
लोकालोक को जानता है,
लोकालोक को नहीं जानता (है ऐसा) नहीं है
(मगर वो) व्यवहारनय का कथन है।

00:09:29.458 --> 00:09:34.656
मुमुक्षु: आप फरमाते हैं कि
केवली भगवान लोकालोक को जानते हैं,
यह व्यवहारनय का कथन है।

00:09:34.680 --> 00:09:37.105
पू. लालचंदभाई: हाँ!
व्यवहार का अर्थ दो प्रकार है।

00:09:37.129 --> 00:09:43.803
एक तन्मय नहीं है इसलिए व्यवहार और
पर की अपेक्षा आती है इसलिए व्यवहार।

00:09:43.827 --> 00:09:48.305
मुमुक्षु: और स्व को ही जानता है
निर्विकल्प अनुभव के काल में
यह निश्चयनय का कथन है?

00:09:48.329 --> 00:09:50.314
पू. लालचंदभाई: हाँ! स्वाश्रित निश्चयनय।

00:09:50.338 --> 00:09:54.252
मुमुक्षु: तो निश्चयनय छद्मस्थ के ऊपर
यानि अनुभव करनेवाले के ऊपर लागू हुआ

00:09:54.276 --> 00:09:57.807
और व्यवहारनय केवली भगवान के
ऊपर लागू किया गया?
पू. लालचंदभाई: नहीं! ऐसा नहीं है।

00:09:57.831 --> 00:10:03.083
अपने ऊपर ही लागू होता है।
देव-गुरू-शास्त्र को जानता है तो व्यवहार है।

00:10:03.107 --> 00:10:08.936
देव-गुरू-शास्त्र को जाने वो व्यवहार है।
नहीं जानता है, ऐसा नहीं।

00:10:08.960 --> 00:10:14.883
परंतु व्यवहारनय से जाना जाता है इसका
अर्थ (कि) उसमें तन्मय होता नहीं है।

00:10:14.907 --> 00:10:20.567
दूसरा, वो पर की अपेक्षा आई, पर की
अपेक्षा आई तो व्यवहार हो गया।

00:10:20.591 --> 00:10:26.003
स्वाश्रित निश्चयनय और पराश्रित व्यवहारनय,
ऐसा (समयसार गाथा २७२ में) पाठ है।

00:10:26.027 --> 00:10:29.674
मुमुक्षु: अरहंत भगवान सर्वज्ञ हैं
ये बात तो निश्चय से ही कही न फिर?

00:10:29.698 --> 00:10:34.594
पू. लालचंदभाई: निश्चय से सर्वज्ञ हैं,
व्यवहार से सर्वज्ञ नहीं है।

00:10:34.618 --> 00:10:37.407
मुमुक्षु: तो फिर मानता है कि
लोकालोक को जानते है वो व्यवहार है?

00:10:37.431 --> 00:10:40.585
पू. लालचंदभाई: लोकालोक को जानते हैं
वो व्यवहार है।

00:10:40.609 --> 00:10:44.532
अपने को जाने और लोकालोक
को जाने वो भी व्यवहार है।

00:10:44.556 --> 00:10:53.225
पर को जाने वो तो व्यवहार है ही, परंतु
केवली भगवान अपनी आत्मा को भी जानें और
लोकालोक को जानें उसका नाम भी व्यवहार है।

00:10:53.249 --> 00:11:08.020
प्रमाण लक्षण जिसका है ऐसा
व्यवहार हो गया वो। यह नियमसार
के अंदर १५९ गाथा में है, १५९।

00:11:08.044 --> 00:11:17.185
मुमुक्षु: प्रवचन के संदर्भ में ही
एक प्रश्न है, ज्ञेयों के आकाररूप
होता हुआ ज्ञान यह तो कथनमात्र है

00:11:17.209 --> 00:11:25.323
- ऐसा जो आज प्रकरण सुबह आया था।
सो जब ये बात कथनमात्र है तो
ये कथन किया क्यों जाता है?

00:11:25.347 --> 00:11:28.696
कथनमात्र कहा तो इसका कुछ मतलब तो होगा?

00:11:28.720 --> 00:11:33.514
पू. लालचंदभाई: मतलब तो ऐसा है
(कि) उसका प्रतिभास होता है
तो ज्ञेयाकार ज्ञान कहा जाता है

00:11:33.538 --> 00:11:39.412
मगर सचमुच तो ज्ञानाकार है,
वहाँ ले जाना है।

00:11:39.436 --> 00:11:47.287
ज्ञेयाकार ज्ञान का तिरोभाव
करके सामान्य का आविर्भाव
जब होता है तब अनुभव होता है।

00:11:47.311 --> 00:11:51.958
ज्ञेयाकार ज्ञान के आविर्भाव से अनुभव
नहीं होता है (क्योंकि) वो तो अज्ञान है।

00:11:51.982 --> 00:11:59.860
ज्ञेय के संबंधवाला जो ज्ञान (है)
वो ज्ञेयाकार ज्ञान है, अनुभव के
काल में वह तिरोभूत हो जाता है

00:11:59.884 --> 00:12:03.865
और सामान्यज्ञान का आविर्भाव
(यानि) प्रगट हो जाता है।

00:12:03.889 --> 00:12:10.758
यह जो गाथा है न गुरुदेव की,
यह अनुभव करने के लिए है।

00:12:10.782 --> 00:12:18.207
अनुभव के बाद क्या होता है
वह दूसरी बात है और अनुभव करने
के लिए क्या है वह दूसरी बात है;

00:12:18.231 --> 00:12:20.985
वो अलग-अलग हैं, दोनों बातें।
आहाहा!

00:12:21.009 --> 00:12:25.083
मुमुक्षु: तो ऐसा समझना चाहिए
कि आत्मा जानता तो है सबको,

00:12:25.107 --> 00:12:28.314
लेकिन अनुभव करने के लिए ऐसा
कह रहे हैं कि पर को नहीं जानता है?

00:12:28.338 --> 00:12:33.158
केवल अनुभव करने की बात हुई ये तो।
(क्यों) कि जानता तो है न पर को आत्मा।

00:12:33.182 --> 00:12:38.336
पू. लालचंदभाई: पर जणित (जानने
में आ) जाता है, पर को जानता नहीं है।
पर (के) ऊपर लक्ष होता नहीं है ज्ञान का।

00:12:38.360 --> 00:12:42.718
ज्ञान का, कभी केवली भगवान का
ही लक्ष लोकालोक पर नहीं है

00:12:42.742 --> 00:12:53.723
और श्रुतकेवली हैं, श्रुतज्ञानी हैं, साधक हैं,
उनका (भी) लक्ष राग पर नहीं है,
राग जणित जाता है, जानता नहीं है।

00:12:53.747 --> 00:12:59.060
जाना हुआ प्रयोजनवान है
(समयसार गाथा १२) - ऐसा लिखा है,
जाना हुआ प्रयोजनवान;

00:12:59.084 --> 00:13:04.389
मगर वो जानने में आ जाता है, सहज
में जानने में आ जाता है लक्ष बगैर।

00:13:04.413 --> 00:13:08.585
केवली भगवान के ज्ञान में
लोकालोक जानने में आ जाता है,

00:13:08.609 --> 00:13:15.145
उसका अर्थ लोकालोक को जानता है
और उस की ओर लक्ष है - ऐसा नहीं।

00:13:15.169 --> 00:13:26.003
इन्द्रियज्ञान का अनुभव ऐसा है अनादि से
कि जैसे ही पर को जानने के लिए
जब लक्ष करे तब जानने में आवे,

00:13:26.027 --> 00:13:30.678
तो उस अनुभव को आगे करता है कि
केवली भगवान लोकालोक को जानते हैं।

00:13:30.702 --> 00:13:40.958
लोकालोक को नहीं जानते हैं,
लोकालोक जणित जाता है।

00:13:40.982 --> 00:13:46.265
मुमुक्षु: आत्मा का अनुभव तो सम्यग्दृष्टि
को बहुत थोड़े समय के लिए होता है

00:13:46.289 --> 00:13:50.087
तो बाकी के समय में वो (उसको)
बुद्धिपूर्वक क्या करना चाहिए?

00:13:50.111 --> 00:13:59.865
पू. लालचंदभाई: भेदज्ञान का विचार करना
चाहिए। (और) क्या करना चाहिए?
भेदज्ञान (तो) चलता ही है।

00:13:59.889 --> 00:14:03.478
समझ में आया प्रश्न क्या (है)?
कि निर्विकल्पध्यान में तो ठीक है

00:14:03.502 --> 00:14:07.505
मगर सविकल्पदशा में आवे
तो शुभराग (तो) करे कि नहीं साधक?

00:14:07.529 --> 00:14:17.163
करता नहीं है; आता है, उसको जानता है।
करने की बात नहीं है।

00:14:17.187 --> 00:14:23.772
होता है, साधक को राग होता है।
पाँच महाव्रत भी होते हैं,
देशव्रती को होते हैं,

00:14:23.796 --> 00:14:30.189
अविरत सम्यग्दृष्टि को
देव-गुरु-शास्त्र पर ऐसा राग होता है,
आता है, जाता है, जानता है।

00:14:30.213 --> 00:14:32.896
आता है, होता है, जानता है।
बस!

00:14:32.920 --> 00:14:46.269
जानता-जानता है और कुछ नहीं है,
द्रव्य को भी जाने और पर्याय को
भी जाने, जाननहार है भैया!

00:14:46.293 --> 00:14:52.340
मुमुक्षु: प्रवचन में एक बात ये आयी थी
कि ध्येय को प्रसिद्ध करके उत्पाद होता है

00:14:52.364 --> 00:14:56.474
और ध्येय को ही प्रसिद्ध करके व्यय होता है।
पू. लालचंदभाई: बराबर! ऐसा ही है।

00:14:56.498 --> 00:15:03.438
मुमुक्षु: तो इसमें प्रश्न है कि
जब पर्याय का अभाव ही हो गया तो
वो ध्येय को प्रसिद्ध कैसे करती है?

00:15:03.462 --> 00:15:09.305
पू. लालचंदभाई: वो व्यय हुआ न
तो व्यय तो हुआ मगर उसको प्रसिद्ध
करके ही व्यय होती है (पर्याय)।

00:15:09.329 --> 00:15:14.340
उत्पाद ने ध्रुव को प्रसिद्ध किया,
करने के बाद ही व्यय होती है।

00:15:14.364 --> 00:15:18.972
प्रसिद्ध किए बिना व्यय नहीं होती है;
ऐसा उपयोग लक्षण है।

00:15:18.996 --> 00:15:22.905
ऐसी प्रक्रिया अनादि-अनंत चालू है,
function (प्रक्रिया) चालू है

00:15:22.929 --> 00:15:27.732
- उपयोगमय भगवान ध्रुव परमात्मा
समय-समय पर जानने में आता है।

00:15:27.756 --> 00:15:32.505
स्वीकार नहीं करता है वो उसकी भूल है।

00:15:32.529 --> 00:15:37.558
मुमुक्षु: अज्ञानी को भी ये बात लागू होती है?
पू. लालचंदभाई: अज्ञानी को,
अज्ञानी को लागू पड़ती है।

00:15:37.582 --> 00:15:40.532
अज्ञानी स्वीकार करे तो ज्ञानी बन जाये।

00:15:40.556 --> 00:15:48.456
वो स्थिति है (कि) आबाल-गोपाल सबको
भगवान आत्मा अनुभव में आ रहा है। आहाहा!

00:15:48.480 --> 00:15:55.167
मुमुक्षु: निगोदिया जीव में भी?
पू. लालचंदभाई: निगोदिया जीव में
भी ज्ञायक जानने में आता है, अनुभव।

00:15:55.191 --> 00:15:58.576
मुमुक्षु: यह कैसे हो सकता है कि
निगोदिया को भी ज्ञायक जानने में आता है?

00:15:58.600 --> 00:16:03.883
पू. लालचंदभाई: हाँ जरूर!
प्रतिभास होता है। उसके
अंदर स्वपरप्रकाशक की ज्ञप्ति है।

00:16:03.907 --> 00:16:14.958
पंचास्तिकाय शास्त्र १२१ गाथा;
उसमें आचार्य भगवान ने लक्षण दिया है
कि सभी जीवों को

00:16:14.982 --> 00:16:22.883
- एक इन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय,
चार इन्द्रिय, भव्य-अभव्य सबको
एक स्वपरप्रकाशक की ज्ञप्ति है।

00:16:22.907 --> 00:16:29.523
ज्ञप्ति यानि ज्ञान की पर्याय की स्वच्छता है,
उसमें स्व-पर दोनों का प्रतिभास होता है।

00:16:29.547 --> 00:16:34.029
दो का प्रतिभास होने से
बंध-मोक्ष की सिद्धि होती है।

00:16:34.053 --> 00:16:37.749
दो का प्रतिभास होता है उसमें
बंध-मोक्ष की (सिद्धि होती है);

00:16:37.773 --> 00:16:42.878
पर के प्रतिभास (को) वो उपयोगात्मक
करता है तो आस्रव की उत्पत्ति होती है;

00:16:42.902 --> 00:16:51.736
और स्व के प्रतिभास (को) उपयोगात्मक करे,
उसको (पर को) गौण करे और उसके (स्व के)
अंदर आवे तो संवर प्रगट हो जाता है।

00:16:51.760 --> 00:16:57.496
मुमुक्षु: तो इन दो के प्रतिभास में बंध-
मोक्ष की प्रसिद्धि होती है - ऐसा आपने फरमाया।
पू. लालचंदभाई: बराबर।

00:16:57.520 --> 00:17:00.083
मुमुक्षु: तो ये दो का प्रतिभास
उपयोग में होता है?

