﻿WEBVTT

00:03:03.800 --> 00:03:07.816
श्री प्रवचनसारजी शास्त्र।

00:03:07.840 --> 00:03:13.416
उसकी जयसेन आचार्य भगवान की टीका।

00:03:13.440 --> 00:03:17.776
गाथा नंबर ८०। उसकी टीका।

00:03:17.800 --> 00:03:34.520
<b>जो जाणदि अरहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं।
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं ॥८०॥ </b>

00:03:34.540 --> 00:03:38.456
एक-एक का अर्थ करते हैं।

00:03:38.480 --> 00:03:55.136
<b>जो जाणदि अरहंतं</b> उसका अर्थ करते हैं।
<b>य: कर्ता जानाति।</b>
जो जानता है उसे कर्ता कहने में आता है।

00:03:55.160 --> 00:04:08.976
<b>कम्। अर्हन्तम्। कै: कृत्वा।
दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं द्रव्यत्वगुणत्वपर्यायत्वैः।</b>

00:04:09.000 --> 00:04:17.216
अरिहंत को द्रव्यपने, अरिहंत को गुणपने,
अरिहंत को पर्यायपने, <b>सो जाणदि अप्पाणं।</b>

00:04:17.240 --> 00:04:32.936
जो कोई जीव अरिहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय
को जानता है ऐसा जीव,
<b>स पुरुषोऽर्हत्परिज्ञानात्पशचादात्मनं जानाति</b>

00:04:32.960 --> 00:04:46.376
जो कोई भव्य आत्मा- लायक जीव,
पहले अरहंत के द्रव्य को, अरहंत के गुणों को
और अरहंत की पर्याय को जानता है

00:04:46.400 --> 00:04:56.216
कि अरिहंत का द्रव्य परिपूर्ण है,
नित्य निरावरण है, अबद्ध है;

00:04:56.240 --> 00:05:02.336
इसप्रकार उनके द्रव्यस्वभाव को
परिपूर्ण जो है, ऐसा जानता है

00:05:02.360 --> 00:05:09.216
और उनके गुण ज्ञानादि वे भी परिपूर्ण हैं
पारिणामिक भाव से, ऐसा जानता है

00:05:09.240 --> 00:05:16.816
और उनकी पर्याय परिपूर्ण केवलज्ञान,
केवलदर्शन जिनको प्रगट हो गया है।

00:05:16.840 --> 00:05:23.176
ऐसी परिपूर्ण पर्याय जिसमें
जानना-जानना-जानना-जानना धारावाही है,

00:05:23.200 --> 00:05:37.216
इसप्रकार अरहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को जानकर
पश्चात् मैं भी उनके जैसा ही हूँ।

00:05:37.240 --> 00:05:45.376
<b>(सो) जाणदि अप्पाणं।</b>
मैं भी उन अरहंत के द्रव्यपने- जैसा उनका द्रव्य है
ऐसा मेरा द्रव्य है।

00:05:45.400 --> 00:05:48.576
उनके (जितने) गुण हैं उतने ही मेरे गुण हैं

00:05:48.600 --> 00:05:55.736
और उनकी पर्याय में जैसे जानना-जानना,
चेतना प्रगट होती है, ऐसे मेरी पर्याय में भी चेतना है।

00:05:55.760 --> 00:06:00.296
इसप्रकार द्रव्य, गुण, पर्याय को चेतनरूप जानता है।

00:06:00.320 --> 00:06:05.856
अरिहंत के द्रव्य में, गुण में या पर्याय में
कहीं भी राग-द्वेष नहीं है।

00:06:05.880 --> 00:06:10.576
तो मेरे परिणाम में भी
वास्तव में राग-द्वेष नहीं है।

00:06:10.600 --> 00:06:15.136
राग-द्वेष चेतन के परिणाम नहीं हैं।

00:06:15.160 --> 00:06:20.896
अगर वे राग-द्वेष अरिहंत की पर्याय में हों
तो ही मेरी पर्याय में होंगे।

00:06:20.920 --> 00:06:25.216
मैं तो उनके.., उनकी पर्याय के साथ
मैं अपनी पर्याय का मिलान करता हूँ।

00:06:25.240 --> 00:06:30.896
तो उनकी पर्याय में राग नहीं है- ऐसा जानकर
जब मैं अपनी पर्याय को जानता हूँ,

00:06:30.920 --> 00:06:36.456
तो मेरी पर्याय में ज्ञान-उपयोग दिखता है।
मेरी पर्याय में राग-द्वेष दिखता नहीं है।

00:06:36.480 --> 00:06:43.256
क्योंकि अरहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को जानकर
मैं भी उनके जैसा ही हूँ- ऐसे मिलान करता है।

00:06:43.280 --> 00:06:46.816
और जब मिलान हो जाता है
तब मोह का नाश हो जाता है।

00:06:46.840 --> 00:06:50.616
मुमुक्षु:- वाह, बहुत सुन्दर। मिलान करता है।

00:06:50.640 --> 00:06:55.176
उत्तर:- मिलान करता है और मिलान हो जाता है।
द्रव्य से मिलानपना है।

00:06:55.200 --> 00:07:01.016
वे चेतन हैं, मैं भी चेतन।
उनमें चैतन्य गुण, मेरे में भी चैतन्य गुण।

00:07:01.040 --> 00:07:06.936
उनमें भी चिद्विवर्तन-चेतना।
चेतना मतलब ज्ञान उपयोग।

00:07:06.960 --> 00:07:10.416
ऐसे ही मेरे में भी ज्ञान उपयोग होता है
प्रति समय।

00:07:10.440 --> 00:07:18.136
इसप्रकार अरहंत के द्रव्य, गुण और पर्याय
को जानकर अपने आत्मा का मिलान करता है,

00:07:18.160 --> 00:07:22.576
तो द्रव्य, गुण और पर्याय से
मिल जाता है आत्मा। अभी वर्तमान में।

00:07:22.600 --> 00:07:30.616
उनके जैसा ही मैं हूँ-
जब ऐसा जानता है, तब मोह क्षय होता है।

00:07:30.640 --> 00:07:38.056
उनकी पर्याय में राग नहीं है,
और यहाँ पर्याय में राग स्थापित करे,
तो मोह क्षय नहीं होगा।

00:07:38.080 --> 00:07:45.936
तो तो अरहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को
जानकर <b>पश्चात् </b>, मैं भी उनके जैसा ही हूँ-
ऐसा जानना चाहिए न?

00:07:45.960 --> 00:07:49.936
उनसे अलग नहीं पड़ना चाहिए।
मुमुक्षु:- उनसे अलग पड़े....

00:07:49.960 --> 00:07:55.696
उत्तर:- तो मोह क्षय नहीं होगा। ऐसा।
ये तो मोह क्षय- दर्शनमोह के
नाश का उपाय बताते हैं।

00:07:55.720 --> 00:08:12.216
<b>स पुरुषो </b> अर्थात् आत्मा, <b>ऽर्हत्परिज्ञानात्</b>
अरहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को परिपूर्णपने जानकर।

00:08:12.240 --> 00:08:18.656
<b>पश्चात्</b> फिर
अपने आत्मा को जो जानता है, आहाहा!

00:08:18.680 --> 00:08:24.936
<b>तत् पश्चात् आत्मानं जानाति</b> अपने
आत्मा को जानता है कि मैं भी उनके जैसा हूँ।

00:08:24.960 --> 00:08:31.696
अब, अरिहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को जानकर
अपने आत्मा को भी जब उनके जैसा जाना,

00:08:31.720 --> 00:08:42.656
तो उसके फल में क्या आया?
कि <b>मोहो खलु जादि तस्स लयं</b> आहाहा!

00:08:42.680 --> 00:08:50.056
उनको जानकर जब अपने आत्मा को
ऐसा ही जानता है, किंचित् मात्र अंतर नहीं है।

00:08:50.080 --> 00:09:00.016
जैसे अरहंत जाननहार हैं, ऐसे मैं भी जाननहार हूँ।
जैसे सिद्ध जाननहार ऐसे मैं भी जाननहार हूँ।
मिलान हो गया। पर्याय से मिलान हो गया।

00:09:00.040 --> 00:09:03.456
मुमुक्षु:- क्योंकि मिलान का काम तो
पर्याय में होता है न?
उत्तर:- पर्याय में होता है न?

00:09:03.480 --> 00:09:07.776
द्रव्य, गुण तो एकसमान हैं।
उसमें तो कोई वादविवाद है ही नहीं।

00:09:07.800 --> 00:09:11.216
और भूल भी पर्याय में हुई है न?

00:09:11.240 --> 00:09:15.936
पर्याय में ज्ञान उपयोग होने पर भी
पर्याय में राग होता है (ऐसा मानता है),
वह मोह का कारण हुआ।

00:09:15.960 --> 00:09:24.176
अब, पर्याय में राग नहीं होता,
पर्याय में ज्ञान होता है (ऐसा माने)
तो मोह की उत्पत्ति नहीं होगी।

00:09:24.200 --> 00:09:26.496
मुमुक्षु:- मतलब जैसा स्वरूप है
वैसा दिखा उसे।

00:09:26.520 --> 00:09:31.056
उत्तर:- बस! जैसा स्वरूप है,
एक यह अपने स्वरूप का नमूना दिया।

00:09:31.080 --> 00:09:35.296
मुमुक्षु:- वे प्रतिबिंब हैं।
उत्तर:- प्रतिबिम्ब हैं। उनको जानकर
मैं उनके जैसा हूँ, ऐसा जान।

00:09:35.320 --> 00:09:38.256
क्योंकि सीधा अपने आत्मा को
नहीं जान सकता था।

00:09:38.280 --> 00:09:42.856
अज्ञानी प्राणी अपने आत्मा को
सीधा नहीं जान सकता था।

00:09:42.880 --> 00:09:50.656
जिसप्रकार सोने का परीक्षक, अपरिक्षक को सिखाता है,

00:09:50.680 --> 00:09:57.296
तब कसौटी पर सौ टंच का सोना
उसे दिखाता है पहले, कि देख, यह नमूना।

00:09:57.320 --> 00:10:04.136
इसके साथ मेल खाए वो सोना।
इसके साथ ना मिले वो सोना नहीं है, मैला है।

00:10:04.160 --> 00:10:08.936
धोखा मत खाना, ध्यान रखना।
नमूना देता है, कसौटी पर।

00:10:08.960 --> 00:10:15.336
और ऐसे देखता जाता है, ऐसे देखता जाता है
उसके साथ नहीं मिलता तो कहता है, "नहीं,

00:10:15.360 --> 00:10:19.496
ये तो बारह वान है, दस वान है,
इसमें मिलावट है"। धोखा नहीं खाता।

00:10:19.520 --> 00:10:24.936
इसीप्रकार, अनादिकाल का अज्ञानी जीव
अपने स्वरूप को नहीं जानता।

00:10:24.960 --> 00:10:31.576
अब अपने स्वरूप को नहीं जानता..;
किन्तु अपना स्वरूप भले नहीं जानता,

00:10:31.600 --> 00:10:38.536
पर मेरे से पूर्व अपने स्वरूप को जानकर
परिपूर्ण परमात्मा हुए हैं अरिहंत,

00:10:38.560 --> 00:10:43.576
उनका स्वरूप तो मैं जानूँ।
फिर अपना स्वरूप जानूँ।

00:10:43.600 --> 00:10:48.136
तो अरहंत के द्रव्य, गुण और
पर्याय को जानता है प्रथम।

00:10:48.160 --> 00:10:53.936
देखो! जैनमत अनुयायी मिथ्यादृष्टि का
मोह क्षय होता है, ऐसा कहते हैं।

00:10:53.960 --> 00:11:02.376
जिसे अरहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय में भूल है,
(और) वह उनके जैसा अपने को मानता है,
(उसका) मोह क्षय नहीं होगा।

00:11:02.400 --> 00:11:11.096
अरिहंत को भूख लगती है और रोग होता है,
(मुमुक्षु:- उसकी तो बात ही नहीं है।)
मतलब उसे उन अरिहंत के स्वरूप के बारे में विपरीतता हुई।

00:11:11.120 --> 00:11:16.416
यह तो दिगम्बर जैन आचार्य भगवंतों ने
जो अरिहंत का स्वरूप लिखा,

00:11:16.440 --> 00:11:23.456
ऐसे ही अरहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को
जानता है। चेतन, चैतन्य और चिद्विवर्तन।

00:11:23.480 --> 00:11:30.336
चेतन द्रव्य, चैतन्य गुण और चेतना पर्याय।

00:11:30.360 --> 00:11:35.696
तो वहाँ भी चेतना है और
यहाँ भी चेतना ही है, आहाहा!

00:11:35.720 --> 00:11:41.136
वहाँ राग नहीं है ऐसे
यहाँ भी राग नहीं है, आहाहा!

00:11:41.160 --> 00:11:45.136
छद्मस्थ का आत्मा
अरिहंत के साथ मिल जाता है, बोलो!

00:11:45.160 --> 00:11:50.416
अरिहंत होने से पहले
अरिहंत के साथ समानपना आ जाता है।

00:11:50.440 --> 00:11:52.696
मुमुक्षु:- इसीलिए ही अरहंत हो जाता है न?

00:11:52.720 --> 00:12:02.376
उत्तर:- इसीलिए ही अरिहंत हो जाता है।
सम्यग्दर्शन होता है। मोह क्षय हो गया। आहाहा!

00:12:02.400 --> 00:12:08.296
बहुत ऊँची गाथा है। नमूना दिखाते हैं।
तुम किसके जैसे हो?

00:12:08.320 --> 00:12:12.976
उसने नहीं कहा?
एकबार दृष्टान्त दिया था मैंने।

00:12:13.000 --> 00:12:21.536
कि सिंह का बच्चा रास्ता भूलकर
घेटे-मेंढे में, भेड़-भेड़ में चला गया।

00:12:21.560 --> 00:12:25.136
भेड़ कहते हो ना? उनमें चला गया।
छोटा था इसलिए पता नहीं था,

00:12:25.160 --> 00:12:29.336
अतः उनके साथ (रहने लगा)।
वह ग्वाला भी उसे चराने लगा।
थोड़ा-थोड़ा बड़ा होने लगा।

00:12:29.360 --> 00:12:34.776
बड़ा होने लगा, तब एक दिन उस टीले पर
एक सिंह आया।

00:12:34.800 --> 00:12:41.096
अरे! ये मेरी जाति का बच्चा
इनमें कहाँ फस गया?

00:12:41.120 --> 00:12:47.576
मुमुक्षु:- भाई! कैसा है? हें! आहाहा!
भ्रम में वह उनके साथ (मिल गया)?
भेड़ के साथ (भेड़ जैसा) हो गया?

00:12:47.600 --> 00:12:51.936
उत्तर:- मैं भेड़ हो गया। भेड़ ही हूँ।
अपने स्वरूप को भूल गया।

00:12:51.960 --> 00:12:56.056
मैं सिंह हूँ। मैं शेर हूँ- ये भूल गया ना?

00:12:56.080 --> 00:13:01.616
हें, अच्छा! अपने आप से मालूम नहीं हुआ।

00:13:01.640 --> 00:13:05.936
शास्त्र में आता है कि या तो स्वयं से
या पर के उपदेश से। आता है न?

00:13:05.960 --> 00:13:09.856
खुद को अपने स्वरूप का
पता नहीं चला अपने आप से।

00:13:09.880 --> 00:13:18.376
उसी बीच टीले के ऊपर से दूर से सिंह ने देखा
इन भेड़ को, भेड़ों की टोली को और
उसमें मेरी जाति का सिंह! आहाहा!

00:13:18.400 --> 00:13:21.976
मुमुक्षु:- सबसे भिन्न पड़ता दिखा उसे।
उत्तर:- आहाहा! भिन्न पड़ता दिखा।

00:13:22.000 --> 00:13:28.976
लक्षण से उसे अलग कर दिया ना?
भेड़ कहाँ और सिंह कहाँ?
उसका तेज छिप सकता है कोई?

