﻿WEBVTT LA243

00:01:00.940 --> 00:01:03.436
यह श्री समयसारजी परमागम शास्त्र है। 

00:01:03.460 --> 00:01:12.196
उसका निर्जरा अधिकार गाथा २०१ और २०२। 
पेज नं. ३१५ है। 

00:01:12.220 --> 00:01:35.316
<b>'अब शिष्य पूछता है कि रागी (जीव)
सम्यग्दृष्टि क्यों  नहीं होता?'</b>

00:01:35.340 --> 00:01:42.876
हम तो सम्यग्दृष्टि की अवस्था में 
भी राग होता हुआ देखते हैं। 

00:01:42.900 --> 00:01:48.116
पंच महाव्रत के परिणाम।
फिर जो देशव्रत के परिणाम, 

00:01:48.140 --> 00:01:52.119
उसके पहले (की अवस्था में) 
देव-गुरु-शास्त्र की भक्ति का राग। 

00:01:52.143 --> 00:01:58.116
सम्यग्दृष्टि की दशा में राग होता है 
ऐसा देखते हैं। 

00:01:58.140 --> 00:02:07.956
तो फिर रागी जीव हो,
उसको सम्यग्दृष्टि कैसे कहा जाता है?

00:02:07.980 --> 00:02:19.276
ऐसा शिष्य का प्रश्न है। समझने के लिए। 
सम्यग्दृष्टि तो कहलाता है, पर मुझे समझना है। 

00:02:19.300 --> 00:02:23.716
कि राग होते हुए भी उसे सम्यग्दृष्टि 
कैसे कहा जाता है?

00:02:23.740 --> 00:02:31.036
उसके उत्तर (में) दो गाथा हैं। 
अब गाथा सब एक-साथ बोलिये। 

00:02:31.060 --> 00:03:01.556
<b>अणुमात्र भी रागादि का सद्भाव है जिस जीव को। 
वह सर्व आगमधर भले ही, जानता नहीं आत्म को।।२०१।।</b> 

00:03:01.580 --> 00:03:16.076
<b>नहीं जानता जहँ आत्म को,
अनआत्म भी नहीं जानता।</b> 

00:03:16.100 --> 00:03:30.996
<b>वह क्योंहि होय सुदृष्टि जो, 
जीव-अजीव को नहीं जानता? २०२।।</b> 

00:03:31.020 --> 00:03:37.636
प्रश्न ऐसा है कि यदि वह रागी हो, वह जीव है,
तो वह सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकता है?

00:03:37.660 --> 00:03:41.355
राग उसकी दशा में होना ही नहीं चाहिए। 

00:03:41.379 --> 00:03:48.676
उसकी पर्याय में से भी राग चला जाये 
तो तो सम्यग्दृष्टि कह सकते हैं। 

00:03:48.700 --> 00:03:53.156
लेकिन उसकी पर्याय में पँच महाव्रत 
के परिणाम दिखते हैं। 

00:03:53.180 --> 00:03:58.036
नीचे (के गुणस्थान में) ग्यारह प्रतिमा के विकल्प 
उत्पन्न होते हैं, वे दिखते हैं। 

00:03:58.060 --> 00:04:06.076
उसके नीचे चौथे गुणस्थान में सम्यग्दृष्टि को 
देव-गुरु-शास्त्र की भक्ति का राग आता है,
आता हुआ दिखाई देता है। 

00:04:06.100 --> 00:04:11.516
तो रागी है और फिर तुम कहते हो (कि) सम्यग्दृष्टि (है)। 
ये क्या है? 

00:04:11.540 --> 00:04:14.676
तो इसके उत्तररूप गाथा कहते हैं। 

00:04:14.700 --> 00:04:22.636
<b>'टीका :- जिसके रागादि अज्ञानमय भावों के 
लेशमात्र का भी सद्भाव है...' </b> 

00:04:22.660 --> 00:04:28.596
राग के दो प्रकार हैं। एक अस्थिरता का राग 
और एक अज्ञानमय राग। 

00:04:28.620 --> 00:04:34.956
अर्थात् राग को जो अपना माने, 
ऐसा रागी सम्यग्दृष्टि नहीं है।  

00:04:34.980 --> 00:04:44.476
राग को पराया भाव जानता है, विभाव है, मेरा 
स्वभाव नहीं है, उसको आत्मा में नास्तिपने जानता है, 

00:04:44.500 --> 00:04:49.436
आत्मा में अस्ति है राग की-  
ऐसा जानता नहीं है। 

00:04:49.460 --> 00:04:56.596
ज्ञान की अस्ति है और राग की नास्ति है। 
आत्मज्ञान की आत्मा में अस्ति है। 

00:04:56.620 --> 00:05:05.876
और रागादि की आत्मा में नास्ति है और 
आत्मज्ञान में भी राग की नास्ति है। 

00:05:05.900 --> 00:05:14.636
अर्थात् (जो) रागी है वह जीव नहीं होता। ज्ञानी हो 
वही जीव और सम्यग्दृष्टि होता है। 

00:05:14.660 --> 00:05:22.756
तो यहाँ कहते हैं कि <b>'रागादि अज्ञानमय भावों...'</b> 
मिथ्यात्व, लेशमात्र भी मिथ्यात्व नहीं है। 

00:05:22.780 --> 00:05:30.076
सम्यग्दृष्टि को मिथ्यात्व का राग नहीं होता। 
राग, राग में बड़ा अन्तर है। 

00:05:30.100 --> 00:05:36.596
<b>'जिसके रागादि अज्ञानमय भावों के
लेशमात्र का भी सद्भाव है...' </b> 

00:05:36.620 --> 00:05:41.996
छोटे से छोटे मिथ्यात्व का राग,...
राग के दो प्रकार हैं। 

00:05:42.020 --> 00:05:48.296
श्रद्धा के दोष को भी राग कहते हैं और 
चारित्र के दोष को भी राग कहते हैं। 

00:05:48.420 --> 00:05:50.862
राग नाम एक है, नाम राग,

00:05:50.886 --> 00:05:58.236
लेकिन एक श्रद्धा की विपरीत 
पर्याय मिथ्यात्व, पाप के परिणाम वे भी राग हैं। 

00:05:58.260 --> 00:06:04.019
और चारित्र की दशा में शुभाशुभ 
भाव होते हैं, उन्हें भी राग कहते हैं। 

00:06:04.043 --> 00:06:06.596
राग राग में बड़ा फर्क है। 

00:06:06.620 --> 00:06:16.236
सम्यग्दृष्टि को उसकी दशा में लेशमात्र राग नहीं है 
अर्थात् कि मिथ्यात्व का कण बिल्कुल नहीं है।

00:06:16.260 --> 00:06:23.036
अज्ञानमय राग नहीं है। अस्थिरता का राग 
भले हो लेकिन वह ज्ञान के ज्ञेय में जाता है। 

00:06:23.060 --> 00:06:25.676
कर्ता के कर्म में नहीं जाता। 

00:06:25.700 --> 00:06:30.196
<b>'जिसके रागादि  अज्ञानमय भावों के 
लेशमात्र का भी सद्भाव है...'</b>  

00:06:30.220 --> 00:06:36.076
अज्ञान और मिथ्यात्व का जरा सा भी सद्भाव है, 

00:06:36.100 --> 00:06:45.236
(तो) सम्यग्दर्शन जरा भी नहीं है। सम्यग्दर्शन जरा भी नहीं है। 
और मिथ्यात्व जरा सा रह जाता है। 

00:06:45.260 --> 00:06:55.796
थोड़ा सा। थोड़ा भी। मोक्षमार्ग प्रकाशक में 
कहा है कि मिथ्यात्व का छोटे में छोटा
अंश भी बुरा है, वह यह है। 

00:06:55.820 --> 00:07:03.356
कहते हैं कि जरा भी यदि राग रह गया मिथ्यात्व का,
तो '<b>वह भले ही श्रुतकेवली जैसा हो...', </b> 

00:07:03.380 --> 00:07:11.316
श्रुतकेवली नहीं हुआ है। केवली तो है ही नहीं, 
किन्तु श्रुतकेवली भी नहीं है। 

00:07:11.340 --> 00:07:17.636
क्योंकि वह श्रुतज्ञान द्वारा आत्मा को 
नहीं जानता है, इसलिए श्रुतकेवली नहीं है। 

00:07:17.660 --> 00:07:22.062
पर श्रुतकेवली जैसा दिखता है शास्त्रपाठी।  

00:07:22.086 --> 00:07:28.636
तो <b>'श्रुतकेवली जैसा हो तथापि वह  
ज्ञानमय भाव के अभाव के कारण...'</b>, 

00:07:28.660 --> 00:07:36.836
अज्ञानमय भाव के सद्भाव के कारण
और ज्ञानमय भाव के अभाव के कारण। 

00:07:36.860 --> 00:07:42.916
आत्मा का तो ज्ञान है नहीं। 
शास्त्रज्ञान.. उसको अपना मानता है। 
मिथ्यात्व है। 

00:07:43.100 --> 00:07:52.836
शास्त्र का ज्ञान होता ही नहीं।  
ज्ञान शास्त्र से होता नहीं। 

00:07:52.860 --> 00:07:59.516
और ज्ञान शास्त्र का भी नहीं होता। 
और ज्ञान शास्त्र को प्रसिद्ध नहीं करता। 

00:07:59.540 --> 00:08:05.116
ज्ञान तो उसे कहते हैं  कि आत्मा का ज्ञान 
उसे ज्ञान (कहते हैं )। 

00:08:05.140 --> 00:08:10.996
कि जो ज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध करता है 
उसे ज्ञान कहने में आता है। 

00:08:11.020 --> 00:08:17.356
ऐसे आत्मज्ञान के अभाव के कारण,
अनुभव ज्ञान के अभाव के कारण,

00:08:17.380 --> 00:08:25.049
अतीन्द्रियज्ञान के अभाव के कारण,
स्वसंवेदन ज्ञान के अभाव के कारण 

00:08:25.073 --> 00:08:28.316
<b>'आत्मा को नहीं जानता...'</b>आहाहा!

00:08:28.340 --> 00:08:36.036
राग का सद्भाव है। अज्ञानमय भाव है। 
और ज्ञानमय भाव का अभाव है। 

00:08:36.060 --> 00:08:44.516
अतः वह आत्मा को नहीं जानता इसलिए 
उसे मिथ्यादृष्टि कहने में आता है। 

00:08:44.540 --> 00:08:52.556
अब इसका थोड़ा स्वरूप, हम जरा 
सरल करके समझें।  

00:08:52.580 --> 00:09:00.928
कि ये आत्मज्ञान क्या? और
शास्त्रज्ञान क्या? और ज्ञान गुण क्या?