00:17:00.107 --> 00:17:04.212
पू. लालचंदभाई: उपयोग में चालू;
लब्ध की बात नहीं है।

00:17:04.236 --> 00:17:07.345
सबके पास उपयोग लक्षण है कि नहीं (जैसा)
तत्त्वार्थसूत्र (अध्याय २ सूत्र ८) में (बताया)?
मुमुक्षु: हाँ जी।

00:17:07.369 --> 00:17:09.936
पू. लालचंदभाई: उस उपयोग की बात है।

00:17:09.960 --> 00:17:17.589
मुमुक्षु: उपयोग में भगवान आत्मा जानने
में आता है तो यह शुद्धोपयोग क्या होगा तब तो फिर?
पू. लालचंदभाई: नहीं! शुद्धोपयोग नहीं हुआ।

00:17:17.613 --> 00:17:20.985
मैंने कहा न?
कि उस प्रतिभास को नहीं पकड़ता है।

00:17:21.009 --> 00:17:26.354
देह के प्रतिभास को पकड़ता है, देह पर
लक्ष करता है तो देह में अहंबुद्धि करता है।

00:17:26.378 --> 00:17:35.016
उसके (स्व के) प्रतिभास को छोड़
दिया तो उसके (देह के)
प्रतिभास को स्वीकार कर लिया।

00:17:35.040 --> 00:17:42.403
प्रतिभास दो का है, ज्ञप्ति है,
स्वपरप्रकाशक की ज्ञप्ति है।

00:17:42.427 --> 00:17:48.678
मुमुक्षु: आत्मानुभव की प्रक्रिया आदि से
अंत तक कैसी होती है? कृपया स्पष्ट करें।

00:17:48.702 --> 00:17:52.763
पू. लालचंदभाई: भेदज्ञान से होती है।
पुण्य-पाप से मेरा आत्मा भिन्न है

00:17:52.787 --> 00:17:58.078
और अनंतगुण से मैं अभिन्न हूँ और
वो ही जानने में आता है मेरे को।

00:17:58.102 --> 00:18:03.380
पुण्य-पाप का लक्ष छोड़े और आत्मा का
लक्ष करे तो अनुभव हो जाता है।

00:18:03.404 --> 00:18:13.816
पुण्य-पाप (को) नहीं छोड़ना (है),
पुण्य-पाप का लक्ष छूटता है, पर्याय का;
<b>पर्यायार्थिक चक्षु</b> (प्रवचनसार गाथा ११४)
बंद हो जाती है।

00:18:13.840 --> 00:18:19.532
मुमुक्षु: तो एक बात (कि) ध्येय और
ज्ञेय का एक समय है ऐसा आपने फरमाया।
पू. लालचंदभाई: बराबर।

00:18:19.556 --> 00:18:28.189
मुमुक्षु: तो क्या इसमें आप ऐसा कहना चाहते
हैं कि निर्विकल्पनय और निर्विकल्पप्रमाण,
दोनों अनुभव के समय एक साथ होते हैं?

00:18:28.213 --> 00:18:31.540
पू. लालचंदभाई: एक साथ होते हैं,
नयपूर्वक प्रमाण होता है।

00:18:31.564 --> 00:18:35.696
नय पहले समय में (हो और) प्रमाण
दूसरे समय में (हो) ऐसा नहीं है।

00:18:35.720 --> 00:18:43.532
एक ज्ञान की पर्याय का, पंचाध्यायीकर्ता ने
कहा कि, उसके (ज्ञान की पर्याय के)
विषय-भेद से नाम-भेद पड़ जाता है।

00:18:43.556 --> 00:18:50.709
ज्ञान की पर्याय तो एक है (मगर)
विषय-भेद से नाम-भेद पड़ जाता है।

00:18:50.733 --> 00:18:54.963
मुमुक्षु: एक समय में ही विषय-भेद रहता है?
पू. लालचंदभाई: हाँ! विषय-भेद,
अपेक्षाकृत है।

00:18:54.987 --> 00:18:57.287
अंदर में कहाँ है विषय-भेद?

00:18:57.311 --> 00:19:03.185
उसको समझने के लिए जो ज्ञान की पर्याय
का विषय सामान्य है उसका नाम निश्चय,

00:19:03.209 --> 00:19:08.060
और वो आनंद को जानता है तो व्यवहार,
और दोनों को जानता है तो प्रमाण।

00:19:08.084 --> 00:19:23.687
ऐसे तीन विकल्प नहीं हैं
(मगर तीन से) समझाया जाता है।

00:19:23.711 --> 00:19:33.509
सैंकड़ों प्रश्न आ गए, सैंकड़ों प्रश्न।
अभी प्रश्न नहीं भेजना ऐसी बात की।
जिज्ञासा है न सबको। अच्छी बात है!

00:19:33.533 --> 00:19:39.438
मुमुक्षु: आत्मा में स्याद्वाद का अभाव है
ऐसा आपने प्रवचन में कहा था।
पू. लालचंदभाई: बराबर।

00:19:39.462 --> 00:19:43.260
मुमुक्षु: परंतु हमे (पढ़ा है कि)
एक गुण में दूसरे गुण का अभाव है।

00:19:43.284 --> 00:19:51.745
अतः आत्मा में ज्ञान गुण का (भेद का) अभाव 
बताया, एक का दूसरे में रूप है (ऐसा बताया)
तो आत्मा में स्याद्वाद का अभाव कैसे होगा?

00:19:51.769 --> 00:19:56.545
पू. लालचंदभाई: स्याद्वाद का अभाव है
तो भी निश्चयाभासपना आता नहीं है
 
00:19:56.569 --> 00:20:02.465
- ऐसा देवसेन आचार्य भगवान का नयचक्र
के अंदर (पृष्ठ ३१-३२ में) पाठ है।
उसका क्या अर्थ (है)?

00:20:02.489 --> 00:20:12.380
कि आत्मा शुद्ध ही है,
कथंचित् शुद्ध और कथंचित् अशुद्ध
- ऐसा नहीं है आत्मा में स्याद्वाद।

00:20:12.404 --> 00:20:20.500
क्या कहा? कि आत्मा शुद्ध ही है;
कथंचित् शुद्ध और कथंचित् अशुद्ध,
ये आत्मा में लागू नहीं पड़ता है,

00:20:20.524 --> 00:20:24.718
वो प्रमाणज्ञान का विषय हो गया।
पर्याय शामिल हो गयी (उसमें)।

00:20:24.742 --> 00:20:28.532
मुमुक्षु: प्रमाण का विषय भी
तो आत्मा ही है ना?
पू. लालचंदभाई: पहले प्रमाण नहीं होता है,

00:20:28.556 --> 00:20:31.972
पहले नय होता है;
नयपूर्वक प्रमाण होता है।

00:20:31.996 --> 00:20:38.527
पहले प्रमाण में आये सविकल्प में,
बाद में निर्विकल्प होता है
तब नय की उत्पत्ति होती है।

00:20:38.551 --> 00:20:45.274
मगर (पहले) नयपूर्वक प्रमाण होता है बाद
में प्रमाणपूर्वक नय का व्यापार चालू होता है।

00:20:45.298 --> 00:20:49.540
मुमुक्षु: कभी आप फरमाते हैं कि
नय और प्रमाण एक साथ होता है,

00:20:49.564 --> 00:20:55.580
कभी फरमाते हैं कि पहले नय होता है
फिर प्रमाण होता है; थोड़ा विशेष
खुलासा करने की कृपा करें?

00:20:55.604 --> 00:21:04.736
पू. लालचंदभाई: ऐसा है कि पहले
सविकल्पप्रमाण के अंदर आया, पर से भिन्न पड़
गया कि मेरा आत्मा द्रव्य-पर्यायस्वरूप है।

00:21:04.760 --> 00:21:10.700
आत्मा भी चेतन और परिणाम में भी
चेतना होती है, वो प्रमाण में आ गया।

00:21:10.724 --> 00:21:17.363
राग से भिन्न पड़ गया, ख़्याल रखना।
राग प्रमाणज्ञान में, अंदर में नहीं आता है।

00:21:17.387 --> 00:21:22.149
उसको आगमप्रमाण में जाने दो अभी।
जिसको राग चाहिए उसके खाते में डाल दो।

00:21:22.173 --> 00:21:24.692
अपने को तो राग नहीं चाहिए।
ठीक है?

00:21:24.716 --> 00:21:31.807
तो आत्मा चेतन और पर्याय में उसका
उपयोग लक्षण चेतना, तो प्रमाण में आ गया।

00:21:31.831 --> 00:21:38.887
अभी सविकल्पप्रमाण, उसमें भेदज्ञान
करना कि मैं सामान्य हूँ और विशेष नहीं हूँ।

00:21:38.911 --> 00:21:42.345
क्योंकि सामान्य नित्य
अनंत गुणात्मक ध्रुव परमात्मा हूँ;

00:21:42.369 --> 00:21:48.718
और पर्याय, एक समय की पर्याय है
वो नाशवान है इसलिए
मेरे स्वभाव में उसका अभाव है।

00:21:48.742 --> 00:21:57.807
ऐसा स्वभाव का लक्ष करने से आत्मा
का अनुभव होता है, तो वो नय हुआ,
नय से, नय में उपादेयतत्त्व है न।

00:21:57.831 --> 00:22:03.269
प्रमाण में तो हेय-उपादेय होता है।
नय में, शुद्धनय में उपादेय तत्त्व
आता है, शुद्धनय का विषय।

00:22:03.293 --> 00:22:11.989
तो अनुभव हुआ तो आनंद आया,
तो वो प्रमाण हो गया कि नहीं?
ज्ञान ने प्रमाण को भी जाना न।

00:22:12.013 --> 00:22:15.318
द्रव्य को जाना और पर्याय को भी जाना।

00:22:15.342 --> 00:22:20.020
सम्यग्दर्शन की खबर कैसे पड़े?
आनंद से खबर पड़ती है।

00:22:20.044 --> 00:22:26.163
निर्विकल्पध्यान में से बाहर आया,
सम्यग्दर्शन हुआ तो खबर कैसे पड़े?
आनंद आया उसको।

00:22:26.187 --> 00:22:31.114
तो आनंद को उसने जाना कि नहीं?
निर्विकल्पध्यान में ही जानने में आ जाता है।

00:22:31.138 --> 00:22:34.794
मुमुक्षु: ऐसा तो नहीं कि पहले
सविकल्पप्रमाण होता है फिर नय होता है?
पू. लालचंदभाई: हाँ!

00:22:34.818 --> 00:22:38.643
पहले शुरूआत में प्रमाण-नय-निक्षेप
से समझाया जाता है।

00:22:38.667 --> 00:22:43.256
मगर अनुभव के काल में प्रमाण भी नहीं है,
नय (की लक्ष्मी) अस्त हो जाती है

00:22:43.280 --> 00:22:48.225
(और) निक्षेप कहाँ चला जाता है मालूम
होता नहीं है (समयसार कलश ९)।

00:22:48.249 --> 00:22:55.745
समझाने के लिए माध्यम हैं,
प्रमाण-नय-निक्षेप से समझाया जाता है;
तो शुरूआत में ऐसा ही होता है।

00:22:55.769 --> 00:23:06.425
मगर जब अंदर जाता है तो प्रमाण का
विकल्प, नय का विकल्प, निक्षेप का
विकल्प नहीं होता है; वस्तु नयातीत है।

00:23:06.449 --> 00:23:08.900
मुमुक्षु: अभी एक प्रश्न के उत्तर में
आपने फरमाया

00:23:08.924 --> 00:23:14.136
(कि) निर्विकल्पनय और निर्विकल्पप्रमाण
दोनों अनुभव के काल में उत्पन्न होते हैं।
पू. लालचंदभाई: होता है, हाँ बराबर।

00:23:14.160 --> 00:23:18.309
मुमुक्षु: अभी (आप) कहते हैं कि
प्रमाण नहीं होता है, नय कहाँ
चला जाता है, मालूम नहीं पड़ता।

00:23:18.333 --> 00:23:25.176
पू. लालचंदभाई: वो शुरूआत में
अनुभव के पहले की बात,
अभ्यास करे तब की बात है।

00:23:25.200 --> 00:23:33.607
अभ्यास होता है न शुरूआत में तो
'प्रमाण से मेरा क्या स्वरूप है?
नय से मेरा क्या स्वरूप है?’ समझे?

