﻿WEBVTT

00:03:37.770 --> 00:03:50.119
ये पंच कल्याणक दिन का आज एक अपेक्षा
से मांगलिक दिन है (कि) भगवान का मोक्ष हुआ

00:03:50.143 --> 00:03:58.870
और प्रत्येक जीव का मोक्ष हो,
ये तो अनुमोदन करने योग्य है।

00:03:58.894 --> 00:04:08.157
लेकिन दिव्यध्वनि अभी हमें नहीं मिलेगी,
प्रभु मोक्ष पधारे (हैं इसलिए);

00:04:08.181 --> 00:04:20.413
अरिहंत थे तब तक तो दिव्यध्वनि
मिलती थी और स्वयं के स्वरूप का
स्मरण-वर्णन ये सब मिलता था,

00:04:20.437 --> 00:04:30.399
इसलिए लायक मुमुक्षु जीव को आँख में,
एक आँख में हर्ष और एक आँख में अश्रु

00:04:30.423 --> 00:04:41.079
- ऐसी स्थिति का आज दिन है
क्योंकि निर्वाण पद की प्राप्ति हुई है।

00:04:41.103 --> 00:04:48.082
मृत्यु नहीं है, मृत्यु नहीं है।
मृत्यु किसको कहते हैं?

00:04:48.106 --> 00:04:57.458
कि फिर से इधर से जाकर दूसरी चार
गति में जन्म लें उसको मृत्यु कहते हैं।

00:04:57.482 --> 00:05:06.575
ऐसा भगवान का
निर्वाण का दिन है आज।

00:05:06.599 --> 00:05:17.988
तो निर्वाण जिसका हो गया, मोक्ष हो
गया तो फिर से वो जन्म नहीं लेता है।

00:05:18.012 --> 00:05:25.470
मरता भी नहीं है और जन्म भी नहीं
लेता है। जन्म लेवे तो मरे न!

00:05:25.494 --> 00:05:37.597
तो ये आत्मा ऐसा अनादि-अनंत मोक्ष स्वरूप
है, जिसमें जन्म और मरण का भाव ही नहीं है,

00:05:37.621 --> 00:05:47.585
और जन्म-मरण का जो विभावभाव
निमित्तकारण (है) वो भी स्वभाव
में नहीं है। त्रिकाल मुक्त परमात्मा है।

00:05:47.609 --> 00:05:54.903
जिसको मुक्त की दृष्टि होती है तो
दृष्टि-मोक्ष गृहस्थ अवस्था में हो जाता है।

00:05:54.927 --> 00:06:07.987
दृष्टि अपेक्षा से उस आत्मा (का) मोक्ष हो
जाता है और दशा अपेक्षा से, पर्याय अपेक्षा
से वो बाद में उसकी मुक्ति हो जाती है।

00:06:08.011 --> 00:06:12.870
मुक्त क्यों हो जाता है? भावकर्म-
द्रव्यकर्म-नोकर्म क्यों छूट जाते हैं?

00:06:12.894 --> 00:06:18.646
क्योंकि स्वभाव में नहीं थे, स्वभाव
में नहीं थे, वो तो संयोग हैं।

00:06:18.670 --> 00:06:24.238
संयोग का अभाव होता है, स्वभाव का
तीन काल में अभाव होता नहीं है।

00:06:24.262 --> 00:06:33.030
इसलिए आज के दिन एक आँख में अश्रु
भी चलता है और दूसरी आँख में, आहाहा!

00:06:33.054 --> 00:06:36.994
मोक्ष पधारे हमारे प्रभु!
वो हर्ष की बात है।

00:06:37.018 --> 00:06:43.445
दो आँख है न (तो) एक आँख में
अश्रु है (और) एक आँख में हर्ष है।

00:06:43.469 --> 00:06:50.037
हम भी आपके पास में अभी आयेंगे। आप
पधारो, हम.... आपने जो उपदेश दिया है

00:06:50.061 --> 00:06:55.266
तो हमारा भी अल्पकाल है,
लंबा काल है नहीं।

00:06:55.290 --> 00:07:01.954
भव भी अल्प और काल भी अल्प (हैं) क्योंकि
हमारे आत्मा में बंध-मोक्ष का अभाव है,

00:07:01.978 --> 00:07:08.710
परिणाम मात्र का अभाव है
- ऐसी दृष्टि द्रव्य पर पड़ती है तो
उसको आत्मा का अनुभव होता है।

00:07:08.734 --> 00:07:20.034
अनुभव के काल में त्रिकाल स्वभाव
मुक्त स्वरूपी तो दृष्टि में आ गया मगर
उसके साथ जब दृष्टि प्रगट होती है,

00:07:20.058 --> 00:07:28.972
उसके साथ सम्यग्ज्ञान, श्रुतज्ञान,
अतीन्द्रियज्ञान, भावश्रुतज्ञान,
स्वसंवेदन ज्ञान भी प्रगट होता है।

00:07:28.996 --> 00:07:34.399
वो ज्ञान की पर्याय, भावि (भविष्य की पर्याय)
को वर्तमान में जान लेती है। आहाहा!

00:07:34.423 --> 00:07:38.282
कठिन बात है हमको मालूम है सब।
आहाहा!

00:07:38.306 --> 00:07:41.411
मगर क्या करें -
ऐसा श्रुतज्ञान का स्वरूप है।

00:07:41.435 --> 00:07:47.352
जो द्रव्य स्वभाव को जानता है,
वो भावी पर्याय को भी मोक्षस्वरूप
(पर्याय को भी) अभी जान लेता है।

00:07:47.376 --> 00:07:55.269
तो अल्पकाल में स्थिरता होकर के मोक्ष की
पर्याय, आठ कर्म के अभाव (रूप) नास्ति से

00:07:55.293 --> 00:08:02.456
(और) अस्ति से पूर्णानन्द का नाथ -
अनंतज्ञान-अनंतदर्शन-
अनंतसुख-अनंतवीर्य प्रगट हो गया।

00:08:02.480 --> 00:08:09.513
अभी भविष्य में किसी काल में
वो संसार में आनेवाला नहीं है।

00:08:09.537 --> 00:08:17.128
संसार में क्यों नहीं आता है? कि
दृष्टि का बल है इसलिए नहीं आता है।

00:08:17.152 --> 00:08:24.961
जैसे दृष्टि बलवान है ऐसा ज्ञान
बलवान नहीं है क्योंकि ज्ञान
सविकल्प है और दृष्टि निर्विकल्प है।

00:08:24.985 --> 00:08:30.594
दृष्टि का विषय एक ही है (और) ज्ञान
का विषय उपादेय की अपेक्षा से एक है

00:08:30.618 --> 00:08:39.644
मगर जानने की अपेक्षा से भेदाभेद है;
इसलिए दृष्टि बलवान है, ज्ञान बलवान
नहीं है - ऐसा आत्मा का स्वरूप है।

00:08:39.668 --> 00:08:47.328
तो आज भगवान मोक्ष पधारे।
उनका कल्याणक आज हुआ।

00:08:47.352 --> 00:08:51.315
अभी १३ नंबर की गाथा समयसार की चलती है।

00:08:51.339 --> 00:08:57.908
ये तो सम्यग्दर्शन का विषय है, उसमें लिया
है (कि नवतत्त्व को) भूतार्थनय से जानना।