00:09:00.952 --> 00:09:08.436
आत्मज्ञान क्या? शास्त्रज्ञान क्या?
और ज्ञान गुण क्या? तीन प्रकार हैं। 

00:09:08.460 --> 00:09:18.756
ज्ञान उसे कहा जाता है...  देखो, शास्त्रज्ञान और 
आत्मज्ञान (ऐसा भेद) अभी लक्ष्य में मत लेना।

00:09:18.780 --> 00:09:22.916
शास्त्रज्ञान होता है या आत्मज्ञान होता है? 

00:09:22.940 --> 00:09:27.900
वास्तव में तो शास्त्रज्ञान भी नहीं होता और 
आत्मज्ञान भी नहीं होता।  

00:09:27.924 --> 00:09:30.876
ज्ञान  प्रगट होता है, 
प्रत्येक जीव को।  

00:09:30.900 --> 00:09:37.396
<b>'सामान्य उपयोग लक्षणम्'</b> 
ज्ञान प्रगट होता है, प्रत्येक जीव को। 

00:09:37.420 --> 00:09:41.916
एकेन्द्रिय हो, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय,
चार इन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, छठा मन, सभी को। 

00:09:41.940 --> 00:09:48.036
उपयोग लक्षण जो है प्रगट।  
सदा उपयोगमय आत्मा है। 

00:09:48.060 --> 00:09:53.676
अकेला राग प्रगट हो और उपयोग 
प्रगट न हो, तो जड़ हो जाये।

00:09:53.700 --> 00:09:58.556
और अकेला उपयोग प्रगट हो और 
राग प्रगट न हो, तो तो सिद्ध होना चाहिये। 

00:09:58.580 --> 00:10:07.076
लेकिन राग और ज्ञान एकसाथ प्रगट होते हैं,
पर भिन्न-भिन्न प्रगट होते हैं। वे एक होकर
प्रगट नहीं होते हैं।

00:10:07.100 --> 00:10:12.236
ज्ञान में राग नहीं है और राग में ज्ञान नहीं है।  
ज्ञान के कारण राग की उत्पत्ति नहीं है।

00:10:12.260 --> 00:10:17.276
और राग उत्पन्न होता है, इसलिए ज्ञान 
उत्पन्न होता है, ऐसा नहीं है।  आहाहा! 

00:10:17.300 --> 00:10:25.556
एक अपेक्षा से, आत्मा है इसलिए 
उपयोग उत्पन्न नहीं होता। 
उपयोग तो उपयोग से उत्पन्न होता है। 

00:10:25.620 --> 00:10:28.036
वह स्वतः निरपेक्ष पर्याय है। 

00:10:28.060 --> 00:10:38.916
उपयोग जब प्रगट होता है तब या तो वह 
इन्द्रियज्ञान में कन्वर्ट कर देता है  
या अतीन्द्रिय ज्ञान में कन्वर्ट कर दे। 

00:10:38.940 --> 00:10:44.716
समय एक है। उत्पन्न होने का समय एक है। 

00:10:44.740 --> 00:10:53.876
उस समय यदि उसे  ऐसा ख्याल में लेवे कि मुझे पर जानने में आता  
है, तो इन्द्रियज्ञान इज़ इक्वल टू (=) अज्ञान (खड़ा हो गया)। 

00:10:53.900 --> 00:11:03.036
व्यवहार ज्ञान नहीं। और यदि वह उपयोग प्रगट 
होता है तब ऐसा ख्याल में ले कि ओहो!

00:11:03.060 --> 00:11:11.036
इस वर्तमान उपयोग में तो मुझे ज्ञायक आत्मा,
आबाल-गोपाल सभी को जानने में आता है तो मैं भी 
बाल-गोपाल में आ गया। 

00:11:11.060 --> 00:11:18.116
तो मुझे भी वर्तमान वर्तते हुए उपयोग में 
आत्मा जनाता (जानने में आता) ही है। 

00:11:18.140 --> 00:11:21.813
उसे न जानने में आता हो 
तो भी जनाता रहता है।  

00:11:21.837 --> 00:11:29.196
वह स्वीकार न करे, तो इससे ज्ञायक उसमें 
न जानने में आये और ज्ञान उसे न जाने,

00:11:29.220 --> 00:11:34.036
ज्ञान जानने की क्रिया बंद कर दे और 
ज्ञायक उसमें जनाने की क्रिया (बंद कर दे)- ऐसा नहीं होता। 

00:11:34.060 --> 00:11:39.518
ज्ञायक में ज्ञेयत्व का नाश नहीं होता। 
और ज्ञान में ज्ञानत्व का नाश नहीं होता। 

00:11:39.542 --> 00:11:42.476
यह स्थिति है, सामान्य ज्ञान उपयोग की। 

00:11:42.500 --> 00:11:48.276
अभी सम्यग्ज्ञान और मिथ्याज्ञान की  देर है,
थोड़ी। अभी तो आहाहा!

00:11:48.300 --> 00:11:55.996
फिर कैसे मिथ्याज्ञान कहलाता है और कैसे  
सम्यग्ज्ञान कहलाता है यह 
इसमें से ही अभी निकलेगा। 

00:11:56.020 --> 00:11:59.996
ज्ञान प्रगट होता है प्रत्येक जीव को। 
सदा उपयोग लक्षण जीव है। 

00:12:00.020 --> 00:12:07.196
उस उपयोग में यदि ऐसा ख्याल में आये,
स्वयं से ख्याल नहीं आता,

00:12:07.220 --> 00:12:12.396
और कदाचित् सोनगढ़ के संत मिल जाएँ 
और कहें कि तेरे ज्ञान में ज्ञायक जानने में आता है। 

00:12:12.420 --> 00:12:18.516
वापस पलट जाता है। कि साहेब यह पर जानने में नहीं आता?
(तो गुरु कहें) कि नहीं, बिल्कुल जानने में नहीं आता। 

00:12:18.540 --> 00:12:25.634
पर जानने में नहीं आता तो ज्ञान का नाश होगा,
अज्ञान का नाश होगा?

00:12:25.658 --> 00:12:29.936
पर जानने में आता है तब तक अज्ञान है। 

00:12:29.960 --> 00:12:34.945
'मैं पर को जानता हूँ',
पर को जानता हूँ- यह तो असद्भूत व्यवहार है। 

00:12:34.969 --> 00:12:38.936
और यह असद्भूत व्यवहार के पक्ष में रह गया। 

00:12:39.660 --> 00:12:46.480
अभी तो ज्ञान आत्मा को जानता है, उसमें भी नहीं आता। 

00:12:46.504 --> 00:12:55.156
असद्भूत अर्थात् झूठा। 
असद्भूत अर्थात् सच्चा नहीं। आहाहा! 

00:12:55.180 --> 00:13:03.836
झीनी बात है झवेरचंदभाई! जरा सूक्ष्म है! 
उपयोग लक्षण है। प्रत्येक समय प्रगट होता है। 

00:13:03.860 --> 00:13:09.516
और यह लक्षण लक्ष्य को प्रसिद्ध करता है। 
क्योंकि लक्षण और लक्ष्य (एक दूसरे से) तादात्म्य होते हैं। 

00:13:09.540 --> 00:13:14.910
शक्कर और शक्कर की मिठास,
शक्कर यहाँ और उसकी मिठास वहाँ, ऐसा (कहीं) होता होगा?

00:13:14.934 --> 00:13:18.821
ऐसा होता नहीं। 
लेकिन उसे ख्याल नहीं आता स्वयं से। 

00:13:18.845 --> 00:13:23.236
इसी दौरान सोनगढ़ के संत मिले कि तेरे 
ज्ञान में ज्ञायक ही जानने में आ रहा है। 

00:13:23.260 --> 00:13:33.340
वास्तव में तुझे पर जानने में नहीं आता। क्योंकि ज्ञान,
ज्ञान पर के सन्मुख होकर होता ही नहीं।

00:13:33.364 --> 00:13:36.716
क्या कहा?

00:13:36.740 --> 00:13:42.916
वह ज्ञान प्रगट होता है न! उपयोग। 
वह पर के सन्मुख होकर नहीं होता। 

00:13:42.940 --> 00:13:51.036
क्योंकि <b>'परलक्ष अभावात्'</b>पर के लक्ष्य से 
ज्ञान की उत्पत्ति तीनकाल में नहीं होती। 

00:13:51.060 --> 00:13:57.236
ज्ञान तो चैतन्य अनुविधायी परिणाम उपयोग है। 
प्रत्येक समय प्रगट होता है। 

00:13:57.260 --> 00:14:03.176
उन सोनगढ़ के संत ने कहा कि तुझे आबाल-गोपाल 
सभी को भगवान आत्मा जानने में आता है। 

00:14:03.200 --> 00:14:11.616
पर्याय जानने में आती है, ऐसा नहीं। 
पर्याय में द्रव्य जानने में आता है। और 
पर्याय में अकेला द्रव्य ही जानने में आता है। 

00:14:11.740 --> 00:14:22.716
उसमें ऐसा नहीं लिया कि ये सामान्य अज्ञानी जीव हैं 
उनको रागादि और देहादि जानने में आते हैं और आत्मा भी 
जानने में आता है, ऐसा स्वपरप्रकाशक है -ऐसा  नहीं लिया। 

00:14:22.740 --> 00:14:30.676
अकेला आत्मा ही जानने में आता है। आबाल-गोपाल सभी को। 
इसप्रकार जहाँ निर्णय करने जाता है,

00:14:30.700 --> 00:14:36.356
वहाँ जो सामान्य उपयोग है, वह 
अतीन्द्रियज्ञान में कन्वर्ट होकर 
अनुभव में आ जाता है। 

00:14:36.380 --> 00:14:41.796
अब कन्वर्ट करना तो आता है।  
उपयोग का अनुपयोग करता है। 

00:14:41.820 --> 00:14:46.956
उपयोग का अज्ञान कर डालता है। 
ज्ञान का अज्ञानत्व करता है। 

00:14:46.980 --> 00:14:54.156
अब ज्ञान का ज्ञानत्व करे, पलटा दे, 
(कि) जाननहार ही जानने में आता है, ज्ञायक जानने में आता है। 
क्योंकि ज्ञान में ज्ञायक तन्मय है। 

00:14:54.180 --> 00:14:59.996
तन्मय के ऊपर वजन है। और जो 
परपदार्थ हैं, वे प्रतिभासित होते हैं। 

00:15:00.020 --> 00:15:04.196
लेकिन परपदार्थ और ज्ञान एक नहीं होते,
उसमें तन्मय नहीं होते।

00:15:04.220 --> 00:15:10.076
तन्मय तो नहीं होता, लेकिन 
पर के सन्मुख होता ही नहीं ज्ञान। 

00:15:10.100 --> 00:15:17.676
पर के सन्मुख हो उसे हम ज्ञान नहीं कहते। आहाहा! 