00:23:33.631 --> 00:23:39.429
ऐसा आता है शुरूआत में। प्रमाण में
द्रव्य-पर्याय दो स्वरूप हैं मेरी अस्ति।

00:23:39.453 --> 00:23:46.105
नय एक में गौण और एक में मुख्य करे;
एक हेय, एक उपादेय; वो नय का व्यापार है।

00:23:46.129 --> 00:23:51.105
विधि-निषेध नय में होता है;
प्रमाण में विधि-निषेध नहीं होता।

00:23:51.129 --> 00:23:56.909
मुमुक्षु: प्रवचनसार  (गाथा २००)
में आता है कि आत्मा में ज्ञेय 
इस प्रकार समा जाते हैं

00:23:56.933 --> 00:24:03.496
(जैसे) मानो उसमें कीलित हो गए हों,
डूब गए हों, टंकोत्कीर्ण हो गए हों।
पू. लालचंदभाई: हाँ, डूब गए हों, बराबर है।

00:24:03.520 --> 00:24:06.994
मुमुक्षु: और आप फरमाते हैं
कि आत्मा ज्ञेय को नहीं जानता?

00:24:07.018 --> 00:24:15.554
पू. लालचंदभाई: यानि ज्ञेय का लक्ष
नहीं रहता है; ज्ञेय को नहीं जानता है
यानि ज्ञेय का लक्ष छूट जाता है।
 
00:24:15.578 --> 00:24:20.949
ज्ञेय तो रहता है और
ज्ञेय का प्रतिभास भी अंदर रहता है।

00:24:20.973 --> 00:24:27.874
मुमुक्षु: अगर आप ऐसा कहें कि
ज्ञेय का लक्ष किए बिना ही ज्ञेय को जानता
है तो समस्या (का) समाधान हो जाएगा।

00:24:27.898 --> 00:24:30.287
आप तो कहते हैं कि
ज्ञेय को जानते ही नहीं हैं?

00:24:30.311 --> 00:24:33.776
पू. लालचंदभाई: ज्ञेय के लक्ष बिना
ज्ञेय जानने में आते हैं, केवली भगवान को।

00:24:33.800 --> 00:24:43.438
और श्रुतज्ञानी जो है, अविरत सम्यग्दृष्टि,
उसको भी राग जानने में आता है
मगर राग का लक्ष नहीं है।

00:24:43.462 --> 00:24:48.523
लक्ष एक पर रहता है,
लक्ष दो ऊपर नहीं रहता है।

00:24:48.547 --> 00:24:51.296
मुमुक्षु: ये तो दो की बात हुई,
केवली की और श्रुतज्ञानी की।

00:24:51.320 --> 00:24:59.034
पू. लालचंदभाई: हाँ! एक ही बात है।
उनका ही लक्ष आत्मा ऊपर है, मेंढक
का, हिरण का लक्ष भी आत्मा पर है।

00:24:59.058 --> 00:25:11.545
ऐसा एक पाठ आया है, अभयकुमार, कि
एक जयसेन आचार्य भगवान का समयसार है,
उसका एक निर्जरा अधिकार (गाथा २२३) है

00:25:11.569 --> 00:25:17.825
(इन्द्रियज्ञान  ज्ञाननहीं है, बोल २०८),
तो मुनिराज जब आहार लेते हैं,
पानी भी लेते हैं आहार के टाइम में

00:25:17.849 --> 00:25:23.118
और उनके अंदर पुण्य का भाव भी होता है,
नीचे की भूमिका में पाप भी होता है।

00:25:23.142 --> 00:25:31.740
उसका चार भाव लेकर उन्होंने कहा (कि)
दर्पण में आए हुए (प्रतिबिम्ब) के समान
जानते हैं, प्रतिबिम्ब के समान जानते हैं।

00:25:31.764 --> 00:25:38.794
यानि आहार ऊपर लक्ष नहीं है
मगर आहार को जानते हैं।

00:25:38.818 --> 00:25:43.274
जानते हों तो भी नहीं जानते हैं,
देखें (तो) भी नहीं देखें।

00:25:43.298 --> 00:25:54.892
देखें परंतु नहीं देखते, बोलें तथापि नहीं बोलते,
चलें तथापि नहीं चलते, तत्त्वस्थित अडोल
(इष्टोपदेश गुजराती गाथा ४१)।

00:25:54.916 --> 00:26:03.740
ये इन्द्रियज्ञान से जो शोधन करते हैं
तो वो मालूम नहीं होता है (क्योंकि)
इन्द्रियज्ञान ज्ञेय है, ज्ञान ही नहीं है।

00:26:03.764 --> 00:26:11.989
मुमुक्षु: इसका नाम इन्द्रियज्ञान तो है न साहब?
पू. लालचंदभाई: मोहराजा ने (वैसा) कहा है,
सर्वज्ञ भगवान ने (तो) ज्ञेय (नाम) रखा है;

00:26:12.013 --> 00:26:16.549
नामनिक्षेप है,
भावनिक्षेप नहीं है उसमें।

00:26:16.573 --> 00:26:20.180
(इन्द्रियज्ञान में) आत्मा जानने में नहीं आता है,
अनुभव में नहीं आता है।

00:26:20.204 --> 00:26:24.180
मुमुक्षु: इन्द्रियज्ञान आत्मा की पर्याय है
कि पुद्गल की पर्याय है?

00:26:24.204 --> 00:26:29.292
पू. लालचंदभाई: मूर्तिक है,
ऐसा प्रवचनसार (इन्द्रियज्ञान ज्ञान नहीं है,
बोल १९) में लिखा है;

00:26:29.316 --> 00:26:38.403
और अमितगति आचार्य ने पौद्गलिक कहा;
और प्रवचनसार में कहा कि
इन्द्रियज्ञान बँध का कारण है;

00:26:38.427 --> 00:26:53.416
और पंचाध्यायीकर्ता ने लिखा कि
इन्द्रियज्ञान (जो) है (वो) पुराने कर्म का
कार्य है और नए कर्म-बंध का कारण है।

00:26:53.440 --> 00:26:58.647
सब शास्त्र का आधार देता हूँ मैं।
प्रवचनसार में लिखा आहाहा!

00:26:58.671 --> 00:27:04.309
कि पौद्गलिक है, ५८ गाथा है, ५८ गाथा।
आहाहा!

00:27:04.333 --> 00:27:10.443
यह सांसारिक सुख भी मूर्तिक
और (इन्द्रिय)ज्ञान भी मूर्तिक (है)।

00:27:10.467 --> 00:27:16.883
और अमितगति आचार्य ने कहा पौद्गलिक है, 
आत्मिक नहीं है *योगसार प्राभृत, अमितगति आचार्य, 
चुलिक अधिकार गाथा ४८/५०४)।

00:27:16.907 --> 00:27:24.238
ये सब जो ठगाया जाता है न,
वो इन्द्रियज्ञान से ठगाया जाता है।

00:27:24.262 --> 00:27:31.540
राग से तो छूट जाता है कभी;
पुण्य-पाप बंध का कारण है,
आस्रव तत्त्व है, जड़ है, अचेतन है,

00:27:31.564 --> 00:27:35.967
स्व-पर को नहीं जानता है
इसके लिए तो बहुत न्याय भी हैं।

00:27:35.991 --> 00:27:44.012
मगर इन्द्रियज्ञान के विषय (का) निषेध करने
के लिए बहुत कम (बात) है शास्त्र में।

00:27:44.036 --> 00:27:52.327
मुमुक्षु: मोक्षमार्गप्रकाशक में तो
टोडरमल जी ने लिखा है कि अज्ञानी को भी जो
ज्ञान की धारा चलती है वो स्वभाव का अंश है।

00:27:52.351 --> 00:27:54.234
पू. लालचंदभाई: वो अलग बात है।
मुमुक्षु: (वो) बंध का कारण नहीं है।

00:27:54.258 --> 00:27:56.856
पू. लालचंदभाई: वो उपयोग है,
बंध-मोक्ष का कारण नहीं है।

00:27:56.880 --> 00:28:01.100
बंध का भी कारण नहीं (है)
और मोक्ष का भी कारण नहीं है,
स्वभाव का अंश है, बराबर है!

00:28:01.124 --> 00:28:07.189
मगर जो इन्द्रियज्ञान की
उपाधि गौण करो तो उपयोग है।

00:28:07.213 --> 00:28:14.740
इन्द्रियज्ञान की जो उपाधि (है) उसको
गौण कर लो तो उपयोग ही रह गया। बस!

00:28:14.764 --> 00:28:19.567
मुमुक्षु: उपयोग में और
इन्द्रियज्ञान में क्या अंतर है? उपयोग ही
तो इन्द्रियज्ञानरूप परिणमित होता है?

00:28:19.591 --> 00:28:23.865
पू. लालचंदभाई: परंतु
उपयोग का दुरुपयोग हुआ।

00:28:23.889 --> 00:28:28.865
कल कहा था
उपयोग का दुरुपयोग उसका नाम इन्द्रियज्ञान

00:28:28.889 --> 00:28:44.349
और उपयोग का सदुपयोग
उसका नाम अतीन्द्रियज्ञान,
स्वभाव का अंश है, बराबर है!

00:28:44.373 --> 00:29:00.860
मुमुक्षु: एक सामान्य का ज्ञान करना चाहिए,
पर्याय का लक्ष छोड़ना चाहिए. तब ज्ञान
में इन्द्रियज्ञान का विषय ... (जो) दिखाई देता है,

00:29:00.884 --> 00:29:07.798
अगर उसको भी गौण करके
ज्ञान जाननरूप भासित होता है,
क्या वही द्रव्यभाव है (या) कुछ और है?

00:29:07.822 --> 00:29:10.549
अगर और (है) तो कैसे अनुभव में आवे?

00:29:10.573 --> 00:29:14.469
पू. लालचंदभाई: इन्द्रियज्ञान
जो पर को प्रसिद्ध करता है न,

00:29:14.493 --> 00:29:20.683
अभी इन्द्रियज्ञान को ... भेद करके
मर्यादा में लाकर उपयोग को अभिमुख करो,

00:29:20.707 --> 00:29:26.318
मतिज्ञान (को) सन्मुख करो,
बाद में श्रुतज्ञान को सन्मुख करो
तो आत्मा का अनुभव हो जाता है।

00:29:26.342 --> 00:29:29.487
ऐसा (समयसार) कर्ता-कर्म
अधिकार (गाथा १४४) में लिखा है।

00:29:29.511 --> 00:29:36.065
मुमुक्षु: अभी केवली भगवान की बात आयी थी
कि वो लोकालोक को व्यवहार से जानते हैं।
पू. लालचंदभाई: जानते हैं, बराबर है।

00:29:36.089 --> 00:29:39.429
मुमुक्षु: परंतु केवली (के)
केवलज्ञान को तो नय होते ही नहीं हैं;
तो वहाँ व्यवहारनय से कैसे जाना?

00:29:39.453 --> 00:29:43.594
पू. लालचंदभाई: नीचे का,
नीचे (की भूमिका) का जीव नय
लगाता है, वहाँ नय नहीं हैं।

00:29:43.618 --> 00:29:49.278
नीचे (की भूमिका) का जीव नय
लगाकर समझने की कोशिश करता है।

00:29:49.302 --> 00:29:54.749
मुमुक्षु: मतलब श्रुतज्ञानी जो हैं,
श्रुतज्ञान में प्रगट होनेवाले नयों के द्वारा

00:29:54.773 --> 00:29:58.527
केवलज्ञानी की इस बात को, कि लोकालोक 
को जानता है (वह) व्यवहार कहा।
पू. लालचंदभाई: हाँ! हाँ!

00:29:58.551 --> 00:30:02.243
ऐसा साधक नय लगाकर समझाता है।

00:30:02.267 --> 00:30:16.340
ऐसा नियमसार में आया है कि कोई तत्त्वज्ञानी
अनुभवी ऐसा कहे कि केवली भगवान
लोकालोक को जानते नहीं है, तो क्या दोष है?

00:30:16.364 --> 00:30:21.469
कुंदकुंदाचार्य भगवान ने लिखा कि
कोई तत्त्वज्ञानी, अनुभवी ऐसा कहे

00:30:21.493 --> 00:30:25.634
कि हमारे केवली भगवान 
लोकालोक को नहीं जानते हैं, 
तो क्या दोष है (गाथा १६६)?