00:08:57.932 --> 00:09:08.268
ये आत्मा है न, आत्मा देह से सहित
दिखता है, देह से सहित दिखता है;

00:09:08.292 --> 00:09:16.280
देह पर दृष्टि जिसकी है उसको
आत्मा देह ही लगता है, मनुष्य लगता है,

00:09:16.304 --> 00:09:21.387
शरीरवाला लगता है, शरीर वही
आत्मा है ऐसा लगता है - ये भ्रांति है।

00:09:21.411 --> 00:09:31.735
अभी भी आत्मा देह से रहित है, अभी!
आत्मा को नोकर्म छूता ही नहीं है,

00:09:31.759 --> 00:09:42.690
ऐसा निरालंबी तत्त्व देह से भिन्न
अंदर में परमात्मा विराजमान है।
उसकी दृष्टि कर, देह का लक्ष छोड़ दे।

00:09:42.714 --> 00:09:49.505
देह को नहीं छोड़ना है, देह को
छोड़ने की ताकत आत्मा की नहीं है

00:09:49.529 --> 00:09:57.241
क्योंकि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य
का कर सकता नहीं है।
वो तो महासिद्धांत है। आहाहा!

00:09:57.265 --> 00:10:06.365
आठ प्रकार का कर्म है,
वो अभी संयोगरूप है मगर
वो भी अभी आत्मा से भिन्न है।

00:10:06.389 --> 00:10:11.968
कि 'कथंचित् भिन्न (और) कथंचित् अभिन्न'?
(ऐसा) है ही नहीं; सर्वथा भिन्न है।

00:10:11.992 --> 00:10:15.605
बात-बात में जीव कथंचित् लगाता है।

00:10:15.629 --> 00:10:21.144
जहाँ लगाना चाहिए वहाँ नहीं लगाता और
जहाँ नहीं लगाना चाहिए वहाँ (लगाता है)।

00:10:21.168 --> 00:10:28.954
वो भी हेय है।
प्रकृति के बंध में केवल राग निमित्त है,

00:10:28.978 --> 00:10:36.297
राग के बाजू में,
जोड़े - साथ में अन्वयरूप परमात्मा
ज्ञायक है वो कर्म बंध का कारण नहीं है।

00:10:36.321 --> 00:10:39.544
बिल्कुल कारण नहीं है,
एक समय भी कारण नहीं है।

00:10:39.568 --> 00:10:49.074
जब राग कारण होता है तब आत्मा
अकारण परमात्मा ऐसा का ऐसा रहता है
- ऐसा भेदज्ञान करना चाहिए। आहाहा!

00:10:49.098 --> 00:10:53.164
आत्मा निमित्त हो गया (अरे!)
आत्मा तीन काल में निमित्त नहीं होता है।

00:10:53.188 --> 00:10:54.944
पराश्रित राग निमित्त होता है।

00:10:54.968 --> 00:11:01.918
स्वाश्रित संवर-निर्जरा भी निमित्त
नहीं होते हैं बंध में, तो प्रभु (तो)
कहाँ से निमित्त हो? आहाहा!

00:11:01.942 --> 00:11:06.685
ऐसे राग से भी आत्मा भिन्न है,
पुण्य-पाप का लक्ष छोड़ देना।

00:11:06.709 --> 00:11:13.339
देह का लक्ष छोड़ना, कर्म का
लक्ष छोड़ना, पुण्य-पाप की
वृत्ती उठती है उसका लक्ष छोड़ देना।

00:11:13.363 --> 00:11:16.802
पुण्य-पाप छोड़ने की बात नहीं है,
वो ताकत ही नहीं है।

00:11:16.826 --> 00:11:20.529
ग्रहण ही नहीं किया है तो छोड़े कैसे?
आहाहा!

00:11:20.553 --> 00:11:25.630
आत्मा ने पुण्य-पाप को ग्रहा
ही नहीं है तो छोड़े कहाँ से?

00:11:25.654 --> 00:11:30.386
आता है, जाता है पुण्य-पाप,
वो ठीक है (क्योंकि) संयोग है।

00:11:30.410 --> 00:11:35.578
ऐसा उसका लक्ष छोड़कर चिदानंद
भगवान आत्मा अंदर विराजमान है,

00:11:35.602 --> 00:11:40.597
उसको दृष्टि में लेने से
आत्मा का अनुभव होता है

00:11:40.621 --> 00:11:44.456
और अनुभव का नाम
<b>सम्यग्दर्शनाज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:</b>
(तत्त्वार्थसूत्र, प्रथम अध्याय, सूत्र १) है।

00:11:44.480 --> 00:11:47.795
ऐसे विकल्प में, शब्द में.... आहाहा!

00:11:47.819 --> 00:11:53.515
ये नवतत्त्व का श्रद्धान (और)
छह द्रव्य का ज्ञान, छह द्रव्य जैसा है

00:11:53.539 --> 00:12:02.201
ऐसा जाने (तो) वो भी सम्यग्ज्ञान नहीं,
नवतत्त्व जैसा है, ऐसा जाने उसका लक्ष
करके तो भी सम्यग्दर्शन होता नहीं है।

00:12:02.225 --> 00:12:09.398
नवतत्त्व से आत्मा भिन्न है। नवतत्त्व
परिणामरूप है (और) आत्मा तो द्रव्यरूप है।

00:12:09.422 --> 00:12:15.020
नवतत्त्व के परिणाम में कोई भी परिणाम
लो, उस परिणाम में मोक्ष की पर्याय ले लो

00:12:15.044 --> 00:12:20.623
(तो) उसमें अनंत गुण हैं?
नहीं हैं। इसलिए वो
जीवतत्त्व नहीं है, मोक्षतत्त्व है।

00:12:20.647 --> 00:12:27.968
मोक्षतत्त्व और जीवतत्त्व -
जीव में मोक्षतत्त्व की नास्ति है;
ऐसी अस्ति भगवान की अंदर में है।

00:12:27.992 --> 00:12:33.709
परिणाम मात्र का लक्ष छोड़कर
अंदर भगवान आत्मा विराजमान है।

00:12:33.733 --> 00:12:40.333
अंतर्मुख होकर देख, देख! अरे!
निरंतर दिख रहा है जानने में आ रहा है!

00:12:40.357 --> 00:12:48.281
स्वीकार कर, स्वीकार कर!
आहाहा! अनादि-अनंत!

00:12:48.305 --> 00:12:57.463
कलश-टीका (कलश ८) में ऐसा आया है
कि <b>जीव वस्तु चेतना लक्षण से जीव
को</b> निरंतर <b>जानती है</b>।

00:12:57.487 --> 00:13:04.695
आत्मा अपने उपयोग से
अपने आत्मा को निरंतर जानता है।

00:13:04.719 --> 00:13:12.775
राग नहीं जानता है आत्मा को,
देह नहीं जानता है (आत्मा को)
मगर जो उपयोग लक्षण है आत्मा का,

00:13:12.799 --> 00:13:22.471
उसमें भगवान आत्मा का
निरंतर दर्शन होता है। आहाहा!
दर्शन देता है मगर वो लेता नहीं है।

00:13:22.495 --> 00:13:30.715
एक बार रतिभाई घिया ने प्रश्न
किया था राजकोट में कि गुरुदेव
इतनी प्रशंसा करते हैं आत्मा की,

00:13:30.739 --> 00:13:38.509
प्रशंसा करते-करते थकते ही नहीं है, तो
ऐसा ये आत्मा चौबीस घंटा क्या करता होगा?

