﻿WEBVTT LA344_Lalchandbhai Hindi

00:01:05.600 --> 00:01:15.356
<p>एक शास्त्र मिला है नया। एक शास्त्र नया मिला है।
उसका नाम है <b>'दो भूल',</b>

00:01:15.380 --> 00:01:30.736
<b>'दो भूल'।</b> लिखा हुआ है ऊपर (शीर्षक) <b>'दो भूल'</b> हिंदी में।
गुजराती में <b>'बे भूल'</b>। 

00:01:30.760 --> 00:01:42.196
<p>इस 'दो भूल' में ऐसा लिखा है,
एक भूल और दूसरी भूल, दो भूल।

00:01:42.220 --> 00:01:49.936
एक भूल में ऐसा लिखा है कि प्रत्येक जीव को,

00:01:49.960 --> 00:02:04.576
<b>जीवमात्र परिणाम परिणाम को करता है
मानता है कि मैं उसको करता हूँ,</b> यह एक भूल।

00:02:04.600 --> 00:02:14.616
दूसरी भूल में ऐसा पढ़ा कि <b>जानता है इंद्रियज्ञान
पर को और मानता है कि मैं पर को जानता हूँ,</b>

00:02:14.640 --> 00:02:23.856
यह दूसरी भूल है। 'दो भूल' नाम की एक पुस्तक है
इसमें ये दो लाइन हैं बस!

00:02:23.880 --> 00:02:35.136
पुस्तक पूरी हो गई, समाप्त हो गई पुस्तक।

00:02:35.160 --> 00:02:46.296
<p>पर्याय, पर्याय को ही करती है,
उसके षट्कारक से होती है। उसका जन्मक्षण है,

00:02:46.320 --> 00:02:55.616
वह सत् है, अहेतुक है, क्षणिक उपादान है।
अनेक प्रकार से उसके शास्त्र के आधार हैं।

00:02:55.640 --> 00:03:04.856
फिर भी उसकी दृष्टि पर्याय के ऊपर पड़ी है। द्रव्य अकर्ता है
ज्ञाता है, उसके ऊपर दृष्टि नहीं आती।

00:03:04.880 --> 00:03:08.136
इसलिए उसे भ्रमणा हो गई है, भ्रांति हो गई है

00:03:08.160 --> 00:03:14.096
कि इस परिणाम को मैं करता हूँ और
इस परिणाम के फल को मैं भोगता हूँ।

00:03:14.120 --> 00:03:20.096
दो भूल जब जायेंगी तब उसे सम्यग्दर्शन होगा।

00:03:20.120 --> 00:03:31.536
<p>बाकी मैं करता हूँ परिणाम को..। मिथ्यात्व के
परिणाम को मिथ्यादृष्टि का आत्मा करता नहीं है।

00:03:31.560 --> 00:03:42.256
सम्यग्दर्शन प्रगट होता है तब सम्यग्दृष्टि का
आत्मा सम्यग्दर्शन की पर्याय को करता नहीं है।

00:03:42.280 --> 00:03:50.536
केवलज्ञान प्रगट होता है तब भी उसका
आत्मा केवलज्ञान की पर्याय को करता नहीं है। 

00:03:50.560 --> 00:03:57.216
आहाहा! ऐसा त्रिकाल अकर्तापना ऐसा का 
ऐसा चला आता है, अनादि अनंत।

00:03:57.240 --> 00:04:03.896
<p>दृष्टि पर्याय के ऊपर पड़ी है। पर्याय पर्याय को करती है, 
(किन्तु) भ्रान्ति से भासित होता है कि मैं करता हूँ।

00:04:03.920 --> 00:04:10.696
यह उसे निर्णय स्वयं को करना पड़ेगा।
दूसरा कोई उपाय इसमें है ही नहीं।

00:04:10.720 --> 00:04:16.416
मूल में चोट मारे तो काम होगा।

00:04:16.440 --> 00:04:31.016
फिर, ऐसा स्वीकार करके सम्यग्दर्शन होता है,
उसके बाद भी परिणाम तो परिणाम को करता रहेगा।

00:04:31.040 --> 00:04:39.236
परिणाम अपना कर्तापना नहीं छोड़ेगा और यह आत्मा अकर्तापना नहीं छोड़ेगा। 

00:04:39.260 --> 00:04:43.816
आहाहा! दो सत् हैं न?

00:04:43.840 --> 00:04:50.416
<p>स्वीकार करे कि परिणाम परिणाम को करता है
और मैं नहीं करता, अकर्ता हूँ, ज्ञाता हूँ।

00:04:50.440 --> 00:04:54.776
ऐसे दृष्टि सम्यक् होने के बाद भी
परिणाम तो परिणाम को करता ही रहेगा।

00:04:54.800 --> 00:05:03.216
परिणाम को मैं नहीं करता इसलिए परिणाम
अपनी क्रिया बंद कर देगा, ऐसा नहीं है।

00:05:03.240 --> 00:05:10.216
परिणाम में पलटा जरूर आयेगा। परिणाम को मैं करता हूँ (ऐसा मानता था)
तब तक मिथ्यात्व के परिणाम होते थे।

00:05:10.240 --> 00:05:13.416
मिथ्यात्व के परिणाम को पर्याय करती थी।

00:05:13.440 --> 00:05:18.456
और मैं नहीं करता। और मैं अकर्ता ज्ञाता हूँ,
दृष्टि द्रव्य के ऊपर आयी।

00:05:18.480 --> 00:05:23.176
पर्याय तो अपनी क्रिया को छोड़ेगी नहीं।
लेकिन पलटा आया।

00:05:23.200 --> 00:05:28.096
परिणाम में मिथ्यात्व होता था
उसके स्थान पर, आस्रव के स्थान पर संवर।

00:05:28.120 --> 00:05:37.456
पर्याय तो क्रियावान ही है, अनादि अनंत,
किसी भी काल में उसकी क्रिया बंद नहीं होगी।

00:05:37.480 --> 00:05:46.056
पर्याय अपने कर्ता स्वभाव को छोड़ेगी नहीं,

00:05:46.080 --> 00:05:50.136
आत्मा अपने अकर्ता स्वभाव को छोड़ता नहीं,
तीनों काल।

00:05:50.160 --> 00:05:58.036
दो सत् अलग अलग हैं, एक में दूसरे की नास्ति है,
यह अस्ति-नास्ति अनेकांत है।

00:05:58.060 --> 00:06:07.196
ज<p>्ञायक में प्रमत्त-अप्रमत्त नहीं हैं। नहीं हैं इसलिए ज्ञायकभाव
प्रमत्त-अप्रमत्त को नहीं करता है, ऐसा। उसमें नहीं हैं,

00:06:07.220 --> 00:06:16.416
उसमें न-अथी, न-अस्ति, नास्ति, नास्ति।
नास्ति अर्थात् न-अथी। नअस्ति, नास्ति, नहीं है मेरे में।

00:06:16.440 --> 00:06:24.456
उसमें हैं परिणाम, परिणाम (में)
परिणाम की क्रिया हुआ करती है। आहाहा!

00:06:24.480 --> 00:06:34.376
<p>छह महीने का कोर्स है मात्र। 
तीन महीने का अकर्ता का। 
तीन महीने का ज्ञाता का। बस!

00:06:34.400 --> 00:06:39.636
ऐसी एक पुस्तक मिल गयी चमत्कारिक!