00:15:17.700 --> 00:15:21.196
इस अलमारी के सन्मुख होकर 
अलमारी जानने में नहीं आती। 

00:15:21.220 --> 00:15:29.276
आत्मा के सन्मुख होकर आत्मा भी जानने में आती है और 
अलमारी के सन्मुख हुये बिना अलमारी 
जानने में आ जाती है अंदर।  

00:15:29.300 --> 00:15:34.196
लोकालोक जानने में आ जाता है। यह ऐसी ज्ञान की ताकत है। 

00:15:34.220 --> 00:15:38.796
तो वह ज्ञान उपयोग प्रगट होता है। 
या तो मुझे पर जानने में आता है (ऐसा मानता है),

00:15:38.820 --> 00:15:43.716
तो अतीन्द्रियज्ञान के बदले इन्द्रियज्ञान 
पर की प्रसिद्धि करने गया। 

00:15:43.740 --> 00:15:51.316
और पर को जानकर मोह हुए बिना रहता ही नहीं।  
जाने हुए का श्रद्धान होता, होता और होता ही है। 

00:15:51.340 --> 00:15:56.469
उसमें भी पाँच इन्द्रियों द्वारा स्थूल पदार्थ,
रूपी पदार्थ जानने में आते हैं। 

00:15:56.493 --> 00:16:00.116
आँख द्वारा देह 
जानने में आती है तो देह में आत्मबुद्धि (होती है)। 

00:16:00.140 --> 00:16:07.596
और मन द्वारा राग जानने में आता है, तो राग में आत्मबुद्धि।  
आँख का विषय राग नहीं है। कान का विषय राग नहीं है। 

00:16:07.620 --> 00:16:15.036
स्पर्श इन्द्रिय का विषय राग नहीं है।।
उस राग को जाननेवाला मानसिक ज्ञान है। 

00:16:15.060 --> 00:16:23.796
मन में राग ज्ञात होता है, जिस समय दुःख जानने में आता है,
तो मैं दुःखी। आह! मैं दुःखी हो गया,

00:16:23.820 --> 00:16:28.156
क्योंकि इन्द्रियज्ञान जिसको जानता है उसमें 
आत्मबुद्धि किये बिना (रहता नहीं),

00:16:28.180 --> 00:16:33.236
इन्द्रियज्ञान एकत्व करता है और 
अतीन्द्रियज्ञान विभक्त कर डालता है। 

00:16:33.260 --> 00:16:39.116
भेदज्ञान अतीन्द्रियज्ञान से होता है। 
आत्मा का अनुभव अतीन्द्रियज्ञान में होता है। 

00:16:39.140 --> 00:16:44.276
इन्द्रियज्ञान का विषय नहीं है आत्मा। 
इन्द्रियज्ञान से अगोचर है आत्मा। 

00:16:44.300 --> 00:16:50.836
मन से भी अगोचर है। मन से भी पार है आत्मा। 
ज्ञान से गम्य है आत्मा। 

00:16:50.860 --> 00:16:57.636
तब अनादिकाल से मैं पर को जानता हूँ,
ऐसी मिथ्याबुद्धि प्रगट होती है। 

00:16:57.660 --> 00:17:04.836
अब वापस फिर कि तेरे ज्ञान में ज्ञायक 
जानने में आ रहा है, जाननहार जानने में आता है- ऐसा ले। 

00:17:04.860 --> 00:17:10.596
अज्ञान टल जाएगा। समय मात्र में 
जात्यांतर हो जायेगा। 

00:17:10.620 --> 00:17:20.636
श्रीमद् राजचन्द्रजी ने फ़रमाया है, जो ज्ञान,
अनंतकाल से जो ज्ञान..., ज्ञान शब्द प्रयुक्त किया है। 

00:17:20.660 --> 00:17:28.156
<b>'अनंतकाल से जो ज्ञान भव-हेतु होता था। </b> 
भव अर्थात् दुःख। दुःख का हेतु, मतलब कारण। 

00:17:28.180 --> 00:17:38.916
जो ज्ञान शब्द। अज्ञान नहीं। राग नहीं। 
जो राग भव-हेतु (भव का कारण) होता था, ऐसा नहीं लिखा। आहाहा!

00:17:38.940 --> 00:17:46.756
गूढ़, समझकर लिखा, कि कोई विचक्षण होगा तो 
इसमें से निकालेगा। उसकी बुद्धि के ऊपर छोड़ा। 

00:17:46.780 --> 00:17:48.676
समझ गये? सब खुल्ला नहीं किया जाता। 

00:17:48.700 --> 00:17:56.836
वे भी परीक्षा करते हैं कि मैं लिखता हूँ उसका 
हल निकालनेवाला कोई न कोई तो निकलेगा। 

00:17:56.860 --> 00:18:01.915
ऐसी एक घटना बनी। 
मेरे पिताजी बात करते थे। 

00:18:01.939 --> 00:18:07.556
किसी गाँव में मेरा जन्म (हुआ) 
-जूनागढ़ के उस तरफ स्वराष्ट्र में, लिंबुड़ा में। 

00:18:07.580 --> 00:18:16.876
तो वहाँ से दस-पंद्रह गाँव दूर कोई गाँव है, वहाँ एक सेठ। 
बहुत पैसे (वाले)। बहुत पैसा। सोना-चाँदी भरपूर। 

00:18:16.900 --> 00:18:23.476
कोई बाल बच्चे नहीं। अकेला। 
उसने विचार किया कि अब इसका क्या करना? 

00:18:23.500 --> 00:18:32.716
विचार किया कि किसी भाग्यशाली के हाथ में 
यह धन जाये तो अच्छा। लेकिन भाग्यशाली को ढूँढना कहाँ? 

00:18:32.740 --> 00:18:41.436
और जीते जी तो देना नहीं है किसी को। 
जीते जी तो दान भी करना नहीं है। समझ गये?

00:18:41.460 --> 00:18:47.476
तो अब करना क्या? कि मरने के बाद भाग्यशाली के 
हाथ में जाये तो ठीक, ऐसा विचार आया। 

00:18:47.500 --> 00:18:54.396
उसका उपाय क्या? उसका उपाय निकाला उन्होंने। 
एक बनाया स्टेच्यु। मूर्ति, समझे न? 

00:18:54.420 --> 00:19:03.956
स्टेच्यु। स्टेच्यु बनाया। और 
वह खोखला था। उसमें सब भर दिया।  
उसमें सब कुछ भर दिया। 

00:19:03.980 --> 00:19:09.916
ये दो (शरीर और गर्दन) भिन्न पड़ें, ऐसा बनाया था कि 
कोई सांध (जोड़) उसमें दिखे नहीं। 

00:19:09.940 --> 00:19:16.501
और वह स्टेच्यु उसने बाहर रख दिया।  
समझ गये?

00:19:16.525 --> 00:19:23.556
प्रवेश द्वार में। सरहद समझे न?
गाँव के बाहर। रास्ते के ऊपर। 

00:19:23.580 --> 00:19:33.116
सब पढ़ते जाते। नीचे लिखा,
'सिर काटे वो माल निकाले।' 
सिर काटे वो माल निकाले। 

00:19:33.140 --> 00:19:37.716
सब पढ़ते जाते। अरे! हमें सिर काटकर  
कहाँ माल निकालना है? यह तो मूर्ख है। 

00:19:37.740 --> 00:19:44.880
सिर काटें फिर शायद उसमें पैसे मिलें तो 
वह किस काम का? इसलिए हमें सिर नहीं काटना है।

00:19:44.904 --> 00:19:52.516
उसमें कोई विचक्षण समझदार (व्यक्ति) निकला कि 
कुछ मर्म लगता है इसमें। ओहोहो!

00:19:52.540 --> 00:19:55.916
सिर काटे वो माल निकाले यह क्या (बात है)? 

00:19:55.940 --> 00:20:02.596
हं.. उसको ख्याल आ गया और ज़रा 
कहीं कोई देखे नहीं इसप्रकार (मूर्ती के) आसपास ठोककर देखा।  

00:20:02.620 --> 00:20:07.809
खोखला लगता है। देखेंगे। रात के एक बजे
घोड़े पर आया। 

00:20:07.833 --> 00:20:12.076
वह डालकर, क्या कहलाता है?
भरवाड़ के पास- बड़ा थैला। 

00:20:12.100 --> 00:20:16.447
उसका नाम होता है कुछ, झोला, झोला।

00:20:16.471 --> 00:20:22.436
रात के एक बजे आकर 
ऐसा एक हथोड़े से प्रहार किया यहाँ (गर्दन) पर,

00:20:22.460 --> 00:20:29.116
धड़ उड़ गया। और धन का ढे़र 
सारा भरकर चला गया घर। 

00:20:29.140 --> 00:20:34.236
सुबह हुई, ७ बजे, ८ बजे, सब आते गये। 
अरे! यह क्या हुआ?

00:20:34.260 --> 00:20:39.591
अरे! यह तो खोखला था 
और इसमें धन था। कोई ले गया। 

00:20:39.615 --> 00:20:45.836
सिर काटे, वह माल निकाले। 
वह मर्म यह था। कोई पैसे ले गया। 

00:20:45.860 --> 00:20:56.076
इसप्रकार ये मार्मिक बात हैं सभी। यह बात। 
मैं पर को जानता हूँ, यह (मान्यता) संसार है। 

00:20:56.100 --> 00:21:01.756
मैं पर को नहीं जानता- (ऐसा मानते ही) संसार बंद हो जाता है। 

00:21:01.780 --> 00:21:06.276
और पर को नहीं जानता (ऐसा मानता है), 
तो अज्ञान का नाश होता है। 

00:21:06.300 --> 00:21:11.156
ज्ञान का नाश नहीं होता। ज्ञान तो 
उदय में आता है नया। आहाहा! 

00:21:11.180 --> 00:21:16.716
इसप्रकार यह अनंतकाल से पर को 
जानता हूँ और पर को करता हूँ। 

00:21:16.740 --> 00:21:21.556
एक कर्ताबुद्धि और एक ज्ञाताबुद्धि। 
दोनों दोष अनंतकाल से हैं। 

00:21:21.580 --> 00:21:26.876
इसीप्रकार श्रीमद्जी ने यह एक गूढ़ (रहस्य) लिखा। 
सिर काटे वह माल निकाले।

00:21:26.900 --> 00:21:30.691
उसमें लिखा 
कि "अनंतकाल से जो ज्ञान भव-हेतु होता था..." 

00:21:30.715 --> 00:21:34.356
राग नहीं लिखा, अज्ञान नहीं लिखा,
मिथ्यात्व नहीं लिखा। 

00:21:34.380 --> 00:21:38.756
ज्ञान शब्द प्रयुक्त किया। यह क्या? समझ गये?

00:21:38.780 --> 00:21:42.211
एक बहन ने प्रश्न किया सोनगढ़ में, कि यह क्या?

00:21:42.235 --> 00:21:46.596
मैंने कहा यह ज्ञान शब्द है न
वह इन्द्रियज्ञान है। 

00:21:46.620 --> 00:21:52.916
वह ज्ञान नहीं है, इन्द्रियज्ञान है। 
इन्द्रियज्ञान भव-हेतु लिखा है हों! 