00:13:38.533 --> 00:13:45.898
चौबीस घंटा आत्मा करता क्या होगा? मैंने
कहा वो दर्शन देने का कार्य उसका चालू है।

00:13:45.922 --> 00:13:51.786
कभी एक समय भी दर्शन न
देवे ऐसा होता नहीं है।

00:13:51.810 --> 00:13:58.569
तो हमको क्यों दिखता नहीं है? कि (वो)
दर्शन देता है मगर तू दर्शन लेता नहीं है।

00:13:58.593 --> 00:14:05.606
ये भगवान की प्रतिमा है,
दर्शन करने के लिए प्रतिमा इधर
आएगी कि अपने को वहाँ जाना है?

00:14:05.630 --> 00:14:09.791
अपने को वहाँ जाना पड़ता है,
भगवान इधर नहीं आते हैं।

00:14:09.815 --> 00:14:17.776
ऐसे (ही) प्रत्येक समय, प्रत्येक जीव
के अंदर.... हिन्दी में.... प्रत्येक समय,

00:14:17.800 --> 00:14:25.160
प्रत्येक जीव में उपयोग लक्षण प्रगट
होता है, उसमें आत्मा जानने में आता है।

00:14:25.184 --> 00:14:27.986
जानने में आ रहा है।
आहाहा!

00:14:28.010 --> 00:14:32.256
पर उसकी दृष्टि पर ऊपर है
तो इंद्रियज्ञान प्रगट होता है,

00:14:32.280 --> 00:14:36.598
तो इंद्रियज्ञान (तो) पर की प्रसिद्धि
करता है (और) स्व को तिरोभूत करता है।

00:14:36.622 --> 00:14:41.360
इंद्रियज्ञान ज्ञान ही नहीं है,
शास्त्रज्ञान ज्ञान ही नहीं है भैया!

00:14:41.384 --> 00:14:47.809
वो तो ज्ञेय है, तूने मान लिया (है) ज्ञान;
मोहराजा ने कहा ज्ञान तो तूने मान लिया!

00:14:47.833 --> 00:14:54.141
सर्वज्ञ भगवान की दिव्यध्वनि में
आया कि (वो) ज्ञान नहीं है,
ज्ञेय है; तो ज्ञेय का ढेर होता है।

00:14:54.165 --> 00:15:02.426
जैसे पैसा का ढेर होता है न, ढगला।
ऐसे शास्त्रज्ञान भी प्रभु!

00:15:02.450 --> 00:15:07.243
आत्मज्ञान ज्ञान है,
शास्त्रज्ञान ज्ञान नहीं है!

00:15:07.267 --> 00:15:11.254
तो क्या शास्त्र पढ़ना नहीं?
(तो) क्या करना?

00:15:11.278 --> 00:15:18.016
कि शास्त्र ऐसा बताता है कि हमारे
सन्मुख जो ज्ञान हुआ वो तेरा ज्ञान नहीं है,

00:15:18.040 --> 00:15:24.261
तेरे आत्मा के सन्मुख हो वो तेरा
ज्ञान है। शास्त्र ही (ऐसा) बताता है।

00:15:24.285 --> 00:15:29.751
शास्त्र क्यों पढ़ना? कि शास्त्र बताते
हैं कि ये शास्त्रज्ञान तेरा नहीं है,

00:15:29.775 --> 00:15:35.113
इसलिए शास्त्र बार-बार पढ़ता हूँ। शास्त्र
में लिखा है कि शास्त्रज्ञान तेरा नहीं है।

00:15:35.137 --> 00:15:43.289
एक बार गुरुदेव ने कहा
सुरेन्द्रनगर में - एक भाई ने कहा
कि निमित्त कुछ करता नहीं है।

00:15:43.313 --> 00:15:50.918
तो दूसरे (भाई) ने कहा कि
यदि निमित्त कुछ करता नहीं है
तो आप सोनगढ़ क्यों जाते हो?

00:15:50.942 --> 00:15:55.220
गुरु (तो) निमित्त हैं न, देशनालब्धि,
तो वहाँ क्यों जाते हो?

00:15:55.244 --> 00:16:04.209
उस भाई ने कहा कि इसलिए
बार-बार मैं जाता हूँ कि निमित्त से
कार्य होता है ऐसा मुझे भ्रम हो गया है न,

00:16:04.233 --> 00:16:11.855
इसलिए सुनने को जाता हूँ कि
निमित्त से कुछ कार्य होता नहीं
है। कार्य उपादान से होता है।

00:16:11.879 --> 00:16:15.788
बार-बार सुनने के लिए मैं जाता हूँ
कि निमित्त से कुछ होता नहीं है।

00:16:15.812 --> 00:16:18.136
निमित्त है दूसरी चीज,
वो अलग है।

00:16:18.160 --> 00:16:24.963
निमित्त का नाम अकर्ता है
और उपादान का नाम कर्ता है।

00:16:24.987 --> 00:16:31.462
उपादान-निमित्त दो हैं (और) कार्य अकेला
उपादान से होता है - इस गाथा का मर्म है।

00:16:31.486 --> 00:16:38.889
पर्याय निरपेक्ष होती है; मिथ्यात्व की
पर्याय दर्शनमोह से उत्पन्न नहीं होती है
(और) आत्मा से भी उत्पन्न नहीं होती है।

00:16:38.913 --> 00:16:41.006
निरपेक्ष है तो कर्ताबुद्धि छूटती है।

00:16:41.030 --> 00:16:49.428
और कर्ताबुद्धि छूटने से अकर्ता ऐसे आत्मा
की दृष्टि होती है तो मिथ्यात्व की जगह
पर सम्यग्दर्शन अपने आप (आ जाता है)।

00:16:49.452 --> 00:16:56.537
कर्ताबुद्धि किये बिना सम्यग्दर्शन
सहज प्रगट हो जाता है, तो उपचार
से 'कर्ता है' (ऐसा) कहा जाता है।

00:16:56.561 --> 00:17:02.901
वो उपचार भी खटकता है ज्ञानी को।
आहाहा! कल बात की थी।

00:17:02.925 --> 00:17:11.275
ऐसे १३ नंबर की गाथा में
आचार्य भगवान फरमाते हैं कि नवतत्त्व
निरपेक्ष हैं, भूतार्थनय से नवतत्त्व जान।

00:17:11.299 --> 00:17:16.065
व्यवहारनय से तो जाना (कि) इसका
ये कारण है, इसका ये कारण है,

00:17:16.089 --> 00:17:25.118
वो कर्म के उदय से यहाँ राग होता
है, राग के उदय से कर्म बंधता है
- ऐसा जाना। मगर आत्मा क्या है? आहाहा!

00:17:25.142 --> 00:17:31.941
उससे भिन्न, आत्मा <b>द्रव्यकर्म,
भावकर्म, नोकर्म </b>से भिन्न है वो
तो मांगलिक (समयसार कलश १) में कहा।

00:17:31.965 --> 00:17:37.720
भावकर्म से भिन्न कहा परंतु भगवान
की भक्ति से तो भिन्न नहीं है न;

00:17:37.744 --> 00:17:41.481
तो भावकर्म में भक्ति नहीं आ गई?
तो भक्ति छोड़ देना?

