﻿WEBVTT

00:01:06.804 --> 00:01:15.078
आदि-मध्य-अंत में,
मैं तो कर्म-अबंध हूँ, मैं तो मुक्त हूँ।
ऐसे-ऐसे बहुत शब्द शास्त्र में आते हैं।

00:01:15.102 --> 00:01:24.820
तो वो आत्मा का जैसा स्वरूप है,
जीवतत्त्व का, ऐसा स्वरूप ख़्याल में लेने
से महिमा आती है कि मैं आनंद की मूर्ति हूँ।

00:01:24.844 --> 00:01:28.402
आनंद भरा है मेरे में,
दुःख मेरे में है नहीं।

00:01:28.426 --> 00:01:31.420
दुख पर्याय में हो तो हो
मगर मेरे में नहीं है।

00:01:31.444 --> 00:01:38.540
ऐसा द्रव्य-पर्याय का भेदज्ञान करने से
द्रव्यस्वभाव की अधिकता आती है
और पर्याय (की) गौणता हो जाती है।

00:01:38.564 --> 00:01:45.682
गौण होकर लक्ष छूट जाता है
और द्रव्य का लक्ष आ जाता है
तो अनुभूति हो जाती है।

00:01:45.706 --> 00:01:50.451
पर्याय नहीं है ऐसा नहीं; पर्याय गौण
करके उसका लक्ष छोड़ देना।

00:01:50.475 --> 00:01:56.198
मुमुक्षु: अभी थोड़ी देर पहले ये बात आयी
थी कि अतीन्द्रियज्ञान आत्मा को जानता है

00:01:56.222 --> 00:02:01.620
और इन्द्रियज्ञान पर को जानता है।
हम सबके पास तो इन्द्रियज्ञान ही है।
पू. लालचंदभाई: हाँ!

00:02:01.644 --> 00:02:07.607
मुमुक्षु: अतीन्द्रियज्ञान तो है नहीं।
तो फिर हम आत्मा को कैसे जानेगें?
पू. लालचंदभाई: अतीन्द्रियज्ञान प्रगट करना।

00:02:07.631 --> 00:02:11.087
मुमुक्षु: वो तो
आत्मा को जानने पर प्रगट होगा?
पू. लालचंदभाई: नहीं।

00:02:11.111 --> 00:02:17.736
इन्द्रियज्ञान का निषेध करते ही
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट हो जाता है!

00:02:17.760 --> 00:02:24.380
इन्द्रियज्ञान का निषेध करते ही मैं तो
अतीन्द्रियज्ञानमय भगवान आत्मा हूँ।

00:02:24.404 --> 00:02:31.407
इन्द्रियज्ञान कर्ता का कर्म नहीं है
और ज्ञान का ज्ञेय भी नहीं है।
मेरे में (उसकी) नास्ति है।

00:02:31.431 --> 00:02:35.256
द्रव्य में तो नास्ति है मगर
अतीन्द्रियज्ञान जो प्रगट अभी होगा (तो)

00:02:35.280 --> 00:02:39.589
उसमें भी उसकी (इन्द्रियज्ञान
की) नास्ति रहेगी, अंदर में नहीं आएगा।

00:02:39.613 --> 00:02:47.700
ऐसा भेदज्ञान का विचार करने से
एक नया अतीन्द्रियज्ञान अनुभूति
के काल में प्रगट हो जाता है।

00:02:47.724 --> 00:02:52.047
मुमुक्षु: साहेब! इन्द्रियज्ञान का
निषेध इन्द्रियज्ञान खुद करेगा?

00:02:52.071 --> 00:02:54.967
कि अतीन्द्रियज्ञान आकर
इन्द्रियज्ञान का निषेध करेगा?
पू. लालचंदभाई: नहीं!

00:02:54.991 --> 00:03:01.278
पहले सविकल्प में, मानसिकज्ञान में
विधि-निषेध का विकल्प आता है।

00:03:01.302 --> 00:03:04.571
वो मानसिकज्ञान में
विधि-निषेध का विकल्प आता है।

00:03:04.595 --> 00:03:12.460
बाद में विकल्प छूट जाता है और साक्षात्,
विधि-निषेध का राग-द्वेष नहीं होता है,
मध्यस्थ हो जाता है

00:03:12.484 --> 00:03:17.647
तो सहज अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होकर
आत्मा को प्रसिद्ध करता है।

00:03:17.671 --> 00:03:21.229
मुमुक्षु: इन्द्रियज्ञान में पहले निषेध हो
तब अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होता है?

00:03:21.253 --> 00:03:26.096
पू. लालचंदभाई: हाँ! विधि-निषेध
इसके (आत्मा के) जोर से, अकेला वहाँ नहीं।

00:03:26.120 --> 00:03:32.909
मैं अतीन्द्रियज्ञानमय महापदार्थ हूँ
और इन्द्रियज्ञान पराश्रित है,
वो मेरा परिणाम नहीं है,

00:03:32.933 --> 00:03:38.771
मेरा ज्ञान नहीं है,
वो मेरी चीज नहीं है।
इन्द्रियज्ञान मेरी चीज ही नहीं है।

00:03:38.795 --> 00:03:49.011
राग तो मेरा नहीं (है) परंतु
इन्द्रियज्ञान भी मेरा नहीं है।
ममता छूट जाती है, अनुभूति हो जाती है।

00:03:49.035 --> 00:03:53.473
बाद में इन्द्रियज्ञान तो रहता है।
राग भी रहता है और इन्द्रियज्ञान भी रहता है।

00:03:53.497 --> 00:03:58.464
मगर स्वामीपना छूट जाता है,
स्वामीपना छूट जाता है,
एकत्वबुद्धि छूट जाती है।

00:03:58.488 --> 00:04:05.478
इतना फायदा चौथे गुणस्थान में होता है।
इन्द्रियज्ञान भी रहता है, राग भी रहता है।
नहीं रहता (है) ऐसा नहीं है।

00:04:05.502 --> 00:04:11.905
राग राग में है; इन्द्रियज्ञान
इन्द्रियज्ञान में है (और) मैं मेरे में हूँ।
विभाजन पड़ जाती है भेदज्ञान के अंदर।

00:04:11.929 --> 00:04:15.972
मुमुक्षु: ये इन्द्रियज्ञान और राग,
ये दोनों एक जैसे ही हैं क्या?

00:04:15.996 --> 00:04:22.278
पू. लालचंदभाई: एक अपेक्षा से एक जैसे हैं,
एक अपेक्षा से एक जैसे हैं।
मुमुक्षु: वो कौनसी अपेक्षा है?

00:04:22.302 --> 00:04:24.976
पू. लालचंदभाई: क्योंकि राग
आत्मा को प्रसिद्ध नहीं करता है

00:04:25.000 --> 00:04:30.292
और इन्द्रियज्ञान भी आत्मा को प्रसिद्ध
नहीं करता है इसलिए एक जैसे हैं।

00:04:30.316 --> 00:04:42.452
तो भी इन्द्रियज्ञान में जानने की क्रिया
होती है और मनवाले प्राणी सविकल्प
भेदज्ञान करते हैं इतना उसका कार्य है।

00:04:42.476 --> 00:04:48.034
आत्मा तक वो ले जाता है (मगर) आत्मा
में प्रवेश नहीं करता है मानसिकज्ञान।

00:04:48.058 --> 00:04:53.265
मुमुक्षु: इसका जरा विशेष खुलासा (करें)?
पू. लालचंदभाई: संज्ञी पंचेन्द्रिय
जीव सम्यग्दर्शन का पात्र होता है।

00:04:53.289 --> 00:05:00.669
असंज्ञी (तो) सम्यग्दर्शन को प्राप्त होता
नहीं है। तो संज्ञी जीव हुआ। आहाहा!

00:05:00.693 --> 00:05:06.940
अनंत-अनंत कल्पकाल चले जायें।
समझे? तब ये मनुष्यभव मिलता है।

00:05:06.964 --> 00:05:11.314
और संज्ञी पंचेन्द्रियपना मिला, मनवाला
प्राणी हुआ, मन मिल गया (उसको)।

00:05:11.338 --> 00:05:19.309
तो मन के अंदर अपने प्रयोजनभूत तत्त्व के
अंदर लगा देना मन को, भेदज्ञान करना।

00:05:19.333 --> 00:05:27.474
तो ये जो मन है, वो मन की
एक शक्ति अनुमान है, अनुमान।
अनुमान में निर्णय की शक्ति है।

00:05:27.498 --> 00:05:32.909
अनुभव नहीं करता है मन, मगर
निर्णय की शक्ति मन में आती है।

00:05:32.933 --> 00:05:50.598
कैसा आता है भावमन में निर्णय?
(कि) जो अनुभव आया आत्मानुभव...

00:05:50.622 --> 00:05:57.483
मन से ऐसा निर्णय हो जाता है,
अभयकुमार जी! कि
मानो शुद्धात्मा हाथ में आ गया।

00:05:57.507 --> 00:06:01.394
मुमुक्षु: इन्द्रियज्ञान में ही?
पू. लालचंदभाई: इन्द्रियज्ञान नहीं;
मानसिकज्ञान लेना।

00:06:01.418 --> 00:06:06.447
बाहरी ज्ञान की ताकत नहीं है, मन,
मन वो इन्द्रियज्ञान है, भावमन है।

00:06:06.471 --> 00:06:15.740
मगर उसके अंदर ऐसा
सविकल्प भेदज्ञान की शक्ति है;
सविकल्प भेदज्ञान भावमन में होता है।

00:06:15.764 --> 00:06:20.318
विनाशिक होने पर भी उपादेय है,
ऐसा लिखा है कलश-टीका में।

00:06:20.342 --> 00:06:27.447
है तो विनाशिक, तो भी प्राथमिक भूमिका
में उसको मन द्वारा, भावमन द्वारा,

00:06:27.471 --> 00:06:33.527
स्व-पर का विभाग स्पष्टरूप से भासता है
कि ये ज्ञायक ही हूँ, मैं कर्ता नहीं हूँ;

00:06:33.551 --> 00:06:35.576
पर का ज्ञाता नहीं हूँ,
ज्ञायक का ज्ञाता हूँ।

00:06:35.600 --> 00:06:44.056
ऐसा भावमन में त्रिकाली द्रव्य का
निर्णय आ जाता है तो बाद में,
थोड़े काल में अनुभूति हो जाती है।

00:06:44.080 --> 00:06:48.136
किसी को तो अन्तर्मुहूर्त में होती है,
किसी को दो-चार महीने लगते भी हैं।

00:06:48.160 --> 00:06:55.994
ऐसा निर्णय-अपूर्व निर्णय जो (कि)
पंचाध्यायीकर्ता ने 'उसको
सम्यग्दर्शन हो गया' ऐसा कह दिया,

00:06:56.018 --> 00:06:58.478
नैगमनय लगा दिया,
है नहीं (अभी सम्यग्दर्शन)।

00:06:58.502 --> 00:07:02.709
तो ऐसा मनवाला प्राणी है न, (उसके
पास) भेदज्ञान की शक्ति (है)।

00:07:02.733 --> 00:07:09.425
परंतु भेदज्ञान ही करना चाहिए,
मन का (सद)उपयोग भेदज्ञान है।

00:07:09.449 --> 00:07:13.732
तो ऐसा निर्णय मानसिकज्ञान
में आ जाता है। बाद में अतिक्रांत
होकर अनुभव (होता है)।

00:07:13.756 --> 00:07:16.616
मुमुक्षु: (तो) इन्द्रियज्ञान
और मानसिकज्ञान दोनों एक ही हैं?

00:07:16.640 --> 00:07:21.025
पू. लालचंदभाई: नहीं! पाँच इन्द्रिय हैं न,
उन पाँच इन्द्रियों का विषय आत्मा नहीं है।
मुमुक्षु: बराबर!

00:07:21.049 --> 00:07:25.358
पू. लालचंदभाई: मन का विषय रूपी
और अरूपी दोनों ही हैं, तत्त्वार्थसूत्र
(अध्याय १, सूत्र २४) में लिखा (है)।

00:07:25.382 --> 00:07:31.936
पाँच इन्द्रिय का विषय तो अकेला रूपी है।
मन का विषय रूपी और अरूपी दो हैं।

00:07:31.960 --> 00:07:35.145
मुमुक्षु: मन और भाव - ये दोनों
एक ही चीज हैं कि अलग-अलग हैं?

00:07:35.169 --> 00:07:40.718
पू. लालचंदभाई: नहीं! भावमन वो
क्षयोपशम है, ज्ञान की पर्याय के
क्षयोपशम का नाम भावमन है।

00:07:40.742 --> 00:07:44.918
और इधर (छाती में) जो आठ पँखुड़ी
का खुला हुआ (जो) है वो द्रव्यमन है।

00:07:44.942 --> 00:07:48.594
जैसे ये (कान) द्रव्येन्द्रिय है न, ऐसी
अंदर (छाती में एक) द्रव्येन्द्रिय है।

00:07:48.618 --> 00:07:54.292
द्रव्येन्द्रिय के माध्यम से,
उसके आश्रय से वो विचार चलता है
अंदर में, इधर (छाती में)।

00:07:54.316 --> 00:08:02.340
operation (ऑपरेशन) करे तो दिखाई
नहीं देता (है) इतना सूक्ष्म रजकण है,
मनोवर्गणा से बना हुआ है, द्रव्यमन।

00:08:02.364 --> 00:08:07.478
मुमुक्षु: डॉक्टर साहब हार्ट
बदल देते हैं तो वो मन नहीं है?

00:08:07.502 --> 00:08:16.749
पू. लालचंदभाई: मन, द्रव्यमन को
(वो) जान नहीं सकता है। द्रव्यमन
को वो जान नहीं सकता है।

00:08:16.773 --> 00:08:23.145
मुमुक्षु: ऐसा कहा जाता है कि
आत्मा में अनंतगुण हैं, पर हमें तो
उसकी कोई झलक दिखाई नहीं देती है।

00:08:23.169 --> 00:08:26.385
तो आप कोई उपाय बताईये कि
जिससे झलक दिखाई दे?

00:08:26.409 --> 00:08:31.634
पू. लालचंदभाई: पर की महिमा छूटे
और अपनी महिमा आवे तो-तो झलक दिखाई देवे।

00:08:31.658 --> 00:08:42.469
या तो सत्ता की महिमा या फिर
लक्ष्मी की महिमा। सेठी जी! पी.सी.सेठी
क्या नाम? हाँ! पूनमभाई सेठी हाँ!

00:08:42.493 --> 00:08:52.127
इसकी (लक्ष्मी की) महिमा आवे तो
आत्मा की महिमा (नहीं आवे)। इस
काल में तो पैसे का लोभ बहुत, आहाहा!

00:08:52.151 --> 00:08:59.327
बढ़ गया है, बहुत बढ़ गया,
अगन लगे, अगन! आहाहा!
एक ईर्ष्या की अगन भी लग गई है।

00:08:59.351 --> 00:09:04.367
ऐसा देवलाली में मैंने
शास्त्र का आधार करके बोला था

00:09:04.391 --> 00:09:13.069
कि मुमुक्षु-मुमुक्षु (के)
बीच में ईर्ष्या बहुत बढ़ती है
पंचमकाल में, ऐसा बताया था।

00:09:13.093 --> 00:09:17.572
मत्सर्य,
मत्सर्य शब्द आया है, ईर्ष्या।

00:09:17.596 --> 00:09:22.936
गुणभद्र आचार्य के (आत्मानुषासन गाथा २१५),
(परमागम चिंतामणि) पुस्तक है, २०००
(बोल कि) पुस्तक निकली हैं न? हाँ!

