﻿WEBVTT LA068

00:00:53.520 --> 00:01:07.328
आज पर्याय स्वभाव का प्रकरण आनेवाला है।
एक द्रव्य स्वभाव है और एक पर्याय स्वभाव है।

00:01:07.353 --> 00:01:15.828
द्रव्य स्वभाव भी स्वभाव से अनादि-अनंत है।

00:01:15.853 --> 00:01:25.361
द्रव्य का अपना निज भाव - निज स्वभाव भाव,
स्वभाव से ही अनादि-अनंत है।

00:01:25.386 --> 00:01:39.261
उसमें कभी किसी भी कारण से फेरफार नहीं हो सकता।
उसमें फेरफार होना अशक्य है।

00:01:39.286 --> 00:01:49.385
जो है, कल था, आज है और
भविष्यकाल, अनंतकाल में भी
ऐसा का ऐसा द्रव्य स्वभाव रहेगा।

00:01:49.410 --> 00:01:57.918
द्रव्य स्वभाव निरपेक्ष है।
उसे किसी संयोग की, किसी निमित्त की अपेक्षा नहीं है।

00:01:57.943 --> 00:02:07.385
उसे कर्म का बंध होता नहीं।
उसे कर्म का उदय आता नहीं।

00:02:07.410 --> 00:02:12.251
वह द्रव्य स्वभाव कर्म के उदय में जुड़ता नहीं।

00:02:12.276 --> 00:02:21.951
वह नये कर्म को बांधता नहीं और
बंधते हैं उसमें निमित्तपना भी इसमें नहीं है।

00:02:21.976 --> 00:02:29.851
ऐसा एक द्रव्य स्वभाव
अनादि-अनंत परमात्मा का स्वभाव है।

00:02:29.876 --> 00:02:37.597
और अंदर में देखें तो
वह परिणाम से भी निरपेक्ष है।

00:02:37.680 --> 00:02:48.811
कि जिसके कारण परिणाम बिगड़े या सुधरे,
परिणाम घट जाये या बढ़ जाये,

00:02:48.836 --> 00:02:53.645
परिणाम स्वभाव में चाहे जितना फेरफार होवे,

00:02:53.670 --> 00:03:04.978
तो भी उस परिणाम से आत्मा रहित होने से
निरपेक्ष है, उसकी बिल्कुल अपेक्षा उसे नहीं है।

00:03:05.045 --> 00:03:09.778
द्रव्य स्वभाव पर्याय को छूता नहीं है।

00:03:09.803 --> 00:03:27.744
ऐसा द्रव्य स्वभाव त्रिकाली है
कि जो परिणाम होते हैं उन्हें करता भी नहीं
और परिणाम होते हैं उन्हें जानता भी नहीं।

00:03:27.769 --> 00:03:39.011
ऐसा द्रव्य स्वभाव निष्क्रिय परमात्मा है।
वह पारिणामिक भाव से विराजमान है।

00:03:39.036 --> 00:03:45.311
उसे किसी कर्म के उदय आदि की अपेक्षा नहीं है,
क्षय की अपेक्षा नहीं है।

00:03:45.336 --> 00:03:55.644
निगोद की पर्याय के समय जो द्रव्य स्वभाव है,
साधक की अवस्था के समय भी ऐसा का ऐसा है।

00:03:55.669 --> 00:04:02.344
वह परमात्मा अरिहंत और सिद्ध होता है
तो भी वैसा का वैसा है।

00:04:02.369 --> 00:04:14.910
किंचित मात्र न घटता है न बढ़ता है,
न घटे न बढ़े ऐसा अघटित घाट
अनादि-अनंत परमात्मा का स्वभाव है।

00:04:14.935 --> 00:04:18.844
अनंत गुणों का पिंड परमात्मा है।

00:04:18.869 --> 00:04:30.810
वह निष्क्रिय है, क्रिया के कारक उसमें नहीं हैं।
स्वभाव से ही अकारक और अवेदक है।

00:04:30.835 --> 00:04:41.910
किसी भी होते हुये परिणाम को करता नहीं
और होते हुये परिणाम को भोगता नहीं।

00:04:41.935 --> 00:04:52.611
अज्ञान दशा में हो तो अज्ञान भाव को करता नहीं
और अज्ञान का फल दुःख वह भोगता नहीं।

00:04:52.636 --> 00:05:01.878
साधक दशा होती है पर्याय में तो वह
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के परिणाम प्रगट होते हैं,
उन्हें करता नहीं

00:05:01.903 --> 00:05:11.278
और उनका फल आंशिक आनंद आता है पर्याय में,
उसे वह भोगता नहीं।

00:05:11.303 --> 00:05:21.945
और साधक होकर वह परमात्मा होता है,
पर्याय से - बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा,

00:05:21.970 --> 00:05:35.778
तब केवलज्ञान आदि पर्याय को करता नहीं
और यथाख्यात चारित्र का फल जो पूर्ण आनंद
उसे वह भोगता नहीं।

00:05:35.803 --> 00:05:43.605
ऐसा अकारक-अवेदक त्रिकाल सामान्य
एकरूप स्वभाव है,

00:05:43.630 --> 00:05:55.405
उसे दृष्टि का विषय कहा जाता है,
अथवा उसे शुद्धनय का विषय भी कहा जाता है।

00:05:55.430 --> 00:06:31.671
अथवा जो उपादेय तत्त्व है अनादि-अनंत,
ऐसा त्रिकाली सामान्य एकरूप स्वभाव,

00:06:31.696 --> 00:06:39.031
जिसे अपनी विशेष पर्याय में
ऐसा स्वभाव लक्ष में आता है

00:06:39.056 --> 00:06:46.598
तब उसे आत्मा का अनुभव होता है,
दर्शन होते हैं आत्मा के, भगवान के।

00:06:46.623 --> 00:06:53.065
तब पर्याय अपेक्षा से
उसे मोक्षमार्ग प्रगट हुआ कहा जाता है।

00:06:53.090 --> 00:07:05.365
द्रव्य स्वभाव से तो तीनोंकाल मुक्त है।
वह बंधा नहीं है, बंधता है वह मुक्त होता है।
बंधा नहीं है इसलिये मुक्त भी होता नहीं है।

00:07:05.390 --> 00:07:09.990
परमात्मप्रकाश में (गाथा ६८ में) कहते हैं
बंध मोक्ष से आत्मा रहित है।

00:07:10.056 --> 00:07:22.531
श्रीमद् राजचंद्रजी (व्याख्यानसार-१, बोल ८०)
कहते हैं कि दिगंबर के आचार्यों ने ऐसा कहा है कि
<b>जीव का मोक्ष नहीं होता, मोक्ष समझ में आता है</b>।

00:07:22.556 --> 00:07:36.197
अर्थात् तीनोंकाल मुक्त है, ऐसा समझ में आता है,
ऐसा जानने में आता है, ऐसा हमें अनुभव में आता है, इसप्रकार।

00:07:36.222 --> 00:07:43.355
जीव का मोक्ष नहीं होता,
मोक्ष समझ में आता है, है वह जानने में आता है।

00:07:43.380 --> 00:07:49.855
जीव का मोक्ष नहीं होता,
यदि जीव का मोक्ष होवे
तो जीव बंधा हुआ हो तो छूटे।

00:07:49.880 --> 00:07:52.955
परंतु जीव तो अबद्ध स्वभावी अनादि-अनंत।

00:07:52.980 --> 00:07:58.721
भावकर्म का भी बंध नहीं है,
द्रव्यकर्म का भी बंध नहीं है,
संयोग का भी संबंध नहीं है।

00:07:58.746 --> 00:08:04.021
ऐसा द्रव्य स्वभाव त्रिकाली सामान्य एकरूप है।

00:08:04.046 --> 00:08:16.488
अब उसे कहते हैं कि
यहाँ तो आगे बढ़कर ऐसा जो है,
ऐसे आत्मा के मूल स्वभाव को जो जानता नहीं,

00:08:16.513 --> 00:08:24.754
ऐसे अज्ञानी प्राणियों को,
नय के द्वारा उस स्वरूप को समझाते हैं संत।

00:08:24.779 --> 00:08:36.388
कि निश्चयनय से अकारक-अवेदक है,
शुद्ध द्रव्यार्थिकनय से देखने में आये तो
अकारक-अवेदक है, निष्क्रिय है।

00:08:36.413 --> 00:08:47.721
इसप्रकार नय द्वारा वस्तु के स्वरूप को वे समझाते हैं।
समझाने के लिये नय का प्रयोग यथार्थ है।

00:08:47.746 --> 00:08:55.877
क्योंकि जो जीव वस्तु के स्वरूप को
नहीं समझता, नहीं जानता,
वास्तव में कभी सुना नहीं रुचिपूर्वक,

00:08:55.960 --> 00:09:04.688
अनुभव तो हुआ नहीं,
ऐसे जीवों को समझाने के लिये संत करुणा करके,

00:09:04.713 --> 00:09:09.311
अपना नुकसान होता दिखाई दे तो भी,

00:09:09.336 --> 00:09:19.945
वे सविकल्प में आकर
नयों के दो भेद करके समझाते हैं कि
एक नय तो अन्यथा कथन करता है, व्यवहारनय तो,

00:09:19.970 --> 00:09:29.911
उसकी बात तो क्या करनी हमें?
परंतु निश्चयनय यथार्थ स्वरूप को बताता है।

00:09:29.936 --> 00:09:42.345
और हम निश्चयनय से समझाते हैं
वह समझनेवाले को ख्याल में भी आता जाता है
कि आप ऐसा कहना चाहते हो।

00:09:42.370 --> 00:09:55.245
कहनेवाले का आशय लायक श्रोता समझ सकता है।
समझकर व्यवहार का पक्ष छोड़ देता है।

00:09:55.270 --> 00:10:01.178
बुद्धिपूर्वक व्यवहार का जो पक्ष था
वह छोड़ देता है।

00:10:01.203 --> 00:10:12.011
बुद्धिपूर्वक निश्चयनय के पक्ष में आ जाता है
और फिर पक्षातिक्रांत होकर अनुभव करता है।

00:10:12.036 --> 00:10:24.811
तब श्री गुरु को नमस्कार करता है कि
आपने जो मुझे नय के द्वारा वस्तु का स्वरूप समझाया
और मैंने अपने मानसिक ज्ञान में ग्रहण किया।

00:10:24.836 --> 00:10:31.211
फिर मानसिक ज्ञान छूट गया
और आत्मिक ज्ञान में,

00:10:31.236 --> 00:10:38.177
जो मानसिक ज्ञान में आया था,
जो आपने कहा था, आपने कहा था,
मानसिक ज्ञान में आया था,

00:10:38.202 --> 00:10:45.248
ऐसा ही आत्मा मुझे आज अनुभव में आया।
आपका वचन प्रमाण है।

00:10:45.273 --> 00:10:54.144
ऐसा करके वह स्वभाव के सन्मुख होकर
और द्रव्य स्वभाव को पर्याय में,
विशेष में सामान्य को ग्रहण करता है।

00:10:54.169 --> 00:11:03.215
उस विशेष में जहाँ सामान्य का ग्रहण हुआ
वहाँ उस विशेष की उस काल की योग्यता,
शुद्धता होनेवाली थी वह हुई।

00:11:03.240 --> 00:11:08.495
सामान्य को ग्रहण किया
इसलिए शुद्धता प्रगट हुई ऐसा भी नहीं है।