00:30:25.658 --> 00:30:30.772
कि कुछ दोष नहीं है क्योंकि
वो निश्चयनय का कथन हो गया।

00:30:30.796 --> 00:30:37.763
और बाद में एक गाथा लिखी (है) कि
हमारे केवली भगवान आत्मा को नहीं जानते हैं,

00:30:37.787 --> 00:30:43.323
लोकालोक को जानते हैं  (गाथा १६९)
तो कहो इसमें क्या दोष है?
(कि) कुछ दोष नहीं है

00:30:43.347 --> 00:30:52.189
(क्योंकि) वो व्यवहारनय का कथन है;
ये निश्चयनय का कथन है। ऐसा
नय लगाने से समझ में आ जाता है।

00:30:52.213 --> 00:31:08.100
मुमुक्षु: एक प्रश्न आया है कि क्या
सम्यग्दृष्टि को जुआ खेलने का भाव आ सकता
है? यदि नहीं तो पाँडवों ने जुआ क्यों खेला?

00:31:08.124 --> 00:31:14.398
पू. लालचंदभाई: जुआ खेलने का भाव
पहले तो पाप ही है, उसको आगे मत करो।

00:31:14.422 --> 00:31:23.683
कोई अपवादरूप घटना बन गई हो
तो उसको आगे नहीं करना चाहिए।
वो पाप का परिणाम है।

00:31:23.707 --> 00:31:32.158
ऐसी कलकत्ता में ऐसी घटना
एक बन गई थी थोड़ी। समझे?

00:31:32.182 --> 00:31:42.256
गुरुदेव ने वो बात मेरे को कही थी
कि धर्मराजा जुआ भी खेलते थे,
पर (उनका) सम्यग्दर्शन गया नहीं।

00:31:42.280 --> 00:31:54.634
मगर उसको आगे करने जैसी चीज नहीं है।
पाप के परिणाम को आगे नहीं करना
चाहिए, कोई भी पाप का परिणाम।

00:31:54.658 --> 00:31:57.265
उस पाप के परिणाम को
आगे नहीं करना चाहिए।

00:31:57.289 --> 00:32:10.623
ऐसा पाप का परिणाम हो तो भी सम्यग्दर्शन टिकता है
 - ऐसा पाप का परिणाम आगे करके, ऐसी बात नहीं 
करना चाहिए। नहितर वो स्वच्छनदी हो जाता है!

00:32:10.647 --> 00:32:27.060
मुमुक्षु: पूछनेवाला क्या चाहता है?
पूछनेवाला खुद खेलना चाहता है क्या?
पू. लालचंदभाई: वो तो वो जाने, मैं नहीं जानता।

00:32:27.084 --> 00:32:31.496
मुमुक्षु: सिद्ध भगवान के
सुख के संबंध में एक प्रश्न है।

00:32:31.520 --> 00:32:40.505
क्या सिद्ध अवस्था प्रारंभ होने के बाद
प्रत्येक समय आगे बढ़ने पर अनंत आनंद
की अनुभूति अनंत गुणी होती है क्या?

00:32:40.529 --> 00:32:43.980
सिद्धों के सुख में भी अनंत ...
पू. लालचंदभाई: नहीं!
बढ़ता नहीं है, बढ़ता नहीं है।

00:32:44.004 --> 00:32:50.740
आनंद प्रगट हो गया (तो) हो गया
शत प्रतिशत। उसमें शुद्धि की वृद्धि,
आनंद की वृद्धि नहीं होती है।

00:32:50.764 --> 00:32:53.234
साधक के अंदर आनंद की वृद्धि होती है।

00:32:53.258 --> 00:32:57.700
मगर पूर्ण होता है - कृत्कृत्य,
तब कषायों का अभाव हो गया,

00:32:57.724 --> 00:33:03.687
पूर्ण वीतराग हो गया,
पूर्ण आनंद हो गया (उसके)
बाद में आनंद की वृद्धि नहीं होती है।

00:33:03.711 --> 00:33:06.545
मुमुक्षु: वो उतना का उतना आनंद
रहता होगा तो क्या मजा आता होगा?

00:33:06.569 --> 00:33:23.452
उतना का ही उतना आनंद रहता
होगा तो क्या मजा आता होगा?
पू. लालचंदभाई: आप रोज रोटी क्यों खाते हो?

00:33:23.476 --> 00:33:31.758
मुमुक्षु: श्रद्धान के संबंध में एक प्रश्न है
कि आत्मा में पर्याय से भिन्न द्रव्य
का श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन कहा है।

00:33:31.782 --> 00:33:32.594
पू. लालचंदभाई: बराबर।

00:33:32.618 --> 00:33:39.323
मुमुक्षु: जबकि तत्त्वार्थसूत्र में सात
-तत्त्वों के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहा है।
पू. लालचंदभाई: बराबर।

00:33:39.347 --> 00:33:41.292
मुमुक्षु: परंतु ये तो पर्यायरूप हैं।

00:33:41.316 --> 00:33:47.789
और समयसार में अभूतार्थ कहा है,
अतः इसका अभेदरूप
श्रद्धान सम्यग्दर्शन कैसे होता है?

00:33:47.813 --> 00:33:51.243
जबकि सामान्य जीवतत्त्व तो भिन्न है।

00:33:51.267 --> 00:33:58.078
कृप्या स्पष्ट करें कि असल में सात-तत्त्व
का श्रद्धान सम्यक्त्व है या अकेला पर्याय
से भिन्न आत्मा का श्रद्धान सम्यक्त्व है?

00:33:58.102 --> 00:34:03.892
पू. लालचंदभाई: देखो! पहले तो पर्याय
से भिन्न आत्मा का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है।

00:34:03.916 --> 00:34:11.914
दूसरी बात (यह है) कि जो तत्त्वार्थसूत्र (अध्याय 
१, सूत्र १) में आया है (कि) सात-तत्त्वों का
श्रद्धान वो सम्यग्दर्शन है, बराबर है।

00:34:11.938 --> 00:34:20.380
क्योंकि उसमें एकवचन लगाया है
बाद में। तो एकवचन में उसके अंदर
शुद्धात्मा गर्भित है, वो दृष्टि में आ जाता है।

00:34:20.404 --> 00:34:25.927
तो सम्यग्दर्शन का जो निमित्तकारण
है सात-तत्त्व, नौ पदार्थ,

00:34:25.951 --> 00:34:30.616
वो निमित्त की प्रधानता से
ऐसा कहा जाता है कि
सात-तत्त्वों का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है।

00:34:30.640 --> 00:34:38.416
मगर उसमें, वो समयसार में (और)
तत्त्वार्थसूत्र में कोई विरोध नहीं है।
आत्मा का ही अनुभव उसमें होता है।

00:34:38.440 --> 00:34:43.612
दूसरी एक बात है most important
(सबसे महत्वपूर्ण) बताता हूँ आपको।

00:34:43.636 --> 00:34:51.834
आपने तो तत्त्वार्थसूत्र के साथ वो बात बतायी,
मगर समयसार की ११वीं गाथा में तो ऐसा है

00:34:51.858 --> 00:34:58.376
कि भूतार्थनय से जानो आत्मा को,
व्यवहारनय सम्पूर्ण अभूतार्थ है,

00:34:58.400 --> 00:35:02.692
भूतार्थ के आश्रय से सम्यग्दर्शन
हो जाता है, ११वीं गाथा है न।

00:35:02.716 --> 00:35:07.247
तो वो त्रिकाली द्रव्य के आश्रय से
सम्यग्दर्शन होता है, पर्याय से भिन्न।

00:35:07.271 --> 00:35:15.625
व्यवहार अभूतार्थ यानि पर्याय है मगर
पर्याय द्रव्य में नहीं है। ऐसी भूल नहीं
करना कि पर्याय को उड़ा देते हैं ज्ञानी।

00:35:15.649 --> 00:35:22.794
पर्याय द्रव्य में नहीं है; सामान्य में
विशेष की नास्ति है, ऐसी अस्ति है।
इसका लक्ष करने से अनुभव होता है।

00:35:22.818 --> 00:35:29.536
वहाँ तो त्रिकाली द्रव्य के आश्रय से अनुभव
करने की बात है न, सम्यग्दर्शन, एक बात।

00:35:29.560 --> 00:35:39.172
और (समयसार) १३वीं गाथा में तो कहा (है)
कि भूतार्थनय से नवतत्त्व जाना हुआ सम्यक्त्व
है। तो नवतत्त्व तो व्यवहारनय का विषय है।

00:35:39.196 --> 00:35:43.407
नवतत्त्व जो भेद है पर्याय का,
वो तो व्यवहारनय का विषय है।

00:35:43.431 --> 00:35:49.558
तो क्या उसका आश्रय करने का बोध है?
नहीं! आगे लगाया है भूतार्थनय से।

00:35:49.582 --> 00:35:58.314
भूतार्थनय से अर्थ क्या है? कि
अभूतार्थनय से तो सभी नौ तत्त्वों
को जानते हैं, वह तो मिथ्यात्व है।

00:35:58.338 --> 00:36:05.576
अभूतार्थनय से नवतत्त्व को जानता है
यानि आत्मा बंध का ही कर्ता है
और मोक्षमार्ग का ही कर्ता है

00:36:05.600 --> 00:36:16.580
और मोक्ष का कर्ता है, वह
अभूतार्थनय का कथन है। भूतार्थनय
से तो नौ जो तत्त्व हैं वो निरपेक्ष हैं।

00:36:16.604 --> 00:36:22.376
आत्मा उपादानपने भी कर्ता नहीं है
और निमित्तकर्ता भी नहीं है।

00:36:22.400 --> 00:36:28.976
वो स्वयं एक समय की पर्याय
सत्-अहेतुक क्षणिक-उपादान है।

00:36:29.000 --> 00:36:35.140
और निमित्तकारण पुराने कर्म का उदय
-अनुदय दो ले लेना, निमित्तकारण।

00:36:35.164 --> 00:36:41.483
तो ऐसे जो जीव जानता है कि पर्याय
सत्-अहेतुक है, होने योग्य होती है पर्याय,

00:36:41.507 --> 00:36:45.940
तो उसकी दृष्टि अकर्ता (के) ऊपर
आ जाती है; कर्ताबुद्धि छूट जाती है।

00:36:45.964 --> 00:36:51.958
तो वहाँ भी सम्यग्दर्शन हो जाता है नियम से,
ऐसा लिखा (है)। कोष्ठक में नियम लिखा।

00:36:51.982 --> 00:37:00.527
भूतार्थनय से नवतत्त्व जाना हुआ
सम्यग्दर्शन है। ऐसा फूलचंद जी सिद्धांत
शास्त्री को हमने पूछा था गुवाहाटी में।

00:37:00.551 --> 00:37:06.474
जब गुरुदेव गुवाहाटी में गए
तब मैं गया था।
तब पंडितजी को पूछा कि

00:37:06.498 --> 00:37:13.038
 'पंडितजी ये भूतार्थनय से नवतत्त्व जाना
हुआ सम्यक्त्व है, ऐसा कहीं अलग
(दूसरी) जगह तो आता नहीं है,

00:37:13.062 --> 00:37:20.994
एक ही जगह पर है १३वीं गाथा में?'।
(पंडितजी): 'हाँ! वो बात सच्ची है एक ही 
जगह पर है'। सबसे महत्वपूर्ण बात है वो।

00:37:21.018 --> 00:37:24.909
उसमें ११वीं गाथा में पर्याय से भिन्न
कहा द्रव्य का अवलंबन कर।

00:37:24.933 --> 00:37:32.003
और पर्याय सत्-अहेतुक है (उसका)
तू कर्ता नहीं है, अकर्ता है - ऐसे
होकर सम्यग्दर्शन हो जाता है।

00:37:32.027 --> 00:37:40.478
अभूतार्थनय से तो अनंतकाल से
जाना कि आत्मा पुण्य-पाप का कर्ता
है, आत्मा आस्रव का कर्ता है,

00:37:40.502 --> 00:37:48.367
संवर का कर्ता है, निर्जरा का कर्ता है,
बंध का कर्ता है, मोक्ष का कर्ता है;
वो अभूतार्थ, व्यवहारनय का कथन है।

00:37:48.391 --> 00:37:54.603
पर्याय का कर्ता आत्मा है ही नहीं
निश्चयनय से तो। पर्याय का
कर्ता पर्याय है, सत्-अहेतुक (है)।

00:37:54.627 --> 00:38:00.252
ऐसे जो जाने पर्याय को सत्-अहेतुक
तो कर्ताबुद्धि छूट जाती है

00:38:00.276 --> 00:38:05.100
और कर्ताबुद्धि छूटने से अकर्ता पर
दृष्टि आती है, अनुभव हो जाता है।

00:38:05.124 --> 00:38:10.558
तो नवतत्त्व को जाना हुआ
सम्यग्दर्शन कहा जाता है।

00:38:10.582 --> 00:38:15.829
मुमुक्षु: सम्यग्दर्शन फिर ११वीं गाथा के
हिसाब से होगा कि १३वीं गाथा के हिसाब
से होगा कि दोनों के हिसाब से होगा?