00:21:52.940 --> 00:21:57.535
राग तो भव-हेतु है, लेकिन इन्द्रियज्ञान को 
राग की कक्षा में डाला। 

00:21:57.559 --> 00:22:00.436
दोनों को असद्भूत व्यवहार में डाला है।  

00:22:00.460 --> 00:22:04.492
जिसप्रकार राग पुराने कर्म के उदय के संग से होता है 

00:22:04.516 --> 00:22:11.996
अर्थात् पुराने कर्म का कार्य, बंध का कार्य 
और नया बंध होता है, उसका कारण। 

00:22:12.020 --> 00:22:18.916
राग है वह कार्य भी है और कारण भी है। 
नया बंध होता है उसका कारण। निमित्त कारण। 

00:22:18.940 --> 00:22:22.836
और पुराने कर्म के लक्ष्य से होता है 
इसलिए पुराने का यह कार्य कहलाता है। 

00:22:22.860 --> 00:22:29.196
उसीप्रकार इन्द्रियज्ञान बंध का कार्य 
और बंध का कारण समानकोटि का है। 

00:22:29.220 --> 00:22:33.836
शास्त्रज्ञान को आत्मा मानकर 
विद्वान मर जाते हैं। आहाहा!

00:22:33.860 --> 00:22:40.036
शास्त्रपाठी को ख्याल नहीं आता 
कि इन्द्रियज्ञान अज्ञान है। 

00:22:40.060 --> 00:22:43.936
ज्ञेय है। इन्द्रियज्ञान ज्ञेय है, ज्ञान नहीं है। 

00:22:43.960 --> 00:22:47.836
अभी इकत्तीस गाथा वहाँ पर चली थी,
भाई, किशोरभाई। 

00:22:47.860 --> 00:22:52.740
उसमें इन्द्रियज्ञान, द्रव्यइन्द्रिय,
(भावइन्द्रिय), भावइन्द्रिय के विषय सभी को 

00:22:52.740 --> 00:22:56.436
ज्ञेय में डाला। वे तीनों ही ज्ञेय में हैं। 
वे ज्ञान ही नहीं हैं। 

00:22:56.460 --> 00:23:07.236
फिर श्रीमद्जी फरमाते हैं कि '<b>अनंतकाल से 
जो ज्ञान भव-हेतु होता था, उस ज्ञान को 
समय मात्र में जात्यांतर किया...</b>' 

00:23:07.260 --> 00:23:14.276
जाति बदल गई। इन्द्रियज्ञान में से 
अतीन्द्रियज्ञान हो गया। 
अज्ञान टलकर ज्ञान हो गया। 

00:23:14.300 --> 00:23:22.236
'<b>और भव की निवृत्तिरूप हुआ, उस सम्यग्दर्शन को 
हम नमस्कार करते हैं</b>।' आहाहा!

00:23:22.260 --> 00:23:31.996
जितना ठगा जाता है जीव शुभभाव से, शुभभाव से 
धर्म होता है और (शुभभाव) करते-करते धर्म होता है,

00:23:32.020 --> 00:23:38.836
पुण्य करने से सुखी हुआ जाता है 
पुण्य करने से मोक्ष जाया जाता है। आहाहा!

00:23:38.860 --> 00:23:41.953
सामान्य जनता शुभराग में अटक गयी,

00:23:41.977 --> 00:23:49.076
धर्म मानने लगी और विद्वान 
इन्द्रियज्ञान को ज्ञान मानने लगे। आहाहा!

00:23:49.100 --> 00:23:57.476
दोनों ही बड़ी भूल हैं। इसलिए जो इन्द्रियज्ञान है 
वह पराश्रित है। पर की प्रसिद्धि करता है। 

00:23:57.500 --> 00:24:02.316
स्व को तिरोभूत करता है। ढक देता है। आहाहा!

00:24:02.340 --> 00:24:09.796
इन्द्रियज्ञान में आत्मा के दर्शन नहीं होते।  
अर्थात् जिसने आत्मा का लक्ष्य छोड़ा है 

00:24:09.820 --> 00:24:14.876
और राग को अपना माना है, ऐसा जो जीव,

00:24:14.900 --> 00:24:21.436
वह भले ही श्रुतकेवली हो, पंच महाव्रत 
पालता हो, नग्न (दिगंबर) हो, आहाहा!

00:24:21.460 --> 00:24:28.116
द्रव्यलिंगी मुनि हो, जंगल में रहता हो,
गाँव में रहे ही नहीं। गाँव में रहे तो मुनि ही नहीं है। 
आहाहा!

00:24:28.140 --> 00:24:33.276
जंगल में ही रहते हैं और दिन में तो सोते ही नहीं।  

00:24:33.300 --> 00:24:38.396
पंचपरमेष्ठी में जिन मुनि को नमस्कार 
हम करते हैं, वे मुनि, सच्चे मुनि हों!

00:24:38.420 --> 00:24:46.236
रात के पिछले पहर में पौने सेकंड की नींद (लेते हैं)। 
एक सेकंड की भी नहीं, एक मिनट की नींद नहीं। 

00:24:46.260 --> 00:24:53.996
ऐसे तो (वे मुनि) जिनकी नींद उड़ गई है, 
जिनकी नींद (उड़ गई है) अर्थात् प्रमाद चला गया है। 

00:24:54.020 --> 00:24:56.562
प्रमाद चला गया है। 

00:24:56.586 --> 00:25:04.236
जहाँ कमाई दिखती है ना, वहाँ थकान नहीं दिखती। 
कमाई दिखती है वहाँ थकान (नहीं दिखती)। आहाहा!

00:25:04.260 --> 00:25:08.460
कपड़ेवाले के बहुत ग्राहकी होती है न जब 
एकदम सीज़न बड़ा हो 

00:25:08.484 --> 00:25:13.036
तब एक बज जाये, दो बज जाये,
तीन बज जायें, भूख ही नहीं लगती उसको। 

00:25:13.060 --> 00:25:16.781
वहाँ उसके बच्चे आयें, पापा पापा घड़ी में 
दो बज गये हैं, भोजन के लिये आओ। 

00:25:16.805 --> 00:25:22.196
आज मुझे भूख नहीं लगी है।
क्योंकि वो पैसा आ रहा होता है न? आहाहा!

00:25:22.220 --> 00:25:28.116
ऐसे ही भावलिंगी संत को... आनंद का भोजन करते हैं 
उसमें प्रमाद उड़ गया है उनको। 

00:25:28.140 --> 00:25:37.356
उनका प्रमाद उड़ गया है। नींद नहीं आती। 
नींद तो पाप है। नींद के परिणाम तो पाप हैं। 
आहाहा!

00:25:37.380 --> 00:25:45.676
उसमें उपयोग लब्धरूप हो जाता है। 
उपयोग व्यापाररूप नहीं रहता।  दोष होता है उसमें। 

00:25:45.700 --> 00:25:48.122
इसलिए साधक संत कहते हैं 

00:25:48.146 --> 00:25:55.436
कि भाई!
तेरे ज्ञान में ज्ञायक जानने में आता है। 
जाननहार जानने में आता है, जाननहार जानने में आता है। 

00:25:55.460 --> 00:25:58.978
एक बार छह महीने प्रेक्टिस तो कर! आहाहा!

00:25:59.002 --> 00:26:05.116
तो तुझे आत्मा का ज्ञान होगा और 
भव का अंत आयेगा। यहाँ ऐसा कहते हैं। 

00:26:05.140 --> 00:26:10.511
भले चाहे जितने 
पंचमहाव्रत निरतिचाररूप से पाले,

00:26:10.535 --> 00:26:17.956
दोष आता है। अनाचार नहीं, अतिचार।
दोष आने पर प्रायश्चित लेता है, हों! 

00:26:17.980 --> 00:26:22.596
गुरु कहें तीन उपवास। प्रमाण वचन! आहाहा! 

00:26:22.620 --> 00:26:28.516
(गुरु कहें) खड़े रहो चौबीस घंटे!
तो खड़ा रहे। बैठे नहीं, खड़ा ही रहे। 

00:26:28.540 --> 00:26:33.756
ऐसी तो जिसकी बाह्य क्रिया 
कर्ताबुद्धिपूर्वक की, कर्ताबुद्धि(पूर्वक की)। 

00:26:33.780 --> 00:26:38.396
सहजदशा नहीं है द्रव्यलिंगी की। 
भावलिंगी की सभी सहजदशा होती है। 

00:26:38.420 --> 00:26:44.356
ऐसा-ऐसा अनंतबार इसने किया। 
नवमें ग्रैवेयक तक भी गया। 

00:26:44.380 --> 00:26:54.916
<b>"बहु पुण्य पुंज प्रसंग से शुभ देह 
मानव का मिला। तो भी अरे! भवचक्र का 
फेरा न एक कभी टला।"</b>आहाहा!

00:26:54.940 --> 00:27:04.836
<b>'श्रुतकेवली जैसा हो तथापि वह ज्ञानमय भाव के 
अभाव के कारण...,'</b>अस्ति-नास्ति अनेकांत किया। 

00:27:04.860 --> 00:27:12.916
अज्ञान का सद्भाव और ज्ञान का अभाव।
इस तरह से भी ऐसा और उस तरह से भी ऐसा।  

00:27:12.940 --> 00:27:18.756
इसप्रकार अज्ञान का सद्भाव है और ज्ञान का 
उसको अभाव है, इसलिए अज्ञानी है। 

00:27:18.780 --> 00:27:26.316
<b>आत्मा को नहीं जानता... </b> लेकिन शास्त्र को जानता है। 
नवतत्व को जानता है। छह द्रव्य को जानता है। 

00:27:26.340 --> 00:27:31.036
चौदह गुणस्थान को जानता है। चौदह मार्गणा 
स्थान को जानता है। आठ कर्म को जानता है। 

00:27:31.060 --> 00:27:36.116
उत्तर प्रकृति, एक सौ अड़तालीस कर्म की प्रकृति,
इसप्रकार मौखिक रहती हैं हों! फटाफट बोल जाये।

00:27:36.140 --> 00:27:42.956
ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय,
आयु, नाम, गोत्र सब (बोल) जाये। एक-एक के भेद  
ऐसे फटाफट बोल जाये। 

00:27:42.980 --> 00:27:49.676
दूसरा तो ग्रहण भी नही कर पाता इतने में तो ये पूरा कर देता है। 
इतनी तेजी से ... धारणा से। आहाहा!

00:27:49.700 --> 00:28:01.396
तूने कर्म को जाना, आठ कर्म को, लेकिन आठ कर्म से 
भिन्न आत्मा है, उसको जाना नहीं। 
इसलिए अज्ञान रह गया। 

00:28:01.420 --> 00:28:08.676
श्रुतकेवली जैसा भले हो। <b> आत्मा को नहीं जानता 
और जो आत्मा को नहीं जानता...</b>

00:28:08.700 --> 00:28:19.436
अपने शुद्धात्मा को जो नहीं जानता...,
<b>और जो आत्मा को नहीं जानता  
वह अनात्मा को भी नहीं जानता...</b>

00:28:19.460 --> 00:28:26.876
वह राग अनात्मा है, देह अनात्मा है, वह मेरे से 
भिन्न है, इसप्रकार उसे पररूप नहीं जानता। 

00:28:26.900 --> 00:28:32.636
जो आत्मा को स्वपने नही जानता, 
वह देहादि को पररूप भी नहीं जानता।

00:28:32.660 --> 00:28:39.196
देहादि को स्वपने जानता है। परपने कब जाने?
कि जब स्वपने कोई वस्तु हाथ में आई हो तो!

