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00:01:43.960 --> 00:01:50.456
मुमुक्षु: सुबह स्व-परप्रकाशक के ऊपर..
पू. लालचंदभाई: हाँ, यह अच्छा कहा। ठीक याद किया।

00:01:50.480 --> 00:02:07.056
स्व-परप्रकाशक के विषय में, स्व-परप्रकाशक के
नाम पर वास्तव में एक बड़ी भ्रान्ति चलती है।

00:02:07.080 --> 00:02:20.376
स्व-परप्रकाशक तो अज्ञानी जीव की पर्याय में
भी एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय , तीन इन्द्रिय,

00:02:20.400 --> 00:02:26.336
चार इन्द्रिय, पंचेंद्रिय, संज्ञी,
असंज्ञी चारों गति के अज्ञानी प्राणिओं को भी

00:02:26.360 --> 00:02:30.616
जो ज्ञान की पर्याय प्रगट होती है
जिसको ज्ञप्ति कहा जाता है।

00:02:30.640 --> 00:02:38.950
ज्ञप्ति अर्थात् जानने की क्रिया जिसमें होती है।
राग में जानने की क्रिया नहीं है,
इसलिए राग तो अंधा है।

00:02:38.974 --> 00:02:48.736
स्व-परप्रकाशक उसमें है नहीं। लेकिन अज्ञानी को
जो ज्ञान प्रकट होता है, उस ज्ञान की पर्याय में

00:02:48.760 --> 00:02:59.016
ज्ञप्तिक्रिया में स्व-पर का
प्रतिभास होता है। ऐसी स्व-परप्रकाशक
क्रिया अज्ञानी को भी प्रकट होती है।

00:02:59.040 --> 00:03:07.736
इस स्व-परप्रकाशक को कोई सत्यार्थ
माने (तो) किसी को अनुभव नहीं होता।

00:03:07.760 --> 00:03:19.936
स्व-परप्रकाशक प्रमाण ज्ञान का विषय है। 
इस प्रमाणज्ञान में से उसे निश्चयनय निकालना चाहिए।

00:03:19.960 --> 00:03:31.336
कि वास्तव में स्व-पर का प्रतिभास होने पर भी मुझे
पर जानने में नहीं आता, मेरा शुद्धात्मा ही जानने में आता है।

00:03:31.360 --> 00:03:41.896
क्योंकि ज्ञान में आत्मा तन्मय होकर जानने में आता है,
और देहादि और परपदार्थों का प्रतिभास होता है

00:03:41.920 --> 00:03:47.496
लेकिन ज्ञान वहाँ जाता भी नहीं,
ज्ञेय ज्ञान में आते भी नहीं,

00:03:47.520 --> 00:03:53.496
और ज्ञेय ज्ञान में जानने में आयें तथापि
उन ज्ञेय के साथ ज्ञान तन्मय होता नहीं है। 

00:03:53.520 --> 00:03:58.736
जिसप्रकार यह (लकड़ी) पदार्थ जानने में आता है, जानने में आता है
अवश्य लेकिन ज्ञान इसमें तन्मय नहीं होता।

00:03:58.760 --> 00:04:06.256
इसलिए वास्तव में ज्ञान उसे जानता नहीं है किन्तु
ज्ञान तो आत्मा का होने से आत्मा को जानता है।

00:04:06.280 --> 00:04:12.136
जो जिसका होता है वह वही होता है।
आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान वह आत्मा ही है।

00:04:12.160 --> 00:04:24.496
ऐसा यदि वह ले तो अनंतकाल से जो नहीं प्रकट हुआ
ऐसी स्वप्रकाशक ज्ञान की पर्याय प्रकट होती है।

00:04:24.520 --> 00:04:30.496
उस स्वप्रकाशक लक्षण से आत्मा
लक्षित होता है, अनुभव में आता है।

00:04:30.520 --> 00:04:38.616
इसप्रकार इस शुद्धात्मा का अनुभव होने पर
उस निर्विकल्प ध्यान के काल में ही

00:04:38.640 --> 00:04:44.256
अभी उपयोग बाहर न आया हो ।
अंदर ही अंदर में सम्यग्दर्शन के काल में,

00:04:44.280 --> 00:04:49.616
स्वप्रकाशक में सम्यग्दर्शन,
ज्ञान, चारित्र के परिणाम प्रकट हुये

00:04:49.640 --> 00:04:54.176
उनका फल आनंद आता है
उस ही समय। समय एक ही है।

00:04:54.200 --> 00:05:00.256
अब, वह ज्ञान ज्ञान को भी जानता है और
प्रकट हुए आनंद को भी जानता है।

00:05:00.280 --> 00:05:08.896
अर्थात् स्वप्रकाशक पूर्वक स्व-परप्रकाशक
निश्चय से प्रकट होता है। यह निश्चय है।

00:05:08.920 --> 00:05:14.536
अब उसे अंदर ही अंदर में
स्व-परप्रकाशक क्यों कहा?

00:05:14.560 --> 00:05:20.927
पूरा जगत ऐसा मानता है कि आत्मा वह स्व
और लोकालोक वह पर, वह स्व-परप्रकाशक।

00:05:20.960 --> 00:05:25.896
समझ गये? वह अनुभवी का बाहर का
(अनुभव के) बाद का व्यवहार है।

00:05:25.920 --> 00:05:31.736
और अज्ञानी को स्व-परप्रकाशक की ज्ञप्ति है
वह तो अज्ञानमय ही है,

00:05:31.760 --> 00:05:39.536
उसमें सम्यग्ज्ञान है ही नहीं। उसमें से उसे उस
ज्ञान में से ज्ञायक को पकड़ने पर अनुभव होता है।

00:05:39.560 --> 00:05:45.136
उस ज्ञान की पर्याय को स्वप्रकाशक
उपयोग कहने में आता है।

00:05:45.160 --> 00:05:48.018
पूरा ही उपयोग अंदर में आये, निरवशेषरूप से,

00:05:48.042 --> 00:05:52.336
कुछ भी बाकी रखे बिना सम्पूर्ण
उपयोग अंदर में ढल जाए 

00:05:52.360 --> 00:05:57.456
तब शुद्धोपयोग दशा प्रकट होती है।
उसका नाम स्वप्रकाशक है।

00:05:57.480 --> 00:06:04.736
उस समय आत्मा की अनुभूति होती है, आनंद आता है।
तो उस ही समय ज्ञान आत्मा को जानता है

00:06:04.760 --> 00:06:10.776
अथवा ज्ञान ज्ञान को भी जानता है और प्रकट
हुआ जो आनंद वह भी उसके ज्ञान में जानने में आता है।

00:06:10.800 --> 00:06:17.456
उस प्रकट हुए आनंद के सन्मुख नहीं है ज्ञान।
ज्ञान तो आनंदमूर्ति के सन्मुख है।

00:06:17.480 --> 00:06:22.976
लेकिन उसमें एक स्व-परप्रकाशक
ऐसी शक्ति अंदर प्रकट होती है

00:06:23.000 --> 00:06:30.096
कि जिसमें आनंद भी जानने में आ जाता है। आनंद को
जानता नहीं है ज्ञान, लेकिन आनंद जानने में आ जाता है।

00:06:30.120 --> 00:06:36.056
उसका अंदर का स्व-परप्रकाशक प्रकट होता है
उसे निश्चय कहने में आता है।

00:06:36.080 --> 00:06:41.616
उसमें पर की अपेक्षा नहीं है,
मात्र अपना ही है इसलिए उसे निश्चय।

00:06:41.640 --> 00:06:48.553
एक द्रव्याश्रित है वह परिणाम। ज्ञान ज्ञान को भी
जानता है और उत्पन्न हुए आनंद को भी जानता है,

00:06:48.577 --> 00:06:52.296
प्रतीति को भी जानता है, स्थिरता को भी जानता है
सभी को ज्ञान जानता है।

00:06:52.320 --> 00:07:00.376
तो ज्ञान है वह स्व है और बाकी के अनंत
गुण अर्थात् पर्यायें वे सभी पर हैं। 

00:07:00.400 --> 00:07:05.616
ज्ञान की अपेक्षा से ज्ञान वह स्व
और आनंद वह पर

00:07:05.640 --> 00:07:13.296
ऐसा अंदर में स्व-परप्रकाशक अनुभव के
काल में निश्चय स्व-परप्रकाशक प्रकट होता है।

00:07:13.320 --> 00:07:19.176
वह नंबर दो कहा। स्वप्रकाशक पूर्वक
स्व-परप्रकाशक निश्चय

00:07:19.200 --> 00:07:23.056
उसमें पर की अपेक्षा बिलकुल नहीं है।
लोकालोक ज्ञात ही नहीं होते।

00:07:23.080 --> 00:07:31.096
उसे निश्चय स्व-परप्रकाशक कहने में आता है।
फिर सविकल्प दशा में साधक आता है

00:07:31.120 --> 00:07:37.416
तो व्यवहार जाना हुआ प्रयोजनवान है। जो कुछ
देहादि, देव, गुरु, शास्त्र, रागादि सब जानने में आते हैं 

00:07:37.440 --> 00:07:43.136
उसके ज्ञान में, तो वह स्व-परप्रकाशक
व्यवहार है। लेकिन वह व्यवहार कब कहलाता है

00:07:43.160 --> 00:07:49.176
कि स्व-परप्रकाशक निश्चय प्रकट हुआ हो तो।
और स्व-परप्रकाशक निश्चय कब प्रकट होता है

00:07:49.200 --> 00:07:57.816
कि स्वप्रकाशक हो तो। ऐसी अंदर की रमत है यह।
तीन रमत ज्ञानी को ये तीन भाव लागू पड़ते हैं।

00:07:57.840 --> 00:08:05.416
ज्ञानी को ऐसी तीन प्रक्रिया होती हैं।
आहाहा! और अज्ञानी को स्व-परप्रकाशक,

00:08:05.440 --> 00:08:11.536
स्व-पर का प्रतिभास होता है, वह तो अज्ञानमय
है, उसमें कहीं आत्मा का अनुभव नहीं है।

00:08:11.560 --> 00:08:16.856
वह तो उसकी ऐसी स्वच्छता थोड़ी रह
गई है कि स्व-पर का प्रतिभास होता है।

00:08:16.880 --> 00:08:22.496
भगवान भी जानने में आता है और परपदार्थ
भी उसमें प्रतिभासित होते हैं, ज्ञात होते हैं। 

00:08:22.520 --> 00:08:26.776
तो ऐसे स्व-परप्रकाशक की कोड़ी की
कीमत नहीं है, वह तो अभवि के भी है।

00:08:26.800 --> 00:08:32.536
बहन! ख्याल आया तुम्हें कुछ?
बहन का प्रश्न था स्व-परप्रकाशक का।

00:08:32.560 --> 00:08:38.856
ऐसे चार प्रकार हैं इसमें।
यह सब शास्त्र में है।

00:08:38.880 --> 00:08:52.416
एक नियमसार में जब केवलज्ञान का अधिकार
१५९-१६० गाथा शुरू की, शुद्धोपयोग अधिकार। 

00:08:52.440 --> 00:08:57.976
तुम्हारे चलता है न यहाँ? शुद्धोपयोग
अधिकार। नियमसार है? लाओ।

00:08:58.000 --> 00:09:23.496
नियमसार का शुद्धोपयोग अधिकार उसकी पहली गाथा
१५९ है। अर्थात् कि मोक्षमार्ग का फल मोक्ष। 

00:09:23.520 --> 00:09:29.576
मोक्षमार्ग जब प्रकट होता है उसका फल मोक्ष
अर्थात् केवलज्ञान प्रकट होता है। 

00:09:29.600 --> 00:09:38.256
अब केवलज्ञान का स्वरूप क्या है?