00:11:08.520 --> 00:11:16.948
वह उसका शुद्धता का स्वकाल था,
अशुद्धता छूटने का स्वकाल था।

00:11:16.973 --> 00:11:28.715
उस विशेष में, उस विशेष में,
इन्द्रियज्ञान में राग और देह,
वे जानने में आते थे उसे बंद किया।

00:11:28.740 --> 00:11:34.535
और उस विशेष में सामान्य जानने में आने लगा
तब इसका स्वकाल शुद्धता का था,

00:11:34.560 --> 00:11:38.915
(तब) इसके आश्रय से शुद्धता प्रगट हुई
ऐसा उपचार से कहने में आता है।

00:11:38.940 --> 00:11:57.848
ऐसा द्रव्य स्वभाव है अनादि-अनंत।
अब <b>पर्याय स्वभाव</b> की बात शुरू होती है।

00:11:57.873 --> 00:12:14.048
मुमुक्षु:- द्रव्य स्वभाव का एकदम स्पष्ट।
उत्तर:- स्पष्ट। बहुत दिनों से चलता है न?
इसीलिए short (शॉर्ट, संक्षेप)में।

00:12:14.073 --> 00:12:27.804
मुमुक्षु:- <b>'पर्याय स्वभाव'। सिद्धांत:-
वस्तु कभी भी अपना स्वभाव छोड़ती नहीं।
वस्तु के दो विभाग।</b>

00:12:27.829 --> 00:12:31.637
उत्तर:- पहले वस्तु कही।
उस वस्तु में द्रव्य पर्याय स्वरूप दोनों आ गये।

00:12:31.662 --> 00:12:35.757
वस्तु गुणपर्ययवत् द्रव्यं
(मोक्षशास्त्र अध्याय ५, सूत्र ३८),
वह सिद्धांत कहा।

00:12:35.782 --> 00:12:39.611
वस्तु अपने स्वभाव को नहीं छोड़ती।

00:12:39.636 --> 00:12:50.778
अब वह वस्तु कैसी है?
वस्तु के दो विभाग।
वस्तु एक उसके विभाग दो, भेद दो।

00:12:50.803 --> 00:12:59.011
मुमुक्षु:- <b>१. द्रव्य स्वभाव:-
निष्क्रिय स्वरूप अपने अनादि-अनंत
अकर्ता स्वभाव को छोड़ता नहीं</b>

00:12:59.036 --> 00:13:07.317
<b>और कभी भी कर्ता होता नहीं।</b>
उत्तर:- यह द्रव्य स्वभाव।
पहला शब्द निष्क्रिय आया।

00:13:07.400 --> 00:13:11.637
क्योंकि 'निष्क्रिय: शुद्धपारिणामिक:'
(गाथा ३२०, समयसार, तात्पर्यवृत्ति टीका,
जयसेनाचार्य) उसका मूल स्वभाव है।

00:13:11.720 --> 00:13:23.971
उसका लक्षण है वह।
निष्क्रिय है वह द्रव्य स्वभाव का लक्षण है।

00:13:23.996 --> 00:13:30.005
मुमुक्षु:- <b>२. पर्याय स्वभाव:-
पर्याय भी एक वस्तु है।</b>

00:13:30.030 --> 00:13:35.971
<b>सत् अहेतुक है।
पर्याय स्वभाव से ही क्रियावंत है।</b>

00:13:35.996 --> 00:13:41.638
<b>अनादि-अनंत वह अपने
क्रिया के कारक को छोड़ती नहीं।</b>

00:13:41.663 --> 00:13:52.038
<b>पर्याय में क्रिया-(सामान्य उत्पाद-व्ययरूप
क्रिया, पराश्रित या स्वाश्रित ऐसा भेद
अभी नहीं करना) -प्रति समय हुआ ही करती है।</b>

00:13:52.063 --> 00:13:55.971
उत्तर:- उत्पाद-व्यय हुआ ही करता है।
मुमुक्षु:- <b>वह उसका स्वभाव ही है।</b>

00:13:55.996 --> 00:14:02.304
उत्तर:- उसका स्वभाव है।
उत्पाद-व्यय भी पर्याय का स्वभाव है,
वस्तु का स्वभाव है।

00:14:02.329 --> 00:14:07.504
किसी समय पर्याय में उत्पाद-व्यय न हो
ऐसा बनता नहीं।

00:14:07.529 --> 00:14:16.504
और ध्रुव में उत्पाद-व्यय हो जाये
ऐसा किसी काल में बनता नहीं।

00:14:16.587 --> 00:14:22.135
यह जैनदर्शन वस्तु-दर्शन है।
इसके दो भेद, द्रव्य स्वभाव
और (पर्याय स्वभाव)।

00:14:22.160 --> 00:14:26.077
द्रव्य निष्क्रिय और पर्याय सक्रिय,
अनादि-अनंत दोनों।

00:14:26.160 --> 00:14:29.937
अपने अपने धर्म को, स्वभाव को छोड़ते नहीं। आहाहा!

00:14:29.962 --> 00:14:34.357
मुमुक्षु:- और एक दूसरे के धर्म को
कोई ग्रहण करता नहीं है।
उत्तर:- ग्रहण करता नहीं, छूता नहीं।

00:14:34.440 --> 00:14:39.375
दो सत् अलग-अलग हैं,
सामान्य और विशेष अलग-अलग हैं।

00:14:39.400 --> 00:14:42.204
मुमुक्षु:- वास्तविक वस्तु की स्थिति का सिद्धांत।

00:14:42.229 --> 00:14:47.837
उत्तर:- प्रमाण से एक सत्ता है,
नय विभाग से देखो तो दो सत्ता हैं। आहाहा!

00:14:47.862 --> 00:14:54.170
स्वभाव से देखो तो भी दो सत्तायें हैं, अलग-अलग।
आहाहा!

00:14:54.195 --> 00:15:05.837
अभेदनय से एक सत्ता है, भेदनय से दो सत्ता हैं।
वस्तु का स्वरूप है ऐसा।

00:15:05.862 --> 00:15:13.211
मुमुक्षु:- <b>होती हुई क्रिया को मैं करूँ वह अज्ञान।</b>

00:15:13.236 --> 00:15:20.045
<b>होती हुई क्रिया को मैं रोकूँ वह भी अज्ञान।</b>

00:15:20.070 --> 00:15:33.045
<b>पर्याय में कर्ता-भोक्ता धर्म स्वभाव से ही है।
पर्याय करती है और भोगती है वह उसका स्वभाव ही है।</b>

00:15:33.070 --> 00:15:38.778
उत्तर:- मिथ्यात्व को करे और दुःख को भोगे
वह पर्याय का स्वभाव है, विभाव स्वभाव।

00:15:38.803 --> 00:15:46.178
सम्यग्दर्शन को करे पर्याय और आनंद को भोगे
वह भी पर्याय का स्वभाव है।

00:15:46.203 --> 00:15:53.444
वह विभाव कहलाता है, समझ गये?
चारों पर्यायें विभावरूप हैं -
उपशम, क्षायिक, क्षयोपशम, (औदयिक)।

00:15:53.469 --> 00:16:04.495
विभाव भी उसका स्वभाव है।
राग होना ऐसा जो विभाव वह पर्याय का तत्
समय का स्वभाव है। स्वभाव अर्थात् धर्म, ऐसा।

00:16:04.520 --> 00:16:13.844
किसी से नहीं होता,
निमित्त से नहीं होता और
आत्मा से भी नहीं होता राग।

00:16:13.869 --> 00:16:19.244
मुमुक्षु:- <b>पर्याय करती है और भोगती है
वह उसका स्वभाव ही है।</b>

00:16:19.269 --> 00:16:29.844
<b>किस नय से पर्याय को करता है और भोगता है
ऐसा नहीं। बस स्वभाव से ही
उसमें कर्ताभोक्तापना है।</b>

00:16:29.869 --> 00:16:39.425
उत्तर:- अज्ञानी हो, साधक हो,
परमात्मा हो, पर्याय में कर्ता और भोक्तापना
पर्याय का स्वभाव से ही हुआ करता है, बस।

00:16:39.450 --> 00:16:43.425
होने योग्य होता है, जाननहार जानने में आता है।

00:16:43.450 --> 00:16:49.525
जाननहार को जिसने जाना उसे ऐसा
भासित होता है कि होने योग्य होता है।

00:16:49.550 --> 00:16:54.758
उसका स्वभाव है पर्याय का,
करती है और भोगती है। आहाहा!

00:16:54.783 --> 00:16:59.655
जैसे परिणाम को वह करती है
वैसे परिणाम को वह भोगती है। आहाहा!

00:16:59.680 --> 00:17:03.491
वह परिणाम को करे और भोगूँ मैं- ऐसा नहीं है।

00:17:03.516 --> 00:17:12.858
जो करता है वह भोगता है,
जो करता नहीं वह भोगता नहीं।

00:17:12.883 --> 00:17:20.591
आत्मा तो करता नहीं है, वह दुःख को कहाँ से भोगे?

00:17:20.616 --> 00:17:31.434
यह भेदज्ञान है,
द्रव्य पर्याय के बीच का भेदज्ञान है,
उत्कृष्ट भेदज्ञान है।

00:17:31.459 --> 00:17:36.168
मुमुक्षु:- <b>अज्ञान दशा में राग को करता है
और दुःख को भोगता है।</b>

00:17:36.193 --> 00:17:41.568
उत्तर:- कौन, अज्ञान दशा में राग को करे
और (दुःख को) भोगे कौन?
मुमुक्षु:- पर्याय।

00:17:41.593 --> 00:17:47.677
उत्तर:- पर्याय, जीव नहीं?
मुमुक्षु:- नहीं। उसमें धर्म ही नहीं है
करने-भोगने का जीव में तो।

00:17:47.760 --> 00:17:57.334
उत्तर:- अच्छा!
मुमुक्षु:- <b>अज्ञान दशा में राग को करता है
और दुःख को भोगता है।</b>

00:17:57.359 --> 00:18:04.068
उत्तर:- यह पर्याय स्वभाव की बात चल रही है,
यह ध्यान रखना, प्रकरण बदल गया।
मुमुक्षु:- हाँ! पर्याय स्वभाव की।

00:18:04.093 --> 00:18:17.501
<b>साधक दशा में, वीतरागता और राग को
करता है, और आनंद और दुःख को भोगता है।</b>
साधक है न?