00:09:22.960 --> 00:09:27.003
परमागम चिंतामणि (बोल १७९), उसमें आया।

00:09:27.027 --> 00:09:36.158
उसमें मैंने बताया था (कि) मुमुक्षु
-मुमुक्षु के बीच में एक दूसरे को काटते
हैं। आहाहा! क्या काल आ गया!

00:09:36.182 --> 00:09:38.674
मुमुक्षु: तो ये बात आचार्य
को पहले से (ही) मालूम थी सब?

00:09:38.698 --> 00:09:42.296
पू. लालचंदभाई: पहले से ही मालूम थी,
उनके ज्ञान में सब आ गया था।

00:09:42.320 --> 00:09:44.776
मुमुक्षु: मतलब जो कुछ हो रहा है
सब क्रमबद्ध में ही हो रहा है?

00:09:44.800 --> 00:09:49.434
पू. लालचंदभाई: क्रमबद्ध हुआ
मगर क्रमबद्ध का ज्ञान क्या नहीं
होता है? ज्ञान तो होता है न।

00:09:49.458 --> 00:09:57.265
तो ज्ञान होता है तो क्या
अक्रम होता है? क्रमबद्ध जो
होनेवाला है उसका ज्ञान हो जाता है।

00:09:57.289 --> 00:10:02.105
पर्यायें सब क्रमबद्ध ही हैं। भैया,
क्रमबद्ध का अर्थ आत्मा अकर्ता है!

00:10:02.129 --> 00:10:07.496
क्रमबद्ध का अर्थ, प्रयोजन क्या है?
कि पर्याय होने योग्य होती है,

00:10:07.520 --> 00:10:14.398
मैं करनेवाला नहीं हूँ; तो दृष्टि द्रव्य पर
आ जाती है, ज्ञाता बन जाता है साक्षात्।

00:10:14.422 --> 00:10:18.972
भैया, क्रमबद्ध का फल वीतरागता है।

00:10:18.996 --> 00:10:23.034
मुमुक्षु: क्रमबद्ध के संबंध में
एक प्रश्न है कि सिद्ध भगवान तीनलोक,

00:10:23.058 --> 00:10:28.136
तीनकाल की प्रत्येक पर्याय को
युगपद् जानते हैं।
पू. लालचंदभाई: हाँ जानते हैं।

00:10:28.160 --> 00:10:32.096
मुमुक्षु: तो उनके क्रमबद्धपना कैसे
हुआ? पर्याय तो क्रमबद्ध होती है,

00:10:32.120 --> 00:10:35.567
वो तो एक साथ जान लेते हैं, तो
उनको क्रमबद्ध कैसे लागू पड़ेगा?

00:10:35.591 --> 00:10:40.096
पू. लालचंदभाई: जानना अलग है
और जहाँ क्रमबद्ध पर्याय होती है
वो तो अलग है।

00:10:40.120 --> 00:10:45.923
पर्याय तो क्रमबद्ध ही होती है।
जैसा होने योग्य होता है ऐसा
ज्ञान में पहले से आ जाता है।

00:10:45.947 --> 00:10:51.407
तो ज्ञान में आ जाता है, तो क्या क्रम
टूट जाता है? क्रम टूटनेवाला नहीं है।

00:10:51.431 --> 00:10:54.834
क्रमबद्ध ही पर्याय है,
उसमें फर्क नहीं है। देखो!

00:10:54.858 --> 00:11:00.118
डॉक्टर (हुकुमचन्द जी भारिल्ल) साहब
ने लगाया क्रमबद्ध का पुस्तक,
बराबर है। आहाहा!

00:11:00.142 --> 00:11:04.634
गुरुदेव ने बहुत प्रशंसा की है,
डॉक्टर साहब की। आहाहा!

00:11:04.658 --> 00:11:16.256
(गुरुदेव ने) ऐसा कहा था कि उसका
उघाड़ (क्षयोपशम) बहुत है और वहाँ तक भी
कहा था कि वो तत्त्व प्रचार करेगा। आहाहा!

00:11:16.280 --> 00:11:30.296
तो डॉक्टर साहब ने भी प्रतिज्ञा
ली थी उनके सामने कि जिंदगी
भर मैं तत्त्व प्रचार करूँगा। आहाहा!

00:11:30.320 --> 00:11:33.994
मुमुक्षु: प्रश्न तो ये है कि सिद्ध भगवान
की पर्याय भी क्रमबद्ध होती है क्या?

00:11:34.018 --> 00:11:40.109
पू. लालचंदभाई: हाँ! सभी जीवों की।
जड़ और चेतन सबकी पर्याय क्रमबद्ध होती है।

00:11:40.133 --> 00:11:49.767
इसका अर्थ क्या है कि द्रव्य पर्याय का
करनेवाला नहीं है। इसमें से वो निकालना।

00:11:49.791 --> 00:11:55.580
स्वच्छंद की बात नहीं है,
स्वभाव की बात है अभी।

00:11:55.604 --> 00:11:59.434
मुमुक्षु: बहुत सुंदर! एक भाई पूछते
हैं कि हम पहली बार शिविर में आये हैं।

00:11:59.458 --> 00:12:05.812
हमें सब कुछ नया-नया लगता है।
हमें कहाँ से शुरुआत करनी चाहिए?

00:12:05.836 --> 00:12:10.909
पू. लालचंदभाई: प्रथम आत्मा को
जानना वहाँ से शुरूआत होती है।

00:12:10.933 --> 00:12:14.118
वस्तु है कि नहीं? आत्मा है कि नहीं?
मुमुक्षु: है।

00:12:14.142 --> 00:12:18.140
पू. लालचंदभाई: जैसे ये (पर-पदार्थ) है
तो आत्मा भी वस्तु है कि नहीं?
मुमुक्षु: है।

00:12:18.164 --> 00:12:23.483
पू. लालचंदभाई: तो वस्तु है, तो वस्तु को
प्रसिद्ध करनेवाला उपयोग भी है कि नहीं?
मुमुक्षु: है।

00:12:23.507 --> 00:12:28.065
पू. लालचंदभाई: उपयोग प्रगट होता है, तो
उस उपयोग में जाननहार जानने में आता है,

00:12:28.089 --> 00:12:35.483
ऐसी वहाँ से शुरुआत होती है।
प्रथम आत्मा को जानो। क्या कहा?

00:12:35.507 --> 00:12:40.638
मुमुक्षु: प्रथम आत्मा को जानो।
पू. लालचंदभाई: ऐसा कहा है
कुंदकुंदाचार्य भगवान ने।

00:12:40.662 --> 00:12:45.340
मुमुक्षु: उनका तो ये आशय है कि हम
स्वाध्याय करें तो कौनसी पुस्तक पहले पढ़ें?

00:12:45.364 --> 00:12:52.598
पू. लालचंदभाई: वो तो ठीक है।
जिसमें शुद्धात्मा का स्वरूप
और भेदज्ञान की प्रधानता हो,

00:12:52.622 --> 00:12:57.763
जिसमें अकर्ता-ज्ञाता की प्रधानता हो
ऐसा शास्त्र पढ़ना चाहिए।

00:12:57.787 --> 00:13:04.674
जिसमें कर्ता है, और यह (संबंध) है,
निमित्त-नैमित्तिक संबंध है -
ऐसा, ऐसी शुरुआत नहीं करना;

00:13:04.698 --> 00:13:08.732
नहीं तो कर्ता का शल्य हो जायेगा।
आहाहा!

00:13:08.756 --> 00:13:14.438
पहले द्रव्यानुयोग का अभ्यास करना - ऐसा
लिखा है टोडरमल जी साहब ने। बोलो!

00:13:14.462 --> 00:13:18.256
पहले शुरुआत में
द्रव्यानुयोग का अभ्यास करना।

00:13:18.280 --> 00:13:23.847
चरणानुयोग और प्रथमानुयोग और
करणानुयोग का (अभ्यास) बाद में करना।

00:13:23.871 --> 00:13:28.247
निर्विकल्पध्यान में नहीं रहते हैं ज्ञानी
तो सभी शास्त्रों का अध्ययन करते हैं।

00:13:28.271 --> 00:13:38.469
चारों अनुयोग हैं, जिनवाणी है,
मगर अध्ययन में जिंदगी चली जाये तो?
ऐसा नहीं करना!

00:13:38.493 --> 00:13:44.238
भेदज्ञान करके
अपने उपयोग में आत्मा को ढूँढ लेना।
मुमुक्षु: बराबर।

00:13:44.262 --> 00:13:47.674
पू. लालचंदभाई: कहाँ तक है?
टाइम हो जाए तो थोड़ा बन्द कर दो।

00:13:47.698 --> 00:13:50.496
मुमुक्षु: पाँच मिनिट हैं।
पू. लालचंदभाई: पाँच मिनिट हैं। ठीक!

00:13:50.520 --> 00:13:56.772
मुमुक्षु: एक प्रश्न आया है (कि)
मुमुक्षु का दैनिक जीवन और
आचरण कैसा होना चाहिए?

00:13:56.796 --> 00:14:04.203
पू. लालचंदभाई: भेदज्ञान का
निरंतर अभ्यास करता है वो
आचरण है, उसमें मिथ्यात्व गलता है।

00:14:04.227 --> 00:14:11.025
मिथ्यात्व गलता है (तो) उसके साथ-साथ में
पाप का परिणाम भी मर्यादा में आ जाता है।

00:14:11.049 --> 00:14:18.003
निर्गल (बेहद पाप) प्रवृत्ति नहीं होती है,
स्वच्छंदी प्रवृत्ति नहीं होती है उसकी।

00:14:18.027 --> 00:14:22.705
मुमुक्षु: तो कुछ खाने-पीने
की बात में कुछ फर्क पड़ता है? क्योंकि
वो आशय लगता है प्रश्नकार का।

00:14:22.729 --> 00:14:25.678
पू. लालचंदभाई: रोटी, दाल,
सब्जी, चावल खाना बस।

00:14:25.702 --> 00:14:32.127
दारू नहीं, माँस नहीं, अंडा नहीं,
अभक्ष्य नहीं खाना। बस!

00:14:32.151 --> 00:14:40.060
ये कंद नहीं खाना, जिसमें अनंत जीव हैं।
बस! सादा भोजन ले लेना।
रोटी, सब्जी, दाल, भात।

00:14:40.084 --> 00:14:46.318
मुमुक्षु: कब खाना?
पू. लालचंदभाई: भूख लगे तब खाना।
मुमुक्षु: दिन में? रात में?

00:14:46.342 --> 00:14:58.252
पू. लालचंदभाई: नहीं! दिन में,
रात में नहीं। रात्रि भोजन नहीं।
आहाहा! दिन की बात है।

00:14:58.276 --> 00:15:06.172
मुमुक्षु: एक प्रश्न है,
राग-द्वेष के परिणामों का कर्ता कौन है?
क्या इससे आत्मा प्रभावित होता है?

00:15:06.196 --> 00:15:13.740
पू. लालचंदभाई: आत्मा बिल्कुल
प्रभावित नहीं होता है; और राग-द्वेष
का कर्ता, परिणाम का कर्ता परिणाम है।

00:15:13.764 --> 00:15:21.816
पर से (यानि) कर्मकृत नहीं है
और जीवकृत भी नहीं है,
पर्यायकृत है राग। आहाहा!

00:15:21.840 --> 00:15:30.838
आता है, कर्म की सापेक्षता से
ये पुद्गल का परिणाम है, पुद्गल
के साथ व्याप्य-व्यापक संबंध है,

00:15:30.862 --> 00:15:34.940
आत्मा के साथ व्याप्य-व्यापक संबंध
नहीं है ऐसा आता है।

00:15:34.964 --> 00:15:39.976
और निमित्त सापेक्ष के कथन से
पुद्गल का परिणाम कहा जाता है।

00:15:40.000 --> 00:15:49.887
सचमुच तो परिणाम का कर्ता परिणाम ही है,
आत्मा उसका कर्ता नहीं है;
आत्मा कर्ता हो तो कर देवे मोक्ष अभी।

00:15:49.911 --> 00:15:55.669
मैं एक दृष्टांत देता था कभी कभी।
इधर नहीं दिया, कि सीमंधर भगवान हैं न?

00:15:55.693 --> 00:16:01.376
तो इधर (भरतक्षेत्र में) १३वें जब
तीर्थंकर परमात्मा होंगे न, तब
उनका (सीमंधर भगवान का) मोक्ष होगा।

00:16:01.400 --> 00:16:05.696
तो इधर से कर्ताबुद्धिवालों ने
समुच्चय मिलकर विनती की

00:16:05.720 --> 00:16:13.127
कि 'भगवान! एक हमारा ऐसा
काम हम आपको सौंपते हैं कि
आप (आपका) मोक्ष कर दो।

00:16:13.151 --> 00:16:19.394
क्योंकि आपकी वाणी में आया है कि
वो १३वें गुणस्थान(वाला) भी संसारी
है, (तो) वो हमको सुहाता नहीं है।

00:16:19.418 --> 00:16:24.696
और (आपको) अनंतवीर्य प्रगट हो गया है;
और (यह) अच्छा काम है (कि)
मोक्ष की पर्याय कर दो'।

00:16:24.720 --> 00:16:29.634
तो वहाँ से ये जवाब आया कि
'तेरा प्रश्न मूर्खता से भरा हुआ है!

00:16:29.658 --> 00:16:36.109
पर्याय का कर्ता आत्मा नहीं है;
वो जाननेवाला है, करनेवाला नहीं है।

00:16:36.133 --> 00:16:46.016
वो क्रमबद्ध पर्याय (अपने)
स्वकाल में पर्याय प्रगट होगी;
आगे-पीछे होती नहीं है' - ऐसा है।

00:16:46.040 --> 00:16:49.500
मुमुक्षु: बनारसीदास जी ने लिखा है
कर्ता परिणाम ही धर्म।
पू. लालचंदभाई: हाँ।

00:16:49.524 --> 00:16:52.834
मुमुक्षु: वो तो द्रव्य को कर्ता कहते
हैं, पर्याय को कर्म कहते हैं।
पू. लालचंदभाई: बराबर है!

00:16:52.858 --> 00:16:55.878
मुमुक्षु: आप कहते हैं
परिणाम का कर्ता परिणाम है?
पू. लालचंदभाई: हाँ! बराबर है!