00:09:38.280 --> 00:09:43.976
कि केवली स्व-परप्रकाशक हैं, वे स्व और पर को
जानते हैं। ये प्रचलित बातें हैं सभी बहुत।

00:09:44.000 --> 00:09:51.536
लेकिन उसकी गहराई का रहस्य कोई जानता नहीं है।
कोई ही विरला जानता है, अनुभवी विरला जानता है।

00:09:51.560 --> 00:10:17.136
इस १५९ गाथा में आचार्य भगवान ऐसा
फरमाते हैं, मूल गाथा ऐसी है,

00:10:17.160 --> 00:10:28.776
<b>व्यवहार से प्रभु केवली सब जानते अरु देखते;</b>
<b>निश्चय नयात्मक द्वार से, निज आत्मा को प्रभु पेखते।</b>

00:10:28.800 --> 00:10:32.216
व्यवहारनय और निश्चयनय
दोनों अपेक्षा से बात करते हैं। 

00:10:32.240 --> 00:10:39.896
उसमें टीका, उसकी शुरुआत करते हुए टीका की पहली
लाइन, most important (सब से महत्व) है।

00:10:39.920 --> 00:10:55.474
<b>यहाँ, ज्ञानी को</b> अर्थात् केवली को <b>स्व-पर
स्वरूप का प्रकाशकपना</b> स्व-पर का प्रकाशकपना

00:10:55.498 --> 00:10:59.816
अर्थात् स्व-परप्रकाशक <b>कथंचित् कहा है </b>।
सर्वथा नहीं है।

00:10:59.840 --> 00:11:08.056
लोगों ने सर्वथा मान लिया है। कि आत्मा को
जानते हैं केवली और लोकालोक को जानते हैं।

00:11:08.080 --> 00:11:21.536
वह जो व्यवहार, वह जो व्यवहार उसे सर्वथा
मान लिया इसलिए उपयोग अंदर में जाता नहीं है।

00:11:21.560 --> 00:11:26.336
वह व्यवहार है। केवली
स्व-पर को जानते हैं वह व्यवहार है।

00:11:26.360 --> 00:11:33.936
ये टीका में है सब, हों! मैं अपने घर की
बात नहीं करता हूं। उसे व्यवहार क्यों कहा?

00:11:33.960 --> 00:11:40.856
कि आत्मा को जाने वह स्व और आत्मा के साथ
पर को मिलाया तो प्रमाणज्ञान हो गया।

00:11:40.880 --> 00:11:44.616
तो उसे स्व-परप्रकाशक व्यवहार कहा,
इस टीका में।

00:11:44.640 --> 00:11:50.860
अंदर के स्व-परप्रकाशक में पर को
मिलाया ही नहीं। अतः निश्चय हो गया। 

00:11:50.884 --> 00:11:56.536
ज्ञान स्व और आनंद पर,
वह आनंद आत्मा ही है।

00:11:56.560 --> 00:12:01.376
आनंद कोई पर नहीं है।
पर तो उसे अपेक्षा से कहा है। 

00:12:01.400 --> 00:12:07.176
ज्ञान को जब स्व कहते हैं तो ज्ञान की अपेक्षा से
आनंद आदि श्रद्धा को पर कहने में आता है।

00:12:07.200 --> 00:12:12.376
लेकिन स्वआश्रित है। एक द्रव्याश्रित
है स्व-परप्रकाशक। 

00:12:12.400 --> 00:12:18.016
पूर्वकथित स्व-परप्रकाशक दो
द्रव्याश्रित हो गया। आहाहा!

00:12:18.040 --> 00:12:24.936
उसे स्व-परप्रकाशक निश्चय कहा जाता है 
जिसमें पर की अपेक्षा न आये।

00:12:24.960 --> 00:12:32.136
ज्ञान ज्ञान को जानता है और आनंद को भी जानता है।
अनुभव के काल में अतीन्द्रिय आनंद आता है

00:12:32.160 --> 00:12:36.696
उसे यदि साधक न जाने तो
सम्यग्दर्शन हुआ ऐसा पता ही न चले।

00:12:36.720 --> 00:12:43.016
मुंबई में कहा एक भाई ने, रोनकवाले हैं
बड़े, ७० लाख का बंगला है, जानते होंगे तुम।

00:12:43.040 --> 00:12:48.296
गुरुदेव वहाँ उतरे थे। रोनकवाला 
रमणीकभाई ने पूछा, समझ गये?

00:12:48.320 --> 00:12:52.136
प्रवचन के बीच में, कि सम्यग्दर्शन
हुआ उसका प्रूफ (प्रमाण) क्या?

00:12:52.160 --> 00:13:00.576
कि आनंद आता है अतीन्द्रिय, वह उसका प्रूफ है।
उसका लक्षण है, आनंद आता है। 

00:13:00.600 --> 00:13:04.896
क्योंकि एक कषाय टल गई।
चार कषायें दूसरी गयी चारित्र की।

00:13:04.920 --> 00:13:10.376
तो कषाय के अभाव से वीतरागता प्रकट हुई।
तो वीतरागता का फल तो आनंद ही आता है न?

00:13:10.400 --> 00:13:14.496
दुःख होता है कहीं? राग का फल दुःख
और वीतरागभाव का फल सुख।

00:13:14.520 --> 00:13:21.776
तो वह आनंद आता है उसे पता चलता है। बाहर
निकलता है न तब प्रतीति में आ गया,

00:13:21.800 --> 00:13:26.216
भव का अंत आ गया।
वह निश्चय से स्व-परप्रकाशक।

00:13:26.240 --> 00:13:31.456
यह बात समाज में चलती नहीं है बहुत।
गुरुदेव कह गये हैं लेकिन चलती नहीं है।

00:13:31.480 --> 00:13:34.776
वो वाला स्व-परप्रकाशक चलता है।
आहाहा! वही पकड़ लिया।

00:13:34.800 --> 00:13:46.016
वोराभाई का नाला, कहावत है हमारे यहाँ, समझ गये?
लेकिन स्व-परप्रकाशक कथंचित् है, सर्वथा नहीं।

00:13:46.040 --> 00:13:52.296
कथंचित् एक शब्द most important है।
कथंचित् अर्थात् किसी एक अपेक्षा से।

00:13:52.320 --> 00:14:00.056
निश्चयनय से स्व-परप्रकाशक और व्यवहारनय से
भी स्व-परप्रकाशक। ऐसा इसमें है।

00:14:00.080 --> 00:14:05.856
तीन प्रकार ज्ञानी के होते हैं, एक प्रकार
अज्ञानी के (होता है)। सभी को स्व-पर उसमें जानने में आते हैं

00:14:05.880 --> 00:14:10.456
स्वच्छता में ज्ञान की पर्याय में जानने में आते हैं।
भले अज्ञानभाव हो , कुछ नहीं।

00:14:10.480 --> 00:14:17.216
लेकिन उसमें से भेदज्ञान करना चाहिए।
कि जाननहार जानने में आता है, वास्तव में पर जानने में नहीं आता।

00:14:17.240 --> 00:14:20.536
तब पर तरफ से उपयोग हटकर अंदर में आता है। 

00:14:20.560 --> 00:14:24.376
तो वह उपयोग स्वप्रकाशक है। 
उपादेयरूप से ज्ञायक को जानता है।

00:14:24.400 --> 00:14:31.896
उपादेयपने ज्ञायक को जानता है
वह निश्चय स्वप्रकाशक हुआ। 

00:14:31.920 --> 00:14:37.576
और उसका जो सामर्थ्य प्रकट हुआ
स्वपर का, तो आनंद को भी जानता है।

00:14:37.600 --> 00:14:41.976
यह अंदर का सामर्थ्य है।
वह बाहर का सामर्थ्य है। आहाहा!

00:14:42.000 --> 00:14:47.256
ऐसी स्व-परप्रकाशक की कथा बहुत अच्छी इसमें है। 

00:14:47.280 --> 00:14:54.296
कथंचित्, इतने शास्त्रों में, दिगंबर शास्त्रों में
कहीं भी कथंचित् स्व-परप्रकाशक नहीं लिखा है।

00:14:54.320 --> 00:15:00.336
स्व-परप्रकाशक की बात स्थान-स्थान पर आती है,
लेकिन आगे कथंचित् विशेषण लगाया,

00:15:00.360 --> 00:15:15.576
वह इन एक आचार्य ने ही लगाया है। भावी
तीर्थंकर हैं ये, स्वयं लिख गये हैं।

00:15:15.600 --> 00:15:21.536
स्वप्रकाशक पूर्वक निश्चय से,
स्व-परप्रकाशक निश्चय

00:15:21.560 --> 00:15:27.976
और फिर व्यवहार स्व-परप्रकाशक।
ऐसे तीन प्रकार ज्ञानियों के होते हैं।

00:15:28.000 --> 00:15:31.376
केवली के होते हैं और फिर श्रुतकेवली के
भी ये ही जाति होती है। 

00:15:31.400 --> 00:15:37.656
मुमुक्षु: तीन प्रकार एक ही समय में?
पू. लालचंदभाई: हाँ, एक ही समय में दो।
एक ही समय में दो होते हैं।

00:15:37.680 --> 00:15:44.656
लेकिन जो लोकालोक उसमें प्रतिभासित होता है
वह निश्चय में नहीं लिया। वह बाद में लिया।

00:15:44.680 --> 00:15:51.776
विवक्षा बदली कि आत्मा आत्मा को जानता है,
लोकालोक भी उसमें ज्ञात हो जाता है, उसे व्यवहार कहा। इसप्रकार। 

00:15:51.800 --> 00:15:58.016
साधक को थोड़ा क्रम पड़ता है। केवली को कोई
क्रम नहीं, एक समय में है।

00:15:58.040 --> 00:16:00.896
निश्चय स्व-परप्रकाशक और
व्यवहार स्व-परप्रकाशक

00:16:00.920 --> 00:16:04.456
उन्हें एक समय में अक्रमरूप से होते हैं।
साधक को क्रम पड़ता है। 

00:16:04.480 --> 00:16:09.256
निश्चय स्वप्रकाशक और निश्चय
स्व-परप्रकाशक एक समय में दो होते हैं।

00:16:09.280 --> 00:16:14.936
ये दोनों एक समय में। और फिर
जब सविकल्प दशा में आता है

00:16:14.960 --> 00:16:20.136
तब व्यवहार जाना हुआ प्रयोजनवान -
१२ वीं गाथा है न? वह सविकल्प दशा की है।

00:16:20.160 --> 00:16:24.296
वह व्यवहार बाद में खड़ा होता है।
लेकिन निश्चयपूर्वक व्यवहार होता है।

00:16:24.320 --> 00:16:32.336
स्व-पर प्रकाशक में, हों। स्व-पर प्रकाशक में
भी निश्चय स्व-परप्रकाशक प्रकट होता है,

00:16:32.360 --> 00:16:36.376
आनंद आता है तब उसे स्व-परप्रकाशक
व्यवहार कहा जाता है।

00:16:36.400 --> 00:16:40.136
अब आनंद ही नहीं आता तो
स्व-परप्रकाशक अज्ञान में जाता है।

00:16:40.160 --> 00:16:45.496
वह तो निगोद में भी है अभी स्व-परप्रकाशक।
पंचास्तिकाय है? पंचास्तिकाय लाओ। 

00:16:45.520 --> 00:16:50.716
मुमुक्षु: वह आनंद १० मिनिट से ज्यादा नहीं 
रहता उसका क्या कारण?