00:06:39.660 --> 00:06:45.976
'दो भूल' इतने इतने (बड़े)
अक्षरों से लिखा है 'दो भूल'

00:06:46.000 --> 00:06:51.976
बोलो! बस दो ही भूल हैं? 
कि हाँ दो ही भूल हैं।

00:06:52.000 --> 00:07:02.656
<p>दूसरी भूल ऐसी है कि इन्द्रियज्ञान
अनादिकाल का है। इन्द्रियज्ञान तो है।

00:07:02.680 --> 00:07:07.176
वह तो लंबे काल तक रहेगा,
जैसे राग लंबे काल तक रहता है (ऐसे ही),

00:07:07.200 --> 00:07:13.616
राग ठेठ दसवें गुणस्थान तक रहेगा।
इन्द्रियज्ञान बारहवें तक रहेगा।

00:07:13.640 --> 00:07:19.616
भले ही अबुद्धिपूर्वक, क्षयोपशमरूप से, लब्धरूप से है।
इन्द्रियज्ञान रहेगा।

00:07:19.640 --> 00:07:23.976
इन्द्रियज्ञान पर को जानता है, मैं पर को नहीं जानता,

00:07:24.000 --> 00:07:29.676
वहाँ अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होकर आत्मा का अनुभव होगा।

00:07:29.700 --> 00:07:39.176
और फिर इन्द्रियज्ञान पर को प्रसिद्ध करता ही रहेगा।
वह बंद नहीं होगा, इन्द्रियज्ञान का व्यापार।

00:07:39.200 --> 00:07:46.016
<p>श्रद्धा सम्यक् हो गई। मैं पर को नहीं जानता।
इन्द्रियज्ञान जाने तो जाने।

00:07:46.040 --> 00:07:54.216
उसका जाननेवाला, पर का जाननेवाला,
राग का जाननेवाला मैं नहीं। आहाहा!

00:07:54.240 --> 00:08:02.536
यह दूसरी भूल जाये तो एक अतीन्द्रियज्ञान
नया प्रगट होता है और आत्मा के दर्शन होते हैं।

00:08:02.560 --> 00:08:07.256
फिर इन्द्रियज्ञान तो रहेगा, वह तो जानता रहेगा।

00:08:07.280 --> 00:08:12.136
किसी किसी समय जानना बंद करेगा,
उसकी बुद्धिमानी आयेगी उसमें।

00:08:12.160 --> 00:08:18.836
लेकिन एकदम पूरी तरह से जानना बंद नहीं करेगा,
थोड़े टाइम रहेगा। बारहवें गुणस्थान तक।

00:08:18.860 --> 00:08:25.176
उसका काल जब तक नहीं पकेगा, आहाहा!
उसका आयुष्य पूरा होगा तब ही होगा।

00:08:25.200 --> 00:08:31.176
<p>आयुष्य पूरा (हुए) बिना देवगति में जीव जाता ही नहीं।

00:08:31.200 --> 00:08:43.576
आयुष्य पूरा होता है तब दूसरी गति में जाता है
ऐसा कहा जाता हैं न? हें? इसका आयुष्य है।

00:08:43.600 --> 00:08:50.256
राग का भी आयुष्य है और इन्द्रिय ज्ञान का
भी आयुष्य है। घबराने की कोई जरूरत नहीं है।

00:08:50.280 --> 00:08:53.376
आहाहा! लिमिट है उसकी।

00:08:53.400 --> 00:08:58.816
राग अनादि सांत है।
इन्द्रियज्ञान भी अनादि सांत है।

00:08:58.840 --> 00:09:08.016
अनादि का भले ही हो राग और इन्द्रियज्ञान 
लेकिन उसका अंत है। सांत अर्थात् अंत सहित। 

00:09:08.040 --> 00:09:14.176
जिज्ञेश, समझ में आया?
<p>मुमुक्षु:- हाँ बराबर।
<p>उत्तर:- बराबर, तो ठीक (है)।

00:09:14.200 --> 00:09:18.656
आहाहा! मैं नहीं जानता पर को हों!
इन्द्रियज्ञान भले ही जाने। 

00:09:18.680 --> 00:09:23.216
इन्द्रियज्ञान जानता है पर को
और मानता है कि मैं जानता हूँ

00:09:23.240 --> 00:09:30.496
तो उसे इन्द्रियज्ञान और अतीन्द्रियज्ञानमय भगवान
आत्मा की एकत्वबुद्धि हो गई, ज्ञेय ज्ञायक शंकर दोष।

00:09:30.520 --> 00:09:40.056
करता है दूसरा और मानता है कि मैं करता हूँ।
जानता है दूसरा और मानता है कि मैं जानता हूँ पर को।

00:09:40.080 --> 00:09:54.056
ऐसी पुस्तक एक बड़ी मिली
और बड़े अक्षरों में 'दो भूल' (लिखा है)।

00:09:54.080 --> 00:10:11.736
यह पुस्तक तुम्हारे पास भी है। सबके पास यह पुस्तक है।
खोलकर पढ़ना चाहिये क्या लिखा है उसमें।

00:10:11.760 --> 00:10:25.376
<p>यह शॉर्ट है सब कुछ बस!
बहुत लंबा करने से मूल बात लक्ष्य में से रह जाती है।

00:10:25.400 --> 00:10:38.576
बहुत लंबा लंबा करते हैं न (तो)
मूल बात रह जाती है लक्ष में से।

00:10:38.600 --> 00:10:48.056
रिड्यूस ध रेडियस (reduce the radius),
बापूजी कहते थे न? यही न? रिड्यूस (ध रेडियस),

00:10:48.080 --> 00:10:54.096
वर्तुल (परिधि) को छोटा कर। 
लंबे लंबे मत जा। आहाहा!

00:10:54.120 --> 00:11:06.816
उषा किरण के कम्पाउंड में आ जाये
तो परिधि में आ गया कहलाता है।

00:11:06.840 --> 00:11:16.856
और जामनगर हो तो परिधि के बाहर(है),
बहुत दूर। कब यहाँ पर आये? आये तब यह होगा न?

00:11:16.880 --> 00:11:25.736
<p>छोटा वर्तुल, द्रव्य-पर्याय स्वरूप वस्तु है।
पर्याय को पर्याय करती है, मैं नहीं करता। आहाहा!

00:11:25.760 --> 00:11:30.096
इन्द्रियज्ञान पर को जानता है,
मैं पर को नहीं जानता, बस!

00:11:30.120 --> 00:11:45.496
कोई भी आत्मा दो पदार्थों को जान नहीं सकता,
एक को ही जानता है। अज्ञानी पर को जानता है,
 ज्ञानी स्व को जानता है।

00:11:45.520 --> 00:11:52.896
स्वपरप्रकाशक वह तो प्रतिभासरूप से है।
जाननेरूप से नहीं है।

00:11:52.920 --> 00:11:56.176
लक्ष दो के उपर नहीं होता, 
लक्ष एक के उपर ही होता है।

00:11:56.200 --> 00:12:07.616
आत्मा का स्वभाव - लक्षण उपयोग है।
उपयोग का लक्षण स्वपरप्रकाशक है। 

00:12:07.640 --> 00:12:15.776
सम्यक्ज्ञान का लक्षण स्वप्रकाशक,
मिथ्याज्ञान का लक्षण परप्रकाशक।

00:12:15.800 --> 00:12:23.176
मिथयादृष्टि स्व को जानता ही नहीं है।
एकांत परप्रकाशन में ही पड़ा है।

00:12:23.200 --> 00:12:31.856
और सम्यग्दृष्टि हिरण, मेंढक वह पर को जानता ही नहीं,
स्व को ही जाना करता है।

00:12:31.880 --> 00:12:37.336
वह इन्द्रियज्ञान का पक्ष है न?

00:12:37.360 --> 00:12:44.696
और स्वपर का प्रतिभास देखकर.., स्वपरप्रकाशक के
शब्द आते हैं न? आहाहा! वह उलझन हो गई।

00:12:44.720 --> 00:12:49.456
<p><b>स्वपर प्रकासक सकति हमारी।</b>
<p><b>तातैं वचन-भेद भ्रम भारी ॥</b>

00:12:49.480 --> 00:12:55.016
<p><b>ज्ञेय दशा दुविधा परगासी।</b>
<p><b>निजरूपा पररूपा भासी॥</b>

00:12:55.040 --> 00:13:03.416
<p>प्रतिभासित होता है, जानता है ऐसा नहीं लिखा। आहाहा!
दर्पण में दो का प्रतिभास तो होता है।

00:13:03.440 --> 00:13:08.056
दर्पण का दल उसका भी 
प्रतिभास होता है, स्वच्छ पर्याय है।

00:13:08.080 --> 00:13:16.096
और दूसरे मोर आदि जो परपदार्थ बाहर के हैं,
कोयला आदि (भी) प्रतिभासित होते हैं। आहाहा!