00:18:17.526 --> 00:18:26.934
उत्तर:- साधक दशा है, दो धर्म लिये न?
वीतरागता भी करता है और राग को भी करता है।
दुःख को भोगता है और आनंद को भोगता है।

00:18:26.959 --> 00:18:33.495
एक पर्याय में दो भाग पड़ गये,
थोड़ा वीतरागभाव, थोड़ा रागभाव।

00:18:33.520 --> 00:18:40.081
मुमुक्षु:- बोलो कैसी बात है न?
साधक दशा में ऐसा पर्याय स्वभाव है?
उत्तर:- पर्याय स्वभाव ऐसा ही है।

00:18:40.106 --> 00:18:50.128
क्योंकि जो अज्ञान दशा में पर्याय स्वभाव जैसा है
ऐसा साधक दशा में होता नहीं है।
मुमुक्षु:- सही है! यह तो पर्याय स्वभाव है।

00:18:50.153 --> 00:18:52.997
उत्तर:- पर्याय स्वभाव है
वह वीतरागभाव को करता है और राग को करता है।

00:18:53.080 --> 00:19:00.995
थोड़ा राग को करता है,
पराश्रित पर्याय है वह राग को करती है,
और स्वाश्रित पर्याय वीतरागभाव को करती है।

00:19:01.020 --> 00:19:04.795
और वह पर्याय जितना राग करती है उतना दुःख भोगती है।

00:19:04.820 --> 00:19:07.961
और पर्याय जितना वीतरागभाव को करती है
उतना सुख भोगती है।

00:19:07.986 --> 00:19:15.295
जैसा उसे करना हो ऐसा करे। आहाहा!
होने योग्य होता है।

00:19:15.320 --> 00:19:19.055
मुमुक्षु:- वीतरागता भी होने योग्य होती है
और राग भी होने योग्य होता है।
उत्तर:- होता है।

00:19:19.080 --> 00:19:22.917
आत्मा अकारक और अवेदक है, मूल बात यह है।

00:19:23.000 --> 00:19:28.995
पर्याय करती है तब द्रव्य अकर्ता रहता है, ऐसा।

00:19:29.020 --> 00:19:38.428
पर्याय जब करती है अपने कार्य को,
तब हस्तक्षेप कोई नहीं करता।
द्रव्य उसका दाता नहीं है।

00:19:38.453 --> 00:19:46.561
मुमुक्षु:- <b>साध्य दशा में पूर्ण वीतरागता को
करता है और पूर्ण आनंद को भोगता है।</b>
उत्तर:- साध्य अर्थात् मोक्ष।

00:19:46.586 --> 00:19:58.161
पूर्वोक्त साधक अवस्था थी।
पहली अज्ञान, फिर साधक और फिर साध्य,
पर्याय के तीन प्रकार किये। मीठाभाई!

00:19:58.186 --> 00:20:07.128
पहली लाइन है वह अकेला अज्ञान।
दूसरी दशा में साधक और तीसरी में साध्य।

00:20:07.153 --> 00:20:17.728
बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा
ऐसे तीन विभाग करके समझाते हैं।

00:20:17.753 --> 00:20:26.028
साध्य अर्थात् मोक्ष,
ऐसी जो दशा होती है जीव की,
तब <b>पूर्ण वीतरागता को करता है</b>।

00:20:26.053 --> 00:20:30.361
कौन करता है? पर्याय करती है।

00:20:30.386 --> 00:20:39.328
और पूर्ण आनंद को भोगता है कौन?
पर्याय भोगती है। भगवान आत्मा नहीं भोगता।

00:20:39.353 --> 00:20:49.494
<b>इसप्रकार</b> ...
मुमुक्षु:- <b>इसप्रकार पर्याय अपने
कर्ताभोक्ता धर्म को कभी भी छोड़ती नहीं है।</b>

00:20:49.519 --> 00:20:55.761
उत्तर:- आहाहा! सोलहवाँ पेज अंतिम लाइन से।
<b>साध्यदशा में पूर्ण वीतरागता को करती है
और पूर्ण आनंद को भोगती है।</b>

00:20:55.786 --> 00:20:59.761
पर्याय हों! पर्याय स्वभाव की बात चल रही है।
आत्मा नहीं करता-भोगता।

00:20:59.786 --> 00:21:09.894
आत्मा कर्ता-भोक्ता है ऐसी
भ्रांति अनादिकाल से है, तो भी आत्मा
कर्ता होता नहीं है, अकर्तापना छोड़ता नहीं है।

00:21:09.919 --> 00:21:18.298
कर्ता प्रतिभासित होता है अज्ञानी को,
कि राग को मैं करता हूँ, ऐसा प्रतिभासित होता है
तो भी भगवान आत्मा राग को करता नहीं है।

00:21:18.323 --> 00:21:22.456
उस समय अज्ञान दशा में भी पर्याय राग को करती है।

00:21:22.523 --> 00:21:30.631
अज्ञान दशा पहली ली,
फिर साधक की ली और
फिर साध्य, तीन विभाग किये।

00:21:30.656 --> 00:21:35.655
राग को न करे तो कुछ नहीं परंतु
केवलज्ञान को करता है या नहीं आत्मा? कि नहीं करता!
मुमुक्षु:- नहीं करता।

00:21:35.680 --> 00:21:46.097
वह तो पर्याय का स्वभाव है।
करना आत्मा का स्वभाव ही नहीं है।
उत्तर:- नहीं है। निष्क्रिय है वह तो पहले कह दिया।

00:21:46.122 --> 00:21:52.597
मुमुक्षु:- अनादि-अनंत अकर्ता
स्वभाव को छोड़ता नहीं।
उत्तर:- हाँ, छोड़ता नहीं।

00:21:52.622 --> 00:22:02.631
यह घोटाला कहाँ हुआ है?
और इस घोटाले का समाधान
कुंदकुंद भगवान ने कहा, महापुरुष एक।

00:22:02.656 --> 00:22:12.364
गड़बड़ क्यों हुई?
पर्याय को करता है और भोगता है,
ऐसा अनादि से अज्ञान का प्रवाह चल रहा है।

00:22:12.389 --> 00:22:18.730
आत्मा ही करता है और आत्मा ही भोगता है अकेला।
आत्मा अकेला करता है और अकेला भोगता है।

00:22:18.755 --> 00:22:24.828
अज्ञान दशा में अकेला, साधक दशा में अकेला
और पूर्ण परमात्मा होवे तब भी अकेला।

00:22:24.852 --> 00:22:34.364
ऐसा संत लिखते हैं,
अकेला करता है और अकेला भोगता है।
यह सब आगम में है।

00:22:34.389 --> 00:22:42.730
वह कहते हैं,
कुंदकुंदाचार्य भगवान ने कलम चलायी कि
व्यवहारनय समस्त ही अभूतार्थ है।

00:22:42.755 --> 00:22:51.297
वे उपचार के कथन हैं।
मिथ्यात्व के परिणाम को जीव करता है
वह उपचार का कथन है, व्यवहार का कथन।

00:22:51.322 --> 00:22:56.963
सम्यग्दर्शन की पर्याय को करता है आत्मा,
वह उपचार का कथन है।

00:22:56.988 --> 00:23:00.797
केवलज्ञान को करता है, उपचार का कथन है।

00:23:00.822 --> 00:23:09.863
वह उपचार जो व्यवहार है
वह तुझे सत्यार्थ लगा है
इसलिये तेरा अज्ञान रह गया।

00:23:09.888 --> 00:23:15.163
गुरुदेव ने वे दो विभाग अलग किये
-द्रव्य स्वभाव और पर्याय स्वभाव।

00:23:15.188 --> 00:23:25.130
यह जो द्रव्य स्वभाव और पर्याय स्वभाव की बात
(प्रवचन रत्नाकर के) ११ भाग तुम पढ़ो
तो उसमें मिलेगी।

00:23:25.155 --> 00:23:33.130
यह तो ११ में से सार निकालकर हमने अलग बाहर रखा,
लोगों का ध्यान खिंचे इसलिये।

00:23:33.155 --> 00:23:38.930
करती है और भोगती है - किस नय का कथन है?
कि भाई अशुद्ध निश्चयनय का कथन।

00:23:38.955 --> 00:23:47.963
अशुद्ध निश्चयनय का कथन अर्थात्
पर्यायार्थिकनय का कथन अर्थात् व्यवहारनय का कथन,
इसप्रकार शास्त्र में सब आता है स्पष्टीकरण।

00:23:47.988 --> 00:23:54.930
परंतु व्यवहार के पक्षवाले को
वह व्यवहार सत्यार्थ लगा,
इसलिये अज्ञान रह गया।

00:23:54.955 --> 00:23:58.637
मुमुक्षु:- अशुद्ध निश्चयनय कहा
अर्थात् पर्याय स्वभाव हो गया।
उत्तर:- हो गया।

00:23:58.720 --> 00:24:06.630
अर्थात् उपचार से, अर्थात् इसके ऊपर उपचार आया।

00:24:06.655 --> 00:24:15.463
कुंभार तो घड़े की पर्याय को करता नहीं
परंतु मिट्टी भी घड़े की पर्याय को करती नहीं।

00:24:15.488 --> 00:24:24.283
मिट्टी करे तो एक जैसे ही घड़े होने चाहिये,
फेरफार होना (नहीं चाहिये)।
मुमुक्षु:- परंतु करती ही नहीं है न मिट्टी?

00:24:24.316 --> 00:24:30.858
उत्तर:- उसके लिये यहाँ
परमात्मप्रकाश की ६५ और ६८ गाथा चलती थी।

00:24:30.883 --> 00:24:37.858
और यह जयसेन आचार्य की ३२० गाथा
अकारक-अवेदक की। कौन से साल में?
मुमुक्षु:- ६७।

00:24:37.883 --> 00:24:40.858
उत्तर:- ६७ की साल में। उसे याद होता है।
मुमुक्षु:- नहीं, ६७ तो आपकी थी।

00:24:40.883 --> 00:24:48.325
बाकी महाराज...
उत्तर:- ६८ की साल में, कितने वर्ष हुये?
मुमुक्षु:- बाईस।

00:24:48.350 --> 00:24:58.658
उत्तर:- बाईस साल पहले यह गाथा चलती थी
तब आत्मा अकारक-अवेदक है, अपने
परिणाम होने योग्य होते हैं, उन्हें करता नहीं है।

00:24:58.683 --> 00:25:05.191
उसका एक जबरदस्त अकाट्य दृष्टांत दिया।
अकाट्य, कोई काट न सके।

00:25:05.216 --> 00:25:13.824
कि देखो, एक परमाणु लो,
एक परमाणु में मुख्यरूप से चार गुण,
स्पर्श, रस, गंध और वर्ण।

00:25:13.849 --> 00:25:24.691
तो वर्ण नाम की पर्याय लो, तो पहले समय
काली थी, दूसरे समय सफेद हो जाती है,
तीसरे समय लाल हो जाती है।

00:25:24.716 --> 00:25:28.824
अब उसे किसी निमित्त की अपेक्षा नहीं है
(क्योंकि) अलग परमाणु लिया है।

00:25:28.849 --> 00:25:38.197
गुण एक जैसा और पर्याय में फेरफार होने लगा,
तो उस गुण से भी पर्याय होती नहीं है, द्रव्य से
(भी) होती नहीं है, उसके स्वकाल में पर्याय होती है।

00:25:38.280 --> 00:25:45.324
ऐसा एक जबरदस्त सिद्धांत रखा उन्होंने। आहाहा!

00:25:45.349 --> 00:25:58.590
कर्ताबुद्धि छूट जाये! ज्ञाता हो जाये
साक्षात्, परमात्मा हो जाये दृष्टि में,
(पूर्ण) परमात्मा थोड़े टाइम में।

00:25:58.615 --> 00:26:06.423
एक परमाणु लिया। स्कन्ध का परमाणु नहीं लिया,
(स्कन्ध लिया होता) तो तो इसके निमित्त से
यह हुआ और इसके निमित्त से यह हुआ। नहीं!