00:16:50.740 --> 00:17:05.216
पू. लालचंदभाई: दस मिनिट नहीं रहता। दस मिनिट (से)
बहुत कम, आँख की पलक झपके
इतने में तो बाहर निकल जाता है। 

00:17:05.240 --> 00:17:10.636
इतना समय शुरूआत में आनंद,
आनंद इतने ही समय तक होता है

00:17:10.660 --> 00:17:17.576
मात्रा भी कम और समय भी कम।
फिर मात्रा भी ज्यादा और समय भी (ज्यादा)।

00:17:17.600 --> 00:17:27.896
वह आनंद आया वह भ्रमणा है, दस मिनिट का आनंद।
कल्पना है, कल्पना कल्पना है।

00:17:27.920 --> 00:17:32.836
उस आत्मा का स्वरूप पहले समझो कि आत्मा क्या?
आहाहा!

00:17:32.860 --> 00:17:35.936
मूल बात जीव तत्त्व को समझने जैसा है।

00:17:35.960 --> 00:17:44.356
ऐसे तो अनेक ध्यानवाले आते हैं,
मेरे से अकेले में पूछते हैं कि प्रकाश दिखाई दिया।

00:17:44.380 --> 00:17:50.956
भाई! प्रकाश नहीं होता, वह तो पुद्गल की अवस्था है।
वह ज्ञानप्रकाश अरूपी है।

00:17:50.980 --> 00:18:00.536
यह जो मैंने कहा न स्व-परप्रकाशक
जीवमात्र में होता है, ज्ञप्ति।

00:18:00.560 --> 00:18:07.536
वह पंचास्तिकाय में १२१ गाथा में आचार्य
भगवान ने लिया है। कुंदकुंद का शास्त्र है यह।

00:18:07.560 --> 00:18:27.896
<b>अन्वयार्थ:- [व्यवहार से कहे जानेवाले
एकेन्द्रियादि तथा पृथ्वीकायिकादि 'जीवों' में ] </b>

00:18:27.920 --> 00:18:33.056
<b>इन्द्रियाँ जीव नहीं है और छह प्रकार की
शास्त्रोक्त कायें भी जीव नहीं है;</b>

00:18:33.080 --> 00:18:39.416
<b>उनमें जो ज्ञान है वह जीव है
ऐसी [ज्ञानी] प्ररूपणा करते हैं। </b>

00:18:39.440 --> 00:18:44.736
<b>टीका:- यह, व्यवहारजीवत्व के एकांत की
प्रतिपत्ति का खंडन है। </b>

00:18:44.760 --> 00:18:51.576
<b>[अर्थात् जिसे मात्र व्यवहारनय से
जीव कहा जाता है उसका वास्तव में
जीवरूप से स्वीकार करना उचित नहीं है]</b>

00:18:51.600 --> 00:18:55.336
देह और जीव, एकेन्द्रिय जीव, दो इन्द्रिय जीव
यह उचित नहीं है।

00:18:55.360 --> 00:19:00.776
लेकिन उनमें जो ज्ञान है वह जीव है, इसप्रकार। देह से
अलग करके ज्ञान को जीव का लक्षण कहा है। 

00:19:00.800 --> 00:19:12.176
<b>[ऐसा यहाँ समझाया है]। </b> 
<b>यह जो एकेन्द्रियादि तथा 
पृथ्वीकायिकादि, 'जीव'</b> इन टू कोमा।

00:19:12.200 --> 00:19:21.756
<b>‘जीव' कहे जाते हैं, अनादि
जीव - पुद्गल का परस्पर अवगाह देखकर </b>
पिण्ड देखकर,

00:19:21.780 --> 00:19:31.416
क्षेत्रावगाह देखकर <b>व्यवहारनय से जीव के
प्राधान्य द्वारा (-जीव को मुख्यता देकर) 
‘जीव' कहे जाते हैं।</b>

00:19:31.440 --> 00:19:40.576
<b>निश्चयनय से उनमें स्पर्शनादि
इन्द्रियाँ तथा पृथ्वी-आदि कायें,</b>

00:19:40.600 --> 00:19:46.896
<b>जीव के लक्षणभूत चैतन्यस्वभाव के
अभाव के कारण, जीव नहीं हैं;</b>

00:19:46.920 --> 00:19:50.816
एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय वह जीव नहीं है।
शरीर की संज्ञा है वह तो।

00:19:50.840 --> 00:19:53.496
आहाहा! उसपेमें जानने की क्रिया कहाँ है?

00:19:53.520 --> 00:20:02.856
<b>उन्हीं में </b> एकेन्द्रियादि में, निगोद में भी
<b>जो स्वपर की ज्ञप्तिरूप से प्रकाशमान ज्ञान है</b>

00:20:02.880 --> 00:20:09.976
स्वपर की ज्ञप्तिरूप से प्रकाशमान ज्ञान है।
स्वपर का प्रतिभास होता है स्वच्छता में, ज्ञान में।

00:20:10.000 --> 00:20:17.996
एकेन्द्रिय को भी। <b>उन्हीं में जो स्वपर की
ज्ञप्तिरूप से प्रकाशमान ज्ञान है वही,</b>

00:20:18.020 --> 00:20:24.776
<b>गुण-गुणी के कथंचित् अभेद के कारण,</b>
पर्याय को, द्रव्य को अभेद गिनकर

00:20:24.800 --> 00:20:31.216
जीवरूप से प्ररूपण करने में आता है।
यह स्व-परप्रकाशक का लकड़ा (शल्य) चला।

00:20:31.240 --> 00:20:36.616
पकड़ लिया लकड़ा । स्वप्रकाशक भी गया,
निश्चय स्व-परप्रकाशक भी गया,

00:20:36.640 --> 00:20:40.316
ज्ञानी का निश्चयनय के पूर्वक व्यवहार
स्व-परप्रकाशक भी गया।

00:20:40.340 --> 00:20:46.776
तीनों को उड़ा दिया और एक लकड़ा रह गया।
स्व-परप्रकाशक, स्व-परप्रकाशक, स्व-परप्रकाशक।

00:20:46.800 --> 00:20:59.896
स्व-परप्रकाशक में से परप्रकाशक का निषेध
करके स्व-प्रकाशक में आना चाहिए।

00:20:59.920 --> 00:21:07.436
तो इन्द्रियज्ञान रुक जाये और
नया ज्ञान प्रकट हो और आत्मा का अनुभव हो,

00:21:07.460 --> 00:21:11.216
उसमें स्वप्रकाशक में अनुभव होता है
उसी समय आनंद आता है

00:21:11.240 --> 00:21:18.716
उसे भी ज्ञान जानता है।
वह निश्चय से स्व-परप्रकाशक हुआ।
ज्ञान+आनंद किया कि नहीं?

00:21:18.740 --> 00:21:26.576
तो स्व-परप्रकाशक, अंदर ही अंदर में, अभी
ध्यान में मग्न है उस समय, फिर बाहर आता है

00:21:26.600 --> 00:21:29.636
तब स्व-परप्रकाशक का व्यवहार उसे होता है।

00:21:29.660 --> 00:21:33.856
क्योंकि स्व-परप्रकाशक निश्चय हो उसे
स्व-परप्रकाशक का व्यवहार होता है न?

00:21:33.880 --> 00:21:37.276
निगोद को तो स्व-परप्रकाशक निश्चय
प्रकट नहीं होता, अनुभव नहीं है

00:21:37.300 --> 00:21:41.816
तो उसे स्व-परप्रकाशक
वह व्यवहार का अज्ञान में जाता है।

00:21:41.840 --> 00:21:50.616
बहुत स्व-परप्रकाशक के विषय में बहुत (भ्रान्ति) चलती है।
ज्ञात है हमें।

00:21:50.640 --> 00:22:02.496
हमसे पूछे तो हम खुलासा करें न,
कोई पूछे तो खुलासा करें।

00:22:02.520 --> 00:22:11.796
मुमुक्षु: गुरुदेव ने तो बहुत खुलासे किये हैं।
पू. लालचंदभाई: बहुत खुलासा।

00:22:11.820 --> 00:22:20.456
अरे! गुरुदेव ने तो यहाँ तक कहा है कि
ज्ञान ही जानने में आता है पर जानने में ही नहीं आता।

00:22:20.480 --> 00:22:30.036
एक ८० के वर्ष का आत्मधर्म है मार्च महीने का।

00:22:30.060 --> 00:22:37.576
उसमें तो यहाँ तक उन्होंने कहा कि
आत्मा पर को जानता ही नहीं

00:22:37.600 --> 00:22:41.336
तो पर की तरफ उपयोग रखने की बात ही कहाँ रही?

00:22:41.360 --> 00:22:48.696
आत्मा आत्मा को जानता है वह भी स्व-स्वामी का
व्यवहार है, उसमें भी साध्य की सिद्धि नहीं है।

00:22:48.720 --> 00:22:54.536
ज्ञायक तो ज्ञायक है उसमें अनुभव होता है।
बहुत कह गये हैं जगह-जगह पर। 

00:22:54.560 --> 00:23:00.736
आज सुबह भाई आये थे
उसमें से वह बताया। १८३६ पॉइंट।

00:23:00.760 --> 00:23:03.176
पुस्तक छपती है न दूसरी अभी ही।

00:23:03.200 --> 00:23:14.396
उसका एक कारण है कि उसे अनादिकाल से
इन्द्रियज्ञान प्रकट होता है

00:23:14.420 --> 00:23:21.536
और इन्द्रियज्ञान पर की ही प्रसिद्धि करता है।
ऐसा उसे अभ्यास, अध्यास अनादिकाल से है।

00:23:21.560 --> 00:23:28.656
अनादिकाल से, आज नया नहीं है। समझ गये?
अब उसे पूरा चक्कर पलटना है, उसका निषेध करना है।

00:23:28.680 --> 00:23:35.396
ऐसे ऐसे यह (लकड़ी) जानने में आती है यह प्रत्यक्ष।
यह घड़ी ज्ञात होती है, चार बजने में आठ मिनिट हैं,

00:23:35.420 --> 00:23:41.216
प्रत्यक्ष जानने में आता है। कि नहीं जानने में आता, तेरा
ज्ञान जानने में आता है, (ऐसा) ले। यदि अनुभव करना हो तो। 

00:23:41.240 --> 00:23:45.776
और वरना करो लहर। उसमें कौन,
कोई जबरदस्ती तो है नहीं कोई। 

00:23:45.800 --> 00:23:52.296
तुम्हारा अभिप्राय तुम्हारे पास है, रखो। पर
जानने में आता है, पर जानने में आता है, पर जानने में आता है, जानो जाओ।

00:23:52.320 --> 00:23:55.136
अनंतकाल गया पर को जानते हुए।

00:23:55.160 --> 00:23:58.096
उसमें हमारे ऊपर जब हल्ला (विरोध) आया,

00:23:58.120 --> 00:24:02.336
कि आत्मा पर को नहीं जानता,
वास्तव में जाननहार जानने में आता है।

