﻿WEBVTT LA337 Hindi

00:01:03.080 --> 00:01:07.656
<p>श्री नियमसारजी  परमागम शास्त्र है।

00:01:07.680 --> 00:01:21.656
इसका शुद्धभाव अधिकार यानि
शुद्ध आत्मा का अधिकार, गाथा ५० चलती है।

00:01:21.680 --> 00:01:27.736
इसमें हेय तत्त्व क्या है और
उपादेय तत्त्व क्या है?

00:01:27.760 --> 00:01:32.256
उसकी उत्कृष्ट में उत्कृष्ट
भेदज्ञान की गाथा है।

00:01:32.280 --> 00:01:45.016
<p>जैसे ३८ गाथा में, अधिकार शुरू करते हुए,
सात तत्त्वों के समूह को बहिर्तत्त्व कहकर
परद्रव्य कहा

00:01:45.040 --> 00:01:49.976
और अन्तःतत्त्व शुद्धात्मा को
स्वद्रव्य कहकर उपादेय कहा।

00:01:50.000 --> 00:02:00.736
ऐसे यहाँ ५० गाथा में चार विभाव भाव
जो प्रगट होते हैं वे परस्वभाव हैं,

00:02:00.760 --> 00:02:08.576
परद्रव्य हैं, आत्मा से भिन्न हैं
इसलिए वे उपादेय नहीं, हेय हैं

00:02:08.600 --> 00:02:16.216
और उन चार भावों से रहित
शुद्धात्मा एक ही उपादेय है

00:02:16.240 --> 00:02:28.056
इसप्रकार हेय और उपादेय के स्वरूप का कथन यहाँ
किया गया है, उसमें इस गाथा का पूर्वार्ध हुआ।

00:02:28.080 --> 00:02:33.856
<p>अभी उत्तरार्ध थोड़ा बाकी है।

00:02:33.880 --> 00:02:45.056
पूर्वार्ध में ऐसा कहा कि जितनी विभावगुणपर्यायें हैं, 
वे पूर्व में व्यवहारनय के कथन
द्वारा उपादेयरूप कही गई थी।

00:02:45.080 --> 00:02:53.576
यानि विभाव पर्याय हैं- उदय, उपशम,
क्षय, क्षयोपशम आदि भाव 'हैं' सही।

00:02:53.600 --> 00:03:02.416
और वे 'हैं'  इसलिए जानने योग्य हैं और
जानने की अपेक्षा से उपादेय हैं

00:03:02.440 --> 00:03:10.016
ऐसे शब्दों का प्रयोग करने में आया था
<b>किन्तु</b>, ऐसा।

00:03:10.040 --> 00:03:21.136
<p> <b>किन्तु शुद्धनिश्चयनय के बल से </b> अर्थात् अन्तर्मुख
दृष्टि से सामान्य स्वभाव का अवलोकन करने पर

00:03:21.160 --> 00:03:30.416
<b>वे हेय हैं। </b> अर्थात् उनका
लक्ष होता नहीं, उनका आश्रय होता नहीं।

00:03:30.440 --> 00:03:34.776
और अभेद में भेद जानने में भी नहीं आता।

00:03:34.800 --> 00:03:41.296
<p> वे <b>किस कारण से </b> हेय हैं?
उसका कारण बतलाते हैं।

00:03:41.320 --> 00:03:49.496
<b>क्योंकि वे</b> अर्थात्
सभी विभावगुणपर्यायें <b>परस्वभाव हैं</b>।

00:03:49.520 --> 00:03:58.896
परस्वभाव इसलिए कहा क्योंकि  जो
शुद्धात्मा का लक्षण परमपारिणामिक भाव है,

00:03:58.920 --> 00:04:05.136
ऐसा लक्षण इन किसी भी चार भावों में नहीं है।

00:04:05.160 --> 00:04:13.336
<p>किसी का लक्षण उदय भाव, किसी का उपशम, 
किसी का क्षयोपशम, किसी का क्षायिक, ये पर्याय हैं।

00:04:13.360 --> 00:04:19.896
इनसे रहित द्रव्य स्वभाव है उसका
लक्षण परमपारिणामिक  भाव है।

00:04:19.920 --> 00:04:27.056
चारों भाव कर्म सापेक्ष हैं और
भगवान आत्मा  कर्म से निरपेक्ष है।

00:04:27.080 --> 00:04:34.336
चारों भाव अनित्य और अध्रुव हैं और
भगवान आत्मा नित्य और ध्रुव है।

00:04:34.360 --> 00:04:40.136
इसलिए यह शुद्धात्मा उपादेय है,
कोई भी पर्याय उपादेय नहीं है।

00:04:40.160 --> 00:04:50.296
<p>किस कारण से वे उपादेय नहीं हैं? किस कारण हेय हैं?
<b>क्योंकि वे परस्वभाव हैं,</b> परभाव हैं ।

00:04:50.320 --> 00:04:55.896
आत्मा के स्वभाव भाव से विरुद्ध
भाव को परभाव कहने में आता है।

00:04:55.920 --> 00:05:05.216
आत्मा नित्य शुद्ध है और ये 
परिणाम अनित्य और शुद्धाशुद्ध हैं।

00:05:05.240 --> 00:05:08.216
इसलिए हेय हैं और परस्वभाव हैं।

00:05:08.240 --> 00:05:19.576
और परस्वभाव होने के कारण <b>इसीलिये </b> वे
<b>परद्रव्य हैं।</b> और परद्रव्य हैं इसलिए हेय हैं।

00:05:19.600 --> 00:05:27.416
<p>हेय का कारण बतलाया। परस्वभाव हैं,
परस्वभाव होने से परद्रव्य हैं
और परद्रव्य उपादेय नहीं है।

00:05:27.440 --> 00:05:34.216
अर्थात् परद्रव्य में आत्मबुद्धि करने
योग्य नहीं है। परद्रव्य में आत्मा नहीं है।

00:05:34.240 --> 00:05:38.536
आत्मा आत्मा में है और परिणाम परिणाम में है।

00:05:38.560 --> 00:05:46.136
परिणाम में आत्मा नहीं है और
आत्मा में परिणाम नहीं है।
इसलिए वह परद्रव्य है, इसलिए वह हेय है।

00:05:46.160 --> 00:05:56.976
<p>अब, हेय की बात तो की, फिर उसके सामने
उपादेय तत्त्व क्या है ? - यह कहना चाहिये।

00:05:57.000 --> 00:06:04.856
मूल में पहले हेय की बात की है।

00:06:04.880 --> 00:06:13.656
अन्वयार्थ में - <b>पूर्वोक्त सर्व भाव पर स्वभाव हैं,
परद्रव्य हैं, इसलिये हेय हैं।</b>

00:06:13.680 --> 00:06:22.056
हेय का कारण बतलाया था।
<b>पर स्वभाव हैं, परद्रव्य हैं, इसलिये </b>
वे <b>हेय हैं </b> इसप्रकार कारण दिया था।

00:06:22.080 --> 00:06:29.416
इतनी डेढ़ पंक्ति की टीका हुई ।

00:06:29.440 --> 00:06:35.376
<p>अब उपादेय जो मूल में है।

00:06:35.400 --> 00:06:47.136
<b>अन्तःतत्त्व ऐसा स्वद्रव्य---आत्मा </b>,
स्वद्रव्य यानि आत्मा।
एक परद्रव्य और एक स्वद्रव्य।

00:06:47.160 --> 00:06:55.536
परद्रव्य के भेद - संख्यात, असंख्यात
और अनंत - भेद हैं परद्रव्य के।

00:06:55.560 --> 00:07:05.096
और स्वद्रव्य अभेद एक है।
स्वद्रव्य में अनेकपना नहीं है।
शुद्धात्मा एक ही है।

00:07:05.120 --> 00:07:10.696
शुद्धात्मा में दो प्रकार नहीं हैं।
परद्रव्य तो अनंत हैं।

00:07:10.720 --> 00:07:15.856
परिणाम मात्र अनंत पर्याय।
अनन्तगुणों की अनंत पर्याय परद्रव्य (हैं)।

00:07:15.880 --> 00:07:25.776
कर्म रजकण अनंत परद्रव्य। पुद्गल-परमाणु
अनंतानंत पुद्गल वे परद्रव्य (हैं)।

00:07:25.800 --> 00:07:29.416
अनंत दूसरे जीव वे परद्रव्य।

00:07:29.440 --> 00:07:39.776
धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश
और काल ये सभी परद्रव्य हैं।
तब स्वद्रव्य क्या है?

00:07:39.800 --> 00:07:46.136
<p>कि अन्तःतत्त्व अंदर में रहा हुआ।
वह बहिर्तत्त्व और यह अन्तःतत्त्व।

00:07:46.160 --> 00:08:00.496
<b>ऐसा स्वद्रव्य-- </b>, स्वद्रव्य का अर्थ किया
<b>आत्मा </b>। स्वद्रव्य यानि क्या?
आत्मा। <b>उपादेय है।</b>

00:08:00.520 --> 00:08:05.856
इतनी जो आखरी पंक्ति है,
उसकी टीका अब आती है।

00:08:05.880 --> 00:08:15.136
<p><b>अन्तःतत्त्व ऐसा स्वद्रव्य-- </b> यानि
<b>आत्मा उपादेय है।</b> इसका विस्तार आता है।

00:08:15.160 --> 00:08:19.256
<b>सर्व विभावगुणपर्यायों से रहित</b>,

00:08:19.280 --> 00:08:28.256
यहाँ से शुरुआत की। शुद्धात्मा जो है
वह परिणाममात्र से भिन्न,
परिणाममात्र से रहित है।

00:08:28.280 --> 00:08:33.416
शुद्ध आत्मा भिन्न है और परिणाम भिन्न हैं।

00:08:33.440 --> 00:08:38.496
परिणाम में आत्मा नहीं है और
आत्मा में परिणाम नहीं हैं।

00:08:38.520 --> 00:08:49.056
<p> कहते हैं <b>सर्व </b> शब्द का प्रयोग किया  
<b>विभावगुणपर्यायों</b>
विशेष गुण की पर्यायें जो प्रगट होती हैं,