00:13:16.120 --> 00:13:23.056
<p>स्फटिकमणि की पर्याय में उसका दल भी प्रतिभासित होता है 
और फूल का भी प्रतिभास है।

00:13:23.080 --> 00:13:31.696
लेकिन फूल या फूल की लालिमा उसमें आती नहीं।
और दल उसमें से निकलता नहीं।

00:13:31.720 --> 00:13:47.736
प्रत्येक समय दल को प्रसिद्ध करता है। दृष्टि निमित्ताधीन है
 इसलिए मुझे यह लाल दिखता है। आहाहा!

00:13:47.760 --> 00:13:58.336
आहाहा! दो भूल हैं बस!

00:13:58.360 --> 00:14:05.096
<p>स्वपरप्रकाशक यदि ज्ञान का लक्षण हो न?

00:14:05.120 --> 00:14:16.936
वास्तव में ज्ञान का लक्षण हो तो
अर्थात् कि सम्यकज्ञान का लक्षण हो तो,

00:14:16.960 --> 00:14:21.656
तो निगोद का जीव भी सम्यग्ज्ञानी हो गया।

00:14:21.680 --> 00:14:34.176
और स्वपरप्रकाशक लक्षण हो तो निगोद में
जैसे स्वपरप्रकाशक है तो आत्मा का अनुभव नहीं है,

00:14:34.200 --> 00:14:38.336
तो केवली भी स्वपरप्रकाश करते हैं
तो आत्मा का अनुभव नहीं होगा उनको।

00:14:38.360 --> 00:14:46.736
लक्षण ऐसा होना चाहिये कि जिसमें अव्याप्ति,
अतिव्याप्ति (और असंभव) दोष न आये।

00:14:46.760 --> 00:14:50.656
उसका नाम लक्षण है। ऐसी परिभाषा है लक्षण की।

00:14:50.680 --> 00:15:10.376
<p>प्रतिभास दो का होता है, लक्ष एक का ही होता है।
दो के ऊपर लक्ष होता ही नहीं।

00:15:10.400 --> 00:15:17.816
लक्ष अर्थात् अहमपना। लक्ष अर्थात्,
लक्ष का अर्थ अहमपना।

00:15:17.840 --> 00:15:21.936
जिसका ज्ञायक ऊपर लक्ष हुआ
कि मैं जाननहार हूँ, मैं ज्ञायक हूँ,

00:15:21.960 --> 00:15:27.236
फिर इन्द्रियज्ञान देह को जानता है,
लेकिन उसे देह में आत्मबुद्धि नहीं होती।

00:15:27.260 --> 00:15:32.416
क्यों नहीं होती पता है? क्यों नहीं होती?

00:15:32.440 --> 00:15:41.136
<p>मुमुक्षु:- लक्ष स्व के ऊपर है
इसलिए पर में उसे अहम्पना नहीं होता।

00:15:41.160 --> 00:15:50.736
<p>उत्तर:- ठीक। देह में अहम्बुद्धि क्यों नहीं होती?
और कोई उत्तर देगा?

00:15:50.760 --> 00:15:59.176
<p>मुमुक्षु:- जानने में नहीं आता। जानने में नहीं आता।
<p>उत्तर:- हं...बस! देह को जानता नहीं है ज्ञानी।

00:15:59.200 --> 00:16:06.176
तो जाने तो उसका श्रद्धान हो जाये। जानता ही नहीं न!
अतीन्द्रियज्ञान उसे जानता ही नहीं।

00:16:06.200 --> 00:16:15.576
भले ही जानने में आये, भले प्रतिभास हो, लेकिन वहाँ
लक्ष कहाँ है? लक्ष नहीं है इसलिए नहीं जानता है।
जाने तो लक्ष हो जाये।

00:16:15.600 --> 00:16:27.896
आहाहा! ऐसी बात है।
अद्भुत से अद्भुत चमत्कारिक बातें हैं।

00:16:27.920 --> 00:16:38.536
<p>मैं पर को जानता हूँ
ऐसा ज्ञान की पर्याय का जो व्यवहार - है अज्ञान।

00:16:38.560 --> 00:16:44.336
वह उसका शल्य है, इसलिए अंदर में नहीं आता उपयोग,
जानता नहीं है आत्मा को।

00:16:44.360 --> 00:16:51.296
मैं पर को जानता हूँ, मैं पर को जानता हूँ,
जानता है इन्द्रियज्ञान और मानता है कि मैं (जानता हूँ)।

00:16:51.320 --> 00:17:01.896
आत्मा तो अतीन्द्रियज्ञानमय है। आहाहा!
<p>गुरु के वचन हैं उन्हें भी नहीं मानता।

00:17:01.920 --> 00:17:07.896
वह <b>इन्द्रियज्ञान ज्ञान नहीं</b>
है न पुस्तक उसमें से निकालो तो जरा।

00:17:07.920 --> 00:17:14.896
<b>भगवान! तू पर को नहीं जानता</b> 
ऐेसा गुरुदेव ने कहा। गुरुदेव के शब्द!

00:17:14.920 --> 00:17:24.376
<b>भगवान! तू पर को नहीं जानता।</b>
कितनी करूणा की है। भगवान कहकर कहते हैं।

00:17:24.400 --> 00:17:34.456
भगवान पर को नहीं जानता ऐसा कहते हैं।
जो पर को जाने वह भगवान नहीं, बुद्धु है।

00:17:34.480 --> 00:17:41.896
<p>मुमुक्षु:- भगवान कहना, और पर को जाने?
<p>उत्तर:- कौन सा है बोल नंबर?
<p>मुमुक्षु:- २७६.

00:17:41.920 --> 00:17:56.136
<p>उत्तर:- दो सौ(छहत्तर), टू सेवन सिक्स - २७६ निकालो।

00:17:56.160 --> 00:18:12.216
<b>यहाँ तो कहते हैं कि - भगवान! तू पर को जानता ही नहीं।</b>
'ही' लगाकर सर्वथा कहा है।

00:18:12.240 --> 00:18:16.336
कथंचित् पर को जानता है और कथंचित् स्व को जानता है, ऐसा नहीं।

00:18:16.360 --> 00:18:23.536
कथंचित् शब्द होता है वह प्रतिभास का है,
जानने के ऊपर लागू नहीं पड़ता।

00:18:23.560 --> 00:18:32.736
कथंचित् स्व को जाने कथंचित् पर को जाने
ऐसा आये, तो वहाँ प्रतिभास लेना।

00:18:32.760 --> 00:18:40.176
लक्ष नहीं है वहाँ पर। दो के ऊपर लक्ष नहीं होता कभी भी, तो तो
मिश्रण - सम्यकज्ञान और मिथ्याज्ञान मिश्रण हो गया।

00:18:40.200 --> 00:18:44.176
<p>मुमुक्षु:- नहीं, ऐसा नहीं होता।

00:18:44.200 --> 00:18:54.696
<p>उत्तर :- आहाहा! यहाँ तो कहते हैं कि भगवान!
जो भगवान होता है न, वह पर को नहीं जानता।

00:18:54.720 --> 00:19:02.736
मैं पर को जानता हूँ, वह भगवान को स्वीकार नहीं करता है।
भगवान नहीं होगा। खलास! गया वह दुनियाँ में से।

00:19:02.760 --> 00:19:13.136
ये तो गुरुदेव के शब्द हैं।
गुरुदेव के रोज पैर छुए, लेकिन उनका कहा हुआ इसे मानना नहीं है।

00:19:13.160 --> 00:19:19.496
वो तो किसी अपेक्षा से ज्ञानी कहते हैं,
लेकिन दूसरी अपेक्षा तो है न?