00:38:15.853 --> 00:38:20.838
पू. लालचंदभाई: आत्मा के आश्रय से होगा।

00:38:20.862 --> 00:38:22.896
मुमुक्षु: दोनों गाथाओं में
अलग-अलग बात कही है?

00:38:22.920 --> 00:38:27.234
पू. लालचंदभाई: नहीं! अलग-अलग
नहीं है। अलग-अलग नहीं है,
आत्मा का ही आश्रय आया।

00:38:27.258 --> 00:38:34.354
नौ को सत् जाना वो वहाँ
ठहरता नहीं है, होने योग्य होता है
तो मैं करनेवाला नहीं हूँ,

00:38:34.378 --> 00:38:43.412
मैं (तो) अकर्ता ज्ञायक हूँ
- ऐसे ज्ञायक पर दृष्टि आ गयी।

00:38:43.436 --> 00:38:52.789
मुमुक्षु: दृष्टि का विषय अखंड है और
अखंड द्रव्य-गुण-पर्याय का समूह
आत्मा अभेद होने से अखंड होगा।

00:38:52.813 --> 00:38:55.963
मात्र ध्रुव स्वभाव तो वस्तु का एक अंश है।

00:38:55.987 --> 00:39:01.514
उसको दृष्टि का विषय कहा गया है
तो फिर दृष्टि का विषय अखंड
कैसे होगा, वो तो खंड हो गया?

00:39:01.538 --> 00:39:08.163
पू. लालचंदभाई: अनंतगुण से
अखंड है अभेद, वो दृष्टि का विषय है;
उसमें पर्याय शामिल नहीं होती है।

00:39:08.187 --> 00:39:14.816
ध्रुव, ध्रुव, अखंड, वो भी अखंड है;
अनंतगुण से अभेद-अखंड है।

00:39:14.840 --> 00:39:19.096
उसमें गुण-भेद नहीं है इसलिए
खंड उसमें नहीं है, अखंड है।

00:39:19.120 --> 00:39:25.714
और जब ज्ञेय होता है तब पर्याय से
अनन्य होता है, वो भी अखंड हो गया।

00:39:25.738 --> 00:39:31.647
परिशिष्ट में अखंड ही हो गया (ऐसा) अर्थ
किया। अखंड की दो व्याख्या आती हैं;

00:39:31.671 --> 00:39:41.136
एक पर्याय से रहित अनंतगुणात्मक
अखंड, ध्रुव, परमात्मा उसका आश्रय करो;
और एक पर्याय से अभेद हुआ वो भी अखंड है।

00:39:41.160 --> 00:39:47.856
मुमुक्षु: जैसे अनंत गुणों से
अखंड है वैसे अनंत पर्यायों से
भी तो अखंड है। तो उसको क्यों...

00:39:47.880 --> 00:39:52.523
पू. लालचंदभाई: वो पदार्थ है।
वो पदार्थ की सिद्धि में
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यं</b> (कहा)।

00:39:52.547 --> 00:39:57.994
पर्याय के बिना द्रव्य नहीं है,
द्रव्य के बिना पर्याय नहीं (है),
परस्पर सापेक्ष पदार्थ (है),

00:39:58.018 --> 00:40:04.380
उसमें भी पदार्थ की सिद्धि होती है, मगर
प्रयोजन की सिद्धि उसमें नहीं होती है।

00:40:04.404 --> 00:40:10.323
पंडित बनता है, मगर ज्ञानी बनता नहीं है।
पंडित की टीका नहीं मैं करता हूँ!

00:40:10.347 --> 00:40:15.887
कोई पंडित की टीका की बात, टीका
की बात इधर है ही नहीं, मना है सख्त।

00:40:15.911 --> 00:40:22.425
मगर वो द्रव्य-गुण-पर्याय,
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्</b>
जो पदार्थ है,

00:40:22.449 --> 00:40:27.252
पदार्थ की सिद्धि,
वो परपदार्थ से जुदा (भिन्न) करता है।

00:40:27.276 --> 00:40:35.620
और नय (में) अपनी पर्याय से जुदा करके
त्रिकाली द्रव्य का अवलम्बन लेता है।

00:40:35.644 --> 00:40:42.896
मुमुक्षु: द्रव्य शुद्ध, निर्मल,
अविकारी है तो इसमें से जो पर्यायें
निकलती हैं वो अशुद्ध कैसे होती हैं?

00:40:42.920 --> 00:40:45.736
शुद्ध द्रव्य में से अशुद्ध पर्यायें
कैसे निकलती हैं?

00:40:45.760 --> 00:40:53.816
पू. लालचंदभाई: शुद्ध द्रव्य में से
अशुद्ध पर्याय निकलती ही नहीं है पहले तो।
शुद्ध में से अशुद्ध निकलती ही नहीं है।

00:40:53.840 --> 00:41:00.158
जब पर्याय निकलती है तब उसका
मुख स्व-तरफ है कि पर-तरफ?

00:41:00.182 --> 00:41:07.336
जो पर-तरफ है तो अशुद्ध बन जाती है;
(और अगर) स्व-तरफ मुख है,
तो शुद्ध रहती है।

00:41:07.360 --> 00:41:11.380
मुमुक्षु: पर्याय के निकलने के बाद में
फिर वो स्व की या पर की?
पू. लालचंदभाई: हाँ पर्याय।

00:41:11.404 --> 00:41:19.309
एक ही समय में, समय एक है उसमें।
पहले समय में शुद्ध निकले, दूसरे समय
में अशुद्ध निकले - ऐसा नहीं (है)।

00:41:19.333 --> 00:41:26.283
पर्याय का उत्पाद है, उसका मुख उत्पाद के
समय स्व-सन्मुख होता (है) कि पर-सन्मुख?

00:41:26.307 --> 00:41:31.087
बस! उसके ऊपर शुद्ध-अशुद्ध का आधार है।

00:41:31.111 --> 00:41:40.140
शुद्ध-अशुद्ध वो भी उपाधि है;
उत्पाद-व्यय तो स्वभाव है पर्याय का।

00:41:40.164 --> 00:41:45.083
मुमुक्षु: ध्रुव सामान्य में
उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य ये तीनों बनेंगे क्या?

00:41:45.107 --> 00:41:48.225
पू. लालचंदभाई: सामान्य में नहीं,
सामान्य में तो अकेला गुण हैं।

00:41:48.249 --> 00:41:55.043
सामान्य-विशेष कहो (तो)
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत्</b>
आ गया, सामान्य-विशेष दो।

00:41:55.067 --> 00:42:06.296
मुमुक्षु: एक भाई ने पूछा है कि साधक
अर्थात् मिथ्यात्व की भूमिका में ऐसा कौनसा
व्यवहार उचित है जो सम्यग्दर्शन में सहायक होवे?

00:42:06.320 --> 00:42:14.927
पू. लालचंदभाई: भेदज्ञान!
शुभभाव करना सहायक नहीं है,
वो तो मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है।

00:42:14.951 --> 00:42:21.683
मुमुक्षु: भेदज्ञान तो निश्चय की बात है?
पू. लालचंदभाई: निश्चय की बात ही सच्ची है!
निश्चय की बात सच्ची है।

00:42:21.707 --> 00:42:28.225
पूर्व भूमिका बताई न? पात्रता। सम्यग्दर्शन के लिए 
पात्र कौन है? मोक्षमार्गप्रकाशक (अधिकार ७, 
सम्यक्त्वसन्मुख  मिथ्यादष्टि, पृष्ठ २६०) 

00:42:28.249 --> 00:42:35.780
में लिखा है कि बारंबार तत्त्व का 
विचार करे यानि
भेदज्ञान करे, वो व्यवहार है।

00:42:35.804 --> 00:42:39.580
भेदज्ञान का जो विचार है न,
वो व्यवहार है।

00:42:39.604 --> 00:42:44.416
ये मैं स्व हूँ और ये मैं पर नहीं हूँ (ऐसा)
विधि-निषेध का विकल्प आया न।

00:42:44.440 --> 00:42:51.643
मैं ऐसा हूँ और ऐसा नहीं हूँ,
मैं शुद्ध हूँ और अशुद्ध नहीं हूँ,
मैं अकर्ता हूँ और कर्ता नहीं हूँ,

00:42:51.667 --> 00:43:02.336
दो के बीच में भेदज्ञान का विचार आया न,
उसमें मिथ्यात्व गलता है और शुभभाव
करने से मिथ्यात्व बढ़ जाता है।

00:43:02.360 --> 00:43:10.158
लोगों को यह प्रिय लगता है,
शुभभाव। हाँ! ये ठीक है। शुभभाव
तो करना चाहिए तो पात्रता है।

00:43:10.182 --> 00:43:21.887
(अरे!) अपात्रता है! शुभभाव से पुण्य
बंधता है जरूर, मगर साथ-साथ में कर्ताबुद्धि
है इसलिए मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है।

00:43:21.911 --> 00:43:26.816
भेदज्ञान नहीं है उसमें।
कर्ता में कहाँ भेदज्ञान रहा?

00:43:26.840 --> 00:43:36.136
शुभभाव करने जैसा है ऐसा जो
अभिप्राय है वो तो अज्ञान है, अप्रतिबुद्ध का
लक्षण है। भेदज्ञान। शुभभाव आता है जरूर।

00:43:36.160 --> 00:43:44.172
एक प्रश्न आया गुरुदेव के पास कि
साहब! आप फरमाते हैं कि आत्मा के अनुभव
से सम्यग्दर्शन, धर्म की शुरूआत होती है।

00:43:44.196 --> 00:43:52.376
वहाँ तक तो हम पहुँचते नहीं (हैं)।
अनुभव तक तो हम पहुँचते नहीं हैं
और पाप तो करना नहीं है हमको।

00:43:52.400 --> 00:43:59.020
बाकी बचा पुण्य, तो पुण्यभाव करना
कि नहीं करना? करना कि नहीं करना?

00:43:59.044 --> 00:44:06.918
तो दो में से एक उत्तर आएगा ऐसा
प्रश्नकार का विचार था। मगर (गुरुदेव
ने) दो में से एक भी जवाब नहीं दिया।

00:44:06.942 --> 00:44:14.896
क्या जवाब दिया? कि जब पुण्यभाव आये,
शुभभाव, तब उससे आत्मा भिन्न है,
जुदा है - ऐसा बार-बार विचार करना।

00:44:14.920 --> 00:44:19.705
पुण्य करना ऐसा भी नहीं कहा
(और) नहीं करना ऐसा भी नहीं कहा।

00:44:19.729 --> 00:44:29.536
नहीं करना, ऐसा कहा नहीं बिल्कुल।
मुमुक्षु: क्यों नहीं कहा?

00:44:29.560 --> 00:44:34.327
पू. लालचंदभाई: उसके कालक्रम
में शुभभाव आता है।

00:44:34.351 --> 00:44:40.114
करने की बात नहीं है,
नहीं करने की बात भी नहीं है;
उसके कालक्रम में आवे (ही आवे)।

00:44:40.138 --> 00:44:45.292
नहीं करना क्या? नहीं करना वो भी
कर्ताबुद्धि (और) करना वो भी कर्ताबुद्धि है।

00:44:45.316 --> 00:44:49.372
आता है, उससे आत्मा भिन्न है
ऐसा बार-बार विचार करना।

00:44:49.396 --> 00:44:57.816
भेदज्ञान का विचार
वो पूर्व भूमिका है, पात्रता।
सम्यग्दर्शन की पात्रता (तो) वो है।

00:44:57.840 --> 00:45:04.380
मुमुक्षु: जब आता ही है तो फिर
'करना’ ऐसा कहने में क्या दिक्कत है? आएगा
तो 'करना है’ ऐसा कहने में क्या दिक्कत है?

00:45:04.404 --> 00:45:09.785
पू. लालचंदभाई: मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है,
एकत्वबुद्धि हो जाती है,
उसका स्वामी बन जाता है।

00:45:09.809 --> 00:45:15.514
स्व-स्वामी संबंध, आहाहा! बन गया,
ममत्व हो गया शुभभाव से।

00:45:15.538 --> 00:45:22.736
वीतरागमार्ग में ममत्व करने की
सख्त मनाही है। आहाहा!