00:08:49.080 --> 00:08:56.536
वे प्रगट होती हैं। जो प्रगट होती हैं
वे प्रगट से भिन्न हैं।

00:08:56.560 --> 00:09:02.456
प्रकट है वह द्रव्य है। और प्रकट होते हैं
वो उसके परिणाम प्रकट होते हैं।

00:09:02.480 --> 00:09:06.936
प्रकट है उससे
जो प्रकट होता है वह भिन्न है।

00:09:06.960 --> 00:09:18.896
<p>सोना प्रकट है और सोने के परिणाम -
घाट (डिज़ाइन) प्रकट होते हैं, वे सोने से भिन्न हैं,
सोना नहीं हैं।

00:09:18.920 --> 00:09:26.976
कहने में तो सोना आता है,
वह कथनमात्र है। वह सोना नहीं है।

00:09:27.000 --> 00:09:34.536
सोना तो जो प्रकट है, है-है-है-है
अनादि अनंत सोना उसे स्व कहते हैं।

00:09:34.560 --> 00:09:39.176
और ये (पर्यायें) तो प्रकट होकर नाश होती हैं,
प्रकट होकर नाश होती हैं, ऐसा।

00:09:39.200 --> 00:09:45.456
<p><b>सर्व विभावगुणपर्यायों से रहित </b>।
जो प्रकट होती हैं, पर्यायें,

00:09:45.480 --> 00:09:50.736
उनसे भगवान आत्मा
जो उपादेय तत्व कहना है वह रहित है।

00:09:50.760 --> 00:09:56.776
परिणाममात्र से आत्मा भिन्न-रहित है,
व्यतिरिक्त है। 

00:09:56.800 --> 00:10:04.416
ऐसा जो <b>शुद्ध-अन्तस्तत्त्वस्वरूप </b>
अन्तःतत्त्व की व्याख्या करते हैं। 

00:10:04.440 --> 00:10:11.056
उसमें कहा अन्तःतत्त्व। 
उस अन्तःतत्त्व की व्याख्या करते हुए कहा कि

00:10:11.080 --> 00:10:16.016
जो बहिर्तत्त्व है उससे
रहित होने से अन्तःतत्त्व है। 

00:10:16.040 --> 00:10:23.776
विभावगुण पर्यायें बहिर्तत्त्व हैं और
उनसे जो रहित होता है वह अन्तःतत्त्व है। 

00:10:23.800 --> 00:10:26.176
उनसे रहित तीनो काल है। 

00:10:26.200 --> 00:10:33.696
<p>बंध-मोक्ष के परिणाम से रहित,
नौ तत्वों से रहित , प्रमत्त-अप्रमत्त से रहित,

00:10:33.720 --> 00:10:40.856
सुख-दुःख के परिणाम से रहित, राग से रहित,
इन्द्रिय ज्ञान से रहित, श्रुतज्ञान से रहित,

00:10:40.880 --> 00:10:50.296
केवलज्ञान से रहित, मोक्ष से रहित, आहाहा !
ऐसा जो <b>सर्व विभावगुणपर्यायों से रहित</b>

00:10:50.320 --> 00:10:54.816
अनादि अनंत रहित है। 
एक समय भी सहित नहीं होता। 

00:10:54.840 --> 00:11:00.816
<p>(यदि) एक समय भी पर्याय से सहित द्रव्य हो जाये,
तो दूसरे समय द्रव्य का नाश हो जाये।

00:11:00.840 --> 00:11:07.256
रहित ही है और
रहित रहनेवाला है, अनादि अनंत।

00:11:07.280 --> 00:11:14.376
निगोद में भी परिणाम से रहित रहा है और
सिद्ध भगवान की पर्याय जो प्रकट हुई,

00:11:14.400 --> 00:11:20.536
उससे भी आत्मा रहित रहा है
और अनंतकाल रहित रहनेवाला है।

00:11:20.560 --> 00:11:25.776
सिद्ध पर्याय से आत्मा तीनों काल रहित रहेगा।

00:11:25.800 --> 00:11:32.456
<p>जो पर्याय से रहित रहे वह उपादेय है।
आहाहा! पर्यायमात्र हेय है।

00:11:32.480 --> 00:11:36.536
<b>सर्व विभावगुणपर्यायों से रहित </b> आहाहा!

00:11:36.560 --> 00:11:44.656
इस सहित का शल्य वह संसार (है) और
रहित का ज्ञान वह मोक्ष का मार्ग (है)।

00:11:44.680 --> 00:11:58.416
<p><b>सर्व विभावगुणपर्यायों से रहित 
शुद्ध-अन्तस्तत्त्वस्वरूप स्वद्रव्य उपादेय है।</b>

00:11:58.440 --> 00:12:04.896
लो, ये स्वद्रव्य की व्याख्या की।
अन्तःतत्त्व ऐसा स्वद्रव्य।

00:12:04.920 --> 00:12:08.576
स्वद्रव्य किसको कहते हैं?
कि परिणाममात्र से रहित

00:12:08.600 --> 00:12:12.016
उसे शुद्धात्मा स्वद्रव्य,
निजद्रव्य कहने में आता है।

00:12:12.040 --> 00:12:18.176
<b>शुद्ध-अन्तस्तत्त्वस्वरूप
स्वद्रव्य उपादेय है।</b>

00:12:18.200 --> 00:12:20.776
स्वद्रव्य उपादेय है यानि
आत्मा उपादेय है।

00:12:20.800 --> 00:12:24.656
आत्मा कैसा है?
परिणाममात्र से भिन्न है।

00:12:24.680 --> 00:12:30.216
<p>परिणाममात्र से रहित है।
इसलिए आत्मा परिणाम का कर्ता-भोक्ता नहीं है।

00:12:30.240 --> 00:12:37.376
परिणाम का कर्ता-भोक्ता क्यों नहीं है?
क्योंकि वो परिणाम स्वयं परद्रव्य है।

00:12:37.400 --> 00:12:41.536
जैसे इस  (क्लिप) पदार्थ का
कर्ता-भोक्ता आत्मा नहीं है,

00:12:41.560 --> 00:12:50.536
ऐसे ही अध्यात्म की पराकाष्ठा में उत्पन्न हुए
जो परिणाम, उनका आत्मा कर्ता-भोक्ता नहीं है।

00:12:50.560 --> 00:12:55.856
क्योंकि आत्मा परिणाम से भिन्न है
और परिणाम आत्मा से भिन्न हैं।

00:12:55.880 --> 00:13:01.696
अतः दोनों के बीच कर्ता-कर्म
संबंध का अभाव है। आहाहा!

00:13:01.720 --> 00:13:07.496
और जहाँ व्याप्य-व्यापक, कर्ता-कर्म (संबंध)
कहा हो, वहाँ (उसे) व्यवहार समझना चाहिए।

00:13:07.520 --> 00:13:13.176
और दृष्टि प्राप्त करने के लिए वो व्यवहार
भी अभूतार्थ और असत्यार्थ है ऐसा जानना।

00:13:13.200 --> 00:13:19.736
<p>स्वद्रव्य उपादेय है।

00:13:19.760 --> 00:13:28.336
<b>सर्व विभावगुणपर्यायों से रहित शुद्ध-
अन्तस्तत्त्वस्वरूप स्वद्रव्य उपादेय है।</b>

00:13:28.360 --> 00:13:33.256
अब, जो स्वद्रव्य उपादेय है
तो उस स्वद्रव्य में क्या है?

00:13:33.280 --> 00:13:38.856
उनमें विभावरूप पर्यायें थी चार में,
तो स्वद्रव्य में कुछ तो होगा ना?

00:13:38.880 --> 00:13:44.136
कोई खाली नहीं है। पर्याय से रहित है,
तो सहित किससे है?

00:13:44.160 --> 00:13:47.616
<p>एकत्व-विभक्त की बात करते हैं।

00:13:47.640 --> 00:13:54.696
अनन्तगुणों से एकपना है और अनंत पर्यायों से
विभक्त नाम भिन्नपना है आत्मा का।

00:13:54.720 --> 00:14:04.696
यह भेदज्ञान की पराकाष्ठा चलती है।
पराकाष्ठा में एक स्वद्रव्य
और अन्य सब परद्रव्य।

00:14:04.720 --> 00:14:12.136
आहाहा ! एक शुद्धात्मा स्वद्रव्य,
बाकी मुझसे भिन्न छह द्रव्य परद्रव्य,

00:14:12.160 --> 00:14:20.936
मुझसे भिन्न पंचपरमेष्ठी परद्रव्य,
चौदह गुणस्थान, मार्गणास्थान परद्रव्य,

00:14:20.960 --> 00:14:25.616
आठ कर्म परद्रव्य,
शरीर परद्रव्य, आहाहा!

00:14:25.640 --> 00:14:36.896
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के परिणाम के भेद
भी परद्रव्य हैं। स्वद्रव्य नहीं हैं। आहाहा!

00:14:36.920 --> 00:14:44.016
<p>अब यह <b>स्वद्रव्य उपादेय है</b> इसकी
व्याख्या करते हैं. हेय की व्याख्या हो गई।

00:14:44.040 --> 00:14:47.136
अब उपादेय की व्याख्या करते हैं।
उपादेय तत्त्व यानि क्या?

00:14:47.160 --> 00:14:56.256
<b>वास्तव में सहजज्ञान, </b> यानि सहज गुण,
ज्ञान नाम का आत्मा में एक त्रिकाली गुण है।

00:14:56.280 --> 00:15:01.656
आत्मा का स्वभाव ज्ञान और
ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना।

00:15:01.680 --> 00:15:09.056
<p>अब देखो, आत्मा का स्वभाव क्या है?
कि ज्ञान। ज्ञान आत्मा का गुण है।

00:15:09.080 --> 00:15:13.856
आत्मा गुणी है और ज्ञान उसका गुण है।

00:15:13.880 --> 00:15:22.016
सोना है वह गुणी है और चिकनाई, पीलापन
उसके गुण हैं और वह घाट से रहित है।

00:15:22.040 --> 00:15:33.376
आहाहा! गुण की पर्याय , गुण की पर्याय,
वह गुण की पर्याय, पर्याय से गुण रहित।

00:15:33.400 --> 00:15:38.256
जिसकी पर्याय है उस पर्याय से गुण रहित है।

00:15:38.280 --> 00:15:45.776
यानि कि वह गुण की पर्याय ही नहीं है,
वह परद्रव्य है। आहाहा!