00:17:41.505 --> 00:17:46.586
भक्ति छोड़ने की बात नहीं है,
भक्ति में आत्मबुद्धि छोड़ दे।

00:17:46.610 --> 00:17:52.603
सम्यग्दर्शन के बाद भक्ति तो ज्यादा
बढ़ती है! भक्ति छूटती नहीं है।

00:17:52.627 --> 00:17:58.227
स्वरूप में लीन हुए बिना शुभभाव छूटेगा
(नहीं); है तो छूटा (हुआ ही); आहाहा!

00:17:58.251 --> 00:18:02.022
मगर पर्याय में से नहीं छूटता है,
द्रव्य में तो है ही नहीं।

00:18:02.046 --> 00:18:07.073
पर्याय में जितनी स्थिरता होती है
उतना राग कम हो जाता है।

00:18:07.097 --> 00:18:15.024
ज्यों <b>ज्यों विज्ञानघन स्वभाव होता
जाता है त्यों त्यों</b> आत्मा (की) <b>आस्रवों
से निवृत्ति होता जाता है</b> (समयसार गाथा ७४)।

00:18:15.048 --> 00:18:20.092
इसलिए १३ नंबर की गाथा में
पहला पारा हुआ, अभी दूसरा पारा है।

00:18:20.116 --> 00:18:28.690
भेदज्ञान का मंत्र है, सारा
समयसार भेदज्ञान से भरा हुआ है, कोई
भी श्लोक (अथवा) कोई भी गाथा लो।

00:18:28.714 --> 00:18:34.410
जितने आज तक सिद्ध परमात्मा हुए
वो सब भेदविज्ञान से हुए।

00:18:34.434 --> 00:18:39.155
<b>भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन।</b>
(समयसार आत्मख्याति टीका,
कलश १३१) आता है न श्लोक।

00:18:39.179 --> 00:18:47.926
दूसरा पारा। <b>बाह्य (स्थूल) दृष्टिसे
देखा जाये तो:- </b>अभी हिन्दी हो
जाएगा; थोड़ा गुजराती इधर है न।

00:18:47.950 --> 00:18:51.264
<b>बाह्य (स्थूल) दृष्टिसे देखा जाये तो:- </b>
बहिर्दृष्टि से देखो तो -

00:18:51.288 --> 00:18:56.156
अंतर्दृष्टि से नहीं देखो, बहिर्दृष्टि
से देखो तो क्या हुआ है?

00:18:56.180 --> 00:19:03.200
कि <b>जीव-पुद्गलकी अनादि बन्धपर्यायके
समीप जाकर एकरूपसे अनुभव
करनेपर यह नवतत्त्व भूतार्थ हैं, </b>आहाहा!

00:19:03.224 --> 00:19:07.366
नवतत्त्व भूतार्थ कब लगता है?

00:19:07.390 --> 00:19:14.063
कि जीव और पुद्गल, जीव
और अजीव की एकत्वबुद्धि होती
है तब नवतत्त्व भूतार्थ लगता है।

00:19:14.087 --> 00:19:21.665
अजीव का लक्ष छोड़कर जीव का
लक्ष होता है तो नवतत्त्व अभूतार्थ है,
आत्मा के स्वभाव में है (नहीं)।

00:19:21.689 --> 00:19:26.253
पर्याय में भले हो मगर
वो पर्याय आत्मा में नहीं है।

00:19:26.277 --> 00:19:34.290
जो पर्याय आत्मा में हो तो ज्ञायक का,
सामान्य का अवलंबन करते समय
राग का भी अवलंबन आना चाहिए।

00:19:34.314 --> 00:19:41.404
मगर सामान्य का अवलंबन करते
समय राग का अवलंबन आता नहीं
है और दुख का वेदन आता नहीं है;

00:19:41.428 --> 00:19:45.337
इसलिए परिणाम भगवान आत्मा से भिन्न है।

00:19:45.361 --> 00:19:50.376
सामान्य में विशेष की नास्ति, ऐसा
अस्ति-नास्ति अनेकांत है। आहाहा!

00:19:50.400 --> 00:19:59.193
वो अनेकांत का ज्ञान दूसरी चीज (है)
और अस्ति-नास्ति भेदज्ञान करने
के लिए बात अलग होती है।

00:19:59.217 --> 00:20:02.328
<b>बन्धपर्यायके समीपजाकर
एकरूपसे अनुभव करनेपर</b>,

00:20:02.352 --> 00:20:12.858
आत्मा और अनात्मा एक है - ऐसा जो
अनुभव करता है उस दृष्टि से नव
का भेद, नव का भेद दिख जाता है।

00:20:12.882 --> 00:20:18.861
मगर जो जीव और अजीव का भेदज्ञान
करके आत्मा के सन्मुख होता है,

00:20:18.885 --> 00:20:25.228
अजीव का लक्ष छूट जाता है, तो नव का
भेद, अभेद में दिखता नहीं है। आहाहा!

00:20:25.252 --> 00:20:32.863
भले पर्याय का भेद हो तो हो, मैं तो अभेद
हूँ। अभेद, किसके साथ अभेदता है?

00:20:32.887 --> 00:20:37.730
कि अनंत गुणमय मैं आत्मा हूँ अभेद,
एकत्व हूँ;

00:20:37.754 --> 00:20:43.823
ऐसे अनंत गुण से एकत्व होने
पर अंदर में परिणति जाती है,

00:20:43.847 --> 00:20:53.093
चलती जाती है तो ये परिणाम भी
क्षणिक अभेद हो जाता है -
इसका नाम ध्येय पूर्वक ज्ञेय होता है।

00:20:53.117 --> 00:21:00.518
यानि समयसार भी आ गया और
प्रवचनसार, तत्त्वार्थ सूत्र भी आ गया,
धवल-महाधवल भी इसमें आ गया।

00:21:00.542 --> 00:21:07.119
ये कैसे आया? देखो!
ये परिणाम भी है और आत्मा भी है;

00:21:07.143 --> 00:21:13.300
जीव भी है और परिणाम - नवतत्त्व
(भी) है; नहीं हैं - ऐसा नहीं (है)।
खरगोश के सींग (जैसा) नहीं है।

00:21:13.324 --> 00:21:18.643
(वो) है, वो परिणाम भी है और
उत्पाद-व्यय भी है और ध्रुव भी है।

00:21:18.667 --> 00:21:27.163
मगर उत्पाद-व्यय का लक्ष छूटता है,
नव के भेद का लक्ष छूटता है और
अभेद सामान्य पर दृष्टि आती है।

00:21:27.187 --> 00:21:33.462
दृष्टि का विषय दृष्टि में आते ही,
दृष्टि का विषय दृष्टि में आते ही,

00:21:33.486 --> 00:21:44.324
श्रद्धा का विषय श्रद्धेय में आते ही
निर्विकल्प अनुभव होता है (और)
उस समय ज्ञान प्रगट होता है।