00:19:19.520 --> 00:19:24.216
एक अपेक्षा से, वो तो निश्चय से बात की है,
व्यवहार से तो पर को जानता है न?

00:19:24.240 --> 00:19:30.296
इसमें निश्चय व्यवहार लगाया ही नहीं है।
देख तो सही तू। स्वभाव है उसे बताते हैं।

00:19:30.320 --> 00:19:35.696
भगवान! तू निश्चय से पर को नहीं जानता-
ऐसा लिखा नहीं है, बोला भी नहीं है।

00:19:35.720 --> 00:19:43.616
आहाहा! स्वभाव से बात की है।

00:19:43.640 --> 00:19:49.376
<b>भगवान! तू पर को जानता ही नहीं</b>।
'ही' लगाया है। सम्यक् एकांत।

00:19:49.400 --> 00:19:52.816
सम्यक् एकांत अर्थात् क्या पता है? अनेकांत।

00:19:52.840 --> 00:19:58.736
कि स्व जानने में आता है और पर जानने में नहीं आता।
उसका नाम अनेकांत है, अस्ति-नास्ति अनेकांत।

00:19:58.760 --> 00:20:04.776
<b>भगवान! तू पर को जानता ही नहीं।</b>
<p>आगे, दूसरी लाइन।

00:20:04.800 --> 00:20:13.376
<b>भगवान लोकालोक को जानते हैं ऐसा कहना
वह तो असद्भूत व्यवहार है</b> - झूठा व्यवहार।

00:20:13.400 --> 00:20:21.176
फिर तीसरी लाइन। तीन लाइन हैं। वन, टू, थ्री (१, २, ३)
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्ग।

00:20:21.200 --> 00:20:26.696
<b>भगवान! तू पर को जानता ही नहीं।</b>
दोनों में 'ही' लगाया। आहाहा!

00:20:26.720 --> 00:20:35.096
सम्यक् एकांत किया है। कथंचित् भगवान अपने को जानता है
और कथंचित् पर को जानता है ऐसा नहीं है।

00:20:35.120 --> 00:20:42.376
<p>इन्द्रियज्ञान पर को जानता है, उसका उपचार देकर,
व्यवहारनय ऐसा कहता है कि (आत्मा) पर को जानता है।

00:20:42.400 --> 00:20:50.896
राग को जानता है आत्मा - साधक का आत्मा,
(वह) उपचार का कथन है।

00:20:50.920 --> 00:20:59.256
जानता है इन्द्रियज्ञान, उपचार आया
कि आत्मा उसे जानता है। आत्मा जानता नहीं है।

00:20:59.280 --> 00:21:08.056
आत्मा, आत्मा को जानता है।
आहाहा! भगवान तू पर को जानता ही नहीं।

00:21:08.080 --> 00:21:18.776
मीठा मधुर अमृत जैसा वचन है। आहाहा!
<p>लक्ष्मी टीका करने के लिये आयी है, अपना मुँह मत फेरना। आहाहा!

00:21:18.800 --> 00:21:31.816
गिरनार है न जूनागढ़ अपना।
नेमिनाथ भगवान के जहाँ पर कल्याणक हुए थे, तीन।

00:21:31.840 --> 00:21:39.016
उस जूनागढ़ में ऐसी घटना बन गई,
एक राजा राज्य करता था, रा’मांडलिक। 

00:21:39.040 --> 00:21:48.296
राजा की उत्तरोत्तर गद्दी आती है न?
तो सौ-दो सौ साल पहले की बात है।

00:21:48.320 --> 00:21:54.336
रा’मांडलिक राज्य करता था।
राजगद्दी उसको दी। उनके पिताजी गुजर गये।

00:21:54.360 --> 00:21:59.016
रा’मांडलिक को गद्दी के ऊपर
दीवान ने बिठाया, समाज ने, सभी ने।

00:21:59.040 --> 00:22:10.056
तो वहाँ रिवाज था कि चारण लोग होते हैं न उनकी लड़की -
कुमारी तिलक करने आती है और फिर (राजा) गद्दी पर बैठता है।

00:22:10.080 --> 00:22:23.496
ऐसा रिवाज था वहाँ का। 
<p>तो बहन आयी,
कुमारी, बहन, पुत्री आयी। तिलक करने लगी

00:22:23.520 --> 00:22:33.496
तो उसने (राजा ने) अपना मुख फेर लिया। क्योंकि तिलक करती
तो तो पिता हो जाता। उसकी दृष्टि विपरीत थी।

00:22:33.520 --> 00:22:40.216
दृष्टि में दोष आ गया, देखकर।
आहाहा! कामवासना प्रगट हो गई।

00:22:40.240 --> 00:22:51.496
ऐसा कर दिया (मुँह फिरा लिया) तो लड़की गई अपनी
माँ के पास। कि माँ, माँ, राजा ने तिलक करने से मना किया है।

00:22:51.520 --> 00:22:57.776
(तो माँ ने कहा) क्या किया? कि अपना मुख फिरा लिया।
रा' नहीं पलटता उसके दिन पलटते हैं।

00:22:57.800 --> 00:23:03.256
राजगद्दी चली गई। खलास!
चढ़ाई करके दूसरा राजा आ गया।

00:23:03.280 --> 00:23:15.196
<p>इसीप्रकार भगवान तू पर को नहीं जानता है। 
ऐसे मत करना (अपना चेहरा मत घुमाना)
ऐसा करना (हाँ करना)। हाँ प्रभु! ठीक है।

00:23:15.220 --> 00:23:25.016
ये बैठे! 'ही' लगाया बहन! 

00:23:25.040 --> 00:23:34.216
भगवान कहकर कहा है। क्योंकि वे तो सभी को
भगवान देखते हैं न? और भगवान पर को जानते ही नहीं।

00:23:34.240 --> 00:23:46.696
ऐसे भगवान को देखा। और ऐसे भगवान को कहते हैं
कि भगवान! तू पर को जानता ही नहीं। आहाहा!

00:23:46.720 --> 00:23:56.816
<p>गुरुदेव के स्वर्गवास के बाद यह कहा कि
आत्मा पर को नहीं जानता, जाननहार ही जानने में आता है।

00:23:56.840 --> 00:24:07.016
उहापोह बहुत हुई। आहाहा! बहुत उहापोह हुई। 
पूरे हिंदुस्तान में हों! खलबली मच गई।

00:24:07.040 --> 00:24:13.976
उसमें एक बार ज्योति बेन और भरत भाई घर पर आये।
तब मैं दीवानपरा में रहता था।

00:24:14.000 --> 00:24:24.896
ज्योति बेन ने कहा कि 'भाई! तुम्हारी हिम्मत कैसे चली कि
आत्मा पर को जानता ही नहीं?' ये बैठे हैं। कहा था न?

00:24:24.920 --> 00:24:32.896
<p>मुमुक्षु:- हाँ जी।
<p>उत्तर:- तुम्हारी हिम्मत कैसी चली? आहाहा!

00:24:32.920 --> 00:24:42.736
पर को जानने का निषेध जहाँ आता है वहाँ एक नया
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होकर आत्मा का अनुभव कर लेता है।

00:24:42.760 --> 00:24:56.776
निषेध का फल सम्यग्दर्शन है। निषेध का फल बड़ा है।
<p>मुमुक्षु:- सब ओर से वापस मुड़ता है।

00:24:56.800 --> 00:25:09.976
<p>मुमुक्षु:- निषेध का फल सम्यग्दर्शन है। आहाहा!
<p>उत्तर:- ये तो गुरुदेव के शब्द पढ़ाये हैं मैंने।

00:25:10.000 --> 00:25:16.136
भगवान तू पर को जानता ही नहीं है।
तीन लाइन में दो बार कहा।

00:25:16.160 --> 00:25:21.696
और सामने वापस आधार दिया है कि
कोई ऐसा कहे कि केवली भगवान लोकालोक को जानते हैं

00:25:21.720 --> 00:25:24.536
और हम अपने क्षयोपशम के अनुसार जानते हैं।

00:25:24.560 --> 00:25:33.416
कि केवली भगवान लोकालोक को जानते हैं वह झूठा
व्यवहार है। असद्भूत अर्थात् झूठा व्यवहार है। आहाहा!