00:16:55.902 --> 00:17:02.167
दोनों ही बात बराबर हैं।
बनारसीदास जी ने कहा है कि
द्रव्य कर्ता है और परिणाम कर्म है,

00:17:02.191 --> 00:17:07.856
वो बात भी सही है कि परिणमे
सो कर्ता और परिणाम सो कर्म,

00:17:07.880 --> 00:17:14.709
ऐसे कर्ता-कर्म की व्याख्या एक द्रव्य
के बीच में है, वो व्यवहारनय का कथन है;

00:17:14.733 --> 00:17:22.758
और परिणाम का कर्ता परिणाम है और
द्रव्य अकर्ता है वो निश्चयनय का कथन है।

00:17:22.782 --> 00:17:25.265
बनारसीदास जी ने (जो)
लिखा बराबर लिखा है।

00:17:25.289 --> 00:17:33.363
कौनसे नय का कथन है और यहाँ क्या
प्रयोजन सिद्ध करना है - जिनागम का
मर्म समझने के लिए (यह) खास (बात है)।

00:17:33.387 --> 00:17:38.656
कि पर से परिणाम होता नहीं, स्वयं
परिणमता है, अपने-आप परिणमता है;

00:17:38.680 --> 00:17:46.709
तो परिणमे सो कर्ता और परिणाम
सो कर्म, कर्ता-कर्म एक द्रव्य में
होता है वो व्यवहारनय का कथन है।

00:17:46.733 --> 00:17:49.540
डॉक्टर हुकुमचंद जी भारिल्ल:
त्रिकाली उपादान कि अपेक्षा लगाओ
और स्वयं उपादान कि अपेक्षा।

00:17:49.564 --> 00:17:53.656
पू. लालचंदभाई: हाँ! परिणमता है
सो कर्ता और परिणाम सो कर्म।

00:17:53.680 --> 00:18:00.523
व्याप्य-व्यापक लिखा है, बहुत लिखा है,
मगर सचमुच परिणाम का कर्ता परिणाम है;

00:18:00.547 --> 00:18:05.136
द्रव्य अकारक है, कर्ता नहीं है -
उसमें साध्य की सिद्धि होती है।

00:18:05.160 --> 00:18:09.834
साध्य की सिद्धि होने के बाद परिणमता
है ज्ञान-दर्शन-चारित्ररूप से आत्मा,

00:18:09.858 --> 00:18:16.483
साधक, तो सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र
का परिणाम का कर्ता भी आत्मा है।

00:18:16.507 --> 00:18:21.096
परिणमता है न, मोक्षमार्गरूप से,
तो मोक्षमार्ग का कर्ता कहा जाता है

00:18:21.120 --> 00:18:26.723
और मोक्षमार्ग अपना कर्म - कार्य है, ऐसा
कहा जाता है; वो व्यवहारनय का कथन है।

00:18:26.747 --> 00:18:34.265
मुमुक्षु: साहिब, परिणाम का कर्ता परिणाम
है तो इसका मतलब हम तो करते हैं न!
तो फिर हम सम्यग्दर्शन तो कर नहीं सकते?

00:18:34.289 --> 00:18:38.865
पू. लालचंदभाई: सम्यग्दर्शन का
जो विषय है उसको आप जान सकते
हैं कि नहीं जान सकते हैं?

00:18:38.889 --> 00:18:41.749
मुमुक्षु: तो जानना भी तो परिणाम हुआ?
पू. लालचंदभाई: परिणाम जानता है न?

00:18:41.773 --> 00:18:46.589
परिणाम अपने को जाने उस परिणाम
का नाम ही सम्यग्दर्शन है।

00:18:46.613 --> 00:18:55.180
जो परिणाम अपनी आत्मा को
जाने-माने उसका नाम ही
सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन है, भैया;

00:18:55.204 --> 00:19:02.838
परिणाम पर को जानने में रुक जावे,
पर को मानने में रुक जावे वो
तो मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान है।

00:19:02.862 --> 00:19:06.598
मुमुक्षु: आत्मा को जाननेवाला
परिणाम वो अपन कर सकते हैं क्या?

00:19:06.622 --> 00:19:12.820
पू. लालचंदभाई: कर सकते नहीं;
होता है, ऐसा जानता है।

00:19:12.844 --> 00:19:17.136
होता है (कि) अभिमुख हो गया
परिणाम तो कहा जाता है

00:19:17.160 --> 00:19:21.407
कि आत्मा ने पुरुषार्थ किया, सम्यग्दर्शन
प्रगट किया (ऐसा) कह सकते हैं।

00:19:21.431 --> 00:19:24.100
मुमुक्षु: वो परिणाम अपने-आप होगा
कि हमें करना पड़ेगा?

00:19:24.124 --> 00:19:29.234
पू. लालचंदभाई: नहीं! करना नहीं पड़ेगा।
त्रिकाली द्रव्य को जानो उसका
नाम सम्यग्दर्शन-ज्ञान है।

00:19:29.258 --> 00:19:33.487
दृष्टि आप द्रव्य पर लगाओ तो
अपने-आप परिणाम शुद्ध हो जायेगा।

00:19:33.511 --> 00:19:36.572
शुद्ध को जो जानता है,
वो शुद्ध हो जाता है।

00:19:36.596 --> 00:19:41.665
<b>जो शुद्ध जाने आत्मको, वह शुद्ध आत्म ही प्राप्त हो ।</b>
अनशुद्ध जाने आत्मको<b>, </b>अनशुद्ध आत्म हि प्राप्त हो (समयसार गाथा १८६)

00:19:41.689 --> 00:19:52.838
भाईसाहब (डाक्टर भारिलजी) ने एक
बार राजकोट के अंदर शिविर में ऐसा चलाया,
कुंदकुंद शतक की २-३ गाथा। समझे!

00:19:52.862 --> 00:19:56.416
तो अष्टपाहुड़ में से एक गाथा चलाई।

00:19:56.440 --> 00:20:01.643
तो आत्मज्ञान हुआ,
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का
परिणाम (अर्थात्) साधक हो गया,

00:20:01.667 --> 00:20:13.154
तो भी आत्मा ही उपादेय है,
आत्मा ही शरण है, आत्मा के
परिणाम आत्मा को शरणभूत नहीं हैं।

00:20:13.178 --> 00:20:16.220
मुमुक्षु: बराबर! अभी आपके पधारने
के पहले भी यही गाथा यहाँ चलती थी।

00:20:16.244 --> 00:20:19.292
पू. लालचंदभाई: चलती थी।
बहुत अच्छी गाथा (है)! हम तो खुश हो गए।

00:20:19.316 --> 00:20:28.580
वहाँ से जरा हमको खुशी भी हो गई।
ठीक है! अभी सत् चलेगा, ऐसा भी
भाव हो गया, ऐसा भी भाव आ गया।

00:20:28.604 --> 00:20:35.998
लगता है तो बोलता हूँ।
कोई पक्षपात नहीं है। पंडित जी
मेरे कोई सगेवाले (संबंधी) नहीं हैं।

00:20:36.022 --> 00:20:40.923
मुमुक्षु: आपका आशीर्वाद रहेगा साहब
तो बहुत लंबा चलेगा।
पू. लालचंदभाई: हाँ! चलनेवाला है।

00:20:40.947 --> 00:20:50.865
ये सत्य तो पंचम काल के अंत तक
ये गुरुदेव की वाणी निमित्त होगी
सम्यग्दर्शन में - ऐसा है।

00:20:50.889 --> 00:20:54.627
मुमुक्षु: बोलो महावीर भगवान की जय।।

00:21:31.404 --> 00:21:39.149
मुमुक्षु: आदरणीय भाईश्री!
आज प्रातः के प्रवचन में आया था
ज्ञेय से ज्ञान नहीं होता है।

00:21:39.173 --> 00:21:44.589
और यदि ज्ञेय से ज्ञान हो तो
ज्ञान पराधीन हो जाये।
पू. लालचंदभाई: (हाँ)।

00:21:44.613 --> 00:21:52.242
मुमुक्षु: इसका तात्पर्य तो यह है कि
हम जिनागम का आश्रय नहीं करें,
नहीं तो हमारा ज्ञान पराधीन हो जायेगा।

00:21:52.266 --> 00:21:57.336
तो हम क्या करें?
पू. लालचंदभाई: क्या?
फिर से, अकेली अंतिम लाइन।

00:21:57.360 --> 00:22:01.900
मुमुक्षु: ज्ञेय से ज्ञान होता है
तो ज्ञान पराधीन हो जाता है।
पू. लालचंदभाई: हाँ।

00:22:01.924 --> 00:22:07.984
मुमुक्षु: तो हम शास्त्रों का अभ्यास
करें, आगम का आश्रय लें कि नहीं लें?

00:22:08.008 --> 00:22:21.167
पू. लालचंदभाई: देखो! श्रद्धा में,
अभिप्राय में तो ऐसा रखना चाहिए कि
अपने आश्रय से ही ज्ञान होता है, तीनोंकाल।

00:22:21.191 --> 00:22:31.220
और जहाँ तक उपयोग अंदर में न आवे,
तहाँ तक जिनागम का अवलंबन रहता है।

00:22:31.244 --> 00:22:40.376
ये जिनागम में, अवलंबन में ही आया है
(अर्थात्) जिनागम में (ही) लिखा है कि मेरा
अवलंबन छोड़ दे और तेरा अवलंबन ले।

00:22:40.400 --> 00:22:49.016
तो जिनागम का अभ्यास करना (मगर)
श्रद्धा में तो ऐसा रखना कि आत्मा
के लक्ष से ही ज्ञान उत्पन्न होगा;

00:22:49.040 --> 00:22:54.936
मगर आत्मा के, वहाँ स्वभाव तक (तो)
मैं पहुँचता नहीं हूँ, मेरी पहुँच नहीं है,

00:22:54.960 --> 00:23:01.718
इतना मेरा पुरुषार्थ लगता नहीं है
तो जिनागम का अवलंबन लेता हूँ।

00:23:01.742 --> 00:23:08.167
मुमुक्षु: आपने फरमाया कि
श्रद्धा में तो ऐसा रखना कि
जिनागम का अभ्यास नहीं करना।

00:23:08.191 --> 00:23:14.927
पू. लालचंदभाई: नहीं करना (ऐसा)
नहीं! पर के लक्ष से ज्ञान होगा ही नहीं!
मुमुक्षु: ऐसा अभिप्राय रखना।

00:23:14.951 --> 00:23:21.571
पू. लालचंदभाई: हाँ! रखना।
और अंदर में उपयोग (में) न लगे
तो जिनागम का अवलंबन लेना।

00:23:21.595 --> 00:23:24.144
मुमुक्षु: इसमें छल नहीं है?
ये तो अलग-अलग बात है?
पू. लालचंदभाई: छल नहीं है,

00:23:24.168 --> 00:23:27.922
छल नहीं है।
उपयोग बाहर भटकता था न, बाहर!

00:23:27.946 --> 00:23:32.384
इस वजह से जिनागम का
स्वाध्याय करना, चिंतवन करना।

00:23:32.408 --> 00:23:41.362
मुमुक्षु: हाँ जी, बराबर। 
एक प्रश्न है
स्व-पर का प्रतिभास पर्याय में ही होता है

00:23:41.386 --> 00:23:48.536
तो कौनसी पर्याय इस स्व-पर (के)
प्रतिभासवाली पर्याय को विषय
करती है अनुभव के समय में?

00:23:48.560 --> 00:23:52.531
दो पर्यायें होती हैं? एक तो वो
जिसमें स्व-पर का प्रतिभास होता है

00:23:52.555 --> 00:23:58.718
और दूसरी पर्याय वो
जो स्व-पर के प्रतिभासवाली
पर्याय को जानती है। ऐसा है क्या?

00:23:58.742 --> 00:24:05.233
पू. लालचंदभाई: स्व-पर का
प्रतिभास अज्ञानी जीव को भी
अपने ज्ञान उपयोग में होता है।

00:24:05.257 --> 00:24:13.487
जब अनुभव का काल आता है तब
वह 'मैं पर को जानता नहीं हूँ, स्व
को ही जाननहार को (ही) जानता हूँ’

00:24:13.511 --> 00:24:20.091
ऐसा भेदज्ञान करने से उपयोग पर
से हटकर स्वसन्मुख हो जाता है।

00:24:20.115 --> 00:24:26.509
तो स्वप्रकाशक ऐसा लक्षण है ज्ञान
का, उसमें अनुभूति होती है।

00:24:26.533 --> 00:24:30.282
तो उसमें स्वपरप्रकाशक का ज्ञान
आ जाता है।

00:24:30.306 --> 00:24:39.153
स्वप्रकाशक पूर्वक
स्वपरप्रकाशक का ज्ञान अंदर का भी होता
है और बाहर का भी हो जाता है।

00:24:39.177 --> 00:24:41.353
मुमुक्षु: ये दोनों पर्यायें एक ही हैं
कि अलग-अलग?

00:24:41.377 --> 00:24:50.469
पू. लालचंदभाई: एक ही पर्याय में
स्वपरप्रकाशक ज्ञान में प्रतिभास होता
है मगर भेदज्ञान करना चाहिए।

00:24:50.493 --> 00:24:55.744
स्वपरप्रकाशक लक्षण प्रमाण,
व्यवहारनय का विषय है।

00:24:55.768 --> 00:25:05.891
अभी स्व और पर दो के प्रतिभास में
उपयोग अपनी आत्मा में लगाना चाहिए,
पर से हटकर, तो अनुभव होता है।

00:25:05.915 --> 00:25:15.856
तो अनुभव होने के समय अतीन्द्रियज्ञान
प्रगट होता है, उसमें स्व और आनंद
(अर्थात्) पर, वो जानने में आ जाता है।

00:25:15.880 --> 00:25:25.029
और बाहर में आत्मा भी जानने
में आता है और देव-गुरु-शास्त्र
भी जानने में आ जाता है।

00:25:25.053 --> 00:25:30.260
मुमुक्षु: जयसेनाचार्य ने अनुभव को
<b>शुद्ध आत्माभिमुख परिणाम</b>
(समयसार गाथा ३२० कि टीका) कहा है।

00:25:30.284 --> 00:25:32.584
पू. लालचंदभाई: बराबर।
मुमुक्षु: इसका क्या मतलब है?

00:25:32.608 --> 00:25:37.856
पू. लालचंदभाई: <b>शुद्धोपयोग</b>
कहो कि <b>आत्माभिमुख परिणाम</b>
कहो, एक ही बात है।

00:25:37.880 --> 00:25:46.700
शुद्धात्मा का अनुभव कहो, स्वानुभव कहो
कि शुद्धात्म अभिमुख परिणाम कहो,
अनुभूति के कई नाम चलते हैं।

00:25:46.724 --> 00:25:52.873
<b>शुद्ध आत्माभिमुख परिणाम</b>
यानि शुद्धात्मा के अभिमुख
जो उपयोग - परिणाम हुआ,

00:25:52.897 --> 00:25:59.842
उसका नाम स्वानुभव है; पर का लक्ष
छूट गया (और) आत्मा का लक्ष हो गया।

00:25:59.866 --> 00:26:05.816
मुमुक्षु: जब उपयोग बाहर जाता है
तब भी ज्ञानी को आत्मा का
अवलंबन होता है कि नहीं होता है?

00:26:05.840 --> 00:26:07.776
पू. लालचंदभाई: जरूर,
Definitely (अवश्य) हो रहा है।

00:26:07.800 --> 00:26:10.198
मुमुक्षु: तो उसको शुद्धात्माभिमुख
परिणाम कहना कि नहीं कहना?

00:26:10.222 --> 00:26:14.931
पू. लालचंदभाई: हाँ! कहना है
परिणतिरूप, उपयोगरूप नहीं है।

00:26:14.955 --> 00:26:19.336
मुमुक्षु: तो शुद्धात्माभिमुख परिणाम
दो प्रकार का हुआ,
एक उपयोग(रूप और) एक परिणतिरूप?

00:26:19.360 --> 00:26:26.572
पू. लालचंदभाई: दो प्रकार का है,
साधक है न। केवली होगा
तो एक प्रकार का होगा।

00:26:26.596 --> 00:26:33.972
श्रुतज्ञान है, साधक है तो
परिणतिरूप व्यवस्था निरंतर है (और)
उपयोगरूप कभी-कभी हो जाता है।

00:26:33.996 --> 00:26:40.669
मुमुक्षु: तो परिणतिरूप जो है
वह किस गुण की पर्याय है?
पू. लालचंदभाई: ज्ञान गुण की पर्याय है।

00:26:40.693 --> 00:26:42.967
मुमुक्षु: परिणति का मतलब
क्या लब्धरूप से है?

