﻿WEBVTT

00:01:11.728 --> 00:01:18.180
मुमुक्षु: साहेब जो आज सुबह
के प्रवचन में एक, दो, तीन बोल आए,

00:01:18.204 --> 00:01:24.842
वहाँ तक तो बंध-मोक्ष का प्रश्न नहीं
लेकिन उसके बाद किस तरह से चूक हो जाती है

00:01:24.866 --> 00:01:34.100
(उसका) विशेष प्रकार से
चारों बोल का वर्णन कीजिए।

00:01:34.124 --> 00:01:43.700
पू. लालचंदभाई: सुबह में ऐसी बात आई थी।
हिन्दी में थोड़ा। हिन्दीवाले आए हैं ना।

00:01:43.724 --> 00:01:55.353
ये आत्मा है न वो ज्ञानमयी है, तो
ज्ञान में से ज्ञान प्रगट होता है। क्या कहा?

00:01:55.377 --> 00:02:03.668
आत्मा ज्ञानमयी होने से
ज्ञान में से ज्ञान प्रगट होता है।

00:02:03.692 --> 00:02:10.966
ज्ञानमयी होने से उसमें से राग प्रगट
नहीं होता है, ज्ञान प्रगट होता है।

00:02:10.990 --> 00:02:21.891
ज्ञान यानि उपयोग लक्षण जो है जो
(तत्त्वार्थ) सूत्र जी (अध्याय २ सूत्र ८) में
कहा है, ऐसा ज्ञान में से ज्ञान प्रगट होता है।

00:02:21.915 --> 00:02:31.562
दो बातें हो गईं। एक तो ज्ञान
यानि ज्ञानमयी आत्मा है, उसमें से
एक ज्ञान की पर्याय प्रगट होती है।

00:02:31.586 --> 00:02:36.504
ठीक है?
उसमें से राग प्रगट नहीं होता है।

00:02:36.528 --> 00:02:46.948
आत्मा के आश्रय से राग उत्पन्न नहीं होता है
और राग आत्मा को प्रसिद्ध नहीं करता है

00:02:46.972 --> 00:02:58.851
और राग आत्मा में अभेद नहीं होता है;
इसलिए राग तो भिन्न तत्त्व है।
ज्ञान की जाति नहीं है उसमें।

00:02:58.875 --> 00:03:10.068
ज्ञान का निशान राग में नहीं है,
नहीं है निशानी उसमें, ऐसा है;
(राग में) पुद्गल की निशानी है।

00:03:10.092 --> 00:03:20.891
इसलिए आत्मा ज्ञान है और ज्ञान में
से ज्ञान उपयोग प्रगट होता है;
ज्ञान की क्रिया होती है, जानन-क्रिया।

00:03:20.915 --> 00:03:25.508
दो बात हुईं। दो बात हो गईं ना?

00:03:25.532 --> 00:03:38.415
अभी एक तीसरी बात कि
अनंतकाल से ऐसा उसको लक्ष में
नहीं आता है कि ज्ञान प्रगट होता है

00:03:38.439 --> 00:03:49.451
और ज्ञान में आबाल-गोपाल सबको
भगवान आत्मा जानने में आता है - ऐसा
श्रद्धान-ज्ञान उसको उत्पन्न नहीं हुआ है।

00:03:49.475 --> 00:03:56.295
इसलिए पर के लक्ष से जो राग उत्पन्न
होता है, (वो) कर्म-आश्रित राग है,

00:03:56.319 --> 00:04:01.900
पुद्गल-आश्रित राग है, कर्म के उदय
में उसकी परिणति जुड़ जाती है।

00:04:01.924 --> 00:04:11.433
तो ये अनादि से राग भी उत्पन्न होता है,
पराश्रित राग उत्पन्न होता है
और स्वाश्रित ज्ञान प्रगट होता है।

00:04:11.457 --> 00:04:13.428
तीन बातें हो गईं।

00:04:13.452 --> 00:04:21.828
जो राग प्रगट न हो तो-तो सिद्ध
परमात्मा होना चाहिए (मगर) ऐसा तो है नहीं।

00:04:21.852 --> 00:04:30.624
और जो उपयोग प्रगट न हो तो-तो
आत्मा जड़ हो जाए। जड़ भी नहीं
हुआ और सिद्ध भी नहीं है अभी।

00:04:30.648 --> 00:04:39.522
इसलिए पराश्रित राग प्रगट होता है (वो
भी) अपने दोष से, कर्म के उदय से नहीं।

00:04:39.546 --> 00:04:50.006
अपनी जो ज्ञाता-द्रष्टा उदासीन अवस्था (है)
उसको समय-समय पर वो (जीव) त्याग करता
है और मैं रागी हूँ - ऐसा राग उत्पन्न होता है।

00:04:50.030 --> 00:04:56.282
मैं देह हूँ, देह मेरा है,
तो राग उत्पन्न होगा।
पर में मेरेपने की मान्यता।

00:04:56.306 --> 00:05:09.135
तीन बातें, वहाँ तक तो ठीक।
मगर जब राग ज्ञान की स्वच्छता में
दिखाई देता है, तो वहाँ भूल (कर) जाता है।

00:05:09.159 --> 00:05:15.868
प्रतिभास उसका हुआ, प्रतिभास तो
ज्ञायक का भी है और राग का भी है

00:05:15.892 --> 00:05:26.104
मगर वो भूलता है 'मैं रागी हूँ, मैं रागी हूँ',
जो इंद्रियज्ञान में जानने में आया,
ज्ञान का अज्ञान कर लेता है।

00:05:26.128 --> 00:05:32.837
उपयोग तो है, वो उपयोग
शुद्धोपयोग नहीं है, स्वच्छ है;

00:05:32.861 --> 00:05:40.686
शुद्धोपयोग जैसा चतुर्थ गुणस्थान में,
चौथे गुणस्थान (में) प्रगट होता है,
वैसा शुद्धोपयोग नहीं है, उपयोग है।

00:05:40.710 --> 00:05:45.446
तो उस उपयोग में झलक है उसकी,
राग की, देह की झलक तो आती है।

00:05:45.470 --> 00:05:50.655
तो लक्ष है राग पर,
लक्ष ज्ञायक पर नहीं है;

00:05:50.679 --> 00:05:58.460
स्व पर लक्ष नहीं है, पर ऊपर लक्ष है,
तो 'मैं रागी’
तो मिथ्यात्व श्रद्धा का दोष हो गया।

00:05:58.484 --> 00:06:05.220
राग चारित्र का दोष था, मगर
उसमें plus (जोड़) कर दिया कि राग;

00:06:05.244 --> 00:06:15.855
तो मैं जाननहार हूँ, मैं ज्ञानमयी हूँ
- वो भूल गया, तो मिथ्यात्व का दोष
हो गया - राग का राग उत्पन्न हो गया।

00:06:15.879 --> 00:06:22.264
सम्यग्दृष्टि को राग तो उत्पन्न होता है
मगर रागी नहीं होता है।

00:06:22.288 --> 00:06:29.517
'मैं रागी हूँ' ऐसी भ्रांति (नहीं होती है),
मैं तो ज्ञाता हूँ, राग को जानता हूँ

00:06:29.541 --> 00:06:36.815
(मगर) राग मेरा नहीं है,
मैं तो जाननहार हूँ,
तो मिथ्यात्व का दोष नहीं लगता (है) उसको।

00:06:36.839 --> 00:06:41.331
मगर राग उत्पन्न होता है तो
चारित्र का दोष तो लगता है।

00:06:41.355 --> 00:06:53.322
चारित्र का दोष गौण है, सचमुच (तो)
अनंत दु:ख का कारण एक मिथ्यात्व
भाव है, श्रद्धा का दोष, बस।

00:06:53.346 --> 00:06:59.957
जानने के समय भूल गया;
दो चीजें जानने में आती हैं;

00:06:59.981 --> 00:07:06.188
परंतु अनंतकाल से लक्ष पर ऊपर (है),
निमित्त पर (है) तो 'मैं रागी'
ऐसी भ्रांति हो गई।

00:07:06.212 --> 00:07:15.864
श्री गुरु मिले, अरे! तू तो जाननहार है,
राग तो तेरा भाव ही नहीं है,
सचमुच राग तेरा परिणाम भी नहीं है।

00:07:15.888 --> 00:07:21.206
तेरा परिणाम तो तेरे साथ अनन्य है,
जो उपयोग वो तेरा परिणाम है।

00:07:21.230 --> 00:07:27.642
राग तो अन्य जाति का है,
तेरे आश्रय से नहीं होता है,
राग तेरे को प्रसिद्ध नहीं करता है

00:07:27.666 --> 00:07:32.193
और राग आत्मा में अभेद नहीं होता है;
तीन बात हैं।

00:07:32.217 --> 00:07:40.940
तो वो उसको जुदाई ख्याल में आ गई
तो भेदज्ञान हो गया, ज्ञानी हो गया,
तो जाननहार रहा राग का।

00:07:40.964 --> 00:07:49.828
राग रहा, मगर राग के अंदर
ममत्वभाव छूट गया, संसार गया।

00:07:49.852 --> 00:08:54.292
थोड़े टाइम राग रहेगा उसका भी अभाव
हो जाएगा, आत्मा के आश्रय से स्वरूप
में लीन होगा (तब)। वहाँ भेदज्ञान है।

00:08:54.316 --> 00:09:08.020
मुमुक्षु: क्या उपयोग लक्षण जुदा है?
और जिसमें स्व-पर का प्रतिभास होता है
ऐसा ज्ञान जुदा है?

00:09:08.044 --> 00:09:11.815
पू. लालचंदभाई: नहीं, एक ही ज्ञान है,
ज्ञान की पर्याय एक प्रगट होती है,

00:09:11.839 --> 00:09:18.775
जिसमें स्व-पर का प्रतिभास (होता है),
उपयोग जुदा नहीं है,
उपयोग आत्मा से अनन्य है।

00:09:18.799 --> 00:09:23.966
मगर उपयोग आत्मा से अनन्य है,
ऐसा कहाँ श्रद्धान है उसको?

00:09:23.990 --> 00:09:30.535
'मैं राग से अनन्य, दु:ख से अनन्य हूँ'
उसका नाम अज्ञान है।

00:09:30.559 --> 00:09:38.642
उपयोग जो लक्षण है
वो आत्मा से अनन्य है - ऐसा पाठ है।

00:09:38.666 --> 00:09:48.757
ज्ञान में से ज्ञान आता है, उपयोग
प्रगट होता है तो वो अनन्य है,
उसमें स्वपरप्रकाशक है, स्वभाव;

00:09:48.781 --> 00:10:00.326
ऐसा पंचास्तिकायसंग्रह गाथा नंबर १२१,
उसमें लिखा है कि
स्वपरप्रकाशक ज्ञप्ति ऐसा लक्षण है।

00:10:00.350 --> 00:10:11.211
एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय,
चार इंद्रिय वो लक्षण नहीं है,
वो तो जड़ है, द्रव्येन्द्रिय तो जड़ है।

00:10:11.235 --> 00:10:14.895
उपयोग जुदा और
स्वपरप्रकाशक पर्याय जुदी - ऐसा नहीं है।

00:10:14.919 --> 00:10:20.637
एक ही पर्याय जिसका उपयोग नाम है
उसमें ही स्वपरप्रकाशक है।

00:10:20.661 --> 00:10:29.611
जैसे दर्पण की एक ही पर्याय है,
स्वच्छ पर्याय एक ही है।
क्या दर्पण से भिन्न है वो?

00:10:29.635 --> 00:10:34.917
जैसे कोयला भिन्न है, मोर भिन्न है ऐसे
(क्या) उसकी स्वच्छता (भी) भिन्न है?