00:25:33.440 --> 00:25:41.656
<p>यह इन्द्रियज्ञान पर को जानता है और 
इन्द्रियज्ञान में (उसे) ज्ञान की भ्रांति हो गई है।

00:25:41.680 --> 00:25:47.976
इसलिए वापस मुड़ता नहीं है।
वह सत्य लगता है।

00:25:48.000 --> 00:25:52.656
इन्द्रियज्ञान पर को जानता है अर्थात् मैं ही पर को जानता हूँ।
अर्थात् इन्द्रियज्ञान में अहम् हो गया।

00:25:52.680 --> 00:26:02.376
इन्द्रियज्ञान के अंदर स्वस्वामी संबंध हुआ।
उसके साथ कर्ता-कर्म संबंध हो गया। आहाहा!

00:26:02.400 --> 00:26:20.316
<p>भगवान! तू पर को जानता ही नहीं। आहाहा!
उनकी कैसे हिम्मत चली होगी?

00:26:20.340 --> 00:26:27.656
ऐसा स्वरूप है। उसमें हिम्मत चलने की (बात) नहीं है।
ये तो स्वभाव ही है। सभी का स्वभाव है।

00:26:27.680 --> 00:26:32.656
सभी का स्वभाव है। वह सभी को कहा न?
भगवान! तू पर को जानता ही नहीं।

00:26:32.680 --> 00:26:39.236
ऐसा नहीं कहा, 'भरतभाई' तुम पर को जानते नहीं'
ऐसा नहीं कहा। ऐसा हमने पढ़ा नहीं उसमें कहीं भी।

00:26:39.260 --> 00:26:46.256
भगवान! तू पर को नहीं जानता।
आहाहा! नाम नहीं लिखा है उसमें। 

00:26:46.280 --> 00:26:55.856
सभी का नाम तो भगवान है इसलिए भगवान कहा। किसी का
नाम भरतभाई या किसी का नाम जिज्ञेश, ऐसा नहीं है।

00:26:55.880 --> 00:27:05.296
भगवान! तू पर को जानता ही नहीं। अमृत जैसे वचन हैं।
निषेध करे तो सम्यग्दर्शन होता है।

00:27:05.320 --> 00:27:15.056
निषेध में विधी प्रगट हो जाती है।

00:27:15.080 --> 00:27:23.216
दो भूल की पुस्तक बहुत बड़ी। ओहो!
इतने इतने (बड़े) अक्षर, <b>दो भूल</b>।

00:27:23.240 --> 00:27:27.496
<p><b>करती है पर्याय और मानता है कि मैं करता हूँ।</b>

00:27:27.520 --> 00:27:38.496
<b>जानता है इन्द्रियज्ञान पर को</b> (और)
<b>मानता है कि मैं पर को जानता हूँ। दो भूल हैं।</b>

00:27:38.520 --> 00:27:46.216
थोड़े दिन पहले बहन से बात की फ़ोन पर।

00:27:46.240 --> 00:27:52.976
तो कहा कि यह पुस्तक तो लिखने जैसी है।
वो तुम जानो, हमारा काम नहीं है अब।

00:27:53.000 --> 00:27:59.536
<p>मुमुक्षु:- इसमें आ गया,
ये सभी पुस्तक में, सब आ गया।

00:27:59.560 --> 00:28:08.816
<p>उत्तर:- गुरुदेव के वचन शिरोमान्य करने चाहिये।
ज्ञानी को मानता नहीं है इसलिए अज्ञानी रह गया है।

00:28:08.840 --> 00:28:17.376
जब उन ज्ञानी के वचन को शिरोमान्य करेगा भाव से,
तो वह ज्ञानी हो जायेगा। ज्ञानी हो ही जानेवाला है।

00:28:17.400 --> 00:28:32.216
अंतर नहीं पड़ेगा इसमें। आहाहा!

00:28:32.240 --> 00:28:56.256
<p>दो भूल। बस! समझने में देर लगे क्रम से-
लेकिन जब निकलती हैं तब दो भूल एक समय में जाती हैं, हों!

00:28:56.280 --> 00:29:09.136
यह पुस्तक मिल गई दो भूल की बोलो!

00:29:09.160 --> 00:29:26.616
दो भूल का विस्तार है सब पूरी तरह।

00:29:26.640 --> 00:29:29.216
<p>मुमुक्षु:- वह कौनसी पुस्तक है?

00:29:29.240 --> 00:29:37.176
<p>उत्तर:- वह तुम्हारे ज्ञान में है पुस्तक।
तुम्हारे ज्ञान में पुस्तक है।

00:29:37.200 --> 00:29:47.376
तुम विचार करो कि <b>परिणाम परिणाम को करता है,
मैं नहीं करता।</b> यह एक भूल की पुस्तक आयी।

00:29:47.400 --> 00:29:54.816
<b>इन्द्रियज्ञान पर को जानता है, मैं पर को नहीं जानता।</b>
यह दूसरी भूल। वह तुम्हारे ज्ञान का ही नाम है।

00:29:54.840 --> 00:29:58.736
ज्ञान में ही दो नाम हैं, समझ गये?

00:29:58.760 --> 00:30:10.936
दो भूल गई, सम्यग्ज्ञान प्रगट हो जाता है।
भूल टल जाती है। आहाहा! आत्मदर्शन हो जाये ऐसी बात है।

00:30:10.960 --> 00:30:22.936
ये दो भूल की पुस्तक भी भविष्य में निकलेगी
ऐसा लगता है। अर्थात् कोई न कोई इसे निकालेगा।

00:30:22.960 --> 00:30:32.056
इतने सारे लोग बैठे हैं। पाँच वर्ष में, दश वर्ष में,
बीस वर्ष में किसी न किसी को विचार आयेगा।

00:30:32.080 --> 00:30:45.496
<p>बाकी बहन को तो कहा है कि अब पुस्तक नहीं,
यह अंतिम है खलास! <b>इन्द्रियज्ञान ज्ञान नहीं है।</b>

00:30:45.520 --> 00:30:57.296
उसमें सब कुछ आ जाता है। (उसमें) कुछ बाकी नहीं है।
उसमें से ही हमने निकाला न कि भगवान तू पर को जानता नहीं है। 

00:30:57.320 --> 00:31:05.136
मैं पर को जानता हूँ ऐसा जो मानता है
वह अजैन है, दिगंबर जैन नहीं।

00:31:05.160 --> 00:31:23.456
गुरुदेव के शब्द (हैं)। इससे ज्यादा क्या कहें?