00:21:44.348 --> 00:21:53.527
वो ज्ञान प्रगट होता है,
उस ही समय वो आत्मा सम्यग्दर्शन
-ज्ञान-चारित्ररुप से परिणमता है,

00:21:53.551 --> 00:22:00.746
वीतरागी भावरूप से परिणमता है तो
निर्मल पर्याय से आत्मा कथंचित् अभिन्न है।

00:22:00.770 --> 00:22:08.503
रहित होने पर (भी) सहित का ज्ञान
होता है। रहित का श्रद्धान (और)
निर्मल पर्याय से सहित का ज्ञान।

00:22:08.527 --> 00:22:18.182
उत्पाद-व्यय से रहित ध्रुव का ध्यान
और उत्पाद-व्यय सहित से ध्रुव है वो
ध्याता बन जाता है। एक समय में सब काम हैं।

00:22:18.206 --> 00:22:22.853
जैसे केवली भगवान <b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं
सत्</b> (तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०)
को एक समय में जानते हैं,

00:22:22.877 --> 00:22:30.847
ऐसा (ही) छद्मस्थ हिरण, मेंढक,
अनुभव के काल में (उसको) एक समय में

00:22:30.871 --> 00:22:35.231
ध्रुव का अवलंबन करते ही
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
का ज्ञान हो जाता है।

00:22:35.255 --> 00:22:42.386
वो हिरण भी प्रवचनसार पढ़ लेता है,
जंगल का हिरण। आहाहा!

00:22:42.410 --> 00:22:46.525
एक आत्मा के आश्रय से
सब कार्य की सिद्धि होती है।

00:22:46.549 --> 00:22:51.530
जिसको <b>आत्मा की अनुभूति</b> हुआ
(<b>वह निश्चय से</b>) <b>समस्त जिनशासन
की अनुभूति</b> (समयसार गाथा १५) हो गई।

00:22:51.554 --> 00:22:55.383
<b>आत्मा की अनुभूति</b> कहो
कि <b>जिनशासन की</b>
(<b>अनुभूति</b> कहो);

00:22:55.407 --> 00:22:59.999
जिनशासन कहाँ है?
जिनशासन बाहर में नहीं है,

00:23:00.023 --> 00:23:06.632
जिनशासन (तो) अंतर्मुख परिणाम जो
अतीन्द्रियज्ञान का, सम्यग्दर्शन का होता है,

00:23:06.656 --> 00:23:10.029
अनुभूति होती है, आत्मा की
अनुभूति है (<b>वह निश्चय से
जिनशासन की अनुभूति है</b>)।

00:23:10.053 --> 00:23:15.005
... है ऐसा द्रव्य स्वभाव सामान्य
का अवलंबन करने से अनुभूति होती है।

00:23:15.029 --> 00:23:21.035
उस अनुभूति से आत्मा सहित है।
तो अनुभूति आत्मा है कि अनात्मा है?

00:23:21.059 --> 00:23:26.823
कि आत्मा है मगर वो ज्ञेय है,
ध्येय नहीं है, वो ध्यान रखना।

00:23:26.847 --> 00:23:30.257
वो कहते हैं (कि) हाँ! पर्याय से
सहित तो पहले से ही कहते थे हम।

00:23:30.281 --> 00:23:36.005
आपने तो बाद में किया। तो हम
क्या खोटे हैं, झूठे हैं? आहाहा!

00:23:36.029 --> 00:23:39.496
देखो; पर्याय से सहित तो
हम पहले से ही कहते थे।

00:23:39.520 --> 00:23:44.706
आप क्यों टुकड़े करते हो?
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
में दो टुकड़े क्यों करता हो?

00:23:44.730 --> 00:23:52.109
ये टुकड़े करने के बाद वो साँध (सिल) लेता
है। टुकड़ा टुकड़ारूप रहता नहीं है।

00:23:52.133 --> 00:24:00.613
साँधता (सिलता) है तो भी
सामान्य तो सामान्य और विशेष
तो विशेष ही रहता है - दो सत्।

00:24:00.637 --> 00:24:07.208
ज्ञानप्रधान कथन से - ज्ञेय से देखो तो एक
सत्ता है (और) नय से देखो तो दो सत्ता हैं।

00:24:07.232 --> 00:24:18.319
अभी नय से देखना नहीं और प्रमाण
से (भी) देखना नहीं; जैसा है ऐसा ज्ञान
में आ जाता है, नयपक्ष रहता नहीं है।

00:24:18.343 --> 00:24:21.040
तो हमारे पास तो बहुत प्रश्न आता है

00:24:21.064 --> 00:24:25.162
कि <b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>एक
सत्ता है तो उसके दो टुकड़े क्यों करते हो?

00:24:25.186 --> 00:24:28.186
मैंने कहा कि दो टुकड़े
करके बाद में सिलते हैं।

00:24:28.210 --> 00:24:37.148
दो टुकड़े करके अलग ऐसा नहीं रहता है
कि वो पर्याय अलोक में भेज दे और द्रव्य
को इधर रखता है - ऐसा नहीं है। आहाहा!

00:24:37.172 --> 00:24:44.707
तो क्या है? तो ये दृष्टांत है। दृष्टांत सादा
है मगर (सिद्धांत) समझ में आ जाता है।

00:24:44.731 --> 00:24:51.939
मुंबई है न, मुंबई बड़ी नगरी
मोहमयी नगरी है न! झवेरी बाजार
में भीड़ तो ज्यादा है न।

00:24:51.963 --> 00:24:57.504
एक आदमी अकारण निकला, सोचा
(कि) झब्बा (कुर्ता) है सिलाना है कुर्ता।

00:24:57.528 --> 00:25:05.509
उसकी सिलाई तो अभी १०० रुपया हो
गई, तो १०० रुपया सिलाई देना नहीं है
मेरे को। ऐसा (बिना) सिलाई करके पहनना है।

00:25:05.533 --> 00:25:14.283
तो सिलाई के बिना कपड़ा दो मीटर का ले
लिया, निकला। पगड़ी तो गई, टोपी तो गई।

00:25:14.307 --> 00:25:20.332
खुल्ला सर तो है ही, खुल्ला माथा तो
है ही। तो निकला (सबने पूछा कि)

00:25:20.356 --> 00:25:25.276
भाईसाहब! कौन गुजर गया? कौन मर
गया? वो श्मशान-यात्रा कब निकलेगी?

00:25:25.300 --> 00:25:31.096
अरे भाई (ये) क्या है? क्यों भाई,
आपने ये ओढ़ा है न! आहाहा!

00:25:31.120 --> 00:25:34.353
आगे गया तीसरा मिला,
चौथा मिला, सबने (यही) कहा।

00:25:34.377 --> 00:25:42.215
अरे! ये तो चले नहीं, ये तो चलेगा नहीं।
अभी १०० रुपया खर्च करना पड़ेगा।

00:25:42.239 --> 00:25:49.966
कपड़ा लेकर दर्जी के पास गया,
दर्जी ने कैंची उठाई। अरेरे!
भाई! कैंची से काटना नहीं है।

00:25:49.990 --> 00:26:03.803
तो क्या करना है तेरे को? कि कुर्ता सिलाना
है, कुर्ता। तो कैंची के बिना, टुकड़े
किये बिना संधान (सिलना) होता नहीं है।

00:26:03.827 --> 00:26:13.823
अच्छा! वो समझ गया। तो काटना तो पड़ेगा,
मगर मैं तूझे टुकड़े नहीं दूँगा, सिलकर दूँगा।

00:26:13.847 --> 00:26:23.484
मगर इतनी सिलाई सूक्ष्म करूँगा कि सिला 
हुआ होने पर भी उपलक (छिछला) दृष्टि से 
दिखने में आएगी नहीं - ऐसी सिलाई मैं कर दूँगा।

00:26:23.508 --> 00:26:27.411
सिद्धांत में उतारना है हों! 
आहाहा!