00:15:45.800 --> 00:15:54.136
अब पर्याय को भूल जा तू ।
कि द्रव्य की पर्याय और गुण की पर्याय 
और अर्थ पर्याय और व्यंजन पर्याय

00:15:54.160 --> 00:16:01.296
- ये थोड़ी देर के लिए भूल जा, वो परद्रव्य है। आहाहा!
पर्याय को जानेगा तो उसमें ममता रहेगी।

00:16:01.320 --> 00:16:04.896
पर्याय को जानेगा तो उसमें
कर्ता-भोक्ता की भ्रान्ति रह जाएगी।

00:16:04.920 --> 00:16:11.096
और परद्रव्य कहने पर
सारी भ्रान्ति मिट जाएगी।

00:16:11.120 --> 00:16:15.856
<p>उपादेय तत्त्व कैसा है ?
वास्तव में आत्मा उपादेय है।

00:16:15.880 --> 00:16:21.016
उपादेय यानि आश्रय करने योग्य,
अहं करने योग्य। आहाहा!

00:16:21.040 --> 00:16:24.216
आत्मा के साथ स्वस्वामी संबंध जोड़ने योग्य।

00:16:24.240 --> 00:16:29.576
वह  वास्तव में सहज ज्ञान यानि ज्ञान नाम का गुण

00:16:29.600 --> 00:16:35.776
- उसका परमपारिणामिक लक्षण नित्य
निरावरण और परिपूर्ण।

00:16:35.800 --> 00:16:51.456
ज्ञान गुण, परमपारिणामिक लक्षण वाला गुण,
परिपूर्ण और नित्य निरावरण ऐसा
ज्ञान नाम का आत्मा में गुण है। आहाहा!

00:16:51.480 --> 00:16:58.336
आत्मा में पर्याय नहीं है।
गुण है और गुण की पर्याय नहीं है।

00:16:58.360 --> 00:17:08.136
आत्मा में ज्ञान गुण तो है। परन्तु ज्ञान गुण की
क्रम से पांच पर्याय होती हैं, वे आत्मा में नहीं हैं।

00:17:08.160 --> 00:17:15.896
मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान
ये पांच प्रकार की सम्यक्ज्ञान की पर्याय

00:17:15.920 --> 00:17:25.776
ज्ञान गुण में नहीं हैं।
गुण की पर्यायें गुण में नहीं हैं।

00:17:25.800 --> 00:17:30.496
<p>मुमुक्षु:- गुण की पर्यायें कहना
और गुण में नहीं हैं?

00:17:30.520 --> 00:17:33.776
<p>उत्तर:- गुण की पर्याय कहना और गुण में नहीं हैं!

00:17:33.800 --> 00:17:47.336
गुण में नहीं हैं अतः वे गुण नहीं हैं
परन्तु वे परद्रव्य हैं। आहाहा!

00:17:47.360 --> 00:17:51.976
सहजज्ञान आत्मा में यह त्रिकाली गुण है।

00:17:52.000 --> 00:17:54.696
<p>दूसरा दर्शनगुण आत्मा में है।

00:17:54.720 --> 00:18:00.016
दर्शनगुण आत्मा में है परन्तु वह अपरिणामी है।
परिणमता नहीं है। 

00:18:00.040 --> 00:18:06.176
यदि परिणमे तो चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन,
अवधि और केवलदर्शन उपयोग दिखाई दे।

00:18:06.200 --> 00:18:13.056
लेकिन वह तो अनादि अनंत अपरिणामी,
कूटस्थ और निष्क्रिय है। आहाहा!

00:18:13.080 --> 00:18:20.776
परिणाम से अब गुण को मत देखो।
द्रव्य को परिणामी से मत देखो।

00:18:20.800 --> 00:18:25.616
परिणाम से मत देखो और 'परिणामी है'- ऐसा मत देखो। 
अपरिणामी देखो।

00:18:25.640 --> 00:18:30.976
और गुण को भी, परिणाम होते हैं ऐसा मत देखो।

00:18:31.000 --> 00:18:37.656
गुण परिणमता है ऐसा मत देखो ।
गुण है ऐसा देखो।

00:18:37.680 --> 00:18:52.056
आहाहा ! अद्भुत है बात!
५० वीं गाथा यानि शीर्ष (की गाथा)। आहाहा!

00:18:52.080 --> 00:18:58.656
<p>यहाँ शुद्धभाव अधिकार। शुद्धभाव
अधिकार पूरा होता है ५० गाथा में।

00:18:58.680 --> 00:19:06.416
३८ गाथा से शुरू होकर ५० में निश्चयनय का विषय
पूरा होने के बाद ५१ से व्यवहारनय की बात बतायेंगे।

00:19:06.440 --> 00:19:16.656
<p>‘<b>सहजज्ञान</b>' यह आत्मा का एक त्रिकाली
सामान्य गुण , नित्य निरावरण , परिपूर्ण शुद्ध है।

00:19:16.680 --> 00:19:30.856
आहाहा ! वह ज्ञान गुण परिणमता नहीं है।
आहाहा ! ज्ञानगुण कूटस्थ है।
ज्ञानगुण निष्क्रिय है।

00:19:30.880 --> 00:19:44.776
गुण के परिणाम नहीं होते। परिणाम कहते ही
गुण नजर में नहीं आयेगा, पर्याय नजर में आएगी।

00:19:44.800 --> 00:19:51.976
गुण को देखना हो तो गुण की
पर्याय को मत देखो तो गुण दिखेगा।

00:19:52.000 --> 00:19:55.816
गुण की पर्याय को देखोगे तो गुण जानने में नहीं  आयेगा।

00:19:55.840 --> 00:20:03.316
और गुण जानने में नहीं आयेगा
तो गुणी भी जानने में नहीं आयेगा।  आहाहा !

00:20:03.340 --> 00:20:10.016
सहज ज्ञान, सहज दर्शन गुण है।

00:20:10.040 --> 00:20:17.576
<p>सहज चारित्र आत्मा का
एक त्रिकाली गुण है। आहाहा !

00:20:17.600 --> 00:20:27.776
उस चारित्र नाम के गुण के यथाख्यात
चारित्ररूप परिणाम नहीं होते हैं।

00:20:27.800 --> 00:20:36.616
वह परिणाम, परिणाम से होता है, गुण से नहीं।
चारित्र गुण की पर्याय को
चारित्र गुण का आधार नहीं है।

00:20:36.640 --> 00:20:45.136
ज्ञान गुण की पर्याय को उस गुण का आधार नहीं है।
इसलिए गुणी ऐसे द्रव्य के आधार से
पर्याय होती नहीं है।

00:20:45.160 --> 00:20:53.016
<p>दर्शन गुण, उसका केवलदर्शन उपयोग,
उसका आधार गुण नहीं है और गुणी भी नहीं है।

00:20:53.040 --> 00:20:55.816
आधार-आधेय संबंध का अभाव है।

00:20:55.840 --> 00:21:04.096
पर्याय का आधार पर्याय है परन्तु
पर्याय का आधार गुण भी नहीं है और
पर्याय का आधार गुणी भी नहीं है।

00:21:04.120 --> 00:21:16.496
क्योंकि व्यतिरिक्त अर्थात् भिन्न है।
एकदम पराकाष्ठा है भेदज्ञान की,
स्वद्रव्य और परद्रव्य के विभाग की। 

00:21:16.520 --> 00:21:23.336
<p>चारित्र नाम का गुण त्रिकाल,
नित्य शुद्ध, नित्य निरावरण।

00:21:23.360 --> 00:21:34.856
इस गुण का चारित्र मोहनीय के साथ संबंध हुआ नहीं है
और किसी भी काल में होने वाला भी नहीं है।

00:21:34.880 --> 00:21:45.296
चारित्र गुण को पर्याय नहीं होती।
गुण की पर्याय देखोगे तो गुण नजर में नहीं आयेगा।

00:21:45.320 --> 00:21:59.856
और गुण को भेद से देखोगे
तो गुणी नजर में नहीं आयेगा।

00:21:59.880 --> 00:22:07.616
पर्याय को देखोगे, चारित्र गुण की पर्याय,
स्वरूपाचरण चारित्र की (देखोगे),
तो गुण हाथ में नहीं आयेगा।

00:22:07.640 --> 00:22:12.056
और गुण को देखोगे तो गुणी हाथ में नहीं आयेगा।

00:22:12.080 --> 00:22:18.256
भगवान अभेद आत्मा में पर्याय भी नहीं है और
गुण-भेद होने पर भी दिखाई नहीं देता।

00:22:18.280 --> 00:22:20.776
अभेद में भेद दिखाई नहीं देता।

00:22:20.800 --> 00:22:23.976
<p>मुमुक्षु: गुणभेद ?
<p>उत्तर: गुणभेद दिखाई नहीं देता।

00:22:24.000 --> 00:22:29.656
गुण हैं। पर्याय नहीं है
और गुण हैं, परन्तु गुणभेद नहीं है।

00:22:29.680 --> 00:22:39.136
फिर से. पर्यायें तो हैं ही नहीं द्रव्य में,
वे तो व्यतिरिक्त हैं परन्तु
सहज ज्ञान, दर्शन, चारित्र गुण हैं।

00:22:39.160 --> 00:22:44.816
गुण हैं परन्तु गुण भेद दिखाई नहीं देता।

00:22:44.840 --> 00:22:53.176
पर्याय दिखाई दे तो तो परद्रव्य का दर्शन हुआ।
और गुण-भेद दिखाई दे तो भी परद्रव्य है वो।

00:22:53.200 --> 00:23:01.136
गुणी में गुण का भेद करना
उसे परद्रव्य कहने में आया है।

00:23:01.160 --> 00:23:06.296
कहाँ कहा है?
२५२ (कलश) में कहा है। आहाहा!