00:26:42.991 --> 00:26:46.416
पू. लालचंदभाई: नहीं! लब्ध नहीं।
उत्पाद-व्ययरूप है।

00:26:46.440 --> 00:26:48.492
मुमुक्षु: लब्धरूप में और
उत्पाद-व्यय में क्या अंतर है?

00:26:48.516 --> 00:26:53.692
पू. लालचंदभाई: लब्ध में व्यापार नहीं
है इसलिए लब्ध। व्यापार नहीं है।

00:26:53.716 --> 00:27:01.012
जानने की क्रिया होती है मगर उपयोग
अभिमुख नहीं हो तो इसका नाम
लब्ध कहो कि परिणति कहो।

00:27:01.036 --> 00:27:08.678
निरंतर परिणति रहती है, अछिन्न धारावाही।
उपयोग अंदर में कभी-कभी आता है।

00:27:08.702 --> 00:27:19.727
मुमुक्षु: दूसरा प्रश्न है, पर्याय
त्रिकाली आत्मा से किस अपेक्षा
तन्मय होती है अनुभव के काल में?

00:27:19.751 --> 00:27:28.176
पू. लालचंदभाई: तन्मय होती है;
एक अपेक्षा से निश्चय से होती है,
एक अपेक्षा से व्यवहार से।

00:27:28.200 --> 00:27:37.012
तन्मय होती है इसका अर्थ ये है कि
पर्याय और द्रव्य का भेद दिखाई
देता नहीं है; एकाकार होती है।

00:27:37.036 --> 00:27:48.069
वो परिणाम आत्मा बन जाता है,
आत्मा बनने पर भी वो पर्याय ध्रुव नहीं
बनती है, पर्याय तो पर्याय रहती है।

00:27:48.093 --> 00:27:53.647
मुमुक्षु: आप फरमाते हैं कि वो पर्याय
और द्रव्य का भेद दिखाई नहीं देता है?

00:27:53.671 --> 00:27:59.740
पू. लालचंदभाई: अर्थात् भेद तो है
परंतु भेद दिखाई देता नहीं है,
इसका नाम अनुभव है।

00:27:59.764 --> 00:28:03.745
मुमुक्षु: वो तो अधूरा ज्ञान ही हुआ कि
भेद है लेकिन भेद दिख नहीं रहा है?

00:28:03.769 --> 00:28:11.132
पू. लालचंदभाई: नहीं! अधूरा नहीं।
साध्य की सिद्धि इसमें है। भेद दिखे
तो निर्विकल्पध्यान नहीं आता है।

00:28:11.156 --> 00:28:19.092
और भेद होवे ही नहीं तो अनुभूति नहीं होती
है। भेद का लक्ष नहीं है, अभेद होता है;

00:28:19.116 --> 00:28:23.865
मगर अभेद भी वो कथंचित् अभेद है,
सर्वथा अभेद नहीं (है)।

00:28:23.889 --> 00:28:29.789
जैसा गुण और गुणी सर्वथा अभेद है;
ऐसे निर्मल पर्याय आत्मा के साथ

00:28:29.813 --> 00:28:37.234
कथंचित् तादात्म्य - कथंचित् अभेद है,
कथंचित् भेदरूप भी है; ऐसा स्याद्वाद है।

00:28:37.258 --> 00:28:41.985
मुमुक्षु: अभी आपने फरमाया
कि भेद हो नहीं तो अनुभूति नहीं हो।
इसका क्या मतलब है?

00:28:42.009 --> 00:28:50.669
पू. लालचंदभाई: यानि जो पर्याय
अपने से सर्वथा अभिन्न हो जाये और
ध्रुव हो जाये तो अनुभव कैसे होवे?

00:28:50.693 --> 00:28:57.078
वो तो ध्रुव का अवलंबन लेती है पर्याय तो
आत्मा हो जाती है तो अनुभव हो जाता है।

00:28:57.102 --> 00:29:01.136
ये सर्वथा भिन्न भी नहीं (है और)
सर्वथा अभिन्न भी नहीं (है)।

00:29:01.160 --> 00:29:09.718
ऐसा आज एक प्रश्न आया था
कि पर्याय निर्मल होती है तो
आत्मा को छूती है कि नहीं छूती है?

00:29:09.742 --> 00:29:20.549
कि नहीं छूती (हुई) छू लेती है,
नहीं छूती (हुई) छू लेती है। ऐसा
छू-मंत्र है, ऐसा ये छू-मंत्र है!

00:29:20.573 --> 00:29:27.834
मुमुक्षु: यह बढ़िया मंत्र है!
नहीं छूती है का क्या मतलब है
और छूती है का क्या मतलब है?

00:29:27.858 --> 00:29:35.332
पू. लालचंदभाई: छूती है यानि
आनंदमूर्ति के साथ तन्मय होकर पर्याय
में आनंद प्रगट होता है तो छूती है।

00:29:35.356 --> 00:29:46.136
मगर नहीं छूती है इसका अर्थ क्या? कि वो
सामान्यरूप नहीं होती है, विशेष-विशेषरूप
होती है, सामान्यरूप नहीं हो जाती है।

00:29:46.160 --> 00:29:52.638
छूती हुई नहीं छूती है,
छूती हुई नहीं छूती है। छू-मंत्र है!

00:29:52.662 --> 00:29:57.416
मुमुक्षु: अनेकांत?
पू. लालचंदभाई: अनेकांत, वो स्याद्वाद,
उसका नाम ही स्याद्वाद है;

00:29:57.440 --> 00:30:02.118
कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न।

00:30:02.142 --> 00:30:07.923
मुमुक्षु: कभी तो आप सर्वथा कहने पर
बहुत जोर देते हैं और कभी कथंचित् भिन्न
और कथंचित् अभिन्न, दोनों की बात करते हैं?

00:30:07.947 --> 00:30:14.069
पू. लालचंदभाई: दोनों ही बराबर हैं।
दोनों ही बात सम्यक् हैं, ऐसा ही स्वरूप है।

00:30:14.093 --> 00:30:23.585
दृष्टि की अपेक्षा से सर्वथा भिन्न है,
ज्ञान की अपेक्षा से कथंचित् भिन्न
(और) कथंचित् अभिन्न है; समय एक है।

00:30:23.609 --> 00:30:26.003
मुमुक्षु: अनुभव के लिए जो प्रयत्न होगा

00:30:26.027 --> 00:30:29.874
उसमें तो दोनों अपेक्षाओं को
तो ख्याल में रखना पड़ेगा कि किसी
एक को ही ख्याल में रखना पड़ेगा?

00:30:29.898 --> 00:30:36.016
पू. लालचंदभाई: वो ख्याल ही छोड़ देना,
पर्याय को याद ही नहीं करना, मैं
तो सामान्य चिदानंद आत्मा हूँ। बस!

00:30:36.040 --> 00:30:40.732
मेरे में प्रमत्त-अप्रमत्त नहीं है
ऐसा लेना।

00:30:40.756 --> 00:30:46.812
अनुभव के काल में कथंचित् का
व्यवहार नहीं लगाना, सर्वथा भिन्न है

00:30:46.836 --> 00:30:50.563
इसलिए मैं पर्याय का कर्ता नहीं हूँ
अकर्ता ऐसा ज्ञायक हूँ,

00:30:50.587 --> 00:31:00.434
ऐसा जोर आने से पर्याय आत्मा अभिमुख
होती है तो अनुभव होता है, तो वो एक
ज्ञान प्रगट होता है, वो ज्ञान जानता है।

00:31:00.458 --> 00:31:07.718
श्रद्धा के साथ-साथ ज्ञान प्रगट होता है
(वो) जानता है कथंचित् भिन्न-अभिन्न
- वो ज्ञान जानता है।

00:31:07.742 --> 00:31:18.483
ऐसा है अभयकुमार जी! कि
उत्पाद-व्यय से रहित और उत्पाद-व्यय से
सहित, ऐसा एक समय में ज्ञान हो जाता है।

00:31:18.507 --> 00:31:24.816
जो ध्रुव परमात्मा है
वो उत्पाद-व्यय से रहित
और उत्पाद-व्यय से सहित

00:31:24.840 --> 00:31:30.256
(ऐसा) एक समय में ज्ञान हो जाता है;
उसका नाम स्याद्वाद है।

00:31:30.280 --> 00:31:35.998
मुमुक्षु: अभी आपने फरमाया कि
अनुभव के काल में पर्याय को
बिल्कुल भूल जाना, याद नहीं करना।

00:31:36.022 --> 00:31:37.136
पू. लालचंदभाई: यानि उसका लक्ष छोड़ देना।

00:31:37.160 --> 00:31:40.847
मुमुक्षु: तो उससे
ज्ञान मिथ्या नहीं हो जायेगा?
पू. लालचंदभाई: मिथ्या नहीं होगा,

00:31:40.871 --> 00:31:48.807
सम्यक् हो जायेगा। <b>पर्यायार्थिक चक्षु
सर्वथा बंद कर</b> दे (प्रवचनसार गाथा
११४) यानि पर्याय के भेद का लक्ष छोड़ दे।

00:31:48.831 --> 00:31:54.456
पर्याय छोड़ने की बात नहीं है, पर्याय
का लक्ष, पर्याय में अहंबुद्धि छोड़ दे।

00:31:54.480 --> 00:32:00.527
यह (अपना) द्रव्यस्वभाव में
अहंबुद्धि लगा दे तो अनुभव होगा।

00:32:00.551 --> 00:32:04.945
स्याद्वाद का जन्म
अनुभूति के काल में आता है।

00:32:04.969 --> 00:32:11.447
<b>उभयनयविरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्के</b>
(समयसार कलश ४),
ऐसा आता है न? आहाहा! ऐसा ...।

00:32:11.471 --> 00:32:17.140
मुमुक्षु: एक प्रश्न आया है कि
नयों के भेद-प्रभेद क्यों किये गये हैं?
कृपया स्पष्ट करें।

00:32:17.164 --> 00:32:22.705
पू. लालचंदभाई: समझाने के लिए, (क्यों)
कि समझाने के लिए वही एक हथियार है।

00:32:22.729 --> 00:32:28.700
प्रमाण, नय, निक्षेप से समझाया जाता है
और तो कोई उपाय है ही नहीं।

00:32:28.724 --> 00:32:33.603
समझाने के लिए नय हैं,
अनुभव के लिए नय नहीं हैं।

00:32:33.627 --> 00:32:39.438
नय से अनुभव नहीं होता है,
नय <b>अतिक्रान्त</b>
(समयसार गाथा १४२, १४४) है।

00:32:39.462 --> 00:32:44.038
मुमुक्षु: समयसार में ऐसा आता है
कि <b>कारणानुविधायीनि कार्याणी </b>
(समयसार आत्मख्याति टीका गाथा ६८)

00:32:44.062 --> 00:32:48.776
यानि कारण के अनुसार कार्य होता है,
<b>कारण जैसा ही कार्य होता है</b>।
पू. लालचंदभाई: हाँ, बराबर है।

00:32:48.800 --> 00:32:54.087
मुमुक्षु: और प्रवचनसार (गाथा ९६ भावार्थ)
में आता है पर्याय <b>अहेतुक</b> है। तो
दोनों में से कौनसी बात सही है?

00:32:54.111 --> 00:32:56.892
पू. लालचंदभाई: हाँ!
बराबर है। दोनों ही बात सही हैं।

00:32:56.916 --> 00:33:02.243
<b>कारणानुविधायी</b> जो पर्याय है
<b>कार्याणी</b>, वो भी बराबर है।

00:33:02.267 --> 00:33:10.216
उसमें कारण अनुविधायी में ऐसा लेना,
त्रिकाली द्रव्य नहीं लेना
(बल्कि) पर्याय लेना।

00:33:10.240 --> 00:33:13.980
लोहा और सोना - पुद्गल एक जाति है।

00:33:14.004 --> 00:33:21.883
लोहे में से लोहे की पर्याय होती है,
लोहे की, और सोने में सोने की
पर्याय होती है। कारण जैसा कार्य।

00:33:21.907 --> 00:33:30.834
जो ऐसा कहो त्रिकाली द्रव्य के साथ,
तो घटता नहीं है। पर्याय कारण है
और पर्याय कार्य है।

00:33:30.858 --> 00:33:41.580
सोने और लोहे में सामान्य तो पुद्गल है,
तो पुद्गल सामान्य कारण और दोनों का
कार्य पर्याय, तो-तो तकलीफ होगी।

00:33:41.604 --> 00:33:48.834
जैसा कारण वैसा कार्य आना चाहिए।
लोहे की पर्याय का कारण सुवर्ण हो और
कार्य लोहे की पर्याय होवे, ऐसा नहीं (है)।

00:33:48.858 --> 00:33:53.612
समयसार में है।
<b>कारणानुविधायीनि कार्याणी</b>,

00:33:53.636 --> 00:34:00.860
कार्य-कारण एक पर्याय में घटाओ,
व्यवहार से द्रव्य के साथ कह सकते हैं,
कहा जाता है, कोई बात नहीं।

00:34:00.884 --> 00:34:08.100
मुमुक्षु: द्रव्य के साथ व्यवहार से लागू पड़ेगा?
पू. लालचंदभाई: व्यवहार से।
निश्चय से तो पर्याय का कारण पर्याय है।

00:34:08.124 --> 00:34:12.638
मुमुक्षु: तो साहब! पर्याय का कारण
पर्याय है तो हम तो त्रिकाली द्रव्य हैं।

00:34:12.662 --> 00:34:17.869
तो फिर हम सम्यग्दर्शन का कारण कैसे
बनेंगे? और कैसे सम्यग्दर्शन प्रगट करेंगे?

00:34:17.893 --> 00:34:25.243
पू. लालचंदभाई: ये 'सम्यग्दर्शन का
कारण मैं नहीं हूँ, मैं अकारण परमात्मा
हूँ' तो सम्यग्दर्शन भज जायेगा!

00:34:25.267 --> 00:34:33.452
मैं सम्यग्दर्शन का कारण नहीं हूँ ऐसा
अकारण परमात्मा हूँ, आहाहा! तो
सम्यग्दर्शन अपने आप (हो जायेगा)।

00:34:33.476 --> 00:34:38.349
ऐसा आया है आत्मा कर्ता भी नहीं है
और कारण भी नहीं है।

00:34:38.373 --> 00:34:48.700
कर्ता कहो तो व्याप्य-व्यापक संबंध
बन जायेगा और कारण कहो तो
नित्य कर्तापने का दोष आयेगा।

00:34:48.724 --> 00:34:52.216
मुमुक्षु: तो अपनी पर्याय के साथ
तो व्याप्य-व्यापक संबंध है न?

00:34:52.240 --> 00:34:56.860
द्रव्य का अपनी पर्याय के साथ तो
व्याप्य-व्यापक संबंध है न?
पू. लालचंदभाई: वो व्यवहार है,

00:34:56.884 --> 00:35:01.460
निश्चय नहीं है।
पर से भिन्न करने के लिए निश्चय

00:35:01.484 --> 00:35:12.296
और अपना अकर्ता स्वभाव दृष्टि में
लेने के लिए वो कथन व्यवहार का है।

00:35:12.320 --> 00:35:19.807
मुमुक्षु: इन्द्रियज्ञान,
मानसिकज्ञान और अतीन्द्रियज्ञान;
इन तीनों का स्वरूप स्पष्ट करें?