00:26:06.448 --> 00:26:14.423
एक पृथक परमाणु लो,
उसमें वर्ण नाम का गुण लो,

00:26:14.448 --> 00:26:21.623
वर्ण नाम का एक गुण जो है
उसकी एक समय की पर्याय काली
और दूसरे समय सफेद हो जाती है,

00:26:21.648 --> 00:26:25.215
संख्यात गुणी सफेद,
असंख्यात गुणी सफेद,
अनंत गुणी सफेद हो जाती है,

00:26:25.240 --> 00:26:32.123
फिर उसमें भी वृद्धि-हानि हो जाती है।
कौन करता है उसे?
मुमुक्षु:- पर्याय करती है पर्याय को।

00:26:32.148 --> 00:26:37.135
उत्तर:- यदि गुण करे तो
एक सी पर्याय होनी चाहिये,
और काली के बाद सफेद नहीं ही होगी।

00:26:37.160 --> 00:26:45.854
यदि काली पर्याय को करे
तो सफेद पर्याय नहीं होवे,
काली ही किया करे।

00:26:45.879 --> 00:26:51.808
परंतु कर्ता नहीं है, गुण तो निष्क्रिय है।
ऐसा दृष्टांत दिया था।

00:26:51.833 --> 00:27:00.088
मुमुक्षु:- आपने मुझे बाईस वर्ष पहले
बताया था, मैंने तो तब ही लिख लिया था,
तबसे मुझे याद है।

00:27:00.113 --> 00:27:04.975
उत्तर:- धुन चढ़ी थी गुरुदेव को
उस गाथा में, ३२० गाथा में दृष्टांत दिया।

00:27:05.000 --> 00:27:19.075
आत्मा कर्ता नहीं है। आहाहा!
जैसे चक्षु देखनेवाला है ऐसे
आत्मा देखनेवाला जाननेवाला है, करनेवाला नहीं है।

00:27:19.100 --> 00:27:22.508
यह कर्ता-भोक्ता का शल्य जबरदस्त है।

00:27:22.533 --> 00:27:30.741
कोई तो ईश्वर को कर्ता मानता है,
कोई कर्म को कर्ता मानता है और
कोई स्वयं को कर्ता मानता है, तीनों अज्ञानी हैं।

00:27:30.766 --> 00:27:34.007
मुमुक्षु:- तीनों अपसिद्धांत हैं।
उत्तर:- अपसिद्धांत।

00:27:34.032 --> 00:27:38.007
कुंदकुंद भगवान द्रव्यलिंगी मुनि को कहते हैं,

00:27:38.032 --> 00:27:40.807
जैसे ईश्वर कर्तावादी है
ऐसे तू यदि करेगा,

00:27:40.832 --> 00:27:48.007
कि 'मैं कर्ता हूँ पर को और अपने परिणाम को'
तो तेरे में और ईश्वर के कर्तावादी में
कोई अंतर नहीं है, अन्यमति हो!

00:27:48.032 --> 00:27:54.095
अन्यमति कह दिया। तेरा मोक्ष नहीं होगा, ऐसा।
ऐसा कहा मोक्ष नहीं होगा।

00:27:54.120 --> 00:27:58.874
मुमुक्षु:- अर्थात् अपने परिणाम का कर्ता
माने उसका मोक्ष नहीं होगा।

00:27:58.899 --> 00:28:09.574
उत्तर:- मौत होती है! मौत होती है!
भावमरण होता है परंतु मोक्ष (नहीं होता)।

00:28:09.599 --> 00:28:15.840
मुमुक्षु:- गुरुदेवश्री का महासिद्धांत
अच्छा फरमाया, आपने कहा न कि
घोटाला क्यों हो गया? इस कारण से हुआ।

00:28:15.865 --> 00:28:21.157
उत्तर:- उपचार के कथन आते हैं,
असीम शास्त्रों में,
अकेला करता है और अकेला भोगता है।

00:28:21.182 --> 00:28:31.406
प्रवचनसार में, अमृतचंद्र आचार्य भगवान कहते हैं
अरे! मैं अज्ञान अवस्था में था न?
अमृतचंद्र आचार्य समर्थ!

00:28:31.431 --> 00:28:38.040
मैं अज्ञान अवस्था में था न,
मैं अकेला परिणाम को करता था
और परिणाम को भोगता था।

00:28:38.065 --> 00:28:43.557
अर्थात् वे परिणाम दूसरे से नहीं होते थे
इतना उन्हें बताना था, पर से भिन्नपना।

00:28:43.640 --> 00:28:48.273
और फिर जब भेदविज्ञान हुआ,
तब मैं अकेला ही मोक्षमार्ग में आया

00:28:48.298 --> 00:28:55.081
और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के
परिणाम को अकेला करता हूँ
और आनंद को अकेला मैं भोगता हूँ। आहाहा!

00:28:55.106 --> 00:29:05.358
ऐसे जो उपचार के कथन, व्यवहारनय के कथन,
वे सत्यार्थ जिसे लगते हैं उसे सम्यग्दर्शन
होनेवाला नहीं है। तीनकाल में नहीं होगा।

00:29:05.441 --> 00:29:11.748
मुमुक्षु:- किस प्रकार से हो? आत्मा ऐसा है नहीं।
उत्तर:- आत्मा तो निष्क्रिय है।
आत्मा को कर्ता माना।

00:29:11.773 --> 00:29:17.514
आत्मा को अकर्ता रखकर
पर्याय पर्याय को करती है ऐसा जानो।

00:29:17.539 --> 00:29:23.575
ऐसा जानो कि मैं तो अकर्ता हूँ
और परिणाम परिणाम से होता है,
परिणाम परिणाम को करता है। बस!

00:29:23.600 --> 00:29:36.781
तो अकर्ता के पक्ष में तो आया, भले ही
साक्षात् बाद में होवे परंतु अकर्ता में तो आया,
इतना भेदज्ञान तो हुआ। आहाहा!

00:29:36.806 --> 00:29:50.547
ये तीनों बातें ली हैं देखो! अज्ञान दशा,
साधक दशा और परमात्म दशा।
बहुत व्यवस्थित सब कुछ आता था!

00:29:50.572 --> 00:29:54.877
<b>इसप्रकार पर्याय</b> ...
मुमुक्षु:- <b>इसप्रकार पर्याय अपने
कर्ता-भोक्ता धर्म को कभी भी छोड़ती नहीं।</b>

00:29:54.960 --> 00:29:58.514
उत्तर:- आहाहा! करती ही है तीनोंकाल।

00:29:58.539 --> 00:30:07.547
आत्मा कर्ता है ऐसा जो कहा उसका अर्थ
पर्याय करती है और पर्याय का आरोप
आत्मा के ऊपर देकर आत्मा करता है,

00:30:07.572 --> 00:30:15.714
ऐसा आरोपित कथन, व्यवहार का कथन है,
वास्तव में वह कथन सच्चा नहीं है।
मुमुक्षु:- सच्चा नहीं है। ऐसा नहीं है। सही बात है।

00:30:15.739 --> 00:30:21.477
यह पर्याय स्वभाव बताकर
यह बहुत स्पष्ट कर दिया है भाई! हों!
यह पर्याय स्वभाव है।

00:30:21.502 --> 00:30:28.813
उत्तर:- पर्याय स्वभाव है।
कर्ता का उपचार देंगे, व्यवहार के कथन तो
अनेक प्रकार के आते हैं, उसमें क्या है?

00:30:28.838 --> 00:30:35.076
मुमुक्षु:- पर्याय स्वभाव है यह तो।
अर्थात् द्रव्य स्वभाव नहीं है।
उत्तर:- नहीं है!

00:30:35.101 --> 00:30:44.076
करना-भोगना वह तो पर्याय का स्वभाव है,
जीव का स्वभाव नहीं है।
जीव तो अकारक-अवेदक निष्क्रिय परमात्मा है।

00:30:44.101 --> 00:30:50.643
आहाहा! पर्यायरूप से परिणमता ही नहीं न,
तो पर्याय को करे कहाँ से? तद्रूपो न भवति
(समयसार गाथा ३२०, जयसेन आचार्यदेव की टीका)

00:30:50.668 --> 00:30:58.767
आहाहा! शिष्य के मुख में प्रश्न आया
कि यह मिथ्यात्व अवस्था में राग को करता है जीव?
कि झूठी बात है।

00:30:58.801 --> 00:31:01.576
कि झूठी बात हो तो कारण बताओ?

00:31:01.601 --> 00:31:09.876
हमने तो शास्त्र में जगह-जगह पढ़ा है
कि अज्ञानी आत्मा राग को करता है,
अज्ञानी का आत्मा राग को करता है।

00:31:09.901 --> 00:31:15.335
कि नहीं! तद्रूपो न भवति, उसरूप नहीं होता
इसीलिये भगवान आत्मा राग को नहीं करता।

00:31:15.360 --> 00:31:24.076
(राग) होता है तब भी वह अकर्ता रहता है,
वह टलता है तब अकर्ता हुआ ऐसा नहीं।

00:31:24.101 --> 00:31:32.442
मिथ्यात्व की पर्याय होती है तब
मिथ्यात्व की पर्याय का भगवान आत्मा अकर्ता है।

00:31:32.467 --> 00:31:44.908
वह मिथ्यात्व की पर्याय टल जाती है
तब अकर्ता हुआ, ऐसा नहीं है।
वह तो प्रथम से ही अकर्ता है। आहाहा!

00:31:44.933 --> 00:31:59.775
ऐसा अकर्ता स्वभाव दृष्टि में आया
उसे पर्याय दृष्टि छूटकर सम्यग्दर्शन होता ही है।
आगे।

00:31:59.800 --> 00:32:07.441
मुमुक्षु:- <b>पर्याय के ऐसे
स्वभाव को जानने का निषेध नहीं है</b>।
उत्तर:- पर्याय, पर्याय में ऐसे क्रिया के कारक हैं।

00:32:07.466 --> 00:32:13.881
पर्याय में मिथ्यात्व अवस्था मिथ्यात्व को करती है।
(पर्याय) सम्यग्दर्शन को करती है,
वह पर्याय केवलज्ञान को करती है।

00:32:13.906 --> 00:32:21.581
ऐसा पर्याय स्वभाव है
उसे जानने का निषेध नहीं है,
परंतु 'मैं करता हूँ' उसका निषेध है।

00:32:21.606 --> 00:32:27.647
मुमुक्षु:- बोलो! पर्याय का ज्ञान हो जाता है
और द्रव्य-दृष्टि हो जाती है।
उत्तर:- द्रव्य-दृष्टि होती है।

00:32:27.672 --> 00:32:34.497
होने योग्य होता है और जाननहार जानने में आता है,
वह यह है, वह यह है।

00:32:34.580 --> 00:32:42.781
पर्याय के ऐसे स्वभाव को,
जो तीन प्रकार ऊपर कहे, अज्ञान अवस्था में,
साधक अवस्था में या साध्य अवस्था में,

00:32:42.806 --> 00:32:57.847
पर्याय का जो ऐसा स्वभाव है उसे
<b>जानने का निषेध नहीं है, परंतु उसमें मैंपने का
निषेध है।</b> 'मैं करता हूँ' उसका निषेध है। आहाहा!

00:32:57.872 --> 00:33:05.880
मुमुक्षु:- भाई, होने योग्य होता है
और जाननहार जानने में आता है।
उत्तर:- वही आया न? आहाहा!

00:33:05.905 --> 00:33:17.180
तीनलोक के नाथ की वाणी मे  ... आहाहा!
तो दिव्यध्वनि है।

00:33:17.205 --> 00:33:23.413
अधिक तो कहा नहीं जाता क्योंकि पंचमकाल है,
हजम नहीं होता किसी को।

00:33:23.438 --> 00:33:30.280
तो भी हम तो किसी-किसी बार कह देते हैं।
आहाहा!