00:23:06.320 --> 00:23:16.256
एकदम गाथा टोप मोस्ट (top most) है। आहाहा!

00:23:16.280 --> 00:23:21.696
सभी प्रकार के व्यवहार के पक्ष छूट जायें,
अभेद निश्चय का पक्ष आ जाये

00:23:21.720 --> 00:23:32.336
और पक्षातिक्रांत होकर अनुभव हो जाये
ऐसी गाथा है यह।

00:23:32.360 --> 00:23:42.696
कहते हैं कि चारित्र गुण। फिर आगे
<b>सहजपरमवीतरागसुखात्मक </b>
आत्मा में सुख नाम का गुण है।

00:23:42.720 --> 00:23:52.256
उसकी पर्याय नहीं है यानि दुःख नहीं है आत्मा में।
और अनाकुल सुख भी आत्मा में नहीं है
क्योंकि सुख गुण की पर्याय नहीं है।

00:23:52.280 --> 00:24:00.736
सुख गुण की पर्याय देखने जाओगे तो
सुख गुण ख्याल में नहीं आयेगा।
वो परद्रव्य ख्याल में आयेगा।

00:24:00.760 --> 00:24:05.216
सुख गुण की पर्याय देखने पर,
वो पर्याय परद्रव्य है।

00:24:05.240 --> 00:24:11.296
पर्याय पर - परद्रव्य पर लक्ष करने से
विकल्प उत्पन्न होगा।
निर्विकल्प अनुभव नहीं होगा।

00:24:11.320 --> 00:24:25.296
और सुख नाम के गुणभेद पर नजर होगी
तो भी वह परद्रव्य के ऊपर लक्ष है।
वह स्वद्रव्य के ऊपर लक्ष नहीं है। आहाहा!

00:24:25.320 --> 00:24:33.656
<b>शुद्ध-अन्तस्तत्त्वस्वरूप इस स्वद्रव्य का आधार </b>
यानि गुणों का आधार, आहाहा!

00:24:33.680 --> 00:24:44.176
गुणों का आधार गुणी है परन्तु
पर्यायों का आधार द्रव्य नहीं है।

00:24:44.200 --> 00:24:50.976
आधार-आधेय गुण और गुणी के बीच
इतना व्यवहार है। भेद रूप।

00:24:51.000 --> 00:24:57.456
परन्तु परद्रव्य और स्वद्रव्य के बीच
व्यवहार से भी आधार-आधेय संबंध नहीं है,

00:24:57.480 --> 00:25:04.216
और गुण और गुणी के तो
व्यवहार से आधार-आधेय संबंध है।
सूक्ष्म बात है।

00:25:04.240 --> 00:25:14.016
कहते हैं- अब आधार की बात करते हैं।
कि जो गुण कहे वे किसके आधार से हैं?

00:25:14.040 --> 00:25:18.976
कि कारणसमयसार ऐसे गुणी
परमात्मा के आधार से हैं।

00:25:19.000 --> 00:25:27.016
तो पर्याय किसके आधार से है?
कि पर्याय, पर्याय के आधार से है।
पर्याय को द्रव्य का आधार नहीं है।

00:25:27.040 --> 00:25:30.976
निषेध कर दिया।
गुणों को द्रव्य का आधार है।

00:25:31.000 --> 00:25:37.856
पर्याय को गुणों का या द्रव्य का आधार नहीं है।
क्यों नहीं है? क्योंकि परद्रव्य है।

00:25:37.880 --> 00:25:47.416
आहाहा ! और गुण तो व्यवहार से स्वद्रव्य हैं।

00:25:47.440 --> 00:25:54.976
<p>फिर से। पर्यायें तो व्यवहार से भी स्वद्रव्य नहीं हैं।

00:25:55.000 --> 00:26:05.816
और ज्ञान, दर्शन गुण हैं वे
व्यवहार से स्वद्रव्य हैं परन्तु
निश्चय से वे स्वद्रव्य नहीं हैं। आहाहा!

00:26:05.840 --> 00:26:13.696
उन्हें व्यवहार क्यों कहा?
क्योंकि गुण गुणी के आधार से हैं।
परन्तु पर्याय तो द्रव्य के आधार से नहीं हैं।

00:26:13.720 --> 00:26:21.456
द्रव्य के आधार से होती ही नहीं हैं (पर्यायें)।
आधार-आधेय संबंध का अभाव है।
आहाहा! परम सत्य है।

00:26:21.480 --> 00:26:25.776
पर्यायदृष्टि छूट जाती है। ये परिणाम मेरे
और मैं परिणाम को करुँ

00:26:25.800 --> 00:26:32.376
और सम्यग्दर्शन प्रकट करूँ और ध्यान करने
बैठ जाऊं और ध्यान प्रकट करूँ, आहाहा!

00:26:32.400 --> 00:26:45.656
वो परद्रव्य का ध्यान तू कर रहा है।
आहाहा ! परद्रव्य से स्वद्रव्य का
ध्यान नहीं होगा।

00:26:45.680 --> 00:26:53.856
<p><b>इस स्वद्रव्य </b> यानि स्वगुणों
<b>का आधार </b>,गुणों को गुणी का आधार है।

00:26:53.880 --> 00:27:02.816
सोना है सोना- वह द्रव्य कहलाता है।
और उसमें चिकनापन, भारीपन उसके गुण हैं।

00:27:02.840 --> 00:27:12.256
ये गुण हैं, वे सोने के आधार से हैं,
परन्तु जो घाट होता है वह सोने के आधार से नहीं है।

00:27:12.280 --> 00:27:23.216
उसे आधार-आधेय संबंध का अभाव है।
इसलिए कर्ता-कर्म संबंध का अभाव है।
इसलिए परिणाम का आधार परिणाम है।

00:27:23.240 --> 00:27:28.896
<p>परिणाम द्रव्य के आधार से नहीं होते।
द्रव्य को परिणाम अड़ते नहीं हैं।

00:27:28.920 --> 00:27:36.896
द्रव्य को परिणाम स्पर्शते नहीं हैं।
क्योंकि परद्रव्य हैं।

00:27:36.920 --> 00:27:45.656
परिणाम यदि कहोगे तो कथंचित् आयेगा
परन्तु परद्रव्य कहोगे तो हो गया,
दृष्टि का विषय पक्का हाथ में आ जायेगा।

00:27:45.680 --> 00:27:53.936
दृष्टि के विषय बिना
निर्विकल्प आत्मा का अनुभव, किसी काल में,
कभी भी किसी जीव को नहीं हो सकता।

00:27:53.960 --> 00:28:03.256
इसलिए ४५ वर्षों तक जो दृष्टि के
विषय को घूँटा है वह यथार्थ है। आहाहा!

00:28:03.280 --> 00:28:09.736
<p>गुण हैं उन्हें तो द्रव्य का आधार है
परन्तु पर्याय को किसका आधार है?

00:28:09.760 --> 00:28:16.816
कि पर्याय सत् अहेतुक होने से उसे
किसी के साथ आधार-आधेय संबंध नहीं है।

00:28:16.840 --> 00:28:27.496
क्योंकि अनित्य को, अनित्य को नित्य का आधार
नहीं होता। नित्य अनित्य को आधार नहीं देता।

00:28:27.520 --> 00:28:35.576
नित्य और अनित्य दोनों सत् अलग अलग हैं,
इसलिये पर्याय पर्याय के आधार से होती हैं,
मेरे आधार से पर्याय नहीं होती।

00:28:35.600 --> 00:28:42.496
(मुझे और पर्याय को) आधार-आधेय संबंध नहीं है,
इसलिये कर्ता संबंध नहीं है,
भोक्ता संबंध भी नहीं है। आहाहा!

00:28:42.520 --> 00:28:47.016
और परद्रव्य और स्वद्रव्य के
ज्ञाता-ज्ञेय(संबंध) कहना वो व्यवहार है।

00:28:47.040 --> 00:28:51.776
और स्वद्रव्य वो स्व और स्वद्रव्य का
स्वामी मैं, ये निश्चय है।

00:28:51.800 --> 00:28:58.416
और स्वद्रव्य जानने में आता है।
स्वद्रव्य जानता है।
स्वद्रव्य जानता है और स्वद्रव्य जानने में आता है।

00:28:58.440 --> 00:29:04.216
पर्याय जानने में नहीं आती।
क्योंकि पर्याय परद्रव्य है। आहाहा!

00:29:04.240 --> 00:29:10.336
स्वद्रव्य के ऊपर लक्ष जाते ही परद्रव्य के ऊपर से
लक्ष छूट जाता है। परद्रव्य अर्थात् पर्याय।

00:29:10.360 --> 00:29:23.656
ओहोहो ! क्या माल भरा है इसमें!
हे ग्रंथाधिराज ! तुझमें ब्रह्मांड के भाव भरे हैं।

00:29:23.680 --> 00:29:33.856
<p><b>जिसे केवली भगवान भी पूरा नहीं कह सके,</b>
<p><b>तह स्वरूप, अन्य वाणी उसे कैसे कहे?</b>
<p><b>अनुभवगोचरमात्र रहा वह ज्ञान जो।(श्रीमद्जी) </b>

00:29:33.880 --> 00:29:42.796
<p>ऐसे भाव, इसमें भंडार भरा है बापू! आहाहा!
गणधर भगवान कहते हैं, केवली परमात्मा को- 

00:29:42.820 --> 00:29:51.696
अरे! कहाँ तेरा केवलज्ञान और
कहाँ हमारा अल्प, समुद्र में बिंदु ज्ञान।
आहाहा!

00:29:51.720 --> 00:29:58.936
तू कहकर, तू कहकर बुलाते हैं गणधर भगवान भी,
आहाहा! कहाँ तेरा केवलज्ञान, तुम्हारा नहीं!