00:45:22.760 --> 00:45:26.425
मुमुक्षु: आप कहते हैं कि
शुभभाव से मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है।

00:45:26.449 --> 00:45:29.203
पू. लालचंदभाई: कर्ताबुद्धि से
मिथ्यात्व (दृढ़ होता है), शुभभाव से नहीं।

00:45:29.227 --> 00:45:32.180
शुभभाव तो, पाँच महाव्रत के परिणाम
शुभभाव (तो) होता है ज्ञानी को (भी)।

00:45:32.204 --> 00:45:41.683
शुभभाव मिथ्यात्व नहीं है भैया!
(नहीं) तो गड़बड़ होगी!
अब तो साधक को भी शुभभाव होता है।

00:45:41.707 --> 00:45:49.852
मगर शुभभाव में ममत्व, एकत्व,
कर्तृत्व वो मिथ्यात्व है, भैया।

00:45:49.876 --> 00:45:57.096
मुमुक्षु: जीवन में चरणानुयोग ओर
द्रव्यानुयोग का सुमेल किसप्रकार होवे?
पू. लालचंदभाई: भेदज्ञान से हो जाता है।

00:45:57.120 --> 00:46:06.176
भेदज्ञान से सुमेल हो जाता है।
सुमेल करना हो (तो) भेदज्ञान करो,
राग से भिन्न आत्मा को जानो, बस।

00:46:06.200 --> 00:46:11.976
वो द्रव्यानुयोग (और) चरणानुयोग; यानि
सम्यग्दर्शन का आचरण, वह चरणानुयोग है।

00:46:12.000 --> 00:46:16.274
स्वरूपाचरण चारित्र वो भी आचरण
(अर्थात्) चारित्र है, ऐसा आ जाता है।

00:46:16.298 --> 00:46:21.207
मुमुक्षु: भेदज्ञान और सम्यग्दर्शन
ये सब बातें तो द्रव्यानयोग की हुईं।
चरणानुयोग का क्या आया इसमें?

00:46:21.231 --> 00:46:25.478
पू. लालचंदभाई: चरणानुयोग का है
(कि) जैसा भाव आता है उसको जानना।

00:46:25.502 --> 00:46:30.909
स्थिति अनुसार जो शुभाशुभभाव है
उसको जानना, बस।

00:46:30.933 --> 00:46:37.407
जानना वो चरणानुयोग है; शुभभाव
करने का चरणानुयोग में नहीं है।

00:46:37.431 --> 00:46:41.594
परस्पर विरुद्ध बात होती नहीं हैं
जिनागम में।

00:46:41.618 --> 00:46:50.176
हाँ! कोई ऐसा जीव पाप के रास्ते चढ़ गया
हो तो उपदेश-बोध देते हैं (कि) पाप
छोड़ और पुण्य कर, ऐसा कहें।

00:46:50.200 --> 00:46:56.732
कोई (अगर) दूसरी जगह पर जाता है (अन्य)
मंदिर में तो (उसको कहें कि) अरे! (जिनेन्द्र)
भगवान का दर्शन कर, तेरे को धर्म होगा।

00:46:56.756 --> 00:47:05.740
मुमुक्षु: स्वार्थ-प्रमाण और परार्थ-प्रमाण?
पू. लालचंदभाई: स्वार्थ-प्रमाण
और परार्थ-प्रमाण, अच्छा!

00:47:05.764 --> 00:47:16.114
स्वार्थ-प्रमाण में अंदर में अपने धर्मों
को जानना, वो प्रमाण है। परार्थ में
बाहर में स्व और पर आ गए।

00:47:16.138 --> 00:47:23.483
अंदर में अपने गुण और अपना धर्म 
और अपनी पर्याय, वो स्वार्थ में 
आता है और वो अध्यात्मप्रमाण है।

00:47:23.507 --> 00:47:33.212
बाहर का परार्थ-प्रमाण है, आत्मा को भी जाने, 
लोकालोक को भी जाने, पर के द्रव्य-
गुण-पर्याय को (जाने), ऐसा (परार्थ-प्रमाण है)।

00:47:33.236 --> 00:47:42.118
मुमुक्षु: उसी के उपरांत इसमें 
दूसरा प्रश्न है कि नयों का भेद स्वार्थ
-प्रमाण में होता है कि परार्थ-प्रमाण में?

00:47:42.142 --> 00:47:50.807
नय स्वार्थ-प्रमाण में लागू पड़ता है 
कि परार्थ-प्रमाण में? 
पू. लालचंदभाई: नय तो दोनों में लागू पड़ता है।

00:47:50.831 --> 00:47:56.549
मुमुक्षु: दोनों में किस तरह लागू पड़ता है?
पू. लालचंदभाई: अंदर का स्वपरप्रकाशक 
और बाहर का स्वपरप्रकाशक।

00:47:56.573 --> 00:48:03.567
अंदर के स्वप्रकाशक में अपना द्रव्य, 
अपना गुण और अपनी पर्याय - अंदर की बात।

00:48:03.591 --> 00:48:10.016
और बाहर में, प्रमाण से बाहर 
लोकालोक भी जानने में आता है - ऐसा।

00:48:10.040 --> 00:48:16.358
मुमुक्षु: लोकालोक को जानना 
यह भी प्रमाण में आ जाएगा क्या? 
पू. लालचंदभाई: हाँ! प्रमाण में आ जाता है।

00:48:16.382 --> 00:48:23.083
जणित (जानने में आ) जाता है तो जानता है, 
ऐसा कहा जाता है। यह ख़्याल रखना।

00:48:23.107 --> 00:48:30.372
निश्चय जो ख़्याल में से छूट गया 
तो लक्ष लोकालोक पर चला जाएगा।

00:48:30.396 --> 00:48:38.163
पर (के) ऊपर चला जाएगा तो 
नय प्रगट नहीं होगा। 
स्वपरप्रकाशक भी प्रगट नहीं होगा।

00:48:38.187 --> 00:48:45.825
स्वप्रकाशक होगा, नंबर एक, 
तो अंदर का स्वपरप्रकाशक 
(अर्थात्) निश्चय प्रगट होता है।

00:48:45.849 --> 00:48:55.425
और अंदर का स्वपरप्रकाशक होता है 
तो बाहर का भी स्वपरप्रकाशक होता है। 
ऐसी तीन बातें ज्ञानी के ज्ञान में आती हैं।

00:48:55.449 --> 00:48:59.692
मुमुक्षु: अंदर का स्वपरप्रकाशक 
और बाहर का स्वपरप्रकाशक,  क्या चीज़ है?

00:48:59.716 --> 00:49:06.683
पू. लालचंदभाई: अंदर का 
स्वपरप्रकाशक का ऐसा विषय है कि 
अपना आत्मा ज्ञायक भी जानने में आवे

00:49:06.707 --> 00:49:10.900
और आनंद आदि जो परिणाम 
प्रगट हों वो भी जानने में आवें।

00:49:10.924 --> 00:49:18.296
तो जब ज्ञान अपेक्षा से देखो तो ज्ञान ने 
ज्ञान को भी जाना और ज्ञान ने आनंद आदि

00:49:18.320 --> 00:49:22.603
परिणाम जो प्रगट हुए 
अनुभव के काल में, उनको भी जाना;

00:49:22.627 --> 00:49:29.763
तो ज्ञान स्व है और आनंद पर है 
तो ऐसा स्वपरप्रकाशक अनुभूति 
के काल में प्रगट होता है।

00:49:29.787 --> 00:49:33.332
निश्चय स्वपरप्रकाशक कहा जाता है।

00:49:33.356 --> 00:49:38.816
और (जब) वो सविकल्पदशा में आता है 
साधक, तो आत्मा भी जानने में आता है

00:49:38.840 --> 00:49:44.860
(और) देव-गुरु-शास्त्र सब लोकालोक भी 
जानने में आते हैं; वो भी स्वपरप्रकाशक है।

00:49:44.884 --> 00:49:47.692
एक निश्चय (स्वपरप्रकाशक और) 
दूसरा व्यवहार (स्वपरप्रकाशक)।

00:49:47.716 --> 00:49:53.038
निश्चय क्या? कि पर की अपेक्षा नहीं है 
इसलिए स्वपरप्रकाशक निश्चय;

00:49:53.062 --> 00:49:58.078
(और) बाहर की, पर की अपेक्षा आती है 
तो वो परप्रकाशक (इसलिए) 
स्वपरप्रकाशक व्यवहार हो गया।

00:49:58.102 --> 00:50:02.807
एक निश्चय (और) दूसरा व्यवहार, 
ऐसा हो जाता है।

00:50:02.831 --> 00:50:09.709
मुमुक्षु: व्यवहार स्वपरप्रकाशक से तो 
ये सिद्ध हो गया कि आत्मा पर को जानता है। 
नहीं तो व्यवहार स्वपरप्रकाशक कैसे कहें?

00:50:09.733 --> 00:50:18.305
पू. लालचंदभाई: परपदार्थ जणित (जानने में 
आ) जाता है, दर्पण में आए हुए प्रतिभास के 
समान, तो कहा जाता है कि पर को जानता है।

00:50:18.329 --> 00:50:34.425
ऐसा, प्रवचनसार (गाथा २६) में ऐसी 
बात आयी है कि जो परपदार्थ ज्ञेय है, 
वो निमित्तभूत ज्ञेयाकार ज्ञान है

00:50:34.449 --> 00:50:44.309
और वो (जो) ज्ञेय ज्ञान में 
प्रतिभासित होते हैं, उनका नाम 
 नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार ज्ञान है।

00:50:44.333 --> 00:50:50.980
तो नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार, 
ज्ञान का प्रतिभास 
तो ज्ञान की पर्याय है।

00:50:51.004 --> 00:50:59.705
उसको जाना तो कार्य में कारण 
का आरोप देकर लोकालोक को 
जानता है, ऐसा कहा जाता है।

00:50:59.729 --> 00:51:06.260
मुमुक्षु: ये निमित्तभूत ज्ञेयाकार 
और नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार इन 
दोनों का थोड़ा विशेष खुलासा करें।

00:51:06.284 --> 00:51:12.576
पू. लालचंदभाई: नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार 
तो जैसे दर्पण, दर्पण का दृष्टांत लो 
तो ख़्याल में आवे।

00:51:12.600 --> 00:51:26.038
जब दर्पण में प्रतिभास के अंदर अग्नि हो, 
बर्फ़ हो, मोर हो, कोई भी पदार्थ हो तो 
वो निमित्तभूत ज्ञेयाकार है, निमित्तभूत।

00:51:26.062 --> 00:51:32.798
'निमित्तभूत ज्ञेयाकार' ज्ञान से भिन्न है, 
वो निमित्त में चला गया।

00:51:32.822 --> 00:51:41.683
और ये जो इसका प्रतिभास हुआ इसका 
नाम 'नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार' ज्ञान है।

00:51:41.707 --> 00:51:44.909
वो बात तो ठीक है, 
सब (कुछ) आत्मा में ही है।

00:51:44.933 --> 00:51:51.887
तो उस कार्य के अंदर कारण का उपचार 
देकर लोकालोक को जानता है ऐसा कहा 
जाता है। जानता है तो अपनी पर्याय को।

00:51:51.911 --> 00:51:55.980
मुमुक्षु: तो बाहर का जो मोर है 
वो निमित्तभूत ज्ञेयाकार?
पू. लालचंदभाई: निमित्तभूत मोर है।

00:51:56.004 --> 00:52:02.447
मुमुक्षु: अंदर का जो प्रतिबिम्ब है 
वो नैमित्तिक(भूत) ज्ञेयाकार (है)?
पू. लालचंदभाई: हाँ! (नैमित्तिकभूत) ज्ञेयाकार है।

00:52:02.471 --> 00:52:08.954
जैसी स्वच्छता है न दर्पण में, 
ऐसी आत्मा में ज्ञान के अंदर 
स्वच्छता है तो प्रतिभास होता है।

00:52:08.978 --> 00:52:14.883
मुमुक्षु: क्या ज्ञेय पदार्थों को 
निमित्तभूत ज्ञेयाकार कहते हैं?
पू. लालचंदभाई: हाँ! ज्ञेय पदार्थों को (कहते हैं)।

00:52:14.907 --> 00:52:25.420
अपना आत्मा भी ज्ञेय और अपनी आत्मा 
के अलावा जो आत्मा से भिन्न हैं, वो 
ज्ञेयाकार हैं, वो ज्ञेय हैं, निमित्तभूत ज्ञेय हैं।

00:52:25.444 --> 00:52:32.674
ये (पुस्तक) निमित्तभूत ज्ञेय है और 
इसकी झलक अंदर (ज्ञान) में आयी 
तो नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार ज्ञान हो गया।

00:52:32.698 --> 00:52:35.283
वो (पुस्तक) निमित्त और 
ये (झलक अंदर) नैमित्तिक, ऐसा।

00:52:35.307 --> 00:52:38.287
मुमुक्षु: ज्ञेयरूप।
पू. लालचंदभाई: ज्ञेयरूप!