00:10:34.941 --> 00:10:39.451
नहीं! वो तो अभिन्न है,
अनन्य है, एक ही पर्याय है।

00:10:39.475 --> 00:10:48.131
उसमें दो प्रतिभासित होते हैं - दर्पण का
दल भी प्रतिभासित होता है और बाह्य
पदार्थ का भी प्रतिभास होता है, झलक।

00:10:48.155 --> 00:10:55.686
प्रतिभास कहो या झलक कहो,
एक ही बात है। वहाँ भेदज्ञान है।

00:10:55.710 --> 00:11:05.140
अग्नि प्रतिभासित होती है तो
क्या दर्पण गरम हो गया? ऐसा नहीं है।

00:11:05.164 --> 00:11:10.033
मुंबई में ऐसा बनाव बन गया,
मुंबई में ऐसा बनाव बना।

00:11:10.057 --> 00:11:15.117
एक बड़ा दर्पण था और सर्दी का समय था।

00:11:15.141 --> 00:11:21.197
माताजी ने थोड़ी सिगड़ी वहाँ रखी थी,
भाप उसमें से निकलती थी।

00:11:21.221 --> 00:11:26.664
वो बालक आया,
वो દફતર (झोला) होता है,
उसको रखा या न रखा।

00:11:26.688 --> 00:11:32.620
 बालक: 'माताजी-माताजी!
ये दर्पण जलता है, पानी छिड़क जल्दी'।

00:11:32.644 --> 00:11:37.437
माता: ऐसा कर कि तू पानी छिड़क जरा,
तो (आग) बुझ जाएगी।

00:11:37.461 --> 00:11:40.380
तो उसने (बालक ने) छोटा डिब्बा,
बाल्टी तो उठा सके नहीं,

00:11:40.404 --> 00:11:48.531
छोटा डिब्बा समझे ना?
tumbler (गिलास) छोटा डिब्बा
(से पानी) दर्पण पर छिड़का।

00:11:48.555 --> 00:11:56.255
बालक: मम्मी-मम्मी ये आग बुझती नहीं है।
मेरा ये साधन छोटा है,
तू बड़ी बाल्टी लेकर छिड़क।

00:11:56.279 --> 00:12:00.540
तो वो (बालक) तो समझे नहीं,
समझाये तो भी समझे नहीं
कि उसमें आग नहीं है,

00:12:00.564 --> 00:12:06.406
आग भिन्न है और दर्पण की
स्वच्छता भिन्न है, समझे ही नहीं।
समझाओ तो भी समझे नहीं!

00:12:06.430 --> 00:12:08.171
Practical (प्रयोग) करना चाहिए ना।

00:12:08.195 --> 00:12:15.024
तो उसने (माता ने) बालक को समझाने
के लिए बाल्टी उठाकर पानी छिड़काया।

00:12:15.048 --> 00:12:22.962
बालक: मम्मी अभी ये सारा फ्लैट
अपना जल जाएगा।
माता: कि नहीं जलेगा।

00:12:22.986 --> 00:12:28.908
बालक: अरे! शांति से जवाब देती है,
फोन नहीं करती है।
पापा को फोन कर जल्दी।

00:12:28.932 --> 00:12:40.166
माता: शांति रख! शांति रख!
तो उसने (माता ने) बालक को कहा
कि तेरा हाथ (दर्पण पर) लगा, लगा दे।

00:12:40.190 --> 00:12:46.277
बालक: नहीं! मैं जल जाऊँगा।
मैं हाथ नहीं लगाऊँगा, तू लगा।

00:12:46.301 --> 00:12:52.660
तो उसने (माता ने) हाथ लगाया।
ऐसा-ऐसा (दर्पण में) हाथ किया (तो)
उसको (बालक को) शंका पड़ गई।

00:12:52.684 --> 00:13:03.113
बस! शंका पड़ी इतना फेर है।
शंका पड़े तो काम हो जाएगा।

00:13:03.137 --> 00:13:07.131
समझ में आये दृष्टांत तो, ऐसी चीज है।

00:13:07.155 --> 00:13:14.175
बालक: हाँ! कुछ है,
मेरी कुछ गलती लगती है (क्योंकि)
माता जी का हाथ जलता नहीं है।

00:13:14.199 --> 00:13:23.273
माता: तो अभी तू तेरा हाथ लगा।
बालक: मैं हाथ नहीं लगाऊँ, मैं तो
जरा अँगुली से पहले test (जाँच) करूँगा।

00:13:23.297 --> 00:13:27.473
माता: कोई परेशानी नहीं, अँगुली लगाओ।

00:13:27.497 --> 00:13:33.157
बालक: माताजी वो तो शीतल लग रहा है,
यह अग्नि इसमें है तो भी शीतल लगता है।

00:13:33.181 --> 00:13:37.091
माता: कि अग्नि इसमें नहीं है!
वो तेरी गलती है, भ्रम है।

00:13:37.115 --> 00:13:42.028
अग्नि अग्नि में है
और स्वच्छता स्वच्छता में है।
तो अब तो हाथ लगाओ।

00:13:42.052 --> 00:13:47.748
(बालक ने) हाथ लगाया,
पूरा हाथ बाद में (लगाया)।
बालक: आहाहा! ये तो शीतल है।

00:13:47.772 --> 00:13:53.700
स्वच्छ और शीतल, ऐसा है।

00:13:53.724 --> 00:13:59.215
ऐसे ही उपयोग में राग नहीं आया है;
उपयोग में तो उपयोग है।

00:13:59.239 --> 00:14:06.286
स्वच्छता में जैसे दर्पण है,
ऐसे प्रत्येक जीव को प्रत्येक समय
उपयोग प्रगट होता है

00:14:06.310 --> 00:14:11.460
और उपयोग में ज्ञायक
- भगवान आत्मा जानने में आ रहा है।

00:14:11.484 --> 00:14:16.113
मगर उसका लक्ष निमित्त पर है ना।
आहाहा!

00:14:16.137 --> 00:14:20.313
निमित्त में अहम् बुद्धि करता है;
उपादान को देखता नहीं है।

00:14:20.337 --> 00:14:26.068
उपयोगमयी आत्मा उपादान है;
बाह्य पदार्थ तो निमित्त संयोगरूप हैं।

00:14:26.092 --> 00:14:32.255
तो राग दिखे तो राग मेरा,
क्रोध दिखे तो मैं क्रोधी हो गया,
दुःख दिखे तो मैं दुखी हो गया।

00:14:32.279 --> 00:14:37.922
मनुष्य पर्याय दिखे तो मैं मनुष्य,
तिर्यंच में जन्म हुआ (तो) मैं तिर्यंच हूँ,

00:14:37.946 --> 00:14:47.948
देव में जन्म हुआ (तो) मैं देव हूँ,
मैं देव हूँ (ऐसी) भ्रांति हो गई।
आहाहा! ऐसा है।

00:14:47.972 --> 00:14:56.322
भेदज्ञान की बात है,
कला है भेदज्ञान की।

00:14:56.346 --> 00:15:06.153
मुमुक्षु: ये भ्रांति जल्दी से मिट जाए ना,
ऐसा उपाय बताइए।

00:15:06.177 --> 00:15:10.731
पू. लालचंदभाई: वही उपाय है।
वो ही एक उपाय है कि राग
और देह जानने में ही नहीं आता है।

00:15:10.755 --> 00:15:15.957
जाननहार जानने में आता है,
बस, लक्ष फिर गया।

00:15:15.981 --> 00:15:24.340
लक्ष फेरना है, संयोग को फेरना नहीं है,
राग को टालना नहीं है, देह के
टुकड़े करके अलोक में भेजना नहीं है।

00:15:24.364 --> 00:15:31.744
देह देह में है, राग राग में है,
ज्ञान में आत्मा है। ज्ञान ज्ञान में है।
राग जुदा और ज्ञान जुदा।

00:15:31.768 --> 00:15:34.131
बस! लक्ष छोड़ना पड़े।

00:15:34.155 --> 00:15:45.068
एक बार तो लक्ष छोड़ना पड़े कि
राग और देह और उपकारी गुरु
(भी) जानने में आते नहीं है।

00:15:45.092 --> 00:15:56.020
साक्षात् तीर्थंकर भगवान हों, सामने बैठे हों
(तो भी) तीर्थंकर प्रभु जानने में आते नहीं हैं;
जाननहार जानने में आता है।

00:15:56.044 --> 00:16:04.140
तो लक्ष हट जाएगा वहाँ से,
लक्ष अंदर में आ जाएगा, वो
भ्रांति टालने का एक ही उपाय है।

00:16:04.164 --> 00:16:08.406
दो प्रकार की भ्रांति है - (मैं)
राग का कर्ता और राग का ज्ञाता।

00:16:08.430 --> 00:16:11.575
जो पहले तरह की भ्रांति
अभी चलती है (कि मैं) अकर्ता (हूँ)।

00:16:11.599 --> 00:16:15.557
राग का कर्ता मैं नहीं हूँ,
मैं जाननहार हूँ। समझे?

00:16:15.581 --> 00:16:18.206
तो पचास टका तो जीत हो गई उसकी।

00:16:18.230 --> 00:16:24.700
अभी पचास टका बाकी रह गई
कि राग को मैं जानता हूँ,
राग मेरा ज्ञेय और मैं (उसका) ज्ञाता।

00:16:24.724 --> 00:16:31.735
राग तेरा ज्ञेय नहीं है,
तेरा ज्ञान ही ज्ञेय है,
आत्मा ही तेरा ज्ञेय है।

00:16:31.759 --> 00:16:40.597
वो बेन के भाग में आएगा, वो उसमें
आएगा - गुरुदेव के प्रवचन में आएगा।
कल से वो मिलेगा, वो प्रवचन।

00:16:40.621 --> 00:16:44.184
द्रव्य का निश्चय और पर्याय का निश्चय।

00:16:44.208 --> 00:16:51.055
द्रव्य का निश्चय क्या?
कि आत्मा परिणाम मात्र आत्मा
(से) भिन्न है, आत्मा से भिन्न है;

00:16:51.079 --> 00:16:57.695
और इसलिए परिणाम का कर्ता
आत्मा नहीं है, अकारक है,
अकारक यानि कि जाननहार है।

00:16:57.719 --> 00:17:03.353
अकर्ता यानि ज्ञाता है, ज्ञाता होने से
जाननहार, जाननहार, जाननहार है।

00:17:03.377 --> 00:17:10.851
परिणाम होता है, उसको आत्मा को
जानते-जानते (परिणाम को) जान ले,
बस इतनी ही मर्यादा तेरी है।

00:17:10.875 --> 00:17:20.815
मगर उसको भी पहले जानना
बंद करना पड़ेगा, वो दूसरा पाठ है।
दूसरा पाठ कल से चलेगा।

00:17:20.839 --> 00:17:24.984
अज्ञानी ने अज्ञान से
(बात को) लंबी चौड़ी कर दी है।

00:17:25.008 --> 00:17:32.277
और उसमें हाँ में हाँ मिलानेवाले भी तो हैं
‘हाँ भैया! राग तो आत्मा ही करता है ना,
दु:ख तो आत्मा ही भोगता है ना। आहाहा!

00:17:32.301 --> 00:17:41.717
दूसरे (दुख को) भोगें
तो चार गति ही नहीं रहेगी’।
तो तेरे को चार गति रखना है?

00:17:41.741 --> 00:17:47.935
चार गति जिसको चाहिए वो भले माने कि
दु:ख का भोगता है और राग का कर्ता है।

00:17:47.959 --> 00:17:51.277
और जिसको दु:ख नहीं चाहिए वो कहता है

00:17:51.301 --> 00:17:57.975
'मैं तो अकारक-अवेदक हूँ
और जानने में राग नहीं आता है,
जाननहार जानने में आता है’

00:17:57.999 --> 00:18:07.593
तो उपयोग वहाँ से हटकर,
भेद और निमित्त से हटकर.... राग
भेद है, पर पदार्थ, पर पदार्थ निमित्त हैं।

00:18:07.617 --> 00:18:13.713
निमित्त और नैमित्तिकभाव का लक्ष छोड़कर
अभी ज्ञायक का लक्ष आता है ना,

00:18:13.737 --> 00:18:19.184
तो निमित्त का लक्ष छूटा,
नैमित्तिक का अभाव हो गया
और स्वभाव प्रगट हो जाता है।

00:18:19.208 --> 00:18:25.762
बस! इतनी देर है।
बात तो छोटी है, बात तो छोटी है।

00:18:25.786 --> 00:18:31.611
(जहाँ तक) निमित्त का लक्ष है,
तहाँ तक नैमित्तिक राग प्रगट होता है।

00:18:31.635 --> 00:18:39.260
और निमित्त का लक्ष छूटा,
लक्ष फिर गया (तो) मेरे ज्ञान
में तो ज्ञायक जानने में आता है।

00:18:39.284 --> 00:18:46.522
तो आत्मा का जब लक्ष होता है,
तब वीतरागभाव प्रगट होता है,
राग प्रगट नहीं होता है।

00:18:46.546 --> 00:18:52.002
निमित्त का लक्ष छूटा
(तो) नैमित्तिक मिथ्यात्व भी गया।

00:18:52.026 --> 00:18:57.331
निमित्त, जहाँ (तक) दर्शन मोह का
लक्ष था तो नैमित्तिक मिथ्यात्व था;

00:18:57.355 --> 00:19:01.473
निमित्त का लक्ष छूटने से
नैमित्तिक भाव उत्पन्न ही नहीं हुआ;

00:19:01.497 --> 00:19:06.775
स्वभाव का लक्ष आया
तो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-
सम्यक्चारित्र प्रगट हो गया। बस!