00:35:19.831 --> 00:35:24.265
पू. लालचंदभाई: ये पाँच इन्द्रिय (का)
उघाड़ हैं न - स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द

00:35:24.289 --> 00:35:29.163
- वो तो स्थूल रूपी पदार्थ को
जानता है पाँच इन्द्रियज्ञान।

00:35:29.187 --> 00:35:36.736
और जो मन है न वो रूपी-अरूपी दोनों
को जानता है, परोक्षरूप से, प्रत्यक्ष नहीं।

00:35:36.760 --> 00:35:43.016
धर्मास्तिकाय को जानता है,
अधर्मास्तिकाय (को) जानता है,
आत्मा अरूपी है उसको भी मन जानता है

00:35:43.040 --> 00:35:46.696
- परोक्षरूप से कि इसका नाम
आत्मा है, ऐसा जानता है।

00:35:46.720 --> 00:35:52.874
मन के विषय रूपी-अरूपी दोनों ही हैं और
पाँच इन्द्रिय का विषय अकेला रूपी है। बस!

00:35:52.898 --> 00:35:58.092
इतना फर्क है दोनों में।
भेदज्ञान मनवाला प्राणी करता है।

00:35:58.116 --> 00:36:03.420
पाँच इन्द्रियवाला (असंज्ञी) प्राणी
भेदज्ञान का विचार कर सकता नहीं।

00:36:03.444 --> 00:36:07.607
मुमुक्षु: तो मन की सहायता
से भेदविज्ञान हो सकता है क्या?

00:36:07.631 --> 00:36:14.300
पू. लालचंदभाई: मन की
सहायता से नहीं, आत्मा का लक्ष
करने से मन ऐसा कार्य कर लेता है।

00:36:14.324 --> 00:36:18.763
आत्मा का लक्ष करने से मन
ऐसा अपना काम करता है।

00:36:18.787 --> 00:36:23.438
ख्याल में भी आता है कि मन
ऐसा काम करता है, भेदज्ञान का।
ख्याल में भी आता है।

00:36:23.462 --> 00:36:27.056
मुमुक्षु: भेदज्ञान मन का कार्य है
कि आत्मा का कार्य (है)?

00:36:27.080 --> 00:36:34.327
पू. लालचंदभाई: सविकल्प भेदज्ञान
मन का कार्य है;
निर्विकल्प भेदज्ञान आत्मा का कार्य है।

00:36:34.351 --> 00:36:39.705
दो प्रकार का भेदज्ञान है।
मुमुक्षु: दोनों में क्या अंतर है सविकल्प
भेदज्ञान और निर्विकल्प भेदज्ञान (में)?

00:36:39.729 --> 00:36:41.927
पू. लालचंदभाई: एक सविकल्प
यानि मानसिकज्ञान है।

00:36:41.951 --> 00:36:47.696
मिथ्यादृष्टि जब आत्मा के सन्मुख होगा,
(सन्मुख) होने का time (समय) होता है

00:36:47.720 --> 00:36:53.416
तो भेदज्ञान का विचार मानसिक (ज्ञान) में
आता है और मन में निर्णय भी हो जाता है।

00:36:53.440 --> 00:36:59.660
इसका एक तो प्रवचनसार की
८० नम्बर की गाथा है,

00:36:59.684 --> 00:37:03.869
अरिहंत के द्रव्य-गुण-पर्याय को जानना
बाद में अपने (आत्मा) को जानना 
वो मुख्य हो जाता है।

00:37:03.893 --> 00:37:13.603
उसमें अमृतचंद्राचार्य की टीका में
ऐसा आया कि मन के द्वारा,
त्रिकाली द्रव्य को मन जान लेता है।

00:37:13.627 --> 00:37:16.994
जाणी ल्ये छे, क्या हिन्दी में?
जान लेता है।

00:37:17.018 --> 00:37:28.909
और जयसेनाचार्य भगवान ने लिखा है
कि सविकल्प स्वसंवेदन ज्ञान के
द्वारा आत्मा को मन जान लेता है।

00:37:28.933 --> 00:37:33.905
बाद में अनुभव होता है वो प्रत्यक्ष है,
(वहाँ) मन पावे विश्राम।

00:37:33.929 --> 00:37:36.189
मुमुक्षु: मन जान लेता है
ऐसा आप फरमाते हैं?

00:37:36.213 --> 00:37:38.318
पू. लालचंदभाई: मन यानि भावमन,
ज्ञान का उघाड़।

00:37:38.342 --> 00:37:48.838
भावमन, ज्ञान का उघाड़;
द्रव्यमन तो जड़ है, वो तो जड़ है।
क्षयोपशम की बात है, भावमन, उघाड़।

00:37:48.862 --> 00:37:56.687
मुमुक्षु: अध्यात्म में कौनसे ज्ञान का
उपयोग होता है, इन्द्रियज्ञान का कि
मानसिकज्ञान का कि अतीन्द्रियज्ञान का?

00:37:56.711 --> 00:38:02.083
अध्यात्म में आत्मा के अनुभव के
लिए कौनसा ज्ञान जरूरी है?
पू. लालचंदभाई: अतीन्द्रियज्ञान।

00:38:02.107 --> 00:38:10.972
इन्द्रियज्ञान का कार्य नहीं है,
वो आत्मा को जानता नहीं है।

00:38:10.996 --> 00:38:15.105
मुमुक्षु: परमपारिणामिक और
पारिणामिकभाव का क्या स्वरूप है?

00:38:15.129 --> 00:38:21.166
पू. लालचंदभाई: पारिणामिकभाव
छहद्रव्य में रहता है और परम
पारिणामिकभाव शुद्धात्मा में रहता है।

00:38:21.190 --> 00:38:25.599
परम यानि पूजनिक है, इसलिए
परमपारिणामिकभाव कहा जाता है।

00:38:25.623 --> 00:38:28.699
पारिणामिकभाव तो परमाणु हैं न वो जड़,

00:38:28.723 --> 00:38:30.160
<b>जड़भावे जड़ परिणमे</b>
(श्रीमद राजचन्द्र जी, भाद्रपद
शुक्ल ८ १९४७, राजपद दोहरा २८)

00:38:30.184 --> 00:38:33.032
अनादि-अनंत वो
उसका पारिणामिक स्वभाव है।

00:38:33.056 --> 00:38:37.458
कभी जड़ से चेतन होगा नहीं,
वो पारिणामिकभाव उसका;

00:38:37.482 --> 00:38:44.731
और भगवान आत्मा परमपारिणामिक
भाव से विराजमान है, उपादेय तत्त्व है।

00:38:44.755 --> 00:38:48.896
मुमुक्षु: शुद्धात्मा भी तो छहद्रव्य में
एक द्रव्य है न?
तो उसमें भी पारिणामिकभाव है?

00:38:48.920 --> 00:38:51.993
पू. लालचंदभाई: उसमें से
आत्मा को निकाल लेना, छहद्रव्य में से।

00:38:52.017 --> 00:39:03.085
अपनी कार्य-सिद्धि में जीवतत्त्व को
निकाल लेना, द्रव्य में से तत्त्व निकालना।
मुमुक्षु: बराबर!

00:39:03.109 --> 00:39:08.187
द्रव्य में से तत्त्व निकालना मतलब
जैसे अनंत आत्मायें हैं, उसमें एक
मैं अलग हूँ ऐसे निकालना?

00:39:08.211 --> 00:39:15.651
पू. लालचंदभाई: पहले (प्रमाण का) द्रव्य को
अलग पाड़ देना, बाद (में) द्रव्य को अलग पाड़ कर 
पर्यायमात्र से मैं भिन्न ऐसा जीवतत्त्व हूँ।

00:39:15.675 --> 00:39:31.969
देखो! जीव की एक तो जीव (तत्त्व)
संबंधी भूल है कि जीवतत्त्व है ज्ञाता (और)
मानता है कर्ता, वह जीवतत्त्व की भूल है।

00:39:31.993 --> 00:39:41.113
और जानता है स्व को और मानता है पर
को जानता हूँ वो संवरतत्त्व की भूल है।
दो भूल हैं जीव की।

00:39:41.137 --> 00:39:51.402
जीवतत्त्व की क्या भूल? है ज्ञाता,
अकारक-अवेदक, मानता है कर्ता,
तो जीवतत्त्व की भूल है वो।

00:39:51.426 --> 00:40:02.565
और ज्ञान की पर्याय में जानने में
आ रहा है स्व और मानता है पर
को जानता हूँ, वो संवरतत्त्व की भूल है।

00:40:02.589 --> 00:40:10.881
संवर प्रगट नहीं होगा।
मान्यता की बात है वो,
ध्यान रखना; श्रद्धा का दोष।

00:40:10.905 --> 00:40:15.891
मुमुक्षु: स्व को जानने में संवर
तत्त्व-संबंधी भूल का क्या प्रसंग है?

00:40:15.915 --> 00:40:21.800
स्व को जानता है
लेकिन पर को जानता हूँ ऐसा मानता है,
इसमें भी स्व-पर की भूल हुई।

00:40:21.824 --> 00:40:23.527
इसमें संवरतत्त्व क्यों लिया?

00:40:23.551 --> 00:40:28.443
पू. लालचंदभाई: संवर नहीं उत्पन्न होगा।
स्व को जानता हूँ मैं, तो संवर प्रगट होगा।

00:40:28.467 --> 00:40:33.050
मैं पर को जानता हूँ तो आस्रवतत्त्व
प्रगट होगा, मिथ्यात्व होगा।

00:40:33.074 --> 00:40:37.868
ऐसा बंध अधिकार में आचार्य भगवान ने
लिखा है कि धर्मास्तिकाय को मैं जानता हूँ

00:40:37.892 --> 00:40:42.993
(वह) अध्यवसान है (समयसार गाथा २६८-२६९);
आस्रव प्रगट हो गया,
संवर प्रगट नहीं होता है।

00:40:43.017 --> 00:40:47.960
पर को जानने से आस्रव प्रगट होता है,
संवर प्रगट नहीं होता है।

00:40:47.984 --> 00:40:53.483
आत्मा को जानने से संवर प्रगट हो जाता है।

00:40:53.507 --> 00:41:01.196
संवर क्यों प्रगट नहीं होता है?
मैं पर को जानता हूँ ऐसे पक्ष में पड़ा है,
तो उपयोग अंदर तो आता नहीं है

00:41:01.220 --> 00:41:07.141
और अनुभव होता नहीं है;
अनुभव का नाम संवर है।

00:41:07.165 --> 00:41:16.939
मुमुक्षु: पर को जानना आस्रव है क्या?
पू. लालचंदभाई: पर को जानने के समय
उसमें एकता करता है तो आस्रव है।

00:41:16.963 --> 00:41:22.185
और इन्द्रियज्ञान एकता करता ही है,
अध्यवसान करता रहता है।

00:41:22.209 --> 00:41:24.030
ऐसा तो मोक्षमार्गप्रकाशक (अधिकार ४,
मिथ्यादर्शन का स्वरूप, मिथ्यादर्शन कि प्रवृत्ति,
जीव-अजीवतत्त्व संबंधी अयथार्थ श्रद्धान) में लिखा

00:41:24.054 --> 00:41:28.543
(कि) इन्द्रियज्ञान जिसको जानता है
उसमें ममता कर लेता है।

00:41:28.567 --> 00:41:35.252
जाने हुये का श्रद्धान होता है;
आत्मा को जाने तो आत्मा मैं हूँ
ऐसा श्रद्धान प्रगट होता है, सम्यक्;

00:41:35.276 --> 00:41:38.972
और पर को जाने तो पर मेरा है
ऐसा मिथ्याश्रद्धान (प्रगट होता है)।

00:41:38.996 --> 00:41:44.585
जाने हुए का श्रद्धान होता है, ये (समयसार)
१७-१८ गाथा में अंदर (आत्मा) की बात है।

00:41:44.609 --> 00:41:49.149
और बाहर की बात लगा लेना कि
मैं पर को जानता हूँ तो पर मेरा है,

00:41:49.173 --> 00:41:55.200
ऐसा मिथ्यात्व प्रगट हो जाता है
अज्ञानी को, अज्ञानी की बात है।

00:41:55.224 --> 00:41:59.740
मुमुक्षु: पर को जानने में गलती नहीं है,
उसमें एकता करने में भूल हुई?

00:41:59.764 --> 00:42:04.511
पू. लालचंदभाई: जाने बिना एकता
होती ही नहीं है। देह को जाने तो देह मेरा।

00:42:04.535 --> 00:42:06.926
जाने ही नहीं तो मेरा कहाँ से आया?

00:42:06.950 --> 00:42:14.647
इन्द्रियज्ञान जिसको जानता है
उसमें अपनापन, उसकी मान्यता
कर लेता है, ममत्व करता है।

00:42:14.671 --> 00:42:21.583
जाने हुए का श्रद्धान होता है;
नहीं जाने हुए का श्रद्धान (तो)
गधे के सींघ समान है। आहाहा!

00:42:21.607 --> 00:42:25.216
मुमुक्षु: तो साहेब! देह में
एकत्वबुद्धि का निषेध करना चाहिए।

00:42:25.240 --> 00:42:28.418
देह को जानना निषेध करने से
तो ज्ञान का ही निषेध हो जायेगा?

00:42:28.442 --> 00:42:39.091
पू. लालचंदभाई: नहीं! ज्ञान प्रगट होगा।
देह को जानना बंद कर दे, तू तेरे
को जान तो संवर प्रगट होगा।

00:42:39.115 --> 00:42:43.236
इन्द्रियज्ञान जीतने के बिना
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट नहीं होगा।

00:42:43.260 --> 00:42:47.910
<b>कर इन्द्रियजय ज्ञानस्वभाव रु,
अधिक जाने आत्मको</b> (समयसार गाथा ३१),

00:42:47.934 --> 00:42:53.530
इन्द्रियज्ञान से अधिक यानि
मेरा अतीन्द्रियज्ञानमयी आत्मा
अलग है तीनोंकाल।

00:42:53.554 --> 00:42:58.228
इन्द्रियज्ञान और अतीन्द्रिय
ज्ञानमयी आत्मा एक नहीं हुए हैं।

00:42:58.252 --> 00:43:07.432
ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान करना,
ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान करना।

00:43:07.456 --> 00:43:13.571
मुमुक्षु: कौनसे ज्ञान से?
पू. लालचंदभाई: हमारे पिताजी ने एक बार
वो सुमेरूमलभाई हैं न, बैठे हैं बाजू में।

00:43:13.595 --> 00:43:23.543
उन सेठिया जी का पत्र-व्यवहार मेरे
साथ था और बहुत (तत्त्व)प्रेमी, हमारे
साथ प्रेम बहुत था सेठिया जी को।

00:43:23.567 --> 00:43:27.452
तो पत्र-व्यवहार चला करता था।
तो पत्र लिखा मैंने।

00:43:27.476 --> 00:43:35.487
मेरे पिताजी ने कहा कि लालचंद!
एक लाइन मेरी ओर से लिखो
कि बापू जी लिखवाते हैं।

00:43:35.511 --> 00:43:43.939
कि बोलो मैं क्या लिखूँ? तो लिखो
सेठिया जी पर (कि) 'ज्ञान से ज्ञान का
भेदज्ञान करना' - ऐसा लिखावाया।

00:43:43.963 --> 00:43:50.549
वो इन्द्रियज्ञान और अतीन्द्रियज्ञान
अलग-अलग चीज हैं, एक नहीं हैं।
खिचड़ी करते हैं सब।

00:43:50.573 --> 00:43:58.205
इन्द्रियज्ञान को ही ज्ञान मानता है
सारा जगत।
इन्द्रियज्ञान से जुदा ज्ञान है। आहाहा!

