﻿WEBVTT

00:01:08.920 --> 00:01:30.993
<b>बाबूजी युगल किशोर जी:-</b> हमारे विशिष्ट अतिथि
महोदय माननीय श्री कमिश्नर साहब,
हमारे सम्माननीय अतिथि श्री जिलाधीश महोदय,

00:01:31.017 --> 00:01:43.677
मंच पर विराजमान हमारे विद्वतगण
एवं विशिष्ट सज्जनों, माताओं एवं बहनों।

00:01:43.700 --> 00:01:58.358
भिंड का ये लोकोत्तर अनुष्ठान
आज समापन के बिन्दु पर है।

00:01:58.389 --> 00:02:14.576
कोई चाहता तो नहीं है कि ऐसे अनुष्ठान का
समापन हो और आशा भी ऐसी ही की जाती है

00:02:14.615 --> 00:02:19.612
कि भले ही इस रूप में इसका समापन हो जाए

00:02:19.637 --> 00:02:33.080
लेकिन आप इसका कभी समापन नहीं करेंगे -
ऐसा विश्वास लेकर आदरणीय
श्री लालचंदभाई आपसे विदा लेंगे।

00:02:33.119 --> 00:02:55.907
यह एक सुयोग ही समझिये भिंड का
कि शिकोहाबाद से विहार करता-करता
ये शिविर भिंड में आ गया।

00:02:55.930 --> 00:03:12.852
मुझे ऐसा लगा कि अनायास ही भिंड की
एक अकल्पित लॉटरी खुल गई।

00:03:12.883 --> 00:03:24.666
आदरणीय श्री लालचंदभाई को बहुत लोगों
ने पहले देखा भी नहीं था, सुना भी नहीं था

00:03:24.681 --> 00:03:30.486
और जो सुना था वह उन्होंने स्वयं
आपको बताया है कि क्या सुना था।

00:03:30.511 --> 00:03:38.150
कि वे जो बोलेंगे उसे लोग
समझ नहीं पायेंगे - ऐसा सुना था।

00:03:38.166 --> 00:03:54.504
लेकिन यहाँ पाया यह गया
कि वे जो बोले उसको सबके सब लोग
पी गए और फिर भी प्यासे रहे।

00:03:54.528 --> 00:04:11.459
सचमुच लालचंदभाई हमारे इस वर्तमान
अध्यात्म-युग के श्रेष्ठ व्यक्तित्व हैं।

00:04:11.484 --> 00:04:28.620
मैं तो इस बात को अकेले में भी सोचता हूँ
कि पूज्य गुरुदेव हमारे बीच से चले गए
जैसे अनायास ही चले गए।

00:04:28.659 --> 00:04:38.575
किसी को ये आशा नहीं थी,
किसी का मन भी यह नहीं करता था
कि गुरुदेव चले जाएँ; लेकिन वे चले गए।

00:04:38.646 --> 00:04:51.783
और यह एक समस्या सी बन गई थी
कि अब गुरुदेव की जो वाणी है

00:04:51.822 --> 00:04:59.104
और उस वाणी का जो हार्द है, उसका
जो मर्म है, वो हमें कैसे मिलेगा?

00:04:59.129 --> 00:05:10.070
लेकिन मुझे लगता है कि भारत का
भाग्य सिर्फ लालचंदभाई के रूप में बच गया!

00:05:10.095 --> 00:05:20.795
और पूज्य गुरुदेव
सिर्फ लालचंदभाई के पास सुरक्षित रह गए।

00:05:20.820 --> 00:05:35.177
आज अध्यात्म के नाम पर सुनते
तो हम बहुत हैं। आपने भी बहुत सुना होगा
और बहुत सुनेंगे आप।

00:05:35.202 --> 00:05:40.261
लेकिन अभी इस एक सप्ताह में
आपने जो सुना है,

00:05:40.286 --> 00:05:49.661
उसमें सभी लोगों ने यह अनुभव किया है
कि यह जो सुना है
वह हमने पहले कभी नहीं सुना (था)।

00:05:49.686 --> 00:05:55.615
सचमुच गुरुदेव का हार्द यही था,
उनका हृदय यही था।

00:05:55.638 --> 00:06:08.808
और उन्होंने आगम के सागर को
अपनी स्वयंबुद्धता से मथकर
जो मोती निकाले थे, जो रत्न निकाले थे,

00:06:08.832 --> 00:06:24.074
आज सचमुच यदि लालचंदभाई नहीं होते
तो मैं आपको सत्य कहता हूँ कि
वे मोती हमको उपलब्ध नहीं होते।

00:06:24.128 --> 00:06:37.808
अध्यात्म की बात करना कोई एक बात है,
लेकिन सचमुच अध्यात्म तो एक लोकोत्तर पथ है।

00:06:37.833 --> 00:06:48.326
और उस लोकोत्तर पथ का जो गंतव्य है,
मुक्ति (वह) कैसे उपलब्ध होती है,
उसकी कला क्या है