00:26:27.435 --> 00:26:34.289
अच्छा! (तो) काटा, सिलाई करके कुर्ता 
दे दिया। (कुर्ता) पहना, अच्छा!

00:26:34.313 --> 00:26:43.240
देखा उसने, सिलाई अच्छी इतनी 
की है कि सिलाई करने पर भी वो 
दो (टुकड़ा) जुदा दिखता नहीं है;

00:26:43.264 --> 00:26:48.297
एक दिखता है, एक। 
एक है नहीं! एक है नहीं!

00:26:48.321 --> 00:26:53.656
टुकड़ा होने के बाद सर्वथा एक नहीं होता 
है और सर्वथा भिन्न भी नहीं रहता है।

00:26:53.680 --> 00:27:01.300
सर्वथा भिन्न रहे तो कुर्ता नहीं! 
आहाहा!

00:27:01.324 --> 00:27:07.000
तो ऐसा दृष्टांत है। 
ऐसे ज्ञायक की ओर दृष्टि जाती है

00:27:07.024 --> 00:27:12.010
तो, दृष्टि और दृष्टि का विषय 
भिन्न होने पर (भी), कथंचित् अभिन्न

00:27:12.034 --> 00:27:17.539
ऐसा ज्ञेय होता है, उसका नाम 
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>है। 
आहाहा!

00:27:17.563 --> 00:27:22.987
त्रिकाल सत् और 
क्षणिक सत्, हैं तो सत् दो;

00:27:23.011 --> 00:27:33.831
तो भी इतना अनुसंधान हो जाता है कि एक ही 
सत् (है), पदार्थ की अपेक्षा से एक सत् है 
(और) नय की अपेक्षा से दो सत् जुदा-जुदा हैं।

00:27:33.855 --> 00:27:41.659
ऐसा ज्ञान में एक समय में अक्रम में आ जाता 
है। 'रहित पूर्वक सहित' का ज्ञान होता है।

00:27:41.683 --> 00:27:45.952
एकांत से रहित (माने) तो सांख्यमती है, 
ऐसा है नहीं।

00:27:45.976 --> 00:27:50.166
सर्वथा सहित (माने) 
वो भी ऐसा स्वरूप नहीं है।

00:27:50.190 --> 00:27:54.374
मगर कथंचित् रहित और सहित 
का ज्ञान अनुभव के बाद होता है।

00:27:54.398 --> 00:28:00.881
पहले तो सर्वथा लेना! आहाहा! परिणाम 
मात्र से मेरा आत्मा सर्वथा भिन्न (है)।

00:28:00.905 --> 00:28:03.402
<b>एकत्व-विभक्त आत्मा 
को दिखाऊँगा </b>(समयसार गाथा ५)।

00:28:03.426 --> 00:28:09.591
वहाँ से शुरू हुआ (कि) अनंत गुण से एकपना 
और परिणाम मात्र से विभक्त-जुदा है आत्मा।

00:28:09.615 --> 00:28:15.433
ऐसा दृष्टि में आने से, दृष्टि द्रव्य 
में व्याप जाती है, फैल जाती है।

00:28:15.457 --> 00:28:24.456
दृष्टि और दृष्टि का विषय, भिन्न होने पर 
भी एक नय की अपेक्षा से अभिन्न हैं।

00:28:24.480 --> 00:28:31.130
एक नय की अपेक्षा से 
वो परिणाम द्रव्य से अभिन्न है, 
और ध्येय की अपेक्षा से भिन्न है।

00:28:31.154 --> 00:28:33.208
भिन्न भी है और अभिन्न भी है।

00:28:33.232 --> 00:28:40.121
और अभिन्न का विकल्प गया 
और भिन्न का विकल्प गया, जैसा है 
वैसा श्रुतज्ञान में आ जाता है। आहाहा!

00:28:40.145 --> 00:28:44.199
ऐसी अनुभव की process (विधि) है।

00:28:44.223 --> 00:28:52.156
तो <b>अनादि बंधपर्याय</b> 
की दृष्टि से देखो तो.... सवा नौ 
का टाइम है व्यवस्था की अपेक्षा से।

00:28:52.180 --> 00:28:57.876
<b>अनादि बन्धपर्यायके समीप जाकर 
एकरूपसे अनुभव करनेपर यह 
नवतत्त्व भूतार्थ हैं, सत्यार्थ हैं </b>

00:28:57.900 --> 00:29:04.329
नव का भेद दिखता है, कभी? अजीव 
का लक्ष करने से नव का भेद दिखता है

00:29:04.353 --> 00:29:11.772
(मगर) जीव का लक्ष करने से नव 
का भेद दिखता नहीं है। आहाहा!

00:29:11.796 --> 00:29:16.444
इसमें लिखा है इसका अर्थ है। 
<b>अनादि बन्धपर्यायके समीप जाकर </b>

00:29:16.468 --> 00:29:21.911
यानि आत्मा के विमुख होकर, जब 
अजीव के सन्मुख जाता है परिणाम तब

00:29:21.935 --> 00:29:25.483
<b>एकरूपसे अनुभव करनेपर 
यह नवतत्त्व भूतार्थ हैं, सत्यार्थ है</b>।

00:29:25.507 --> 00:29:28.873
पर्याय है, नवतत्त्व है; 
नहीं है, ऐसा (नहीं है)।

00:29:28.897 --> 00:29:44.016
मगर नवतत्त्व के भेद का जन्म 
पर के लक्ष से होता है, स्व के 
लक्ष से होता नहीं है। आहाहा!

00:29:44.040 --> 00:29:50.975
<b>और एक जीवद्रव्यके </b>देखो! 
आहाहा! भेदज्ञान की बाँसुरी बजती है।

00:29:50.999 --> 00:29:55.334
और अजीव के सन्मुख देखने पर 
तो नवतत्त्व का भेद दिखता है।

00:29:55.358 --> 00:29:59.955
ये जीव है, ये अजीव है, पुण्य, पाप, 
आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष।

00:29:59.979 --> 00:30:07.551
मगर एक जीवद्रव्य स्वभाव जो आत्मा का है 
परिणाम मात्र से भिन्न, नवतत्त्व से जो भिन्न है,

00:30:07.575 --> 00:30:18.473
ऐसा <b>एक जीवद्रव्यके स्वभावके 
समीप</b>, अंतर्मुख होकर ज्ञायक 
के सन्मुख जब परिणाम जाता है,

00:30:18.497 --> 00:30:23.681
<b>जाकर अनुभव करनेपर वे अभूतार्थ हैं, </b>
दिखाई देते (नहीं हैं)।

00:30:23.705 --> 00:30:30.683
अभेद में भेद दिखता नहीं है क्योंकि भेद 
है ही नहीं और अनंत गुण तो अंदर हैं,

00:30:30.707 --> 00:30:33.681
तो भी अनंत गुण में 
गुणभेद दिखता (नहीं है)।

00:30:33.705 --> 00:30:38.761
पर्याय तो है ही नहीं इसलिए दिखती 
नहीं है और अनंत गुण तो हैं

00:30:38.785 --> 00:30:43.739
मगर एक भी गुण पर दृष्टि नहीं है (इसलिए) 
गुणी दिखता है, गुण दिखता नहीं है।

00:30:43.763 --> 00:30:50.815
गुणभेद भी लक्ष में नहीं आता है 
और पर्याय तो है ही नहीं अंदर 
(तो) लक्ष में कैसे आवे? आहाहा!