00:31:23.480 --> 00:31:38.876
<p>इन्द्रियज्ञान ऊर्ध्व नहीं होता, गौण हो जाता है।

00:31:38.900 --> 00:31:47.016
अतीन्द्रियज्ञान के प्रकाश और प्रताप में
इन्द्रियज्ञान गौण हो जाता है।

00:31:47.040 --> 00:31:58.496
इन्द्रियज्ञान ज्ञान नहीं है, बस! इन्द्रियज्ञान (से)
अतीन्द्रियज्ञान का प्रकाश और प्रताप अलग प्रकार का है।

00:31:58.520 --> 00:32:06.456
अहम् नहीं होता। इन्द्रियज्ञान रह जाता है, (किन्तु) 'इन्द्रियज्ञान
मेरा है' ऐसी ममता नहीं होती, मिथ्यात्व जाता है।

00:32:06.480 --> 00:32:17.216
इन्द्रियज्ञान तो रहता है, भले रहे। भले ही वो पर को जाने,
परिणाम भले ही पर्याय को करे, मुझे कोई दिक्कत नहीं है।

00:32:17.240 --> 00:32:26.696
लेकिन वे परिणाम भी सीधे हो जाते हैं फिर।
मिथ्यात्व जाता है न, आहाहा! फिर सीधे हो जाते हैं। 

00:32:26.720 --> 00:32:39.496
फिर उसकी योग्यता भी सुधर जाती है।

00:32:39.520 --> 00:32:57.416
<p>कल रात को पढ़वायी थी भरतभाई को ३१ गाथा। 

00:32:57.440 --> 00:33:15.816
भावेन्द्रिय के द्वारा ग्रहण करने में आते हुए
इन्द्रियज्ञान के जो विषय,

00:33:15.840 --> 00:33:26.016
स्पर्श आदि विषय उनको अपने स्वभाव,
असंगी स्वभाव द्वारा जीत लेता है।

00:33:26.040 --> 00:33:43.976
जो आत्मा स्पर्शादि पदार्थ को जानता होता तो
उसे जीतने की बात न आती, तो तो स्वभाव होता।

00:33:44.000 --> 00:33:57.856
विभाव हो उसे जीतने की बात हो।

00:33:57.880 --> 00:34:10.816
'ज्ञायक नहीं परतणो', एक सेटिका की गाथा तो बस है।
'ज्ञायक नहीं परतणो', ज्ञायक पर को जानता ही नहीं है।

00:34:10.840 --> 00:34:13.976
<p>मुमुक्षु:- यही बात है न?
भगवान! तू पर को जानता ही नहीं है।

00:34:14.000 --> 00:34:18.376
<p>उत्तर:- यही कहा।
<p>मुमुक्षु:- अर्थात् ज्ञायक पर को जानता ही नहीं है।
<p>उत्तर:- जानता ही नहीं, भगवान कहो या ज्ञायक कहो।

00:34:18.400 --> 00:34:24.216
<p>मुमुक्षु:- ज्ञायक कहो। एक ही बात है।

00:34:24.240 --> 00:34:38.096
<p>उत्तर:- और मैं पर को जानता हूँ, तो आत्मा का
नाश किया है उसने। अस्तित्व अलग नहीं रहा।

00:34:38.120 --> 00:34:47.416
खड़ी (कलई) वह पर की नहीं है, खड़ी तो खड़ी ही है।
ज्ञायक नहीं पर का, ज्ञायक तो ज्ञायक ही है।

00:34:47.440 --> 00:34:56.136
मूल में दो ही बात की हैं। सद्भूत व्यवहार लिया ही नहीं है। 

00:34:56.160 --> 00:35:04.336
एक विपरीतता थी और विपरीतता जाती है 
तो अविपरीत प्रगट हो जाता है बस!

00:35:04.360 --> 00:35:15.976
देवलाली में सुबह उठकर रोज पाँच गाथा
बहन के पास बुलवाते हैं। फिर चर्चा करते हैं।

00:35:16.000 --> 00:35:23.516
पहले कहा बहन बोलो पाँच गाथा। तीन गाथा ये
और दो गाथा वो। मोक्ष अधिकार की। कौन सी?

00:35:23.540 --> 00:35:31.356
<p>मुमुक्षु:- मोक्ष अधिकार की तीन और दो वो वाली।
<p>उत्तर:- तीन ये और दो वो। मोक्ष अधिकार की तीन और दो ये वाली।

00:35:31.380 --> 00:35:36.536
बोलो न, सब लोग सुनें इसमें क्या परेशानी है?
यह देवलाली ही है (ऐसा) समझो न?

00:35:36.560 --> 00:35:57.736
मूल गाथा हैं मूल। पाँच गाथायें मूल हैं।
पंचपरमेष्ठी पद में आ जाता है जीव, खलास!

00:35:57.760 --> 00:36:35.496
<p><b>कर ग्रहण प्रज्ञा से नियत, चेतक है सो ही मैं हि हूँ।</b>
<p><b>अवशेष जो सब भाव हैं, मेरे से पर हैं--जानना।।२९७।।</b>

00:36:35.520 --> 00:37:12.416
<p><b>कर ग्रहण प्रज्ञा से नियत, द्रष्टा है सो ही मैं ही हूँ।</b>
<p><b>अवशेष जो सब भाव हैं, मेरे से पर हैं--जानना।। २९८।।</b>

00:37:12.440 --> 00:37:31.816
<p><b>कर ग्रहण प्रज्ञा से नियत, ज्ञाता है सो ही मैं ही हूँ।</b>
<p>करनेवाला नहीं, आत्मा जाननेवाला है, ऐसा कहते हैं।

00:37:31.840 --> 00:37:37.336
भगवान की वाणी में आया है।
भगवान की वाणी दिव्यध्वनि हों!

00:37:37.360 --> 00:37:47.456
कुंदकुंदाचार्य की मूल गाथा।
मैं जाननेवाला हूँ, करनेवाला नहीं। 
जो जाननेवाला है वह ही मैं हूँ।

00:37:47.480 --> 00:37:57.016
आहाहा! जानने की क्रिया (भी) नहीं करता।
होती जरूर है क्रिया, आत्मा को जानने की क्रिया होती है

00:37:57.040 --> 00:38:03.536
फिर भी वह ज्ञाता रहता है, करनेवाला नहीं होता।
ऐसे ज्ञाता को मैं जानता हूँ ऐसा कहते हैं, बहन।

00:38:03.560 --> 00:38:11.876
भगवान कहते हैं। आहाहा! प्रज्ञा से, निश्चय से।

00:38:11.900 --> 00:38:29.176
<p><b>कर ग्रहण प्रज्ञा से नियत, ज्ञाता है सो ही मैं ही हूँ।</b>
<p>ग्रहण करना अर्थात् जानना। सो ही।

00:38:29.200 --> 00:38:45.976
<p><b>अवशेष जो सब भाव हैं, मेरे से पर हैं-- जानना।।२९९।।</b>

00:38:46.000 --> 00:39:25.896
<p><b>ज्यों सेटिका नहीं अन्य की, है सेटिका बस सेटिका।</b>
<p><b>ज्ञायक नहीं त्यों अन्य का, ज्ञायक अहो ज्ञायक तथा।।३५६।।</b>

00:39:25.920 --> 00:39:44.136
<p><b>ज्ञायक नहीं त्यों अन्य का, ज्ञायक अहो ज्ञायक तथा।।३५६।।</b>

00:39:44.160 --> 00:40:12.136
<p><b>ज्यों सेटिका नहीं अन्य की, है सेटिका बस सेटिका।</b> 
<p><b>दर्शक नहीं त्यों अन्य का,</b> 
<p>पर को देखता नहीं है आत्मा।

00:40:12.160 --> 00:40:28.656
अंधा हो जा एक बार पर को देखने जानने से। आहाहा!
किसको पड़ी है? पड़ी है उसे पड़ी है। बाकी तो ऐसा का ऐसा है।

00:40:28.680 --> 00:40:43.656
गुरुदेव के शब्द - अंधा हो जा एक बार, कहते हैं।
पंद्रहवीं गाथा चलती थी।

00:40:43.680 --> 00:40:53.896
<p>मुमुक्षु:- <b>दर्शक अहो दर्शक तथा।</b>
<p>उत्तर:- <b>दर्शक नहीं त्यों अन्य का,</b> पर को देखता नहीं है।

00:40:53.920 --> 00:40:57.836
<p>मुमुक्षु:- ऐसा देखनेवाला है।
<p>उत्तर:- ऐसा देखनेवाला है।
<p>मुमुक्षु:- पर को देखे ऐसा नहीं है।

00:40:57.860 --> 00:41:03.656
<p>उत्तर:- ऐसा देखनेवाला नहीं है। पर को देखे ऐसा
देखनेवाला नहीं है अर्थात् ऐसा देखनेवाला दिखता नहीं।