00:28:39.220 --> 00:28:45.756
स्वपने आत्मा जानने में आये, जब(ऐसा माने) कि 
मैं तो जाननहार वह मैं हूँ। 

00:28:45.780 --> 00:28:53.316
इसप्रकार दृष्टि में द्रव्य में आया आत्मा, तब 
रागादि देहादि कर्म वो मैं नहीं,
मेरी वस्तु नहीं। बाहर की वस्तु है। 

00:28:53.340 --> 00:29:01.056
आत्मा को जाने बिना वह वास्तव में पर को भी 
सम्यक प्रकार से जानता नहीं है।  
भाषा (शब्दों में) बोलता है कि पर है। 

00:29:01.080 --> 00:29:10.516
भाषा। आहाहा! वाचाल है वह। 
आत्मा को नहीं जानता वह पर को भी 
पररूप नहीं जानता। पर को स्वपने जानता है। 

00:29:10.540 --> 00:29:16.476
लेकिन स्व को स्वपने जाने, तब पर को परपने जाने। 
भेदज्ञान हो गया।

00:29:16.500 --> 00:29:28.836
एक बार मुंबई में ऐसी घटना बनी। एक भाई 
बाहर के गाँव से आते थे। एड्रेस उनके पास था। 

00:29:28.860 --> 00:29:36.796
वे पहली बार मुंबई आये थे देश(गाँव) में से। उसमें 
बोरीबंदर उतरे। उतरकर चार-पाँच चक्कर लगाए। 

00:29:36.820 --> 00:29:42.756
एक भाई मिले, कहा कि "भाई मुझे इस फलाने 
ठिकाने पर जाना है"। "हाँ, मैंने देखा है।

00:29:42.780 --> 00:29:47.876
चलो मेरे साथ।" समझ गये?
चलकर यह भाई उसे ले गये। 

00:29:47.890 --> 00:29:52.116
वह भाई सुंदर रूपवाला और कपड़े तो ऐसे
इस्त्री टाइट.., साहूकार दिखता था।

00:29:52.140 --> 00:29:58.636
मील, दो मील, तीन मील हुये, फिर 
पूछा, "भाई, तुम कहाँ रहते हो?" 

00:29:58.660 --> 00:30:01.836
"यह तो मुझे खबर नहीं है।" ओहो!

00:30:01.860 --> 00:30:07.076
तुझे तेरे घर की खबर नहीं है तो इस 
एड्रैस को तो तू कहाँ से बता सकेगा?

00:30:07.100 --> 00:30:14.036
तो उसका साथ छोड़ दिया और टेक्सी 
करके घर पहुँच गया। 

00:30:14.060 --> 00:30:20.996
इसप्रकार जो आत्मा को नहीं जानता, वह पुद्गल को भी 
नहीं जानता। हम इस देह को अलग जानते हैं। 

00:30:21.020 --> 00:30:27.476
इस अलमारी को भिन्न जानते हैं। ऐसा?
अलमारी को परपने जानता है? हाँ! "तो स्वपने कौन है?"

00:30:27.500 --> 00:30:34.196
"वह मुझे पता नहीं है।" तेरा स्व क्या? यह मकान 
मेरा है, कुटुंब मेरा...। समझ गये? 

00:30:34.220 --> 00:30:39.436
सभी वस्तु मेरी हैं, लेकिन तेरी वस्तु क्या?
तो (कहता है) यह मुझे खबर नहीं है।  

00:30:39.460 --> 00:30:49.876
उसका नाम पागल अज्ञानी कहने में आता है। 
बही-खाते में उधारी कितनी है वो बता देता है। लेकिन तू कौन है?

00:30:49.900 --> 00:30:53.876
उसके बिना काम नहीं चलेगा.... 

00:30:53.900 --> 00:31:01.276
<b>'अनंतकाल जीव भटका बिना भान भगवान'।
'जो स्वरूप समझे बिना पायो दुःख अनंत'।</b> 

00:31:01.300 --> 00:31:05.508
एक लाइन में। पार बिना (अपार) रखड़ता है। 

00:31:05.532 --> 00:31:13.356
जो अपने स्वरूप को 
नहीं जानता, वह संसार में भटकता है। आहाहा!

00:31:13.360 --> 00:31:19.756
<b>और जो आत्मा को नहीं जानता</b>, स्व को नहीं जानता,
अपने को नहीं जानता <b>वह अनात्मा को-</b>

00:31:19.780 --> 00:31:27.956
राग, कर्म, शरीर अनात्मा, सारा लोकलोक 
अनात्मा। पंचपरमेष्ठी भी ये आत्मा नहीं हैं, 

00:31:27.980 --> 00:31:32.956
इसलिए उसकी अपेक्षा से उनको अजीव भी 
कहने में आता है, पर। 

00:31:32.980 --> 00:31:45.476
<b>क्योंकि...</b> अब एक महासिद्धांत। आहाहा!
ये जगत के जीव, अनेकांत शब्द से ठगाये गये हैं। 

00:31:45.500 --> 00:31:53.636
शब्द से, भाव (समझने) से तो भान हो जाए। अनेकांत का 
रहस्य समझे तो तो सम्यग्दृष्टि हो जाये। 

00:31:53.660 --> 00:31:57.916
आत्मा का अनुभव हो जाये। लेकिन अनेकांत को 
भाव से समझते नहीं हैं।  

00:31:57.940 --> 00:32:05.996
अनेकांत का स्वरूप अनेकांत ही है। 
सम्पूर्ण जैनदर्शन अनेकांत स्वरूप से रहा हुआ है। 

00:32:06.010 --> 00:32:10.396
पदार्थ का स्वरूप भी अनेकांतिक है। 
लेकिन अनेकांत के दो प्रकार हैं। 

00:32:10.420 --> 00:32:19.716
एक अनेकांत तो अनुभव होने के पश्चात् अनंत गुण,
अनंत पर्याय और अनंत अपेक्षित धर्म-

00:32:19.740 --> 00:32:27.116
ऐसे सम्पूर्ण ज्ञेय को स्वयं जानता है युगपद्। 
सर्व को जाने, उसे प्रमाणज्ञान कहते हैं।  

00:32:27.140 --> 00:32:34.556
वह अनुभव के बाद प्रगट होता है। ऐसा अनेकांत। 
वह अनेकांत स्वज्ञेयरूप है। 

00:32:34.580 --> 00:32:41.116
प्रमाणज्ञान से जानने में आता है सब। वह प्रमाणज्ञान। 
लेकिन प्रमाणज्ञान कैसे प्रगट होता है?

00:32:41.140 --> 00:32:47.836
वह अनेकांत से प्रगट होता है। वह अनेकांत अर्थात् क्या?
इसमें लिखा हुआ है, देखो। 

00:32:47.860 --> 00:32:54.636
<b>'स्वरूप से सत्ता और पररूप से असत्ता-
इन दोनों के द्वारा एक वस्तु का निश्चय होता है;'</b> 

00:32:54.660 --> 00:33:00.876
महा सिद्धांत है अनेकांत। 
स्वपने है और परपने नहीं है। 

00:33:00.900 --> 00:33:12.156
अस्ति-नास्ति अनेकांत। यह अस्ति और नास्ति। 
आत्मा ज्ञायकपने है और रागपने नहीं है। 

00:33:12.180 --> 00:33:17.956
शुद्ध है और अशुद्ध नहीं है।  
नित्य है और अनित्य नहीं है। 

00:33:17.980 --> 00:33:24.916
एक है और अनेक नहीं है। 
इसप्रकार अंदर ही अंदर में एक, आहाहा!

00:33:24.940 --> 00:33:33.356
अनेकांत भेदज्ञानपरक है। शब्द! अनेकांत 
अस्ति-नास्ति, स्वपने है और परपने नहीं। 

00:33:33.380 --> 00:33:40.316
अब उसके दो प्रकार हैं। 
एक ज्ञान-प्रधान अनेकांत और 
एक दृष्टि-प्रधान अनेकांत। 

00:33:40.340 --> 00:33:46.316
उसे शास्त्रीय भाषा में प्रमाण सप्तभंगी और 
नय सप्तभंगी (कहते हैं)। हमें उसकी जरूरत नहीं है। 

00:33:46.340 --> 00:33:51.236
ऐसे शब्द की कोई जरूरत नहीं है। भाव का काम है। 
दो प्रकार हैं अनेकांत के। 

00:33:51.260 --> 00:33:57.196
इस अनेकांत के दो प्रकार में, एक समयसार में है 
और एक प्रवचनसार (में)। 

00:33:57.220 --> 00:34:05.716
प्रवचनसार और समयसार। एक प्रवचनसार का 
अनेकांत और एक समयसार का अनेकांत। 

00:34:05.740 --> 00:34:09.396
प्रवचनसार के अनेकांत में क्या कहते हैं?

00:34:09.420 --> 00:34:18.876
कि अपना द्रव्य, गुण, पर्याय (अपने) द्रव्य,
क्षेत्र, काल, भाव, वह स्व और लोकालोक पर। 

00:34:18.900 --> 00:34:25.676
अब ऐसा अस्ति-नास्ति अनेकांत जब जीव 
जानता है, तब पर से बिल्कुल भिन्न पड़ जाता है। 

00:34:25.700 --> 00:34:33.156
फिर यह महान मेरा और लड़का मेरा और देह मेरी- 
ऐसा रहता नहीं। राग मेरा- (यह) रह जाता है। 

00:34:33.180 --> 00:34:42.556
राग मेरा। आहाहा! राग मेरा, सुख मेरा- 
यह (श्रद्धान) रह जाता है। यह प्रमाण का ज्ञान-प्रधान अनेकांत (है)। 

00:34:42.580 --> 00:34:46.436
दो द्रव्यों की भिन्नता बतानेवाला 
अनेकांत प्रवचनसार में है। 

00:34:46.460 --> 00:34:53.636
कि परद्रव्य के साथ मेरा कुछ लेना-देना नहीं है। 
मेरे द्रव्य, गुण और पर्याय मेरे में हैं। 

00:34:53.660 --> 00:34:58.556
मैं अकेला संसार में भटकता हूँ और 
मैं अकेला मोक्ष में जाता हूँ। 

00:34:58.580 --> 00:35:04.156
राग करूँ तो बंधूँ और 
वीतराग भाव आये तो छूटूँ।  

00:35:04.180 --> 00:35:08.916
मात्र अंदर ही अंदर में सब 
पूरा द्रव्य, गुण, पर्याय, सब अंदर में।  

00:35:08.940 --> 00:35:18.196
उसे दो द्रव्य की भिन्नता करनेवाला अनेकांत। 
स्वद्रव्यपने है और परद्रव्यपने नहीं है। 

00:35:18.220 --> 00:35:22.236
इसप्रकार स्वरूप से सत्ता और पररूप से असत्ता। 

00:35:22.260 --> 00:35:27.676
ये दो ऊँगली हैं न? दो। दो ऊँगली हैं। 
अब इन दो ऊँगली में,

00:35:27.700 --> 00:35:31.676
हमें यह ऊँगली नक्की करनी है 
तो यह ऊँगली किस तरह से नक्की हो?