00:13:29.000 --> 00:13:36.336
अब इसे किस प्रकार छुड़ाना?
छुड़ाना है बच्चे को। फस गया है।

00:13:36.360 --> 00:13:46.456
पहले यहाँ से आवाज की। दहाड़ मारी।
वहाँ मूल तो जाति तो सिंह की थी न?

00:13:46.480 --> 00:13:49.616
हें, रोएँ बैठ गये, कि यह क्या?

00:13:49.640 --> 00:13:57.256
सिंह के बच्चे को उसकी भाषा में कहता है, (कि)
पहले मेरी ओर देख! उसके बाद ही अपनी ओर देख।

00:13:57.280 --> 00:14:05.296
उस सिंह के बच्चे ने ऐसे (सिंह को) देखा,
ऐसे देखकर ऐसे (स्वयं को) देखा।

00:14:05.320 --> 00:14:11.496
ऐसे जहाँ देखा वहाँ तो 'मैं सिंह हूँ' (ऐसी प्रतीति हो गई।)
कूदकर बाहर निकल गया।

00:14:11.520 --> 00:14:19.760
इसीप्रकार इस संसार में से बाहर निकलता है,
जब अरिहंत को देखकर
अपने स्वरूप को देखता है।

00:14:19.780 --> 00:14:27.096
आहाहा! अरिहंत कहते हैं कि तू मेरे सामने देख।
अरिहंत की वाणी में आया, दिव्यध्वनि में।

00:14:27.120 --> 00:14:30.816
तू पहले मेरे सामने देख और
फिर अपने सामने देख।

00:14:30.840 --> 00:14:39.336
मैं द्रव्य, गुण, पर्याय से शुद्ध हूँ।
तुम भी द्रव्य, गुण, पर्याय से ऐसे ही हो,
ज्ञानमय आत्मा हो। आहाहा!

00:14:39.360 --> 00:14:44.776
तेरे द्रव्य, गुण, पर्याय में और
मेरे द्रव्य, गुण, पर्याय में
किंचित् मात्र फर्क नहीं है।

00:14:44.800 --> 00:14:49.576
जो प्रगट उपयोग लक्षण है, चेतना।
चेतना प्रगट है।

00:14:49.600 --> 00:14:56.616
यहाँ भी चेतना है और वहाँ भी चेतना है।
चेतन और चैतन्य तो एकसमान हैं।

00:14:56.640 --> 00:14:59.320
मुमुक्षु:- पर शेर और शेर का बच्चा
एक सा ही होता है न!

00:14:59.340 --> 00:15:02.480
उत्तर:- एक सा ही होता है।
मुमुक्षु:- उसमें क्या फर्क होता है?
उत्तर:- कोई फर्क नहीं होता।

00:15:02.480 --> 00:15:11.016
इसलिए पहले वहाँ देखना। वहाँ देखकर,
अरे! ऐसे जहाँ देखा वहाँ
उसमें सिंह का वीर्य प्रगट हो गया।

00:15:11.040 --> 00:15:18.536
शक्ति तो थी। सिंह तो था ही।
लेकिन उन भेड़ों को देखकर (सिंह)वृत्ति दब गई थी।

00:15:18.560 --> 00:15:22.936
तिरोभूत हो गई थी वृत्ति।
और ऐसे (सिंह को) जहाँ देखा
और ऐसे (स्वयं को) देखा अरे!

00:15:22.960 --> 00:15:28.016
छलांग मारी हों!
छलांग मारकर निकल गया बाहर।

00:15:28.040 --> 00:15:31.736
मुमुक्षु:- उसके पास पहुँच गया।
उत्तर:- उसके पास पहुँच गया। सिंह के पास, हों!

00:15:31.760 --> 00:15:37.696
उसके पास ही पहुंचे न वह तो।
उसने बुलाया इसलिए, हें?

00:15:37.720 --> 00:15:41.376
उसने बुलाया इसलिए उसके पास जाना चाहिए।
सिद्ध भगवान हमें बुलाते हैं।

00:15:41.400 --> 00:15:48.620
आओ आओ यह पद तुम्हारा है,
यह पद तुम्हारा है। आहाहा!

00:15:48.640 --> 00:15:51.296
मुमुक्षु:- सिंह तो था लेकिन सिंह का ख्याल आ गया।

00:15:51.320 --> 00:15:56.456
उत्तर:- हाँ। सिंह तो था ही।
पर अपने आप से ख्याल नहीं आता था।

00:15:56.480 --> 00:16:02.616
तो दूसरे के उपदेश से ख्याल आ गया।
फिर उसके पास चला गया।

00:16:02.640 --> 00:16:09.896
मुमुक्षु:- उसके पास ही जाये न।
भेड़ के पास रहे कोई?
उत्तर:- भेड़ के पास रहे कोई? आहाहा!

00:16:09.920 --> 00:16:14.616
वह तो बंधन में था, अब मुक्त हो गया।
वह बंधन में था। टोली में था न?

00:16:14.640 --> 00:16:22.896
उनके साथ आना-जाना, उसका ग्वाला जैसा चाहे ऐसा
करना पड़े, हें! अब तो मुक्त हो गया! खलास!

00:16:22.920 --> 00:16:31.416
ऐसे ही यह ८० नंबर की गाथा बहुत ऊँची है।
इस दृष्टान्त से बराबर ख्याल आ सकता है।

00:16:31.440 --> 00:16:40.656
वह दृष्टान्त है। उसमें सिद्धांत कहते हैं कि
पहले अरिहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को जान। आहाहा!

00:16:40.680 --> 00:16:46.776
और जानकर फिर.., वहाँ जानकर
वहाँ लक्ष्य में रुकना नहीं है।

00:16:46.800 --> 00:16:53.376
उन्हें जानते नहीं रहना है। उन्हें जानकर फिर
यहाँ (अपने को) जान। आहाहा!

00:16:53.400 --> 00:16:59.760
<b>स पुरुषोऽर्हत्परिज्ञानात्पश्चादात्मनं
जानाति</b>, हें?

00:16:59.780 --> 00:17:05.536
अरिहंत के द्रव्य, गुण, पर्याय को जानकर
फिर अपने आत्मा को जानता है।

00:17:05.560 --> 00:17:10.136
अब उसने अपने आत्मा को
जाना तो फल क्या आया?

00:17:10.160 --> 00:17:14.616
कि <b>मोहो खलु जादि तस्स लयं।</b> आहाहा!

00:17:14.640 --> 00:17:24.056
<b>तत आत्मपरिज्ञानात्तस्य मोहो</b> अर्थात्
<b>दर्शनमोहो लयं विनाशं क्षयं यातिती।</b>

00:17:24.080 --> 00:17:35.016
<b>विनाशं क्षयं यातीति ।</b> आहाहा!
कहते हैं, संस्कृत अपनी....चलती है गाड़ी!

00:17:35.040 --> 00:17:46.616
<b>तत आत्मपरिज्ञानात्तस्य</b>,आत्मा के...।
आत्मा का भान हुआ, आत्मा का ज्ञान हुआ,

00:17:46.640 --> 00:17:52.096
तो आत्मा का ज्ञान हुआ तो क्या हुआ?
<b>मोहो दर्शनमोहो लयं विनाशं।</b>

00:17:52.120 --> 00:17:57.936
दर्शनमोह- भाव दर्शनमोह और द्रव्य दर्शनमोह,
दोनों का नाश हो गया, खलास! क्षय हो गया।

00:17:57.960 --> 00:18:05.056
<b>विनाशं क्षयं यातीति ।</b> आहाहा!
उपशम नहीं। उपशम शब्द नहीं है। क्षयोपशम नहीं है।

00:18:05.080 --> 00:18:08.160
मुमुक्षु:- अब उसमें उपशम का क्या काम है?
उत्तर:- अब क्या काम है उपशम का?

00:18:08.180 --> 00:18:14.440
मुमुक्षु:- छलाँग मारकर भाग जाय फिर उसमें (वापस) आये?
उत्तर:- छलाँग मारकर, भाग गया। (वापस) आये ही नहीं। आहाहा!

00:18:14.464 --> 00:18:24.576
उस जीव का मोह अर्थात् भावमोह, दर्शनमोह,
मिथ्यात्व, अज्ञान नाश को प्राप्त हो जाता है।

00:18:24.600 --> 00:18:37.416
अब, द्रव्य, गुण और पर्याय कैसे होते हैं
उसका ज्ञान कराते हैं।

00:18:37.440 --> 00:18:47.136
पूर्वोक्त तो संक्षेप में, संक्षेप में
अन्वयार्थ के रूप में ले लिया।
हं, मूल में इतना है।

00:18:47.160 --> 00:18:57.176
<b>यो जानात्यर्हन्तं द्रव्यत्वगुणत्वपर्ययत्वैः ।
स जानात्यात्मानं मोहः खलु याति तस्य लयम् ॥ ८० ॥</b>

00:18:57.200 --> 00:19:04.376
वह जो ८० गाथा का है न? उतने का अर्थ हुआ।
अब टीका। गाथा का अर्थ हुआ।
अब टीका करते हैं स्वयं।

00:19:04.400 --> 00:19:09.736
मुमुक्षु:- गाथा के अर्थ में ही भाई!
कितना सुन्दर स्पष्ट करते हैं!
उत्तर:- गाथा के अर्थ में ही सब आ गया।

00:19:09.760 --> 00:19:14.536
गाथा के अर्थ में ही आ गया सब।
अब उसका विस्तार करते हैं।

00:19:14.560 --> 00:19:18.856
द्रव्य किसे कहते हैं?
गुण किसे कहते हैं? और
पर्याय किसे कहते हैं?

00:19:18.880 --> 00:19:21.576
ऐसे उसके तीन भाग करते हैं उसके लक्षण।

00:19:21.600 --> 00:19:28.336
द्रव्य का लक्षण, गुण का लक्षण
और पर्याय का लक्षण।
इसप्रकार तीन लक्षण से भिन्न करते हैं।

00:19:28.360 --> 00:19:44.776
<b>केवलज्ञानादयो विशेषगुणा</b>,
केवलज्ञान है वह आत्मा का विशेष, असाधारण गुण है।

00:19:44.800 --> 00:19:52.456
<b>अस्तित्वादय: सामान्यगुणा:</b>
अस्तित्व आदि सामान्य गुण हैं।

00:19:52.480 --> 00:19:59.976
ज्ञान है वह असाधारण गुण है।
<b>विशेषगुणा</b> अर्थात् असाधारण गुण है।
ज्ञान गुण आत्मा का।

00:20:00.000 --> 00:20:06.896
और अस्तित्व आदि वगैरह अस्तित्व,
वस्तुत्व आदि, वे सामान्य गुण हैं।

00:20:06.920 --> 00:20:17.216
ऐसा कहते हैं कि विशेष ज्ञान गुण है,
वह जीव में ही होता है, अन्य में नहीं होता।
उसे विशेष असाधारण गुण कहते हैं।

00:20:17.240 --> 00:20:21.656
और अस्तित्व, वस्तुत्व आदि जो गुण हैं
वे सामान्य गुण हैं।

00:20:21.680 --> 00:20:27.536
जीव में भी हैं और अन्य पाँच द्रव्यों में भी हैं।
अतः सामान्य गुण कहलाते हैं।

00:20:27.560 --> 00:20:41.256
आगे, <b>परमौदारिकशरीराकारेण
यदात्मप्रदेशानामवस्थानं स व्यंजनपर्याय:</b>

00:20:41.280 --> 00:20:49.856
परम औदारिक शरीर के कारण
<b>यदात्मप्रदेशानाम</b> जो प्रदेश का कंपन,

00:20:49.880 --> 00:20:56.216
प्रदेश का आकार <b>स्थानं स व्यंजनपर्याय:</b>
उसे व्यंजनपर्याय कहने में आता है।

00:20:56.240 --> 00:21:00.576
उसका अर्थ बराबर करो, देखो ये सही है?
मैंने तो यूं ही किया ऊपर से।

00:21:00.600 --> 00:21:06.896
मुमुक्षु:- <b>परमौदारिकशरीराकारेण</b>,
परम औदारिक शरीर के आकार

00:21:06.920 --> 00:21:08.236
उत्तर:- आकार वह जीव का आकार

00:21:08.260 --> 00:21:14.996
मुमुक्षु:- आकार प्रमाण <b>यदात्मप्रदेशानामवस्थानं
स व्यंजनपर्याय:</b> व्यंजनपर्याय की व्याख्या की।

00:21:15.020 --> 00:21:20.696
उत्तर:- व्यंजनपर्याय की व्याख्या (यह है) कि जैसा
शरीर परम औदारिक सिद्ध है
उस ही प्रकार की उसकी आकृति अभी है।

00:21:20.720 --> 00:21:24.416
तो उसे व्यंजनपर्याय कहा जाता है।
ये पर्याय का कहा।

00:21:24.440 --> 00:21:30.776
एक सामान्य, एक विशेष गुण कहा ज्ञान,
साधारण गुण अस्तित्व कहा और व्यंजनपर्याय।

00:21:30.800 --> 00:21:34.816
पर्याय में व्यंजनपर्याय ली।
जिसमें परम औदारिक शरीर निमित्त है।

00:21:34.840 --> 00:21:39.736
निमित्त के रूप में और नैमित्तिक के रूप में उसकी
व्यंजनपर्याय, प्रदेशत्व गुण के आकार ....

00:21:39.760 --> 00:21:43.216
मुमुक्षु:- उस प्रमाण में हीआत्मा का आकार है।
उत्तर:- उस ही प्रमाण में आत्मा का आकार है, ऐसा!

00:21:43.240 --> 00:21:49.656
<b>स व्यंजनपर्याय:</b> अब आगे,

00:21:49.680 --> 00:21:59.256
<b>अगुरुलघुकगुणषड्वृद्धिहानिरूपेण
प्रतिक्षणं प्रवर्तमाना अर्थपर्याया:</b>

00:21:59.280 --> 00:22:02.336
व्यंजनपर्याय के पश्चात् अब अर्थपर्याय लेते हैं।

00:22:02.360 --> 00:22:04.336
मुमुक्षु:- अर्थपर्याय में
अगुरुलघुगुण की पर्याय लेते हैं।

00:22:04.360 --> 00:22:08.176
उत्तर:- ली है क्योंकि वह निर्मल
और शुद्ध है, आहाहा!

00:22:08.200 --> 00:22:16.440
मुमुक्षु:- और एकसमान है सबकी।
उत्तर:- एकसमान है अरिहंत की और इस जीव की, दोनों की।

00:22:16.460 --> 00:22:22.416
वास्तव में तो अर्थपर्याय का ही काम है न?
व्यंजनपर्याय तो ठीक है।

00:22:22.440 --> 00:22:27.496
मतलब व्यंजनपर्याय जैसे उनके है,
ऐसे यहाँ व्यंजनपर्याय तो है ही न?

00:22:27.520 --> 00:22:30.936
उनके (अरिहंत के) परम औदारिक शरीर है,
ये औदारिक शरीर है।

00:22:30.960 --> 00:22:38.736
तो व्यंजनपर्याय तो है, बस इतना।
आकार बताया। क्षेत्र बताया।
मूल तो क्षेत्र बताया।

00:22:38.760 --> 00:22:53.376
अगुरुलघुगुण की जो हानि-वृद्धि पर्याय है
<b>प्रतिक्षणं प्रवर्तमाना अर्थपर्याया:</b>,

00:22:53.400 --> 00:23:00.136
जैसे अरिहंत की अगुरुलघुगुण की पर्याय है
वैसे यहाँ अगुरुलघुगुण की पर्याय, निर्मल और शुद्ध है।

00:23:00.160 --> 00:23:10.896
<b>एवंलक्षण </b>, <b>एवंलक्षण</b> गुण का
लक्षण कहा और पर्याय का लक्षण कहा।

00:23:10.920 --> 00:23:16.496
गुण में सामान्य और असाधारण
और साधारण गुण- दो कहे।

00:23:16.520 --> 00:23:20.616
और पर्याय में व्यंजनपर्याय
और अर्थपर्याय। हें?