00:41:03.680 --> 00:41:09.196
पर को नहीं देखता है, ऐसा देखनेवाला है,
ऐसा देखनेवाला दिखता है तब अनुभव होता है।

00:41:09.220 --> 00:41:24.216
पर को जानता देखता है वो इन्द्रियज्ञान का धर्म है।
इसमें एकांत, एकांत लगता है लोगों को,

00:41:24.240 --> 00:41:28.896
आहाहा! लेकिन 'भगवान! तू पर को जानता ही नहीं' - 
ये उनके (गुरुदेव के) वचन हैं।

00:41:28.920 --> 00:41:44.376
ये कहाँ लालुभाई के वचन हैं। आहाहा!
<p>व्यक्ति की बात नहीं है, तत्त्व की बात है यह।

00:41:44.400 --> 00:41:58.336
कुंदकुंद भगवान कहते हैं,
सर्वज्ञ भगवान के द्वारा कहे हुए छह द्रव्य, उनको मैं जानता हूँ,

00:41:58.360 --> 00:42:07.816
ऐसा यदि तेरा अभिप्राय होगा तो तुम मिथ्यादृष्टि हो।
छह द्रव्य को जानता हूँ, मेरे छह द्रव्य (हैं ऐसा) नहीं।

00:42:07.840 --> 00:42:14.816
छह द्रव्य के परिणाम को करता नहीं हूँ,
लेकिन छह द्रव्य को छह द्रव्य स्वरूप ही जानता हूँ,

00:42:14.840 --> 00:42:19.976
धर्म को धर्म, अधर्म को अधर्म। मिथ्यादृष्टि है।

00:42:20.000 --> 00:42:28.096
<p>क्योंकि भगवान! तू पर को नहीं जानता और यह कहता है
छह द्रव्य को मैं जानता हूँ, नवतत्त्व को मैं जानता हूँ।

00:42:28.120 --> 00:42:36.776
लेकिन नवतत्त्व को, छह द्रव्य को तू जानेगा तो तेरे
आत्मा को कौन जानेगा? उसका तो विचार कर!

00:42:36.800 --> 00:42:55.896
<b>कर विचार तो पाम,</b> स्वतंत्ररूप से
स्वयं एकांत में बैठकर विचार करे तो होवे।

00:42:55.920 --> 00:43:05.616
अपनी विचार शक्ति यदि उठती न हो तो
११ भाग हैं, गुरुदेव की टेप हैं।

00:43:05.640 --> 00:43:15.216
लेकिन उसमें से मक्खन निकाल लेना, और छाछ को फेंक देना।
वह कला आनी चाहिये।

00:43:15.240 --> 00:43:22.336
क्योंकि दही बिलोते हैं न तो छाछ और मक्खन एक साथ होते हैं।
तब मक्खन ऐसे ऊपर तैरता है न, उसे ऐसे (अलग) निकाल लेते हैं।

00:43:22.360 --> 00:43:29.656
आहाहा! लेकिन मक्खन लेकर फिर ऐसे
ऐसे करे। इससे जो छाछ बाकी होती है न, वो निकल जाती है। 

00:43:29.680 --> 00:43:34.456
शुद्ध मक्खन निकाल लेता है। आहाहा!
वह स्त्री होशियार है।

00:43:34.480 --> 00:43:40.696
ऐसे करके, ऐसे लेकर डाले, ऐसे करके ऐसे डाले
छाछ सहित, वह तो फूहड़ है। उसे आता नहीं है मक्खन निकालना।

00:43:40.720 --> 00:43:51.296
गुरुदेव एक पद बोलते थे।
आता है? छाछ में भरमाया। 

00:43:51.320 --> 00:44:08.536
<p>मुमुक्षु:- गगन मण्डल में गौवा बिहाई, वसुधा दूध
जमाया। माखन था सो विरला पाया, छाछे जगत भरमाया।

00:44:08.560 --> 00:44:12.376
<p>उत्तर:- आहाहा! अर्थात् व्यवहारनय को,
इस छाछ की जगह पर व्यवहार रखा है। समझ गये न?

00:44:12.400 --> 00:44:22.536
माखन की जगह पर निश्चय स्वभाव को रखा है।
निश्चय से जो बात करते हैं गुरुदेव वह तो ठीक ही है,

00:44:22.560 --> 00:44:29.176
लेकिन अकेले निश्चय की नहीं की है,
व्यवहार की बात भी की है गुरुदेव ने। आहाहा!

00:44:29.200 --> 00:44:33.336
<p>मुमुक्षु:- निश्चय की बात स्वभाव की बात है।
निश्चय की बात स्वभाव की बात है।

00:44:33.360 --> 00:44:36.096
<p>उत्तर:- हाँ, और व्यवहार की बात की है अर्थात्?
<p>मुमुक्षु:- झूठी बात है।

00:44:36.120 --> 00:44:40.496
<p>उत्तर:- झूठी है, निषेध करने के लिए की है।
हाँ, ऐसा कहना तुझे, समझ गये?

00:44:40.520 --> 00:44:45.736
जब कोई कहे कि तुम्हारे गुरु ने व्यवहार की बात
की है? हाँ, बराबर की है! तो वह खुश हो जायेगा।

00:44:45.760 --> 00:44:52.716
फिर जरा एक मिनट रहकर कहना - हाँ व्यवहार की बात
जितनी की है गुरुदेव ने वह निषेध करने के लिए की है

00:44:52.740 --> 00:44:57.896
ऐसा हम जानते हैं।
ऐसा कह देना, स्पष्ट कह देना।

00:44:57.920 --> 00:45:08.096
<p>मुंबई में ऐसी घटना घटी। चर्चा चलती थी,
शांतिभाई झवेरी के घर। बहुत लोग आते थे,

00:45:08.120 --> 00:45:17.296
श्वेतांबर, स्थानकवासी, बहुत आते थे। एक भाई आये, कहा
कि समर्थ आचार्य भगवंतों ने व्यवहार दर्शाया है।

00:45:17.320 --> 00:45:24.856
तो मैंने कहा कि (हाँ), बराबर दर्शाया है। खुश हो गया।
समझ गये? लेकिन निषेध करने के लिये दर्शाया है।

00:45:24.880 --> 00:45:30.936
दूसरे दिन से आना बंद कर दिया (उसने)।
दर्शाया है यह बात सच्ची है।

00:45:30.960 --> 00:45:38.416
चौदह गुणस्थान, मार्गणास्थान, व्यवहार दर्शाया है,
लेकिन निषेध करने के लिए बताया है।

00:45:38.440 --> 00:45:49.736
वह आत्मा में नहीं है, आत्मा उसका स्वामी नहीं है।
व्यवहार दर्शाया है। पाँच महाव्रत होते हैं। आहाहा!

00:45:49.760 --> 00:45:58.216
कौन मना करता है? लेकिन निषेध करने के लिये है
व्यवहार, आदर करने के लिये नहीं है।

00:45:58.240 --> 00:46:08.056
उपादेय तत्त्व नहीं है। उपादेय भी नहीं है
और हेय भी नहीं है और वास्तव में तो ज्ञेय भी नहीं है। आहाहा!