00:33:30.305 --> 00:33:40.213
भविष्य में ऐसा तो होगा कि ये एक पुरुष हो गये,
(वे) ऐसा कह गये हैं। बस है,
किसी का काम होगा उसमें।

00:33:40.238 --> 00:33:45.813
मुमुक्षु:- यह तो परमाणु का दृष्टांत
गुरुदेव की दिव्यध्वनि में आनेवाला है।
उत्तर:- हाँ! आनेवाला है, आनेवाला है।

00:33:45.838 --> 00:33:53.679
परमाणु का दृष्टांत बहुत अच्छा।
गुण एक जैसा, पर्याय में फेरफार हुआ करता है।

00:33:53.704 --> 00:34:01.713
श्रद्धा नाम का गुण एक जैसा और
पर्याय में मिथ्यात्व, पर्याय में उपशम सम्यक्,
क्षयोपशम सम्यक्, क्षायिक सम्यक्। बोलो!

00:34:01.738 --> 00:34:08.979
पर्याय में फेरफार हुआ ही करता है।
आहाहा! बोलो आगे।

00:34:09.004 --> 00:34:15.046
मुमुक्षु:- <b>मैं तो ज्ञायक हूँ।
स्वभाव से ही अकारक और अवेदक हूँ।</b>

00:34:15.071 --> 00:34:20.813
<b>मेरापना यहाँ आया तो,
द्रव्य स्वभाव को जानते-जानते,</b>

00:34:20.838 --> 00:34:25.513
<b>पर्याय के कर्ता-भोक्ता धर्म
जैसे हैं वैसे जानने में आ जाते हैं।</b>
उत्तर:- <b>जानने में आ जाते हैं।</b>

00:34:25.538 --> 00:34:30.161
मुमुक्षु:- <b>पर्याय के कर्ता-भोक्ता धर्म
जैसे हैं वैसे जानने में आ जाते हैं।</b>
उत्तर:- <b>जानने में आ जाते हैं</b>, उन्हें जानता नहीं है।

00:34:30.186 --> 00:34:34.197
जानने में आ जाते हैं, जनित जाते हैं। लक्ष नहीं है न वहाँ।

00:34:34.280 --> 00:34:40.294
मुमुक्षु:- और पर्याय के कर्ता-भोक्ता धर्म।
उत्तर:- हाँ। पर्याय के कर्ता-भोक्ता धर्म हों!

00:34:40.319 --> 00:34:45.827
मुमुक्षु:- जैसे हैं वैसे जानने में आ जाते हैं।
इसमें सब आ गया।

00:34:45.852 --> 00:34:49.835
उत्तर:- परिणाम होने योग्य होते हैं
और जाननहार जानने में आता है।

00:34:49.860 --> 00:34:56.727
मुमुक्षु:- होने योग्य होता है
वह जनाता नहीं है, जाननहार जनाता है।
उत्तर:- हाँ। जनाता है।

00:34:56.752 --> 00:35:03.827
मुमुक्षु:- <b>आत्मा व्यवहार से
कर्ता भोक्ता नहीं है।
वह तो पर्याय स्वभाव ही है।</b>

00:35:03.852 --> 00:35:08.760
ओहो! <b>आत्मा व्यवहार से कर्ता भोक्ता नहीं है।</b>

00:35:08.785 --> 00:35:16.585
उत्तर:- निश्चय से तो कर्ता-भोक्ता नहीं है
परंतु आत्मा उपचार से भी
परिणाम का कर्ता-भोक्ता नहीं है।

00:35:16.610 --> 00:35:19.657
मुमुक्षु:- क्योंकि <b>वह तो पर्याय स्वभाव ही है।</b>
उत्तर:- पर्याय स्वभाव है।

00:35:19.740 --> 00:35:26.975
वह जयपुर में कहा था कि
निर्मल पर्याय का कर्ता उपचार से भी नहीं है।

00:35:27.000 --> 00:35:30.557
अर्थात् व्यवहार से भी सम्यग्दर्शन का कर्ता नहीं है।

00:35:30.582 --> 00:35:38.293
निश्चय से तो नहीं है आत्मा कर्ता
परंतु व्यवहारनय से (भी) कर्ता नहीं है।

00:35:38.318 --> 00:35:46.693
व्यवहारनय से कर्ता नहीं है, तुझे यदि इतना
लेना हो तो व्यवहारनय से ज्ञाता है- इतना ले,
किन्तु कर्ता का शल्य निकाल दे।

00:35:46.718 --> 00:35:50.484
क्या कहा?
मुमुक्षु:- व्यवहारनय से कर्ता हूँ
उसका शल्य तो निकाल दे।

00:35:50.560 --> 00:35:54.357
उत्तर:- निकाल दे।
मुमुक्षु:- ज्ञाता लेना हो तो ले।
उत्तर:- ले, ले थोड़े time (टाइम, काल) के लिये,

00:35:54.440 --> 00:36:03.093
temporary (टेम्परेरी, अल्प काल के लिए) ऐसा कहते हैं,
लेकिन कर्ता का शल्य तो छोड़ दे अभी।

00:36:03.118 --> 00:36:09.892
मुमुक्षु:- हाथ हिलाता हूँ ऐसा तो ले ही मत
लेकिन हिलते हुये हाथ को जानता हूँ,
थोड़े टाइम के लिये ये ले ले।

00:36:09.917 --> 00:36:16.292
उत्तर:- आहाहा! पर्याय को मैं करता हूँ
वह कर्ताबुद्धि छोड़ दे कि निश्चय से भी कर्ता नहीं हूँ
और व्यवहार से भी कर्ता नहीं हूँ।

00:36:16.317 --> 00:36:24.026
तो व्यवहार करना हो तो क्या कहना?
कि व्यवहार से उसे जानता है, इतना कह सकते हैं। आहाहा!

00:36:24.051 --> 00:36:29.392
वरना करता है, वह शल्य तो भाईसाहब निकाल देना।
आहाहा!

00:36:29.417 --> 00:36:35.895
भाषा बोलता है व्यवहारनय से कर्ता और
मानता है निश्चय से कर्ता,
ऐसा मईल्ल धवल में पाठ आया है।

00:36:35.978 --> 00:36:39.295
मईल्ल धवल में एक पाठ आया है

00:36:39.320 --> 00:36:47.826
कि जीव ऐसा कहते हैं कि व्यवहारनय से,
देह है वह व्यवहारनय से मेरा है,
निश्चयनय से मेरा नहीं है, ऐसा बोलते हैं भाषा में।

00:36:47.851 --> 00:36:53.292
परंतु वे जो बोलते हैं व्यवहारनय से मेरा है,
वे निश्चयनय से मेरा मानते हैं।

00:36:53.317 --> 00:36:59.225
ऐसे व्यवहारनय से कर्ता हूँ परिणाम का,
ऐसा जो भाषा में आया
वह निश्चयनय से कर्ता है (ऐसा मानता है)।

00:36:59.250 --> 00:37:04.677
उसकी भाषा में ऐसा क्यों नहीं आया
कि व्यवहारनय से ज्ञाता है?
कर्ता का क्यों आया शल्य?

00:37:04.760 --> 00:37:13.425
मुमुक्षु:- कर्ताबुद्धि है इसलिये।
बराबर है एकदम।
उत्तर:- वाणी में कर्ता क्यों आया व्यवहारनय से?

00:37:13.450 --> 00:37:20.825
वाणी में ऐसा क्यों नहीं आया कि
व्यवहारनय से उसे जानता है, परिणाम को?
मुमुक्षु:- सही है। न्याय से बात है।

00:37:20.850 --> 00:37:24.255
मुमुक्षु:- ऐसा ले तो तो
जानने के व्यवहार को उलंघ जायेगा।
उत्तर:- हाँ!

00:37:24.280 --> 00:37:30.258
तो जानने के लिये नहीं रुकेगा, वह छूटकर अनुभव होगा।

00:37:30.283 --> 00:37:38.558
परंतु व्यवहार से मैं कर्ता हूँ
वह छूटकर अनुभव नहीं होगा,
क्योंकि ज्ञाता के पक्ष में भी नहीं आया।

00:37:38.583 --> 00:37:46.858
मुमुक्षु:- ज्ञाता के पक्ष में भी आया नहीं।
उत्तर:- वह वाला पक्ष...
सम्यग्दर्शन का कर्ता उपचार से भी नहीं है।

00:37:46.883 --> 00:37:56.215
और वह ही बात कुंदकुंद भगवान ने
नियमसार में पाँच रत्न की (७७-८१) गाथा में
कहा कि पर्याय का कर्ता व्यवहार से भी नहीं है।

00:37:56.240 --> 00:38:04.898
कर्ता ही नहीं है, निश्चय से या व्यवहार से कर्ता ही नहीं है
क्योंकि होने योग्य परिणाम होते हैं,
इसलिये कर्तापना इसे लागु नहीं पड़ता।

00:38:04.923 --> 00:38:14.331
व्यवहार से कर्ता मतलब निमित्तकर्ता हो जायेगा वह।

00:38:14.356 --> 00:38:28.598
मिट्टी घड़े की पर्याय को निश्चय से तो नहीं करती
परंतु व्यवहार से करती है - व्यवहार से करती है मतलब
मिट्टी कारण बन गई और घड़ा कार्य हो गया।

00:38:28.623 --> 00:38:33.765
कि कर्ता भी नहीं है और कारण भी नहीं है,
अर्थात् निमित्त कारण उसमें नहीं है।

00:38:33.790 --> 00:38:43.797
उसकी मौजूदगी है, मिट्टी द्रव्य की,
तो घट की पर्याय हुई ऐसा नहीं है।

00:38:43.822 --> 00:38:52.757
इसलिये उसमें कर्तापना भी नहीं है
और कारणपना भी नहीं है अर्थात्
निमित्तपने का भी उसमें अभाव। सूक्ष्म बात है।

00:38:52.840 --> 00:39:01.748
मुमुक्षु:- कर्ता और कारण दो (शब्द) लिये,
उसका रहस्य है।
उत्तर:- रहस्य है।

00:39:01.773 --> 00:39:06.335
सम्यग्दर्शन का निश्चय से तो कर्ता नहीं है,
व्यवहार से भी कर्ता नहीं है।

00:39:06.360 --> 00:39:12.895
व्यवहार से कर्ता नहीं है अर्थात् उसकी उपस्थिति है
तो यहाँ होता है, ऐसा नहीं है।

00:39:12.920 --> 00:39:16.375
वह है तो यहाँ होता है
वह निमित्तपना उसमें है, ऐसा नहीं है।

00:39:16.400 --> 00:39:20.081
क्योंकि आत्मा तो अनादि का था,
क्यों सम्यग्दर्शन नहीं हुआ?