00:35:31.700 --> 00:35:36.036
इस ऊँगली में इसका अभाव। 
इस अस्ति में इसकी नास्ति। 

00:35:36.060 --> 00:35:40.796
इसकी अस्ति में इसकी नास्ति, यह ऊँगली है। 

00:35:40.820 --> 00:35:45.756
यह ऊँगली मेरी दुःखती है साहब!
कौनसी ऊँगली दुःखती है? इसका ऑपरेशन करना है। 

00:35:45.780 --> 00:35:51.436
क्योंकि इसमें इसका अभाव है। दुःखती है यह। 
इसका (दूसरी ऊँगली का) ऑपरेशन मत करना। 

00:35:51.460 --> 00:35:58.596
इसका करना। समझ गये? एक में दूसरे की नास्ति, 
इसको अस्ति-नास्ति अनेकांत कहने में आता है। 

00:35:58.620 --> 00:36:04.596
यह ज्ञान-प्रधान अनेकांत है। 
पर से भिन्न कर देता है। 

00:36:04.620 --> 00:36:10.516
पर से तो ऐसा भिन्न करता है कि 
उसका मिथ्यात्व गलने लगता है। 

00:36:10.540 --> 00:36:14.916
टलता नहीं है अभी। वह समयसार के 
अनेकांत में आता है तब टलता है। 

00:36:14.940 --> 00:36:18.876
प्रवचनसार के अनेकांत में पर से भिन्न पड़ता है। 

00:36:18.900 --> 00:36:27.476
फिर अंदर में आता है। समयसार लिखते हैं 
जब, आचार्य भगवान 

00:36:27.500 --> 00:36:33.916
कहते हैं कि मैंने पर से भिन्न करनेवाले अस्ति-नास्ति 
अनेकांत की बात तो प्रवचनसार में की है। 

00:36:33.940 --> 00:36:38.996
लेकिन अब एक मुझे अस्ति-नास्ति अनेकांत 
अंदर की बात करनी है। 

00:36:39.020 --> 00:36:47.396
तू अंदर में तो आया। प्रमाण के बाहर भटकता था, 
उसके बदले प्रमाण में तो, वर्तुल (परिधि) में तो आया। 

00:36:47.420 --> 00:36:53.876
तेरे द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव में आया। 
लेकिन उसमें कुछ साध्य की सिद्धि नहीं है। 

00:36:53.900 --> 00:36:55.756
तब क्या करना? अब?

00:36:55.780 --> 00:37:01.236
तब शुरूआत में कहते हैं 
<b>'मैं एकत्व विभक्त आत्मा की बात कहूँगा'। </b> 

00:37:01.260 --> 00:37:07.876
स्व से एकपना और पर से भिन्न, ऐसी बात मैं कहूँगा। 
अंदर में अस्ति-नास्ति अनेकांत। 

00:37:07.900 --> 00:37:13.436
देखो! अनेकांत द्वारा भी एक सम्यक् आत्मा की 
प्राप्ति होती है। 

00:37:13.460 --> 00:37:15.516
शुद्धात्मा की प्राप्ति होती है। 

00:37:15.540 --> 00:37:22.876
<b>अनेकांतिक ज्ञान भी सम्यक् एकांत 
ऐसे निजपद की प्राप्ति के सिवा  
अन्य हेतु से उपकारी नहीं है'।</b> 

00:37:22.900 --> 00:37:26.956
अब अंदर में आता है तब शिष्य पूछता है। 

00:37:26.980 --> 00:37:32.116
कि आप कहते हो कि आत्मा को मैं 
ऐसा बताऊँगा एकत्व-विभक्त। 

00:37:32.140 --> 00:37:38.796
अनंतगुणों से एकपना और अनंत 
पर्यायों से भिन्नपना, वह स्वरूप मुझे समझाओ। 

00:37:38.820 --> 00:37:47.476
तब आचार्य भगवान फरमाते हैं कि यह ज्ञायक 
भाव है, उसमें प्रमत्त-अप्रमत्त की नास्ति है। 

00:37:47.500 --> 00:37:49.596
इसकी (ज्ञायक) अस्ति में, उसकी नास्ति। 

00:37:49.620 --> 00:37:58.036
ज्ञायक में ज्ञायक भी है और राग भी है 
तो तो एकांत हो गया। अनेकांत नहीं हुआ। 

00:37:58.060 --> 00:38:02.236
अनेकांत दो भाव को और 
दो द्रव्य को भिन्न करता है। 

00:38:02.260 --> 00:38:06.596
प्रवचनसार का अनेकांत 
दो द्रव्यों को भिन्न करता है 

00:38:06.620 --> 00:38:13.516
और समयसार का अनेकांत 
स्वभाव और विभाव को भिन्न करता है। 

00:38:13.540 --> 00:38:17.196
प्रमत्त-अप्रमत्त मेरे में नहीं हैं। नास्ति है। 

00:38:17.220 --> 00:38:26.436
अर्थात् पर्याय की अस्ति, लेकिन मेरे में नास्ति, ऐसी 
मेरी अस्ति। ऐसा अनुभव, उसका नाम मस्ती है। 

00:38:26.460 --> 00:38:32.436
इस समयसार में द्रव्य और 
पर्याय के भेदज्ञान की बात चलती है। 

00:38:32.460 --> 00:38:37.476
प्रवचनसार में दो द्रव्यों की भिन्नता बताते हैं। 
यहाँ पर ऐसा कहते हैं। 

00:38:37.500 --> 00:38:46.716
'<b>स्वरूप से सत्ता</b>' स्वपने है आत्मा और रागादिपने 
(नहीं है)। जीव, जीवपने है और अजीवपने नहीं है।  

00:38:46.740 --> 00:38:51.396
अजीव की नास्ति। छः द्रव्य की नास्ति। 
देव-शास्त्र-गुरू की नास्ति। 

00:38:51.420 --> 00:38:55.956
नवतत्व की भी नास्ति। 
पुण्य-पाप की भी नास्ति। 

00:38:55.980 --> 00:39:07.276
न-थी। नथी अर्थात् नास्ति । न-थती। न.. -नथी
है न? न-थी, न-थी न-थी। न अस्ति, नास्ति। 

00:39:07.300 --> 00:39:14.596
मेरे में वो है नहीं। तो मेरे में जो नहीं (है), 
उसे मैं कैसे कर सकता हूँ?

00:39:14.620 --> 00:39:21.516
राग तो मेरे में नास्तिपने है 
तो मैं राग को कैसे कर सकता हूँ प्रभु?

00:39:21.540 --> 00:39:25.636
कि तू उसका कर्ता नहीं है क्योंकि 
तेरे में उसका अभाव है। 

00:39:25.660 --> 00:39:32.236
जिसका जिसमें अभाव होता है, उसका आत्मा 
कर्ता नहीं बन सकता। ठीक साहेब!

00:39:32.260 --> 00:39:35.196
इतना तो समझ में आया कि राग की नास्ति है। 

00:39:35.220 --> 00:39:41.676
राग का मैं कर्ता नहीं हूँ। लेकिन दुःख होता है,
वो तो मैं वेदन करता हूँ न?

00:39:41.700 --> 00:39:49.436
सुन! आत्मा सुखमय है और दुःखमय नहीं है। 
दुःख की तेरे में नास्ति। (कब?) 

00:39:49.460 --> 00:39:54.756
कि जब दुःख होता है तब। जब दुःख 
शिथिल होता है, तब की बात नहीं है यह। 

00:39:54.780 --> 00:40:02.036
यह भेदज्ञान की बात है। 
यह जहाँ-तहाँ मिल जाये ऐसा नहीं है। 

00:40:02.060 --> 00:40:10.436
हमारे समधी के समधी हैं। समझ गये?

00:40:10.460 --> 00:40:15.476
आहाहा! अरे! यह तो सर्वज्ञ भगवान 
के अलावा यह बात कहीं (भी नहीं है)। 

00:40:15.500 --> 00:40:20.236
कहीं मार्ग नहीं है। सब गोते खाते हैं। 
व्यर्थ ही भटकते हैं संसार में। आहाहा! 

00:40:20.320 --> 00:40:25.156
अस्ति-नास्ति अनेकांत। तुम 
अनेकांतवादी हो? हाँ! हम अनेकांतवादी हैं। 

00:40:25.180 --> 00:40:30.036
सर्वज्ञ भगवान का वचन अनेकांतमय है। 
अनेकांत अर्थात् क्या?

00:40:30.060 --> 00:40:35.156
आत्मा आत्मापने है और रागपने भी है 
और देहपने है, ये अनेकांत है? 

00:40:35.180 --> 00:40:43.556
नहीं। यह अनेकांत नहीं है। यह तो खिचड़ा 
किया है तूने! गेहूँ और कंकड़ को भिन्न नहीं किया।  

00:40:43.580 --> 00:40:50.836
गेहूँ में कंकड़ की नास्ति है। गेहूँ में 
कंकड़ की नास्ति, तब गेहूँ की अस्ति है। 

00:40:50.860 --> 00:40:58.956
अस्ति सिद्ध करने के लिये नास्ति का उपयोग 
करोगे, तब अस्ति हाथ में आयेगी। 

00:40:58.980 --> 00:41:04.036
केवल ज्ञायक हूँ, ज्ञायक हूँ,
ज्ञायक हूँ, नहीं हाथ में आएगा। 

00:41:04.060 --> 00:41:09.836
कि ज्ञायक तो हूँ लेकिन मेरे में 
पुण्य-पाप की नास्ति है। 

00:41:09.860 --> 00:41:14.036
अब तेरी जिस आत्मा में शुभाशुभ भाव नहीं हैं,

00:41:14.060 --> 00:41:19.436
और उसका उपदेश देते हैं कि शुभभाव तो 
करना चाहिये, और व्यवहार करते-करते (निश्चय)) होता है, 

00:41:19.460 --> 00:41:22.676
नहीं तो स्वच्छंदी (हो जायेगा)। 
कुछ खबर नहीं है!

00:41:22.700 --> 00:41:29.436
अनेकांत का हथियार वह जानता नहीं है। 
दो प्रकार के अनेकांत हैं। आहाहा!

00:41:29.460 --> 00:41:34.596
एक, एक द्रव्य से दूसरे द्रव्य को भिन्न करता है। 
मिथ्यात्व गलने लगता है, मिथ्यात्व (गलने लगे)। 

00:41:34.620 --> 00:41:37.956
दो द्रव्य की एकता थी और देह और  
आत्मा को एक मानता था। अरे!