00:30:50.839 --> 00:30:55.038
<b>स्वभावके समीप जाकर 
अनुभव</b> करता है।

00:30:55.062 --> 00:30:59.449
विकल्प की बात नहीं, शब्द की बात नहीं, 
भाषा की बात नहीं, धारणा की बात नहीं।

00:30:59.473 --> 00:31:05.426
वो मानसिकज्ञान का विषय नहीं है। 
मानसिकज्ञान में निर्णय होता है

00:31:05.450 --> 00:31:09.835
मगर मानसिकज्ञान में आत्मा 
प्रत्यक्ष अनुभव में आता (नहीं है)।

00:31:09.859 --> 00:31:17.587
परोक्ष अनुभूति मन में होती है। 
प्रत्यक्ष अनुभूति ज्ञान में होती है। 
आहाहा!

00:31:17.611 --> 00:31:21.933
<b>समीप जाकर अनुभव 
करनेपर वे </b>यानि नवतत्त्व,

00:31:21.957 --> 00:31:27.785
जो अजीव का संबंध से आत्मा को देखता है, 
कर्म के संबंधवाला दिखाई देता है,

00:31:27.809 --> 00:31:32.706
देह के संबंधवाला दिखाई देता है 
ऐसा नवतत्त्व (का) भेद दिखता था।

00:31:32.730 --> 00:31:39.516
अभी अंतर्मुख आत्मा में जाता है उपयोग। 
लक्ष अंदर में जाता है, लक्ष फिर गया।

00:31:39.540 --> 00:31:45.477
लक्ष फेरे फेर है। 
लक्ष फेरे (फेर है)। 
लक्ष फिरता है।

00:31:45.501 --> 00:31:49.718
ज्ञेय फिर गया! 
ज्ञेय फिर गया!

00:31:49.742 --> 00:31:59.252
जो नवतत्त्व ज्ञेय था ज्ञान का, 
वहाँ इंद्रियज्ञान का जन्म होता था, और 
क्रम-क्रम से नवतत्त्व का ज्ञान होता था।

00:31:59.276 --> 00:32:02.285
(अब) वो लक्ष छूट गया, 
ज्ञेय बदल गया।

00:32:02.309 --> 00:32:09.042
पर्याय जो ज्ञेय थी, अभी सामान्य 
द्रव्य ज्ञेय बनता है उपयोग में।

00:32:09.066 --> 00:32:15.683
पर्याय ज्ञेय बनती थी वहाँ तक इंद्रियज्ञान 
था, आकुलता का कारण था वो तो।

00:32:15.707 --> 00:32:20.290
अभी ज्ञेय बदल गया, ज्ञेय बदल 
गया तो ध्येय भी (बदल गया)।

00:32:20.314 --> 00:32:25.751
और ध्येय बदला तो ध्यान भी बदल गया, 
धर्मध्यान प्रगट होता है।

00:32:25.775 --> 00:32:27.381
ज्ञेय बदलने की बात है।

00:32:27.405 --> 00:32:30.468
ये (परज्ञेय) जानने में आता है, 
ये (परज्ञेय) जानने में आता है, 
इस जगत में ये (पर) ज्ञेय हैं,

00:32:30.492 --> 00:32:36.709
ये आत्मा ज्ञेय नहीं हैं? 
(अरे!) आत्मा ही ज्ञेय है! आहाहा!

00:32:36.733 --> 00:32:44.372
जैसे, क्या बात कहूँ? 
जैसे जगत में कोई निमित्त नहीं है - आज 
से बीस साल पहले कहा था राजकोट में।

00:32:44.396 --> 00:32:49.699
जगत में कोई निमित्त नहीं है, 
सब उपादान हैं। आहाहा!

00:32:49.723 --> 00:32:58.019
ऐसी अध्यात्म की पराकाष्ठा 
में जिसको अनुभव करना हो, 
जिसको अनुभव करना हो - शर्त ये है;

00:32:58.043 --> 00:33:05.395
तो इस जगत में एक ही ज्ञेय है, 
दूसरा ज्ञेय है नहीं। एक बार तो आ जा।

00:33:05.419 --> 00:33:16.829
बाद में सब ज्ञेय हैं ऐसा ज्ञान, 
व्यवहार हो जाता है; मगर निश्चय 
के बिना व्यवहार होता (नहीं है)।

00:33:16.853 --> 00:33:19.514
<b>समीप जाकर अनुभव 
करनेपर वे अभूतार्थ हैं, </b>

00:33:19.538 --> 00:33:25.014
नवतत्त्व का भेद, 
अभेद में दिखता नहीं है।

00:33:25.038 --> 00:33:28.290
<b>असत्यार्थ हैं; (वे जीवके 
एकाकार स्वरूपमें नहीं हैं;) </b>

00:33:28.314 --> 00:33:36.843
देखो! पंडितजी ने कोष्ठक डाला। 
जयचंद पंडित जी हो गए, जयपुर में।

00:33:36.867 --> 00:33:43.178
उन्होंने अनुवाद किया है, 
संस्कृत का ढूँढ़ारी भाषा में। बाद में 
हिन्दी (और) बाद में गुजराती (हुआ)।

00:33:43.202 --> 00:33:51.115
<b>वे जीवके एकाकार स्वरूपमें </b>
वो अनेक परिणाम <b>नहीं हैं; </b>आहाहा!

00:33:51.139 --> 00:33:55.978
ये अनेकाकार का ज्ञान होने 
पर भी वो एकाकार रहता है।

00:33:56.002 --> 00:34:03.418
अनेकाकार ज्ञान होता है 
तो क्या आत्मा अनेकाकार होता है? 
तीन काल में होता नहीं है।

00:34:03.442 --> 00:34:08.955
अनेकाकार ज्ञान तो होता है 
मगर एकाकार रहता है वो।

00:34:08.979 --> 00:34:15.292
<b>(वे जीवके एकाकार स्वरूपमें नहीं 
हैं;) इसलिये इन नव तत्त्वोंमें</b>, देखो!

00:34:15.316 --> 00:34:23.937
इन नवतत्त्व में <b>भूतार्थनयसे एक 
जीव ही प्रकाशमान है। </b>आहाहा! 
नवतत्त्व कोई दिखता (नहीं है)।

00:34:23.961 --> 00:34:32.770
भावार्थ में तो वो कहेंगे। 
देखो! भावार्थ में देखो। आहाहा! 
भावार्थ भी ५, ६, ७, पंक्ति देखो।

00:34:32.794 --> 00:34:40.112
कि <b>जब शुद्धनयसे जीव-पुद्गलका 
निजस्वरूप भिन्न भिन्न देखा जाये 
तब</b>, तब क्या है?