00:29:58.960 --> 00:30:07.496
कहाँ तेरा केवलज्ञान और
कहाँ हमारा अल्प ज्ञान। आहाहा !
ये भक्ति की मस्ती में होता है।

00:30:07.520 --> 00:30:13.816
भक्ति की मस्ती में भगवान को भी
तू कहकर भक्त बुलाते हैं।

00:30:13.840 --> 00:30:21.736
हे प्रभु ! कहाँ तेरा ज्ञान!
और कहाँ मेरा अल्प ज्ञान!

00:30:21.760 --> 00:30:27.536
तुम तो समुद्र हो और समुद्र में मेरा तो
बिंदुमात्र, क्षयोपशम ज्ञान है।

00:30:27.560 --> 00:30:34.136
छद्मस्थ का क्षयोपशम ज्ञान होता है
और केवली का केवलज्ञान होता है।

00:30:34.160 --> 00:30:38.136
केवलज्ञान अलग आहाहा! परिपूर्ण
और यह तो अल्प।

00:30:38.160 --> 00:30:42.736
कहते हैं कि भाव तेरे में
ब्रह्मांड के भरे हैं।

00:30:42.760 --> 00:30:49.256
<p>पर्याय को द्रव्य का आधार नहीं है।
तो गुणों को किसका आधार है?
कि स्वद्रव्य का आधार है।

00:30:49.280 --> 00:30:58.456
जब पर्याय से व्यतिरिक्त नाम रहित
कहा आत्मा को तो फिर आत्मा शून्य है,
खाली है या कुछ उसमें है?

00:30:58.480 --> 00:31:07.096
कि माल भरा हुआ है। आहाहा! मालामाल है अंदर।
आहाहा! अनंत गुण का पिंड भगवान आत्मा।

00:31:07.120 --> 00:31:14.736
एक एक गुण परिपूर्ण सामर्थ्य से भरा हुआ।
ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख, प्रभुत्व,
विभुत्व शक्ति आहाहा!

00:31:14.760 --> 00:31:25.576
ऐसा एक एक गुण, ऐसे गुण, उन गुणों को
परमपारिणामिक जिसका लक्षण ऐसा
कारण समयसार आधार है।

00:31:25.600 --> 00:31:30.716
आधार-आधेय के भेद
को व्यवहार कहने में आता है।

00:31:30.740 --> 00:31:42.456
और द्रव्य और पर्याय का भेद कहना,
उसे स्वद्रव्य और परद्रव्य
कहने में आता है। आहाहा!

00:31:42.480 --> 00:31:46.056
क्योंकि परिणाम स्वयं परद्रव्य है।

00:31:46.080 --> 00:31:54.536
परद्रव्य, स्वद्रव्य के आधार से नहीं होता और
स्वद्रव्य, परद्रव्य के आधार से नहीं होता।
आत्मा परिणाम के आधार से नहीं है।

00:31:54.560 --> 00:32:00.416
और परिणाम आत्मा के आधार से नहीं है।
आधार-आधेय संबंध का परिणाम के साथ अभाव है।

00:32:00.440 --> 00:32:06.536
और जहाँ शास्त्र में आधार-आधेय
कहा हो, वहाँ समझ लेना कि
वह व्यवहारनय का कथन है।

00:32:06.560 --> 00:32:10.256
अतः श्रद्धा की अपेक्षा से
वह अभूतार्थ है ऐसा जान लेना।

00:32:10.280 --> 00:32:14.136
ज्ञान की अपेक्षा से भूतार्थ और
श्रद्धा की अपेक्षा से अभूतार्थ,

00:32:14.160 --> 00:32:18.456
व्यवहार से भूतार्थ और
निश्चय से अभूतार्थ है ऐसा जानना।

00:32:18.480 --> 00:32:24.256
आयेगा आधार-आधेय, कर्ता-कर्म  भी आयेगा।
निराश होने की जरूरत नहीं है।

00:32:24.280 --> 00:32:38.016
<p>आहाहा! जो नयों का ज्ञाता हो गया और
निश्चयनय- नयों का अधिपति आ गया हाथ में,
वह व्यवहारनय के कथन से निराश नहीं होता।

00:32:38.040 --> 00:32:43.576
जान लेता है कि यह व्यवहारनय का कथन है।

00:32:43.600 --> 00:32:54.176
<p><b>इस स्वद्रव्य का आधार </b>,
गुणों का आधार, 
(इसका) बहुत लम्बे समय बाद गुरुदेव ने खुलासा किया।

00:32:54.200 --> 00:32:57.256
इस स्वद्रव्य का आधार, स्वद्रव्य का आधार क्यों?

00:32:57.280 --> 00:33:06.496
फिर खुद कहा कि हे भगवान! लाज रखना आज।
बहुत सभा इकट्ठी हो गई है।

00:33:06.520 --> 00:33:12.656
तुझे जो अंदर में हो कहने का,
वो आज कह देना, लाज रखना हमारी प्रभु!

00:33:12.680 --> 00:33:16.856
इसका मुझे समाधान देना, कि
स्वद्रव्य यानि क्या तुम कहना चाहते हो ?

00:33:16.880 --> 00:33:26.016
वो जहाँ वांचन शुरू हुआ और पंक्ति आयी
`कि स्वद्रव्य यानि गुण,
वे गुणी के आधार से रहते हैं’।

00:33:26.040 --> 00:33:29.096
इसमें तालियों की गड़गड़ाहट हो गई। आहाहा!

00:33:29.120 --> 00:33:35.496
<p>लाज रखना भक्त की प्रभु!
(उन्होंने) खुद की आत्मा को कहा, हों!

00:33:35.520 --> 00:33:45.256
इस भगवान को कहा कि जैसा है
वैसा तू आज (कह देना)। आहाहा!

00:33:45.280 --> 00:33:51.336
अंदर का भगवान जागा और कहा कि
यह स्वद्रव्य यानि गुण अर्थ करना।

00:33:51.360 --> 00:34:03.216
आहाहा ! सभी शिष्यों को, भक्तों को भी इसका
(अर्थ) समझने की जिज्ञासा रहती थी।

00:34:03.240 --> 00:34:17.216
<p><b>इस स्वद्रव्य का आधार </b> अर्थात् इन
गुणों का आधार <b>सहजपरमपारिणामिकभावलक्षण
कारणसमयसार है।</b>

00:34:17.240 --> 00:34:22.536
कारणसमयसार के आधार से कार्यसमयसार नहीं है।

00:34:22.560 --> 00:34:34.816
कारणसमयसार के आधार से गुणरूप कारण तो हैं,
परन्तु पर्यायरूप कार्य उसमें नहीं है। आहाहा!
क्या ये तो कोई गाथा है!

00:34:34.840 --> 00:34:45.016
<p>मुमुक्षु:- गुणरूप कारण।
<p>उत्तर:- गुणरूप कारण हैं परन्तु
पर्यायरूप कार्य उसमें नहीं है। आहाहा!

00:34:45.040 --> 00:34:53.336
गुण भेद हैं किन्तु उसमें
पर्याय के भेद नहीं हैं। आहाहा!

00:34:53.360 --> 00:35:01.656
गुण है वो व्यवहार है और
गुणी है वो निश्चय है। और
पर्याय है वो परद्रव्य है। क्या कहा?

00:35:01.680 --> 00:35:12.736
पर्यायें परद्रव्य हैं,
गुण है वो व्यवहार स्वद्रव्य है और
गुणी है वह निश्चय स्वद्रव्य है। आहाहा!

00:35:12.760 --> 00:35:16.976
गुण और गुणी, इतना व्यवहार लो।

00:35:17.000 --> 00:35:19.976
श्रद्धा के विषय के लिए बात चल रही है, हों!

00:35:20.000 --> 00:35:27.036
दृष्टि के विषय में,  दृष्टि के विषय से
जीव का लक्षण क्या? कि उपयोग? कि नहीं।

00:35:27.060 --> 00:35:37.456
दृष्टि के विषय में लक्षण शुद्ध उपयोग?
कि नहीं। दृष्टि के विषय में ज्ञान गुण
वो लक्षण? तो कहते हैं, हाँ।

00:35:37.480 --> 00:35:40.356
परमपारिणामिक लक्षण?
तो कहते हैं, हाँ।

00:35:40.380 --> 00:35:49.456
परन्तु उपयोग और शुद्धोपयोग- ये दृष्टि के
विषय के लक्षण नहीं हैं।
(ये) प्रमाण ज्ञान के (लक्षण हैं), पदार्थ के लक्षण हैं।  

00:35:49.480 --> 00:35:54.836
आहाहा! बहुत गहराई की बात है।

00:35:54.860 --> 00:36:04.496
<p>यह उपादेय तत्त्व, इसका लक्षण क्या?
कि उपयोग तो क्रमिक है, अनित्य है,
नाशवान है, ये इसका लक्षण (नहीं है)। 

00:36:04.520 --> 00:36:09.816
और शुद्धोपयोग भी समयवर्ती है।
समयवर्ती त्रिकाली का लक्षण नहीं होता। 

00:36:09.840 --> 00:36:13.936
तो त्रिकाली का लक्षण त्रिकाली।  
ये त्रिकाली का लक्षण त्रिकाली कौन?

00:36:13.960 --> 00:36:20.656
कि सहजज्ञान, सहजदर्शन, सहजसुख, ये गुण।
गुण ये लक्षण और आत्मा लक्ष्य।

00:36:20.680 --> 00:36:28.616
<p>ऐसा लक्ष्य-लक्षण का भेद है।
परमपारिणामिक भाव वो लक्षण
और आत्मा लक्ष्य।

00:36:28.640 --> 00:36:39.776
ऐसे भाव और भाववान, गुण और गुणी
ऐसे भेद का व्यवहार आओ तो आओ।
अभेद में तो ये भेद भी फिर दिखता नहीं है।

00:36:39.800 --> 00:36:48.736
आहाहा! ७ वीं गाथा में कहा आत्मा में
ज्ञान है, दर्शन है, चारित्र है
परन्तु जब विचार करने में आता है

00:36:48.760 --> 00:36:55.056
तो ज्ञान नहीं, दर्शन नहीं, चारित्र भी नहीं।
आहाहा! बोलो तो वह गाथा क्या है?