00:23:20.640 --> 00:23:27.616
गुण के दो प्रकार और पर्याय के भी दो
प्रकार कहे। अब टोटल करते हैं।

00:23:27.640 --> 00:23:31.496
<b>एवं</b>, एवं मतलब?
मुमुक्षु:- एवं (अर्थात्) आगे।

00:23:31.520 --> 00:23:46.936
उत्तर:- <b>एवंलक्षणगुणपर्यायाधारभूतममूर्तमसंख्यातप्रदेशं
शुद्धचैतनयान्वयरूपं द्रव्यं चेति।</b>

00:23:46.960 --> 00:23:51.336
अब, द्रव्य की व्याख्या करते हैं कि
द्रव्य किसे कहते हैं?

00:23:51.360 --> 00:24:01.576
कि गुण-पर्याय को आधारभूत असंख्य प्रदेश
शुद्ध चैतन्यस्वरूप, वह द्रव्य(है)।

00:24:01.600 --> 00:24:05.936
<b>द्रव्यं चेति ।</b> द्रव्य है ऐसा जान।
चेति मतलब जान।

00:24:05.960 --> 00:24:10.096
मुमुक्षु:- उसमें अन्वयरूप द्रव्य है।
उत्तर:- ऐसा? यह अन्वयरूप द्रव्य है।

00:24:10.120 --> 00:24:19.296
<b>शुद्धचैतन्यान्वयरूपंद्रव्यं</b> ऐसा
अन्वयरूप, वही का वही, वही का वही, वही का वही,
ऐसा है वह द्रव्य है। बराबर!

00:24:19.320 --> 00:24:26.176
<b>गुणपर्ययवत् द्रवयम्</b> (तत्त्वार्थसूत्र,
अध्याय ५, सूत्र ३८) संक्षेप में। <b>गुणपर्ययवत्
द्रवयम्</b> लिया पूरा। प्रमाण का विषय।

00:24:26.200 --> 00:24:53.856
<b>इत्थंभूतं द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपं
पूर्वमर्हदभिधाने परमात्मनि ज्ञात्वा
पश्चान्निश्चयनयेन</b>

00:24:53.880 --> 00:25:06.416
<b>तदेवागमसारपदभूतयाऽध्यात्मभाषया
निजशुद्धात्मभावनाभिमुखरूपेण</b>

00:25:06.440 --> 00:25:12.936
<b>सविकल्पस्वसंवेदनज्ञानेन</b>
जरा पढ़ लूँ।

00:25:12.960 --> 00:25:32.816
<b>तथैवागमभाषयाध:प्रवृत्तिकरणापूर्वकरणानिवृतिकरण
संज्ञदर्शनमोहक्षपणसमर्थपरिणामविशेषबलेन</b>

00:25:32.840 --> 00:25:47.456
<b>पश्चादात्मनि योजयति ।
तदनन्तरमविकल्पस्वरूपे प्राप्ते यथा
पर्यायस्थानीयमुक्ताफलानि</b>

00:25:47.480 --> 00:25:56.176
<b>गुणस्थानीयं धवलत्वं चाभेदनयेन हार एव
तथापूर्वोक्तद्रव्यगुणपर्याया</b>

00:25:56.200 --> 00:26:15.416
<b>अभेदनयेनातमैवेतिभावयतोदर्शनमोहान्धकार:
प्रलीयते ।</b> आहाहा! करो, इसका अर्थ करो।

00:26:15.440 --> 00:26:31.056
मुमुक्षु:- <b>एवंलक्षणगुणपर्यायाधारभूतममुर्तम्संख्यातप्रदेशं
शुद्धचैतन्यान्वयरूपं द्रव्यं चेति ।</b>

00:26:31.080 --> 00:26:36.936
<b>ईत्थंभूतं द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपं
पूर्वमर्हदभिधाने परमात्मनि ज्ञात्वा</b>

00:26:36.960 --> 00:26:45.936
ऐसा कहते हैं कि गुण और पर्यायों का आधारभूत
अमूर्तिक, असंख्यात प्रदेशी,

00:26:45.960 --> 00:26:54.496
शुद्ध चैतन्य अन्वयरूप जो द्रव्य है,
उसको इस प्रकार से द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूप

00:26:54.520 --> 00:27:01.496
उन अरिहंत भगवान परमात्मा को जानकर मतलब
उनको द्रव्य-गुण-पर्याय से इस प्रकार जानकर...

00:27:01.520 --> 00:27:09.936
उत्तर:- जानकर, इस प्रकार जानकर।
मुमुक्षु:- जानकर। देखो, इसमें भी कैसा लिया!
अरहंत भगवान की भी इस प्रकार अभेद जानकर!

00:27:09.960 --> 00:27:13.736
उत्तर:- अभेद जानकर।
मुमुक्षु:- अभेद जानकर-
द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूप जानकर।

00:27:13.760 --> 00:27:18.456
द्रव्य को, गुण को, पर्याय को ऐसे
अलग अलग नहीं जानना अरहंत में भी।

00:27:18.480 --> 00:27:21.536
उत्तर:- अब सही (है)! क्योंकि यहाँ अभेद जानना है।
मुमुक्षु:- हाँ।

00:27:21.560 --> 00:27:27.896
उत्तर:- ये अब सही है।
मुमुक्षु:- देखो, <b>इत्थंभूतं</b> इस प्रकार
<b>द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपं</b>

00:27:27.920 --> 00:27:34.256
द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूप
पहले अरहंत भगवान परमात्मा को जानकर।

00:27:34.280 --> 00:27:39.696
उत्तर:- जान! अभेदरूप से, द्रव्य, गुण, पर्यायरूप से।
मुमुक्षु:- उनको भी अभेद जानना।
उत्तर:- वहाँ अभेद जान, ऐसे यहाँ अभेद जान।

00:27:39.720 --> 00:27:45.216
मुमुक्षु:- पहले उनको भेद से जाना,
द्रव्य, गुण, पर्याय।
पश्चात् उन्हें अभेद से जान लिया।

00:27:45.240 --> 00:27:52.776
उत्तर:- जान लिया, अच्छा।
मुमुक्षु:- पश्चात् यहाँ जान।
अब यहाँ शुद्धनय से आत्मा को जानता है।

00:27:52.800 --> 00:28:02.296
उत्तर:- उन्हें अभेदपने जान लिया, उसके बाद क्या शब्द है?
मुमुक्षु:- उसके बाद कहते हैं कि <b>पश्चात्</b>। उसके बाद।
उत्तर:- <b>पश्चात्</b>।

00:28:02.320 --> 00:28:03.880
मुमुक्षु:- उनको जान लिया।
उत्तर:- जान लिया।

00:28:03.880 --> 00:28:06.816
मुमुक्षु:- अब यहाँ। उसका मुख पलट गया।
उत्तर:-  हाँ, मुख पलट गया।

00:28:06.840 --> 00:28:08.800
मुमुक्षु:- उनको जानकर।
उत्तर:- हाँ, उपादान की तरफ आ गया।

00:28:08.800 --> 00:28:19.456
मुमुक्षु:- अब यहाँ आ गया। कि
<b>निश्चयनयेन</b> निश्चयनय से
<b>तदेवागमसारपदभूतयाऽध्यात्मभाषया।</b>

00:28:19.680 --> 00:28:27.456
निश्चयनय से आगम की जो सारभूत
सारपदभूत जो अध्यात्म भाषा है उसके अनुसार

00:28:27.480 --> 00:28:34.696
<b>निजशुद्धात्मभावनाभिमुखरूपेण</b>
निज शुद्धात्मा की भावना के सन्मुख हुआ।

00:28:34.720 --> 00:28:41.216
उत्तर:- देखा? त्रिकाली द्रव्य,
त्रिकाली द्रव्य के सन्मुख हुआ।

00:28:41.240 --> 00:28:46.536
मुमुक्षु:- <b>सविकल्पस्वसंवेदनज्ञानेन</b>
सविकल्प स्वसंवेदन ज्ञान

00:28:46.560 --> 00:28:56.736
कि जिसको आगम भाषा में अधःकरण,
अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण संज्ञा कहते हैं

00:28:56.760 --> 00:29:03.176
कि जो दर्शनमोह के क्षपण में समर्थ
परिणाम विशेष के बल से

00:29:03.200 --> 00:29:10.056
<b>पश्चादात्मनि योजयति</b> उसके बाद वह
आत्मा में परिणाम को जोड़ देता है।

00:29:10.080 --> 00:29:14.216
उत्तर:- जोड़ देता है। <b>योजयति</b> जोड़ देता है।
मुमुक्षु:- पहले सन्मुख होता है,
पीछे (पश्चात्) आत्मा में जोड़ देता है।

00:29:14.240 --> 00:29:29.216
उत्तर:- जोड़ देता है।  पूरा हो गया?
मुमुक्षु:- नहीं, अभी है। <b>तदनन्तर</b>
उसके बाद <b>अविकल्पस्वरूपे प्राप्ते</b>।

00:29:29.240 --> 00:29:33.456
उत्तर:- देखो, यहाँ तक सविकल्प था।
मुमुक्षु:- यहाँ तक सविकल्प।

00:29:33.680 --> 00:29:48.536
उत्तर:- जब तक, संध्या! अधःकरण,
अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के परिणाम हैं,

00:29:48.560 --> 00:30:03.936
तब तक वह आत्मा के सन्मुख तो था।
किन्तु बाद में आत्मा में जोड़ देता है पर्याय को।

00:29:57.980 --> 00:30:01.500
वो बाद में। जुड़ा नहीं है अभी।
तब तक सविकल्प दशा थी, ऐसा।

00:30:03.960 --> 00:30:07.856
मुमुक्षु:- भावना भाता है।
उत्तर:- भावना है। त्रिकाली द्रव्य की भावना भाता है,

00:30:07.880 --> 00:30:15.296
अर्थात् वह भावना है वह मोह क्षपण होने में
समर्थ है, किन्तु मोह अभी क्षय नहीं होता है।

00:30:15.320 --> 00:30:20.136
वो है। बराबर है।
मुमुक्षु:- उसके बाद तो परिणाम को आत्मा में..

00:30:20.160 --> 00:30:25.256
उत्तर:- देखो! ध्येय के ध्यान में गया लेकिन
ध्याता नहीं हुआ अभी।
मुमुक्षु:- हाँ, नहीं हुआ।

00:30:25.280 --> 00:30:32.176
उत्तर:- ध्येय हाथ में आया पर ध्याता नहीं हुआ।
ज्ञेय हाथ में आया पर ज्ञाता नहीं हुआ।

00:30:32.200 --> 00:30:36.376
ध्येय पूर्वक ज्ञेय होता है।
वो होता है तब होता है, बराबर है।

00:30:36.400 --> 00:30:45.976
सविकल्प में तो वह शुद्धात्मा के सन्मुख
हो गया और उसकी भावना में स्थित है।

00:30:46.000 --> 00:30:51.616
अतः उत्तरोत्तर क्षण में कर्ता-कर्म-क्रिया
के भेद विलय होते जाते हैं।

00:30:51.640 --> 00:30:57.936
विलय हुए नहीं हैं। प्रोसेस (process) में आ गया।
अभी मोह क्षय होगा, वह तो निश्चित है।

00:30:57.960 --> 00:31:02.896
क्योंकि अधःकरण आदि परिणाम में जो आया,
वो तो वापस मुड़ता ही नहीं।

00:31:02.920 --> 00:31:08.996
पर तब तक अभी सविकल्प कहा उसे।
भले अबुद्धिपूर्वक है, पर है।

00:31:09.020 --> 00:31:13.096
निर्विकल्प नहीं है ध्यान।
यहाँ तक मिथ्यात्व है, हों!

00:31:13.120 --> 00:31:20.496
सूक्ष्म परिणाम है, अथवा केवलीगम्य!
किन्तु मिथ्यात्व का रस है अभी। टूटा नहीं है।

00:31:20.520 --> 00:31:29.296
मुमुक्षु:- अभी तो ध्येय का विचार चलता है।
ध्येय का पक्ष है अभी तक।
उत्तर:- ध्येय का पक्ष है।

00:31:29.320 --> 00:31:38.416
मुमुक्षु:- ध्येय पूर्वक जब पूरा ज्ञेय होता है,
तब मोह का क्षय होता है।
उत्तर:- आहाहा! गजब की गाथा है, हों!

00:31:38.440 --> 00:31:46.176
गजब की गाथा है। जो यहाँ आया,
आया था वही इसमें है। अक्षरः अक्षर।

00:31:46.200 --> 00:31:52.136
उसमें मुझे कोई फर्क नहीं लगता।
कोई फर्क नहीं लगता।

00:31:52.160 --> 00:32:03.216
जो ये लिखते हैं, ऐसा ही घटित हुआ था।
ऐसा ही। अतः हूबहू है यह।

00:32:03.240 --> 00:32:10.776
अनुभव के काल में, अनुभव के सन्मुख होता है तब,
अनुभव की प्रोसेस में प्रवेश हुआ तब

00:32:10.800 --> 00:32:14.176
और वृद्धिगत होता है तब क्या हुआ अंत में-
वो सब लिखा है इसमें।

00:32:14.200 --> 00:32:20.616
इसमें सब आना पैसा सिक्का (बारीक से बारीक) लिखा है।
कुछ बाकी नहीं रखा है। आहाहा!

00:32:20.640 --> 00:32:25.096
मुमुक्षु:- जैसे आपको सब ऐसे सूक्ष्म में सूक्ष्म....
उत्तर:- ऐसे क्लियर है। हाँ, सूक्ष्म में सूक्ष्म..

00:32:25.120 --> 00:32:28.360
मुमुक्षु:- ऐसे इसमें भी सब सूक्ष्म-सूक्ष्म है।
उत्तर:- सूक्ष्म है।
मुमुक्षु:- एक-एक।

00:32:28.360 --> 00:32:33.856
उत्तर:- आत्म अभिमुख परिणाम जो शब्द लिखे हैं,
(उसका अर्थ है कि) त्रिकाली द्रव्य के सन्मुख हो गया उपयोग।

00:32:33.880 --> 00:32:38.176
अभेद नहीं हुआ।
पश्चात् आत्मा में जोड़ता है, ऐसा कहते हैं।

00:32:38.200 --> 00:32:42.296
पश्चात् आत्मा में जोड़ देता है उपयोग को।
समझ गये? जोड़ता है।

00:32:42.320 --> 00:32:48.816
<b>पश्चात्</b> आत्मा में उपयोग को जोड़ता है।
जब जोड़ता है तब अभेद होकर अनुभव होता है, ऐसा।

00:32:48.840 --> 00:32:52.416
वो पहले लिख दिया।
कि इस प्रोसेस के बाद क्या करेगा वो आत्मा?

00:32:52.440 --> 00:32:57.216
कि उपयोग को आत्मा में जोड़ देगा। आहाहा!

00:32:57.240 --> 00:33:01.336
जोड़ने की शुरआत तो हो गई है
किन्तु पूर्ण नहीं हुआ अभी, हों!

00:33:01.360 --> 00:33:04.976
करणलब्धि के परिणाम में
अभी सम्यग्दर्शन प्रगट नहीं होता।

00:33:05.000 --> 00:33:09.776
निर्जरा शुरू हो गई।
असंख्यात गुणी निर्जरा शुरू हो गई। (मुमुक्षु:- गुणश्रेणि निर्जरा।)

00:33:09.800 --> 00:33:22.016
भावनिर्जरा और द्रव्यनिर्जरा का ढेर होने लगता है। आहाहा!
रजकण खिरने लगते हैं।
अपने आप। आहाहा!

00:33:22.040 --> 00:33:31.696
मुमुक्षु:- लेकिन संवर नहीं हुआ अभी।
उत्तर:- संवर नहीं हुआ।
बहुत लोग मुझे ये प्रश्न करते हैं।

00:33:31.720 --> 00:33:41.416
कि करणलब्धि के परिणाम में आया
अतः संवर तो हो गया?