00:34:40.136 --> 00:34:44.661
जीव और पुद्गल से भिन्न, अकेला 
जीव को देखने में आवे तो क्या है?

00:34:44.685 --> 00:34:49.352
<b>तब वे पुण्य, पापादि सात 
तत्त्व कुछ भी वस्तु नहीं हैं; </b>

00:34:49.376 --> 00:34:52.836
अवस्तु है? 
कि हाँ! अवस्तु है। 
आहाहा!

00:34:52.860 --> 00:34:57.647
जब वो (सात तत्त्व) वस्तु दिखती है 
तब ये (आत्मा) वस्तु दिखाई नहीं देगी।

00:34:57.671 --> 00:35:01.487
प्रभु! 
तू ख्याल तो कर कि क्या बात है।

00:35:01.511 --> 00:35:04.915
सब व्यवहार का निषेध करते हैं, 
व्यवहार का निषेध करते हैं।

00:35:04.939 --> 00:35:06.957
अरे! व्यवहार का जन्म होता है।

00:35:06.981 --> 00:35:12.890
तू निषेध करता है, 
निश्चय और व्यवहार का तू निषेध करता है, 
ज्ञानी व्यवहार का निषेध करता नहीं है।

00:35:12.914 --> 00:35:17.378
उसको व्यवहार का ज्ञान होता है, 
व्यवहार का पक्ष नहीं होता है।

00:35:17.402 --> 00:35:25.804
निश्चय का ज्ञान होता है तो व्यवहार का - 
नवतत्त्व का ज्ञान हो जाता है मगर 
नवतत्त्व के सन्मुख नहीं है उपयोग।

00:35:25.828 --> 00:35:33.393
परद्रव्य से पराङमुख है 
साधक सविकल्पदशा में भी, 
निर्विकल्पध्यान में तो पराङमुख है (ही)।

00:35:33.417 --> 00:35:40.210
नवतत्त्व परद्रव्य हैं, उससे सविकल्पदशा 
में भी ज्ञान पराङमुख रहता है

00:35:40.234 --> 00:35:44.038
क्योंकि ज्ञेयाकर अवस्था में 
भी ज्ञायक जानने में आता है।

00:35:44.062 --> 00:35:47.236
उस भेद का लक्ष नहीं है 
इसलिए जानने में आता (नहीं है)।

00:35:47.260 --> 00:35:51.925
जनित (जानने में आ) जाता है 
मगर उसको जानता नहीं है।

00:35:51.949 --> 00:35:54.443
<b> एक जीव ही प्रकाशमान है। </b>
आहाहा!

00:35:54.467 --> 00:36:01.451
उसमें अनुभव की, 
सम्यग्दर्शन की विधि है। 
सम्यग्दर्शन की विधि इसमें लिखी है।

00:36:01.475 --> 00:36:04.929
<b>इसीप्रकार अन्तर्दृष्टिसे देखा जाये 
तो :- ज्ञायकभाव जीव है </b>

00:36:04.953 --> 00:36:07.419
देखो! ये एक ऊपर 
पढ़ने का रह गया थोड़ा।

00:36:07.443 --> 00:36:13.149
भावार्थ: <b>निमित्त-नैमित्तिकभाव 
मिट गया तब जीव-पुद्गल </b>...<b> कोई वस्तु 
(पदार्थ) सिद्ध </b>...<b>। वस्तु तो द्रव्य है, </b>

00:36:13.173 --> 00:36:22.126
वस्तु तो द्रव्य है, <b>और द्रव्यका 
निजभाव</b>, पारिणामिकभाव 
द्रव्य के साथ में ही रहता है। ओहोहो!

00:36:22.150 --> 00:36:24.848
उसका वियोग होता नहीं है।

00:36:24.872 --> 00:36:31.676
<b>तथा निमित्त-नैमित्तिकभावका 
तो अभाव ही होता है,</b>

00:36:31.700 --> 00:36:35.313
अरे! निमित्त-नैमित्तिकभाव 
नहीं मानते हैं? आहाहा!

00:36:35.337 --> 00:36:40.069
निमित्त-नैमित्तिकभाव 
अंतर्दृष्टि से देखो तो नहीं है।

00:36:40.093 --> 00:36:47.320
निमित्त के लक्ष से नैमित्तिक होता है, 
स्वभाव के लक्ष से नैमित्तिक राग कभी 
(भी) - तीनकाल में उत्पन्न होता नहीं है।

00:36:47.344 --> 00:36:54.141
इसलिए निमित्त-नैमित्तिक संबंध 
का अभाव हो गया है - ऐसा 
पंडितजी ने लिखा है, (वो) सही है।

00:36:54.165 --> 00:36:57.980
<b>तथा निमित्त-नैमित्तिकभावका 
तो अभाव ही होता है, </b>आहाहा!

00:36:58.004 --> 00:37:07.316
<b>इसलिये शुद्धनयसे जीवको जाननेसे 
ही सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो सकती है। 
जबतक भिन्न भिन्न नव पदार्थोंको जाने,</b>

00:37:07.340 --> 00:37:13.733
ये जीव है, ये अजीव है, ये पुण्य है, 
पाप है, ये आस्रव, उसका लक्षण, उसका 
कारण-कार्य, उसका फल। आहाहा!

00:37:13.757 --> 00:37:20.570
वहाँ चिपक गया। वहाँ चिपक गया 
भेद में, भेद में से हटता ही नहीं है।

00:37:20.594 --> 00:37:26.078
भेद का ज्ञान ज्यादा होने पर पंडित 
होता है मगर ज्ञानी होता (नहीं है)।

00:37:26.102 --> 00:37:33.849
भेद का थोड़ा ज्ञान हो भले, 
मगर अभेद का ज्ञान होता है तो 
सम्यग्दर्शन हो जाता है। आहाहा!

00:37:33.873 --> 00:37:38.767
<b>इसलिये शुद्धनयसे जीवको जाननेसे 
ही सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो सकती है। </b>

00:37:38.791 --> 00:37:47.154
इसका अर्थ ये नहीं कि ये अपना 
महाविद्यालय बंद कर देना - ये 
बात नहीं है। ऐसी बात नहीं है।

00:37:47.178 --> 00:37:51.690
ऊपर-ऊपर जाने की बात है, 
नीचे उतरने की बात (नहीं है)!

00:37:51.714 --> 00:37:59.890
जो भेद में अटकता है 
उसको वहाँ से भेद की दृष्टि छुड़ाकर 
अभेद में लाने का प्रयोजन है।

00:37:59.914 --> 00:38:04.753
<b>इसलिये शुद्धनयसे जीवको जाननेसे 
ही सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो सकती है।</b>

00:38:04.777 --> 00:38:14.036
<b>जबतक भिन्न भिन्न नव पदार्थोंको जाने, 
और शुद्धनयसे आत्माको न जाने</b>

00:38:14.060 --> 00:38:20.925
शुद्धनय से अंतर्मुख होकर आत्मा 
को जाने नहीं <b>तबतक पर्यायबुद्धि,</b> 
मिथ्याबुद्धि <b>है॥१३॥</b>