00:19:06.799 --> 00:19:18.771
इतनी छोटी बात है,
लंबी तो बात है ही नहीं।
लक्ष फेरने की बात है, लक्ष फेरे फेर (है)।

00:19:18.795 --> 00:19:29.148
<b>जिनपद निजपद एकता, भेदभाव नहीं कांई;</b>
<b>लक्ष थवाने तेहनो, कह्याँ शास्त्र सुखदायी. </b>
(श्रीमद् राजचन्द्र जी, चैत्र सूद ९, १९५७)

00:19:29.172 --> 00:19:34.571
<b>जिनपद निजपद एकता</b>,
जैसे अरिहंत हैं ना, ऐसा मैं हूँ।

00:19:34.595 --> 00:19:39.686
और अरिहंत के द्रव्य-गुण-पर्याय के
साथ हमारे द्रव्य-गुण-पर्याय
(का) मिलान हो जाता हैं। बोलो!

00:19:39.710 --> 00:19:50.153
ये कैसे? वहाँ तो केवलज्ञान है, इधर तो
केवलज्ञान नहीं है, द्रव्य गुण तो मिलते
हैं मगर पर्याय से तो मिलते नहीं हैं?

00:19:50.177 --> 00:19:53.393
पर्याय से मिल गया, मिलता है।
कि कैसे?

00:19:53.417 --> 00:19:58.531
उनमें जानन, जानन, जानन, जानना,
जानना, जानना। उनकी चेतना में
आत्मा जानने में आता है;

00:19:58.555 --> 00:20:07.642
हमारी ज्ञान-चेतना में भी आत्मा जानने
में आता है, अनुभव में। बस मिल गया
कि नहीं? तो मोह क्षय हो गया।

00:20:07.666 --> 00:20:18.562
<b>जिनपद निजपद एकता, भेदभाव नहीं कांई;
लक्ष थवाने तेहनो, कह्याँ शास्त्र सुखदायी.</b>

00:20:18.586 --> 00:20:34.748
<b>जो निगोद में सो ही मुझमें, सो ही मोक्ष मँझार। </b>
<b>निश्चयभेद कछू भी नाहीं, भेद गिनै संसार॥ </b>
(पंडित बुधजन जी द्वारा भजन, हमको कछु भय ना रे)

00:20:34.772 --> 00:20:41.971
<b>सिद्ध समान सदा पद मेरो</b>
(नाटक समयसार, मंगलाचरण दोहा ११)।
आता है कि नहीं?

00:20:41.995 --> 00:20:51.771
विश्वास नहीं है! अपने
का, ‘मैं कौन हूँ?’ ये विश्वास नहीं है।
मैं रागी हूँ और मैं दु:खी हूँ। आहाहा!

00:20:51.795 --> 00:20:56.166
मैं जयपुरवाला हूँ और मैं
फलाना गाँववाला हूँ। ये गाँव मेरा है।

00:20:56.190 --> 00:21:06.962
तेरा गाँव ही नहीं है और तेरा काम
भी कोई नहीं है। तेरा काम तो तेरे
को जानने का है। कर ले न! आहाहा!

00:21:06.986 --> 00:21:11.664
पर का कर्ता भी नहीं है
और ज्ञाता भी नहीं है।
वो भ्रांति है,

00:21:11.688 --> 00:21:17.411
ऐसा लिखा है कि
<b>मैं ज्ञायक समस्त छह द्रव्य मेरे ज्ञेय</b>
(समयसार कलश टीका, कलश २७१)

00:21:17.435 --> 00:21:21.211
- ये तो भ्रांति
अनादिकाल से चली आ रही है।

00:21:21.235 --> 00:21:25.815
ऐसे ४०० साल पहले राजमल जी हो गए,

00:21:25.839 --> 00:21:30.664
<b>पांडे राजमल जिनधर्मी, समैसार नाटकके मर्मी</b>
(नाटक समयसार, ग्रंथ समाप्ति
और अंतिम प्रशस्ति, गाथा २३)।

00:21:30.688 --> 00:21:37.731
आहाहा! उनके निमित्त से
बनारसीदास जी को आत्मानुभव हो
गया, ऐसे अनुभवी पुरुष हो गए (हैं)।

00:21:37.755 --> 00:21:49.593
उन्होंने लिखा है कि मैं ज्ञाता और
षट् द्रव्य मेरे ज्ञेय ऐसी भ्रांति अनादिकाल
से चालू है। ये (पर) तेरे ज्ञेय ही नहीं हैं।

00:21:49.617 --> 00:22:04.255
हें? ज्ञेय ही नहीं हैं, तेरा ज्ञेय तो तेरा
आत्मा है। तेरा ज्ञेय, ज्ञान से ज्ञेय भिन्न
नहीं होता है; ज्ञान से ज्ञेय अभिन्न होता है।

00:22:04.279 --> 00:22:09.940
आत्मा ही ज्ञान, आत्मा ही ज्ञेय और
आत्मा ही ज्ञाता - ऐसे तीन भेद भी नहीं हैं।

00:22:09.964 --> 00:22:18.344
तो आत्मा ज्ञाता और ये (पर) मेरा ज्ञेय,
ओहोहों! ऐसा तो है ही नहीं।
वो सब व्यवहारनय का कथन है।

00:22:18.368 --> 00:22:29.171
वो व्यवहारनय का कथन अभूतार्थ,
असत्यार्थ जानकर अपनी ओर देख लेना। बस!

00:22:29.195 --> 00:22:35.575
बात तो छोटी है।
बात-बात में बढ़ गई बात,
हमारे प्रेमचंद जी कहते हैं। क्या कहते हैं?

00:22:35.599 --> 00:22:40.886
मुमुक्षु: बढ़ गई बात में बात,
बात तो कुछ भी नहीं थी।

00:22:40.910 --> 00:22:44.100
पू. लालचंदभाई: बात-बात में बढ़ गई बात,
बात तो कुछ (भी नहीं थी)।

00:22:44.124 --> 00:22:48.100
एक (बार) दो बालक झगड़ा करते थे।
समझ गए?

00:22:48.124 --> 00:22:54.042
तो दोनों के सगेवाले आए कि क्या है?
लड़के छूटा (करा)।

00:22:54.066 --> 00:22:59.046
लड़ाई बंद करो, क्योंकि आज
तुम लड़ाई करते हो कल को
मिलकर साथ में खाएंगे। समझ गए?

00:22:59.070 --> 00:23:04.935
तो वे कोई माने नहीं, उसमें बात बढ़ गई,
दोनों दल लड़ने लगे,
झगड़ने लगे, सिर फूट गए।

00:23:04.959 --> 00:23:10.428
बाद मे सब ने पूछा कि क्या था?
कि ये तो दो बालक झगड़ा करते थे
उसमें बड़ा झगड़ा हो गया।

00:23:10.452 --> 00:23:22.375
कि बात तो कुछ नहीं थी मगर बढ़ गई बात।
मुमुक्षु: सिद्धांत?

00:23:22.399 --> 00:23:25.135
पू. लालचंदभाई: सिद्धांत ये है कि
जाननहार जानने में आता है

00:23:25.159 --> 00:23:33.695
और मानता है कि मुझे पर जानने में
आता है; जाननहार है उसकी जगह
मानता है कि मैं राग का कर्ता हूँ। आहाहा!

00:23:33.719 --> 00:23:39.286
राग का कर्ता, जड़कर्म का कर्ता,
कर्म को मैं बाँधता हूँ, ८ कर्म को।

00:23:39.310 --> 00:23:45.157
इतने शास्त्र लिखे हैं ना,
वो संयोग का ज्ञान कराने के लिए हैं।

00:23:45.181 --> 00:23:54.322
वो संयोग का ज्ञान कराते हैं, जब आत्मा
को भूल जाता है आत्मा, अज्ञानी बनता
है तो अज्ञान के निमित्त से ८ कर्म बंधते हैं।

00:23:54.346 --> 00:24:03.006
वो कर्म उदय में आते हैं (और) भेदज्ञान
का अभाव है (तो) फिर से वो वहाँ लक्ष
करता है तो चक्र चलता है संसार का। आहाहा!

00:24:03.030 --> 00:24:05.526
संसार-चक्र कट जाता है (कैसे)?

00:24:05.550 --> 00:24:18.002
मैं तो जाननहार हूँ, जाननहार होने से
जाननहार जानने में आता है, आ जाओ
अंदर, इधर (स्व में) आ जाओ। आहाहा!

00:24:18.026 --> 00:24:26.042
ज्ञाता को कर्ता मानने (से)
मुश्किल है बहुत। आहाहा!
ज्ञाता ही है, कर्ता नहीं है।

00:24:26.066 --> 00:24:36.108
दिन में दस बार तो ऐसा विचार करना
'मैं ज्ञाता हूँ, कर्ता नहीं हूँ'।
बाद में 'ज्ञाता ही हूँ’ बस।

00:24:36.132 --> 00:24:39.900
अभी ज्ञाता किसका?
कि ज्ञायक का।

00:24:39.924 --> 00:24:44.193
ज्ञाता का अर्थ कहेंगे जाननहार, तो
(ऐसा मानता है कि) जैसे पर को जानता होगा।

00:24:44.217 --> 00:24:52.455
इसमें (पूज्य गुरुदेवश्री का प्रवचन)
आएगा सब, सब इसमें लिखा है।
पढ़कर आना।

00:24:52.479 --> 00:25:07.264
कल से बेन का चलेगा,
तबियत के कारण से।

00:25:07.288 --> 00:25:14.002
सुबह में द्रव्य का निश्चय चलता है,
पर्याय का निश्चय कल से दोपहर में चलेगा;

00:25:14.026 --> 00:25:19.948
ज्ञान की पर्याय का निश्चय
और द्रव्य का निश्चय।

00:25:19.972 --> 00:25:27.873
द्रव्य का निश्चय ऐसा है कि
उत्पाद-व्यय से रहित
ध्रुव परमात्मा जो ध्येय है, वो मैं हूँ।

00:25:27.897 --> 00:25:37.606
उत्पाद-व्यय नाशवान, वो मैं नहीं हूँ,
इसलिए कर्ता नहीं हूँ - द्रव्य का निश्चय।
आहाहा!

00:25:37.630 --> 00:25:42.913
सुबह में ध्येय की बात चलेगी,
दोपहर में चलेगी ज्ञेय की बात।

00:25:42.937 --> 00:25:48.584
ज्ञान की पर्याय का व्यवहार
और ज्ञान की पर्याय का निश्चय।

00:25:48.608 --> 00:25:52.077
ज्ञान की पर्याय का व्यवहार
दो प्रकार का है।

00:25:52.101 --> 00:26:00.424
एक (तो) 'मैं पर को जानता हूँ' ज्ञान में
आया, वो व्यवहार है; और ज्ञान में
स्वपरप्रकाशक है वो भी व्यवहार हो गया।

00:26:00.448 --> 00:26:10.504
ज्ञान की पर्याय में ज्ञायक ही जानने में
आता है, पर जानने में आता नहीं है
तो अनुभव हो जाता है। दो ही बात हैं।

00:26:10.528 --> 00:26:20.175
वो दो बात ३२० गाथा में हैं, (जो अभी)
चलता है। और अंत में २७१ कलश
है उसमें, उसमें वही बात है।

00:26:20.199 --> 00:26:24.220
उन राजमल जी की टीका के
ऊपर गुरुदेव का प्रवचन (चलता है)।

00:26:24.244 --> 00:26:29.624
ये समयसार (कलश) २७१ पर प्रवचन है,
कलश तो (समयसार में और
कलश टीका में) एक ही है।

00:26:29.648 --> 00:26:48.340
तो इसमें (समयसार कलश २७१ पर प्रवचन
में) ज्यादा माल है, इसलिए छपाया।

00:26:48.364 --> 00:26:52.424
मुमुक्षु का लिखित प्रश्न:
क्या सिद्ध पर्याय में उपयोग है?