00:52:38.311 --> 00:52:45.887
ये प्रवचनसार शास्त्र है न देखो! 
मँगवाओ जरा। अभी प्रवचनसार इधर लाओ।

00:52:45.911 --> 00:52:51.078
मुमुक्षु: आज सुबह के प्रवचन में 
भी इस प्रकार की बात आयी थी 
कि निमित्त को भी नहीं जानता,

00:52:51.102 --> 00:52:54.549
नैमित्तिक को भी नहीं जानता, 
क्षणिक-उपादान को जानता है,

00:52:54.573 --> 00:53:00.736
तो उससे अभेद त्रिकाली-उपादान 
को जान लेता है। इस बात का जरा 
विशेष खुलासा करने की कृपा करें।

00:53:00.760 --> 00:53:39.380
(प्रवचनसार शास्त्र आया।)
पू. लालचंदभाई: हाँ, ठीक! ३१ गाथा है।

00:53:39.404 --> 00:53:51.918
<b>यदि समस्त स्व-ज्ञेयाकारोंके 
समर्पण द्वारा (ज्ञानमें) अवतरित होते हुए 
समस्त पदार्थ ज्ञानमें प्रतिभासित न हों तो</b>,

00:53:51.942 --> 00:53:56.394
ज्ञान में आता नहीं है, 
प्रतिभास तो होता है।

00:53:56.418 --> 00:54:04.865
<b>प्रतिभासित न हों तो वह 
ज्ञान सर्वगत नहीं माना जाता</b>, 
यानि प्रतिभास तो होता है।

00:54:04.889 --> 00:54:12.678
<b>और यदि वह (ज्ञान) सर्वगत 
माना जाये, तो फिर (पदार्थ) 
साक्षात् ज्ञानदर्पण-भूमिकामें</b>

00:54:12.702 --> 00:54:20.287
<b>अवतरित ¹बिम्बकी भाँति 
अपने-अपने 
ज्ञेयाकारोंके कारण (होनेसे)</b>,

00:54:20.311 --> 00:54:23.860
अपने-अपने, 
वो कारण-कार्य उसमें है ज्ञेय का।

00:54:23.884 --> 00:54:28.229
<b>अपने-अपने ज्ञेयाकारोंके कारण (होनेसे) </b>

⁰ ¹ ² ³ ⁴ ⁵ ⁶ ⁷ ⁸ ⁹
00:54:28.253 --> 00:54:37.340
<b>और ²परम्परासे प्रतिबिम्बके समान 
ज्ञेयाकारोंके कारणहोनेसे </b>

00:54:37.364 --> 00:54:49.163
<b>पदार्थ कैसे ज्ञानस्थित निश्चित् नहीं होते? 
(अवश्य ही ज्ञानस्थित निश्चित होते हैं)।</b>

00:54:49.187 --> 00:54:54.065
उसमें एक नीचे फूटनोट है।

00:54:54.089 --> 00:55:04.709
<b>२. पदार्थ साक्षात् स्वज्ञेयाकारोंके 
कारण हैं (अर्थात् पदार्थ अपने-अपने द्रव्य-
गुण-पर्यायोंके साक्षात्कारण हैं) </b>बाहर,

00:55:04.733 --> 00:55:14.167
<b>और परम्परासे ज्ञानकी अवस्थारूप 
ज्ञेयाकारोंके (ज्ञानाकारोंके) कारण हैं।</b>

00:55:14.191 --> 00:55:19.180
(फुटनोट) <b>३. प्रतिबिम्ब नैमित्तिक कार्य हैं और 
मयूरादि निमित्त-कारण हैं। </b>

00:55:19.204 --> 00:55:24.483
एक निमित्त और इधर स्वच्छता दिखती है न।

00:55:24.507 --> 00:55:29.189
गुजराती में बहुत, भावार्थ में बहुत 
लिखा है। इसमें भावार्थ बड़ा है।

00:55:29.213 --> 00:55:33.669
<b>भावार्थ:- दर्पणमें </b>
दर्पण का दृष्टांत बहुत अच्छा है।

00:55:33.693 --> 00:55:41.069
<b>दर्पणमें मयूर, मन्दिर, सूर्य, वृक्ष 
इत्यादिके प्रतिबिम्ब पड़ते हैं।</b>

00:55:41.093 --> 00:55:46.923
<b>वहाँ निश्चयसे तो प्रतिबिम्ब 
दर्पणकी ही अवस्थायें हैं,</b>

00:55:46.947 --> 00:56:01.612
<b>तथापि दर्पणमें प्रतिबिम्ब देखकर 
³कार्य में कारण का उपचार करके व्यवहारसे 
कहा जाता है कि ‘मयूरादिक दर्पणमें हैं।’</b>

00:56:01.636 --> 00:56:13.274
<b>इसीप्रकार ज्ञानदर्पणमें भी सर्व पदार्थोंके 
समस्त ज्ञेयाकारोंके प्रतिबिम्ब पड़ते हैं</b>।

00:56:13.298 --> 00:56:16.487
ज्ञेय नहीं आता है ज्ञान में, 
प्रतिबिम्ब पड़ते हैं।

00:56:16.511 --> 00:56:27.269
<b>अर्थात् पदार्थोंके ज्ञेयाकारोंके 
निमित्तसे ज्ञानमें ज्ञानकी 
अवस्थारूप ज्ञेयाकार होते हैं</b>

00:56:27.293 --> 00:56:32.812
<b>(क्योंकि यदि ऐसा न हो तो ज्ञान 
सर्व पदार्थोंको नहीं जान सकेगा)।</b>

00:56:32.836 --> 00:56:45.909
<b>वहाँ निश्चयसे ज्ञानमें होनेवाले 
ज्ञेयाकार ज्ञानकी ही अवस्थायें है, पदार्थोंके 
ज्ञेयाकार कहीं ज्ञानमें प्रविष्ट नहीं है।</b>

00:56:45.933 --> 00:56:58.136
<b>निश्चयसे ऐसा होने पर भी व्यवहारसे 
देखा जाये तो, ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकारों
के कारण पदार्थोंके ज्ञेयाकार हैं,</b>

00:56:58.160 --> 00:57:07.567
<b>और उनके कारण पदार्थ हैं - 
इसप्रकार परम्परासे ज्ञानमें होनेवाले 
ज्ञेयाकारोंके कारण पदार्थ हैं;</b>

00:57:07.591 --> 00:57:13.949
<b>इसलिये उन (ज्ञानकी अवस्थारूप) 
ज्ञेयाकारोंको ज्ञानमें देखकर,</b>

00:57:13.973 --> 00:57:22.918
<b>कार्यमें कारणका उपचार 
करके व्यवहारसे ऐसा कहा जा सकता 
है कि ‘पदार्थ ज्ञानमें हैं’॥३१॥</b>

00:57:22.942 --> 00:57:38.812
राग निमित्त है, राग ज्ञान में आ गया 
ऐसा कहने में आता है। 
अभी पहला प्रश्न हो गया। बहुत बढ़िया!

00:57:38.836 --> 00:57:45.954
मुमुक्षु: ज्ञान पदार्थों को जानता है 
और पदार्थ ज्ञान में प्रतिभासित होते हैं, 
इन दोनों बातों में क्या अंतर है?

00:57:45.978 --> 00:57:49.012
पू. लालचंदभाई: बड़ा, 
बड़ा भारी फेर (फर्क़) है उसमें।

00:57:49.036 --> 00:57:59.345
मैं ज्ञेय को जानता हूँ (ये) एक बात 
और ज्ञेय मेरे ज्ञान में जणित (जानने में 
आ) जाता है, उसमें बहुत अंतर है।

00:57:59.369 --> 00:58:02.816
ज्ञेय को मैं जानता हूँ 
तो लक्ष ज्ञेय पर चला जाता है;

00:58:02.840 --> 00:58:10.323
और ज्ञेय मेरे ज्ञान में झलकता है 
तो ज्ञान आत्मा पर आ जाता है, 
पर का लक्ष नहीं होता है।

00:58:10.347 --> 00:58:12.429
मुमुक्षु: साहब! 
बात तो दोनों में एक ही हुई न?

00:58:12.453 --> 00:58:19.025
ज्ञान में पदार्थों का प्रतिबिम्ब पड़ता है 
इसी को जानना कह दें या इसी को 
ज्ञेयों का प्रतिभास होता है ऐसा कह दें?

00:58:19.049 --> 00:58:24.438
पू. लालचंदभाई: परंतु जानता किसको है? 
ज्ञेय को या ज्ञेयाकार ज्ञान को 
या ज्ञानाकार ज्ञान को?

00:58:24.462 --> 00:58:26.398
ज्ञान किसको जानता है?

00:58:26.422 --> 00:58:35.598
इसको (कागज़) ज्ञान जानता है या वो 
प्रतिभास उसमें (ज्ञान में) हुआ - ऐसे 
ज्ञेयाकार ज्ञान को जानता है?

00:58:35.622 --> 00:58:39.425
मुमुक्षु: प्रतिभास ज्ञान में हुआ 
यही तो उसका जानना है?

00:58:39.449 --> 00:58:41.540
पू. लालचंदभाई: तो वो जानना है 
तो ज्ञान जाना न?

00:58:41.564 --> 00:58:46.580
ज्ञान को, प्रतिभास को ज्ञान ने जाना न? 
या इसको (कागज़ को) जाना?

00:58:46.604 --> 00:58:54.283
इसको (कागज़) वहाँ रखा है, 
(जानना अंदर) इधर-इधर है, 
लोकालोक इधर प्रतिभासित होते हैं

00:58:54.307 --> 00:59:00.309
तो केवली भगवान ऐसा-ऐसा (परसन्मुखता) 
करते हैं (क्या)? नहीं करते हैं!

00:59:00.333 --> 00:59:09.976
इन्द्रियज्ञान से जो अभ्यास है, 
उस इन्द्रियज्ञान से यदि 
खोज करे तो वो ख़्याल में नहीं आएगा।

00:59:10.000 --> 00:59:17.354
इन्द्रियज्ञान के अलावा एक 
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होता है साधक को।

00:59:17.378 --> 00:59:25.816
उस ज्ञान की ताकत कोई अपूर्व है, 
वो ही ज्ञान है। 
इन्द्रियज्ञान ज्ञान नहीं है, ज्ञेय है भैया।

00:59:25.840 --> 00:59:29.318
मुमुक्षु: अतीन्द्रियज्ञान अपनी 
ज्ञान पर्याय को जानता है?
पू. लालचंदभाई: जानता है।

00:59:29.342 --> 00:59:37.834
मुमुक्षु: और इन्द्रियज्ञान पर को जानता है?
पू. लालचंदभाई: हाँ! ऐसा है, ऐसा आया है। 
ऐसा कहाँ आया है?

00:59:37.858 --> 00:59:46.683
एक अमितगति आचार्य का योगसार है, 
उसमें अंतिम चूलिका अधिकार है,

00:59:46.707 --> 00:59:51.532
उस चूलिका अधिकार (गाथा ४८) में 
आचार्य भगवान ने लिखा,

00:59:51.556 --> 01:00:03.180
most important (सबसे महत्वपूर्ण)
 बात है कि पदार्थ दो हैं, 
देह और आत्मा - पदार्थ दो हैं।

01:00:03.204 --> 01:00:12.020
दो को जाननेवाला दो प्रकार का ज्ञान 
होता है; इन्द्रियज्ञान देह को जानता है

01:00:12.044 --> 01:00:18.478
और स्वसंवेदन ज्ञान आत्मा को जानता है। 
ऐसे दो भाग कर दिए।

01:00:18.502 --> 01:00:27.469
और दो की ही दो बात निश्चय से है 
और निश्चय की बात पहले समझनी 
चाहिए, उसमें भेदज्ञान है।

01:00:27.493 --> 01:00:34.616
इन्द्रियज्ञान पर को जानता है, 
अतीन्द्रियज्ञान स्व को जानता है 
ऐसा वहाँ लिखा है।

01:00:34.640 --> 01:00:39.087
साफ शब्दों में लिखा है, 
अमितगति आचार्य का योगसार है।

01:00:39.111 --> 01:00:44.109
कल लाना इधर दोपहर में, 
इधर रखना योगसार अमितगति आचार्य का।

01:00:44.133 --> 01:00:50.772
इधर होगा, होगा ही होगा 
- अमितगति आचार्य का योगसार।

01:00:50.796 --> 01:01:01.429
उसमें लिखा है और वो बात समयसार में है, 
वो बात समयसार में भी है।

01:01:01.453 --> 01:01:06.860
समयसार तो इधर आ गया है। 
हाँ जी! समयसार है।

01:01:06.884 --> 01:01:19.696
उसकी दस (३७३-३८२) गाथायें हैं, दस। 
कर्णेंद्रिय शब्द को जानती है और शब्द 
ऐसा नहीं कहता है कि तू हमको जान;

01:01:19.720 --> 01:01:31.363
और आत्मा अपने को जानना 
छोड़कर वो शब्द को जानने जाता 
ही नहीं है! दस गाथायें हैं, दस।

01:01:31.387 --> 01:01:36.665
डॉक्टर हुकुमचंद जी भारिल्ल: .. कर्ताबुद्धि .. ज्ञाताबुद्धि ..
पू. लालचंदभाई: हाँ! मार्मिक तो वो बात है

01:01:36.689 --> 01:01:42.656
(कि) वो तो नहीं कहता है कि 
तू सुन (ऐसा) वो तो नहीं कहता है।

01:01:42.680 --> 01:01:50.732
और उसको जाननेवाली कर्णेंद्रिय आती है, 
पाँच इंद्रिय। समझे? 
रसेंद्रिय आदि उसको जाननेवाला वो है।

01:01:50.756 --> 01:02:00.216
मगर उसको वो (इन्द्रियज्ञान) 
जाननेवाला है और आत्मा भी उसको 
जानने को जावे, ऐसा नहीं है।

01:02:00.240 --> 01:02:09.247
यह जो स्वपरप्रकाशक का अंदर 
में थोड़ा व्यवहार का ज्यादा पक्ष 
होवे तो वो ख़्याल में नहीं आवे।

01:02:09.271 --> 01:02:13.900
निश्चय की बात पहले समझनी चाहिए! 
निश्चयपूर्वक व्यवहार होता है।

01:02:13.924 --> 01:02:21.016
व्यवहार नहीं है ऐसा नहीं है, मगर निश्चय 
की बात होना चाहिए (उसको) पहले 
समझना चाहिए। दस गाथायें हैं।

01:02:21.040 --> 01:02:38.203
देखो! मैं मूल गाथा आपको बताऊँ। क्योंकि 
थोड़े दिन हैं न, तो मूल-मूल बात कह 
देने से सबको ख़्याल में आ जावे। आहाहा!