00:33:41.440 --> 00:33:45.816
कि नहीं। संवर नहीं हुआ अभी बिलकुल।
तो (कहते हैं) कि निर्जरा लिखी है।

00:33:45.840 --> 00:33:52.976
असंख्यात गुणी निर्जरा लिखी है
गोम्मटसार में, तो संवरपूर्वक निर्जरा होती है न?

00:33:53.000 --> 00:33:58.576
मैंने कहा, नहीं। वो निर्जरा सापेक्ष है।
संवरपूर्वक की नहीं है। समझ में आया?

00:33:58.600 --> 00:34:02.656
ऐसे प्रश्न आते हैं मेरे पास।
और उसका बराबर उत्तर देता हूँ। हें! हाँ।

00:34:02.680 --> 00:34:10.136
संवरपूर्वक निर्जरा नहीं है। वो तो निमित्त में
क्या होता है उसका ज्ञान कराया।

00:34:10.160 --> 00:34:17.936
निर्जरा होने लगी। परिणाम अभिमुख हुए
तो द्रव्यनिर्जरा होने लगी और
भावनिर्जरा भी होने लगी।

00:34:17.960 --> 00:34:23.536
किन्तु भाव निर्जरा पूरी नहीं होती।
वो संवरपूर्वक ही होती है।
ऐसा प्रश्न आया था।

00:34:23.560 --> 00:34:29.296
मुमुक्षु:- संवर के साथ की निर्जरा नहीं है?
उत्तर:- नहीं। (तो) संवर बिना की निर्जरा (है)?

00:34:29.320 --> 00:34:31.976
कि नहीं। वह संवर सापेक्ष निर्जरा (है)।

00:34:32.000 --> 00:34:37.776
संवर पूर्वक निर्जरा तो अनुभव के काल में,
निर्विकल्प ध्यान में होती है।

00:34:37.800 --> 00:34:51.096
चलो, फिर? ये सब इसमें (वीडियो
रिकॉर्डर में) आ जाता है। इसमें हूबहू है।

00:34:51.120 --> 00:34:54.496
इसमें लिखा है ऐसा
हमें स्वरूप भासित हुआ था।

00:34:54.520 --> 00:35:06.096
बोलो, मानो ये हमारे लिए लिखा हो!
चलो, आगे क्या (कहते हैं)? आहाहा!

00:35:06.120 --> 00:35:09.776
देखो अब, अब <b>अविकल्प </b>
निर्विकल्प ध्यान में आता है।

00:35:09.800 --> 00:35:21.816
मुमुक्षु:- पहले तो दर्शनमोह के क्षपण में
समर्थ परिणाम विशेष के बल से बाद में
<b>पश्चादात्मनि योजयति।</b>

00:35:21.840 --> 00:35:25.336
उस ही परिणाम को आत्मा में लगा देता है।
उत्तर:- लगा देता है, बस!

00:35:25.360 --> 00:35:35.336
क्षपण में समर्थ हो गया।
अभी मोह का क्षय होगा। आहाहा!

00:35:35.360 --> 00:35:45.696
ऐसी स्थिति आ गई। हूबहू-
हूबहू प्रोसेस लिख दी है मुनिराज ने।

00:35:45.720 --> 00:35:58.056
जैसा स्वयं को अनुभव से भासित हुआ,
वैसा लिखा है। ऐसी प्रोसेस कहीं नहीं है।

00:35:58.080 --> 00:36:07.856
मुमुक्षु:- कितनी व्यवस्थित!
उत्तर:- व्यवस्थित। आगे?

00:36:07.880 --> 00:36:12.656
मुमुक्षु:- <b>पश्चादात्मनि योजयति।</b>
आत्मा में लगाता है।
उत्तर:- लगाता है। अब आगे।

00:36:12.680 --> 00:36:14.736
मुमुक्षु:- <b>तदनन्तर</b>
उत्तर:- <b>तदनन्तर</b>

00:36:14.760 --> 00:36:18.496
मुमुक्षु:- उसके बाद, उत्तरोत्तर।
उत्तर:- उत्तरोत्तर, हाँ।

00:36:18.520 --> 00:36:22.456
मुमुक्षु:- <b>अविकल्पस्वरूपे प्राप्ते।</b>
उत्तर:-  <b>तदनन्तर</b> अर्थात् उत्तरोत्तर।

00:36:22.480 --> 00:36:27.176
मुमुक्षु:- उसके बाद
उत्तर:- उसके बाद! ठीक।

00:36:27.200 --> 00:36:29.576
उसमें कर्ता-कर्म-क्रिया का आता है न?

00:36:29.600 --> 00:36:36.136
उत्तरोत्तर भेद क्षय होता जाता है,
कर्ता-कर्म-क्रिया का भेद

00:36:36.160 --> 00:36:38.256
क्षय होता जाता है। इसमें ही है।
नीचे आएगा। पढ़ना।

00:36:38.280 --> 00:36:41.536
मुमुक्षु:- अमृतचंद्र आचार्य (ने लिया है)।
उत्तर:- हं! चलो फिर आगे।

00:36:41.560 --> 00:36:49.216
<b>करता करम क्रिया भेद नहीं भासतु है,
अकर्तृत्व सकति अखंड रीति धरै है ।
(अध्यात्म पंच संग्रह, ज्ञानदर्पण-१४८)</b>

00:36:49.240 --> 00:36:59.976
ये अनुभव की रीति है।
अकर्तापना कायम रहता है और परिणमता है

00:37:00.000 --> 00:37:06.256
तब कर्ता-कर्म-क्रिया का भेद पड़ता है,
किन्तु उत्तरोत्तर क्षण में भेद विलय होने पर
अभेद हो जाता है।

00:37:06.280 --> 00:37:08.576
કર્તા-કર્મનું અનન્યપણું થઈ જાય છે.
कर्ता-कर्म का अनन्यपना हो जाता है।

00:37:08.600 --> 00:37:12.576
मुमुक्षु:- तब निर्विकल्प होता है।
उत्तर:- तब निर्विकल्प ध्यान में।

00:37:12.600 --> 00:37:17.736
मुमुक्षु:- पहले भेद पड़ता है कर्ता-कर्म-क्रिया का?
उत्तर:- भेद पड़ता है। थोड़ा भेद पड़ता है।

00:37:17.760 --> 00:37:19.976
मुमुक्षु:- उत्तरोत्तर वह भेद
विलय को प्राप्त होता जाता है।

00:37:20.000 --> 00:37:32.896
उत्तर:- वह जमकर ढीम (ठोस) हो जाता है। बर्फ हो जाता है।
पानी का बर्फ हो जाता है। पानी प्रवाही था।

00:37:32.920 --> 00:37:43.256
कर्ता-कर्म-क्रिया है न? (वो पानी है।) पानी प्रवाही था।
और फिर जब बर्फ होता है, अभेद। इसप्रकार!

00:37:43.280 --> 00:37:48.096
पानी ही बर्फ हो जाता है।

00:37:48.120 --> 00:37:55.176
मुमुक्षु:- कर्ता-कर्म-क्रिया का भेद
निष्क्रिय चिन्मात्र हो जाता है।
उत्तर:- हो जाता है। निष्क्रिय चिन्मात्र। बस!

00:37:55.200 --> 00:37:57.256
मुमुक्षु:- अभेद हो जाता है।
उत्तर:- अभेद।

00:37:57.280 --> 00:38:02.616
<b>करता करम क्रिया भेद नहीं भासतु है</b>
भेद अब दिखता नहीं है।

00:38:02.640 --> 00:38:11.376
जहाँ वो भेद दिखना बंद हुआ, वहाँ निर्विकल्प ध्यान में
चला गया, खलास! चलो, बहुत सुन्दर।

00:38:11.400 --> 00:38:19.496
मुमुक्षु:- <b>तदनन्तरमविकल्पस्वरूपे प्राप्ते</b>
उसके बाद निर्विकल्प स्वरूप की प्राप्ति होती है।

00:38:19.520 --> 00:38:25.616
उत्तर:- अब मोह क्षय होगा, अभी।

00:38:25.640 --> 00:38:32.016
मुमुक्षु:- अब तो बीच में दृष्टान्त देते हैं।
बाकी बात तो खत्म हो गई है।

00:38:32.040 --> 00:38:41.696
मुमुक्षु:- <b>तदनन्तरमविकल्पस्वरूपे प्राप्ते ।</b>
उत्तर:- नहीं, अभी मोह क्षय का आयेगा।

00:38:41.720 --> 00:38:43.840
मुमुक्षु:- अब आयेगा पर बात खत्म हो गई है।
उत्तर:- खत्म-खत्म हो गयी।

00:38:43.840 --> 00:38:49.176
मुमुक्षु:- अब इसका फल क्या आया,
वह दृष्टान्त से सब बात करते हैं।

00:38:49.200 --> 00:38:58.856
<b>यथा</b> जैसे, दृष्टान्त देते हैं।
<b>पर्यायस्थानीयमुक्ताफलानि</b>
पर्याय के स्थान पर मोती।

00:38:58.880 --> 00:39:05.976
उत्तर:- मोती, पर्याय के स्थान पर मोती है।
मुमुक्षु:- <b>गुणस्थानीयं धवलत्वं</b> सफेदपना।

00:39:06.000 --> 00:39:11.856
उत्तर:- सफेदपना! मोती का जिसप्रकार सफेदपना है,
वह गुण (है)। ऐसे यहाँ ज्ञानगुण है।

00:39:11.880 --> 00:39:19.816
मुमुक्षु:- <b>चाभेदनयेन हार एव</b>
और अभेद नय से वो हार ही है।

00:39:19.840 --> 00:39:22.336
उत्तर:- गुण और पर्याय का अभेदपना,
उसका नाम हार है।

00:39:22.360 --> 00:39:37.416
मुमुक्षु:- <b>तथापूर्वोक्त</b> ऐसे ही पहले
कहे जो <b>द्रव्यगुणपर्याया</b> द्रव्य-गुण-पर्याय

00:39:37.440 --> 00:39:42.856
<b>अभेदनयेन</b> अभेद नय से
<b>आत्मैवेति (आत्मा एवं इति)</b>

00:39:42.880 --> 00:39:49.256
वो द्रव्य-गुण-पर्याय अभेदनय से आत्मा ही है।
इसप्रकार <b>भावयतो</b> भाता हुआ

00:39:49.280 --> 00:39:54.176
<b>दर्शनमोहान्धकार:प्रलीयते</b>
दर्शनमोह का अन्धकार क्षय हो जाता है।

00:39:54.200 --> 00:40:02.776
उत्तर:- क्षय हो जाता है। यहाँ,
द्रव्य-गुण-पर्याय से अभेद जब ज्ञेय लिया,
ध्येय में अभी मोह प्रलय नहीं हुआ था।

00:40:02.800 --> 00:40:06.336
मुमुक्षु:- वे तो मोह क्षपण में
समर्थ परिणाम थे।
उत्तर:- समर्थ थे। हाँ!

00:40:06.360 --> 00:40:11.216
मुमुक्षु:- परंतु मोह का क्षय तो यहाँ
द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूप एक अभेदनय से

00:40:11.240 --> 00:40:14.936
एक वस्तु को भाया
तब दर्शन मोह का नाश हो गया।

00:40:14.960 --> 00:41:04.216
उत्तर:- अद्भुत बात है!
द्रव्य का पक्ष आया।
पक्ष आया वह तो स्थूल है।

00:41:04.240 --> 00:41:12.256
फिर जब उपयोग अंदर में जाता है और
करणलब्धि के परिणाम शुरू हुए

00:41:12.280 --> 00:41:21.936
तब उस द्रव्य के आश्रय (से),
मोह के नाश का उपाय आ गया। समर्थन हो गया।

00:41:21.960 --> 00:41:27.216
अब, मोह का नाश होगा ही। ऐसा!
अप्रतिहत भाव है उसमें।

00:41:27.240 --> 00:41:34.656
फिर जब उपयोग अनन्य हो गया, आहाहा!
जाननहार जानने में आ गया, अंदर में,

00:41:34.680 --> 00:41:40.896
दर्शन हुए। तब कहते हैं कि आहाहा!
द्रव्य-गुण-पर्याय का अभेदनय से आत्मा

00:41:40.920 --> 00:41:45.856
<b>मोह क्षय लयं</b>, आहाहा!
मोह का नाश हो गया।

00:41:45.880 --> 00:42:00.336
नाश की ध्वनि है, हों!
उपशम की ध्वनि नहीं है।

00:42:00.360 --> 00:42:12.416
आहाहा! ऐसा जब समझे कि आत्मा में,
आत्मा की पर्याय में राग नहीं होता,
आत्मा की पर्याय में चेतना होती है।

00:42:12.440 --> 00:42:28.616
यदि अरिहंत की पर्याय में राग हो
तो मेरी पर्याय में राग हो।
आहाहा! अरिहंत की पर्याय ली, बोलो!

00:42:28.640 --> 00:42:34.456
अरिहंत की पर्याय के साथ
हमारी पर्याय मिल जाती है, ऐसा कहते हैं।

00:42:34.480 --> 00:42:42.456
वो कब मिले? कि यहाँ (मेरे में)
राग होता है, ऐसा मत देख अभी।

00:42:42.480 --> 00:42:45.840
यहाँ (मेरे में) ज्ञान होता है।
वहाँ (अरिहंत की पर्याय में) भी ज्ञान होता है
और यहाँ (मेरे में) भी ज्ञान होता है।

00:42:45.840 --> 00:42:52.336
इतना तो नहीं, इससे आगे है। कि उनके (अरिहंत के)
ज्ञान में भी आत्मा जानने में आता है

00:42:52.360 --> 00:42:57.696
और मेरा ज्ञान ऐसा प्रगट होता है कि उसमें
मेरा आत्मा ही जानने में आता है, ऐसा लेना।

00:42:57.720 --> 00:43:05.176
उनके (अरिहंत के) ज्ञान में भी उनका आत्मा
जानने में आता है या नहीं? प्रत्यक्ष हो गया या नहीं?

00:43:05.200 --> 00:43:13.816
इसीप्रकार मेरे वर्तमान चेतना लक्षण में, आहाहा!
चेतन जानने में आता है, ऐसा लेना।

00:43:13.840 --> 00:43:22.536
तब अभेद हो जाता है आत्मा।
मुमुक्षु:- और जानने में आता है,
इसलिए तो जानने में आ जाता है उसे।

00:43:22.560 --> 00:43:27.696
जानने में आता है इसलिए तो जानने में आ जाता है।
उत्तर:- जानने में आ जाता है। जानने में आता है,
इसलिए जानने में आ जाता है।

00:43:27.720 --> 00:43:30.216
परोक्षपने जानने में आता है
इसलिए प्रत्यक्ष हो जाता है।

00:43:30.240 --> 00:43:34.336
मुमुक्षु:- वह सच्चा है न!
उत्तर:- वह सच्चा है।
परोक्ष ज्ञान भी सच्चा है।

00:43:34.360 --> 00:43:40.576
उपयोग में.., उपयोग में परोक्षपने आत्मा जानने में आता है
और शुद्धोपयोग में प्रत्यक्ष जानने में आता है।

00:43:40.600 --> 00:43:47.136
अब, उपयोग में जब परोक्ष जानने में आता है,
सुनना! तब मोह क्षय होने का समर्थपना आ गया

00:43:47.160 --> 00:43:49.816
और शुद्धोपयोग में जानने में आया
तब मोह का नाश हो गया।

00:43:49.840 --> 00:43:56.816
ये दो भेद पड़ते हैं।
इतना भेद पड़ता है।
इतना भेद पड़ता है।

00:43:56.840 --> 00:44:03.736
परोक्षपने जहाँ ज्ञायक हाथ में आया,
आहाहा! वहाँ मोह क्षपण में समर्थ हो गया।

00:44:03.760 --> 00:44:06.956
अभी मोह क्षय होगा।
मुमुक्षु:- प्रत्यक्ष होता है तो मोह क्षय हो जाता है।

00:44:06.980 --> 00:44:11.016
उत्तर:- प्रत्यक्ष हो गया, शुद्धोपयोग हुआ,
मोह क्षय हो गया, आहाहा!