00:26:52.448 --> 00:26:59.717
पू. लालचंदभाई: अभी जो
क्षायिकभाव हो गया ना, क्षायिकभाव,
उपयोग का सदुपयोग हुआ।

00:26:59.741 --> 00:27:04.433
तो उपयोग लक्षण नहीं है
(बल्कि वो) क्षायिक हो गया, बस।

00:27:04.457 --> 00:27:08.984
लक्षण-लक्ष्य का भेद था
वहाँ तक उपयोग था।

00:27:09.008 --> 00:27:13.748
जब उपयोग अंदर में जाता है
तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:27:13.772 --> 00:27:22.402
भेद अपेक्षा से उपयोग है,
अभेद अपेक्षा से तो आत्मा है।
मुमुक्षु: समझ में नहीं आया।

00:27:22.426 --> 00:27:35.735
पू. लालचंदभाई: लक्ष्य और लक्षण,
जो भेद करने में आए तो आत्मा लक्ष्य है
और उपयोग उसका लक्षण है, भेद से।

00:27:35.759 --> 00:27:45.162
मगर जो उपयोग आत्मा में लग जाता है,
एकाग्रता हो जाती है
तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:27:45.186 --> 00:27:57.828
उपयोग+शुद्धोपयोग और शुद्धोपयोग+आत्मा।

00:27:57.852 --> 00:28:06.384
क्या कहा? उपयोग जो आत्मा में लगे
तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:28:06.408 --> 00:28:14.313
तो+(plus) हो गया कि नहीं थोड़ा, बढ़ा कि
नहीं? पहले 'शुद्ध' शब्द नहीं लगाया था,
उपयोग लक्षण (शब्द) लगाया था।

00:28:14.337 --> 00:28:23.828
बाद में उस उपयोग का सदुपयोग हुआ,
सदुपयोग यानि उपयोग जिसका है
उसको जानने में लग गया कि नहीं?

00:28:23.852 --> 00:28:26.735
ऐसा (पर द्रव्य में) जो चिपक गया (था),
(अब) ऐसा (अंदर) आ गया।

00:28:26.759 --> 00:28:38.717
तो उपयोग+शुद्धोपयोग हो गया कि नहीं?
और शुद्धोपयोग+आत्मा हो गया, क्योंकि
शुद्धोपयोग और आत्मा अनन्य है, अभेद है।

00:28:38.741 --> 00:28:43.957
अभेदनय से वो आत्मा है
इसलिए सिद्ध पर्याय में क्षायिकभाव है;

00:28:43.981 --> 00:28:54.375
क्षायिकभाव नहीं है वो तो आत्मा ही है;
क्षायिकभाव से समझाया जाता है।
आहाहा! आत्मा हो गया।

00:28:54.399 --> 00:29:02.468
ऐसे निर्विकल्पध्यान के काल में भी
श्रुतज्ञान और आत्मा जुदा नहीं हैं,

00:29:02.492 --> 00:29:08.908
श्रुतज्ञान से आत्मा अनन्य है तो सारा
आत्मा ज्ञेय हो जाता है, अभेद-ज्ञेय।

00:29:08.932 --> 00:29:16.562
जैसे अभेद-ध्येय है अनंत गुण
का पिंड, ऐसे परिणाम अंदर में
गया (तो) अभेद हो जाता है।

00:29:16.586 --> 00:29:20.966
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के
परिणाम आत्मा से भिन्न हैं कि अभिन्न?

00:29:20.990 --> 00:29:27.166
ऐसा प्रश्न आया। कि अभिन्न हैं।
सम्यग्दर्शन आत्मा से भिन्न है कि अभिन्न?

00:29:27.190 --> 00:29:33.104
कि अभिन्न है, आत्मा है,
सम्यग्दर्शन नहीं रहा।
अरे! सम्यग्दर्शन नहीं रहा?

00:29:33.128 --> 00:29:40.766
इस ज्ञान ... का भेद दिखाई नहीं देता है,
अभेद में भेद दिखाई देता नहीं है।

00:29:40.790 --> 00:29:51.255
श्रीपालजी, समझ में आया?
भेद से समझाया जाता है पर भेद
में पड़ता नहीं है, वो तो अभेद है।

00:29:51.279 --> 00:30:02.233
शिष्य को अभेद में भेद कल्पना करके
समझाया जाता है कि सोना किसको
कहें? कि पीला सोना, चिकना सोना।

00:30:02.257 --> 00:30:05.046
क्या चिकना और पीला उसमें से निकल गया?

00:30:05.070 --> 00:30:14.766
भेद कल्पना से जो सोने को नहीं जानता है
उसको अभेद में भेद, ऐसा व्यवहार
करके समझाया जाता है।

00:30:14.790 --> 00:30:17.157
परंतु भेद, इसमे टुकड़े नहीं होता है।

00:30:17.181 --> 00:30:48.380
ऐसे उपयोग, शुद्धोपयोग आहाहा!
बाद में तो आत्मा हो गया। आहाहा!

00:30:48.404 --> 00:31:26.308
यह आपका काम है।
कैसेट के बारे में प्रश्न है-जानकारी।
वो जाहिर करेंगे।

00:31:26.332 --> 00:31:33.428
बाकी तो गुरुदेव ने बहुत खुलासा कर
दिया है, (प्रवचन रत्नाकर के) ११ भागों में।
९००० तो टेप हैं।

00:31:33.452 --> 00:31:44.313
थोड़ा समय निकालकर अपना हित करने के
लिए घंटा, दो घंटा स्वाध्याय-चिंतवन-मनन

00:31:44.337 --> 00:31:51.642
और बाद में निर्णय, निर्णय के बाद
में प्रयोग, ऐसा थोड़ा करना चाहिए।

00:31:51.666 --> 00:31:58.522
केवल सुनने का रस, पढ़ने का रस,
उसके बाद तो उसको निर्णय करना चाहिए।

00:31:58.546 --> 00:32:04.677
<b>मैं कौन हूँ, आया कहाँ से और
मेरा रूप क्या है? </b>(श्रीमद्
राजचन्द्रजी, अमूल्य तत्त्व विचार) आहाहा!

00:32:04.701 --> 00:32:15.335
वास्तविक स्वरूप क्या है?
'आत्मा रागी है' ये वास्तविक स्वरूप है या
'आत्मा ज्ञानमयी है‘ ये वास्तविक स्वरूप है?

00:32:15.359 --> 00:32:31.420
खरा समझे ना? सच्चा।
कि 'भैया! संसारी जीव तो रागी होता है'।
कि कोई जीव रागी नहीं होता। बोलो!

00:32:31.444 --> 00:32:37.526
सर्वज्ञ भगवान ने कहा है (कि) सब
भगवान आत्मा हैं, कोई जीव रागी नहीं है।

00:32:37.550 --> 00:32:43.162
पर्यायदृष्टि से देखते हैं इसलिए ख्याल
में नहीं आता है; द्रव्यदृष्टि से देख।

00:32:43.186 --> 00:33:05.900
पानी तो गरम हो गया।
गरम पर्याय गौण कर दे तो शीतल,
शीतल, शीतल, शीतल है। बस!

00:33:05.924 --> 00:33:16.588
दस मिनट बाकी हैं,
किसी को प्रश्न करना हो तो करो।

00:33:16.612 --> 00:33:21.148
मुमुक्षु: साहिब, परिणाम होता है और
ये आत्मा अकर्ता किस तरह से रहता है?

00:33:21.172 --> 00:33:29.442
पू. लालचंदभाई: परिणाम होने योग्य
होता है, आत्मा उसका करनेवाला नहीं है।
मानता है कि परिणाम का मैं कर्ता हूँ।

00:33:29.466 --> 00:33:33.371
वास्तव में (तो) आत्मा निष्क्रिय,
अकर्ता होने के कारण,

00:33:33.395 --> 00:33:40.011
ज्ञाता होने के कारण, केवल जाननहार
होने के कारण परिणाम का कर्ता नहीं है।

00:33:40.035 --> 00:33:43.335
तो परिणाम को कौन करता है?
परिणाम होता तो है।

00:33:43.359 --> 00:33:47.420
हाँ! परिणाम होता है
और आत्मा अकर्ता रहता है।

00:33:47.444 --> 00:33:54.420
परिणाम तो हुआ करता है,
तो परिणाम का कर्ता कौन है?
कि परिणाम का कर्ता परिणाम है।

00:33:54.444 --> 00:33:59.122
एक त्रिकाली उपादान
और एक क्षणिक उपादान।

00:33:59.146 --> 00:34:07.686
क्षणिक उपादान के दो प्रकार हैं,
एक अशुद्ध क्षणिक उपादान
और शुद्ध क्षणिक उपादान।

00:34:07.710 --> 00:34:12.775
जयसेन आचार्य भगवान ने कहा है
जहाँ-जहाँ ये राग की बात आए,

00:34:12.799 --> 00:34:18.317
वहाँ-वहाँ क्षणिक उपादान से विचार
करना तो भेदज्ञान हो जाएगा।

00:34:18.341 --> 00:34:23.011
उसका स्वकाल है राग करने का;
वीतराग होने का भी स्वकाल है।

00:34:23.035 --> 00:34:29.593
होने योग्य होता है -
ऐसी जब कान पर वाणी आए आहाहा!

00:34:29.617 --> 00:34:34.531
'परिणाम को मैं करता हूँ'
ऐसी मेरी मान्यता थे! आहाहा!

00:34:34.555 --> 00:34:41.344
भगवान की वाणी में तो ऐसा आया कि
'परिणाम होने योग्य होता रहता है और
जाननेवाला जानने में आया करता है'।

00:34:41.368 --> 00:34:44.002
यह क्या? चमत्कारिक बात!

00:34:44.026 --> 00:35:00.006
परिणाम की कर्ताबुद्धि छूटी, परिणाम की
ज्ञाताबुद्धि छूट गई और जाननेवाला जानने में
आ जाए, उस समय अनुभव होता है। आहाहा!

00:35:00.030 --> 00:35:03.491
ज्ञानी के समागम में
ये वाणी आए (अगर) पात्र जीव हो,

00:35:03.515 --> 00:35:08.300
पका हुआ फिर 'होने योग्य होता है,
जाननेवाला जानने में आया करता है'।

00:35:08.324 --> 00:35:11.971
'होने योग्य होता है' अर्थात्
मैं परिणाम का करनेवाला नहीं (हूँ)।

00:35:11.995 --> 00:35:16.748
'जाननेवाला जानने में आता है'
अर्थात् परिणाम को मैं जानता भी नहीं।
लक्ष पूरा फिर गया।

00:35:16.772 --> 00:35:21.277
बाबूभाई! परिणाम होता है,
परिणाम (होने) की ना नहीं (है)।

00:35:21.301 --> 00:35:32.477
मगर परिणाम को कौन करता है?
परिणाम का कर्ता परिणाम है या
मैं कर्ता हूँ? बस! उसमें सब समाधान है।

00:35:32.501 --> 00:35:44.446
अपने षट्कारक से परिणाम होता है।
तेरे से होता हो तो कर दे ना केवलज्ञान,
कर दे ना सम्यग्दर्शन! ले! कर दे।

00:35:44.470 --> 00:35:52.828
एक बार एक मूर्ख था।
मूर्ख की स्वयं की कर्ताबुद्धि थी ना,
वह महाविदेहक्षेत्र तक पहुँचा।

00:35:52.852 --> 00:35:59.055
महाविदेहक्षेत्र में बीस तीर्थंकर विहरमान,
अभी विराजमान हैं, केवली प्रभु हों! आहाहा!