00:43:58.229 --> 00:44:05.146
कलश-टीका में तो यहाँ तक कहा है कि
नय ज्ञान से जुदा ज्ञान अनुभव में आता है।

00:44:05.170 --> 00:44:10.157
नय यानि विकल्पवाला है ज्ञान,
भावेन्द्रिय।

00:44:10.182 --> 00:44:14.578
मुमुक्षु: इन्द्रियज्ञान भी पर्याय है
और अतीन्द्रियज्ञान भी पर्याय है।
पू. लालचंदभाई: हाँ! बराबर!

00:44:14.602 --> 00:44:17.201
मुमुक्षु: तो पर्याय से पर्याय का
भेदज्ञान करना?

00:44:17.225 --> 00:44:23.241
पू. लालचंदभाई: पर्याय जब द्रव्य में अहम्
करती है तब पर्याय का भेदज्ञान होता है।

00:44:23.265 --> 00:44:29.838
ज्ञान की पर्याय में आया कि 
मैं ज्ञानानंद परमात्मा हूँ, 
मैं अतीन्द्रियज्ञानमयी हूँ;

00:44:29.862 --> 00:44:38.114
इन्द्रियज्ञान मेरा स्वरूप नहीं है; तो 
भेदज्ञान के काल में लक्ष ज्ञायक पर 
जाता है, पर्याय पर टिकता नहीं है।

00:44:38.138 --> 00:44:41.963
ज्ञान से शुरूआत करता है 
मगर अंदर में जाता है।

00:44:41.987 --> 00:44:50.869
जैसे दीपचंदजी साहब ने लिखा न? 
कि उपयोग है न, तो (उसकी) डोरी से, डोरी से 
(रस्सी से, रस्सी से) अंदर चला जा, ऐसा शब्द है।

00:44:50.893 --> 00:44:55.007
डोरी से, डोरी से यानि उपयोग 
जहाँ से आता है ज्ञान, वहाँ चले जा।

00:44:55.031 --> 00:45:00.732
जैसे नल है न पानी का? 
तो पानी का नल है, प्रवाह, 
तो कहाँ से आता है?

00:45:00.756 --> 00:45:05.332
यहाँ से आता है, यहाँ से आता है 
तो depot (संग्रहस्थान) तक, 
तालाब तक चला जाता है, उपयोग।

00:45:05.356 --> 00:45:16.114
समझे? ऐसा। 
समझाने के बहुत तरीके हैं। आहाहा! 
(जिसको) समझना हो उसके लिए हैं।

00:45:16.138 --> 00:45:25.167
मुमुक्षु: आप बहुत तरीकों से समझाते हैं! 
पू. लालचंदभाई: ये आचार्य भगवान ने 
समझाया है। बस! गुरुदेव ने समझाया है।

00:45:25.191 --> 00:45:33.096
मुमुक्षु: एक प्रश्न है कि 
द्रव्यस्वभाव का पारिणामिकभाव अलग है 
और उपयोग का पारिणामिकभाव अलग है।

00:45:33.120 --> 00:45:35.229
पू. लालचंदभाई: हाँ! वो पर्यायार्थिक(नय) 
का पारिणामिक है,

00:45:35.253 --> 00:45:38.789
उपयोग है न, 
वो पर्यायार्थिक(नय) का पारिणामिक है;

00:45:38.813 --> 00:45:42.914
और त्रिकाली द्रव्य है 
वो द्रव्यार्थिकनय का पारिणामिक है।

00:45:42.938 --> 00:45:48.198
पारिणामिक का अर्थ यह है कि 
जिसके अंदर कर्म की अपेक्षा आवे नहीं।

00:45:48.222 --> 00:45:53.007
उपयोग लक्षण है न? उसके अंदर 
कोई कर्म की अपेक्षा आती नहीं है।

00:45:53.031 --> 00:46:00.625
स्वभाव का अंश है न, इसलिए वो 
पर्यायार्थिकनय का पारिणामिक है। 
समयवर्ती है, नाशवान है न इसलिए।

00:46:00.649 --> 00:46:04.554
ये द्रव्यार्थिकनय का पारिणामिक है, 
द्रव्यस्वभाव।

00:46:04.578 --> 00:46:08.998
मुमुक्षु: पर्यायार्थिकनय का पारिणामिक 
किसी काम में आता है, अनुभव के लिए?

00:46:09.022 --> 00:46:12.883
पू. लालचंदभाई: हाँ! 
उसमें ही अनुभव होता है।

00:46:12.907 --> 00:46:21.456
वो पर्यायार्थिकनय का पारिणामिक 
उपयोग है न, उपयोग में उपयोग है ऐसा 
ले लेवे तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:46:21.480 --> 00:46:29.505
उपयोग में उपयोग है ऐसा ज्ञान-श्रद्धान 
में जो आ जावे तो सामान्य जो उपयोग है,

00:46:29.529 --> 00:46:37.540
उसका convert (परिवर्तित) होकर 
शुद्धोपयोग हो जाता है, plus (जोड़) 
हो जाता है। उपयोग plus शुद्धता।

00:46:37.564 --> 00:46:43.874
मुमुक्षु: बराबर। ये साहब जो आपने 
फरमाया कि उपयोग में उपयोग है। 
पू. लालचंदभाई: हाँ!

00:46:43.899 --> 00:46:48.092
मुमुक्षु: तो उसमें जब दोनों 'उपयोग' 
शब्द हैं उन दोनों का एक ही 
अर्थ है कि (दोनों) जुदा-जुदा हैं?

00:46:48.116 --> 00:46:51.949
पू. लालचंदभाई: एक उपयोग का 
अर्थ पर्याय है। उपयोग में उपयोग है।

00:46:51.973 --> 00:47:04.105
तो पहला जो उपयोग है वह पर्याय है, पर्याय। 
और उसमें उपयोग है यानि द्रव्य सामान्य 
ज्ञायक है। ज्ञायक तन्मय है। आहाहा!

00:47:04.129 --> 00:47:08.380
मुमुक्षु: ज्ञायक तो पर्याय से भिन्न है 
तो उपयोग में कैसे आएगा? 
वो पर्याय में कैसे आयेगा?

00:47:08.404 --> 00:47:14.616
पू. लालचंदभाई: वो राग में नहीं है 
मगर तेरे उपयोग में ज्ञायक है, ऐसा ले।

00:47:14.640 --> 00:47:19.709
क्या कहा? 
कि राग में, संवर अधिकार है न?

00:47:19.733 --> 00:47:29.976
तो आस्रव में आत्मा नहीं है 
मगर उपयोग में आत्मा है - 
ऐसा लेने से शुद्धोपयोग हो जाता है

00:47:30.000 --> 00:47:36.185
तो उसका नाम संवरतत्त्व है, 
प्रगट हो गया। पर्याय में द्रव्य है बोलो।

00:47:36.209 --> 00:47:45.794
अनित्य, एक समय की पर्याय में 
द्रव्य सामान्य है क्योंकि द्रव्य सामान्य 
उसमें अनुभव में आता है इसलिए उसमें है।

00:47:45.818 --> 00:47:53.412
इसलिए उसमें है। मध्यस्थ होकर, 
मध्यस्थ होकर (समझना)

00:47:53.436 --> 00:48:02.069
<b>ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे, तहाँ समजवु तेह;</b>
त्यां-त्यां ते ते आचरे, आत्मार्थी जन एह। 
(आत्मसिद्धिशास्त्र गाथा ८)

00:48:02.093 --> 00:48:08.136
आहाहा! एकांत तर्क से 
सिद्धि नहीं होती है। आहाहा!

00:48:08.160 --> 00:48:14.940
तर्क पर तर्क चलता जाये, यह तो 
तर्क का तो अंत ही नहीं आता है।

00:48:14.964 --> 00:48:21.327
तर्क की भी limit (मर्यादा) होनी चाहिए।

00:48:21.351 --> 00:48:29.518
मुमुक्षु: द्रव्य सत्, गुण सत्, पर्याय सत् 
इस प्रकार तीन सत् हैं क्या? 
कि एक ही सत् के तीन अंश हैं?

00:48:29.542 --> 00:48:34.696
पू. लालचंदभाई: तीन सत् 
अलग-अलग ही हैं और 
तीन सत् मिलकर एक सत् भी है।

00:48:34.720 --> 00:48:42.536
द्रव्य सत्, गुण सत्, पर्याय सत्, 
एक में दूसरे का अभाव - 
नास्ति है, ऐसे तीन सत् हैं;

00:48:42.560 --> 00:48:44.758
और तीन सत् मिलकर एक सत् भी है।

00:48:44.782 --> 00:48:51.514
पदार्थ की अपेक्षा से एक सत् है, 
नय की अपेक्षा से तीन सत् हैं।

00:48:51.538 --> 00:48:57.300
सारे पदार्थ की अपेक्षा से देखो 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०) एक सत् है;

00:48:57.324 --> 00:49:02.816
मगर वो नय से देखो तो उत्पाद सत् है, 
व्यय सत् है और ध्रुव सत् है।

00:49:02.840 --> 00:49:08.994
उत्पाद उत्पाद से है, व्यय से नहीं है, 
व्यय उत्पाद से नहीं है, उत्पाद ध्रुव 
से नहीं है, ध्रुव उत्पाद से नहीं है।

00:49:09.018 --> 00:49:13.225
तीनों सत् अलग-अलग हैं। 
आहाहा!

00:49:13.249 --> 00:49:17.132
मुमुक्षु: लेकिन तत्त्वार्थसूत्र में तो 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>... 
पू. लालचंदभाई: बराबर है।

00:49:17.156 --> 00:49:19.394
मुमुक्षु: एक सत् अखंड है ... 
पू. लालचंदभाई: हाँ, अखंड है।

00:49:19.418 --> 00:49:26.185
मुमुक्षु: तो ये तीन सत् अलग-अलग कैसे? 
पू. लालचंदभाई: ज्ञेय की प्रधानता से 
अखंड है, ज्ञेय की प्रधानता से अखंड ही है।

00:49:26.209 --> 00:49:32.540
मगर उसमें ध्येय छुपा है, 
तो ध्रुव निकालना चाहिए।

00:49:32.564 --> 00:49:35.563
मुमुक्षु: ध्रुव निकालने के लिए 
उस सत् को तोड़ना जरूरी है?

00:49:35.587 --> 00:49:40.523
पू. लालचंदभाई: हाँ! जरूरी है, 
बहुत जरूरी है। 
ऐसा मैं एक दृष्टांत देता हूँ।

00:49:40.547 --> 00:49:43.185
दृष्टांत से तो जरा ख्याल में आवे।

00:49:43.209 --> 00:49:46.180
एक बड़े पंडित हैं बाहर गाँव के, 
नाम नहीं लेता हूँ।

00:49:46.204 --> 00:49:52.296
उन्होंने पूछा था २०-२५ साल 
पहले कि 'साहब! 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>एक है,

00:49:52.320 --> 00:49:57.892
आप उसके टुकड़े क्यों करते हैं सोनगढ़वाले?’, 
ऐसा प्रश्न आया था मेरे पास।

00:49:57.916 --> 00:50:00.936
बड़े विद्वान पंडित प्रसिद्ध हैं। 
आहाहा!

00:50:00.960 --> 00:50:07.580
तो मैंने उनको समझाया था। तो इस बारे में 
थोड़ी सबको ही शंका-आशंका रहती है।

00:50:07.604 --> 00:50:12.145
एक सत् है कि तीन सत् हैं? 
सत् तो एक है। 
(फिर) तीन टुकड़े क्यों करते हैं?

00:50:12.169 --> 00:50:17.074
हाँ! ऐसा आता है प्रश्न। 
तो इसके लिए एक दृष्टांत समझने जैसा है।

00:50:17.098 --> 00:50:26.127
मुंबई जैसी नगरी, नगरी है। 
तो उसमें वो कुर्ता, कुर्ता है न, कुर्ता? 
तो पहले तो कुर्ता सिलाकर पहनते थे।

00:50:26.151 --> 00:50:30.874
(फिर) तो सिलाई बढ़ गई, 
७५-१०० रुपये मुंबई में हो गई।

00:50:30.898 --> 00:50:35.180
तो उसने विचार किया कि आखिर तो 
अपने को शरीर ढाँकना है न, अंग।

00:50:35.204 --> 00:50:39.909
शरीर को ढाँकना है न, 
तो दो मीटर कपड़ा लाया।

00:50:39.933 --> 00:50:48.296
लाकर, ओढ़कर जवेरी बाजार में निकला, 
भीड़ में। पगड़ी गई, टोपी तो गई। समझे?

00:50:48.320 --> 00:50:52.772
और डाघिया कहते हैं न वहाँ, 
श्मशान में जाते हैं, डाघिया।

00:50:52.796 --> 00:50:58.300
तो टोपी गई और पगड़ी तो गई, दो 
तो गई अभी और खुल्ला सिर तो है।

00:50:58.324 --> 00:51:03.132
अभी खुला (बिना सिला हुआ) पहनकर निकला! 
तो (एक ने पूछा) 'भाईसाहब! कौन गुजर गया?’।

00:51:03.156 --> 00:51:09.336
आगे गया, दूसरा मिला 'कौन गुजर गया?’। 
तीसरा मिला ... 'अरे! क्या है? क्यों पूछते हो?'। 

00:51:09.360 --> 00:51:16.749
'अरे! आपने कुर्ता नहीं पहना, 
(कपड़ा) लपेटा है तो डाघिया हो गया'। 
अरे! संसार में ऐसे चले नहीं,

00:51:16.773 --> 00:51:22.718
तो उसको विचार आया कि भले 
१०० रुपये, ७५ रुपये (सिलाई) लगे 
मगर दर्जी के पास जाऊँ।

00:51:22.742 --> 00:51:25.918
दो मीटर कपड़ा लेकर 
(दर्जी के पास) गया।

00:51:25.942 --> 00:51:31.723
क्या बनाना है? कि कुर्ता बनाना है, 
कुर्ता बनाना है। अच्छा! नाप लिया।

00:51:31.747 --> 00:51:38.323
तब तक तो दो मीटर पड़ा था कपड़ा। 
बाद में उसने कैंची ली। 
नहीं! कैंची, काटना नहीं!

00:51:38.347 --> 00:51:45.309
काटेंगे नहीं तो कुर्ता होगा नहीं। 
ले जा तेरा कपड़ा।

00:51:45.333 --> 00:51:48.892
न भाईसाहब! कुर्ता (तो बनाना है)। 
जैसा आप कहो तो काटो।

00:51:48.916 --> 00:51:58.607
तो काट दिया उसके सामने, हो, 
कैंची लगाई, निर्दयरूप से! 
निर्दयरूप से काट दिया।

00:51:58.631 --> 00:52:05.483
हाँ! मगर सिलूँगा ऐसा कि 
संधि दिखाई देगी नहीं, ऐसा सिलूँगा।

00:52:05.507 --> 00:52:10.794
संधि तो रहेगी मगर दिखाई देगी नहीं, 
ऐसा सिलूँगा। आहाहा!