00:36:55.080 --> 00:37:25.016
<b>चारित्र, दर्शन, ज्ञान भी, व्यवहार कहता ज्ञानी के । 
चारित्र नहीं, दर्शन नहीं, नहीं ज्ञान, ज्ञायक शुद्ध है ।।७।।</b>

00:37:25.040 --> 00:37:35.676
<p>यह वही। आहाहा! गुणी का लक्षण गुण है। ये भी
व्यवहार है, भाई ! यहाँ अटकना नहीं है।

00:37:35.700 --> 00:37:41.856
आहाहा! ज्ञान वह आत्मा, (ये) व्यवहार हुआ।
दर्शन वह आत्मा, व्यवहार हो गया।

00:37:41.880 --> 00:37:49.736
क्योंकि एक गुण जितना द्रव्य नहीं है।
अनंत गुणों का पिंड उसको आत्मद्रव्य कहते हैं।

00:37:49.760 --> 00:37:57.136
आहाहा! गाथा बहुत ऊंची है।

00:37:57.160 --> 00:38:06.776
हे सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा!
तेरे कहे हुए तत्त्व में जैसे जैसे मैं
गहराई से दृष्टि (नजर) डालता हूँ अंदर में ,

00:38:06.800 --> 00:38:10.656
वैसे वैसे मेरे स्वरूप का
चमत्कार मुझे भासित होता है।

00:38:10.680 --> 00:38:24.016
ऐसा मेरा आत्मा है ऐसा मुझे भासित होने लगता है,
ऐसा। ऐसा मैं हूँ, आहाहा! ऐसा मुझे भासित होता है।

00:38:24.040 --> 00:38:31.496
यह स्वद्रव्य का आधार! पर्यायों का आधार नहीं।
आहाहा! द्रव्य को पर्याय का आधार नहीं है।

00:38:31.520 --> 00:38:38.076
गुण को द्रव्य का आधार है परन्तु
द्रव्य को गुण का आधार नहीं है।

00:38:38.100 --> 00:38:43.976
गुण को तो द्रव्य का आधार है परन्तु
द्रव्य को गुण का आधार नहीं है।

00:38:44.000 --> 00:38:51.296
भेद को अभेद का आधार है परन्तु
अभेद को भेद का आधार नहीं है।
तो परद्रव्य का आधार तो कहाँ से हो?

00:38:51.320 --> 00:39:02.876
<p>प्रभु! सुनो बात, आहाहा!
यह तेरे घर की बात! अंदर में माल भरा है!

00:39:02.900 --> 00:39:18.136
भावजीभाई बेचारे चले गये। क्योंकि हेय की
बात आयी, परन्तु (अब) उपादेय की बात चलती है यह।

00:39:18.160 --> 00:39:22.556
यह उपादेय की बात चलती है।
इम्पोर्टेन्ट (important) है।

00:39:22.580 --> 00:39:31.036
हेय की बात तो नास्ति से थी,
लेकिन अस्ति में आत्मा कैसा है? आहाहा!

00:39:31.060 --> 00:39:35.436
कि आत्मा ऐसा है कि जिसमें
सहज ज्ञान, दर्शन, चारित्र गुण हैं।

00:39:35.460 --> 00:39:38.916
इन गुणों को किसका आधार है?
कि गुणी का।

00:39:38.940 --> 00:39:46.176
ये गुण और गुणी का आधार-आधेय संबंध कहा
ये भी अंदर में परद्रव्य हो जाता है।

00:39:46.200 --> 00:39:58.176
अतः गुण और गुणी अभेद हैं, ऐसा ले।  समझाने के
लिए भेद करने में आता है, वास्तव में है नहीं।

00:39:58.200 --> 00:40:05.016
<b>स्वद्रव्य का आधार
सहजपरमपारिणामिकभाव </b>, आहाहा!

00:40:05.040 --> 00:40:12.576
एक गुण है ज्ञानगुण, वह क्षयोपशम पर्याय के
आधार से नहीं होता। क्योंकि उसका लक्षण नहीं है।

00:40:12.600 --> 00:40:18.496
परन्तु पारिणामिकभाव के
आधार से गुण रहे हुए हैं। आहाहा!

00:40:18.520 --> 00:40:27.056
<p><b>आधार सहजपरमपारिणामिकभावलक्षण
(-सहज परम पारिणामिक भाव जिसका लक्षण है
ऐसा) कारणसमयसार है।</b>

00:40:27.080 --> 00:40:32.696
परमात्मा। कारणपरमात्मा न लिखकर
कारणसमयसार लिखा। 

00:40:32.720 --> 00:40:41.376
कारणसमयसार कहो या कारणपरमात्मा कहो,
एकार्थ वाचक हैं। आहाहा!

00:40:41.400 --> 00:40:56.856
कार्यसमयसार को, कार्यसमयसार को
कारणसमयसार आधार नहीं है।
केवलज्ञान का आधार कारणसमयसार नहीं है।

00:40:56.880 --> 00:41:04.236
परन्तु सहज ज्ञानगुण है वो आत्मा के आधार से है।

00:41:04.260 --> 00:41:09.496
यह आत्मा पर्याय के आधार से नहीं है और
आत्मा गुण के आधार से नहीं है।

00:41:09.520 --> 00:41:16.596
और पर्याय को द्रव्य का आधार नहीं है
परन्तु गुण को तो द्रव्य का आधार है। आहाहा!

00:41:16.620 --> 00:41:24.776
इतना आधार-आधेय का व्यवहार सविकल्प में
आये तो रखना बाकी दूर तक जाना मत।

00:41:24.800 --> 00:41:34.976
<p>आहाहा! पर्याय को मैं करता हूँ
और मैं जानता हूँ, (ऐसा) रहने देना क्योंकि
पर्याय परद्रव्य है।

00:41:35.000 --> 00:41:39.216
मैं तो <b>चैतन्य के विलास स्वरूप
आत्मा को ही भाता हूँ।</b>

00:41:39.240 --> 00:41:45.456
गुण भेद तक रुक जाना। पर्याय के भेद में
लंबाना मत। आहाहा!

00:41:45.480 --> 00:41:51.616
इतने में तो निर्विकल्प ध्यान में आ जाता है।
गुण भेद आता है और गुण भेद छूट जाता है।

00:41:51.640 --> 00:41:57.216
<p>पर्याय का भेद तो दिखता नहीं है
क्योंकि परद्रव्य है, वो आत्मा में नहीं है।

00:41:57.240 --> 00:42:04.696
आत्मा में गुण हैं परन्तु आत्मा में पर्याय नहीं है।
बहुत ऊँचे प्रकार की बात है। आहाहा!

00:42:04.720 --> 00:42:19.776
यह चने के आटे का, सच्चे घी का मैसूर नहीं है।
यह तो बादाम के मैसूर की बात चलती है। आहाहा!

00:42:19.800 --> 00:42:33.496
बादाम का मैसूर तो प्रीतिभोज में कहीं और कभी ही होता है। 
आहाहा! प्रफुल्ला बहन नहीं आये?

00:42:33.520 --> 00:42:43.976
उनके गांव में वो लड्डू होते हैं, करणशाही लड्डू।
करणशाही लड्डू यानि दो सो रुपये का किलो।

00:42:44.000 --> 00:42:54.776
वह लड्डू खोलो तो बादाम दिखे, पिस्ता
दिखे, इलायची दिखे लेकिन आटा नहीं दिखता।

00:42:54.800 --> 00:43:02.416
इतना तो भरपूर मसाला।
उन्हें करणशाही लड्डू कहते हैं। आहाहा!

00:43:02.440 --> 00:43:07.416
श्रीमंत के यहाँ शादी हो तो ये
करणशाही लड्डू बनाते हैं।

00:43:07.440 --> 00:43:13.376
परन्तु अब श्रीमंत की शादी हो तो (भी)
बादाम का मैसूर कोई बनाता नहीं है। आहाहा!

00:43:13.400 --> 00:43:21.376
यह तो बादाम के मैसूर की बात चलती है।
प्रभु! सुन, पर्याय का लक्ष छोड़ दे।

00:43:21.400 --> 00:43:28.376
पर्याय मेरे में है ये पक्ष छोड़ दे। आहाहा!
अरे! तेरे में गुणभेद नहीं है प्रभु!

00:43:28.400 --> 00:43:32.616
मैं तो गुणी अभेद सामान्य हूँ,
(ऐसा) ले न। आहाहा!

00:43:32.640 --> 00:43:41.136
<p><b>इस स्वद्रव्य का आधार
सहजपरमपारिणामिकभावलक्षण कारणसमयसार है।</b>

00:43:41.160 --> 00:43:46.256
यह उपादेय तत्त्व की व्याख्या चली।
उपादेय कहा ना?
आत्मा, आत्मा को उपादेय है।

00:43:46.280 --> 00:43:52.056
तो उपादेय है  (वो ) विभावगुणपर्याय से रहित

00:43:52.080 --> 00:43:57.456
ऐसा शुद्धात्मा उपादेय कहा।
तो उपादेय में है क्या?

00:43:57.480 --> 00:44:01.176
कि सहज ज्ञान, दर्शन आदि गुण हैं,
पर्याय नहीं है उसमें।

00:44:01.200 --> 00:44:09.496
और गुण और गुणी का भेद करे तो व्यवहार है।
उसमें साध्य की सिद्धि नहीं है।
सीधे गुणी के ऊपर आजा।

00:44:09.520 --> 00:44:13.096
गुण का भेद करके, उसको उल्लंघकर
(गुणी के ऊपर आजा।) आहाहा!