00:35:59.079 --> 00:36:06.060
कम से कम बीस तीर्थंकर कायम होते
ही हैं। उनके नाम भी बदलते नहीं (हैं)।
जीव बदल जाते हैं (बस)।

00:36:06.084 --> 00:36:09.691
सीमंधर प्रभु हैं ना!
उनका नाम वही रहेगा।

00:36:09.715 --> 00:36:15.948
यहाँ तेरहवें तीर्थंकर होंगे
तब वो जो सीमंधर भगवान का आत्मा है,
वह सिद्ध हो जाएगा;

00:36:15.972 --> 00:36:22.557
और अभी (एक) साधक में है
सीमंधर नाम का जीव, उनको केवलज्ञान होगा।

00:36:22.581 --> 00:36:24.997
नाम वही का वही रहेगा,
जीव बदल गया (बस)।

00:36:25.021 --> 00:36:28.722
ऐसे बीस तीर्थंकर का नाम बदलता नहीं (है),
वही का वही रहता है।

00:36:28.746 --> 00:36:35.571
इसमें कोई मूर्ख, कर्ताबुद्धिवाला
(कहे) कि प्रभु! मुझे एक विचार आया।

00:36:35.595 --> 00:36:38.633
प्रभु के सामने हो!
सीमंधर प्रभु के सामने।

00:36:38.657 --> 00:36:43.722
प्रतिमा के सामने खड़ा रहा
कि प्रभु मुझे एक विचार आता है

00:36:43.746 --> 00:36:50.411
कि आपकी वाणी में ऐसा आया कि
तेरहवाँ गुणस्थान भी संसार है,
मोक्ष नहीं (है)।

00:36:50.435 --> 00:37:01.175
मुझे यह बात खटकती है। मेरे
प्रभु, मेरे उपकारी नाथ, तीन लोक के नाथ
और उनके ऊपर संसारी आरोप आता है।

00:37:01.199 --> 00:37:03.926
व्यवहारनय करता है (ऐसा) आरोप
(परंतु) मुझे अच्छा नहीं लगता।

00:37:03.950 --> 00:37:07.828
मेरा इतना काम कर दो प्रभु!
अच्छा काम कहूँगा।

00:37:07.852 --> 00:37:13.277
आपको अनंत वीर्य प्रगट हो गया है,
अनंतवीर्य-शक्ति-आत्मबल।

00:37:13.301 --> 00:37:16.517
इतना काम कर दो (कि)
सिद्ध पर्याय आप कर दो बस।

00:37:16.541 --> 00:37:23.135
सिद्ध पर्याय आप कर दो तो
ये आक्षेप तो मिट जाए, मेरा सुनना मिटे।

00:37:23.159 --> 00:37:26.380
(भगवान कहें) कि
तुम्हारा प्रश्न मूर्खता भरा हुआ है।

00:37:26.404 --> 00:37:34.473
आत्मा जाननेवाला है,
वो पर्याय का करनेवाला नहीं, होने
योग्य होगा तब ही सिद्ध की पर्याय होगी,

00:37:34.497 --> 00:37:40.020
एक समय भी
आगे-पीछे सिद्ध की पर्याय होनेवाली नहीं है।
आहाहा!

00:37:40.044 --> 00:37:47.104
आत्मा जाननेवाला अकर्ता है,
पर्याय तो पर्याय के स्वकाल में होती है
- ऐसा सर्वज्ञ भगवान जानते हैं।

00:37:47.128 --> 00:37:54.380
और कर्ताबुद्धिवाला द्रव्य को जानता नहीं,
पर्याय को जानता नहीं और
सर्वज्ञ भगवान को भी जानता नहीं।

00:37:54.404 --> 00:38:01.704
उस हद तक पहुँचा।
तुम्हारा प्रश्न मूर्खता भरा हुआ है।

00:38:01.728 --> 00:38:09.682
यहाँ पर कर्ताबुद्धि है ना
भाई साहब! तो वहाँ (तक) पहुँचा वो।
कि साहब! इतना काम कर दो।

00:38:09.706 --> 00:38:17.300
तेरहवाँ गुणस्थान है ना, तेरहवें का
व्यय कर दो, चौदहवें का व्यय कर दो
और सिद्ध पर्याय का उत्पाद कर दो।

00:38:17.324 --> 00:38:22.428
और अनंतवीर्य तो प्रगट है
(आपको) तो मैं अच्छा काम बताता हूँ।

00:38:22.452 --> 00:38:25.388
मैं ऐसा नहीं कहता हूँ कि
चौथे गुणस्थान में आ जाओ,

00:38:25.412 --> 00:38:32.544
पहले गुणस्थान में आ जाओ,
ऐसा तो मैं आपके प्रति कभी नहीं कहूँ।
अच्छा काम कर दो।

00:38:32.568 --> 00:38:38.126
(अरे!) मूर्खता है तेरी।
पर्याय का कर्ता (पर्याय है),
(पर्याय) सत्-अहेतुक है।

00:38:38.150 --> 00:38:48.340
द्रव्य सत्, गुण सत् और पर्याय सत्
- तीनों सत् हैं, निरपेक्ष हैं।

00:38:48.364 --> 00:38:53.322
अभ्यास करना चाहिए अपने हित के लिए।

00:38:53.346 --> 00:38:59.117
जैसे C.A. (सी. ए.) पढ़े तो १० साल २० साल
नापास हो, (सफल हो) तब तक परीक्षा दे,
थके ही नहीं।

00:38:59.141 --> 00:39:04.726
तो इसका भी तो अभ्यास करना चाहिए ना,
थोड़ा! आहाहा!

00:39:04.750 --> 00:39:10.171
छोटी उम्र हो तो side business
(गौण व्यापार) शुरू कर दो,
main (मुख्य) व्यापार तो बाद में।

00:39:10.195 --> 00:39:18.766
side business समझे?
side business मतलब घंटे, दो घंटे
जहाँ तक निवृत्ति न हो तब तक घंटे,

00:39:18.790 --> 00:40:02.326
दो घंटे तो स्वाध्याय, चिंतन, मनन,
सत्-समागम, विचार, निर्णय (करना)।

00:40:02.350 --> 00:40:13.597
मुमुक्षु: साहेब, इंद्रियज्ञान और आत्मज्ञान
- स्वसंवेदन ज्ञान दोनों अलग हैं,
इसके निषेध का स्पष्टीकरण दीजिए?

00:40:13.621 --> 00:40:18.788
पू. लालचंदभाई: अनंतकाल से
जो उपयोग प्रगट होता है,

00:40:18.812 --> 00:40:23.771
उस उपयोग का दुरुपयोग करना
और 'जाननहार जानने में आता है’

00:40:23.795 --> 00:40:28.237
उसको भूलकर
'मुझे राग जानने में आता है,
शरीर जानने में आता है,

00:40:28.261 --> 00:40:36.326
मन-वचन-काय जानने में आते हैं, ये
परपदार्थ मुझे जानने में आते हैं’ इस उपयोग
का दुरुपयोग (किया) इसका नाम इंद्रियज्ञान।

00:40:36.350 --> 00:40:46.500
और इंद्रियज्ञान जिसको जाने उसमें
अहंबुद्धि किए बगैर रहे नहीं; इसलिए
इंद्रियज्ञान हेय है, आत्मा उपादेय है।

00:40:46.524 --> 00:40:55.766
तो उस उपयोग का जीव दुरुपयोग करता था
उस उपयोग का सदुपयोग करे कि जाननहार
जानने में आता है तो अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होता है।

00:40:55.790 --> 00:41:00.815
बाद में अतीन्द्रियज्ञान और
इंद्रियज्ञान के दो भेद पड़ जाते हैं।

00:41:00.839 --> 00:41:07.215
जैसे साधक के चारित्र के दो भेद -
थोड़ी वीतरागता और थोड़ा राग (होता
है) एक ही पर्याय में, एक ही समय में।

00:41:07.239 --> 00:41:13.371
पर्याय एक (और) भाग दो,
थोड़ा स्व-आश्रय से वीतरागभाव
पर-आश्रय से राग।

00:41:13.395 --> 00:41:20.362
ऐसे ज्ञान की पर्याय एक है,
उसका दो भाग - स्वाश्रित अभेद हो
जितना उतना अतीन्द्रियज्ञान;

00:41:20.386 --> 00:41:29.282
और जितना पराश्रित परसत्तावलंबनशील
ज्ञान शास्त्र के लक्षवाला (है),
वह इंद्रियज्ञान (है), वो तो जड़-अचेतन है।

00:41:29.306 --> 00:41:38.664
आहाहा!
जड़ अचेतन क्यों? क्योंकि उस
ज्ञान में आत्मा जानने में आता नहीं।

00:41:38.688 --> 00:41:42.011
जैसे राग में (आत्मा) जानने में नहीं आता,
ऐसे (ही) इंद्रियज्ञान में,

00:41:42.035 --> 00:41:56.944
पर लक्षवाले ज्ञान में, ज्ञान अर्थात्
इंद्रियज्ञान (में आत्मा जानने में नहीं आता)।

00:41:56.968 --> 00:42:04.428
मैं पर को करता हूँ और
मैं पर को जानता हूँ - ये दो बड़े दोष हैं।

00:42:04.452 --> 00:42:11.704
मैं पर को जानता हूँ ये तो स्वभाव है।
ठीक! स्वभाव है न पर को जानना?

00:42:11.728 --> 00:42:20.100
आया, आनंद आया? आनंद नहीं आया।
तो फिर स्वभाव कहलाया है या विभाव?

00:42:20.124 --> 00:42:24.046
इंद्रियज्ञान आकुलता को उत्पन्न
करनेवाला है, ऐसा।

00:42:24.070 --> 00:42:29.726
प्रवचनसार, दिव्यध्वनि का सार (है)
और (उसमें) कहाँ तक कहा?

00:42:29.750 --> 00:42:36.504
कि इंद्रियज्ञान,
वह मूर्तिक है (गाथा ५३, फुटनोट),

00:42:36.528 --> 00:42:46.766
शास्त्रज्ञान (को) मूर्तिक कहा
और कर्मों के बंध का कारण कहा (गाथा ७६)।
आहाहा!

00:42:46.790 --> 00:42:53.557
एक इंद्रियज्ञान की पुस्तक बाहर पड़ेगा,
इसमें सब बातें आयेंगी,
शास्त्र के आधार सहित हो!

00:42:53.581 --> 00:42:56.233
हाँ, शास्त्र के आधार सहित।

00:42:56.257 --> 00:43:03.793
भाई ने कहा estimate (अनुमान) निकालो
कि कितना खर्च आता है,
१००० हिन्दी और १००० गुजराती (प्रति)।

00:43:03.817 --> 00:43:09.504
इस प्रकार कि बात तो हुई है,
हो जायेगा तो।

00:43:09.528 --> 00:43:11.300
कोई भाई ने कहा हम गुजराती ही छपवाते हैं।

00:43:11.324 --> 00:43:16.668
तो कहा नहीं,
१००० गुजराती और १००० हिन्दी,
१०००-१००० दो कॉपी।

00:43:16.692 --> 00:43:23.753
पैसा तो हो जाएगा, पैसा का कोई
(कमी नहीं है), गुरुदेव का नाम आये
तो पैसे का सवाल नहीं।

00:43:23.777 --> 00:43:27.824
कहा estimate निकालो।

00:43:27.848 --> 00:43:41.451
एक पुस्तक बीस रूपए का पड़े
तो बीस हज़ार रूपया लगे, भले अंदाज,
घटेगा अब, कितना होगा मालूम नहीं। आहाहा!

00:43:41.475 --> 00:43:52.531
ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान।
अतीन्द्रियज्ञानमयी आत्मा और इंद्रियज्ञान
दोनों अलग-अलग चीज हैं, एक नहीं (हैं)।

00:43:52.555 --> 00:43:59.206
आत्मा के आधार से इंद्रियज्ञान नहीं होता।
बोलो!

00:43:59.230 --> 00:44:03.424
मुमुक्षु: क्या उपयोग लक्षण ही
इंद्रियज्ञानरूप हो जाता है?

00:44:03.448 --> 00:44:07.731
या उपयोग लक्षण भिन्न रहकर
इंद्रियज्ञान जुदा प्रगट होता है?

00:44:07.755 --> 00:44:12.575
पू. लालचंदभाई: नहीं उपयोग ही;
उपयोग का दुरुपयोग होता है,
उसका नाम इंद्रियज्ञान है।

00:44:12.599 --> 00:44:18.424
मगर इंद्रियज्ञान की उपाधि आपके
ख्याल में गौण करो तो उपयोग है।

00:44:18.448 --> 00:44:28.491
क्या कहा? फिर से।
प्रश्न सूक्ष्म है, कि उपयोग
इंद्रियज्ञान हो गया? ऐसा नहीं है।

00:44:28.515 --> 00:44:35.126
इंद्रियज्ञान की उपाधि गौण करो
तो-तो उपयोग ही रहा,
तो फिर स्वपरप्रकाशक है।

00:44:35.150 --> 00:44:42.860
ऐसा प्रवचनसार (गाथा ३४) में
आया कि श्रुत की उपाधि गौण
करो - श्रुतज्ञान, आता है न श्रुतज्ञान?

00:44:42.884 --> 00:44:52.526
श्रुत की उपाधि गौण कर दो, बाद बाकी
(निकाल) कर दो तो एक ही ज्ञप्ति रहती है,
तो केवली के जैसा है वो ज्ञान, ऐसा।

00:44:52.550 --> 00:45:00.900
इंद्रियज्ञान, वह ज्ञान की उपाधि है
यानि plus (जोड़) हो गया, (वो) अतिरिक्त
की चीज (है), तो गौण करो तो उपयोग ही है।

00:45:00.924 --> 00:45:05.544
उपयोग लक्षण सबके पास है ना?
तो इंद्रियज्ञान भी सबके पास,
अज्ञानी के पास है।

00:45:05.568 --> 00:45:08.997
तो उपयोग का अभाव हो गया?
कि नहीं।

00:45:09.021 --> 00:45:20.828
उस समय पर (इंद्रियज्ञान) गौण करो
तो उपयोग ही है।
सूक्ष्म बात है थोड़ी, सूक्ष्म है!