00:24:02.360 --> 00:24:08.056
तब मुंबई में मेरे बड़े पुत्र ने मुझसे पूछा,

00:24:08.080 --> 00:24:13.296
मुझे भाई कहते हैं। कोई पापा कहते हैं, कोई भाई कहते हैं,
व्यवहार अलग-अलग होता है ना।

00:24:13.320 --> 00:24:21.056
कि यह आत्मा पर को जानता नहीं यह आप जो बात
करते हो उसके सामने इतना द्रोह है

00:24:21.080 --> 00:24:30.076
तो तुम्हारे पास क्या दलील है उसकी? न्याय दो 
न कुछ। मैंने कहा, ऐसा है? अच्छा प्रश्न है तेरा।

00:24:30.100 --> 00:24:36.256
देख, इतने वर्ष की तेरी उम्र हुई तो पर को तू 
जान रहा है न?
तो कहा, हाँ, मैं पर को जानता हूँ।

00:24:36.280 --> 00:24:41.576
(तो मैंने पूछा) आनंद आया? तो कहा नहीं, आनंद नहीं आया। 
नहीं आनंद आया तो विभाव है।

00:24:41.600 --> 00:24:46.276
इस शास्त्र की कोई जरूरत नहीं है तुझे। ले।

00:24:46.300 --> 00:24:50.316
किस शास्त्र में क्या लिखा है स्वप्रकाशक,
वह कोई तुझे जरूरत नहीं है।

00:24:50.340 --> 00:24:57.776
मैं तुझे पूछता हूँ कि यदि पर को जानने पर आत्मा को
आनंद आता हो तो परप्रकाशक योग्य है।

00:24:57.800 --> 00:25:03.136
कोई दिक्कत नहीं है मुझे। लेकिन तुझे आनंद आया?
कहता है नहीं, मुझे आनंद नहीं आया। 

00:25:03.160 --> 00:25:08.496
तो वह मिथ्या है। वहाँ से व्यावृत्त हो,
वापस मुड़ जा। उसका निषेध कर व्यवहार का। 

00:25:08.520 --> 00:25:12.836
और अंदर में जा कि जाननहार ज्ञात होता है।
तो आनंद आयेगा तुझे।

00:25:12.860 --> 00:25:15.496
तो हमारी बात सत्य है ऐसा मानना। 

00:25:15.520 --> 00:25:33.376
बड़ा शल्य है यह। उसके लिए आचार्य भगवान ने
बंध अधिकार में बहुत सुंदर बात की है।

00:25:33.400 --> 00:25:41.096
कि' मैं पर को मार सकता हूँ' ' बचा सकता हूँ'
'सुखी-दुःखी कर सकता हूँ'
ऐसा जो तेरा अभिप्राय है

00:25:41.120 --> 00:25:47.256
वह भावकर्म है, अध्यवसान है, मिथ्यात्व है,
स्व-पर की एकताबुद्धि तेरी हुई है। 

00:25:47.280 --> 00:25:52.976
वह तो ठीक। भावबंध, भावबंध अर्थात् मिथ्यात्व।

00:25:53.000 --> 00:26:00.256
फिर आगे बढ़कर कहते हैं कि मैं धर्मास्तिकाय को
जानता हूँ वह अध्यवसान, मिथ्यात्व है।

00:26:00.280 --> 00:26:10.476
यह भावबंध की पराकाष्ठा। दूसरों को मारने का
भाव वह तो भावबंध, मिथ्यात्व, अज्ञान है ही।

00:26:10.500 --> 00:26:15.936
लेकिन मैं पर को जानता हूँ वह समकक्षी भावबंध है,
मिथ्यात्व है तुझे। 

00:26:15.960 --> 00:26:22.376
क्योंकि जानने में आता है ज्ञान अथवा
जानने में आता है अभेद से ज्ञायक।

00:26:22.400 --> 00:26:27.456
भेद से ज्ञान जानने में आता है,
अभेद से ज्ञायक जानने में आता है। सभी को, हों!

00:26:27.480 --> 00:26:36.456
भेद से देखो तो ज्ञान की पर्याय जानने में आती है
और अभेद से देखो तो ज्ञायक जानने में आता है। समझ में आया?

00:26:36.480 --> 00:26:43.776
ऐसी स्थिति होने पर भी तू स्व को चूककर
(ऐसा कहता है कि) 'यह मुझे धर्मास्तिकाय जानने में आता है'।
जा तेरा अज्ञान है।

00:26:43.800 --> 00:26:48.216
आहाहा! समकक्षी बंध होता है।

00:26:48.240 --> 00:26:56.016
फिर २७१ कलश है।
उसमें राजमलजी साहब लिखते हैं,

00:26:56.040 --> 00:27:01.016
कि मैं ज्ञायक और ये छह द्रव्य
(जो) सर्वज्ञ भगवान ने कहे हैं (वो मेरे ज्ञेय)।

00:27:01.040 --> 00:27:06.616
जैनमत में आ गया फिर भी मिथ्यादृष्टि
रह गया। उसे चेताते हैं अब।

00:27:06.640 --> 00:27:14.616
कि छह द्रव्यों को तो हम ठीक जानते हैं।
कि छह द्रव्य तेरा ज्ञेय और तू ज्ञाता
वह तो तेरी भ्रान्ति है।

00:27:14.640 --> 00:27:23.976
तेरी भ्रान्ति है, तुझे छह द्रव्य नहीं ज्ञात होते।
छह द्रव्य से भिन्न ज्ञान ज्ञात होता है तुझे। आहाहा!

00:27:24.000 --> 00:27:28.376
बड़ी भ्रान्ति ऐसा लिखा है। बहुत भ्रान्ति चलती है।

00:27:28.400 --> 00:27:32.896
आत्मा ज्ञायक और छह द्रव्य मेरे ज्ञेय।
उसके ऊपर प्रवचन हो गये हैं।

00:27:32.920 --> 00:27:40.056
उसके ऊपर १३ प्रवचन हैं न?
अध्यात्म प्रवचन रत्नत्रय।
आहाहा! वह पुस्तक बहुत ऊँची है।

00:27:40.080 --> 00:27:42.856
लाइफ टाइम पढ़ने जैसी है। लाइफ टाइम।

00:27:42.880 --> 00:27:47.776
ध्येय, ध्यान और ध्याता।
तीन प्रकार उसमें आ गये हैं।

00:27:47.800 --> 00:27:53.656
ध्येय किसे कहते हैं? ध्यान का विषय।
और ध्यान कैसे करना आत्मा का?

00:27:53.680 --> 00:28:00.716
और फिर ध्यान का फल क्या आता है? ये सभी बातें
संकलित हैं उसमें। लाइफ टाइम पढ़ने जैसी है।

00:28:00.740 --> 00:28:04.896
वह पुस्तक खतम हो गई थी। 
अभी हजार छपाई हैं लंदनवालों ने।

00:28:04.920 --> 00:28:08.656
तो हजार में से ५०० तुरंत ही खप गई देवलाली में।

00:28:08.680 --> 00:28:15.756
अब ५०० में से कुछ समाप्त हुई होंगी,
४०० होंगी। दूसरी आवृत्ति छपवाई है।

00:28:15.780 --> 00:28:27.496
केवल मात्र सुनकर निर्णय करने की अपेक्षा
अंदर में मंथन करके निर्णय करना।

00:28:27.520 --> 00:28:36.176
वास्तव में तो आत्मा से पूछना, उलझन हो न
तब छह महीने तक तो किसी से पूछना ही नहीं।

00:28:36.200 --> 00:28:43.256
यदि तुम दूसरों से पूछने जाओगे तो इसका
अपमान किया, अंदर बैठा है भगवान।

00:28:43.280 --> 00:28:49.096
वह कहता है जा भटक जहाँ तहाँ पूछ। अंत में तो मेरे
पास ही (आएगा)। सच्चा जवाब तो अंदर से आएगा।

00:28:49.120 --> 00:28:59.536
पूंजाभाई! (मुमुक्षु: होता है वह आता है।) 
हं (हाँ).. सर्वज्ञ स्वभावी विराजमान है परमात्मा अभी। 
आहाहा! परिपूर्ण परमात्मा है।

00:28:59.560 --> 00:29:03.896
मुमक्षु: शाश्वत बिराजमान है।
पू. लालचंदभाई: शाश्वत। आया था ना अनंत नय प्रगट।

00:29:03.920 --> 00:29:08.976
प्रगट आया था न? फिर ७३वीं
गाथा में प्रत्यक्ष कहते हैं।

00:29:09.000 --> 00:29:13.536
आत्मा प्रत्यक्ष है, परोक्ष नहीं।
परोक्ष रहे ऐसा उसका स्वभाव ही नहीं है।

00:29:13.560 --> 00:29:21.136
मुमुक्षु: उसकी महिमा आती ही नहीं है।
पू. लालचंदभाई: बाहर की महिमा है।
कोई धनार्थी और कोई मानार्थी बस।

00:29:21.160 --> 00:29:27.136
कोई धन की लोलुपता से और
कोई मान की लोलुपता बस।

00:29:27.160 --> 00:29:36.616
जानने के लोभ में सारा ही यह संसार है।
जानने का लोभ हो गया है अनंतानुबंधी का।

00:29:36.640 --> 00:29:42.536
तुम कहाँ गये थे? कहाँ से आये हो?
कब जाते हो? अब तुझे क्या है? रहने दे न पंचायत।

00:29:42.560 --> 00:29:54.016
कुछ प्रयोजन नहीं होता
फिर भी पराये की पंचायत में पड़ गया है। 

00:29:54.040 --> 00:30:01.296
प्रमाण के बाहर जाना नहीं
और प्रमाण में अटकना नहीं।

00:30:01.320 --> 00:30:08.096
प्रमाण के बाहर ये सभी पदार्थ हैं।
तुझे क्या काम है? होने योग्य सब हुआ करता है।
आहाहा!

00:30:08.120 --> 00:30:14.736
अंदर में द्रव्य और पर्याय उनके बीच का
विचार कर, वर्तुल (परिधि) को छोटा करके। आहाहा!

00:30:14.760 --> 00:30:22.056
११ भाग प्रकाशित हो गये वह बहुत अच्छा हुआ।
सब खुलासे हैं उनमें।

00:30:22.080 --> 00:30:30.136
स्व-परप्रकाशक के लिये तुम्हें
हिम्मतनगर नहीं आना पड़ा।

00:30:30.160 --> 00:30:32.936
मैंने कहा हिम्मतनगर आना आराम से बात करेंगे।

00:30:32.960 --> 00:30:45.176
आने की छूट है। थोड़े दिन यहाँ
रुकना है, फिर देवलाली।

00:30:45.200 --> 00:31:04.896
मुमुक्षु: स्व-परप्रकाशक में दिगंबरों को भी
भ्रान्ति है, दूसरों में तो है ही।

00:31:04.920 --> 00:31:12.056
पू. लालचंदभाई: दिगंबरों में क्या, बड़े पंडितों में भ्रान्ति है।

00:31:12.080 --> 00:31:20.736
उसका कारण है। एक तो गहराई से
उस प्रकार का आत्मलक्षी स्वाध्याय कम है।

00:31:20.760 --> 00:31:30.376
स्वाध्याय है अवश्य लेकिन.. आत्मलक्षी स्वाध्याय कम है।
इसलिए पास ऑन (pass on) (ऊपर से ही पसार) हो जाता है।

00:31:30.400 --> 00:31:36.936
नियमसार तो सभी ने पढ़ा है।
पास ऑन हो जाता है। यह क्या लिखा है?