00:44:13.120 --> 00:44:23.016
छठ्ठे-सातवें गुणस्थान में झूलनेवाले मुनिराज
पर्याय का स्मरण नहीं करते,
द्रव्य का स्मरण करते हैं

00:44:23.040 --> 00:44:27.176
और द्रव्य का स्मरण करने पर गुणभेद उठता है, फिर
वापस अभेद में चले जाते हैं।

00:44:27.200 --> 00:44:33.896
आहाहा! विस्तृत होकर पर्याय तक उपयोग
नहीं जाता है (ऐसी) कोई अद्भुत बात है।

00:44:33.920 --> 00:44:49.656
<p>अब आचार्य भगवान ऐसा कहते हैं कि
जैसे ३८ गाथा में मैंने परद्रव्य कहा,
परिणाममात्र को।

00:44:49.680 --> 00:44:56.536
५० वीं गाथा में कुंदकुंद भगवान ने स्वयं 
परिणाममात्र को परद्रव्य कहा। 

00:44:56.560 --> 00:45:05.056
अर्थात् मैं और कुन्दकुन्दाचार्य भगवान, दो 
आचार्य तो, एक आचार्य और एक मुनिराज,
दो तो परद्रव्य कहते हैं। 

00:45:05.080 --> 00:45:11.096
परन्तु अमृतचंद्राचार्य (परद्रव्य) कहते हैं?
कि हाँ, उन्होंने भी परिणाममात्र को
परद्रव्य कहा है। 

00:45:11.120 --> 00:45:15.796
उसका समयसार का १८५ गाथा का आधार देते हैं। 

00:45:15.820 --> 00:45:23.536
<p>समयसार में पर्याय को परद्रव्य कहा है
या नियमसार में कहा है, परन्तु अन्य कहीं (कहा है)?
कि हाँ, है। 

00:45:23.560 --> 00:45:27.916
कि कुन्दकुन्द भगवान ने कहा है या टीकाकार ने
कहा है? दोनों टीकाकारों ने कहा है। 

00:45:27.940 --> 00:45:35.216
मात्र कुंदकुंदाचार्य भगवान ने (ही) कहा है
ऐसा नहीं है, परन्तु उसके दो समर्थ आचार्य टीकाकार हुए, 
उन्होंने भी कहा

00:45:35.240 --> 00:45:44.096
और ये टीकाकार स्वयं भावी तीर्थंकर हैं।
तीन आचार्य भगवानों ने कहा - परद्रव्य।

00:45:44.120 --> 00:45:50.536
और इसका विस्तार करनेवाले एक भावी तीर्थंकर
सूर्यकीर्ति होने वाले हैं। आहाहा!

00:45:50.560 --> 00:46:00.756
धातकी खंड के महाविदेह क्षेत्र में
तीर्थंकर होनेवाले हैं, हैं और हैं।
कोई मानो या कोई ना मानो। 

00:46:00.780 --> 00:46:08.696
ये बहनश्री का जातिस्मरणज्ञान
सौ प्रतिशत सच्चा है। आहाहा!
एक पैसे भर की भी इसमें भूल नहीं है।

00:46:08.720 --> 00:46:13.336
शंका करने जैसी नहीं है। 
ये तो श्रद्धा का विषय है। 

00:46:13.360 --> 00:46:23.896
कोई मानो या कोई ना मानो। परन्तु सूर्यकीर्ति
होनेवाले हैं धातकीखंड के महाविदेह क्षेत्र (में)। 

00:46:23.920 --> 00:46:31.096
जम्बूद्वीप का महाविदेह, धातकीखण्ड का 
महाविदेह और पुष्करद्वीप का महाविदेह। 

00:46:31.120 --> 00:46:37.576
अभी चार तीर्थंकर जम्बूद्वीप के 
महाविदेह में, आठ अभी 
विराजमान हैं धातकीखण्ड में

00:46:37.600 --> 00:46:41.296
और आठ अर्ध पुष्करद्वीप में -
अभी बीस तीर्थंकर विराजमान हैं। 

00:46:41.320 --> 00:46:47.656
सीमंधर भगवान आदि नाम-ठाम
सभी शास्त्रों में है अभी तो,
पूजा में भी है। आहाहा!

00:46:47.680 --> 00:46:50.976
<p>मुमुक्षु:- सीमंधर, युगमंधर, बाहु, सुबाहु। 

00:46:51.000 --> 00:47:03.056
<p>उत्तर:- ये चार और अन्य (सोलह) आहाहा!
उसमें छठ्ठे स्वयंप्रभ हैं।
बोलो! ये नाम याद रह गया। आहाहा!

00:47:03.080 --> 00:47:11.656
ऐसे बीस तीर्थंकर विराजमान हैं। 
छट्ठी गाथा का लेख। आहाहा!

00:47:11.680 --> 00:47:19.016
<p>१८५ श्लोक में आचार्य भगवान कहते हैं
कि वह परद्रव्य है, ध्यान रखना। 

00:47:19.040 --> 00:47:24.336
परद्रव्य उपादेय नहीं होता भाई!
परद्रव्य को परद्रव्य तरीके से जान। बस!

00:47:24.360 --> 00:47:27.656
स्वद्रव्य को स्वद्रव्य तरीके से जान। 
(तो) कोई दोष नहीं है।

00:47:27.680 --> 00:47:42.976
१८५ वाँ श्लोक तो कण्ठस्थ है बहन को, बोलो। 
सिद्धांन्तो आहाहा!  (वीडियो रिकॉर्डिंग - video recording) 
सही होता है? होता है?

00:47:43.000 --> 00:47:47.296
<p>मुमुक्षु:- हाँ जी! बहुत सुंदर। 
<p>उत्तर:- तो ठीक है। यह है ना ये 
मुद्दे की बात है इसलिये। 

00:47:47.320 --> 00:47:56.936
दुबारा तो मौका आये तब आये,
फिर वापस बारंबार नहीं आती।

00:47:56.960 --> 00:48:38.336
<p><b>सिद्धांन्तोऽयमुदात्तचित्तचरितैर्मोक्षार्थिभि: सेव्यतां</b>
<p><b>शुद्धं चिन्मयमेकमेव परमं ज्योति: सदैवास्म्यहम् । </b>

00:48:38.360 --> 00:49:10.576
<p><b>एते ये तु समुल्लसन्ति विविधा भावा: पृथग्लक्षणा-</b>
<p><b>स्तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्रा अपि ॥ १८५ ॥</b>

00:49:10.600 --> 00:49:14.376
<p>आहाहा ! हमें प्रकट होते सभी भाव
परद्रव्य दिखते हैं।

00:49:14.400 --> 00:49:21.136
उनमें कहीं हमें हमारा
आत्मा देखने में नहीं आता। 
खोज बहुत की हमने।

00:49:21.160 --> 00:49:28.096
निश्चय रत्नत्रय के परिणाम प्रकट होते हैं 
हमें, उनमें हमने गहराई से खोज की,

00:49:28.120 --> 00:49:33.896
परन्तु हमारा आत्मा 
कहीं उनमें है नहीं। आहाहा!

00:49:33.920 --> 00:49:38.056
परन्तु सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के
परिणाम में तुम्हारा आत्मा नहीं है?

00:49:38.080 --> 00:49:52.416
बापू! मेरा आत्मा अनित्य नाशवान, आहाहा!
कर्म सापेक्ष और पुद्गलद्रव्य
उसमें स्वद्रव्य दिखता नहीं है। आहाहा!

00:49:52.440 --> 00:49:58.736
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के निर्विकारी
परिणाम ऐसे जो भेद, वे परद्रव्य हैं,

00:49:58.760 --> 00:50:05.176
उनमें स्वद्रव्य की नास्ति है। परद्रव्य में
स्वद्रव्य कहाँ से हो? आहाहा!

00:50:05.200 --> 00:50:12.096
<p>उसका अर्थ - <b>जिनके चित्त का चरित्र </b> आहाहा!

00:50:12.120 --> 00:50:16.696
यानि आचरण। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के 
परिणाम को चारित्र कहते हैं।

00:50:16.720 --> 00:50:24.336
<b>जिनके चित्त का चरित्र</b> यानि ज्ञान का चारित्र 
<b>उदात्त</b> यानि  <b>(उदार, उच्च, उज्ज्वल)</b>

00:50:24.360 --> 00:50:33.616
- शुद्ध निर्मल <b>है ऐसे मोक्षार्थी </b>
आहाहा ! ऐसे साधक धर्मात्मा!

00:50:33.640 --> 00:50:43.496
मुनिराज धर्मात्माओं को, चौथे, पाँचवे, 
छट्ठे गुणस्थान में विराजमान
साधक आत्माओं को कहते हैं कि

00:50:43.520 --> 00:50:48.816
<b>इस सिद्धांत का सेवन करो कि-- </b>, सिद्धांत!

00:50:48.840 --> 00:50:59.516
<b>इस सिद्धांत का सेवन करो कि--
`मैं तो शुद्ध चैतन्यमय एक 
परम ज्योति ही सदैव हूँ ;’</b> आहाहा!

00:50:59.540 --> 00:51:20.396
इस सिद्धांत का सेवन करो कि
मैं तो शुद्ध चैतन्यमय और एक
और परम ज्योति ही सदैव हूँ। आहाहा!

00:51:20.420 --> 00:51:28.616
<b>और यह जो भिन्न लक्षणवाले </b>,
मेरे से भिन्न लक्षणवाले,
चैतन्य के लक्षण से भिन्न,

00:51:28.640 --> 00:51:36.296
शुद्ध चैतन्यमय परमपारिणामिक लक्षण से
भिन्न <b>लक्षणवाले विविध प्रकार के भाव </b>,

00:51:36.320 --> 00:51:43.416
व्यवहार रत्नत्रय के भाव और
निश्चय रत्नत्रय के भाव, दोनों ,
वे विविध प्रकार के भाव हैं।

00:51:43.440 --> 00:51:53.456
वे <b>भाव प्रकट होते हैं </b>,
उत्पाद-व्यय होते हैं,
उत्पाद होता है। वे ध्रुव नहीं हैं।

00:51:53.480 --> 00:51:59.736
प्रकट है वह मैं हूँ, ध्रुव मैं हूँ,
उत्पाद मैं नहीं हूँ।
जो प्रकट होता है वो मैं नहीं।

00:51:59.760 --> 00:52:06.936
क्योंकि जो प्रकट होता है वो नाश हो जाता है
और जो प्रकट है वो नाश होता नहीं।

00:52:06.960 --> 00:52:14.416
<p><b>प्रकट होते हैं वह मैं नहीं हूँ</b>, 
उत्पाद- पर्याय प्रकट होती है वह मैं नहीं हूँ प्रभु !