00:06:48.349 --> 00:06:52.191
- वह किसी विरल व्यक्ति के पास होती है।

00:06:52.216 --> 00:06:58.757
आज का जो युग है,
वो तो आप देखते हैं - अत्यंत निकृष्ट है।

00:06:58.782 --> 00:07:05.318
स्वयं तत्त्वज्ञान की बात करनेवाले भी
एक मत नहीं हो पाते।

00:07:05.343 --> 00:07:16.372
लेकिन यह जो लोकोत्तर पथ है
और उसका जो मर्म है, यदि सचमुच वो
हमारे हृदय में प्रविष्ट हो जाता है,

00:07:16.397 --> 00:07:26.701
स्थापित हो जाता है तो इसमें संदेह नहीं
कि एक नहीं वो अनंत पूरे कर देता है।
उसमें इतनी ताकत है।

00:07:26.726 --> 00:07:39.703
ये ऐसा व्यक्तित्व है लालचंदभाई के
रूप में, कि यदि इस समय हम उनको थोड़े
समय के लिए गौण करके देखते हैं

00:07:39.728 --> 00:07:49.016
- तो ऐसा लगता है कि
गुरुदेव के अध्यात्म को कहनेवाला
जैसे कोई नहीं है - ऐसा लगता है।

00:07:49.041 --> 00:08:05.353
आवश्यकता इस बात की है कि आज अपने
भीतर संचित जिन निधानों को वे हमें लुटा
रहे हैं, हम जितना लूट सकें लूट लें।

00:08:05.378 --> 00:08:14.503
शिविर हुआ है, भिंड का।
मैं तो आपको कहना चाहता हूँ

00:08:14.528 --> 00:08:30.599
कि सचमुच लालचंदभाई के
इस विस्मयात्मक पदार्पण से भिंड में
एक जैनदर्शन भवन का शिलान्यास हुआ है

00:08:30.624 --> 00:08:41.311
और उस भवन की नींव के दो पत्थर
उन्होंने स्थापित किये हैं, रखे हैं,
उस शिलान्यास में;

00:08:41.336 --> 00:08:51.877
पहला ये कि <b>आत्मा अकर्ता है </b>
और दूसरा ये कि <b>आत्मा पर को जानता नहीं। </b>

00:08:51.902 --> 00:09:02.077
अब इस भवन के शिलान्यास के बाद इसका बहुत
बड़ा उत्तरदायित्व हमारे ऊपर आ पड़ा है

00:09:02.102 --> 00:09:12.979
और हम हर कीमत पर, अपने हर प्रयत्न से
उस भवन को पूरा कर पाएँ
- ऐसी शक्ति हमें लालचंदभाई से मिले,

00:09:13.004 --> 00:09:20.213
ऐसी शक्ति उनके द्वारा बताए (हुए) उस ज्ञायक
से हमें मिले, ये भावना हमारी निरंतर रहे।

00:09:20.238 --> 00:09:26.077
सचमुच उन्हें दोबारा यदि हम बुलाना चाहते
हैं तो इस भवन को हम तैयार कर लें।

00:09:26.102 --> 00:09:35.102
और उनकी सबसे बड़ी, उनके प्रति
जो सबसे बड़ा सम्मान है, वह केवल यही है

00:09:35.127 --> 00:09:42.731
कि उनकी वाणी, उनकी अजस्र वाग्धारा
वो हमारे भीतर सुरक्षित हो जाये,

00:09:42.756 --> 00:09:54.654
उस पर हमारा अधिकार हो जाए
और वह हमारे जीवन के लिए
एक मंगलदायिनी औषधि बन जाए।

00:09:54.679 --> 00:10:04.108
सारा ही भिंड समाज कितना पुलकित था, कितना
प्रसन्न था, यह एक सबसे बड़ी विशेषता थी।

00:10:04.133 --> 00:10:11.515
शिविर तो होते हैं और हम देखते भी हैं,
पर यहाँ की एक सबसे बड़ी विशेषता ये देखी थी

00:10:11.540 --> 00:10:22.373
कि आबाल-वृद्ध सारा महिला समाज,
सारा पुरुष समाज जब उठता था वो सुनकर
तो वह प्रसन्न-वदन नजर आता था।

00:10:22.431 --> 00:10:33.196
इसका अर्थ यह है कि उनको लगता था
कि कुछ ऐसा मिला है, जो पहले कभी
नहीं मिला। ये उसका परिचायक है।

00:10:33.221 --> 00:10:39.959
हम, आप सभी मिलकर सम्मान करते हैं
उस महान व्यक्तित्व का

00:10:39.983 --> 00:10:54.338
और हम तो ये भावना करते हैं, ये आग्रह
करते हैं हमारे भीतर कि वे हमारे
बीच ही रहें और उनका निर्वाण न हो।

00:10:54.362 --> 00:11:05.000
उनका निर्वाण तो उनके लिए सुखद होगा,
लेकिन हमारी भावना की सफलता ये है
कि वे हमारे बीच रहकर

00:11:05.025 --> 00:11:12.377
सदैव पूज्य गुरुदेव के इस तत्त्व का,
तीर्थंकरों के इस तत्त्व का उद्घोष