00:45:20.852 --> 00:45:27.073
ये जो सारा उपयोग इंद्रियज्ञान हो गया,
तो उपयोग लक्षण का तो अभाव हो गया?
ऐसा प्रश्न है।

00:45:27.097 --> 00:45:29.460
नहीं! अभाव नहीं होता है।

00:45:29.484 --> 00:45:36.380
इंद्रियज्ञान जो है, गौण करके देख तो
उपयोग, उपयोग, उपयोग, उपयोग,
उपयोग, उपयोग है, बस।

00:45:36.404 --> 00:45:45.971
और उस उपयोग में आत्मा जानने में आता है,
तो शुद्धोपयोग हो गया, ऐसा।

00:45:45.995 --> 00:45:53.411
हो गया समय।
जयकारा।

00:45:53.435 --> 00:46:11.557
मांगलिक।

00:46:11.581 --> 00:46:19.375
मुमुक्षु: क्या प्रतिभास
स्वच्छत्व शक्ति का कार्य है और जानना
ज्ञान गुण का कार्य है? ऐसा प्रश्न है।

00:46:19.399 --> 00:46:24.508
पू. लालचंदभाई: फिर से।
मुमुक्षु: क्या प्रतिभास ...
पू. लालचंदभाई: पर का प्रतिभास या स्व का?

00:46:24.532 --> 00:46:34.562
मुमुक्षु: पर का।
क्या प्रतिभास स्वच्छत्व शक्ति का कार्य
है और जानना ज्ञान गुण का कार्य है?

00:46:34.586 --> 00:46:38.953
पू. लालचंदभाई: जो परपदार्थ का
प्रतिभास ज्ञान की पर्याय में आता है,

00:46:38.977 --> 00:46:45.193
ज्ञान की पर्याय में राग आदि देह
आदि झलकते हैं, प्रतिभास होता है,

00:46:45.217 --> 00:46:56.926
वो ज्ञान की स्वभाव से स्वच्छता ही ऐसी है
कि जिसमें पर पदार्थ का प्रतिभास होवे,
इतनी स्वच्छता है।

00:46:56.950 --> 00:47:14.611
मगर जो ज्ञेय का प्रतिभास हुआ उसके
ऊपर लक्ष जाये तो ज्ञेय पर लक्ष हो
गया तो ज्ञायक पर लक्ष नहीं आएगा।

00:47:14.635 --> 00:47:25.975
प्रतिभास हुआ ना, वो ज्ञेयाकर ज्ञान है;
ज्ञेयाकार ज्ञान, ज्ञेय के सापेक्ष से देखो
तो ज्ञेयाकार ज्ञान ही है।

00:47:25.999 --> 00:47:33.726
वास्तव में ज्ञेय और ज्ञेय के प्रतिभास को
गौण करो तो ज्ञायक का प्रतिभास होता है,

00:47:33.750 --> 00:47:42.722
वो ज्ञायक ही जानने में आता है,
ज्ञेय जानने में आता नहीं है।
उसमें कार्य की सिद्धि होती है।

00:47:42.746 --> 00:47:46.771
मुमुक्षु: आपने सुबह कहा था
कि उपयोग (को) अंतर्सन्मुख करना।
पू. लालचंदभाई: हाँ।

00:47:46.795 --> 00:47:53.162
मुमुक्षु: परंतु जब त्रिकाल
जाननेवाला ही जानने में आ रहा है
तो फिर उपयोग क्यों पलटना?

00:47:53.186 --> 00:48:00.157
मात्र मान्यता पलटनी कि
'जाननेवाला ही जानने में आ रहा है’
तो अनुभव हो जाएगा?

00:48:00.181 --> 00:48:05.620
पू. लालचंदभाई: ऐसी मान्यता ही पलट गई
कि 'जाननेवाला ही जानने में आता है'
तो जाननेवाला जानने में आ जाएगा।

00:48:05.644 --> 00:48:13.473
परंतु ‘मुझे पर जानने में आता है’
वह चालू रखे,
'पर का लक्ष करता हूँ ये वास्तविक है'

00:48:13.497 --> 00:48:18.437
ऐसा श्रद्धा में जब तक है तब तक
तो उपयोग पलटेगा नहीं अंदर।

00:48:18.461 --> 00:48:22.788
अर्थात् उपयोग पलटने की बात किया,
उसका अर्थ ये है

00:48:22.812 --> 00:48:33.828
कि तेरे उपयोग (का) अनंतकाल से
पर तरफ लक्ष है, 'पर को मैं जानता हूँ'
तो इंद्रियज्ञान प्रगट हुआ;

00:48:33.852 --> 00:48:41.935
तो गुरुदेव ने कहा कि
जो परपदार्थ पर-सन्मुख ज्ञान है
उसको, ज्ञान को अंतर्मुख कर।

00:48:41.959 --> 00:48:47.580
यानि इंद्रियज्ञान का व्यापार पर को
प्रसिद्ध करने का ज्ञान बंद कर दे

00:48:47.604 --> 00:48:55.144
और 'जाननेवाला जानने में आता है'
ऐसा ले तो वो उपयोग अपने आप
अंतर में हो गया, अंतर्मुख हो गया।

00:48:55.168 --> 00:49:00.562
ऐसा तो जाननेवाला जानने में
आ ही रहा है ज्ञान की पर्याय में।

00:49:00.586 --> 00:49:07.264
मगर 'ज्ञान की पर्याय में ज्ञायक
जानने में आ रहा है’ ऐसा श्रद्धान
कहाँ है उसको? विश्वास कहाँ है?

00:49:07.288 --> 00:49:13.611
पर के प्रतिभास का विश्वास है
कि पर जानने में आता है मगर
स्व के प्रतिभास का विश्वास तो (नहीं है)।

00:49:13.635 --> 00:49:16.757
प्रतिभास दो का है,
स्वपरप्रकाशक स्वच्छता है।

00:49:16.781 --> 00:49:26.802
पर भी प्रतिभासित होता है, पर को जानता है
ऐसा नहीं! प्रतिभास अलग चीज है
और पर को जानता है, ये अलग चीज है।

00:49:26.826 --> 00:49:32.224
और स्व का प्रतिभास होता है
तो पर को जानता है, ऐसा भी नहीं है।

00:49:32.248 --> 00:49:37.304
क्या कहा?
दर्पण में दो का प्रतिभास होता है।

00:49:37.328 --> 00:49:47.762
परपदार्थ का प्रतिभास स्वच्छता में होता है
और उस स्वच्छता की पर्याय में दल,
द्रव्य, वो भी प्रतिभासित तो होता है।

00:49:47.786 --> 00:49:55.646
दो का प्रतिभास होने पर दो जीव उसको
देखते हैं वहाँ सामने, दर्पण के सामने;

00:49:55.670 --> 00:50:06.766
एक बोलता है कि मेरा मुँह दिखता है,
दूसरा कहता है कि मेरे को तो
दर्पण दिखता है। बस इतनी देर है!

00:50:06.790 --> 00:50:10.051
क्या कहा?
प्रतिभास तो दो का होता है।

00:50:10.075 --> 00:50:16.055
स्वच्छता है न दर्पण में तो अग्नि
की ज्वाला भी प्रतिभासित होती है

00:50:16.079 --> 00:50:27.246
और दर्पण की स्वच्छता में दल भी
प्रतिभासित होता है, इसलिए
स्वपरप्रकाशक दर्पण की स्वच्छता तो है ही है।

00:50:27.270 --> 00:50:35.708
मगर वो देखनेवाला दर्पण को देखता है कि
मोर को देखता है, अग्नि को देखता है? बस!

00:50:35.732 --> 00:50:43.326
अग्नि दिखाई देती है कि दर्पण
की स्वच्छता और दल दिखाई
देता है? क्या दिखाई देता है?

00:50:43.350 --> 00:50:52.268
जाननेवाले दो हैं, एक अज्ञानी बन जाता
है (और) एक ज्ञानी बन जाता है। बस!

00:50:52.292 --> 00:50:57.753
प्रतिभास गुणरूप भी नहीं है
और दोषरूप भी नहीं है।

00:50:57.777 --> 00:51:06.557
दु:ख का प्रतिभास ज्ञान की स्वच्छता में,
प्रतिभास होता है, वो दु:ख का कारण नहीं है।

00:51:06.581 --> 00:51:14.175
और सुखमयी आत्मा का प्रतिभास
तो ज्ञान की पर्याय में होता है,
वो भी सुख का कारण नहीं है।

00:51:14.199 --> 00:51:16.993
क्या कहा? सूक्ष्म बात है!

00:51:17.017 --> 00:51:22.700
सुखमयी भगवान आत्मा सबको ज्ञान
की पर्याय में प्रतिभासित तो होता है

00:51:22.724 --> 00:51:31.135
और रागाादि दु:ख भी प्रतिभासित
तो होते हैं, मगर वो
उपयोगात्मक किसको कर लेता है?

00:51:31.159 --> 00:51:34.655
प्रतिभास तो दो का प्रतिभास है।

00:51:34.679 --> 00:51:42.162
जब भेदज्ञान करता है कि जाननेवाला
जानने में आता है, राग आदि
और दु:ख जानने में आता ही नहीं है,

00:51:42.186 --> 00:51:45.442
जानने में आता ही नहीं है तो वहाँ
से लक्ष हट जाता है, खिसक जाता है

00:51:45.466 --> 00:51:53.731
और उपयोग जानन पर आ जाता है
तो अनुभव हो जाता है। प्रतिभास
मात्र सुख-दु:ख का कारण नहीं है।

00:51:53.755 --> 00:52:00.211
(ज्ञायक का) प्रतिभास को उपयोगात्मक कर लेना,
ज्ञायक को कर लेना तो ज्ञानी हो जाता है।

00:52:00.235 --> 00:52:06.469
और मोटर दिखती है, दिखती है मोटर
(मगर) मोटर को देखता नहीं है।

00:52:06.493 --> 00:52:13.975
दिखने से क्या हुआ?
कि मोटर दिखाई देती है,
वो ज्ञान का अज्ञान हो गया।

00:52:13.999 --> 00:52:19.464
और ज्ञान में ज्ञायक दिखता तो है,
मगर (जब) उसको देखता है तो ज्ञानी होता है।

00:52:19.488 --> 00:52:23.500
दिखती तो हैं दोनों ही चीज,
मगर मेरी चीज कौन (है)?

00:52:23.524 --> 00:52:34.709
मोटर मेरी कि ज्ञायक मेरा?
ऐसी चीज है।

00:52:34.733 --> 00:52:39.633
मुमुक्षु: पूज्य भाईश्री आपश्री ने
फरमाया था कि जानने के दो प्रकार हैं।
पू. लालचंदभाई: हाँ।

00:52:39.657 --> 00:52:47.442
मुमुक्षु: एक निर्विकल्पध्यान के काल में
आत्मा उपयोगात्मकपने जानने में आता है
और भावेन्द्रिय का व्यापार लब्धरूप से रहता है।

00:52:47.466 --> 00:52:48.638
पू. लालचंदभाई: बराबर है।

00:52:48.662 --> 00:52:55.491
मुमुक्षु: दूसरा सविकल्पदशा में परिणति
लब्धरूप से आत्मा को जानती हुई परिणमती है।
पू. लालचंदभाई: बराबर है।

00:52:55.515 --> 00:52:59.189
मुमुक्षु: और भावेन्द्रिय का
व्यापार उपोयगरूप होता है।
पू. लालचंदभाई: बराबर है।

00:52:59.213 --> 00:53:07.224
मुमुक्षु: तो प्रश्न नंबर एक ऐसा है कि
छद्मस्थ के लिए तो ऊपर की बात बराबर है?
पू. लालचंदभाई: हाँ, बराबर।

00:53:07.248 --> 00:53:12.575
मुमुक्षु: परंतु यहाँ प्रश्न ये है कि
क्या एक ही ज्ञान की पर्याय में जानने में

00:53:12.599 --> 00:53:20.358
ये दो प्रकार एक ही समय में होते हैं
कि किस प्रकार से?
कृपया करके विशेष स्पष्टता करें।

00:53:20.382 --> 00:53:23.949
पू. लालचंदभाई: अतीन्द्रियज्ञान में
तो आत्मा ही जानने में आता है;

00:53:23.973 --> 00:53:29.033
और इंद्रियज्ञान में देह आदि जानने
में आते हैं, वो छद्मस्थ की स्थिति है।

00:53:29.057 --> 00:53:34.038
और केवली परमात्मा को
एक समय में केवलज्ञान जो हो गया,

00:53:34.062 --> 00:53:44.126
उसमें लोकालोक का प्रतिभास
तो होता है, मगर जानते हैं अपने
आत्मा को; लोकालोक को नहीं।

00:53:44.150 --> 00:53:50.709
प्रतिभास होने से कहा जाता है कि
लोकालोक को जानते हैं, ऐसा कहा जाता है।

00:53:50.733 --> 00:53:56.664
सचमुच लोकालोक के साथ केवलज्ञान
तन्मय नहीं है, इसलिए उसको नहीं जानता है;

00:53:56.688 --> 00:54:07.771
और केवलज्ञान आत्मा के साथ तन्मय है
इसलिए आत्मा को ही जानता है, पर को नहीं।

00:54:07.795 --> 00:54:11.926
मुमुक्षु: खुलासा नहीं हुआ।
पू. लालचंदभाई: फिर से क्या खुलासा?