00:52:10.818 --> 00:52:17.367
तो काटा और सिल भी दिया 
 और कुर्ता पहन लिया, तो चला बराबर।

00:52:17.391 --> 00:52:21.709
ऐसे <b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
एक पदार्थ है, प्रमाण का विषय।

00:52:21.733 --> 00:52:28.740
उसमें से, उसमें ही हेय-उपादेय है; 
पर्याय हेय है और ध्रुव उपादेय है।

00:52:28.764 --> 00:52:35.505
तो पहले नय से काटना, 
नय से टुकड़ा करना और 
टुकड़े करके जोड़ देना।

00:52:35.529 --> 00:52:40.940
तो उपयोग <b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
एक पूरा आत्मा ज्ञान में ज्ञेय बन जायेगा।

00:52:40.964 --> 00:52:47.140
कुर्ता बन जायेगा। 
काटने के बाद कुर्ता बन जायेगा। 
समझ में आया?

00:52:47.164 --> 00:52:50.816
मुमुक्षु: बराबर। 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं </b>
ये ३ मीटर कपड़ा लेना?

00:52:50.840 --> 00:52:58.825
पू. लालचंदभाई: कपड़ा लेना। 
वो कपड़ा है। मगर उसको ऐसा 
ओढ़कर निकले तो नहीं चलेगा।

00:52:58.849 --> 00:53:02.274
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
तत्त्वार्थसूत्र में लिखा है, तत्त्वार्थसूत्र में।

00:53:02.298 --> 00:53:05.718
लिखा है, मान्य है हमको। 
कौन ना बोलता है?

00:53:05.742 --> 00:53:11.914
मगर ऐसा <b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>का 
ज्ञान करने से सम्यग्दर्शन नहीं होता है।

00:53:11.938 --> 00:53:16.692
परंतु सम्यग्दर्शन के काल में 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
का ज्ञान हो जाता है।

00:53:16.716 --> 00:53:18.963
मुमुक्षु: वाह! वाह! वाह!
पू. लालचंदभाई: नहीं होता है (ऐसा) नहीं।

00:53:18.987 --> 00:53:24.056
तत्त्वार्थसूत्र भी आ जाता है, प्रवचनसार 
भी उसमें अनुभव में आ जाता है।

00:53:24.080 --> 00:53:35.643
समयसार के साथ-साथ प्रवचनसार मिल 
जाता है, तत्त्वार्थसूत्र भी मिल जाता है, 
धवल भी मिल जाता है। ऐसा है भैया!

00:53:35.667 --> 00:53:41.949
मुमुक्षु: एक और प्रश्न है कि 
द्रव्य का निश्चय और पर्याय का निश्चय 
- ये दोनों अलग-अलग होते हैं क्या?

00:53:41.973 --> 00:53:48.332
पू. लालचंदभाई: अलग हैं। 
द्रव्य का निश्चय ऐसा है कि 
जो उत्पाद-व्यय से रहित है,

00:53:48.356 --> 00:53:52.420
१४ गुणस्थान से रहित है 
वो द्रव्य का निश्चय है।

00:53:52.444 --> 00:53:56.740
द्रव्य का निश्चय यानि निश्चयनय 
का विषय जो उपादेय तत्त्व है,

00:53:56.764 --> 00:54:03.656
आश्रयभूत तत्त्व है, अवलंबनभूत तत्त्व है, 
जिसमें अहम् करना है वो 
उत्पाद-व्यय से रहित होता है,

00:54:03.680 --> 00:54:07.878
त्रिकाली सामान्य शुद्धात्मा; 
वो द्रव्य का निश्चय है।

00:54:07.902 --> 00:54:13.336
और एक पर्याय का निश्चय, जो 
पर्याय अपनी आत्मा को ही जानती है,

00:54:13.360 --> 00:54:19.060
पर को जानती नहीं है - बंद करती है, 
तो उसका नाम पर्याय का निश्चय।

00:54:19.084 --> 00:54:24.896
द्रव्य का निश्चय और पर्याय का निश्चय, 
जब दो साथ में आते हैं तब अनुभूति होती है।

00:54:24.920 --> 00:54:34.225
जो उसमें क्रम पड़ता है तो अनुभव 
नहीं होती है, पक्ष आ जाता है, राग 
आ जाता है। एक समय की बात है।

00:54:34.249 --> 00:54:36.656
दो बात हैं, शास्त्र में ही है।

00:54:36.680 --> 00:54:43.998
द्रव्य का निश्चय (जो) है 
वो (समयसार) ३२० गाथा में 
अकारक-अवेदक (है वो) द्रव्य का निश्चय;

00:54:44.022 --> 00:54:50.816
और सेटिका की गाथा (३५६-३६५ समयसार) में 
ज्ञान की पर्याय का निश्चय, 
साफ शब्दों लिखा है, ऊपर शीर्षक में।

00:54:50.840 --> 00:54:58.229
ज्ञान की पर्याय का निश्चय मैं बताता हूँ 
कि ज्ञान की पर्याय 
जब ज्ञायक के सन्मुख होती है

00:54:58.253 --> 00:55:07.269
तब ज्ञायक ही हो जाती है, उसका 
नाम ज्ञान की पर्याय का निश्चय। 
सब (कुछ) शास्त्रों में है।

00:55:07.293 --> 00:55:11.492
जैसे वो आता है न कि (जब) दो 
मिलते हैं तो पानी बनता है। क्या?

00:55:11.516 --> 00:55:18.172
हाँ! oxygen (ऑक्सिजन) और 
hydrogen (हाइड्रोजन), दो मिलते 
हैं तो पानी बनता है कि नहीं?

00:55:18.196 --> 00:55:22.905
ऐसे द्रव्य का निश्चय (अर्थात्) 
दृष्टि का विषय दृष्टि में आवे

00:55:22.929 --> 00:55:29.478
और (पर्याय का निश्चय) ज्ञान में 
ज्ञायक आ जावे तो अनुभूति हो जाती है,

00:55:29.502 --> 00:55:31.167
ध्येय पूर्वक ज्ञेय हो जाता है।

00:55:31.191 --> 00:55:38.723
प्रवचनसार भी आ गया, 
तत्त्वार्थसूत्र भी आ गया, 
समयसार भी आ गया, सब आ गए।

00:55:38.747 --> 00:55:41.558
मुमुक्षु: आप जब बोलते हो 
तो बड़ा सरल मालूम पड़ता है

00:55:41.582 --> 00:55:47.465
और जब practical (प्रयोग) करते हैं 
तो बड़ा कठिन मालूम पड़ता है।

00:55:47.489 --> 00:55:52.545
पू. लालचंदभाई: रुचि बढ़ाना। रुचि 
बढ़ाना वही उपाय है, दूसरा उपाय नहीं है।

00:55:52.569 --> 00:56:01.460
मेरे को इस भव में आत्मा समझना है, 
बस! और कुछ जानकारी कम हो, 
ज्यादा हो, वो तो क्षम्य है।

00:56:01.484 --> 00:56:10.332
मुमुक्षु: बराबर! एक भाई ने पूछा है 
कि मोह का तीव्र उदय हो तो उसे 
मंद करने के लिए क्या पुरुषार्थ करें?

00:56:10.356 --> 00:56:14.176
पू. लालचंदभाई: आत्मा को 
याद करो मोह मंद हो जायेगा।

00:56:14.200 --> 00:56:20.349
मैं तो ज्ञानानंद परमात्मा हूँ 
(तो) मोह भाग जायेगा। पहले 
मंद होगा, बाद में (भाग जायेगा)।

00:56:20.373 --> 00:56:24.598
एक टँकार (धनुष की ध्वनि) करो, एक 
टँकार (कि) मैं ज्ञानानंद परमात्मा हूँ। बस!

00:56:24.622 --> 00:56:30.647
मोह के नाश का एक ही उपाय है 
'मैं परमात्मा हूँ'। आहाहा!

00:56:30.671 --> 00:56:40.905
ऐसी भाषा नहीं, विकल्प नहीं; 
अंदर में, अंदर में परिणमन ऐसा 
अपेक्षित होना। बाद में निरपेक्ष हो जाना।

00:56:40.929 --> 00:56:46.403
मुमुक्षु: साहेब! जब मोह 
का तीव्र उदय होता है उस समय 
आत्मा तो याद आता ही नहीं है।

00:56:46.428 --> 00:56:50.012
पू. लालचंदभाई: यह आत्मा को 
याद नहीं करता है इसलिए मोह है।

00:56:50.036 --> 00:57:04.563
आत्मा को याद करे तो तीव्र मोह 
होता ही नहीं है। वो मोह मंद हो जाता है। 
मुमुक्षु: बहुत सुंदर!

00:57:04.587 --> 00:57:12.536
केवली का ज्ञान स्वपरप्रकाशक है 
तो वहाँ ज्ञेय पदार्थ देखने का दोष 
आता है कि नहीं आता है?

00:57:12.560 --> 00:57:13.487
पू. लालचंदभाई: नहीं! नहीं आता है।

00:57:13.511 --> 00:57:18.780
स्वपरप्रकाशक व्यवहार है न, अपने 
आत्मा को जानते हैं और लोकालोक 
जणित (जानने में आ) जाता है।

00:57:18.804 --> 00:57:25.736
तो स्वपरप्रकाशक ज्ञान केवली का है। 
ऐसे साधक को भी स्वपरप्रकाशक 
ज्ञान है, प्रमाणज्ञान, व्यवहार ज्ञान है।

00:57:25.760 --> 00:57:27.816
स्वपरप्रकाशक व्यवहार है।

00:57:27.840 --> 00:57:34.958
व्यवहार में से निश्चय निकालना कि 
'स्व जानने में आता है, पर जानने 
में आता नहीं है’ तो अनुभव होगा

00:57:34.982 --> 00:57:44.034
और अनुभव के बाद में 
स्वपरप्रकाशक - व्यवहार भी निश्चयपूर्वक 
प्रगट होगा ही होगा। घबराना मत।

00:57:44.058 --> 00:57:47.336
मुमुक्षु: केवली भगवान को 
स्वपरप्रकाशक का व्यवहार लागू पड़ता है?

00:57:47.360 --> 00:58:00.034
पू. लालचंदभाई: हाँ! जरूर। 
व्यवहार ही है, ऐसा लिखा है नियमसार में, 
१५९ गाथा नियमसार की। बस! आधार देता हूँ।

00:58:00.058 --> 00:58:02.634
मुमुक्षु: भाई! केवलज्ञान में 
तो नय होते नहीं हैं न?

00:58:02.658 --> 00:58:05.438
पू. लालचंदभाई: नीचे का 
जीव नय लगाकर जानता है

00:58:05.462 --> 00:58:09.798
कि केवली भगवान लोकालोक को जानते 
हैं कि स्व को जानते हैं, इसमें क्या?

00:58:09.822 --> 00:58:15.487
कि लोकालोक को जाने तो व्यवहारनय; 
केवली भगवान अपने आत्मा को जानते हैं 
वो निश्चयनय है।

00:58:15.511 --> 00:58:22.269
ऐसा नियमसार (गाथा १६६) 
में लिखा है कि कोई तत्त्ववेदी, 
अनुभवी जीव ऐसा कहे

00:58:22.293 --> 00:58:28.576
कि केवली भगवान अपने को जानते हैं 
और पर को जानते नहीं हैं, तो क्या दोष?

00:58:28.600 --> 00:58:33.078
कि कोई दोष नहीं? 
इसका क्या कारण? 
कि निश्चयनय से व्याख्या है।

00:58:33.102 --> 00:58:35.958
निश्चयनय से आत्मा को जानते हैं।

00:58:35.982 --> 00:58:44.149
और बाद में एक गाथा (१६९) आयी कि 
आत्मा को नहीं जानते हैं केवली भगवान, 
लोकालोक को जानते हैं, तो कोई इसमें दोष है?

00:58:44.173 --> 00:58:52.603
कि कोई दोष नहीं है, 
वो व्यवहारनय का कथन है। 
नय लगाने से समाधान हो जाता है।

00:58:52.627 --> 00:58:57.554
मुमुक्षु: स्व-पर का भेदज्ञान करने 
से आगम का ज्ञान हो जाता है क्या?

00:58:57.578 --> 00:59:06.029
पू. लालचंदभाई: स्व-पर का भेदज्ञान करने से 
और बाद में आत्मा का ज्ञान करने से 
अध्यात्म-आगम दोनों का ही ज्ञान हो जाता है।

00:59:06.053 --> 00:59:13.043
अकेला स्व-पर में अटकना नहीं; 
स्व-पर में से स्व निकाल लेना।

00:59:13.067 --> 00:59:16.954
स्व-पर का प्रतिभास तो होता है 
उसमें से स्व निकाल लेना,

00:59:16.978 --> 00:59:22.758
उसमें उपयोग इस तरफ लगा देना, 
तो अध्यात्म-आगम दोनों आ गए।

00:59:22.782 --> 00:59:25.958
मुमुक्षु: अध्यात्म और आगम 
इन दोनों में क्या अंतर है?

00:59:25.982 --> 00:59:31.683
पू. लालचंदभाई: अध्यात्म में अकेले 
आत्मा की बात है और आगम में 
परपदार्थ भी शामिल हो जाते हैं।

00:59:31.707 --> 00:59:38.327
और राग, साधक राग को जानता है 
वो भी आगम-पद्धति है।

00:59:38.351 --> 00:59:45.380
मुमुक्षु: राग को जानना भी आगम-पद्धति है? 
पू. लालचंदभाई: आगम-पद्धति है।

00:59:45.404 --> 00:59:49.416
मुमुक्षु: पर्याय पर्याय का वेदन करती है, 
इसका क्या तात्पर्य है?

00:59:49.440 --> 01:00:00.732
पू. लालचंदभाई: हाँ! पर्याय का 
वेदन करती है। यानि पर्याय के 
अंदर एक भोक्ता नाम का धर्म है।

01:00:00.756 --> 01:00:08.700
पर्याय के अंदर भोक्ता नाम का 
एक धर्म है। द्रव्य तो अभोक्ता है 
मगर पर्याय में क्रिया होती है।

01:00:08.724 --> 01:00:12.540
तो भोक्ता नाम का पर्याय का एक धर्म है।

01:00:12.564 --> 01:00:20.038
तो जब अज्ञानी है तो वो पर्याय 
दुःख को भोगती है और (जब) ज्ञान 
होता है तो आनंद को भोगती है।

01:00:20.062 --> 01:00:24.669
तो भोक्ता नाम का एक पर्याय का धर्म है।

01:00:24.693 --> 01:00:29.474
पर्याय पर्याय को भोगती है, 
आनंद को भोगनेवाली पर्याय है;

01:00:29.498 --> 01:00:35.692
उपचार से आत्मा आनंद को 
भोक्ता है ऐसा भी कहा जाता है, 
उसमें कोई दोष नहीं (है)।

01:00:35.716 --> 01:00:40.078
मुमुक्षु: पर्याय जिस आनंद को भोगती 
है वो आनंद तो द्रव्य में से आता है न?

01:00:40.102 --> 01:00:44.100
पू. लालचंदभाई: आनंद द्रव्य में से आता है।

01:00:44.124 --> 01:00:50.745
द्रव्य का आश्रय है न, द्रव्य का आश्रय 
है न, तो आनंदमूर्ति है, तो उसके खजाने 
में से आता है आनंद। आहाहा!