00:39:20.106 --> 00:39:24.548
अर्थात् आत्मा कर्ता भी नहीं है
और निमित्त कारण भी नहीं है।

00:39:24.573 --> 00:39:32.248
अब यदि आत्मा कर्ता नहीं है तो
सम्यग्दर्शन की पर्याय का कर्ता कौन है?
कि पर्याय का कर्ता पर्याय है।

00:39:32.273 --> 00:39:44.615
आत्मा उसमें निमित्त नहीं है तो निमित्तकारण बताओ?
कि कर्म का अभाव निमित्त है।
यह बात १३ वीं गाथा में ली है।

00:39:44.640 --> 00:39:49.698
मुमुक्षु:- स्वयं और पर जिनके कारण हैं।
स्वयं और पर जिनके कारण हैं।
उत्तर:- (हाँ)।

00:39:49.723 --> 00:39:56.295
पर्याय का कारण पर्याय है, उसका क्षणिक उपादान।
निमित्तकारण कर्म का अभाव है।

00:39:56.320 --> 00:40:05.698
नौ की नौ पर्याय में पुराने कर्म लेना, नये कर्म नहीं।

00:40:05.723 --> 00:40:22.365
नये कर्म के बंध में कारण होवे
ऐसा पर्याय का भी स्वभाव नहीं है।

00:40:22.390 --> 00:40:31.655
निर्मल पर्याय हो वह पर्याय का स्वभाव है,
तब कर्म के अभाव को
निमित्तकर्ता कहने में आता है।

00:40:31.680 --> 00:40:37.465
उपादानकर्ता पर्याय और
निमित्तकर्ता पुराने कर्म का अभाव।

00:40:37.490 --> 00:40:42.015
परंतु उपादानकर्ता भी आत्मा नहीं
और निमित्तकर्ता भी आत्मा (नहीं)।

00:40:42.040 --> 00:40:55.665
क्योंकि आत्मा तो निमित्त पहले से ही था,
क्यों सम्यग्दर्शन नहीं हुआ?
सूक्ष्म बात है! आहाहा!

00:40:55.690 --> 00:41:10.865
चलो आगे। आगे चलो।
कर्ता भी नहीं है और कारण भी नहीं है। आहाहा!

00:41:10.890 --> 00:41:18.524
(नियमसार में गाथा ७७-८१) में लिया है,
कर्ता नहीं है, कारयिता नहीं है, अनुमोदक नहीं है
और कारण भी नहीं है। आहाहा!

00:41:18.549 --> 00:41:23.058
पर्याय का कारण पर्याय ही है।
मुमुक्षु:- वह पर्याय का स्वभाव ही है।
उत्तर:- वह पर्याय का स्वभाव है।

00:41:23.083 --> 00:41:30.791
और तुझे यदि निमित्त चाहिए हो तो
कर्म का सदभाव-अभाव ले ले, बस।
लेकिन आत्मा को तो निमित्त मत बना।

00:41:30.816 --> 00:41:38.615
आत्मा का निमित्तपना टालने के लिये उसको
निमित्त कहा, सापेक्ष। है तो वह
भी निरपेक्ष, है तो वह भी निरपेक्ष।

00:41:38.640 --> 00:41:58.325
परंतु यह आत्मा निमित्तकर्ता नहीं है।
मुमुक्षु:- पर्याय भी निरपेक्ष है।
उत्तर:- (हाँ), चलो आगे।

00:41:58.350 --> 00:42:02.725
<b>आत्मा व्यवहार से कर्ता भोक्ता नहीं है।</b>
मुमुक्षु:- <b>वह तो पर्याय स्वभाव ही है</b>।

00:42:02.750 --> 00:42:06.058
उत्तर:- <b>वह तो पर्याय स्वभाव ही है</b>।
मुमुक्षु:- <b>पर्याय स्वभाव ही है।</b>

00:42:06.083 --> 00:42:11.225
<b>कर्ता भोक्ता धर्म पर्याय में स्वभाव से ही हैं।</b>
उत्तर:- <b>स्वभाव से ही हैं।</b>

00:42:11.250 --> 00:42:16.425
मुमुक्षु:- <b>धर्मी तो मात्र
पर्याय के धर्मों को जानता है।</b>

00:42:16.450 --> 00:42:24.591
<b>धर्मी तो मात्र पर्याय के धर्मों को जानता है।
व्यवहारनय से भी मैं कर्ता भोक्ता नहीं हूँ।</b>

00:42:24.616 --> 00:42:28.425
<b>व्यवहारनय से भी मैं कर्ता भोक्ता नहीं हूँ।</b>
उत्तर:- नहीं हूँ!

00:42:28.450 --> 00:42:33.858
मुमुक्षु:- <b>वह तो पर्याय में
स्वभाव से ही कर्ता भोक्ता धर्म है।</b>
उत्तर:- ऐसा मैं जानता हूँ।

00:42:33.883 --> 00:42:37.283
मैं कर्ता-भोक्ता हूँ- ऐसा जानने में नहीं आता।

00:42:37.350 --> 00:42:41.821
वैसे ही कर्ता-भोक्ता, उसका (पर्याय का) धर्म है,
ऐसा मुझे ज्ञान में जनाता है।

00:42:41.846 --> 00:42:49.055
परंतु मैं कर्ता हूँ और मैं भोगता हूँ,
ऐसा धर्मी को जनाता नहीं है। आहाहा!

00:42:49.080 --> 00:42:58.721
कहा न?
बहुत होये खींचकर तो ज्ञाता हूँ ऐसा ले,
परंतु कर्ता रहने दे। वह कहा था न, (उसका) खुलासा (है ये)।

00:42:58.746 --> 00:43:07.888
मुमुक्षु:- <b>आत्मा व्यवहारनय से
कर्ता-भोक्ता है- ऐसा मत ले।</b>
उत्तर:- ऐसा मत ले प्रभु! आहाहा! अब रहने दे न?

00:43:07.913 --> 00:43:15.997
मुमुक्षु:- अच्छा! बहुत अच्छी बात आनेवाली है।
<b>आत्मा व्यवहारनय से कर्ता-भोक्ता है- ऐसा मत ले।</b>
उत्तर:- मत ले प्रभु! आहाहा! <b>और</b> ...

00:43:16.022 --> 00:43:21.295
मुमुक्षु:- <b>और पर्याय का कर्ता
पर्याय निश्चयनय से है- ऐसा भी मत ले!</b>
उत्तर:- मत ले!

00:43:21.320 --> 00:43:25.957
मुमुक्षु:- क्योंकि पर्याय का कर्ता पर्याय
निश्चयनय से है तो आत्मा व्यवहारनय से
(कर्ता) है ऐसा आ जायेगा।

00:43:25.982 --> 00:43:33.563
उत्तर:- आ जायेगा, सापेक्ष है नय।
मुमुक्षु:- नय लागू मत कर।

00:43:33.588 --> 00:43:42.196
उत्तर:- उसका स्वभाव,
पर्याय को उसके स्वभाव से देख न?
नय का क्या काम है तुझे?

00:43:42.221 --> 00:43:47.095
वास्तव में ऊँचा माल आ गया है।
ऐसी पल थी, ३१ वीं December (दिसंबर १९८९).

00:43:47.120 --> 00:43:55.696
एक वर्ष और अठारह दिन हुये।
अठारह तारीख है न आज।

00:43:55.721 --> 00:44:10.228
शांतिभाई झवेरी के घर नीलांबर में
सुबह ६ बजे शुरू हो गई चर्चा।

00:44:10.253 --> 00:44:24.895
६ बजते ही आ जाते थे सभी, घर के, कुटुंब के।
आप भी थे। रात को सोते थे मेरे पास।
मुमुक्षु:- आपकी कृपा से लाभ मिला।

00:44:24.920 --> 00:44:32.728
उत्तर:- मेरा बिस्तर होता है,
उसके बराबर में इसका बिस्तर होता ही है,
जहाँ भी जाएँ वहाँ।

00:44:32.753 --> 00:44:43.718
देवलाली दो महीने रहे,
श्रवणबेलगोला (रहे)। आहाहा!

00:44:43.743 --> 00:44:58.518
रात के दो बजे बाथरूम जाने के लिये उठता हूँ।
बैठ जाओ, जरा बैठो मेरे सामने।
भाव आये हों, वह कह देता।

00:44:58.543 --> 00:45:12.655
मुमुक्षु:- मीठाभाई की भी पात्रता है न?
उत्तर:- (हाँ), ग्रहण करते हैं। ग्रहण करते हैं। आहाहा!

00:45:12.680 --> 00:45:21.655
बहन, क्या कहें?
निकट भव्य जीव हो न,
वह स्वभाव के पक्ष में आ जाता है।

00:45:21.680 --> 00:45:26.655
फिर (पक्ष) छूट जाता है।
ऐसा करके साष्टांग प्रणाम करता है।

00:45:26.680 --> 00:45:34.288
मुमुक्षु:- यह कड़ी घटती थी वह
मिल जाए वह छूट ही जाता है।
मुमुक्षु:- स्वभाव के पक्षवाला नीचे नहीं गिरेगा।

00:45:34.313 --> 00:45:39.288
उत्तर:- (हाँ)।
व्यवहार के पक्ष में फँसा है न?
निश्चय के पक्ष में आजा।

00:45:39.313 --> 00:45:44.721
वह निश्चय का पक्ष, विकल्प छूट जायेगा,
रहेगा नहीं ज्यादा टाइम।

00:45:44.746 --> 00:45:56.488
स्वभाव का घोलन होता है न?
निकटभवी हो,
उसे निश्चय की बात अमृत जैसी लगती है।

00:45:56.513 --> 00:46:01.557
व्यवहार के पक्षवाले दूरभवी जीव को
एकांत की दुर्गंध लगती है उस में, है सुगंध।

00:46:01.582 --> 00:46:08.854
मुमुक्षु:- सुवास! सुवास भरी हुई है।
उत्तर:- सुवास भरी हुई बात है। आहाहा!

00:46:08.879 --> 00:46:19.546
उसके लक्खण से ख्याल आ जाता है
कि यह निकट भव्य नहीं है। उसके लक्खण हैं वे।

00:46:19.571 --> 00:46:31.488
आता है न णाणदंसणलक्खणो (नियमसार गाथा
१०२), शास्त्र का वचन है लक्खणो, लक्खणो।
प्राकृत भाषा में लक्खणो।

00:46:31.513 --> 00:46:38.295
पुत्र के पैर पालने में पहचान लिये जाते हैं,
पुत्र के पैर, समझ गये?

00:46:38.320 --> 00:46:45.521
उसका ख्याल आ जाता है
कि यह निकट भव्य नहीं लगता है।
निषेध करता है, निश्चयनय का।

00:46:45.546 --> 00:46:54.421
आदर न करे वहाँ तक दिक्कत नहीं है,
परंतु निषेध करता है 'नहीं एकांत हो गया है यह',
समझ लेना, समाप्त!

00:46:54.446 --> 00:47:00.717
नहीं बैठे तो विचारकोटि में रखना
परंतु निश्चयनय के कथन को एकांत करके उड़ा मत।

00:47:00.742 --> 00:47:05.495
मुमुक्षु:- भूलचूक में भी
उसका अनादर करने योग्य नहीं है।
उत्तर:- अनादर मत कर, स्वभाव की बात है।

00:47:05.520 --> 00:47:12.587
निश्चयनय से आत्मा ज्ञायक है, ज्ञाता है,
ज्ञायक है। वह तो स्वभाव की बात है,
उसका निषेध मत कर भाई! आहाहा!

00:47:12.612 --> 00:47:14.354
तेरे आत्मा का निषेध है उसमें।

00:47:14.379 --> 00:47:19.587
मुमुक्षु:- गुरुदेव बाहर की बात आने पर,
यह तो निश्चय है, निश्चय है - वह सोनगढ़ के
एरिया के बाहर की बात आए

00:47:19.612 --> 00:47:23.987
(तब) अरेरे! प्रभु! तू क्या बात करता है?
क्या करता है यह?
उत्तर:- क्या करता है यह?