00:44:11.040 --> 00:44:20.296
उपयोग में परोक्ष जानने में आता है।
शुद्धोपयोग में प्रत्यक्ष जानने में आता है, बस!

00:44:20.320 --> 00:44:28.616
दोनों जीव के लक्षण हैं और जीव को प्रसिद्ध
करते हैं दोनों लक्षण। उपयोग लक्षण भी ...

00:44:28.640 --> 00:44:31.856
मुमुक्षु:- जीव को प्रसिद्ध करता है।
उत्तर:- और शुद्धोपयोग भी ..
मुमुक्षु:- जीव को प्रसिद्ध करता है।

00:44:31.880 --> 00:44:34.136
उत्तर:- एक परोक्ष और
एक प्रत्यक्ष, इतना फर्क है बस!

00:44:34.160 --> 00:44:44.856
सुबह से (विचार) आया था
वही यहाँ आ गया, लो!

00:44:44.880 --> 00:44:49.256
सुबह से ये विचार आये थे,
मैंने भाई को बताया था।

00:44:49.280 --> 00:44:57.896
वह अभी एकदम सही मौके पर वही बात आयी।
वही अभी हमने स्वाध्याय ८० नंबर का किया।

00:44:57.920 --> 00:45:08.696
क्योंकि दोनों (का) उपयोग से मिलान हो गया।
उनके (अरहंत के) उपयोग में उनका आत्मा जानने में आता है

00:45:08.720 --> 00:45:14.256
और मेरे उपयोग में
मेरा आत्मा जानने में आता है। आहाहा!

00:45:14.280 --> 00:45:23.296
वो अभिमुख परिणाम हुए। उपयोग में उपयोग है,
अन्य कुछ है नहीं। हें?

00:45:23.320 --> 00:45:29.256
अरिहंत के उपयोग में भी उपयोग और
मेरे उपयोग में भी उपयोग। आहाहा!

00:45:29.280 --> 00:45:32.816
मुमुक्षु:- लेकिन उपयोग में तो उपयोग ही होता है न?
उत्तर:- उपयोग ही होता है न? आहाहा!

00:45:32.840 --> 00:45:39.136
<b>जिसका जो होता है वह वही होता है न, वही होता है </b> न?
<b>आत्मा का ज्ञान होने से ज्ञान सो आत्मा ही है </b>

00:45:39.160 --> 00:45:47.856
अभेदनय से आत्मा हो गया। अभेदनय का
बहुत प्रयोग करते हैं जयसेन आचार्य भगवान!
अभेदनय का प्रयोग करते हैं।

00:45:47.880 --> 00:46:35.176
मुमुक्षु:- वही अनुभूति है न?
उत्तर:- (हाँ।) शास्त्र में लिख गये।
आत्म अभिमुख परिणाम- वो ध्येय की बात की।

00:46:35.200 --> 00:46:40.336
मुमुक्षु:- ध्येय की अभिमुखता।
उत्तर:- ध्येय के अभिमुख हो गया।

00:46:40.360 --> 00:46:52.576
ध्येय पूर्वक, आहाहा!
अभेद ज्ञेय हो गया आत्मा।
वह ज्ञेय हो गया पूरा।

00:46:52.600 --> 00:46:58.936
उसमें इतना ही लेना।
स्वाश्रित परिणाम उतना ही आत्मा(है)।
पराश्रित परिणाम नहीं लेना।

00:46:58.960 --> 00:47:04.576
मुमुक्षु:- अरे, यहाँ तो उसकी बात ही नहीं है।
उन्होंने भी लिया ही नहीं है।
उत्तर:- उन्होंने लिया ही नहीं है।

00:47:04.600 --> 00:47:09.056
मुमुक्षु:- है ही नहीं।
उत्तर:- है ही नहीं। उसकी पर्याय ही नहीं है, (
तो) फिर अभेद कहाँ से होगी?

00:47:09.080 --> 00:47:13.696
जो पर्याय द्रव्य की होती है, वो द्रव्य के साथ
अनन्य होती है, अभेद होती है।

00:47:13.720 --> 00:47:18.976
जो परिणाम पुद्गल के हैं, वे अभेद
कहाँ से होंगे? वो तो बात ही नहीं है।

00:47:19.000 --> 00:47:22.736
यहाँ तो चेतन, चैतन्य और
चिद्विवर्तन, इतना लिया है बस!

00:47:22.760 --> 00:47:27.096
चेतन, चिद्विवर्तन कहो या चेतन कहो।
एक ही बात है।

00:47:27.120 --> 00:47:31.056
मुमुक्षु:- निर्णय में ही उसे निकाल दिया,
तो अनुभूति में तो कहाँ से आवे?

00:47:31.080 --> 00:47:34.296
उत्तर:- कहाँ से आवे? निर्णय में (ही) निकाल दिया।

00:47:34.320 --> 00:47:38.856
क्योंकि वहाँ (अरिहंत में) राग नहीं है,
इसलिए यहाँ (मेरे में) राग नहीं है।

00:47:38.880 --> 00:47:44.256
उनकी (अरिहंत की) पर्याय में राग नहीं है
अतः यहाँ की (मेरी) पर्याय में राग नहीं है।

00:47:44.280 --> 00:47:46.816
तो ही मिलान हो न, नहीं तो मिले कहाँ से?

00:47:46.840 --> 00:47:49.096
मुमुक्षु:- वास्तव में वे पुद्गल के परिणाम हैं।
जीव के नहीं।

00:47:49.120 --> 00:48:05.936
उत्तर:- पुद्गल के परिणाम हैं।
जीव के परिणाम नहीं हैं। ऐसा ही है।

00:48:05.960 --> 00:48:20.136
अब अमृतचंद्राचार्य की (टीका) है,
वो ले लो साथ-साथ। साथ-साथ।

00:48:20.160 --> 00:48:29.336
उन्होंने भी कर्ता-कर्म और क्रिया का भेद
उत्तरोत्तर क्षण में विलीन होता जाता है न,

00:48:29.360 --> 00:48:36.776
उस करणलब्धि के प्रोसेस की ही बात की है उन्होंने।
करणलब्धि की। उन्होंने करणलब्धि शब्द प्रयोग नहीं किया है।

00:48:36.800 --> 00:48:49.776
लेकिन वो प्रोसेस ही बताई है।
उसका तो हिन्दी है न? हाँ, पढ़ो हिन्दी।

00:48:49.800 --> 00:49:18.416
आगे, प्रवचनसार शास्त्र गाथा नंबर ८०।
उसकी अमृतचंद्राचार्य भगवान की टीका।

00:49:18.440 --> 00:49:21.336
जयसेन आचार्य भगवान की टीका का
हमने स्वाध्याय किया।

00:49:21.360 --> 00:49:27.376
अब उसी गाथा की अमृतचंद्राचार्य भगवान ने
जो टीका की है, उसका हमारा स्वाध्याय चल रहा है।

00:49:27.400 --> 00:49:39.136
उसका शीर्षक। <b>आगे, 'मुझसे मोह की सेना कैसे
जीती जावे---ऐसे उपाय का
विचार करते  हैं:--</b>

00:49:39.160 --> 00:49:45.416
मोह की सेना को जीतने का उपाय क्या है
वो आचार्य भगवान बताते हैं।

00:49:45.440 --> 00:50:07.536
<b>अर्थ: जो पुरुष द्रव्य गुण पर्यायों से
पूज्य वीतराग देव को जानता है वह पुरुष
अपने स्वरूपको जानता है</b>

00:50:07.560 --> 00:50:16.296
<b>और निश्चयकर उसीका मोह कर्म
नाश को प्राप्त होता है ।</b>

00:50:16.320 --> 00:50:22.976
नाश की ही ध्वनि है इसमें।
<b>लयं</b> का अर्थ <b>नाश को</b>।
नाश को प्राप्त होता है।

00:50:23.000 --> 00:50:30.256
<b>भावार्थ</b>:- भावार्थ मतलब उसकी टीका।
संस्कृत टीका का हिंदी।

00:50:30.280 --> 00:50:44.176
<b>जैसे पिछली आंच का पकाया हुआ
सोना निर्मल होता है उसी प्रकार
अर्हंत का स्वरूप है ।</b>

00:50:44.200 --> 00:50:48.296
सोना अशुद्ध हो (तो) उसे शुद्ध करते हैं।

00:50:48.320 --> 00:50:52.576
कुंडी में डालकर तपाते हैं और
परिपूर्ण शुद्ध हो जाता है।

00:50:52.600 --> 00:51:02.736
ऐसे ही, <b>उसी प्रकार अर्हंत का स्वरूप है</b>।
सुवर्ण-सोना जैसे शुद्ध है,
और शुद्ध सौ टंच का सोना हो गया,

00:51:02.760 --> 00:51:06.156
उसी प्रकार अर्हंत के द्रव्य-गुण-पर्याय
शुद्ध हो गये।

00:51:06.180 --> 00:51:09.576
अब उनकी पर्याय में भी
कहीं अशुद्धता नहीं रही।

00:51:09.600 --> 00:51:15.456
<b>उसी प्रकार अर्हंत का स्वरूप है</b>,
सोने के दृष्टान्त से।

00:51:15.480 --> 00:51:26.336
<b>और निश्चयकर जैसा अर्हंत का स्वरूप है
वैसा ही आत्मा का शुद्ध स्वरूप है ।</b>

00:51:26.360 --> 00:51:31.056
उनके जैसा ही आत्मा का शुद्ध स्वरूप है।

00:51:31.080 --> 00:51:34.856
शुद्ध अर्थात् द्रव्य-गुण-पर्याय,
तीनों शुद्ध स्वरूप हैं।

00:51:34.880 --> 00:51:42.336
<b>इसलिए अर्हंत के जानने से
आत्मा जाना जाता है ।</b>

00:51:42.360 --> 00:51:47.856
अर्हंत के द्रव्य-गुण-पर्याय को जानने से
अपने आत्मा को जाना जा सकता है।

00:51:47.880 --> 00:51:53.296
<b>वह गुण पर्यायों के आधार को द्रव्य कहते हैं।</b>

00:51:53.320 --> 00:51:58.736
गुणों और पर्यायों का जो आधार होता है
उसे द्रव्य कहने में आता है।

00:51:58.760 --> 00:52:11.936
<b>तथा द्रव्य के ज्ञान आदिक
विशेषणों को गुण कहते हैं ।</b>

00:52:11.960 --> 00:52:24.376
<b>तथा द्रव्य के ज्ञान आदिक</b>
ज्ञान दर्शन आदि
<b>विशेषणों को गुण कहते हैं।</b>

00:52:24.400 --> 00:52:38.736
<b>और एक समयमात्र काल के प्रमाण से चैतन्य
आदि के परिणति भेदों को पर्याय कहते हैं।</b>

00:52:38.760 --> 00:52:47.076
ज्ञान को गुण कहते हैं और चैतन्य की पर्याय को,
एक समय की पर्याय, उसे पर्याय कहते हैं,

00:52:47.100 --> 00:52:51.256
<b>परिणति भेदों को पर्याय</b>,
જ્ઞાન જાણવું-દેખવું ઇત્યાદિ.
ज्ञान जानना-देखना इत्यादि।

00:52:51.280 --> 00:52:59.536
<b>चैतन्य आदि के परिणति भेदों को पर्याय
कहते हैं।</b> गुण और पर्याय, दोनों की व्याख्या की।

00:52:59.560 --> 00:53:04.376
ज्ञान को गुण कहा और
जानने की क्रिया होती है उसे पर्याय कहा।

00:53:04.400 --> 00:53:12.816
<b>प्रथम ही अर्हंत के द्रव्य-गुण-पर्याय
अपने मन में अवधारण करे।</b>

00:53:12.840 --> 00:53:17.856
मन द्वारा समज लेता है,
द्रव्य-गुण-पर्याय को पहले।

00:53:17.880 --> 00:53:25.696
उनके द्रव्य-गुण-पर्याय कैसे हैं, ये अपने
मन में लेता है, धारण करता है, अनुभव से पहले,
मानसिक ज्ञान में।

00:53:25.720 --> 00:53:36.936
<b>प्रथम ही अर्हंत के द्रव्य-गुण-पर्याय
अपने मन में अवधारण करे ।</b>
करना, पहले अवधारण करना।

00:53:36.960 --> 00:53:41.976
उनके द्रव्य-गुण-पर्याय कैसे हैं,
वो यहाँ मन में लेना पहले।

00:53:42.000 --> 00:53:50.656
वहाँ देखकर यहाँ मन में निर्णय करना कि
चेतन, चैतन्य और चिद्विवर्तन,
उनमें इतना ही है, तो वो ले लेना।

00:53:50.680 --> 00:53:52.736
ऊपर कहा, गुण और पर्याय की बात।

00:53:52.760 --> 00:54:04.496
<b>पीछे आप को इन गुण पर्यायों से जाने ।</b>

00:54:04.520 --> 00:54:11.756
मेरे में ज्ञान गुण है और
प्रति समय जानने की क्रिया मेरे में होती है।

00:54:11.780 --> 00:54:15.056
इसप्रकार अपने गुण और पर्याय को स्वयं जाने।

00:54:15.080 --> 00:54:18.936
क्योंकि गुण-पर्याय का आधार
वह द्रव्य है, वो तो आ गया है।
वो तो आ गया है।

00:54:18.960 --> 00:54:24.816
गुण-पर्याय जिसके आधार से होते हैं वो द्रव्य (है),
वो तो आ गया है, इसलिए
'गुण और पर्याय को जाने' (इतना लिया।)

00:54:24.840 --> 00:54:30.176
गुण तो ज्ञान गुण है और
पर्याय(में) जानने की क्रिया होती है। बराबर!

00:54:30.200 --> 00:54:41.136
<b>जाने और उसके बाद निज स्वरूप को
अभेदरूप अनुभवे ।</b> पहले भेदरूप जाने।

00:54:41.160 --> 00:54:50.496
<b>प्रथम ही अर्हंत के द्रव्य-गुण-पर्याय
अपने मन में अवधारण करे ।</b>

00:54:50.520 --> 00:54:54.176
<b>पीछे</b>
उन अरिहंत के द्रव्य-गुण-पर्याय को अवधारण किया।

00:54:54.200 --> 00:55:00.736
अब <b>पीछे</b> अपने में,
<b>आप को इन गुण पर्यायों से जाने।</b>

00:55:00.760 --> 00:55:05.576
कि मेरे में भी ज्ञान गुण है और मेरे में भी
जानने की क्रिया होती है, उपयोग लक्षण।

00:55:05.600 --> 00:55:15.216
<b>जाने और उसके बाद</b> वह भेद से, गुण और
पर्याय को भेद से जाना, वह व्यवहार हो गया।

00:55:15.240 --> 00:55:23.736
<b>उसके बाद निज स्वरूप को अभेदरूप अनुभवे ।</b>
जाने और फिर अनुभवे।

00:55:23.760 --> 00:55:32.416
"जाने" में अनुमान आया।
"अनुभव" में प्रत्यक्ष,
वो परोक्ष और ये प्रत्यक्ष।

00:55:32.440 --> 00:55:41.816
मुमुक्षु:- परोक्ष में भेदरूप जानना होता है।
उत्तर:- परोक्ष में भेदरूप।

00:55:41.840 --> 00:55:45.336
गुण और पर्याय को जाना।
स्वयं अपने ज्ञान में लिया।

00:55:45.360 --> 00:55:49.936
मेरे में ज्ञान-दर्शन गुण है और
मेरे में जानने-देखने की दशा होती है।

00:55:49.960 --> 00:55:59.336
इसप्रकार गुण और पर्याय को भेद से जाना,
पश्चात् अभेद कर दिया। वो प्रोसेस लेंगे बाद में।

00:55:59.360 --> 00:56:08.696
<b>अभेदरूप अनुभवे। इस आत्मा के त्रिकाल
सबंधी पर्याय एक काल में अनुभवन करे।</b>

00:56:08.720 --> 00:56:15.336
<b>इस आत्मा के त्रिकाल संबंधी पर्याय
एक काल में अनुभवन करे।</b>

00:56:15.360 --> 00:56:19.656
इसमें हमें उसका अनुवाद
देखना पड़ेगा जरा। देखना पड़ेगा।