01:00:50.769 --> 01:00:57.527
मुमुक्षु: द्रव्य का आनंद पर्याय में 
आयेगा तो द्रव्य खाली नहीं हो जायेगा? 
पू. लालचंदभाई: नहीं होगा, बिल्कुल नहीं।

01:00:57.551 --> 01:01:06.278
सचमुच तो पर्याय का आनंद पर्याय में 
होता है, द्रव्य में से आता ही नहीं है। 
पर क्या करें? समझाने के लिए ऐसा है।

01:01:06.302 --> 01:01:10.669
वो पर्याय उत्पन्न होती है न 
(वो) आनंद लेकर उत्पन्न होती है। 
मुमुक्षु: वाह!

01:01:10.693 --> 01:01:15.709
पू. लालचंदभाई: वो पर्याय सत्-अहेतुक है, 
त्रिकाली द्रव्य आनंदमूर्ति की अपेक्षा 
उसको नहीं है।

01:01:15.733 --> 01:01:21.727
मगर ऐसा कहा जाता है कि आत्मा में 
से आनंद आता है और आत्मा में 
आनंद चला जाता है। आहाहा!

01:01:21.751 --> 01:01:31.020
क्या करें? नय का कथन और प्रमाण 
का कथन मिलान करने से ख्याल में 
आ जाता है, विरोध नहीं है बिल्कुल।

01:01:31.044 --> 01:01:34.496
बिल्कुल विरोध नहीं है। 
आत्मा आनंद को भोक्ता है? 
कि हाँ!

01:01:34.520 --> 01:01:37.580
आत्मा आनंद को नहीं भोक्ता है? 
कि बराबर है।

01:01:37.604 --> 01:01:46.532
और पर्याय भोगती है? 
कि बराबर है! तो सब में बराबर? 
अपेक्षा से समझो तो बराबर है।

01:01:46.556 --> 01:01:51.225
अपेक्षा के ज्ञान बिना 
जिनागम का रहस्य समझ में नहीं आता है।

01:01:51.249 --> 01:01:54.763
टोडरमल साहब ने कहा न अपेक्षा से (समझो)।

01:01:54.787 --> 01:02:01.047
मुमुक्षु: नयचक्र में भी आता है? 
पू. लालचंदभाई: आता है न, हाँ। अपेक्षा 
लगाना चाहिए, तो समझ में आ जाएगा।

01:02:01.071 --> 01:02:06.749
मुमुक्षु: ज्ञान ज्ञान गुण की पर्याय है, 
राग चारित्र गुण की पर्याय है।

01:02:06.773 --> 01:02:13.332
आप ज्ञान का कर्ता तो आत्मा को कहते हैं, 
लेकिन राग का कर्ता नहीं कहते। 
तो ये पक्षपात नहीं है क्या?

01:02:13.356 --> 01:02:18.794
पू. लालचंदभाई: नहीं! पक्षपात नहीं है। 
ज्ञान तो स्वभावभूत क्रिया है 
और राग तो विभावभूत क्रिया है।

01:02:18.818 --> 01:02:27.532
विभावभूत क्रिया करने से आत्मा दुःखी 
होता है। ज्ञानक्रिया स्वभावभूत होने 
से आनंद आता है। फर्क है बहुत।

01:02:27.556 --> 01:02:33.016
ज्ञान की पर्याय तो आत्मा का स्वभाव है; 
राग आत्मा का स्वभाव नहीं है, विभाव है।

01:02:33.040 --> 01:02:37.976
तो विभाव करो। आहाहा! 
ऐसे पाप का उपदेश कौन देवे?

01:02:38.000 --> 01:02:45.123
नियमसार (कलश १७५, नियम का सार 
भाग ४ पृष्ठ १३९) में तो वहाँ तक आया कि 
'पुण्य करो' ऐसा पाप का उपदेश कौन करे?

01:02:45.147 --> 01:02:53.954
वो पापी है, ऐसा आया है, आया है, 
क्या करें? आहाहा! सब आगम में है।

01:02:53.978 --> 01:02:58.087
तू तपस्वी है (और) 
पाप का उपदेश करता है? आहाहा!

01:02:58.111 --> 01:03:05.314
तपस्वी होकर? तपस्वी नहीं रहता वो तो। 
'पुण्य करो' वो पाप का उपदेश है।

01:03:05.338 --> 01:03:11.749
आस्रव है न! आस्रव तो दुःख का कारण है 
न (समयसार गाथा ७२)! आहाहा!

01:03:11.773 --> 01:03:17.060
मुमुक्षु: इसलिए आप पुण्य 
करने का उपदेश नहीं देते? आप पुण्य 
करने का उपदेश इसलिए नहीं देते हैं?

01:03:17.084 --> 01:03:24.883
पू. लालचंदभाई: पुण्य का फल दुःख है, 
इसलिए पुण्य का उपदेश देना ही 
नहीं चाहिए विद्वानों को भी।

01:03:24.907 --> 01:03:33.283
ये पर्युषण में जाते हैं न? पुण्यभाव 
आता है। सब विद्यार्थी के लिए मैं 
बोलता हूँ। छोटे-छोटे विद्यार्थी जाते हैं न?

01:03:33.307 --> 01:03:43.243
पुण्य का उपदेश 'पुण्य करो’ 
वीतराग धर्म में 'पुण्य करो’ वो 
पुण्य और पाप दोनों एक ही जाति है।

01:03:43.267 --> 01:03:49.616
ऐसा आया प्रवचनसार (गाथा ७७) में 
तो कि पुण्य और पाप का जो भेद करेगा,

01:03:49.640 --> 01:03:51.598
वो संसार में <b>हिण्डति 
(परिभ्रमण करता) है</b>, ऐसा है न?

01:03:51.622 --> 01:03:54.176
डॉक्टर हुकुमचंद जी भारिल्ल: 
<b>घोर अपार संसार में</b>, ऐसा है।
पू. लालचंदभाई: <b>घोर</b> संसार में,

01:03:54.200 --> 01:04:02.327
<b>अपार संसार में</b>! 
पुण्य और पाप एक जाति है, 
आस्रवतत्त्व है भैया। व्यवहारनय से भेद है।

01:04:02.351 --> 01:04:03.007
डॉक्टर हुकुमचंद जी भारिल्ल: हिन्दी अनुवाद में

01:04:03.031 --> 01:04:08.332
<b>पुण्य और पापमें अन्तर नहीं है ऐसा 
जो नहीं मानता, वह मोहाच्छादित होता हुआ 
घोर अपार संसारमें परिभ्रमण करता है।</b>

01:04:08.356 --> 01:04:11.829
पू. लालचंदभाई: हाँ! बोलो! पंडित जी 
ने कहा <b>घोर संसार</b> में।

01:04:11.853 --> 01:04:17.394
मुमुक्षु: पुण्य-पाप में अन्तर नहीं है, 
जो न माने बात यह, संसार सागर में भ्रमे ...

01:04:17.418 --> 01:04:22.118
पू. लालचंदभाई: आहाहा! बोलो! 
<b>घोर संसार में हिण्डति</b>, 
घोर संसार में भटकते हैं।

01:04:22.142 --> 01:04:28.265
क्योंकि यदि भेद करता है तो पुण्य 
उपादेय लगता है और पाप हेय लगता है।

01:04:28.289 --> 01:04:33.003
वो पुण्य और पाप (तो) समान कक्षा 
से हेय ही हैं, उपादेय नहीं हैं। भैया!

01:04:33.027 --> 01:04:42.385
आता है पुण्यभाव, शुभभाव आता है, 
साधक को भी पाँच महाव्रत का भाव आता है, 
देशव्रती श्रावक को शुभभाव आता है।

01:04:42.409 --> 01:04:46.585
अविरति सम्यग्दृष्टि को भी यात्रा का, 
पूजा का शुभभाव आता है।

01:04:46.609 --> 01:04:52.949
कर्ता नहीं है, ये ध्यान रखना, 
कर्ता नहीं है, कर्ता तो ज्ञान (का) है

01:04:52.973 --> 01:05:02.385
शुभभाव आता है, उसको जानता है (अर्थात्) 
उसके लक्ष बिना जनित (जानने में आ) 
जाता है। ऐसी चीज है, अभय कुमार जी!

01:05:02.409 --> 01:05:08.820
मुमुक्षु: बहुत सरस खुलासा! 
यहाँ अशुभभाव से बचने के 
लिए शास्त्रों में भी ऐसा उपदेश है न

01:05:08.844 --> 01:05:12.078
कि भगवान की पूजा करना चाहिए, 
दर्शन करना चाहिए।

01:05:12.102 --> 01:05:14.540
पू. लालचंदभाई: उपदेश कथन तो ऐसा आता है।

01:05:14.564 --> 01:05:20.367
उपदेश कथन तो बहुत तरीके के हैं 
मगर सिद्धांत पर चले जाना। समझे?

01:05:20.391 --> 01:05:24.340
मुमुक्षु: उपदेश कथन में तो ऐसा 
कह सकते हैं न कि पाप से छुड़ाना? 
पू. लालचंदभाई: कहवें,

01:05:24.364 --> 01:05:35.349
कोई-कोई कहवें, 
हम तो नहीं कहनेवाले हैं। 
हमारी बात साथ-साथ नहीं करना।

01:05:35.373 --> 01:05:41.909
डॉक्टर हुकुमचंद जी भारिल्ल: 
उपदेश कथन जिनवाणी में ही तो आता है? 
पू. लालचंदभाई: हाँ! ठीक है, आता है।

01:05:41.933 --> 01:05:48.296
कोई अकेला पाप पर चला गया 
(तो) 'भाई पाप छोड़कर पुण्य कर’ 
ऐसा भी कहा जाता है।

01:05:48.320 --> 01:05:52.554
कोई माँस खाता है (तो) 
'माँस खाना छोड़ दे, आलू खा ले'।

01:05:52.578 --> 01:06:02.478
अरे! क्या कहा? वो कथन की पद्धति 
और व्यक्ति, वो व्यक्तिपरक उपदेश है।

01:06:02.502 --> 01:06:08.665
और समष्टिगत उपदेश में 
पुण्य-पाप करने की बात है ही 
नहीं वीतराग वाणी में। आहाहा!

01:06:08.689 --> 01:06:16.314
व्यक्तिगत उपदेश अलग है, 
जब कोई ऐसा तर्क पुस्तक में लिखे, 
(तो) वो सिद्धांत नहीं बन जाता है।

01:06:16.338 --> 01:06:23.154
मुमुक्षु: ऐसा एक प्रश्न भी है 
कि साधक के जीवन में चरणानुयोग 
की उपयोगिता किस प्रकार होती है?

01:06:23.178 --> 01:06:28.336
पू. लालचंदभाई: इस प्रकार होती है कि 
जो भेदज्ञान में जितनी-जितनी स्थिरता 
होती है उतना तो वीतरागभाव है।

01:06:28.360 --> 01:06:34.812
मगर अस्थिरता होती है उतना रागभाव भी, 
व्रतादि का भाव (भी) आता है।

01:06:34.836 --> 01:06:40.216
चरणानुयोग में शुद्धता और अशुद्धता 
ये साथ-साथ में दोनों रहती हैं।

01:06:40.240 --> 01:06:48.692
चरणानुयोग सम्यग्दृष्टि को लागू पड़ता है, 
मिथ्यादृष्टि को चरणानुयोग कहाँ है? आहाहा!

01:06:48.716 --> 01:06:52.652
मुमुक्षु: थोड़ा खुलासा करो।

01:06:52.676 --> 01:07:01.865
पू. लालचंदभाई: सम्यग्दृष्टि बनने के 
बाद उसका जो आचरण होता है वो 
गुणस्थान की परिपाटी के अनुसार ही होता है।

01:07:01.889 --> 01:07:08.789
उससे विपरीत भाव उसको आता ही 
नहीं है। गुणस्थान की परिपाटी 
प्रमाण में अशुभ और शुभ आता है।

01:07:08.813 --> 01:07:14.154
ऊपर में शुभ आता है; 
(नीचे) शुभाशुभ आते हैं और बाद में 
ऊपर में अकेला शुभ आता है।

01:07:14.178 --> 01:07:23.016
ऐसे जैसे-जैसे आत्मा में विज्ञानघन 
स्वभाव होता जाता है, उतनी स्थिरता बढ़ती 
है और अस्थिरता में भी ऐसा ही आता है।

01:07:23.040 --> 01:07:29.576
चारणानुयोग में (जैसा) लिखा हैं न, 
वैसा ही भाव आता है। इससे 
उतरता (हीन) भाव नहीं है।

01:07:29.600 --> 01:07:35.865
इसका अर्थ ये है कि 
ये शुभभाव है तो चारित्र है, ऐसा नहीं है। 
वहाँ नजर जाती है सबकी।

01:07:35.889 --> 01:07:44.625
बाहर का चारित्र देखकर वो उसको 
आहाहा! क्या कहे! 
आहाहा! साधक मान लेता है।

01:07:44.649 --> 01:07:56.132
बाहर के चारित्र का, कषाय की मंदता 
देखकर उसको चारित्रवान मानते हैं। 
वो अलग बात है, वो बात ऐसी नहीं है। आहाहा!

01:07:56.156 --> 01:08:04.483
ऐसे तो ये ग्यारह अंग का पाठी मुनि 
हो गया, दिगम्बर मुनि, नौवें ग्रेवेयक भी 
जाता है तो कषाय की मंदता कितनी है।

01:08:04.507 --> 01:08:10.167
तो क्या चरणानुयोग अनुसार चारित्र है 
उसका?

01:08:10.191 --> 01:08:14.447
मुमुक्षु: उसको तो चरणानुयोग मानना चाहिए। 
द्रव्यानुयोग नहीं है उसके पास, चरणानुयोग है।

01:08:14.471 --> 01:08:19.047
पू. लालचंदभाई: आत्मा तो है कि नहीं 
उसके पास? आत्मा ही द्रव्यानुयोग है। 
मुमुक्षु: हाँ जी।

01:08:19.071 --> 01:08:22.412
पू. लालचंदभाई: आत्मा का लक्ष करने से 
वो भेदज्ञान होता है

01:08:22.436 --> 01:08:29.163
तो उसमें चारित्र की स्थिरता का, 
अस्थिरता के भाव का ज्ञान हो जाता है। 
आहाहा!

01:08:29.187 --> 01:08:34.976
चारित्र, भैया, सम्यग्दर्शन के 
बिना निश्चय-चारित्र नहीं है 
और व्यवहार-चारित्र नहीं है।

01:08:35.000 --> 01:08:40.149
कषाय की मंदता कहो मिथ्यात्व 
दृढ़ करने के लिए, बस! इतना कहो।

01:08:40.173 --> 01:08:48.692
मुमुक्षु: मिथ्यात्व दृढ़ करने के लिए? 
पू. लालचंदभाई: हाँ! कर्ताबुद्धि पड़ी है न? 
उससे धर्म मानता है न? आहाहा!

01:08:48.716 --> 01:08:54.856
आहिस्ता-आहिस्ता धर्म हो जायेगा। आहाहा! 
अफ़ीम खाते-खाते, आहाहा! डकार आयेगी मीठी।

01:08:54.880 --> 01:08:57.892
ऐसा होगा कभी? 
मुमुक्षु: कभी नहीं!

01:08:57.916 --> 01:09:09.218
पू. लालचंदभाई: हो गया टाइम। 
जिनवाणी स्तुति।