00:11:12.411 --> 00:11:21.286
इस भारतवर्ष के बीच में, बल्कि
इस भारत के बाहर भी ये तत्त्व पहुँचे
- ऐसी मंगल कामना हम करें

00:11:21.311 --> 00:11:25.690
और यही उनका सबसे बड़ा अभिनंदन होगा।

00:11:25.715 --> 00:11:32.677
जो तत्त्व उन्होंने दिया है उसका आप
पालन-पोषण करें, उसको आप परिपुष्ट करें

00:11:32.702 --> 00:11:37.958
- आप और हम सभी,
मैं भी कोई न्यारा नहीं हूँ।
सभी हम उसको परिपुष्ट करें

00:11:37.983 --> 00:11:49.825
और उसके द्वारा हम अपना कल्याण करें
और समाज को भी खुलकर वो तत्त्व हम दें
तो सच में समाज भी बहुत उपकृत होगा।

00:11:49.850 --> 00:11:57.406
मैं पुनः पुनः इस महान व्यक्तित्व के प्रति
अपनी श्रद्धांजलियाँ समर्पित करता हूँ।

00:19:43.846 --> 00:20:04.530
<b>पूज्य श्री लालचंदभाई:-</b> मंगलाचरण

00:20:04.554 --> 00:20:17.513
ये आप लोग सब मेरा सम्मान करवा रहे हैं....
गुजराती भाषा है मेरी।

00:20:17.537 --> 00:20:33.604
आप सब लोग जो मेरा सम्मान कर रहे हैं,
वो सब का सब सम्मान मैं गुरुदेव के
चरणों में समर्पित करता हूँ।

00:20:33.629 --> 00:20:43.771
ये सब उनकी देन है।
जो कुछ मैंने जाना और जानकर कहा

00:20:43.796 --> 00:20:51.946
वो सब परम उपकारी पूज्य गुरुदेव श्री
की ही देन है, हमारा कुछ माल नहीं है।

00:20:51.971 --> 00:20:59.116
हम तो उनके प्रतिनिधि (agent) हैं,
transfer (स्थानांतरण) करता हूँ। वो जो
कहते हैं उसको मैं transfer कर देता हूँ।

00:20:59.140 --> 00:21:02.935
मुमुक्षु:- बोलो कहान गुरुदेव की जय हो!

00:21:02.960 --> 00:21:08.676
<b>पूज्य श्री लालचंदभाई:-</b> ये गुरुदेव हैं,
विराजमान ऊपर। आहाहा!

00:21:08.699 --> 00:21:16.428
मूल बात ये है, प्रयोजनभूत बात ये है....
सबके लिए है, जीव मात्र के लिए है

00:21:16.472 --> 00:21:24.508
कि आत्मा का स्वभाव है ज्ञान
और ज्ञान का स्वभाव जानना है।

00:21:24.508 --> 00:21:38.203
यहाँ तक सबके पास ज्ञान तो आ गया।
जानना तो करते हैं सब, जानना-जानना-जानना
मगर ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

00:21:38.266 --> 00:21:47.824
ज्ञान का सदुपयोग दुख के नाश का उपाय है,
सुख का उपाय है - आत्मिक सुख का उपाय है।

00:21:47.849 --> 00:21:52.181
और ज्ञान का जो दुरुपयोग करता है
वो दुख का कारण है।

00:21:52.206 --> 00:21:59.519
ज्ञान का दुरुपयोग क्या?
कि आत्मा का स्वभाव ज्ञान और
ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना था,

00:21:59.558 --> 00:22:05.509
वो भूलकर अपने ज्ञान से
पर को जानते-जानते....

00:22:05.533 --> 00:22:12.236
वो जानने से
ममत्व (अर्थात्) मोह-राग और द्वेष
सारा संसार खड़ा हो जाता है।

00:22:12.283 --> 00:22:21.531
उससे व्यावृत्त होकर जो ज्ञान जिसका है,
आत्मा का है उस ज्ञान के द्वारा
अपने आत्मा को जानने से,

00:22:21.556 --> 00:22:30.279
अनुभव करने से, आत्मिक अतीन्द्रिय आनंद की
अभी (ही) प्राप्ति हो जाती है
और बढ़कर पूर्ण आनंद की प्राप्ति होती है।

00:22:30.304 --> 00:22:35.440
तो ज्ञान का सदुपयोग करना,
दुरुपयोग करना बंद कर देना।

00:22:35.465 --> 00:22:40.874
दुरुपयोग यानि पर को जानना
वो दुरुपयोग है; वो सदुपयोग नहीं है।

00:22:40.898 --> 00:22:52.820
और दुरुपयोग से दुख ही दुख आता है,
मोह-राग-द्वेष, क्रोध-मान-माया-लोभ,
ऐसे सारा संसार उत्पन्न हो जाता है।

00:22:52.845 --> 00:22:59.820
इसलिए आत्मा का स्वभाव ज्ञान
और ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना।

00:22:59.845 --> 00:23:12.762
मात्र आत्मा को जानना,
ऐसे जानने से भव का अंत आ जाता है
और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।