00:56:19.680 --> 00:56:24.656
अभी पढ़ लेता हूँ, फिर देख लेना तुम।
थोड़ा अनुवाद में अंतर लगता है।

00:56:24.680 --> 00:56:32.776
मुमुक्षु:- नहीं, बराबर नहीं है। नहीं, बराबर नहीं है अनुवाद।
उत्तर:- नहीं है। वो अपना जो गुजराती
हुआ है न, वो बराबर है।

00:56:32.800 --> 00:56:37.816
<b>इस आत्मा के त्रिकाल संबंधी पर्याय
एक काल में अनुभवन करे ।</b>

00:56:37.840 --> 00:56:44.576
<b>जैसे हार में मोती पोए जाते हैं
वहाँ भेद नहीं करते हैं। </b>

00:56:44.600 --> 00:56:53.136
<b>तैसे ही आत्मा में चित् पर्याय को अभेद करे ।</b>
पर्याय को अभेद कर दिया द्रव्य में।

00:56:53.160 --> 00:57:02.296
<b>जैसे हार में उज्ज्वलगुण का भेद नहीं
करते हैं, तैसे ही आत्मा में
चेतना गुण को गोपन करे ।</b>

00:57:02.320 --> 00:57:06.496
चेतना गुण को भी द्रव्य में अन्तर्लीन करे।
ऐसा आता है।

00:57:06.520 --> 00:57:18.856
<b>जैसे पहिरने वाला पुरुष अभेदरूप
हार की शोभा के सुख को वेदता है,</b>

00:57:18.880 --> 00:57:24.296
<b>वैसे ही केवल ज्ञान से अभेदरूप
आत्मिक सुख को वेदे।</b>

00:57:24.320 --> 00:57:33.856
<b>ऐसी अवस्था के होने पर अगले अगले</b>
देखो, <b>अगले अगले समयों में</b> उत्तरोत्तर

00:57:33.880 --> 00:57:41.056
<b>अगले अगले समयों में
कर्ता-कर्म-क्रिया का भेद क्षीण होता है।</b>

00:57:41.080 --> 00:57:46.416
ये अधःकरण, अपूर्वकरण के परिणाम आ गये।

00:57:46.440 --> 00:57:53.616
<b>क्षीण होता है। तभी क्रिया रहित</b>
निष्क्रिय था न? <b>क्रिया रहित।</b>

00:57:53.640 --> 00:58:01.736
मुमुक्षु:- अर्थात् भेद रहित।
उत्तर:- भेद रहित। <b>क्रिया रहित,
सभी क्रिया रहित,</b> आहाहा!

00:58:01.760 --> 00:58:08.416
कर्ता-कर्म-क्रिया के भेद रहित
<b>चैतन्य स्वभाव को प्राप्त होता है ।</b>

00:58:08.440 --> 00:58:22.096
<b>जैसे चोखे खरे रत्न का अकंप निर्मल
प्रकाश है तैसे ही चैतन्य प्रकाश
जब निर्मल निश्चल होता है</b>

00:58:22.120 --> 00:58:29.056
<b>तब आश्रय के बिना मोहरूपी
अंधकार का अवश्य ही नाश होता है।</b>

00:58:29.080 --> 00:58:36.656
मोह को पर का आश्रय था। अब अंदर में स्व का
आश्रय आया तो मोह तो निराधार हो गया।
निराश्रय हो गया।

00:58:36.680 --> 00:58:43.976
<b>नाश होता है । आचार्य महाराज कहते हैं
जो इस भान्ति स्वरूप की प्राप्ति होती है</b>

00:58:44.000 --> 00:58:50.016
<b>तो मैंने मोह की सेना के
जीतने का उपाय पाया ।</b>

00:58:50.040 --> 00:58:55.976
अब, जरा तुम संस्कृत पढ़कर
देखो तो सही बराबर है कि नहीं?

00:58:56.000 --> 00:59:06.176
उसके उपयोग में केवल शुद्धात्मा
जानने में आता है, तो यहाँ भी शुद्धोपयोग (में)
आत्मा ही जानने में आता है।

00:59:06.200 --> 00:59:16.056
स्वपर या लोकालोक का कुछ नहीं लिया।
तभी अभेद होता है न लेकिन?

00:59:16.080 --> 00:59:20.416
ज्ञान आत्मा को जानने में आ जाये
तब अभेद होता है न?

00:59:20.440 --> 00:59:21.956
वहाँ जानने जाये तो अभेद कहाँ से हो?

00:59:21.980 --> 00:59:29.436
वो तो विकल्प का जाल खड़ा होता है, आहाहा!
हूबहू प्रोसेस है। हूबहू।

00:59:29.760 --> 00:59:36.576
मुमुक्षु:- दो बातें ले ली इसमें।
राग की बात नहीं ली एक तो,
क्योंकि राग होने का प्रश्न नहीं है आत्मा में।

00:59:36.600 --> 00:59:37.976
उनमें नहीं है तो यहाँ कहाँ से हो?

00:59:38.000 --> 00:59:43.976
उत्तर:- कहाँ से हो? नहीं ही होता।
मुमुक्षु:- एक बात। दूसरी बात। उनके ज्ञान में
उनका आत्मा ही जानने में आता है, भगवान को।

00:59:44.000 --> 00:59:49.016
उसीप्रकार मेरे उपयोग में, मेरे ज्ञान में भी
यह ज्ञायक ही जानने में आता है। दो बातें आई।

00:59:49.040 --> 00:59:56.016
उत्तर:- तब अभेद होता है। पर जानने में आये
तो यहाँ अभेद नहीं होता,
ऐसा मेरा कहना है। आहाहा!

00:59:56.040 --> 01:00:09.416
कर्ता भी नहीं है और ज्ञाता भी नहीं है पर का।
वास्तव में दिगंबर संतों ने
बहुत उपकार किया है शास्त्र से।

01:00:09.440 --> 01:00:14.096
मुमुक्षु:- बहुत उपकार। आत्मा को
ऐसे बाहर लाकर दिखाया।
उत्तर:- दिखाया, हथेली में।

01:00:14.120 --> 01:00:20.576
तू आँख खोले इतनी देर (है),
बस तुझे भी दिखेगा।
तू रूचि की आँख खोलकर रख।

01:00:20.600 --> 01:00:27.696
मुमुक्षु:- अनुभव की विधि प्रत्यक्ष बताते हैं। आहाहा!
उत्तर:- हूबहू! हूबहू!

01:00:27.720 --> 01:00:31.576
मुमुक्षु:- आत्मा में ज्ञान होता है और
ज्ञान में आत्मा जानने में आता है।
उत्तर:- जानने में आता है।

01:00:31.600 --> 01:00:37.656
मुमुक्षु:- बस, इतना ही है।
उत्तर:- आत्मा का स्वभाव ज्ञान और
ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना वह।

01:00:37.680 --> 01:00:43.256
मुमुक्षु:- भेद निकल जाए
तो मोह क्षय हो जाये।
उत्तर:- (हाँ)।

01:00:43.280 --> 01:01:11.856
जैसा केवलज्ञान में स्वरूप भासित होता है,
ऐसा (ही) मति-श्रुत में भासित होता है।
उससे अलग भासित नहीं होता।

01:01:11.880 --> 01:01:19.216
मुमुक्षु:- क्योंकि वही केवलज्ञान में
कन्वर्ट होगा न?

01:01:19.240 --> 01:01:22.616
उत्तर:- वही होनेवाला है न? वह मति-श्रुतवाला
ही केवलज्ञानी होनेवाला है फिर।

01:01:22.640 --> 01:01:34.216
जैसा अरिहंत ने केवलज्ञान में जाना,
ऐसा ही यह जाने तब अरिहंत होगा न? आहाहा!

01:01:34.240 --> 01:02:17.736
<b>मोह लयं। </b> और अमृतचंद्राचार्य ने
मोह की सेना को जीतने का उपाय हाथ में लिया,
मोह को जीतने का नहीं।

01:02:17.760 --> 01:02:19.936
मुमुक्षु:- वह (दर्शनमोह) तो जीता जा चुका है।

01:02:19.960 --> 01:02:30.816
उत्तर:- मोह की सेना अर्थात् मोह क्षय होता है,
उसके पश्चात् सेना रहती है चारित्रमोह की,
उसे जीतने का उपाय हाथ में आ गया है।

01:02:30.840 --> 01:02:35.656
मुमुक्षु:- उसे जीतने का उपाय भी यह ही है।
एक ही उपाय है।

01:02:35.680 --> 01:02:41.016
उत्तर:- (हाँ।) जो मिथ्यात्व को जीतने का
उपाय है, वही अव्रत-कषाय को जीतने का उपाय है।

01:02:41.040 --> 01:02:48.376
इसलिए सेना ली है उसकी।
सेनापति के साथ सेना होती है।
तो सेनापति को तो जीता है मैंने।

01:02:48.400 --> 01:02:54.616
तो सेनापति को जिस रीति से जीता, तो सेना को
जीतना तो सामान्य है अब मेरे लिए।

01:02:54.640 --> 01:02:59.376
मुमुक्षु:- उन्होंने कहा, 'अगर ऐसे ही
जीता जाता है तो वो उपाय तो
मैंने प्राप्त कर लिया है।'

01:02:59.400 --> 01:03:06.096
उत्तर:- कर लिया है प्राप्त, बस!
क्या शब्द प्रयोग किया है!  सेना को जीतने का उपाय।

01:03:06.120 --> 01:03:10.456
मोह की सेना को। मोह तो जीत लिया है। हें?

01:03:10.480 --> 01:03:14.216
मुमुक्षु:- मोह तो जीत लिया है। बराबर।
उत्तर:- अर्थात् उसमें दोनों प्रकार ले लिये,

01:03:14.240 --> 01:03:19.536
दोनों प्रकार अर्थात् मूल ले लिये, आहाहा!
मन द्वारा पहले समज लेता है आत्मा को।

01:03:19.560 --> 01:03:28.336
वह जो शब्द है न? <b>मन द्वारा समज लेता है,</b>
वह यथार्थ निर्णय की भूमिका है।

01:03:28.360 --> 01:03:33.616
मुमुक्षु:- अपूर्व निर्णय।
उत्तर:- अपूर्व निर्णय और अफर (अटल) निर्णय है।

01:03:33.640 --> 01:03:40.296
उसके पीछे अनुभूति बँधी हुई है।
वो ऐसा निर्णय है। मन द्वारा जान लेता है। बोलो!

01:03:40.320 --> 01:03:47.576
इन्होंने मन द्वारा जान लेता है, ऐसा कहा और
उन्होंने (जयसेनाचार्य की टीका में)
सविकल्प स्वसंवेदन लिया है।

01:03:47.600 --> 01:03:51.216
मुमुक्षु:- एक ही बात है।
उत्तर:-एक ही बात है।
सविकल्प स्वसंवेदन कहो या मन द्वारा

01:03:51.240 --> 01:03:58.936
या ज्ञान में परोक्ष आत्मा आ गया (ऐसा कहो),
एक ही बात है।

01:03:58.960 --> 01:04:01.096
मुमुक्षु:- अनुमान ज्ञान कहो।
उत्तर:- अनुमान ज्ञान।

01:04:01.120 --> 01:04:05.776
मुमुक्षु:- शब्द अलग-अलग हैं भाई!
प्रक्रिया तो एक ही है न?
उत्तर:- एक ही होती है न?

01:04:05.800 --> 01:04:16.776
आहाहा! ऐसे स्वरूप की
चर्चा भी कोई करता नहीं है।

01:04:16.800 --> 01:04:23.056
चर्चा करने जैसी तो यह है,
जिसमें मोह का क्षय हो जाये।

01:04:23.080 --> 01:04:47.376
मोह क्षय की चर्चा है।
वो संस्कृत जरा पढ़ना तुम,
मन में,अपने मन में।

01:04:47.400 --> 01:05:02.616
मुमुक्षु:- <b>यो हि नामार्हन्तं द्रव्यत्वगुणत्वपर्ययत्वै:
परिच्छिनत्ति स खल्वात्मानं परिच्छिनत्ति,
उभयोरपि निश्चयेनाविशेषात्। </b>

01:05:02.640 --> 01:05:11.896
अपने को और अरिहंत को, दोनों को निश्चय से जाने।
द्रव्य-गुण-पर्याय।

01:05:11.920 --> 01:05:22.496
उत्तर:- बराबर। निश्चय से, उनके (अरिहंत के)
द्रव्य-गुण-पर्याय हैं, ऐसा मेरा आत्मा है

01:05:22.520 --> 01:05:25.016
इसप्रकार निश्चय से मिल जाता है। बराबर। जाना।

01:05:25.040 --> 01:05:38.816
मुमुक्षु:- <b>अर्हतोऽपि पाककाष्ठागतकार्तस्वरस्येव
परिस्पष्टमात्मरूपं </b>,

01:05:38.840 --> 01:05:46.576
अरिहंत सौ टंच के सोने की भाँति परिपूर्ण
परिस्पष्ट एकदम शुद्ध स्वरूप है (अरिहंत की) आत्मा का।

01:05:46.600 --> 01:05:56.256
<b>ततस्तत्परिच्छेदे सर्वात्मपरिच्छेदः। </b>
ऐसा ही आत्मा है।

01:05:56.280 --> 01:06:04.256
वहाँ <b>तत्र </b> वहाँ, <b>अन्वयो द्रव्यं </b>
अन्वयरूप द्रव्य,

01:06:04.280 --> 01:06:09.896
<b>अन्वयविशेषणं गुण: </b>, अन्वय का
विशेषण, द्रव्य का विशेषण गुण है।

01:06:09.920 --> 01:06:16.096
<b>अन्वयव्यतिरेका: पर्याया: </b>
अन्वय का व्यतिरेक पर्याय है।

01:06:16.120 --> 01:06:25.696
उत्तर:- अन्वय का भेद वह पर्याय।
द्रव्य का भेद वह पर्याय।
उन्होंने ऐसा लिया। समझ गये?

01:06:25.720 --> 01:06:28.536
गुण का भेद पर्याय नहीं,
द्रव्य का (भेद) लिया।

01:06:28.560 --> 01:06:32.696
मुमुक्षु:- अर्थात् उसमें व्यंजन पर्याय लेनी है।
उत्तर:- व्यंजन पर्याय लेनी है।
मैं ये बोलने ही जा रहा था अभी।

01:06:32.720 --> 01:06:44.856
ये बराबर है। खरे हो तुम भी।
मुमुक्षु:- सब आपने ही सिखाया है न?

01:06:44.880 --> 01:07:01.776
<b>तत्र भगवत्यर्हति सर्वतो विशुद्धे
त्रिभूमिकमपि स्वमनसा समयमुत्पश्यति।</b>

01:07:01.800 --> 01:07:10.936
अर्थात् उन अरिहंत भगवान को सर्व प्रकार से
शुद्ध अपने मन द्वारा देख लेता है।
मन से देख लेता है।

01:07:10.960 --> 01:07:21.656
उत्तर:- क्योंकि मन का विषय रूपी और
अरूपी दोनों है न, इसीलिए। मन में आ
जाता है, अरूपी आत्मा।

01:07:21.680 --> 01:07:28.576
तत्वार्थ सूत्र का पाठ है, मन का विषय
रूपी और अरूपी दोनों हैं।

01:07:28.600 --> 01:07:43.576
कहीं भी दोष नहीं आता।
ये सब अभ्यास किया हुआ है न?
ऐसे समय पर हाजिर होता है।

01:07:43.600 --> 01:07:48.736
बराबर है।
मन द्वारा जानने में आ जाता है आत्मा।

01:07:48.760 --> 01:08:06.936
मुमुक्षु:- अरिहंत का आत्मा।
उत्तर:- अरिहंत का आत्मा। ठीक है। चलो।

01:08:06.960 --> 01:08:29.656
मुमुक्षु:- <b>यश्चेतनोऽयमित्यन्वयस्तद्द्रव्यं </b>,
जो यह चेतन अन्वयरूप है वह द्रव्य है।

01:08:29.680 --> 01:08:34.576
उत्तर:- चेतन-चेतन-चेतन। चेतन को द्रव्य कहते हैं।
मुमुक्षु:- अन्वय, अन्वय रूप,
उत्तर:- अन्वय रूप।

01:08:34.600 --> 01:08:40.016
मुमुक्षु:- चेतन वह द्रव्य है।
उत्तर:- अन्वय अर्थात् है-है-है और है ही, बस!