00:41:37.980 --> 00:41:41.876
देह की मेरे में नास्ति है। 
अब देह की नास्ति है,

00:41:41.900 --> 00:41:49.516
देह की नास्ति है, आहाहा! तो पुत्र की भी नास्ति 
और पुत्रवधू की (भी नास्ति)। 

00:41:49.540 --> 00:41:56.516
भले अस्पताल में हो, तो भी उसकी मेरे में 
नास्ति है। आहाहा! ऐसी मेरी अस्ति है। 

00:41:56.540 --> 00:42:03.396
तो परपदार्थ से उसे ममता 
घटने लगती है कि (यह) मेरा नहीं है। 

00:42:03.420 --> 00:42:07.719
मेरे में नहीं है इसलिए मेरी चीज (नहीं है)। आहाहा!

00:42:07.743 --> 00:42:13.036
इसप्रकार फिर अंदर में आता है कि 
ज्ञानमय हूँ और रागमय नहीं हूँ। 

00:42:13.060 --> 00:42:17.476
उसके लिये, भेदज्ञान के लिये अनेकांत का 
एक उदाहरण (द्रष्टांत) बहुत सुंदर देते हैं  

00:42:17.500 --> 00:42:23.836
आचार्य भगवान। आहाहा! अभी तो राग का 
कर्तृत्व भासित होता है तुझे प्रभु! आहाहा!

00:42:23.860 --> 00:42:30.036
वह जैनमत का उपदेश नहीं है। आहाहा!

00:42:30.060 --> 00:42:39.036
जैन के मत का उपदेश तो रागादि से आत्मा
भिन्न है और ज्ञान से आत्मा अभिन्न है। 

00:42:39.060 --> 00:42:41.836
उसके लिये उदाहरण देते हैं, अनेकांत के लिये। 

00:42:41.860 --> 00:42:52.036
कि एक अंधा था, जन्म से अंधा। तो घी का घड़ा,
घी का घड़ा, घी का घड़ा, कान से सुना करता था। 

00:42:52.060 --> 00:42:55.836
आँख तो थी ही नहीं। इसलिए घी का घड़ा 
कहें, वही सुनना पड़े न? 

00:42:55.860 --> 00:43:00.476
इसप्रकार अज्ञानी जो कहता है वह अज्ञानी सुनता है। 
आत्मा रागी है, आत्मा दुःख भोगता है। 

00:43:00.500 --> 00:43:04.516
और वे सुननेवाले अंधे और कहनेवाले भी अंधे! ऐसे। 

00:43:04.540 --> 00:43:08.716
दूसरे क्या करें नवीन जीव! 
व्यवहार का उपदेश दिया ही करते हैं। 

00:43:08.740 --> 00:43:14.116
पहले व्यवहार होता है। निश्चय तो बाद में धीरे-
धीरे आता है। हम गृहस्थ हैं। 

00:43:14.140 --> 00:43:16.956
पहले तो इतना करना (चाहिये)। आहाहा!

00:43:16.980 --> 00:43:20.636
(जो) आये उसे जानूँ वह व्यवहार है या  
(जो) आये उसे करूँ वह व्यवहार है?

00:43:20.660 --> 00:43:28.076
परिणाम आता है, उसे करूँ वह व्यवहार नहीं है। वह तो 
अज्ञान है। वह आता है, उससे भिन्न आत्मा है- 

00:43:28.100 --> 00:43:32.076
ऐसा जानना, उसे व्यवहार कहने में आता है। 
हमारे ऊपर एक आफत आयी।  

00:43:32.100 --> 00:43:36.236
बहुत वर्ष पहले मैं वाँचन करता था, राजकोट में। 
अब सप्ताह में तीन बार तो वाँचता हूँ। 

00:43:36.260 --> 00:43:39.556
पहले तो, मुंबई जाने से पहले तो रोज़ वहाँ 
वाँचता था। उसमें एक आफत आयी। 

00:43:39.580 --> 00:43:47.016
पढ़े-लिखे बड़े, समझ गये?                                              
डिग्रीवाले लोग, कितने ही।  

00:43:47.020 --> 00:43:50.916
लोग तो बहुत आवें न? भाई! आप निश्चय की 
बात तो बहुत अच्छी करते हो।  

00:43:51.060 --> 00:43:58.356
भाई! आप निश्चय की बात तो (बहुत अच्छी करते हो)। 
लेकिन यदि थोड़ी आप यह व्यवहार की बात करोगे न  

00:43:58.420 --> 00:44:06.676
तो सोने में सुगंध मिल जायेगी। मैंने कहा 
जरूर! कल से मैं व्यवहार की बात करूँगा। 

00:44:06.700 --> 00:44:10.916
मन में मैंने कहा कि तुम राह देखते रहना। 
तुम (जो) माँगते हो वह व्यवहार आनेवाला नहीं है। 

00:44:10.940 --> 00:44:16.396
लेकिन उसको खड़ा रखा। खुश हो गया।  
दूसरे दिन जल्दी आ गये पाँच मिनिट। 

00:44:16.420 --> 00:44:18.676
आहाहा! आज तो व्यवहार की बात आनेवाली है। 

00:44:18.700 --> 00:44:28.916
(मैंने) कहा, भाई! शुभभाव आता है न, उससे आत्मा भिन्न है 
ऐसा जानना, उसका नाम व्यवहार है। 

00:44:28.940 --> 00:44:34.476
शुभभाव करना, उसका नाम व्यवहार नहीं है। 
वह तो अज्ञान दृढ़ हो गया तेरा।  

00:44:34.500 --> 00:44:44.196
ऐसा प्रश्न गुरुदेव से पूछा गया था। समझ गये?
करोड़पति व्यक्ति, विरानी, छोटूभाई विरानी। 

00:44:44.220 --> 00:44:51.396
शाम को सुनने के लिए आये, प्रश्नोत्तर। कहा, कि प्रभु!
साहेब! पाप तो हमें करना नहीं है। 

00:44:51.420 --> 00:44:57.876
क्योंकि पाप करेंगे तो नरक-निगोद में जाएँगे। आप कहते 
हो कि आत्मा का अनुभव करने से धर्म की शुरूआत होती है। 

00:44:57.900 --> 00:45:03.556
वहाँ तक पहुँचा जाता नहीं है। अब बीच में 
रहा पुण्य। तो पुण्य करना या नहीं करना? 

00:45:03.580 --> 00:45:12.236
पुण्य करना या पुण्य नहीं करना?
उसका ऐसा सुंदर जवाब दिया

00:45:12.260 --> 00:45:18.116
कि जब पुण्य के परिणाम आते हैं न शुभभाव,
तब उससे आत्मा भिन्न है, 

00:45:18.140 --> 00:45:25.236
ऐसा बारंबार विचार करना। पुण्य करना, 
ऐसा नहीं कहा और पुण्य नहीं करना, ऐसा भी नहीं कहा।  

00:45:25.260 --> 00:45:31.596
पुण्य करना छोड़ दे, ऐसा भी नहीं 
और पाप छोड़कर और पुण्य कर, ऐसा भी नहीं। 

00:45:31.620 --> 00:45:37.356
पुण्य के परिणाम... आर्य जीव है। 
दया, दान, करुणा, कोमलता के परिणाम आते हैं। 

00:45:37.380 --> 00:45:42.156
भगवान की भक्ति का भाव आवे,
शुभभाव आवे, यात्रा का भाव आवे। 

00:45:42.180 --> 00:45:47.316
आवे, आवे, आवे, आवे... तुम उनके ग्यारह 
भाग (प्रवचन रत्नाकर के) पढ़ना। 

00:45:47.340 --> 00:45:50.156
આવે આવે આવે આવે આવે એમ કહે છે.
आवे, आवे, आवे, आवे आवे, ऐसा कहेंगे। 

00:45:50.180 --> 00:45:57.196
करे, करे, करे, ऐसा कहीं तुम ढूँढने जाओगे, 
तो मिलेगा नहीं। और अज्ञानी के पास तो करे,

00:45:57.220 --> 00:46:03.436
करे, करे वह ही आता है। आवे, आवे- यह शब्द में भी (नहीं आता)। 
शब्द में नहीं आता तो भाव में तो कहाँ से आयेगा? 

00:46:03.460 --> 00:46:09.516
क्योंकि भाव में नहीं है अतः शब्द में भी 
आता नहीं। आहाहा! लाइन में ही फर्क है बड़ा। 

00:46:09.540 --> 00:46:13.956
यह आत्मा ज्ञाता है, कर्ता नहीं है। प्रभु!

00:46:13.980 --> 00:46:21.196
जिसप्रकार अरिहंत भगवान द्रव्य-गुण-पर्याय से 
जाननेवाले हैं, ऐसे मैं भी जाननेवाला हूँ। आहाहा!

00:46:21.220 --> 00:46:27.516
यह अनेकांत तो अमृत है कि 
आत्मा, आत्मापने है और परपने (नहीं है)। 

00:46:27.540 --> 00:46:33.356
आत्मा, आत्मापने है और रागपने नहीं है। 
<b>'स्वरूप से सत्ता और पररूप से असत्ता।'</b> 

00:46:33.380 --> 00:46:43.316
सिद्धांत-बोध। तीनोंकाल बदलता नहीं अनेकांत। 
आहाहा! स्याद्वाद। स्वपने है और परपने नहीं। 

00:46:43.340 --> 00:46:54.316
<b>'-इन दोनों के द्वारा एक वस्तु का निश्चय होता है;'</b>
आत्मा ज्ञानमय है, रागमय नहीं।  

00:46:54.340 --> 00:46:58.396
उसके लिये एक दृष्टांत दिया आचार्य भगवान ने 
(<b>समयसार गाथा ६७</b>),

00:46:58.420 --> 00:47:09.916
कि अंधा था और सुनता था घी का घड़ा। फिर उससे 
किसी ने कहा कि "घी का घड़ा", (इसको) कोष्ठक में डाला। 

00:47:09.940 --> 00:47:18.316
<b>'जो यह  "घी का घड़ा" है सो मिट्टीमय है,
घीमय नहीं'</b>। हें? घी का घड़ा कहते हो आप?

00:47:18.340 --> 00:47:24.796
कि हाँ। लेकिन "घी का घड़ा"। "घी का घड़ा है"
ऐसा हमने कहाँ कहा? "घी का घड़ा" ऐसा कहा था। 

00:47:24.820 --> 00:47:33.756
"है" वह तो जरा आगे लिखा है मैंने। 
"है" (उसके) साथ में जोड़ा नहीं है। तो तो तू जैसा 
मानता है, वैसा (ही) हो जायेगा। 

00:47:33.780 --> 00:47:38.876
तो तुझे आधार (बल) मिल जायेगा। जयंतीभाई!
समझ में आता है ये कुछ? समझ में आता है न इतना तो?