00:31:36.960 --> 00:31:41.856
केवली के लिये स्व-परप्रकाशक कथंचित्?
आहाहा! यह क्या लिखा है?

00:31:41.880 --> 00:31:50.456
स्व-परप्रकाशक में ये कथंचित् क्या?
कथंचित् है। निश्चय और व्यवहार दोनों।

00:31:50.480 --> 00:31:59.776
उसके ऊपर गुरुदेव के व्याख्यान हो गये हैं,
टेप हैं। सारा साहित्य तो बाहर आ गया है।

00:31:59.800 --> 00:32:13.376
एक पर की कर्ताबुद्धि और एक पर की
ज्ञाताबुद्धि अनंत दुःख का कारण है।

00:32:13.400 --> 00:32:21.676
उसके लिये एक अमितगति आचार्य हो गये हैं।
उन्होंने योगसार लिखा है।

00:32:21.700 --> 00:32:25.936
उन्होंने अनुभव का बहुत सरल उपाय बताया है।

00:32:25.960 --> 00:32:32.656
बिल्कुल शास्त्र पढ़ना न आता हो,
अंगूठा छाप हो, संस्कृत न आती हो,
कुछ न आता हो

00:32:32.680 --> 00:32:36.976
तो भी अनुभव हो जाये।
ऐसी एक सादी बात उन्होंने की है।

00:32:37.000 --> 00:32:48.536
उन्होंने एक उदाहरण दिया। कि दीपक है वह प्रकाशक
है, और उसकी जो प्रकाश पर्याय है वह प्रकाश,

00:32:48.560 --> 00:32:57.016
प्रकाशक और प्रकाश। और प्रकाश्य -
घट, पट जो बाहर के पदार्थ हैं वे उसमें जानने में आते हैं।

00:32:57.040 --> 00:33:01.136
प्रसिद्ध होते हैं। इसप्रकार तीन स्थिति हैं।

00:33:01.160 --> 00:33:11.196
तब वे ऐसा फरमाते हैं कि जो प्रकाश से
अभिन्न है दीपक वह तुझे जानने में नहीं आता।

00:33:11.220 --> 00:33:15.416
और प्रकाश से भिन्न घड़ा है वह तुझे जानने में आता है।

00:33:15.440 --> 00:33:22.936
हमें तो आश्चर्य होता है तेरी मूर्खता पर।
आश्चर्य होता है, ऐसा लिखा है।

00:33:22.960 --> 00:33:27.176
यह तो दृष्टांत हुआ। अब सिद्धांत में घटाते हैं।

00:33:27.200 --> 00:33:36.656
आत्मा है वह ज्ञायक है और उसकी प्रति समय
ज्ञान की पर्याय भी होती है,

00:33:36.680 --> 00:33:43.996
और उस ज्ञान की पर्याय में तुझे पर जानने में आता है।
सभी पदार्थ, शास्त्र वगैरह देव, गुरु,
शास्त्र जानने में आते हैं,

00:33:44.020 --> 00:33:49.296
राग जानने में आता है, क्रोध जानने में आता है सब कुछ बाहर का तुझे
तेरी ज्ञान की पर्याय में ज्ञात होता है।

00:33:49.320 --> 00:33:56.416
तो कहते हैं कि तेरी ज्ञान की पर्याय में
जो अभेद आत्मा है वह ज्ञात नहीं होता

00:33:56.440 --> 00:33:59.416
और ज्ञान की पर्याय (से) भिन्न हैं
वे तुझे ज्ञात होते हैं?

00:33:59.440 --> 00:34:04.776
आश्चर्य होता है।
तो अब क्या करना? तो करना क्या?

00:34:04.800 --> 00:34:10.336
कि ज्ञेय को जानकर वहाँ से व्यावृत्त हो,
वापस मुड़, रिबाउन्ड।

00:34:10.360 --> 00:34:14.356
जैसे बच्चे बॉल मारते हैं न तो उन्हें पता है कि
बॉल मेरे हाथ में आयेगी,

00:34:14.380 --> 00:34:17.136
वहाँ चिपक नहीं जायेगी। ऐसे फट से कैच कर लेते हैं।

00:34:17.160 --> 00:34:22.596
ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि ज्ञेय को जानकर
वहाँ से व्यावृत्त हो, वापस पलट जा

00:34:22.620 --> 00:34:27.976
कि ज्ञेय जानने में नहीं आता, मेरा ज्ञान जानने में आता है,
ज्ञायक जानने में आता है। इतना करेगा तो अनुभव हो जायेगा।

00:34:28.000 --> 00:34:34.296
एकदम सीधा-साधा उदाहरण है।
अमितगति आचार्य ने कहा है।

00:34:34.320 --> 00:34:39.336
संवर अधिकार या निर्जरा अधिकार में है यह।
मुमुक्षु: निर्जरा अधिकार में।

00:34:39.360 --> 00:34:47.336
पू. लालचंदभाई: निर्जरा अधिकार में है। ज्ञानियों ने तो करुणा
करके, बहुत सरल करके बातें की हैं।

00:34:47.360 --> 00:34:52.616
उसे 'पर को मैं जानता हूँ' क्या नहीं जानता?
यह घड़ी क्या जानने में नहीं आती?

00:34:52.640 --> 00:34:58.156
भाई! यह ज्ञानियों के सामने बाहें चढ़ाने (बहस करने) जैसा नहीं है।

00:34:58.180 --> 00:35:02.856
ज्ञानी तेरे हित की बात करते हैं कि यह घड़ी
ज्ञात नहीं होती (तुझे) ज्ञान ज्ञात होता है।

00:35:02.880 --> 00:35:18.056
पर से खिसक जा। यह केवल अनुभव कैसे हो उसकी
प्रधानता है। जानने की प्रधानता नहीं है अभी।

00:35:18.080 --> 00:35:26.556
जीवों को जानने का लोभ है। आहाहा!
जानने के लोभ में सारा यह संसार है।

00:35:26.580 --> 00:35:30.136
बोलो! अनंतानुबंधी का लोभ।

00:35:30.160 --> 00:35:41.256
वरना व्यवहार के कथन तो अपार
आयेंगे शास्त्रों में। ढ़ेर होंगे।

00:35:41.280 --> 00:35:49.576
शुद्धनय का कथन कहीं, विरल। आहाहा!
थोड़े, निश्चय के कथन कम, व्यवहार के कथन ज्यादा।

00:35:49.600 --> 00:35:55.936
एक पंचाध्यायी शास्त्र है,
उसमें बहुत अच्छी बात लिखी है। 

00:35:55.960 --> 00:36:03.416
कि जितना व्यवहारनय का उपदेश है
उतना सभी मिथ्या है। 

00:36:03.440 --> 00:36:11.856
जितना व्यवहारनय से प्रतिपादन करने में आया
वह सभी मिथ्या है, झूठा।

00:36:11.880 --> 00:36:15.736
और उसके ऊपर दृष्टि रखनेवाले
जीव भी मिथ्यादृष्टि हैं,

00:36:15.760 --> 00:36:25.656
और जितना निश्चयनय का निरूपण है
वह सत्यार्थ है, उसके ऊपर दृष्टि रखनेवाले
सम्यग्दृष्टि हो जाते हैं।

00:36:25.680 --> 00:36:31.576
व्यवहारनय का जितना कथन है उतना मिथ्या है।
मिथ्या उपदेश देता है व्यवहार।

00:36:31.600 --> 00:36:37.256
व्यवहार मिथ्या उपदेश को देनेवाला है
और इसलिए वह मिथ्या है।

00:36:37.280 --> 00:36:41.176
और उसके ऊपर दृष्टि रखे अर्थात्
श्रद्धा का विषय बना दे,

00:36:41.200 --> 00:36:45.816
उसे सत्यार्थ माने, तो मिथ्यात्व का
दोष तुझे लगेगा। आहाहा!

00:36:45.840 --> 00:36:55.136
व्यवहार के कथन तो अपार आते हैं,
या तो कहे कुम्हार से घड़ा होता है, वह स्थूल व्यवहार।

00:36:55.160 --> 00:36:59.256
फिर मिट्टी से घड़ा होता है, सूक्ष्म व्यवहार,
व्यवहार है वह।

00:36:59.280 --> 00:37:07.736
मिट्टी से घड़ा होता नहीं। जयंतीभाई!
कुम्हार से तो (घड़ा) नहीं होता लेकिन मिट्टी से भी, आहाहा!

00:37:07.760 --> 00:37:13.796
क्या बात करते हो? मिट्टी से ही होता है,
कुम्हार से न हो तो कोई बात नहीं।

00:37:13.820 --> 00:37:19.056
हमने बहुत समय से सुना है तो कुछ
हमारा अज्ञान गला है, गया तो नहीं है।

00:37:19.080 --> 00:37:27.816
मिट्टी से नहीं होता भाई! मिट्टी से होता हो 
तो घड़े एक जैसे होने चाहिए।

00:37:27.840 --> 00:37:30.716
और घड़े (मिट्टी) में से तवा ही न बने, घड़ा ही बना करे।

00:37:30.740 --> 00:37:36.276
मिट्टी कर्ता हो और घड़ा कर्म हो
तो घड़ा ही बना करे।

00:37:36.300 --> 00:37:40.456
फिर तवा तो बने नहीं। आहाहा! ऐसा है नहीं।

00:37:40.480 --> 00:37:47.356
एक परमाणु का उदाहरण दिया गुरुदेव ने।
एक परमाणु अलग, स्कंध में से अलग करो।

00:37:47.380 --> 00:37:53.816
विचारने के लिये। और उसके गुण स्पर्श,
रस, गंध, वर्ण। मुख्य चार गुण हैं न।

00:37:53.840 --> 00:38:00.176
तो अब वर्ण गुण की उसकी पर्याय होती है।
तो पहले समय ४० डिग्री सफेद हुई पर्याय,

00:38:00.200 --> 00:38:06.176
दूसरे समय में हुई, तीसरी काली हो गई।
चौथे, पाँचवे समय में हो तो ब्लू हो जाती है।

00:38:06.200 --> 00:38:10.576
तो अब उसका गुण तो सदृश
एक ही है वर्ण नाम का।

00:38:10.600 --> 00:38:16.576
गुण का बदलाव नहीं हुआ। गुण तो वही का वही है।
प्रत्येक पर्याय में गुण तो सदृश वही का वही है, 
अन्वयरूप से। 

00:38:16.600 --> 00:38:23.716
पर्याय में बदलाव हुआ तो निश्चित होता है कि
पुद्गल द्रव्य उस पर्याय का कर्ता नहीं है,

00:38:23.740 --> 00:38:26.216
पर्याय की कर्ता पर्याय है। स्वत: होती है।

00:38:26.240 --> 00:38:34.376
तब उपचार से पुद्गल करता है ऐसा कहने में
आता है। ऐसी सूक्ष्म बातें हैं, प्रतीक।

00:38:34.400 --> 00:38:43.256
कर्ताबुद्धि बहुत मार डालती है।
है ज्ञाता मानता है कर्ता। बस। वह भूल हो गई।

00:38:43.280 --> 00:39:01.616
बोलो किसी को अभी प्रश्न हो तो, टाइम बहुत है।
नहीं तो अब भक्ति ले लो।

00:39:01.640 --> 00:39:14.896
मुमुक्षु: सामान्य प्रमाण में, आगम प्रमाण
और अध्यात्म प्रमाण में.. .. ..