01:08:40.040 --> 01:08:46.336
मुमुक्षु :-  <b>यच्चान्वयाश्रितं चैतन्यमिति
विशेषणं स गुण: </b>

01:08:46.360 --> 01:08:53.496
उत्तर:- अन्वय के आश्रय से रहा हुआ चैतन्य
वह गुण है। इसप्रकार चेतन और चैतन्य ऐसे
द्रव्य और गुण में नाम का अंतर किया है।

01:08:53.520 --> 01:08:55.656
मुमुक्षु:- नाम का अंतर किया है।
उत्तर:- बराबर है।

01:08:55.680 --> 01:09:00.756
मुमुक्षु:- चेतन तो अभेद है।
और इस चैतन्य में दर्शन-ज्ञान दो गुण हैं।

01:09:00.780 --> 01:09:08.016
उत्तर:- दो ही गुण हैं मुख्यपने।
उसमें तो अनंत गुण आ जाते हैं,
द्रव्य में। बराबर है।

01:09:08.040 --> 01:09:27.976
मुमुक्षु:- <b>ये चैकसमयमात्रावधृतकालपरिमाणतया
परस्परपरावृत्ता अन्वयव्यतिरेकास्ते
पर्यायाश्चिद्विवर्तनग्रंथय इति यावत् </b>

01:09:28.000 --> 01:09:34.196
उत्तर:- चिद्विवर्तन शब्द प्रयोग किया है न?
चिद् अर्थात् चैतन्य का विवर्तन (अर्थात्) पलटना होता है,

01:09:34.220 --> 01:09:41.696
उपयोग का परिणमन लिया। विवर्तन (अर्थात्) परिणमन
लिया। उपयोग, वह उपयोग लक्षण है। बराबर है।

01:09:41.720 --> 01:09:48.256
चिद्विवर्तन उपयोग का पलटना होता है न?
एक समय का ही उपयोग है।

01:09:48.280 --> 01:09:58.016
दूसरे समय दूसरा उपयोग। इसप्रकार! बराबर है।
कैसा संकलन किया है उन्होंने! आहाहा!

01:09:58.040 --> 01:10:02.336
मुमुक्षु:- यहाँ तो अन्वय के व्यतिरेक।
उत्तर:- हाँ, अन्वय के व्यतिरेक।

01:10:02.360 --> 01:10:08.976
मुमुक्षु:- अन्वय के व्यतिरेक जो पर्याय,
चिद्विवर्तन उसको पर्याय ली है।
उत्तर:- पर्याय ली, बराबर। ठीक है।

01:10:09.000 --> 01:10:14.016
मुमुक्षु:- अर्थात् द्रव्य की भी वो पर्याय,
उपयोग लिया है यहाँ।
उत्तर :- हाँ, उपयोग लिया है।

01:10:14.040 --> 01:10:18.576
मुमुक्षु:- चिद्विवर्तन।
उत्तर:- चिद्विवर्तन! उपयोग ही लिया है।
उसमें उन्होंने व्यंजन पर्याय नहीं ली है।

01:10:18.600 --> 01:10:33.176
मुमुक्षु:- नहीं, उपयोग ही लिया है।
उत्तर:- बराबर। यह व्यंजन पर्याय तो
जयसेनाचार्य ने ली है।

01:10:33.200 --> 01:10:35.216
इन्होंने (अमृतचंद्राचार्य ने) नहीं ली है।

01:10:35.240 --> 01:10:42.936
मुमुक्षु:- इसप्रकार जाना न?
चेतन, चैतन्य और ...
उत्तर:- चिद्विवर्तन जाना।

01:10:42.960 --> 01:10:45.696
मुमुक्षु:- चिद्विवर्तन। तीनों को जाना।
अब क्या कहते हैं?

01:10:45.720 --> 01:11:02.056
कि <b>अथ </b> इसके बाद, <b>अथैवमस्य
त्रिकालमप्येककालमाकलयतो</b>
त्रिकाली को समज लेता है।

01:11:02.080 --> 01:11:04.880
उत्तर :- समज लेता है। जान लेता है।
मुमुक्षु:- त्रिकाली को।
उत्तर:- त्रिकाली को।

01:11:04.880 --> 01:11:08.376
मुमुक्षु:- त्रिकाली अर्थात् त्रिकाली द्रव्य
लेना चाहिये न?

01:11:08.400 --> 01:11:12.216
उत्तर:- त्रिकाली द्रव्य।
द्रव्य, गुण, पर्याय नहीं। त्रिकाली को।

01:11:12.240 --> 01:11:18.496
मुमुक्षु:- इसमें यह अर्थ बराबर नहीं है।
आत्मा की त्रिकाल संबंधी पर्याय
एक काल में अनुभव कर लेता है।

01:11:18.520 --> 01:11:21.856
उत्तर :- वह अर्थ नहीं किया है।
अपने में (गुजराती अनुवाद में) त्रिकाली को
जान लेता है (ऐसा अर्थ किया है)।

01:11:21.880 --> 01:11:34.496
मुमुक्षु:- <b>चिद्विवर्तांश्चेतन एव संक्षिप्य
विशेषणविशेष्यत्ववासनान्तर्धानाद्धवलिमानमिव </b>

01:11:34.520 --> 01:11:40.336
<b>प्रालम्बे चेतन एव चैतन्यमन्तर्हितं
विधाय केवलं प्रालम्बमिव</b>

01:11:40.360 --> 01:11:57.256
<b>केवलमात्मानं
परिच्छिन्दतस्तदुत्तरोत्तरक्षणक्षीयमाणकर्तृकर्मक्रियाविभागतया
निष्क्रियं </b> कितना बड़ा वाक्य लिखा है।

01:11:57.280 --> 01:12:04.856
उत्तर:- बहुत बड़ा है, हाँ।
मुमुक्षु:- <b>निष्क्रियं चिनमात्रं
भावमधिगतस्य जातस्य </b>

01:12:04.880 --> 01:12:14.216
<b>मणेरिवाकम्पप्रवृत्तनिर्मलालोकस्यावश्यमेव
निराश्रयतया मोहतम: प्रलीयते। </b>

01:12:14.240 --> 01:12:25.416
कहते हैं कि त्रिकाली को ले लेता है फिर
<b>मुक्ताफलानीव प्रलम्बे। </b>
मुक्ता फल की जगह पर्याय को लिया।

01:12:25.440 --> 01:12:31.816
उत्तर:- पर्याय कहा। बराबर। मोती।
मोती को इसमें अंतर्धान करता है, हार में।
मुमुक्षु:- संक्षेपण करता है।

01:12:31.840 --> 01:12:38.576
उत्तर:- संक्षेपण करता है। मिला देता है।
मुमुक्षु:- मोती की तरह जो चिद्विवर्तन है
उसे चेतन में संक्षेपता है।

01:12:38.600 --> 01:12:42.776
उत्तर:- संक्षेपता है। बराबर।
इसीप्रकार द्रव्य के सन्मुख होकर अभेद कर देता है।

01:12:42.800 --> 01:12:45.536
द्रव्य कर देता है।
पर्याय को द्रव्यरूप कर देता है।

01:12:45.560 --> 01:12:48.456
मुमुक्षु:- अर्थात् द्रव्य का अनुभव
कर लेता है पर्याय में।
उत्तर:- सही है।

01:12:48.480 --> 01:12:54.696
पर्याय में एकाग्र हो जाता है तो
पर्याय का भेद नहीं दिखता। पर्याय
स्वयं द्रव्यरूप हो जाती है, ऐसा!

01:12:54.720 --> 01:13:00.516
मुमुक्षु:- पर्याय का भेद छोड़कर
द्रव्य में एकाग्र होने पर,
पर्याय द्रव्यरूप हो जाती है।

01:13:00.540 --> 01:13:05.256
उत्तर:- बस-बस! जो 'अनुभूति वह आत्मा'
ऐसा कहा है, वह ये। बराबर।

01:13:05.280 --> 01:13:12.096
मुमुक्षु:- <b>चिद्विवर्तांश्चेतन एव संक्षिप्य </b>
चिद्-विवर्तन को चेतन में संक्षेप करके

01:13:12.120 --> 01:13:18.136
और <b>विशेषणविशेष्यत्ववासना </b>
गुण और गुणी की जो वासना,

01:13:18.160 --> 01:13:23.676
उत्तर:- उसका अंतर्धान करता है।
उसमें लीन करता है। गुणभेद को निकाल देता है।

01:13:23.700 --> 01:13:29.136
पर्याय भेद निकालता है। फिर गुणभेद का
भेद निकालकर, अभेद कर देता है।
पर्याय को द्रव्य में अभेद करता है।

01:13:29.160 --> 01:13:35.896
पर्याय के भेद को और गुणभेद को छोड़कर
द्रव्य को देखता है तो गुण और द्रव्य
एक हो जाते हैं, ऐसा! बराबर।

01:13:35.920 --> 01:13:39.936
मुमुक्षु:- अर्थात् पर्याय का भेद दिखता नहीं है
और गुणभेद भी दिखता नहीं है।
उत्तर:- गुणभेद दिखता नहीं, बस!

01:13:39.960 --> 01:13:43.216
मुमुक्षु:- अकेला स्वभाव दिखता है।
उत्तर:- अकेला अभेदनय से आत्मा है। बराबर है।

01:13:43.240 --> 01:13:54.056
यह बराबर है। वह शब्द आया।
त्रैकालिक को भी एक समय में समज लेता है।

01:13:54.080 --> 01:13:58.536
उसका एक विचार आता है। कहूँ विचार?
मुमुक्षु:- हाँ, फरमाइए।

01:13:58.560 --> 01:14:03.136
उत्तर:- वैसे तो त्रिकाली को समज लेता है,
वह तो त्रिकाली द्रव्य ही है

01:14:03.160 --> 01:14:10.856
और उसके सन्मुख होता है तभी
मोह क्षपण का समर्थपना होता है।

01:14:10.880 --> 01:14:14.736
अर्थात् इस बात को रखकर,
उपरांत विचार तो आवें न बहुत।

01:14:14.760 --> 01:14:28.256
तो अभी जैसा आत्मा मेरे अनुभव में
आया न, द्रव्य-गुण-पर्यायरूप,
भूतकाल में (भी) मेरा ज्ञेय ऐसा था।

01:14:28.280 --> 01:14:36.936
और भविष्यकाल में भी ऐसा ही ज्ञेय रहनेवाला है।
मात्र विचार था।

01:14:36.960 --> 01:14:45.496
ज्ञेय की प्रधानता है, वह ध्यान रखना।
अभी जो ज्ञेय जानने में आया मुझे, आलोचना हुई न?

01:14:45.520 --> 01:14:54.136
द्रव्य, गुण और पर्याय, क्योंकि पर्याय में तो
चिद्विवर्तन ही लिया है, उपयोग लिया है।

01:14:54.160 --> 01:14:58.976
उन्होंने मतिज्ञान या अशुद्ध उपयोग या
मिथ्याज्ञान ऐसा नहीं लिया है।

01:14:59.000 --> 01:15:07.056
भूतकाल में भी मेरा आत्मा, आज मैंने देखा न,
भले मेरे ज्ञान में नहीं आया था,
वह अलग बात है।

01:15:07.080 --> 01:15:10.240
मुमुक्षु:- वह अलग बात है।
वो डिपार्टमेंट पूरा अलग है।
उत्तर:- अलग है, वह डिपार्टमेंट अलग है।

01:15:10.240 --> 01:15:18.576
वस्तु कैसी थी पूर्व में?
पूर्व में मैं रागरूप हुआ था? कि नहीं!
मैं ज्ञान से अनन्य ही था पूर्व में।

01:15:18.600 --> 01:15:21.416
वर्तमान में अनन्य का अनुभव हुआ।

01:15:21.440 --> 01:15:26.856
प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और आलोचना के
विचार आये मुझे।

01:15:26.880 --> 01:15:36.896
भूतकाल में भी मैं ज्ञान से अनन्य था।
जैसे वर्तमान में ज्ञान से अनन्य
अनुभव हुआ मुझे प्रत्यक्ष (वैसा ही भूतकाल में अनन्य था)।

01:15:36.920 --> 01:15:40.616
मुमुक्षु:- जैसा अभी हूँ
ऐसा ही तीनों काल हूँ।
उत्तर:- ऐसा भूतकाल में, त्रिकाल हूँ।

01:15:40.640 --> 01:15:51.936
ये ज्ञेय की प्रधानता से बात है।
ऐसा विचार, पहले दो चार बार आया सही।

01:15:51.960 --> 01:16:15.816
दो चार बार हों! एक बार नहीं।
तीनों काल मैं ज्ञान से अनन्य हूँ, तीनों काल।

01:16:15.840 --> 01:16:21.336
एक समय (भी) राग से अनन्य नहीं हुआ।
तो-तो जड़ हो जाये।

01:16:21.360 --> 01:16:27.736
उसे भान नहीं था वो अलग बात है।
वस्तु की स्थिति कैसी थी?

01:16:27.760 --> 01:16:30.000
मुमुक्षु:- वस्तु की बात चलती है।
उत्तर:- वस्तु की बात चलती है।

01:16:30.000 --> 01:16:46.616
मुमुक्षु:- कि मैं कैसा था?
वह तो भान तो नया होता है यहाँ।
उत्तर:- भान नया होता है।

01:16:46.640 --> 01:16:48.960
मुमुक्षु:- ध्येय का भान भी नया होता है
और ज्ञेय का भान भी नया होता है।

01:16:48.960 --> 01:16:51.080
उत्तर:- ज्ञेय का भान भी नया होता है।
दोनों भान नये होते हैं।

01:16:51.080 --> 01:16:53.696
कुछ जानता नहीं था न। कुछ जानता नहीं था।

01:16:53.720 --> 01:16:57.456
मुमुक्षु:- ध्येय का भान हुआ उसका नाम
सम्यग्दर्शन और ज्ञेय का भान हुआ
उसका नाम सम्यग्ज्ञान।

01:16:57.480 --> 01:16:59.600
उत्तर:- बराबर, बराबर।
मुमुक्षु:- सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान नए होते हैं,

01:16:59.600 --> 01:17:04.856
किंतु मैं तो अनादि से जैसा था वैसा ही हूँ।

01:17:04.880 --> 01:17:16.136
उत्तर:- ये तो एक विचार (है)।
मुमुक्षु:- बराबर है एकदम।

01:17:16.160 --> 01:17:18.336
उत्तर:- विचार करना, बस! दूसरा क्या?

01:17:18.360 --> 01:17:29.016
क्योंकि भूतकाल में भी ज्ञेय,
रागवाला ज्ञेय नहीं लेना चाहिये।
क्योंकि अभी रागवाला (ज्ञेय) नहीं लेता है।

01:17:29.040 --> 01:17:39.716
मुमुक्षु:- फिर भूतकाल में कैसे ले सकते हैं!
उत्तर:- अभी राग रहित है।
पर्याय में राग नहीं है।

01:17:39.740 --> 01:17:43.296
वहाँ (अरिहंत में) भी नहीं है, यहाँ भी नहीं है।
निकाल दिया न राग को तो?

01:17:43.320 --> 01:17:51.136
तो एक समय पूर्व भी राग नहीं था।
भूतकाल में भी नहीं था।
पूर्व भव में भी नहीं था राग।

01:17:51.160 --> 01:17:55.656
मुमुक्षु:- वास्तव में नहीं था राग।
उत्तर:- वास्तव में नहीं था,
क्योंकि वे तो पुद्गल के ही परिणाम (हैं)।

01:17:55.680 --> 01:17:59.096
भले साथ-साथ थे। किंतु (मैं)उपयोग से अनन्य था।

01:17:59.120 --> 01:18:03.816
आज उपयोग से अनन्य भासित हुआ,
तो उपयोग से अनन्य था तो भासित हुआ न?