00:47:24.012 --> 00:47:37.277
मुमुक्षु:- सत्य बात को उड़ाता है!
उत्तर:- गुरुदेव के प्रताप से ये सभी बातें
११ भाग में हैं, सभी बातें हैं।

00:47:37.302 --> 00:47:40.620
पर्याय स्वभाव की बात उन्होंने ही की है,
षट्कारक स्वयं से होते हैं,

00:47:40.645 --> 00:47:45.587
उसका जन्मक्षण है, उसका स्वकाल है।
आत्मा से पर्याय होती नहीं है।

00:47:45.612 --> 00:47:49.255
ये सभी बातें, ये सारा माल उनका ही है।

00:47:49.280 --> 00:48:04.120
हम तो उनके डाकिया हैं, डाक बाँटते हैं,
कि गुरुदेव ऐसा कह गये हैं भाई, बस।
आहाहा! आगे।

00:48:04.145 --> 00:48:08.651
मुमुक्षु:- <b>आत्मा व्यवहारनय से
कर्ता भोक्ता है - ऐसा मत ले</b>
उत्तर:- मत ले!

00:48:08.676 --> 00:48:15.084
मुमुक्षु:- <b>और पर्याय का कर्ता
पर्याय निश्चयनय से है - ऐसा भी मत ले!</b>
उत्तर:- <b>ऐसा भी मत ले!</b>

00:48:15.109 --> 00:48:31.318
मुमुक्षु:- <b>पर्याय स्वभाव से ही
क्रियावंत है ऐसा जान! कोई भी नयपक्ष खड़ा
नहीं होगा।</b> कैसी बात है!

00:48:31.343 --> 00:48:39.335
उत्तर:- आगे।
मुमुक्षु:- <b>पर्याय जानने में आए वह भी स्वाभाविक
है। ऐसी ही कोई स्वाभाविक स्वच्छता है।</b>

00:48:39.360 --> 00:48:43.084
उत्तर:-  ज्ञान में स्वच्छता है
कि पर्याय ज्ञात हो जाती है।

00:48:43.109 --> 00:48:50.417
जानने का प्रयत्न करे और जानने में आये, ऐसा नहीं है.
सहज में ज्ञात हो जाती है। आहाहा!

00:48:50.442 --> 00:48:59.617
पर्याय प्रतिबिंबित होती है। आहाहा!
सुख आया, सुख का प्रतिभास होता है ज्ञान में,
स्वच्छता है, ऐसे।

00:48:59.642 --> 00:49:04.984
मुमुक्षु:- <b>उसके जानपने का
(जानने में आने का) निषेध नहीं है।</b>
उत्तर:- नहीं है!

00:49:05.009 --> 00:49:11.617
मुमुक्षु:- <b>प्रथम निषेध कराया
क्योंकि पर्याय में ही आत्मबुद्धि थी।</b>
उत्तर:- (हाँ) थी!

00:49:11.642 --> 00:49:13.750
मुमुक्षु:- इसलिये निषेध कराया।
उत्तर:- कराया।

00:49:13.775 --> 00:49:20.397
मुमुक्षु:- <b>अब तो आत्मा को जानते जानते
पर्याय अपने धर्मों सहित जैसी है ऐसी ज्ञात होती है।</b>

00:49:20.422 --> 00:49:26.255
उत्तर:- ज्ञात हो जाती है। आहाहा!
मुमुक्षु:- पहले जानने का निषेध किया
(क्योंकि) वह तो पर्यायदृष्टि थी।

00:49:26.280 --> 00:49:28.750
उत्तर:- पर्यायदृष्टि थी उसे छुड़ायी।

00:49:28.775 --> 00:49:39.650
अनुभव हुआ तो द्रव्य-पर्याय एक समय में
सब कुछ ज्ञात होता है बस!
धर्मी को जानने पर धर्म भी ज्ञात हो जाते हैं।

00:49:39.675 --> 00:49:46.684
मुमुक्षु:- <b>प्रश्न: आत्मा राग को कौन से नय से करता है?</b>

00:49:46.709 --> 00:49:56.437
<b>उत्तर:- अरे! ऐसा नहीं है।
वह तो उस समय की पर्याय की 
अपनी योग्यता  (स्वभाव) है।</b>

00:49:56.520 --> 00:50:03.758
<b>उस पर्याय का विभाव स्वभाव है तो राग हुआ।
पर्याय स्वभाव से हुआ है।</b>

00:50:03.783 --> 00:50:08.691
उत्तर:- राग होता है पर्याय में
वह पर्याय के स्वभाव से होता है, ऐसा।

00:50:08.716 --> 00:50:14.691
उसकी योग्यता है, ऐसा।
निमित्त से भी नहीं और
त्रिकाली उपादान स्वभाव से भी नहीं।

00:50:14.716 --> 00:50:19.558
कर्म के उदय से राग नहीं होता,
उसीप्रकार आत्मा से राग नहीं होता, ऐसा।

00:50:19.583 --> 00:50:24.775
वह पर्याय की तत् समय की योग्यता के
स्वभाव से होता है।

00:50:24.800 --> 00:50:29.357
मुमुक्षु:- <b>अरे! वहाँ तो नय के
विकल्प से ज्ञान छूट गया!</b>

00:50:29.382 --> 00:50:36.724
उत्तर:- इसके ऊपर विचार करे कि
उसके स्वभाव से पर्याय होती है
वहाँ नय का विकल्प छूट जाता है।

00:50:36.749 --> 00:50:49.695
मुमुक्षु:- <b>अकेला 'ज्ञाता' हो गया।</b>
उत्तर:- ऊपर आया था न,
निश्चयनय से कर्ता या व्यवहारनय से कर्ता?

00:50:49.720 --> 00:50:52.885
नय मत लगा, ऐसे। वह राग तो स्वभाव से होता है।

00:50:52.910 --> 00:50:55.980
मुमुक्षु:- अर्थात् इसमें होने योग्य होता है
वह पर्याय का स्वभाव है।
उत्तर:- होने योग्य होता है,

00:50:56.005 --> 00:50:59.575
(वह पर्याय का) स्वभाव है ऐसा तू जान।
मुमुक्षु:- ऐसा जानने पर उसे जाननहार ही जानने में आये।

00:50:59.600 --> 00:51:03.751
उत्तर:- उसके अंदर में आ जाता है।
कर्ताबुद्धि छूटे और ज्ञाताबुद्धि छूटे,

00:51:03.776 --> 00:51:10.485
होने योग्य होता है।
ज्ञाता होता है, साक्षात् ज्ञाता होता है।

00:51:10.510 --> 00:51:16.455
मुमुक्षु:- <b>अकेला 'ज्ञाता' हो गया।
नय के विकल्प से छूटकर अकेला ज्ञान रह गया</b>।

00:51:16.480 --> 00:51:22.718
उत्तर:- <b>ज्ञान रह गया</b>,
अकेला अतीन्द्रियज्ञान रह गया।
आत्मज्ञान हो गया।

00:51:22.743 --> 00:51:45.178
मुमुक्षु:- इसमें कितना सारा भरा है?
<b>नय के विकल्प से छूटकर अकेला ज्ञान रह गया।
स्वभाव को जानने में नय की जरूरत नहीं है</b>।

00:51:45.203 --> 00:51:48.145
उत्तर:- निश्चयनय से मैं आत्मा को जानता हूँ,
ऐसा नहीं है।

00:51:48.170 --> 00:51:56.811
मैं अपने स्वभाव से ही आत्मा को जानता हूँ।
जानने का मेरा स्वभाव है,
उसमें नय की अपेक्षा नहीं है।

00:51:56.836 --> 00:52:03.411
मुमुक्षु:- <b>स्वभाव को जानने में
नय की जरूरत नहीं है,
परंतु नयातीत ज्ञान की जरूरत है।</b>

00:52:03.436 --> 00:52:12.615
उत्तर:- स्वभाव को जानने में नय की जरूरत नहीं है,
परंतु नयातीत ज्ञान की तो जरूरत है।

00:52:12.640 --> 00:52:22.645
एक-एक वाक्य है न ... है।
मंत्र हैं बस! मंत्र हैं,
उसमें जाननहार जानने में आता है। मंत्र हैं बस!

00:52:22.670 --> 00:52:27.845
मुमुक्षु:- <b>"दोनों स्वभाव को
जानते जानते मोक्ष होता है"</b>।

00:52:27.870 --> 00:52:31.555
उत्तर:- कर्ता स्वभाव और अकर्ता स्वभाव,
दोनों को जानते-जानते मोक्ष होता है।

00:52:31.580 --> 00:52:39.211
ऐसा भाई के (प्रेमचंदजी, दिल्ली के)
नाम पर सोगानीजी का पत्र है। किस नंबर का है?
मुमुक्षु:- (द्रव्य-दृष्टि प्रकाश, पत्र) ३४ नंबर का।

00:52:39.236 --> 00:52:48.544
उत्तर:- ३४ नंबर का पत्र सोगानीजी का
उनके नाम पर आया। कर्ता-अकर्ता को
जानते-जानते पूर्ण हो जाता है आत्मा।

00:52:48.569 --> 00:52:53.735
मुमुक्षु:- और ये भी उन्होंने कहा कि पर्याय ही 
पर्याय का कर्ता है ... ये कर्ता-कर्म की चरम सीमा है।
उत्तर:- चरम सीमा है, हाँ।

00:52:53.760 --> 00:52:56.261
मुमुक्षु:- अर्थात् कि वह पर्याय का स्वभाव है।
उत्तर:- स्वभाव है।

00:52:56.286 --> 00:53:00.535
मुमुक्षु:- इसके आगे कोई विकल्प नहीं है।
ये चरम सीमा की बात है।
उत्तर:- नहीं है विकल्प। चरम सीमा की बात है।

00:53:00.560 --> 00:53:05.917
आत्मा उसका कर्ता-वर्ता नहीं है।
मुमुक्षु:- सोगानीजी ने नय नहीं लगाया।
उत्तर:- नय कहाँ से लगाये?

00:53:05.942 --> 00:53:11.736
मुमुक्षु:- पर्याय ही पर्याय की कर्ता है
ये कर्ता-कर्म की चरम सीमा है।
उत्तर:- चरम सीमा है। स्वभाव है।

00:53:11.761 --> 00:53:24.336
अकर्ता और कर्ता को जानते-जानते
मोक्ष हो जाता है।
प्रमाण से दोनों को जानता है। आहाहा!

00:53:24.361 --> 00:53:33.997
<b>दोनों स्वभाव को जानते जानते</b>
अर्थात् द्रव्य स्वभाव और पर्याय स्वभाव।
स्वभाव से जानना, नय से नहीं!

00:53:34.022 --> 00:53:46.663
द्रव्य को उसके स्वभाव से जान और पर्याय को भी
उसके स्वभाव से जान। कोई नय मत लगा। नीलम!
मुमुक्षु:- हाँ जी!

00:53:46.688 --> 00:53:51.363
उत्तर:- <b>"दोनों स्वभाव को
जानते जानते मोक्ष होता है"</b>।

00:53:51.388 --> 00:53:54.295
सम्यक् एकांतपूर्वक अनेकांत हो गया या नहीं?
मुमुक्षु:- हो गया न।

00:53:54.320 --> 00:53:58.330
उत्तर:- दो को जानता है आया या नहीं आया?
मुमुक्षु:- आया न।
उत्तर:- आहाहा! इसमें एकांत कहाँ हुआ?