00:39:14.920 --> 00:39:21.136
पू. लालचंदभाई: आगम प्रमाण में ऐसा है कि द्रव्य शुद्ध,
गुण शुद्ध और पर्याय शुद्ध और अशुद्ध।

00:39:21.160 --> 00:39:24.096
वह सभी जब ले लो तब
आगम प्रमाण कहलाता है।

00:39:24.120 --> 00:39:28.736
शुद्ध-अशुद्ध पर्याय का पिंड उसे द्रव्य कहते हैं।
वह आगम प्रमाण कहा जाता है।

00:39:28.760 --> 00:39:38.096
अध्यात्म प्रमाण में राग निकल जाता है।
द्रव्य शुद्ध, गुण शुद्ध और पर्याय शुद्ध
उसे अध्यात्म प्रमाण कहने में आता है।

00:39:38.120 --> 00:40:07.416
मुमुक्षु: व्यवहारनय यदि मिथ्या उपदेश का 
देनेवाला है .....

00:40:07.440 --> 00:40:13.176
पू. लालचंदभाई: प्रश्न सही आया है। कि व्यवहारनय 
यदि मिथ्या उपदेश का देनेवाला है

00:40:13.200 --> 00:40:19.076
तो सर्वज्ञ भगवान की वाणी में निश्चय का
उपदेश है और व्यवहार का भी उपदेश है।

00:40:19.100 --> 00:40:22.296
दो नयाश्रित है न वाणी, द्विनयाश्रित है। 

00:40:22.320 --> 00:40:26.656
परस्पर सापेक्ष निश्चय और व्यवहार,
परस्पर सापेक्ष जोड़ा है।

00:40:26.680 --> 00:40:32.296
तो ऐसा प्रश्न आया कि व्यवहारनय
यदि झूठा उपदेश देता है

00:40:32.320 --> 00:40:36.616
तो जिनेन्द्र भगवान की दिव्यध्वनि में
व्यवहार की बात तो उन्होंने की है।

00:40:36.640 --> 00:40:43.536
व्यवहार की बात उन्होंने की है और फिर
उसका निषेध करना वह भी उन्होंने बात की है।

00:40:43.560 --> 00:40:52.496
क्या कहा? अकेले व्यवहार की बात की,
यह फुल पॉइन्ट (fullstop) नहीं है।

00:40:52.520 --> 00:40:59.216
लेकिन व्यवहारनय का ज्ञान करके
तू उसका निषेध करना निश्चयनय के द्वारा,

00:40:59.240 --> 00:41:04.016
निर्दय होकर। ये वाक्य किसका है?
ये वाक्य भी उन्हीं का है।

00:41:04.040 --> 00:41:13.296
व्यवहारनय को जानकर निश्चयनय के द्वारा
तू उसका निषेध करना। ये वाक्य किसका है?

00:41:13.320 --> 00:41:18.216
सर्वज्ञ भगवान का।
तो व्यवहारनय संयोग का ज्ञान कराता है।

00:41:18.240 --> 00:41:26.456
निश्चयनय स्वभाव का ज्ञान कराता है।
व्यवहारनय संयोग का ज्ञान कराता है मात्र।

00:41:26.480 --> 00:41:31.856
उसकी मर्यादा इतनी है। और निश्चयनय
जैसा स्वभाव है ऐसा भान करा देता है।

00:41:31.880 --> 00:41:36.016
इसलिए निश्चयनय उपादेय है। व्यवहारनय हेय है।

00:41:36.040 --> 00:41:44.256
संयोग का.., देह और आत्मा जब एक क्षेत्र में होते हैं
तो देह जीव है ऐसा कहे,

00:41:44.280 --> 00:41:48.956
आत्मा कर्म से बंधा हुआ है ऐसा कहे, आत्मा में
राग-द्वेष होता है ऐसा भी व्यवहारनय कहता है।

00:41:48.980 --> 00:41:57.536
निश्चयनय कहता है कि देह से बंधा ही नहीं है।
देह है ही नहीं आत्मा को। देह से रहित आत्मा है।

00:41:57.560 --> 00:42:09.316
विदेही है अभी। अशरीरी है आत्मा
अभी। अभी, हों! आत्मा कर्म से
बंधा हुआ नहीं है, अबद्ध है।

00:42:09.340 --> 00:42:14.336
आत्मा राग से संयुक्त है ही नहीं।
व्यवहारनय कहता है संयुक्त है।

00:42:14.360 --> 00:42:16.776
निश्चयनय कहता है राग से रहित आत्मा है।

00:42:16.800 --> 00:42:24.476
यह दो नयों का कथन है उसके लिये मोक्षमार्ग 
प्रकाशक में बहुत सुंदर दो वाक्य आये हैं।

00:42:24.500 --> 00:42:33.736
मोक्षमार्ग प्रकाशक।
कि जितना व्यवहारनय का कथन निरूपण हो
उसे असत्यार्थ जानकर उसका श्रद्धान छोड़ना

00:42:33.760 --> 00:42:44.216
और जितना निश्चयनय के द्वारा निरूपण करने में
आया हो वह सत्यार्थ है ऐसा जानकर
उसका श्रद्धान अंगीकार करना।

00:42:44.240 --> 00:42:52.576
आहाहा! दो वाक्य हैं, मोक्षमार्ग प्रकाशक में।
वे स्टीकर अभी निकले हैं।
यहाँ आये हैं या नहीं, हैं? हैं न?

00:42:52.600 --> 00:43:01.256
व्यवहारनय को सत्यार्थ माना है वह अज्ञान है।

00:43:01.280 --> 00:43:06.136
व्यवहारनय सत्य लगता है तब तक
निश्चयनय तिरोभूत हो जाता है।

00:43:06.160 --> 00:43:09.176
स्वभाव ढँक जाता है। दिखता नहीं है।

00:43:09.200 --> 00:43:13.516
मुमुक्षु: व्यवहारनय का श्रद्धान किस 
भूमिका में छोड़ना?

00:43:13.540 --> 00:43:23.496
पू. लालचंदभाई: हाँ, सम्यग्दर्शन जिसे प्रगट करना हो
उसे (व्यवहारनय का) श्रद्धान छोड़ देना।

00:43:23.520 --> 00:43:29.096
व्यवहार छोड़ने की बात नहीं है,
उसका श्रद्धान छोड़ना।

00:43:29.120 --> 00:43:35.496
व्यवहार तो नहीं छूटेगा। वह तो ज्ञानी होने के
बाद भी शुभभाव जानने में आयेगा वह व्यवहार।

00:43:35.520 --> 00:43:41.456
शुभभाव करना वह अज्ञान, शुभभाव आये
उसे जाने उसका नाम व्यवहार।

00:43:41.480 --> 00:43:47.976
जगत को ऐसा लगता है कि शुभभाव करना वह व्यवहार।
शुभभाव करना वह अज्ञान।

00:43:48.000 --> 00:43:53.096
शुभभाव आता है अपने कालक्रम में
उसे जानना कि शुभभाव है।

00:43:53.120 --> 00:43:56.896
उससे भिन्न मैं हूँ ऐसा जानना।
उसका नाम व्यवहार है।

00:43:56.920 --> 00:44:02.536
जानना वह व्यवहार, करना वह व्यवहार नहीं।
वह तो अज्ञान है, कर्ताबुद्धि है। 

00:44:02.560 --> 00:44:05.576
आहाहा! बड़ा फर्क है।

00:44:05.600 --> 00:44:11.656
एक बार, बहुत समय पहले की बात है।
राजकोट में वांचन करता था पहले तो। 

00:44:11.680 --> 00:44:21.576
लगभग बीस वर्ष पहले की बात है, तो निश्चयप्रधान
कथन शैली हमारी तो है ही स्वभाव से पहले से,

00:44:21.600 --> 00:44:27.656
तो एक भाई ने कहा, बड़ा, बड़ा व्यक्ति
सामान्य अपेक्षा से। तो कहा,

00:44:27.680 --> 00:44:37.176
तो कहा, लालचंदभाई! आप जो निश्चय की बात
करते हो न वह तो ठीक है लेकिन साथ में 
थोड़ी व्यवहार की बात तो करते जाओ।

00:44:37.200 --> 00:44:43.056
तो सोने में सुगंध मिल जायेगी। मैंने कहा ठीक है
कल से मैं व्यवहार की बात करूँगा।

00:44:43.080 --> 00:44:50.316
इसलिये उन्हें ऐसा लगा कि शुभभाव करने के लिए कहेंगे
कुछ। आहाहा! उनको यही चाहिए था।

00:44:50.340 --> 00:44:53.336
लेकिन हमारे पास से ये आशा
रखी वह तो हद करी।

00:44:53.360 --> 00:44:57.976
वह बात तो निकलने वाली ही नहीं है। वीतराग की
गद्दी पर बैठकर आत्मा राग को करे?

00:44:58.000 --> 00:45:01.936
आहाहा! वह तो वीतराग की गद्दी को लांछन है।

00:45:01.960 --> 00:45:12.216
दूसरा दिन हुआ, व्याख्यान में आये। हमने कहा,
कल एक मुमुक्षु भाई की मांग थी
कि हमें व्यवहार चाहिए।

00:45:12.240 --> 00:45:17.476
ठीक है। मांग यथास्थान पर है।
और वह व्यवहार भी है।

00:45:17.500 --> 00:45:22.536
अनुभव से पहले भी व्यवहार होता है और
अनुभव के बाद भी व्यवहार होता है।

00:45:22.560 --> 00:45:25.736
तो वह व्यवहार क्या है? 

00:45:25.760 --> 00:45:32.536
कि जो शुभाशुभ भाव आते हैं उनसे आत्मा भिन्न
है ऐसा बारंबार विचार करना उसका नाम व्यवहार। 

00:45:32.560 --> 00:45:37.956
विचार करना उसका नाम व्यवहार।
शुभाशुभ भाव करना उसका नाम व्यवहार नहीं।

00:45:37.980 --> 00:45:41.696
वह सविकल्प, उसे भेदज्ञान कहते हैं।

00:45:41.720 --> 00:45:46.816
'सविकल्प भेदज्ञान' कि देह से मेरा
आत्मा भिन्न है, कर्म से भिन्न है,

00:45:46.840 --> 00:45:51.816
राग से भिन्न, एक समय की
पर्याय के भेद से भी मैं भिन्न हूँ।

00:45:51.840 --> 00:45:55.896
ऐसे मैं ज्ञायक हूँ, अभेद हूँ,
मैं सामान्य टंकोत्कीर्ण परमात्मा हूँ,

00:45:55.920 --> 00:46:03.096
इसप्रकार भेदज्ञान का बारंबार विचार करना उसका नाम
व्यवहार है। उस व्यवहार में मिथ्यात्व गलता है,

00:46:03.120 --> 00:46:09.056
मिथ्यात्व गलता है और शुभभाव की कर्ताबुद्धि
रखता है तो मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है।

00:46:09.080 --> 00:46:16.576
व्यवहार नहीं है।
जिनागम ने उसे व्यवहार नहीं कहा,
जाना हुआ प्रयोजनवान कहा। क्या कहा?