00:52:14.440 --> 00:52:21.416
वह मैं क्यों नहीं हूँ? वे परिणाम प्रकट होते हैं
उसमें मेरापना क्यों नहीं है?

00:52:21.440 --> 00:52:35.416
<b>क्योंकि वे सब मुझे परद्रव्य हैं।</b>
आहाहा! जो नाशवान परिणाम हैं,
कर्म सापेक्ष हैं, आहाहा!

00:52:35.440 --> 00:52:41.416
अनित्य हैं, मेरे लक्षण के साथ
मिलते नहीं हैं, आहाहा!

00:52:41.440 --> 00:52:53.816
सम्यग्दर्शन मेरे लक्षण के साथ मिलता नहीं है।
क्योंकि सम्यग्दर्शन का लक्षण उपशम,
क्षयोपशम और क्षायिक है।

00:52:53.840 --> 00:53:02.696
मेरा लक्षण परमपारिणामिकभाव है।
लक्षण भेद से भेद है अर्थात् पदार्थ भेद से भेद है।

00:53:02.720 --> 00:53:06.436
इसलिये स्वद्रव्य नहीं, परद्रव्य है। आहाहा!

00:53:06.460 --> 00:53:11.256
<p><b> क्योंकि वे सब मुझे परद्रव्य हैं। </b> आहाहा!

00:53:11.280 --> 00:53:16.356
मुझे तो परद्रव्य रूप से जानने में आते हैं।
किन्तु स्वद्रव्य रूप से जानने में नहीं आते।

00:53:16.380 --> 00:53:22.136
परन्तु प्रभु! निश्चय मोक्षमार्ग?
उसके साथ स्वस्वामी संबंध?
कि नहीं है।

00:53:22.160 --> 00:53:27.296
परद्रव्य के साथ स्वस्वामी संबंध नहीं होता। आहाहा!

00:53:27.320 --> 00:53:35.096
यदि हो जाये, एक समय मात्र के लिए यदि हो जाये, आहाहा!
तो मोक्षमार्ग का अभाव हो जाये।

00:53:35.120 --> 00:53:38.816
स्वस्वामी संबंध नहीं है
इसलिये मोक्षमार्ग टिकता है।

00:53:38.840 --> 00:53:46.516
और स्वस्वामी संबंध नहीं है
इसलिये मोक्ष हो जाता है। आहाहा!

00:53:46.540 --> 00:53:54.336
<b>वे सब मुझे परद्रव्य हैं। </b>
देखो, यह एक कलश हुआ।
अब एक कलश लेना है यह।

00:53:54.360 --> 00:54:02.296
इसलिये (प्रवचन) समाप्त नहीं करते हैं। 
यह एक कलश ले लेना है क्योंकि 
यह कलश बहुत ऊंचा आता है।

00:54:02.320 --> 00:54:10.416
<p>५० गाथा के ऊपर एक अमृतचंद्राचार्य का 
कलश स्वयं रखा आधार के तौर पर।

00:54:10.440 --> 00:54:15.816
अब ५० गाथा के ऊपर स्वयं एक कलश बनाते हैं।
स्वयं का स्वतंत्र कलश।

00:54:15.840 --> 00:54:21.016
वह अमृतचन्द्र आचार्य का, समयसार का।
यह नियमसार टीकाकार स्वयं कलश बनाते हैं।

00:54:21.040 --> 00:54:26.136
ये कलश बहुत ऊंचा है, एकदम। बोलो बहन!

00:54:26.160 --> 00:54:44.856
<p><b>न ह्यस्माकं शुद्धजीवास्तिकाया-</b>
<p><b>दन्ये सर्वे पुद्गलद्रव्यभावा: ।</b>

00:54:44.880 --> 00:55:00.936
<p><b>इत्थं व्यक्तं वक्ति यस्तत्त्ववेदी</b>
<p><b>सिद्धिं सोऽयं याति तामत्यपूर्वाम् ।।७४।।</b>

00:55:00.960 --> 00:55:08.856
<p><b>श्लोकार्थ:-</b> आहाहा! अब यह कुदरती कल
जाना है, इसलिये निश्चयनय का विषय पूरा होता है

00:55:08.880 --> 00:55:16.016
और व्यवहारनय का विषय लेना था
परन्तु टाइम नहीं है इसलिये लिया नहीं जा सकता।

00:55:16.040 --> 00:55:25.856
किसी को ऐसा लगे कि यह अकेले निश्चय की बात की
और व्यवहार की बात एक तरफ रख दी,
तो ऐसा नहीं है प्रभु!

00:55:25.880 --> 00:55:28.216
हम कल तो जाने वाले हैं,

00:55:28.240 --> 00:55:35.936
यदि यहाँ रुकते तो यह व्यवहार की बात भी
ले लेने वाले थे, छोड़ने वाले नहीं थे।

00:55:35.960 --> 00:55:45.416
परन्तु प्रभु! क्या करें, हमारे भाग में, हमारे
भाग में और भाग्य में निश्चय की बात
स्थापने की आयी है, क्या करें प्रभु!

00:55:45.440 --> 00:56:00.856
<p>मुमुक्षु :-आपका अवतार ही इसलिये हुआ है।
<p>मुमुक्षु:- एक एक बात में बहुत मर्म है।

00:56:00.880 --> 00:56:07.976
<p>उत्तर:- मर्म है। ऐसा नहीं है,  मैं रुकता तो
यह लेने ही वाला था, कंटीन्यू में (continue)।

00:56:08.000 --> 00:56:19.176
प्रश्न ही कहाँ था? 
ये तो कुदरती, आहा! कुदरती ऐसा बनाव बना। उसमें हम क्या करें?

00:56:19.200 --> 00:56:29.136
<p><b>श्लोकार्थ:- 'शुद्ध जीवास्तिकाय से </b>, आहाहा!
अस्तिकाय, बहु प्रदेशी
आत्मा एक प्रदेशी नहीं है,

00:56:29.160 --> 00:56:32.976
अनंत प्रदेशी नहीं है,
असंख्यात प्रदेशी है।

00:56:33.000 --> 00:56:38.776
एक प्रदेश से अधिक प्रदेश वाले पदार्थ होते हैं
उनको अस्तिकाय कहने में आता है।

00:56:38.800 --> 00:56:49.816
जीव को अस्तिकाय कहते हैं। धर्मास्तिकाय को
अस्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाश,
ये चार पदार्थ अस्तिकाय रूप हैं।

00:56:49.840 --> 00:56:55.696
और पुद्गल है वो उपचार से
अस्तिकाय - बहुप्रदेशी है

00:56:55.720 --> 00:57:04.936
एक परमाणु लो तो एक प्रदेशी है
और काल द्रव्य भी एक प्रदेशी है।
बहु प्रदेशी चार हैं।

00:57:04.960 --> 00:57:10.096
उन चार में जीव बहु प्रदेशी है
इसलिये उसे जीवास्तिकाय,

00:57:10.120 --> 00:57:16.856
जीव और अस्तिकाय - बहु प्रदेशी (है), इसलिये उसे
अस्तिकाय विशेषण दिया जाता है।

00:57:16.880 --> 00:57:20.376
और अनादि-अनंत शुद्ध है
इसलिये 'शुद्ध' विशेषण कहा।

00:57:20.400 --> 00:57:27.256
<p><b>'शुद्ध जीवास्तिकाय से </b> अर्थात्
शुद्ध आत्मा से अर्थात् मेरे आत्मा से,

00:57:27.280 --> 00:57:35.296
<b>अन्य ऐसे जो सब पुद्गलद्रव्य के भाव </b>
जो प्रकट होते हैं, व्यवहार रत्नत्रय के परिणाम हों

00:57:35.320 --> 00:57:43.936
या निश्चय रत्नत्रय के परिणाम हों,
<b>वे वास्तव में हमारे नहीं हैं'</b>।  आहाहा!

00:57:43.960 --> 00:57:50.376
जो नाश होते हैं उनके साथ
वास्तव में स्वस्वामी संबंध नहीं है।

00:57:50.400 --> 00:58:03.576
ज्ञायक मेरा स्व और मैं उसका स्वामी।
ऐसा स्व-स्वामी संबंध का व्यवहार हो तो हो।
निश्चय में तो यह व्यवहार भी नहीं है। आहाहा!

00:58:03.600 --> 00:58:12.776
तो ये <b>पुद्गलद्रव्य के </b> जो भाव प्रकट
होते हैं अन्य <b>भाव वे वास्तव में हमारे नहीं हैं </b>। 

00:58:12.800 --> 00:58:21.536
हमारा स्वामीपना उनमें नहीं है। आहाहा!
हम उनके कर्ता नहीं हैं और भोक्ता भी नहीं हैं।

00:58:21.560 --> 00:58:31.116
<p><b>ऐसा जो तत्त्ववेदी </b> यानि अनुभवी।
<b>ऐसा जो तत्त्ववेदी </b> यानि
आत्मा के स्वरूप का अनुभव करनेवाला,

00:58:31.140 --> 00:58:40.176
तत्त्ववेदी, ज्ञानी धर्मात्मा।
<b>स्पष्टरूप से कहता है </b>, स्पष्टरूप से कहता है, 

00:58:40.200 --> 00:58:46.696
<b>वह अति अपूर्व सिद्धि को प्राप्त होता है। </b>
तत्त्ववेदी अनुभवी कहते हैं, जो ऐसा जानेगा

00:58:46.720 --> 00:58:56.616
कि शुद्धजीवास्तिकाय से जो भिन्न भाव हैं
वे सभी पुद्गल द्रव्य के भाव हैं
इसलिये वे वास्तव में मेरे भाव नहीं हैं।

00:58:56.640 --> 00:59:04.256
ऐसा जो जानेगा और मानेगा
वह अपूर्व सिद्धि को - मोक्षदशा को पायेगा।

00:59:04.280 --> 00:59:11.856
ऐसा आशीर्वाद देकर
यह निश्चय का अधिकार पूरा किया।
आशीर्वाद दिया। अंत में। आहाहा!

00:59:11.880 --> 00:59:12.880