00:54:11.950 --> 00:54:18.397
मुमुक्षु: प्रश्न ये है कि छद्मस्थ के 
लिए तो ऊपर की दोनों बात बराबर हैं।

00:54:18.421 --> 00:54:25.197
पू. लालचंदभाई: छद्मस्थ के लिए बात बराबर है 
और केवली के लिए क्या है, ऐसा है?
मुमुक्षु: हाँ।

00:54:25.221 --> 00:54:31.260
पू. लालचंदभाई: हाँ। 
मुमुक्षु: तो क्या एक ही ज्ञान की 
पर्याय में जानने के दो प्रकार हैं

00:54:31.284 --> 00:54:34.842
और एक ही समय में ये दोनों प्रकार हैं? 
पू. लालचंदभाई: केवलज्ञान की पर्याय में?

00:54:34.866 --> 00:54:40.504
मुमुक्षु: अभी प्रश्न दूसरा है कि 
केवलज्ञान में तो निर्विकल्प-सविकल्प 
ऐसे भेद पड़ते ही नहीं हैं।

00:54:40.528 --> 00:54:41.317
पू. लालचंदभाई: नहीं हैं, ठीक है।

00:54:41.341 --> 00:54:48.371
मुमुक्षु: तो केवलज्ञान में 'जानने का' 
और 'जानने में आने का' कैसा प्रकार है? 
ये कृपया करके स्पष्ट कीजिए।

00:54:48.395 --> 00:54:53.282
पू. लालचंदभाई: केवलज्ञान में जाननेवाला 
जानने में आ रहा है, अभेदपने तन्मय होकर;

00:54:53.306 --> 00:54:58.691
और उसमें लोकालोक का प्रतिभास 
होता है तो लोकालोक को जानते हैं,

00:54:58.715 --> 00:55:03.806
ऐसा व्यवहार से कहा जाता है; 
निश्चय से उसके साथ तन्मय नहीं है।

00:55:03.830 --> 00:55:11.073
<b>केवल निजस्वभावनुं, अखंड वर्ते ज्ञान; </b>
<b>कहिए केवलज्ञान ते, देह छतां निर्वाण।</b> 
(आत्मसिद्धि शास्त्र – गाथा ११३)

00:55:11.097 --> 00:55:17.428
प्रतिभास लोकालोक का होता है, 
जरूर। प्रतिभास नहीं होता है ऐसा नहीं है।

00:55:17.452 --> 00:55:23.771
तो तो वाणी में, केवली भगवान 
की वाणी में आवे कहाँ से कि 
तीर्थंकर होंगे पहले तीर्थंकर?

00:55:23.795 --> 00:55:28.584
श्रेणिक महाराज अभी नरक में हैं 
(और) पहले तीर्थंकर होंगे।

00:55:28.608 --> 00:55:36.166
और तेरहवें तीर्थंकर अभी होंगे इधर। 
तीर्थंकर का नाम भी निश्चित है, चौबीसों का।

00:55:36.190 --> 00:55:41.460
ये तो जाने बिना कहाँ से आए? 
तो उसको नहीं जाना है;

00:55:41.484 --> 00:56:01.766
उसका (जो) प्रतिभास हुआ, 
ऐसा ज्ञान की पर्याय को जानते हैं केवली; 
पर को नहीं जानते हैं।

00:56:01.790 --> 00:56:08.860
'मैं पर को जानता हूँ' इसका निषेध है, 
'जनित जाता है’ (जानने में आ जाता है) 
इसका निषेध नहीं है।

00:56:08.884 --> 00:56:16.762
जनित जाते हैं, छद्मस्थ को भी 
जनित जाते हैं पर पदार्थ, केवली 
को भी एक समय में जनित जाते हैं।

00:56:16.786 --> 00:56:19.468
जनित जाते हैं इसका निषेध नहीं (है)।

00:56:19.492 --> 00:56:24.033
राग जनित जाता है, मगर 
मैं राग को जानता हूँ (इसका निषेध है)।

00:56:24.057 --> 00:56:35.891
राग को तू जानता हो कि ज्ञायक को जानता हो? 
- वहाँ भूल हो गई, भूल वहाँ हो गई।

00:56:35.915 --> 00:56:43.224
जानता है स्व को, समय-समय पर, 
अज्ञानी, आबाल-गोपाल सबको ज्ञायक 
भगवान आत्मा जानने में आता है।

00:56:43.248 --> 00:57:01.762
इसका अर्थ ये है कि स्व जानने में आने पर 
भी 'मैं पर को जानता हूँ' यानि 'स्व को नहीं 
जानता हूँ’ तो इसका नाम अज्ञान हो गया।

00:57:01.786 --> 00:57:10.913
प्रश्न अच्छा है। सूक्ष्म! सब प्रश्न आ गए। 
विषय ही सूक्ष्म चलता है दोनों 
टाइम तो प्रश्न भी सूक्ष्म ही आवे न।

00:57:10.937 --> 00:57:22.348
अच्छी बात है! जयपुर में भी ऐसे 
ही प्रश्न आते थे। २७१ कलश चला ना? 
तो ऐसे ही प्रश्न वहाँ जयपुर में (आये)।

00:57:22.372 --> 00:57:29.828
मुमुक्षु: फिर आगे! 
क्या प्रमाण के द्रव्य में भी 
पर्याय के प्रदेश भिन्न दिखते रहते हैं?

00:57:29.852 --> 00:57:37.491
पू. लालचंदभाई: प्रमाण ज्ञान के 
अंदर द्रव्य और पर्याय अनन्य 
होकर पदार्थ का ज्ञान होता है।

00:57:37.515 --> 00:57:44.673
इसलिए प्रदेश भिन्न होने पर भी भेद 
दिखाई देता नहीं है, अभेद दिखाई देता है।

00:57:44.697 --> 00:57:52.042
जब नय ज्ञान करो तो प्रदेश-भेद है; 
नय ज्ञान नहीं करो, तो अभेद करो 
तो एक ही प्रदेश है, एक ही क्षेत्र है।

00:57:52.066 --> 00:58:00.877
निर्मल पर्याय जिसमें है उसमें ही आत्मा (है) 
और आत्मा है उसमें निर्मल पर्याय है।

00:58:00.901 --> 00:58:12.126
जैसे दो द्रव्य की भिन्नता में प्रदेश-भेद है, 
ऐसा नहीं है; अपेक्षा से प्रदेश-भेद है 
(और) अपेक्षा से अभेद है।

00:58:12.150 --> 00:58:18.451
जिस प्रदेश में ज्ञायक है उस प्रदेश में 
ज्ञान की पर्याय होती है; अभेद है वो।

00:58:18.475 --> 00:58:26.766
अभेद विवक्षा से प्रदेश-भेद नहीं है, 
भेद की विवक्षा से, 
नय की विवक्षा से प्रदेश-भेद है।

00:58:26.790 --> 00:58:34.433
प्रदेश-भेद का भी एक logic (न्याय) है, 
प्रदेश-भेद के अंदर भी एक logic, न्याय है।

00:58:34.457 --> 00:58:42.126
क्या है? कि ज्ञायक जो 
त्रिकाली सामान्य स्वभाव है, उसके प्रदेश,

00:58:42.150 --> 00:58:49.055
और उसके आश्रय से सम्यग्दर्शन-ज्ञान
-चारित्र का परिणाम (जो) प्रगट हुआ,

00:58:49.079 --> 00:58:58.757
आत्मा के आश्रय से निर्मल पर्याय, उसका 
प्रदेश, कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न है।

00:58:58.781 --> 00:59:06.540
पदार्थ की अपेक्षा से अभिन्न है प्रदेश 
 और नय की विवक्षा से देखो तो भिन्न है।

00:59:06.564 --> 00:59:11.082
भिन्न का logic क्या? 
logic क्या (है) उसका?

00:59:11.106 --> 00:59:18.877
कि जो पर्याय निर्मल उत्पादरूप हुई, 
उसका प्रदेश और द्रव्य का प्रदेश,

00:59:18.901 --> 00:59:26.673
प्रदेश-क्षेत्र, 
एक ही क्षेत्र सर्वथा हो तो पर्याय 
के नाश से द्रव्य का नाश हो जाएगा,

00:59:26.697 --> 00:59:35.202
मगर पर्याय के नाश से द्रव्य का नाश होता 
नहीं है इसलिए पर्याय का प्रदेश भिन्न और 
द्रव्य का प्रदेश भिन्न है, (ये) एक (न्याय)।

00:59:35.226 --> 00:59:42.148
दूसरा, दूसरा न्याय कि आत्मा 
का जब अवलंबन लेता है साधक,

00:59:42.172 --> 00:59:47.388
साधक तो हो गया, निर्मल पर्याय 
परिणत द्रव्य तो उसके पास है।

00:59:47.412 --> 00:59:54.108
तो वो सामान्य का अवलंबन लेता है या 
सामान्य-विशेष दोनों का अवलंबन लेता है? 
मुमुक्षु: सामान्य का।

00:59:54.132 --> 01:00:00.233
पू. लालचंदभाई: सामान्य का ही 
अवलंबन लेता है। इसलिए नक्की होता 
है कि पर्याय का प्रदेश भिन्न है।

01:00:00.257 --> 01:00:06.575
वो अवलंबन में आता नहीं है, सामान्य का 
अवलंबन आता है मगर पर्याय भिन्न है 
इसलिए (उसका) अवलंबन आता नहीं है।

01:00:06.599 --> 01:00:20.020
दो न्याय हैं उसके। सतीश! 
सूक्ष्म बात है ये। 
कपड़े का व्यापार करने से बहुत सूक्ष्म है।

01:00:20.044 --> 01:00:28.091
बड़ा फायदे की बात है यह। वो कमाई 
करें फिर दो भाग, फिर चार भाग,

01:00:28.115 --> 01:00:35.362
फिर चार के चार, चार के चौबीस 
ऐसे भाग करते-करते अर्थात् 
खेत में भाग होते हैं कुटुंब में, गाँव में।

01:00:35.386 --> 01:00:39.064
खेत समझे न? 
खेती करने के लायक।

01:00:39.088 --> 01:00:48.700
तो पहले चार भाई थे तो १०० भीघा 
जमीन थी तो २५-२५ भीघे का 
बटवारा हो गया, चार टुकड़े हो गए।

01:00:48.724 --> 01:00:59.784
और एक भाई के चार लड़के हुए 
तो २५ का ६-६ बीघा आ गया, 
टुकड़े, इतनी जमीन रही।

01:00:59.808 --> 01:01:05.780
ऐसे वो जो लक्ष्मी का भाग है न, 
वो तो हाथ में कुछ नहीं आएगा।

01:01:05.804 --> 01:01:14.864
मगर वो जो ज्ञान की कमाई है 
उसमें कोई भागीदार नहीं है। 
मुमुक्षु: सही बात है।

01:01:14.888 --> 01:01:22.344
पू. लालचंदभाई: उसमें income tax (आयकर) 
नहीं, sales tax (बिक्री कर) नहीं, 
कोई भागीदारी नहीं।

01:01:22.368 --> 01:01:27.148
ज्ञान की लक्ष्मी कोई अपूर्व चीज है।

01:01:27.172 --> 01:01:38.064
आत्मज्ञान वो ज्ञान है, बाकी पूरा 
अज्ञान है। शास्त्रज्ञान ज्ञान नहीं है।

01:01:38.088 --> 01:01:45.500
मुमुक्षु: अनुभव के काल में गुण 
और पर्याय दोनों नहीं दिखते, 
मात्र एक अभेद वस्तु ही दिखती है।

01:01:45.524 --> 01:01:54.104
तो क्या ऐसा माना जाए कि गुण और 
पर्याय दोनों ही द्रव्यदृष्टि में नहीं हैं?