00:46:16.600 --> 00:46:20.096
(मुमुक्षु: जाना हुआ प्रयोजनवान)
'किया हुआ' नहीं लिखा है कहीं।

00:46:20.120 --> 00:46:29.616
पूरा जगत ऐसा मानता है कि पहले व्यवहार
होता है और बाद में निश्चय होता है, व्यवहार अर्थात्?

00:46:29.640 --> 00:46:36.296
कषाय की मंदता करनी यह बात शास्त्रों में भी आती है।
श्रीमद् में भी ऐसे वाक्य तो बहुत आते हैं।

00:46:36.320 --> 00:46:41.936
शांत पहले होता है, कषाय की मंदता होती है, पात्रता
होती है वगैरह-वगैरह। बहुत बातें व्यवहार की आती हैं,

00:46:41.960 --> 00:46:47.616
उससे भिन्न आत्मा है ऐसा विचार करना
वह व्यवहार निश्चय के अनुकूल है।

00:46:47.640 --> 00:46:55.656
शुभभाव करना वह प्रतिकूल है सम्यग्दर्शन में।
सम्यग्दर्शन तीनकाल में नहीं होगा। गेरंटी।
आहाहा!

00:46:55.680 --> 00:47:05.176
जो क्रिया करने से तुझे दुःख हो वह क्रिया
करने की अभिलाषा तुझे क्यों है?

00:47:05.200 --> 00:47:09.616
शुभभाव से भी दुःख और अशुभ से भी दुःख,
एक सोने की बेड़ी और एक लोहे की बेड़ी।

00:47:09.640 --> 00:47:14.896
कोई कहे कि भाई तुझे बांधना है लेकिन
सोने की बेड़ी से बांधना है।

00:47:14.920 --> 00:47:20.936
लोहे की बेड़ी से (नहीं)। ना, भाईसाहब!
मुझे बंधना नहीं है। बंधन की अपेक्षा से 
दोनों ही समान हैं।

00:47:20.960 --> 00:47:31.216
उल्टा वजन उसमें ज्यादा होता है। 
गले पड़ गया है यहाँ। शुभभाव तो इतना गले पड़ा है।
आहाहा!

00:47:31.240 --> 00:47:35.196
मुमुक्षु: प्राथमिक स्टेज में तो व्रत,
नियम जरूरी हैं कि नहीं?

00:47:35.220 --> 00:47:39.896
पू. लालचंदभाई: प्राथमिक जीव में शुभभाव से आत्मा
अलग है, ऐसा बारंबार जानना। 

00:47:39.920 --> 00:47:44.816
उसका नाम प्राथमिक है।
शुभभाव करना वह प्राथमिक भूमिका नहीं है।

00:47:44.840 --> 00:47:51.476
क्योंकि जो वीतराग परमात्मा हुए, वीतराग
हुए वे राग करने का उपदेश नहीं देते।

00:47:51.500 --> 00:47:56.376
राग आता है उसे जानते हैं। राग आता है उसे जानते हैं,
उसका नाम व्यवहार।

00:47:56.400 --> 00:48:01.496
मुमुक्षु: व्रत, नियमों की जरूरत नहीं?
पू. लालचंदभाई: व्रत, नियम आते हैं उनको जानता है,

00:48:01.520 --> 00:48:05.176
उसका नाम व्यवहार।
व्रत, नियम करने जैसे हैं तो मिथ्यात्व।

00:48:05.200 --> 00:48:16.896
व्रतादि आते हैं, पंचम गुणस्थान में देशव्रत, पाँच
महाव्रत के परिणाम छठ्ठे गुणस्थान में आते हैं।

00:48:16.920 --> 00:48:26.416
आना और करना उसमें आसमान जमीन 
का फर्क है। बड़ा फर्क है।

00:48:26.440 --> 00:48:32.536
व्रत, नियम, उपवास आते हैं, सभी भाव आते हैं।
ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा लेता है,

00:48:32.560 --> 00:48:42.176
परिग्रह का परिमाण लेता है, उस जाति के मंद कषाय के
भाव आते हैं, लेकिन साधक मंद कषाय को करता नहीं है,
आहाहा!

00:48:42.200 --> 00:48:48.816
करता हुआ दिखता है लेकिन करता नहीं है।
उसे जानता हुआ दिखता है लेकिन उसे जानता नहीं है।

00:48:48.840 --> 00:48:54.456
वह तो जाननहार को जानता है। 
ज्ञेय का सद्भाव या अभाव, 
दोनों के समय पर भी ज्ञायक जानने में आता है। 

00:48:54.480 --> 00:49:00.516
ज्ञेय के सद्भाव में भी जाननहार जानने में आता है और
ज्ञेय के अभाव में निर्विकल्प ध्यान में भी 
(जाननहार जानने में आता है)। 

00:49:00.540 --> 00:49:02.736
आहाहा! छट्ठी गाथा में कहा है,

00:49:02.760 --> 00:49:11.216
ज्ञेयाकार अवस्था में जो ज्ञायकरूप से ज्ञात हुआ वह
स्वरूप प्रकाशन की अवस्था में भी ज्ञायक ही है।
आहाहा!

00:49:11.240 --> 00:49:19.056
वे सविकल्प दशा में क्या करते होंगे? उसका ज्ञान
आत्मा को जाना करता है इसलिए तो निर्जरा होती है।

00:49:19.080 --> 00:49:25.656
यदि ज्ञान आत्मा को जानना छोड़ दे तो
मिथ्यादृष्टि हो गया। तो तो बंध जाए। 

00:49:25.680 --> 00:49:33.336
निर्जरा होती है न तो समय-समय शुद्धि की
वृद्धि, तो शुद्धि की वृद्धि कब होती है?

00:49:33.360 --> 00:49:39.936
कि ज्ञान का अवलंबन आत्मा में हो, स्थिरता
बढ़ती हो अंदर में, समझ गये? तो निर्जरा होती है।

00:49:39.960 --> 00:49:43.616
एक समय भी ज्ञान आत्मा को जानना छोड़ता नहीं।

00:49:43.640 --> 00:49:49.456
भले ही इन्द्रियाँ पर को जानती हों लेकिन
अतीन्द्रियज्ञान स्व को जानता है।

00:49:49.480 --> 00:49:53.176
एक ज्ञान की पर्याय में दो भाग पड़ गये हैं।

00:49:53.200 --> 00:49:59.016
एक ज्ञानचेतना और एक कर्मचेतना।
पर्याय एक, भाग दो हैं।

00:49:59.040 --> 00:50:05.336
ज्ञान की पर्याय एक, स्वमुख से अतीन्द्रियज्ञान
और पराश्रित है वह इन्द्रियज्ञान,

00:50:05.360 --> 00:50:12.776
पर्याय एक, भाग दो हैं।
एक बंध का कारण इन्द्रियज्ञान और
अतीन्द्रियज्ञान मोक्ष का कारण होता है।

00:50:12.800 --> 00:50:24.936
समय एक है। पर्याय एक, भाग दो। इसलिये तो
साधक कहलाता है न? साधक अर्थात् बाधक तत्त्व है।

00:50:24.960 --> 00:50:29.516
थोड़ा आस्रवभाव होता है। संवर-निर्जरा है
उसके साथ आस्रवभाव भी है। 

00:50:29.540 --> 00:50:35.916
मोक्ष हुआ नहीं है पूरा। तो साधक को भी ऐसे
भाव आते हैं। शुभभाव आते हैं, अरे!

00:50:35.940 --> 00:50:41.416
अरे! अशुभ भी आते हैं, नीचे, चौथे, पाँचवें
गुणस्थान में, रौद्र ध्यान भी होता है।

00:50:41.440 --> 00:50:47.016
पंचम गुणस्थान तक रौद्र ध्यान कहा है।
तो भी सम्यग्दर्शन का बाधक नहीं होता।

00:50:47.040 --> 00:50:54.256
चारित्र का बाधक है। चारित्र में बाधक है,
घातक है जरूर, राग चारित्र को घातता है।

00:50:54.280 --> 00:51:00.776
और 'राग मेरा' तो सम्यग्दर्शन का घात हो गया। 

00:51:00.800 --> 00:51:10.936
राजपाट में हो बाहर के पुण्य के कारण से,
पूर्व के पुण्य बंधे हों तो राजा हो जाये। 

00:51:10.960 --> 00:51:18.136
अरे! चक्रवर्ती हो जाये। भरत महाराजा प्रति समय 
निर्जरा रत। ६०००० वर्ष तक लड़ाई में गये

00:51:18.160 --> 00:51:21.936
और पिता की ओमकार ध्वनि सुनने नहीं गये।

00:51:21.960 --> 00:51:26.616
सुनने नहीं गये अर्थात् अपने कालक्रम में 
वह भाव आता है।

00:51:26.640 --> 00:51:35.016
उसका स्वयं स्वकाल और स्वभाव वह प्रकट होता है
पर्याय का, आहाहा! उसे आत्मा नहीं करता।

00:51:35.040 --> 00:51:42.216
वह ज्ञात होता है लेकिन उसे जानता नहीं है। वह तो
जाननहार को जानता है। ऐसे अंदर के खेल हैं।

00:51:42.240 --> 00:51:46.236
मुमुक्षु: आपने एक बात बताई थी
इष्टोपदेश में, इष्टोपदेश में।

00:51:46.260 --> 00:51:53.916
पू. लालचंदभाई: देखता है लेकिन देखता नहीं, जानता है तो भी
जानता नहीं, चलता है तो भी चलता नहीं।

00:51:53.940 --> 00:51:57.376
यह अंदर की रमत है,
रूखे परिणाम हो गये हैं भाई!

00:51:57.400 --> 00:52:04.296
उसके परिणाम में चिकनाई, मिथ्यात्व की चिकनाई निकल
गयी है। तेल का मर्दन निकाल दिया है उसने।

00:52:04.320 --> 00:52:12.216
धूल चिपकती नहीं है। 
उसके लिये एक उदाहरण बहुत सुंदर,
छोटी उम्र की बात करता हूँ।

00:52:12.240 --> 00:52:18.576
आठ, दस वर्ष की उम्र होगी, उसमें दूसरे अन्यमति के
बच्चों के साथ पढ़ते हों तो बात-चीत करते हैं न,

00:52:18.600 --> 00:52:24.056
उसमें एक लड़का बारह-चौदह वर्ष का
आया और बात करने लगा, मैंने सुनी बात,

00:52:24.080 --> 00:52:35.696
ऐसी बात की कि कृष्ण महाराज हैं न
तो उनकी १६००० स्त्री हैं, रानी।

00:52:35.720 --> 00:52:41.716
फिर उन्हें एक विचार आया कि
ये गंगा नदी के सामने किनारे पर एक ऋषि हैं

00:52:41.740 --> 00:52:47.656
तो उन्हें तुम ये भोजन दे आओ। तो सेवक को
बुलाया। लड्डू का थाल भरा हुआ संपूर्णतया।

00:52:47.680 --> 00:52:53.856
तो सेवक ने कहा कि साहेब!
यह गंगा नदी किस तरह से पार करूं मैं?

00:52:53.880 --> 00:52:59.696
दोनों किनारों पर पानी जाता है, पुल तो है नहीं।
तो कहा, नदी किनारे जाकर कहना

00:52:59.720 --> 00:53:07.796
कि कृष्ण महाराज सदा ब्रह्मचारी हों,
सदा, हों! अष्टमी चौदस नहीं। सदा ब्रह्मचारी हों

00:53:07.820 --> 00:53:13.736
तो तू मार्ग देना। इसे लगा कि ऐसे गप्पे मारते हैं,
उसमें कहीं नदी मार्ग देगी?