00:53:58.355 --> 00:54:02.055
मुमुक्षु:- यह जानना भी अलग प्रकार का है।
उत्तर:- अतीन्द्रियज्ञान।

00:54:02.080 --> 00:54:08.430
मुमुक्षु:- अतीन्द्रियज्ञान किस प्रकार से
प्रगट हो उसकी यह रीति है।

00:54:08.455 --> 00:54:11.215
मुमुक्षु:- <b>१. निश्चयनय से निरपेक्ष
द्रव्य का स्वभाव।</b>

00:54:11.240 --> 00:54:19.163
उत्तर:- लो यह तुमने कहा था न,
पूछा था न "द्रव्य का स्वभाव क्या?"
वह आया ये, वापस।

00:54:19.188 --> 00:54:23.815
मुमुक्षु:- <b>२. व्यवहारनय से
निरपेक्ष पर्याय का स्वभाव।</b>
यह निश्चय-व्यवहार बोलो!

00:54:23.840 --> 00:54:25.695
किस प्रकार के लिए?
उत्तर:- हाँ।

00:54:25.720 --> 00:54:32.496
मुमुक्षु:- द्रव्य स्वभाव को
स्वभाव से जाने वह निश्चय और
पर्याय स्वभाव को स्वभाव से जाने वह व्यवहार।

00:54:32.521 --> 00:54:42.663
उत्तर:- क्योंकि निश्चयनय से निरपेक्ष है स्वभाव।
व्यवहारनय से भी निरपेक्ष पर्याय का स्वभाव है।
आहाहा!

00:54:42.688 --> 00:54:50.796
<b>दोनों नयों के विकल्पों को</b> ...
मुमुक्षु:- <b>दोनों नयों के विकल्पों को
उलंघ गया तो साक्षात् ज्ञाता हो गया!</b>

00:54:50.821 --> 00:54:53.015
उत्तर:- दो नयों का ज्ञाता आया न
(समयसार गाथा) १४३ में।

00:54:53.040 --> 00:55:08.296
समय से प्रतिबद्ध होता है जब आत्मा,
तब दो नयों का ज्ञाता होता है परंतु
किसी नयपक्ष को ग्रहण नहीं करता, वह। आगे।

00:55:08.321 --> 00:55:13.196
मुमुक्षु:- <b>पर्याय पर्याय से होती है</b>।
उत्तर:-<b>पर्याय पर्याय से होती है</b>।

00:55:13.221 --> 00:55:22.329
मुमुक्षु:- <b>ऐसा मैं जानता हूँ लेकिन
पर्याय मेरे से होती है ऐसा मैं नहीं जानता
क्योंकि पर्याय स्वभाव से ही परिणम रही है।</b>

00:55:22.354 --> 00:55:31.429
<b>क्योंकि पर्याय सत् है।
पर्याय को व्यवहार से जानूँ लेकिन
पर्याय को व्यवहार से करूँ नहीं।</b>

00:55:31.454 --> 00:55:38.671
उत्तर:- आया न?
पर्याय को व्यवहार से करूँ ऐसा नहीं है।

00:55:38.696 --> 00:55:45.938
भेद में है तू (तो) पर्याय को व्यवहार से जानूँ,
इतना रख। अभेद में तो वह भी नहीं है,
पर्याय को जानता नहीं।

00:55:45.963 --> 00:55:48.538
पर्याय स्वयं आत्मा हो जाती है, अभेदनय से तो।

00:55:48.563 --> 00:55:54.330
यह तो सविकल्पदशा में,
उस-उस काल में जाना हुआ प्रयोजनवान कहा है न?
किया हुआ नहीं।

00:55:54.363 --> 00:55:59.538
मुमुक्षु:- जाना हुआ। कि होने योग्य होता है,
ऐसा जानने में आता है, उसका नाम जाना हुआ प्रयोजनवान है।

00:55:59.563 --> 00:56:06.671
उत्तर:- बारहवीं गाथा में 'किया हुआ' शब्द नहीं है,
'जाना हुआ' है।

00:56:06.696 --> 00:56:14.055
व्यवहारनय से कर्ता निकाल दे।
व्यवहारनय से ज्ञाता है पर्याय का,
इतना रख, बहुत तो, सविकल्पदशा में।

00:56:14.080 --> 00:56:22.030
वह भी किसी-किसी को किसी काल,
हमेशा के लिये नहीं है। आहाहा!

00:56:22.055 --> 00:56:28.831
गुरुदेव तो निहाल कर गये हैं,
कितना सारा दे गये हैं।
व्यवहार से कर्ता नहीं है, व्यवहार से ज्ञाता है ऐसा ले।

00:56:28.856 --> 00:56:32.598
इतना व्यवहार है सविकल्पदशा में।
आहाहा!

00:56:32.623 --> 00:56:45.098
सविकल्पदशा में पर्याय को ज्ञान जानता है।
द्रव्य को जानते-जानते यह पर्याय
उत्पाद-व्यय है उसे जानता है बस! करता नहीं। आगे।

00:56:45.123 --> 00:57:00.965
मुमुक्षु:- <b>स्वभाव से समझने पर विकल्प छूट जाते हैं।
नय से समझने पर विकल्प रह जाते हैं।</b> सूत्र।
उत्तर:- सूत्र है।

00:57:00.990 --> 00:57:13.798
मुमुक्षु:- <b>ज्ञान को स्वभाव की तरफ
ले जाओ तो विकल्प नहीं उठेंगे।</b>

00:57:13.823 --> 00:57:24.398
<b>स्वभाव में अपेक्षा लगाओगे तो
विकल्प उठेंगे, स्वभाव हाथ में नहीं आयेगा।</b>

00:57:24.423 --> 00:57:30.965
उत्तर:- बहुत गहराई है, विचार करे,
फिर विस्तार से अपनेआप अकेला-अकेला।

00:57:30.990 --> 00:57:49.898
६ महीने के बाद यह पुस्तक मिलेगी सभी को,
अभी नहीं। आहाहा!
ले लो थोड़ा बाकी है, बस।

00:57:49.923 --> 00:57:56.098
मुमुक्षु:- <b>पर्याय स्वभाव से ही क्रियावंत है</b>।
उत्तर:- अर्थात् पर्याय में क्रिया होती ही है।

00:57:56.123 --> 00:58:03.164
समय-समय जो होने योग्य उसकी क्रिया,
उसके स्वकाल में होती ही है,
क्रमबद्ध के नियम के अनुसार।

00:58:03.189 --> 00:58:07.365
क्रिया हुये बिना रहती ही नहीं पर्याय में।

00:58:07.390 --> 00:58:14.698
मुमुक्षु:- <b>पर्याय स्वभाव से ही
क्रियावंत है तो आत्मा उपचार से
पर्याय को करता है, वह कहाँ आया?</b>

00:58:14.723 --> 00:58:16.775
उत्तर:- अर्थात् व्यवहार से भी कर्ता नहीं है
वह आया इसमें।

00:58:16.800 --> 00:58:23.388
मुमुक्षु:- हाँ सही है!
नहीं है कर्ता व्यवहार से, उपचार से भी कर्ता नहीं है।

00:58:23.413 --> 00:58:27.555
उत्तर:- तुझे उपचार से लेना हो
तो उसे जानता है, जाना हुआ प्रयोजनवान इतना ले।

00:58:27.580 --> 00:58:31.401
खींचतान कर कहें तो इतना ले, वरना वह (कर्ता) तो है नहीं।

00:58:31.426 --> 00:58:37.155
मुमुक्षु:- तू कहता हो तो।
हमें तो वह भी नहीं कहना है।
उत्तर:- वह भी नहीं कहना है, खटकता है हमें।

00:58:37.180 --> 00:58:40.655
मुमुक्षु:- <b>तो आत्मा उपचार से
पर्याय को करता है वह कहाँ आया?</b>

00:58:40.680 --> 00:58:49.121
<b>तो दृष्टि सीधी अकर्ता स्वभाव के ऊपर गई तो
कर्ताधर्म का भी ज्ञाता हो गया।</b>

00:58:49.146 --> 00:58:55.088
उत्तर:- पर्याय का कर्ताधर्म है
उसका ज्ञाता हो गया, कर्ता नहीं रहा।

00:58:55.113 --> 00:58:58.455
मुमुक्षु:- पर्याय के षट्कारक से पर्याय होती है।

00:58:58.480 --> 00:59:06.655
गुरुदेवश्री ने बहुत पहले तीन सिद्धांत सिद्ध
किये थे कि (१)अकर्ता स्वभाव आया,
(२)केवलज्ञान आया और (३)क्रमबद्ध आया।

00:59:06.680 --> 00:59:09.855
उत्तर:- हाँ क्रमबद्ध आया।
मुमुक्षु:- तीन आये। बहुत पहले
फरमाया था।

00:59:09.880 --> 00:59:13.754
उत्तर:- सही है! ऐसा ही है।
मुमुक्षु:- पर्याय का कर्ता पर्याय है।
उसके षट्कारक से होती है।

00:59:13.779 --> 00:59:18.720
केवलज्ञान की सिद्धि,
अकर्ता स्वभाव की सिद्धि और
क्रमबद्ध पर्याय की सिद्धि।

00:59:18.745 --> 00:59:31.987
उत्तर:- उसमें हो जाती है।
कर्ताबुद्धि छूट जाती है।
क्रमबद्धपर्याय में कर्ताबुद्धि छूट जाती है।

00:59:32.012 --> 00:59:39.220
मुमुक्षु:- <b>क्रिया न करनी वह द्रव्य का स्वभाव।</b>

00:59:39.245 --> 00:59:45.895
उत्तर:- <b>क्रिया न करनी</b>,
किसी भी प्रकार की, बंध-मोक्ष की,
वह द्रव्य का स्वभाव। और...

00:59:45.920 --> 00:59:50.120
मुमुक्षु:- <b>क्रिया करनी वह पर्याय का स्वभाव।</b>

00:59:50.145 --> 00:59:56.120
उत्तर:- <b>क्रिया करनी</b>,
क्रिया तो होती है न पर्याय में?
<b>वह पर्याय का स्वभाव</b> है।

00:59:56.145 --> 00:59:59.920
मुमुक्षु:- <b>दोनों को जानना
वह ज्ञान का (ज्ञाता का) स्वभाव है।</b>

00:59:59.945 --> 01:00:07.241
उत्तर:- अकर्ता को अकर्तापने जानता है
और कर्ता को कर्तापने जानता है,
ज्ञान का स्वभाव है।

01:00:07.265 --> 01:00:15.786
अकर्ता और कर्ता को जानते-जानते
(केवलज्ञान) होता है या नहीं? यह वह बात है।

01:00:15.810 --> 01:00:24.038
मुमुक्षु:- <b>पर्याय को स्वभाव से
देखो तो व्यवहारनय से आत्मा कर्ता है
यह उपचार निकल जायेगा।</b>

01:00:24.063 --> 01:00:33.376
उत्तर:- यह मूल बात है।
पर्याय को पर्याय के स्वभाव से देखो तो
आत्मा उसका कर्ता है वह भूल निकल जायेगी।

01:00:33.400 --> 01:00:37.856
उसमें नय का क्या काम है? वह तो हुआ ही करती है।

01:00:37.880 --> 01:00:43.336
मुमुक्षु:- उपचार निकल जायेगा।
<b>उपचार को उलंघे तो अनुभव होता है।</b>

01:00:43.360 --> 01:00:50.056
उत्तर:- आहाहा! कर्तापने के उपचार
को उलंघ जाये कि मैं व्यवहार से कर्ता नहीं हूँ
तो वह सीधा ज्ञाता हो जाता है।

01:00:50.080 --> 01:01:07.016
कर्ताबुद्धि छूटकर, ज्ञाता हो जाता है।
कर्ताबुद्धि का शल्य मारता है जीव को।
चलो इतना बस है अब। टाइम हो गया।

01:01:07.040 --> 01:01:08.040