01:01:54.128 --> 01:02:01.935
पू. लालचंदभाई: द्रव्यदृष्टि में 
अर्थात् दृष्टि का विषय जो है, 
उसमें गुण नहीं है - ऐसी बात नहीं है

01:02:01.959 --> 01:02:06.766
(मगर) पर्याय नहीं हैं; 
गुणों से तो सहित है, 
पर्याय से रहित (है)।

01:02:06.790 --> 01:02:13.788
<b>एकत्वविभक्त</b> (समयसार गाथा ५) 
अनंत गुणों से एकपना है और अनंत 
पर्याय से मैं विभक्त (अर्थात्) जुदा (हूँ)।

01:02:13.812 --> 01:02:20.411
दृष्टि के विषय में गुण तो रहते हैं 
मगर गुण-भेद दिखाई देता नहीं है;

01:02:20.435 --> 01:02:24.202
ये ज्ञान है, ये दर्शन, ये चारित्र है 
- ऐसा गुणभेद दिखाई देता नहीं है;

01:02:24.226 --> 01:02:28.811
एक अभेद एकाकार सामान्य 
(ही) दिखाई देता है।

01:02:28.835 --> 01:02:35.046
और उसकी दृष्टि करके उसमें एकाग्र हुआ 
तो निर्मल पर्याय प्रगट हुई।

01:02:35.070 --> 01:02:43.988
वो ज्ञेय हो गया, तो उसमें पर्याय का भेद 
भी दिखाई देता नहीं है; भेद है 
मगर दिखाई देता (नहीं है)। आहाहा!

01:02:44.012 --> 01:02:50.300
पर्याय-भेद नहीं है गुण-भेद नहीं है, 
ऐसा नहीं; भेद का लक्ष छूट जाता है

01:02:50.324 --> 01:02:56.300
तो अभेद सामान्य और सामान्य-विशेष 
स्वरूप पूरा आत्मा ज्ञेय हो जाता है।

01:02:56.324 --> 01:03:05.677
तो उसमें सब है, अनंत गुण हैं, 
अनंत धर्म हैं, अनंत पर्यायें हैं। 
वो कहाँ जायें? मगर वहाँ लक्ष नहीं है।

01:03:05.701 --> 01:03:08.953
जिसका लक्ष होता है 
वो जानने में आता है।

01:03:08.977 --> 01:03:14.028
भेद पर लक्ष नहीं है, अभेद पर लक्ष है 
तो गुण-भेद दिखाई देते नहीं हैं।

01:03:14.052 --> 01:03:22.375
गुण-भेद तो हैं उसमें - ज्ञान है, दर्शन है, 
चारित्र; ज्ञान दर्शन नहीं है, दर्शन 
चारित्र नहीं है; अतद्भाव गुण तो हैं अनंत।

01:03:22.399 --> 01:03:27.242
मगर गुण पर, भेद पर लक्ष है नहीं 
(बल्कि) गुणी पर लक्ष है।

01:03:27.266 --> 01:03:33.135
तो गुणी का ज्ञान हुआ 
तो अनंत गुण का ज्ञान हो गया।

01:03:33.159 --> 01:03:41.957
और ज्ञान की पर्याय में परिणमन होकर 
ज्ञायक को जान लिया तो ज्ञायक के 
आश्रय से जितनी निर्मल पर्यायें हुईं,

01:03:41.981 --> 01:03:45.997
वो भी जानने में आ जाती हैं ज्ञान में।

01:03:46.021 --> 01:03:51.482
ज्ञान का स्वभाव सविकल्प है इसलिए 
जानने में आ जाती हैं, सब पर्यायें।

01:03:51.506 --> 01:03:58.371
निर्विकल्पध्यान के काल में हों! 
अंदर स्वपरप्रकाशक शक्ति है, 
अंदर के स्वपरप्रकाशक की बात है।

01:03:58.395 --> 01:04:00.086
मुमुक्षु: निर्विकल्पध्यान में?
पू. लालचंदभाई: हाँ!

01:04:00.110 --> 01:04:07.668
निर्विकल्पध्यान में, निर्विकल्पज्ञान, 
 में अंदर में विकल्प नहीं है। आहाहा!

01:04:07.692 --> 01:04:13.291
भेद का लक्ष नहीं है क्योंकि स्वपरप्रकाशक 
ज्ञान प्रगट हो गया। इसका क्या अर्थ?

01:04:13.315 --> 01:04:20.784
ज्ञान ने ज्ञान को जाना, ज्ञायक को तो जाना 
मगर आनंद आया उसको भी जान लिया।

01:04:20.808 --> 01:04:27.633
तो ज्ञान की अपेक्षा से ज्ञान स्व (है) और 
आनंद (की) पर्याय प्रगट हुई वो गुण पर है।

01:04:27.657 --> 01:04:34.020
ज्ञान गुण स्व और आनंद हुआ वो पर, 
अंदर के अंदर, स्व-पर (का विभाग है)।

01:04:34.044 --> 01:04:40.828
ऐसा स्वपरप्रकाशक, निश्चय से अंदर का 
स्वपरप्रकाशक अनुभूति के काल में होता है।

01:04:40.852 --> 01:04:44.068
जब बाहर में आता है 
तो स्वपरप्रकाशक व्यवहार (है)।

01:04:44.092 --> 01:04:50.762
एक निश्चय प्रगट हुआ तो 
निश्चयपूर्वक का व्यवहार होता है 
कि अपने आत्मा को भी जाना

01:04:50.786 --> 01:04:59.148
और व्यवहार रत्नत्रय का परिणाम भी जानने 
में आया, देव-गुरु-शास्त्र भी जानने में आया; 
तो उसका नाम स्वपरप्रकाशक व्यवहार है।

01:04:59.172 --> 01:05:08.157
एक स्वपरप्रकाशक निश्चय और 
एक स्वपरप्रकाशक व्यवहार 
और एक स्वप्रकाशक निश्चय।

01:05:08.181 --> 01:05:16.855
स्वप्रकाशक निश्चय, 
निश्चयपूर्वक स्वपरप्रकाशक निश्चय, 
बाद में स्वपरप्रकाशक व्यवहार; तीन बात हुईं।

01:05:16.879 --> 01:05:25.784
और एक स्वपरप्रकाशक भव्य-
अभव्य अज्ञानी के पास है, वो अज्ञानमय है। 
उसके पास भी स्वपरप्रकाशक है।

01:05:25.808 --> 01:05:27.820
मुमुक्षु: वो कैसा है? 
पू. लालचंदभाई: वो कैसा?

01:05:27.844 --> 01:05:32.295
कि ऐसी ज्ञप्ति है ना, तो ज्ञायक भी 
जानने में उसमें आता है, प्रतिभास (रूप)

01:05:32.319 --> 01:05:35.486
और दु:ख भी जानने में उसको, 
एकेन्द्रिय को आता है कि नहीं?

01:05:35.510 --> 01:05:40.437
तो उस अपेक्षा से स्वपरप्रकाशक है। 
मगर भेदज्ञान का अभाव है उसके पास।

01:05:40.461 --> 01:05:49.304
संज्ञी पंचेन्द्रिय हो और अपनी 
योग्यता और गुरुगम मिले, 
भेदज्ञान करे तो स्वप्रकाशक में आता है

01:05:49.328 --> 01:05:52.673
'पर को जानता ही नहीं हूँ, 
स्व-पर को भी जानता नहीं हूँ'।

01:05:52.697 --> 01:05:56.371
स्वपरप्रकाशक, 
ज्ञान का लक्षण ही नहीं है। 
क्या कहा?

01:05:56.395 --> 01:06:00.748
मुमुक्षु: स्वपरप्रकाशक, 
ज्ञान का लक्षण ही नहीं है।
पू. लालचंदभाई: नहीं है।

01:06:00.772 --> 01:06:08.304
ज्ञान का लक्षण तो स्वप्रकाशक ही है, 
तो ज्ञान में ज्ञायक तन्मय होकर 
जानने में आता है;

01:06:08.328 --> 01:06:24.984
तो अंदर का स्वपरप्रकाशक प्रगट हुआ; 
(और) बाहर का स्वपरप्रकाशक प्रगट हुआ; 
ऐसे तीन प्रकार पड़ जाते हैं, साधक को।

01:06:25.008 --> 01:06:29.611
शशिभाई! ये सब थोड़ा 
कठिन लगे लेकिन जानने जैसा है।

01:06:29.635 --> 01:06:31.966
मुमुक्षु: आपकी कृपा से 
सब सरल हो जाता है साहेब।

01:06:31.990 --> 01:06:38.922
पू. लालचंदभाई: आपकी 
आत्मा की कृपा से सरल होता है। 
दूसरे की कृपा का क्या काम है?

01:06:38.946 --> 01:06:52.144
दूसरे किसी की कृपा काम आती नहीं। 
ऐसा गंभीर विषय है बहुत। गुरुदेव के 
प्रताप से ये सब बात बाहर आ गई है।

01:06:52.168 --> 01:06:58.660
ये नियमसार (गाथा १५९) के अंदर है, 
केवलज्ञान की पर्याय के अंदर लिखा

01:06:58.684 --> 01:07:01.255
कि <b>स्व-पर स्वरूपका 
प्रकाशकपना कथंचित् कहा है</b>।

01:07:01.279 --> 01:07:06.802
सारा जगत स्वपरप्रकाशक को 
सर्वथा मानता है, अभी भी मानता है।

01:07:06.826 --> 01:07:10.868
स्वपरप्रकाशक को सर्वथा मानता है।

01:07:10.892 --> 01:07:20.740
जो सर्वथा स्वपरप्रकाशक को माने 
वो अज्ञानी है; और कथंचित् 
स्वपरप्रकाशक है वो ज्ञानी है।

01:07:20.764 --> 01:07:25.704
कथंचित् का क्या? कि 
निश्चय से स्वपरप्रकाशक अंदर का

01:07:25.728 --> 01:07:38.735
और व्यवहार से स्वपरप्रकाशक बाहर का 
तो कथंचित् हो गया, स्याद्वाद हो गया। 
वहाँ स्याद्वाद लगाओ ना। आहाहा!

01:07:38.759 --> 01:07:43.717
वो नियमसार में है, किसी (और) 
जगह पर शास्त्र में ऐसा नहीं है कथंचित्।

01:07:43.741 --> 01:07:49.922
स्वपरप्रकाशक के आगे शब्द कथंचित् 
लगानेवाले भावि तीर्थंकर हैं 
(नियमसार कलश २१२),

01:07:49.946 --> 01:07:58.740
पद्मप्रभमलधारी देव, मुनि थे मुनि, 
आचार्य नहीं, मुनि थे, साधु। आहाहा!

01:07:58.764 --> 01:08:07.651
एकदम मस्ती अंदर में आनंद की, 
उसमें लिख दिया कि केवलज्ञान में 
स्वपरप्रकाशक लोग सर्वथा मानते हैं।

01:08:07.675 --> 01:08:12.628
केवलज्ञान की पर्याय में स्वपरप्रकाशक 
सर्वथा नहीं है (बल्कि) कथंचित् है।

01:08:12.652 --> 01:08:18.197
कथंचित् है इसका अर्थ क्या? 
कि निश्चय से स्वपरप्रकाशक 
और व्यवहार से स्वपरप्रकाशक।

01:08:18.221 --> 01:08:23.402
कथंचित् में दो आते हैं। 
निश्चय-व्यवहार दोनों।

01:08:23.426 --> 01:08:28.682
अभी निश्चय स्वपरप्रकाशक 
(ही) प्रगट नहीं हुआ और 
स्वपरप्रकाशक, स्वपरप्रकाशक (कहते हैं)

01:08:28.706 --> 01:08:34.362
वो तो निगोद में (भी) है, 
क्या फायदा तेरे को हुआ?

01:08:34.386 --> 01:08:43.993
रमेशबाबू! लक्षण बाँधा है, 
पंचास्तिकाय शास्त्र है उसमें १२१ वीं 
गाथा में स्वपरप्रकाशक लक्षण किया है।

01:08:44.017 --> 01:08:46.355
शरीर लक्षण नहीं है, द्रव्येन्द्रिय ....