00:53:13.760 --> 00:53:19.616
लेकिन बोला जाये कैसे? राजा के सामने बोला नहीं जाता।
जी महाराज! चल दिया थाल लेकर।

00:53:19.640 --> 00:53:27.976
और जैसा कहा था वैसा बोला। और फट से मार्ग
हो गया और चला गया सामने किनारे पर,

00:53:28.000 --> 00:53:33.656
और ऋषि महाराज को भोजन कराया। 
ऋषि महाराज ओ.. डकार मारते थे।

00:53:33.680 --> 00:53:40.256
ऋषि महाराज मुझे सामने किनारे पर जाना है किसतरह से जाऊँ? 
दोनों किनारों पर नदी बह रही है। (नदी वापस एक हो गई थी।)

00:53:40.280 --> 00:53:45.216
तो कहा, हाँ यह बात तेरी सत्य है।
जा नदी किनारे जाकर कहना 

00:53:45.240 --> 00:53:48.436
कि यदि ऋषि सदा उपवासी हों तो मार्ग देना।

00:53:48.460 --> 00:53:57.236
अरे! लेकिन ये लड्डू सामने खाए हैं, झपट्टा
मारा है, हें! यह तो उदाहरण है, हों !

00:53:57.260 --> 00:54:03.636
यह तो दृष्टांत है। कितना अंदर में रूखापना
होता है, साक्षीभाव कितना प्रकट होता है,

00:54:03.660 --> 00:54:09.076
इसका उदाहरण है। और गया, समझे गये?
मार्ग हो गया। चला गया।

00:54:09.100 --> 00:54:15.896
वह आया राजा के पास, आहाहा!
आज तो चमत्कार हुआ। मुझे तो बैठता नहीं था 
लेकिन आपके सामने बोला नहीं जाता।

00:54:15.920 --> 00:54:25.856
आपने ऐसा कहा और उन्होंने भी ऐसा कहा।
नदी मार्ग देती है। 
ऐसी अंदर की रमत है। आहाहा!

00:54:25.880 --> 00:54:33.216
प्रति समय निर्जरा होती है। बंध अल्प होता है
उसे गौण करके बंध नहीं होता ऐसा भी

00:54:33.240 --> 00:54:41.636
दृष्टि की मुख्यता से कहा जाता है। होता है बंध थोड़ा।
बंध तो होता है। अनंत बंध का कारण नहीं है,

00:54:41.660 --> 00:54:51.096
थोड़ा अल्प बंध होता है। नफा ज्यादा और
नुकसानी कम। अंदर के भेदज्ञान की
ये सभी बातें हैं।

00:54:51.120 --> 00:55:00.536
इष्टोपदेश में बहुत सुंदर है - देखता है पर देखता
नहीं, चलता है पर चलता नहीं, आहाहा!

00:55:00.560 --> 00:55:08.836
मुमुक्षु: आबाल-गोपाल सभी को, स्वयं ही
जानने में आ रहा है, बैठती क्यों नहीं ये बात?

00:55:08.860 --> 00:55:18.016
पू. लालचंदभाई: बिठाता नहीं है स्वयं इसलिए। स्वयं बिठाता
नहीं है। स्वयं बिठाता नहीं है, बस। 

00:55:18.040 --> 00:55:23.176
उसे ऐसा विश्वास नहीं आता, गहराई से
विचार नहीं किया ऐसा हो सकता है या क्या?

00:55:23.200 --> 00:55:27.696
थोड़ा गहराई से विचार करे तो
हो सकता है, इतना तो आ जाये।

00:55:27.720 --> 00:55:39.176
प्रकाश है तो सूर्य को प्रसिद्ध करता है,
भले सूर्य न दिखा हो
तो भी अनुमान में आ जाता है।

00:55:39.200 --> 00:55:43.596
प्रकाश है तो प्रकाशक (तो) होना (चाहिए)।
पर्याय है तो द्रव्य होना चाहिए। 

00:55:43.620 --> 00:55:47.336
यहाँ ज्ञान प्रकट होता है तो
ज्ञायक द्रव्य होना चाहिए।

00:55:47.360 --> 00:55:55.656
इसप्रकार अनुमान करके भी जरा, जरा अंदर में
आगे बढ़े तो विश्वास आने लगे,
ओहो! बात तो सत्य है।

00:55:55.680 --> 00:56:04.456
मुमुक्षु: बारंबार ऐसा विश्वास करना?
पू. लालचंदभाई: विश्वास करना चाहिए। आहाहा!

00:56:04.480 --> 00:56:10.496
अब एक ज्योतिषी पांच रूपये लेकर
ज्योतिष देख देता है।

00:56:10.520 --> 00:56:14.976
उसके ऊपर विश्वास है और बहुत प्रशंसा
लिखी हो तो पांच के बदले दस रूपया दे देता है।

00:56:15.000 --> 00:56:19.016
अब ये बड़े सर्वज्ञ भगवान
ज्योतिषी त्रिकाल वेत्ता,

00:56:19.040 --> 00:56:25.696
वे लिखते हैं कि तेरे ज्ञान में आत्मा जानने में आता है,
जा। आहाहा! उन ज्योतिषी को मानता नहीं है।

00:56:25.720 --> 00:56:31.136
वह ज्योतिष देख दे उसे, पाँच रूपये कहे
हों लेकिन यदि बहुत अच्छा लिखा हो,

00:56:31.160 --> 00:56:34.476
जाओ ज्योतिष महाराज तुम्हें
दस रुपया इनाम देता हूँ।

00:56:34.500 --> 00:56:40.456
लेकिन ये त्रिकाल वेत्ता सर्वज्ञ भगवान, अफर।

00:56:40.480 --> 00:56:45.896
वह (ज्योतिष का कहा हुआ) तो हो या न हो, वह तो
समझने जैसा है। समझने जैसा है। 

00:56:45.920 --> 00:56:50.416
लेकिन ये तो अफर। होता है, होता है और होता ही है। आहाहा!

00:56:50.440 --> 00:56:59.636
अब यह (लकड़ी) जानने में आती है इसका पूरा विश्वास है।
मैं ऐसा कहता हूँ कि यह लकड़ी है या कुत्ता है?

00:56:59.660 --> 00:57:04.856
सभी कहेंगे कि लकड़ी, लकड़ी, लकड़ी ही जानने में आती है,
कुत्ता नहीं है यह। लकड़ी है।

00:57:04.880 --> 00:57:08.336
लेकिन यह जानने में आती है या ज्ञान जानने में आता है?
वहाँ आपत्ति बड़ी। 

00:57:08.360 --> 00:57:17.736
ऊर्ध्वरूप से ज्ञान ज्ञान को जाने बिना
लकड़ी को जान सकता ही नहीं। 

00:57:17.760 --> 00:57:22.936
जैसे कि क्रोध आया, तो क्रोध आया तो
क्रोध तो क्रोध को जानता नहीं।

00:57:22.960 --> 00:57:25.976
तो क्रोध को जाननेवाला ज्ञान क्रोध से भिन्न है।

00:57:26.000 --> 00:57:30.936
तो ज्ञान ने ज्ञान को जानकर क्रोध को जाना या
ज्ञान को जाने बिना क्रोध को जाना।

00:57:30.960 --> 00:57:32.796
न्याय समझ में आता है कुछ?

00:57:32.820 --> 00:57:39.736
ज्ञान ज्ञान को जाने बिना क्रोध को जानता है
या ज्ञान ज्ञान को जानकर क्रोध को जानता है?

00:57:39.760 --> 00:57:44.376
तो अब क्रोध जानने में आता है,
उसके बदले ज्ञान ज्ञान को जानता है,

00:57:44.400 --> 00:57:50.336
क्रोध के ऊपर से थोड़ा खिसक जाओ और इसकी तरफ
आ जाओ तो काम हो जाये। आसान है, 

00:57:50.360 --> 00:57:52.776
मुश्किल नहीं है। धर्म कठिन नहीं है। 

00:57:52.800 --> 00:58:02.336
ज्ञान ज्ञान को जानकर ही क्रोध को जानता है।
ज्ञान ज्ञान को न जाने तो तो जड़ हो गया।

00:58:02.360 --> 00:58:11.516
ज्ञान ज्ञान को जानता है।
सूर्य का प्रकाश प्रकाश को भी प्रकाशित करता है
और घट को भी प्रकशित करता है।

00:58:11.540 --> 00:58:18.456
घट को प्रकाशे और प्रकाश पर्याय उसे न
प्रकाशे तो तो अँधेरा कहलाये। उदाहरण समझ में आता है?

00:58:18.480 --> 00:58:20.216
सूर्य की बात तो जाने दो

00:58:20.240 --> 00:58:25.936
लेकिन उसका प्रकाश हुआ वह प्रकाश प्रकाश को
प्रसिद्ध करते हुए मकान को प्रसिद्ध करता है। 

00:58:25.960 --> 00:58:32.776
प्रकाश प्रकाश को प्रसिद्ध न करे, प्रकाशे नहीं
और मकान को प्रकाशे ऐसा कभी भी नहीं बनता।

00:58:32.800 --> 00:58:34.896
तो यह प्रकाश नहीं अंधकार हो जाता है।

00:58:34.920 --> 00:58:40.376
उसीप्रकार उपयोग में उपयोग है। उपयोग में उपयोग,
ज्ञान में ज्ञान ज्ञात होता है।

00:58:40.400 --> 00:58:43.256
ज्ञान ज्ञान को जानकर क्रोध को जानता है। 

00:58:43.280 --> 00:58:48.936
ज्ञान ज्ञान को जानना छोड़ दे तो क्रोध को
जान ही न सके। तो जड़ हो जाये। 

00:58:48.960 --> 00:58:55.556
वहाँ ले ना स्व-परप्रकाशक। ले ना वहाँ
स्व-परप्रकाशक चाहिए ना तुझे? ले न अंदर में।

00:58:55.580 --> 00:59:10.856
आहाहा! ऊर्ध्वरूप से आत्मा ज्ञात होता है।
श्रीमद्जी ने कहा है, ऊर्ध्वपने आत्मा ज्ञात होता है।
आहाहा!

00:59:10.880 --> 00:59:16.216
श्रीमद्जी के चरणों में झुकते हैं सभी,
(किन्तु) उनका लिखा हुआ नहीं मानते।

00:59:16.240 --> 00:59:27.176
<b>घट-पट आदि जान तू, तातें उनको मान;
जाननहार को जान नहीं, यह कैसा तेरा ज्ञान?</b>
(आत्मसिद्धि शास्त्र, गाथा ५५)

00:59:27.200 --> 00:59:31.856
आहाहा! उन्हें यह कहना है। कि घड़ा जानने में नहीं आता,
तेरा ज्ञान जानने में आता है।

00:59:31.880 --> 00:59:36.336
तो जाननेवाले को तो जानता नहीं है।
और यह घड़ा है, यह है, यह है, यह है।

00:59:36.360 --> 00:59:43.816
इसप्रकार अनंतकाल से पर्याय की बहिर्मुखता
रह गयी है, उसमें अनुभव नहीं होता।

00:59:43.840 --> 00:59:44.864