01:02:38.227 --> 01:02:44.843
इन्द्रियज्ञान को ज्ञान माना है, अज्ञान है, 
ज्ञान ही नहीं है (वो तो) ज्ञेय है;

01:02:44.867 --> 01:02:57.989
मोहराजा ने ज्ञान (नाम) रखा, 
मोही जीव ने (वैसा) मान लिया। 
ज्ञानी (वैसा) नहीं मानता है।

01:02:58.013 --> 01:03:34.500
३७३ गाथा है, ३७३ से ३८२ गाथा हैं, 
दस गाथा।

01:03:34.524 --> 01:03:46.829
समयसार में माल भरा है, 
सब समयसार में से निकला है, 
मूल तो समयसार है। आहाहा!

01:03:46.853 --> 01:03:52.754
जिनेंद्र भगवान का मार्ग सुरक्षित हो गया 
समयसार में,

01:03:52.778 --> 01:04:09.540
बहुत आचार्यों ने रखा है सुरक्षित; 
(मगर) मुख्यरूप से समयसार की 
प्रधानता है अभी। आहाहा! अच्छा!

01:04:09.564 --> 01:04:23.745
देखो मैं तीसरी (३७५) गाथा पढ़ता हूँ।

01:04:23.769 --> 01:04:37.229
<b>अशुभ अथवा शुभ शब्द 
तुझसे यह नहीं कहता कि 
‘तू मुझे सुन'; </b>शब्द।

01:04:37.253 --> 01:04:41.123
<b>और आत्मा भी</b> 
वो बात main (मुख्य) है,

01:04:41.147 --> 01:04:54.763
<b>आत्मा भी (अपने स्थानसे च्युत होकर), 
श्रोत्रेन्द्रियके विषयमें आये हुए शब्दको</b>, 
शब्द कहाँ तक आता है?

01:04:54.787 --> 01:05:04.763
श्रोतेन्द्रिय तक आता है, 
अतींद्रिय तक पहुँचता ही नहीं है; 
not allowed (प्रवेश वर्जित)।

01:05:04.787 --> 01:05:14.429
<b>श्रोत्रेन्द्रियके विषयमें आये 
हुए शब्दको ग्रहण करनेको </b>
यानि <b>(जाननेको) नहीं जाता। </b>

01:05:14.453 --> 01:05:18.589
शब्द आया तो श्रोतेन्द्रिय ने जान लिया, 
पकड़ लिया।

01:05:18.613 --> 01:05:23.572
तो आचार्य भगवान कहते हैं, फरमाते 
हैं कि ऐसी स्थिति बाहर में है।

01:05:23.596 --> 01:05:34.198
शब्द भी हैं, शब्द को प्रसिद्ध करनेवाली 
श्रोतेन्द्रिय भी है मगर भगवान जो आत्मा है 
(वो) अपने को जानते-जानते परिणमता है।

01:05:34.222 --> 01:05:39.532
अपने जाननेरूप जो परिणमता है, 
वह अपने को जानना छोड़कर

01:05:39.556 --> 01:05:43.936
इस श्रोतेन्द्रिय के विषय को ग्रहण 
करने (या) जानने जाता ही नहीं है।

01:05:43.960 --> 01:05:50.976
ऐसा भेदज्ञान बताया है। 
बढ़िया गाथा हैं, दस गाथायें हैं।

01:05:51.000 --> 01:05:53.816
मुमुक्षु: अनुभूति के संबंध में एक प्रश्न है।

01:05:53.840 --> 01:06:02.367
अनुभूति करने के लिए 
ज्ञान की पर्याय को द्रव्य के साथ 
कथंचित् अभिन्न होने की क्या आवश्यकता है?

01:06:02.391 --> 01:06:08.265
पू. लालचंदभाई: अभेद ना हो 
तो आनंद ही नहीं है, अभेद नहीं 
हो तो सम्यग्दर्शन भी नहीं होता है।

01:06:08.289 --> 01:06:17.669
सर्वथा भिन्न नहीं है; ज्ञायक और ज्ञायक 
के आश्रय से होनेवाली अतीन्द्रियज्ञान 
की पर्याय, कथंचित् अभिन्न है।

01:06:17.693 --> 01:06:24.016
जो अभिन्न न हो तो सम्यग्दर्शन नहीं होता है, 
अनुभव नहीं होता है, आनंद नहीं आता है।

01:06:24.040 --> 01:06:34.003
दृष्टि अपेक्षा से सर्वथा भिन्न, 
ज्ञान अपेक्षा से कथंचित् अभिन्न 
और कथंचित् भिन्न।

01:06:34.027 --> 01:06:38.700
अनुभूति स्वयं पर्याय नहीं रही, 
अभी आत्मा हो गयी (वो)।

01:06:38.724 --> 01:06:51.167
अभेद होने से, अभेदनय से, 
अभेद द्रव्यार्थिकनय से देखो तो वो 
अनुभूति आत्मा ही है, पर्याय नहीं है।

01:06:51.191 --> 01:06:56.785
मुमुक्षु: वो पर्याय 
क्या त्रिकाली हो जाती है?
पू. लालचंदभाई: पर्याय आत्मा हो जाती है। बस!

01:06:56.809 --> 01:07:00.185
पर्याय आत्मा हो जाती है

01:07:00.209 --> 01:07:12.136
यानि पर्याय और द्रव्य का भेद होने पर (भी) 
अभेद ज्ञेय के माध्यम से देखो तो द्रव्य 
और पर्याय का भेद दिखाई देता (नहीं है)।

01:07:12.160 --> 01:07:18.914
अभेद में पर्याय का भेद, अभेद ज्ञेय 
में पर्याय का भेद दिखाई नहीं देता है।

01:07:18.938 --> 01:07:24.189
और अभेद ध्येय में गुण-भेद 
दिखाई नहीं देता है। क्या कहा?

01:07:24.213 --> 01:07:35.887
अभेद ध्येय में, जो ध्येय है ध्यान का विषय, 
त्रिकालीद्रव्य, उस अभेद ध्येय में 
गुण-भेद दिखाई नहीं देता है;

01:07:35.911 --> 01:07:47.118
और जो ध्यान हुआ ध्येय का और ध्याता 
हो गया, तो ज्ञेय हुआ, द्रव्य पर्याय से 
अनन्य एकरूप हुआ तो वो ज्ञेय हुआ;

01:07:47.142 --> 01:07:50.660
तो उस ज्ञेय में पर्याय का भेद 
दिखाई देता नहीं है।

01:07:50.684 --> 01:07:58.936
भेद तो है मगर भेद दिखाई देता नहीं है, 
ऐसी बात है।

01:07:58.960 --> 01:08:02.909
मुमुक्षु: ज्ञेय में पर्याय का भेद 
दिखाई नहीं देता और ध्येय में 
गुण-भेद दिखाई नहीं देता?

01:08:02.933 --> 01:08:08.483
पू. लालचंदभाई: (हाँ, दिखाई) नहीं देता। 
इसका नाम निर्विकल्प अनुभव है।

01:08:08.507 --> 01:08:21.749
गुण-भेद भी है मगर दिखाई देता नहीं है 
और पर्याय-भेद तो है उत्पाद, उत्पाद है; 
ध्रुव तो ध्रुव है; उत्पाद ध्रुव नहीं बन जाता है।

01:08:21.773 --> 01:08:24.300
मुमुक्षु: फिर ध्येय पूर्वक ज्ञेय होता है।
पू. लालचंदभाई: हाँ!

01:08:24.324 --> 01:08:28.305
मुमुक्षु: क्या इसका ये मतलब है (कि) 
पहले ध्येय होता है पीछे ज्ञेय होता है?

01:08:28.329 --> 01:08:36.096
पू. लालचंदभाई: एक समय ध्येय होता है 
और उस एक ही समय में ज्ञेय हो 
जाता है, काल-भेद नहीं है।

01:08:36.120 --> 01:08:39.656
मुमुक्षु: तो 'ध्येय पूर्वक' 
ऐसा क्यों बोलते हो? 
ध्येय के साथ में ज्ञेय होता है न?

01:08:39.680 --> 01:08:44.060
पू. लालचंदभाई: नहीं! 
ध्येय पूर्वक ही होता है ज्ञेय, 
उसमें मर्म है।

01:08:44.084 --> 01:08:50.065
आत्मा के आश्रय से ही 
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के 
निर्विकारी परिणाम प्रगट होते हैं।

01:08:50.089 --> 01:08:56.376
वो तो, ज्ञेय तो फल है। 
ज्ञेय तो फल है। आहाहा!

01:08:56.400 --> 01:09:09.109
मूल कारण तो ध्येय है; ध्येय के आश्रय 
से ध्यान होता है तो ध्येय, ध्यान और 
ध्याता अभेद हो जाते हैं - कथंचित् अभेद।

01:09:09.133 --> 01:09:19.247
मुमुक्षु: एक भाई पूछते हैं (कि) दृष्टि के 
विषय में पर्याय का निषेध करने पर भी 
हमें पर्याय की महिमा क्यों आती है?

01:09:19.271 --> 01:09:28.123
पू. लालचंदभाई: सचमुच निषेध नहीं आया 
(है, इसलिए)।
मुमुक्षु: इसका क्या अर्थ है?

01:09:28.147 --> 01:09:36.612
पू. लालचंदभाई: प्रश्नकार ने कहा न? 
पर्याय का निषेध करने पर भी, 
क्या शब्द आया?

01:09:36.636 --> 01:09:47.260
पर्याय की महिमा आती है, 
इसका अर्थ महिमा पर्याय की है, 
द्रव्य की महिमा आयी नहीं!

01:09:47.284 --> 01:09:49.776
मुमुक्षु: द्रव्य की महिमा नहीं आयी 
इसलिए पर्याय की महिमा आती है?

01:09:49.800 --> 01:09:52.683
पू. लालचंदभाई: आती है, बस। 
पर्यायदृष्टि हो गई (है)।

01:09:52.707 --> 01:09:56.274
मुमुक्षु: तो द्रव्य की महिमा कैसे आवे?
पू. लालचंदभाई: कैसे आवे?

01:09:56.298 --> 01:10:05.998
अपना जो परमात्मा है, मैं ही परमात्मा हूँ, 
मैं बंध-मोक्ष से रहित हूँ। आज तक 
आठ कर्म मैंने बाँधे ही नहीं हैं पूर्व में।

01:10:06.022 --> 01:10:14.318
आदि-मध्य-अंत में, 
मैं तो कर्म-अबंध हूँ, मैं तो मुक्त हूँ। 
ऐसे-ऐसे बहुत शब्द शास्त्र में आते हैं।

01:10:14.342 --> 01:10:24.065
तो वो आत्मा का जैसा स्वरूप है, 
जीवतत्त्व का, ऐसा स्वरूप ख़्याल में लेने 
से महिमा आती है कि मैं आनंद की मूर्ति हूँ।

01:10:24.089 --> 01:10:30.629
आनंद भरा है मेरे में, 
दुःख मेरे में है नहीं। दुख पर्याय 
में हो तो हो मगर मेरे में नहीं है।

01:10:30.653 --> 01:10:37.767
ऐसा द्रव्य-पर्याय का भेदज्ञान करने से 
द्रव्यस्वभाव की अधिकता आती है 
और पर्याय (की) गौणता हो जाती है।

01:10:37.791 --> 01:10:44.834
गौण होकर लक्ष छूट जाता है 
और द्रव्य का लक्ष आ जाता है 
तो अनुभूति हो जाती है।

01:10:44.858 --> 01:10:49.658
पर्याय नहीं है ऐसा नहीं; 
पर्याय गौण करके उसका लक्ष छोड़ देना।