01:18:03.840 --> 01:18:08.916
तो कल भी अनन्य था, परसो भी अनन्य था।
इसप्रकार तुम जरा भूतकाल में लंबा दो।

01:18:08.940 --> 01:18:15.696
मुमुक्षु:- अनादि से अनन्य था,
उपयोग से अनन्य था।
उत्तर:- उपयोग से अनन्य था। ऐसा ही ज्ञेय है।

01:18:15.720 --> 01:18:28.136
गुण से अभेद ध्येय है।
पर्याय से अभेद ज्ञेय है।
ज्ञेय भी पूरा। ध्येय भी पूरा है।

01:18:28.160 --> 01:18:42.896
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय ५, सूत्र ३० )
अनादि अनंत है।

01:18:42.920 --> 01:18:57.576
देखो अब! <b>गुणपर्ययवत् द्रवयम् </b> अनादि
अनंत है। यह जैनदर्शन है न, बहुत विशाल है।

01:18:57.600 --> 01:19:02.976
बहुत विशाल है। जैनदर्शन। बहुत विशाल है।

01:19:03.000 --> 01:19:18.936
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् </b>
अनादि अनंत और
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यम् </b> भी अनादि अनंत।

01:19:18.960 --> 01:19:28.576
तो अनादि अनंत <b> गुणपर्ययवत्
द्रव्यम् </b> में क्या लोगे तुम?
उपयोग ही लेना चाहिए। राग नहीं लेना चाहिए।

01:19:28.600 --> 01:19:32.216
मुमुक्षु:- नहीं लेना चाहिए। अभी भी नहीं लेते।
उत्तर:- अभी भी नहीं लेते, तो फिर?

01:19:32.240 --> 01:19:45.896
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर बात है।
उत्तर:- ज्ञेय का ज्ञान होता है यहाँ।
ज्ञेय का ज्ञान।

01:19:45.920 --> 01:19:50.976
ध्येय तो बराबर है।
उसमें तो कोई दो मत हैं नहीं।

01:19:51.000 --> 01:19:57.616
दो मत पड़ते हों तो
ज्ञेय में पड़ते हैं जगत को।

01:19:57.640 --> 01:20:05.416
ज्ञेय में भी एक ही मत है। दो मत हैं ही नहीं।
उपयोग से अनन्य है। वह तो शास्त्र कहता है न।

01:20:05.440 --> 01:20:14.936
मुमुक्षु:- बिल्कुल सही बात है।
उत्तर:- तो आज से उपयोग से अनन्य तुझे भासित हुआ
और राग से अन्य भासित हुआ,

01:20:14.960 --> 01:20:20.656
तो तू ऐसा ही था। इसीलिए भासित हुआ।
जो था वो भासित हुआ न? आहाहा!

01:20:20.680 --> 01:20:25.496
मुमुक्षु:- पहले, जैसा था ऐसा भासित नहीं होता था,
वह तो अज्ञान था।
उत्तर:- वह तो अज्ञान था।

01:20:25.520 --> 01:20:28.176
मुमुक्षु:- अब जैसा था वैसा भासित हुआ।
उत्तर:- वैसा भासित हुआ।

01:20:28.200 --> 01:20:34.576
तो <b>गुणपर्ययवत् द्रव्यम्,
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् </b>,
अनादिअनंत है। वह ज्ञेय अनादिअनंत है।

01:20:34.600 --> 01:20:40.376
मुमुक्षु:- एकदम सच्ची बात है। बराबर है।
उत्तर:- यह तो शास्त्र का आधार तुम्हें देता हूँ।

01:20:40.400 --> 01:20:43.576
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् </b>, और
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यम् </b>।

01:20:43.600 --> 01:20:47.896
मुमुक्षु:- उसमें आता है न?
सदा उपयोग लक्षण से।
उत्तर:- सदा उपयोग लक्षण, बस वह।

01:20:47.920 --> 01:20:54.696
उस उपयोग से आत्मा अनन्य है।
और उपयोग से अनन्यरूप परिणमता है।

01:20:54.720 --> 01:21:00.856
किंतु उसकी नजर वहाँ नहीं है न, इसलिए
मैं रागरूप से परिणमता हूँ(ऐसा मानता है)।
वह तो भ्रमणा है।

01:21:00.880 --> 01:21:03.336
वह तो अज्ञान है।
वह कोई वास्तविक थोड़ी न है?

01:21:03.360 --> 01:21:06.536
मुमुक्षु:- वह कोई वस्तु थोड़ी है?
उत्तर:- वस्तु थोड़ी न ऐसी हो गई है?
वह मानता है ऐसी?

01:21:06.560 --> 01:21:09.416
मुमुक्षु:- वह तो कल्पना है।
उत्तर:- कल्पना-कल्पना। उसकी कल्पना है।

01:21:09.440 --> 01:21:26.656
आहाहा! स्वाध्याय तो स्वाध्याय है।
हमें वाद-विवाद में पड़ना नहीं है कहीं।

01:21:26.680 --> 01:21:37.176
क्योंकि प्रवचनसार ज्ञान प्रधान है।
ज्ञान भी सम्यग्ज्ञान है।

01:21:37.200 --> 01:21:46.136
ज्ञान प्रधान अर्थात् सम्यग्ज्ञान प्रधान।
तब? ज्ञान प्रधान में
द्रव्य-गुण-पर्याय तीनों आते हैं।

01:21:46.160 --> 01:21:58.636
ये सब निकलता है, (क्योंकि) ध्येय पूर्वक ज्ञेय का
स्वीकार किया तुमने, इसलिए कहता हूँ तुम्हें।

01:21:58.660 --> 01:22:03.856
जो स्वीकार न किया होता
ध्येय पूर्वक ज्ञेय का,
तो यह बात अंतर की नहीं की जाती।

01:22:03.880 --> 01:22:09.836
ऐसा ज्ञेय होता है,
होता है तो पूर्व में (भी) ऐसा था।

01:22:09.860 --> 01:22:16.256
मुमुक्षु:- ऐसा था। ऐसा भान हुआ।
उत्तर:- ऐसा भान हुआ। नया क्या किया
उसने? था ऐसा जान लिया, बस!

01:22:16.280 --> 01:22:21.336
मुमुक्षु:- ध्येय भी अनादि का।
ज्ञेय भी अनादि का। उसका भान नया होता है।

01:22:21.360 --> 01:22:25.216
उत्तर:- भान नहीं था।
ध्येय का भी भान नहीं था और
ज्ञेय का भी भान नहीं था।

01:22:25.240 --> 01:22:28.296
मुमुक्षु:- भाई, यह तो बहुत सुन्दर बात है।
टंकोत्कीर्ण बात है एकदम।

01:22:28.320 --> 01:22:36.336
तो ज्ञान में, भाई! कुछ छिपा नहीं
रह सकता है। ज्ञान में जैसा स्वरूप है
ऐसा आ ही जाता है।

01:22:36.360 --> 01:22:45.936
उत्तर:- आ ही जाता है। आ ही जाता है।
जब जब मैं यह पढ़ता हूँ न
तब तब वही भाव आता है।

01:22:45.960 --> 01:22:48.776
किन्तु दबा के रखता हूँ।

01:22:48.800 --> 01:23:06.696
मेरा जो ओब्ज़रवेशन (observation)
अथवा मेरा स्वाध्याय है वह
ज्ञानी के साथ-साथ चलने का है।

01:23:06.720 --> 01:23:13.416
अर्थात् ज्ञानी का हृदय,
यहाँ ज्ञानी क्या कहना चाहते हैं,
वहाँ मेरा लक्ष्य जाता है।

01:23:13.440 --> 01:23:35.496
अपनी जो बातें होती हैं दृष्टि के विषय की,
उन्हें आगे नहीं करना चाहिये ज्ञान प्रधान कथन में,
(उन्हें आगे करे) तो यह समझ में नहीं आता।

01:23:35.520 --> 01:24:01.256
मुमुक्षु:- बहुत मांगलिक प्रवचन है आपका।
उत्तर:- संध्या! मध्यस्थता से
विचार करनेवाले जीव कम हैं।

01:24:01.280 --> 01:24:08.296
आत्मार्थी बने तो मध्यस्थ हो।

01:24:08.320 --> 01:24:13.576
बाकी पक्षपात में, या इसकी तरफ खिंच जाता है,
या उसकी तरफ खिंच जाता है।

01:24:13.600 --> 01:24:20.776
कल पत्र पढ़ा तो वह ही हुआ,
खिंचाव खिंचाव, खिंच गये हैं।

01:24:20.800 --> 01:24:31.456
मुमुक्षु:- मध्यस्थ नहीं हैं। उत्तर:- (न)।
मुमुक्षु:- यह देखो!
कैसी मध्यस्थता! देखो न अब?

01:24:31.480 --> 01:24:47.376
इसमें भी प्रत्यक्ष दिखता ही है कि
आत्मा उपयोग में ही रहता है।

01:24:47.400 --> 01:24:52.536
अनादि से आत्मा उपयोग में ही रह रहा है।
उपयोग से बाहर गया ही नहीं आत्मा।

01:24:52.560 --> 01:24:56.736
उत्तर:- जाये कहाँ से?
मुमुक्षु:- ऐसे ज्ञेय में ही ऐसा ध्येय
स्वरूप आत्मा रहा हुआ है।

01:24:56.760 --> 01:25:01.776
उत्तर:- बस!
मुमुक्षु:- उपयोग में उपयोग है।
उत्तर:- परिणामी में अपरिणामी रहा हुआ है।

01:25:01.800 --> 01:25:06.216
वह परिणामी है। प्रति समय उपयोग से
अनन्यरूप से परिणमता है।

01:25:06.240 --> 01:25:11.496
मुमुक्षु:- परिणमता है। वस्तु ऐसी है न?
वस्तु ऐसी है।
उत्तर:- वस्तु ऐसी है। वस्तु ऐसी है।

01:25:11.520 --> 01:25:20.096
सूर्य प्रकाश में ही रहा हुआ है।
दीपक अपने प्रकाश में ही रहा हुआ है।
प्रकाश के बाहर जाता नहीं सूर्य।

01:25:20.120 --> 01:25:26.816
मुमुक्षु:- कहाँ जाये? किसप्रकार जाये?
उत्तर:- जा सकता ही नहीं, खलास!
वस्तु स्थिति है।

01:25:26.840 --> 01:25:34.456
वस्तु अपनी मर्यादा नहीं छोड़ती।
तो वस्तु का नाश हो जाये। छोड़ती ही नहीं।

01:25:34.480 --> 01:25:38.416
मुमुक्षु:- नाश तो हुआ नहीं है।
उत्तर:- हुआ नहीं है।
मतलब मर्यादा में ही रहा है।

01:25:38.440 --> 01:25:41.056
नहीं तो होता नहीं अभी आत्मा का अस्तित्व।

01:25:41.080 --> 01:25:46.976
मुमुक्षु:- उपयोग में उपयोग रहा हुआ ही है।
उत्तर:- बस! उपयोग में उपयोग है।
टंकोत्कीर्ण बात है।

01:25:47.000 --> 01:25:51.296
मुमुक्षु:- टंकोत्कीर्ण बात है, और
जयसेनाचार्य की टीका में
अभेद परिणामी लिया है।

01:25:51.320 --> 01:25:53.760
उत्तर:- हाँ, अभेद परिणामी लिया है।
मुमुक्षु:- परिणामी में अपरिणामी रहा हुआ है।

01:25:53.760 --> 01:25:59.616
उत्तर:- वह बराबर है। अभेद लिया है।
मुमुक्षु:- परिणामी में अपरिणामी
है, वह तो हम भेद करके बात करते हैं।

01:25:59.640 --> 01:26:10.616
उत्तर:- जयसेनाचार्य भगवान की जो
टीका है न वो ज्ञानप्रधान है। और ये
दृष्टिप्रधान है। इसलिए दोनों में थोड़ा अंतर है।

01:26:10.640 --> 01:26:16.536
मुमुक्षु:- किंतु दोनों अविरोध हैं।
उत्तर:- दोनों अविरोध हैं।
दोनों सम्यग्ज्ञानी महा संत हैं, आहाहा!

01:26:16.560 --> 01:26:50.056
अति आसन्नभव्य धर्मात्मा हैं, उसमें क्या?
वह स्वरूप है, स्वरूप है। ऐसा ज्ञेय है।

01:26:50.080 --> 01:26:57.536
मुमुक्षु:- क्योंकि आपने एकबार कहा था
मुंबई में। यह थोड़ी सामान्य बात हो गई,

01:26:57.560 --> 01:27:03.456
कि पर्याय बिना द्रव्य नहीं होता है
और द्रव्य बिना पर्याय नहीं होती है।

01:27:03.480 --> 01:27:08.376
तो आत्मा कौनसी पर्याय में रहा है अनादि से?
विचार करो।
उत्तर:- बस! विचार करो।

01:27:08.400 --> 01:27:13.336
मुमुक्षु:- उपयोग में रहा है।
उत्तर:- बस! उपयोग में ही रहे न?
अन्य कहाँ रहे?

01:27:13.360 --> 01:27:16.640
मुमुक्षु:- जैसा सामान्य होता है
ऐसा ही उसका विशेष होता है।
उत्तर:- ऐसा विशेष। वह विशेष में रहा हुआ है।

01:27:16.640 --> 01:27:23.736
और ऐसा सामान्य विशेषरूप से परिणमता है।
ऐसा है, उससे विशेष...

01:27:23.760 --> 01:27:32.376
मुमुक्षु:- उससे ही सामान्य की पहचान होती है न!
उत्तर:- पहचान होती है, बस!
वह उपयोग लक्षण है, वह बराबर है।

01:27:32.400 --> 01:27:35.016
मुमुक्षु:- एकदम बराबर है।
उसमें कोई अंतर नहीं है।

01:27:35.040 --> 01:27:37.936
उत्तर:- तत्त्वार्थसूत्रकार ने
जो कहा वो सत्य है।

01:27:37.960 --> 01:27:40.800
मुमुक्षु:- कैसी बात की है उन्होंने।
<b>उपयोगो लक्षणम् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय २, सूत्र ८)।

01:27:40.800 --> 01:27:49.216
१७-१८ गाथा में भी उपयोग में
आत्मा जानने में आता है।
उत्तर:- हाँ!

01:27:49.240 --> 01:27:55.056
मुमुक्षु:- कितनी स्पष्ट चोखी बात की है।
उत्तर:- स्वयं स्वयं को जाननेरूप परिणम
रहा है। परिणामी है आत्मा, बोलो!

01:27:55.080 --> 01:28:01.816
मुमुक्षु:- उसका परिणाम लिया है।
उत्तर:- लिया है, तब! वह ज्ञेय है।
वह ज्ञेय अनादि अनंत है।

01:28:01.840 --> 01:28:07.176
वह १७-१८ गाथा का जो भाव है
वह अनादि अनंत है।
मुमुक्षु:- वस्तु की स्थिति ऐसी है।

01:28:07.200 --> 01:28:12.216
उत्तर:- वस्तु की स्थिति ऐसी है।
उपयोग में आत्मा का अनुभव होता है।
आहाहा! वह ज्ञेय है।

01:28:12.240 --> 01:28:17.936
वह ज्ञेय अनादिअनंत है।
स्वीकार न करे वह तो उसकी भूल है।
वह अलग बात है।

01:28:17.960 --> 01:28:38.816
वह तो अलग व्यक्तिगत बात हो गई। व्यक्तिगत।
समस्तीगत क्या है? वस्तु का स्वरूप। बस!

01:28:38.840 --> 01:28:44.656
मुमुक्षु:- इसमें कितने सारे न्याय हैं।
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् </b>
वह अनादि अनंत है न?

01:28:44.680 --> 01:28:48.776
उत्तर:- <b>गुणपर्ययवत् द्रव्यम् </b> भी ..
मुमुक्षु:- अनादि अनंत है।