00:47:38.900 --> 00:47:43.276
आहाहा! "घी का घड़ा है" ऐसा नहीं 
लिखा ज्ञानी ने। <b>"घी का घड़ा" </b>

00:47:43.300 --> 00:47:52.876
इसप्रकार इन्टू कोमा कर दिया। <b> 'है सो 
मिट्टीमय है, घीमय नहीं'।</b>

00:47:52.900 --> 00:48:03.156
इसप्रकार। इसप्रकार, उसका उदाहरण।  
"आत्मा रागी"। "आत्मा रागी"। 

00:48:03.180 --> 00:48:11.356
"(आत्मा) रागी है" ऐसा नहीं। "आत्मा रागी"। 
फिर थोड़ी (जगह) छोड़कर, <b>है सो </b> क्योंकि आत्मा तो है न?

00:48:11.380 --> 00:48:19.636
आत्मा तो है न? <b>है सो ज्ञानमय है, 
रागमय नहीं।</b> आहाहा!

00:48:19.660 --> 00:48:27.596
यह क्या? कि कब? कि तीनों काल। कब?
कि तीनों काल आत्मा का स्वरूप है ऐसा। 

00:48:27.620 --> 00:48:34.596
फिर आगे, दुःख की बात कुछ कहो। 
क्योंकि दुःख की बात.., दुःख (प्रत्यक्ष) अनुभव में आता है। 

00:48:34.620 --> 00:48:39.836
आहाहा! अनुभव में आता है या जानने में आता है तुझे?
अनुभव में आता है तो मिथ्यादृष्टि है।  

00:48:39.860 --> 00:48:48.796
जानने में आता है, तो ज्ञानी। आहाहा! अब वो बात करते हैं। 
यह तो इसमें व्यवहार स्वरूप से 

00:48:48.820 --> 00:49:00.836
कि "दुःखी आत्मा"। "दुःखी आत्मा" है 
वह सुखमय है, दुःखमय नहीं है। कब?

00:49:00.860 --> 00:49:05.276
तीनोंकाल। अभी। अभी। समझ गये? 

00:49:05.300 --> 00:49:09.596
एकबार हम घूमने के लिये जाते थे। 
कल वह बात निकाली थी आपने। 

00:49:09.620 --> 00:49:13.516
सात-आठ वर्ष पहले ऐसी एक बात की थी। 
मैंने कहा, क्या बात की थी? 

00:49:13.540 --> 00:49:22.276
आपने ऐसा कहा था कि कल्याणभाई! तुमने भूतकाल में 
किसी दिन दुःख को भोगा नहीं है।  

00:49:22.300 --> 00:49:27.276
तुम तो सुखमय रहे हो भूतकाल में। 
अभी तुम सुखमय हो। 

00:49:27.300 --> 00:49:34.116
और भविष्य में भी सुखमय रहनेवाले हो। 
दो चार-पाँच भव भले हों कदाचित् लेकिन 
दुःखमय आत्मा होता नहीं। 

00:49:34.140 --> 00:49:40.156
यह तो भ्रांति हो गई है उसे दुःखमय होने की। 
वह तो ज्ञानमय और तीनोंकाल सुखमय है। 

00:49:40.180 --> 00:49:45.196
ऐसे सुखमय का अवलंबन लेने पर पर्याय के  
दुःख का नाश हो जायेगा। 

00:49:45.220 --> 00:49:50.556
पर्याय के दुःख में पर्याय का दुःख नहीं रहेगा। 
सुखमय आत्मा को एकबार देखो और 

00:49:50.580 --> 00:49:54.916
फिर देखो बाहर निकलकर। अरे! दुःख कहाँ गया?
दुःख अवस्तु हो गया। 

00:49:54.940 --> 00:50:00.076
सम्यग्दर्शन हुआ। मिथ्यात्व कहाँ गया?
अवस्तु हो गया। आहाहा!

00:50:00.100 --> 00:50:06.556
लेकिन उसे व्यवहार ऐसा गले पड़ा है  
कि जब आत्मा में दुःख होता है 

00:50:06.580 --> 00:50:13.356
तब उसका स्वीकार करते हैं, तो ज्ञान होता है।  
(ज्ञानी कहते हैं) कि उसका स्वीकार वह अज्ञान है, जा। 

00:50:13.380 --> 00:50:20.236
आत्मा सुखमय है, दुःखमय नहीं है। 
दुःख होता है तब उसकी नास्ति विचारना। 

00:50:20.260 --> 00:50:27.396
उसकी अस्ति नहीं विचारना। अस्ति विचारोगे  
तो आत्मा दुःखमय ही लगेगा। आहाहा! 

00:50:27.420 --> 00:50:35.876
नास्ति की तुम अस्ति में खतौनी करोगे, 
समझ में आया? नास्ति, जो तुम्हारे में नहीं है,

00:50:35.900 --> 00:50:41.156
उसको तुम अस्ति में स्थापित करोगे, तो 
मैं दुःखमय हूँ, ऐसा तुम्हें लगेगा। 

00:50:41.180 --> 00:50:47.796
वह तो भ्रांति है, अज्ञान है, मिथ्यात्व है। 
है सुखमय और भासित होता है दुःखमय। 

00:50:47.820 --> 00:50:51.685
अब आगे। कि प्रत्येक जीव को जानने में आता है ज्ञायक। 

00:50:51.709 --> 00:50:56.236
प्रत्येक जीव को (जानने में आता है ज्ञायक),
भव्य हो या अभव्य। 

00:50:56.260 --> 00:51:00.116
एकइन्द्रिय, दोइन्द्रिय सबको। 
जानने में आता है ज्ञायक। 

00:51:00.140 --> 00:51:05.396
स्वज्ञेय जानने में आता है और भासित होता है कि मुझे 
ये परद्रव्य जानने में आते हैं। यह भ्रांति है। 

00:51:05.420 --> 00:51:12.996
यह भ्रांति है। संसार है। यह सब समयसार में 
है हों! मेरे घर की बात नहीं कहता हूँ। 

00:51:13.020 --> 00:51:19.156
यह तो कुदरती कोई पैंतालीस वर्ष का योग! 
चौथा काल आ गया। आहाहा!

00:51:19.180 --> 00:51:26.916
रिएक्शन आया और यह बात शास्त्र में थी 
और उन पुरुष ने अनुभव करके जाहिर की है।  

00:51:26.940 --> 00:51:33.036
और ग्यारह भागों में (प्रवचन रत्नाकर में) 
और उनकी सभी टेपों में भरा हुआ है। आहाहा!

00:51:33.060 --> 00:51:41.556
<b>'स्वरूप से सत्ता और पररूप से असत्ता।'</b> 
तुम्हारा बंगला और उसके आजु-बाजु में दो बंगले हैं। 

00:51:41.580 --> 00:51:47.876
तो तुम्हारा बंगला यह है, यह सीमा  
तुम्हारी है, ऐसा कब सिद्ध होता है?

00:51:47.900 --> 00:51:52.036
ऐसा कब सिद्ध होता है? कि दूसरे बंगले की 
मेरे में (नास्ति है)। 

00:51:52.060 --> 00:51:55.276
कि तुम्हारा बंगला भी तुम्हारा 
और वह (दूसरा) बंगला भी तुम्हारा? 

00:51:55.300 --> 00:52:06.236
ऐसा नहीं होता। उसकी सीमा होती है तुम्हारी। कि दो सौ फुट या  
दो सौ गज वह मेरा। बाकी दूसरा मेरा नहीं है।   

00:52:06.260 --> 00:52:11.756
मेरे में नास्ति है। तब एक पदार्थ की 
सिद्धि होती है। व्यवहार में भी ऐसा है। 

00:52:11.780 --> 00:52:16.356
व्यवहार में भी (ऐसा है)। तो ही व्यवहार चले। 
नहीं तो व्यवहार न चले। 

00:52:16.380 --> 00:52:22.076
निश्चय में तो बात क्या करनी? आहाहा! 
मैं ज्ञानमय हूँ, रागमय नहीं। 

00:52:22.100 --> 00:52:29.996
राग की मेरे में नास्ति है। राग है अवश्य। 
देह है अवश्य। कर्म होते हैं अवश्य। 'है' की ना नहीं है। 

00:52:30.020 --> 00:52:35.416
लेकिन वे मेरे में नहीं-पने हैं। 
मेरे में वे हैं (नहीं)। 

00:52:35.440 --> 00:52:40.836
अस्ति-नास्ति अनेकांत,  
स्वपने है और परपने नहीं। 

00:52:40.860 --> 00:52:44.316
वहाँ भेदज्ञान होकर, मिथ्यात्व का अभाव होकर

00:52:44.340 --> 00:52:48.836
और आत्मभान होकर और अनुभव 
आत्मा का होता है, ऐसी अपूर्व बात है इसमें। 

00:52:48.860 --> 00:52:54.476
<b>'स्वरूप से सत्ता और पररूप से असत्ता'</b>
महासिद्धांत। ऐप्लाई करना, चारों तरफ से। 

00:52:54.500 --> 00:52:58.116
ऐप्लाई, तो समझ गये न?
सिद्धांत को चारों तरफ से।  

00:52:58.140 --> 00:53:04.140
दो और दो चार तो दो और दो चार। इसप्रकार  
<b>'स्वरूप से सत्ता और पररूप से असत्ता'। </b> 

00:53:04.160 --> 00:53:09.676
मैं आत्मापने भी हूँ और देहपने भी हूँ,
ऐसे अनेकांत होगा? आहाहा!

00:53:09.780 --> 00:53:17.036
वह तो एकांत किया। एकता करी है उसने। 
ममता की है। आहाहा!

00:53:17.060 --> 00:53:24.516
पैसा, लक्ष्मी, सोना, चाँदी है 
पर मेरेपने नहीं हैं।

00:53:24.540 --> 00:53:29.916
अस्तिपने मैं और वह नहीं। मेरे में वह नहीं।  
उसमें भले ही वह हो। 

00:53:29.940 --> 00:53:38.676
तो वह जो मेरे में नहीं है, नास्तिपने है,
उसको जानते-जानते अस्ति किस दिन जानने में आएगी?

00:53:38.700 --> 00:53:49.396
किसी काल जानने में नहीं आएगी। जो नहीं है, वह मेरे ज्ञान का 
ज्ञेय नहीं है। जो है, वह मेरे ज्ञान का ज्ञेय है। 

00:53:49.420 --> 00:53:56.116
अंदर उपयोग को आत्मा जब ज्ञेय बनाता है,
ज्ञेय बनता है, तब आत्मा का अनुभव होता है। 

00:53:56.140 --> 00:54:02.916
तब उस समय पर जानने में नहीं आता ।  
तब वास्तव में अस्ति-नास्ति अनेकांत का 
जन्म अनुभव के काल में, 

00:54:02.940 --> 00:54:07.740
अनुभव के काल में होता है। ऐसी अपूर्व बात 
समयसार निर्जरा अधिकार में है।   स्तुति। 