00:46:08.080 --> 00:46:13.296
वह ज्ञेय रहेगा तब तक अनुभव नहीं होगा।

00:46:13.320 --> 00:46:23.736
<p>पंचाध्यायी में एक बात बहुत अच्छी आयी है,
नयज्ञान के लिए।

00:46:23.760 --> 00:46:35.696
कि नयज्ञान है वह शुद्धज्ञान तो नहीं है लेकिन ज्ञेय भी नहीं है।
वह निकालो न बहन, कहाँ है उसमें (जरा देखो)।

00:46:35.720 --> 00:46:48.656
नयज्ञान, निश्चयनय और व्यवहारनय दोनों हों!
अकेला व्यवहारनय नहीं। नयमात्र, नयज्ञान मात्र।

00:46:48.680 --> 00:47:07.296
नयज्ञान, ज्ञान तो नहीं है लेकिन ज्ञेय भी नहीं है।
इसमें है? ऐसा? ठीक।

00:47:07.320 --> 00:47:22.336
<p>पंचाध्यायी भाग पहला गाथा ५०६। ५०६ गाथा में है।
<b>अन्वयार्थ:- ज्ञान के विकल्प का नाम नय है।</b>

00:47:22.360 --> 00:47:37.336
ज्ञान के विकल्प का नाम नय है। ज्ञान का नाम नय,
ऐसा नहीं लिखा। ज्ञान के विकल्प का नाम नय है।

00:47:37.360 --> 00:47:51.336
<b>तथा वह विकल्प भी परमार्थभूत नहीं है।</b>
आहाहा! सत्यार्थ नहीं है वह विकल्प।

00:47:51.360 --> 00:48:02.816
<b>क्योंकि वह ज्ञानविकल्परूप नय
शुद्धज्ञानगुण तथा ज्ञेय भी नहीं है।</b> आहाहा!

00:48:02.840 --> 00:48:09.896
ज्ञान तो नहीं लेकिन ज्ञान का ज्ञेय भी नहीं है।
विकल्प ज्ञेय नहीं होता।

00:48:09.920 --> 00:48:16.056
जब तक विकल्प ज्ञेय है
तब तक मिथ्यादृष्टि है।

00:48:16.080 --> 00:48:23.156
<p>नय को ज्ञान माने तो भी मिथ्यादृष्टि।
नयज्ञान को ज्ञान माने तो भी मिथ्यादृष्टि।

00:48:23.180 --> 00:48:28.056
और नय को ज्ञेय माने तो भी मिथ्यादृष्टि।

00:48:28.080 --> 00:48:37.776
ज्ञान स्वरूपी भगवान भी यहाँ और ज्ञेय
भी यहाँ है। मैं ही ज्ञान और मैं ही ज्ञेय हूँ।

00:48:37.800 --> 00:48:44.916
यह विकल्प मेरा ज्ञेय नहीं है। आहाहा!

00:48:44.940 --> 00:48:51.336
<b>तथा ज्ञेय भी नहीं है, परंतु ज्ञेय के संबंध से
होनेवाले ज्ञान के विकल्प का नाम नय है।</b>

00:48:51.360 --> 00:49:01.976
दोष है, नय तो दोष है, गुण नहीं है।
नयज्ञान है न? वह दोष है, गुण नहीं है।

00:49:02.000 --> 00:49:16.296
<p>एकबार बहन मंदिर जाती थी दर्शन करने मुंबई में।
पंकजभाई साथ में थे। रोज जाते थे सुबह को, पास में (था) मंदिर।

00:49:16.320 --> 00:49:23.376
उनके पद में आता है कि नयज्ञान भी ज्ञान नहीं है,
भजन में।

00:49:23.400 --> 00:49:32.096
मैंने कहा, लेकिन संध्याबेन! नय से तो आत्मा का
अनुभव होता है। (और) तुम कहती हो नय नहीं है आत्मा में।

00:49:32.120 --> 00:49:42.576
कि नहीं, नय नहीं है।
नय से आत्मा का अनुभव नहीं होता, ज्ञान से होता है।

00:49:42.600 --> 00:49:57.296
<p>इसी तरह, पहली मुलाकात हमारी हुई थी फीरोजाबाद में,
आठ नौ वर्ष पहले।

00:49:57.320 --> 00:50:01.256
तब उनका प्रश्न आया
ध्येय पूर्वक ज्ञेय का। चर्चा चलती थी।

00:50:01.280 --> 00:50:15.696
चर्चा चलते, चलते, चलते, चलते मैंने पूछा,
कि आत्मा का अनुभव होता है...

00:50:15.720 --> 00:50:21.776
ऐसे तो प्रश्न पूछने की मेरी आदत ही नहीं है-
ऐसा करके पूछा। तो भी पूछता हूँ

00:50:21.800 --> 00:50:28.516
कि अनुभव होता है तब आनंद का अनुभव आता है,
आनंद की पर्याय प्रगट होती है।

00:50:28.540 --> 00:50:33.136
तो उस पर्याय को ज्ञान जाने,
तो मिथ्यादृष्टि होता है कि नहीं होता?

00:50:33.160 --> 00:50:44.616
पर्याय को जाने। द्रव्य को जाने-ऐसा नहीं पूछा था मैंने।
कि नहीं होता मिथ्यादृष्टि। ऐसा? अच्छी बात है।

00:50:44.640 --> 00:50:56.496
<p>मुंबई में एक सच्चा हीरा सोने की डिब्बी में रखा

00:50:56.520 --> 00:51:04.416
और एक लकड़ी (की डिब्बी) को काले रंग से रंगा दी। 
भद्दी डिब्बी, डिब्बी।

00:51:04.440 --> 00:51:09.576
उसमें उसकी अपेक्षा ऊँची कीमत का हीरा रखा।
ऊँची कीमत का हीरा।

00:51:09.600 --> 00:51:19.176
ग्राहक आया तो दो डिब्बी उसे दिखायी। डिब्बी देखकर ,
यह नहीं देखना है- ऐसा उसने कहा। सेठ ने कहा कि भाई! वो हीरा ऊंचा है।

00:51:19.200 --> 00:51:22.476
नहीं नहीं मुझे देखना नहीं है। डिब्बी के ऊपर नजर थी न?

00:51:22.500 --> 00:51:27.616
वह सोने की डिब्बी थी,
इसलिए हाँ, यह हीरा मुझे लेना है। समझ गये?

00:51:27.640 --> 00:51:36.816
तो कहे कि भले सेठ! यह हीरा तुम रखो।
तो पाँच लाख का हीरा उसने लिया।

00:51:36.840 --> 00:51:42.576
<p>फिर वह डिब्बी थी न जो भद्दी थी हों!
देखते ही उँहु उँहु होता था।

00:51:42.600 --> 00:51:48.516
उसके ऊपर गुड़ लगाया था
इसलिए मक्खियाँ बैठती थी। उँहु उँहु, वह नहीं।

00:51:48.540 --> 00:51:55.856
बाद में हीरा निकालकर दिखाया। कि यह बीस लाख का हीरा है।
तुमने इस डिब्बी के सामने नजर की, (लेकिन) हीरे को तो देखा ही नहीं।

00:51:55.880 --> 00:52:05.976
<p>इसप्रकार बाहर के चमड़े को देखता है कि यह स्त्री की पर्याय
और यह पुरुष की और यह नपुंसक की।

00:52:06.000 --> 00:52:10.496
अरे! भगवान आत्मा!
सम्यग्दर्शन होता है नपुंसक को भी। 

00:52:10.520 --> 00:52:19.696
उसमें नारकी में, नारकी में जाता है न यहाँ से,
नपुंसक होता है, आहाहा! अनुभव हो जाता है।

00:52:19.720 --> 00:52:30.056
उस डिब्बी में चैतन्य हीरा है वह प्रगट हो गया।
अब डिब्बी देखे (तो)... शरीर तो ऐसा दुर्गंध मारता है कि

00:52:30.080 --> 00:52:35.736
एक कणी, ऐसा कहते हैं शास्त्रकार कि एक कणी नरक में से
जो यहाँ पर आ जाये तो सभी मनुष्य मर जायें।

00:52:35.760 --> 00:52:38.776
ऐसी दुर्गंध, टिक न सके।

00:52:38.800 --> 00:52:45.776
अब देख लो न! डिब्बी कैसी है और
अंदर भगवान सम्यग्दर्शन, अनुभव हो गया।

00:52:45.800 --> 00:52:59.676
बाहर से दिखे ऐसा नहीं है।
अंदर से, वाणी के योग से अनुमान हो सकता है।

00:52:59.700 --> 00:53:10.141
उत्कृष्ट मुमुक्षु ज्ञानी को पहचान सकता है। उत्कृष्ट
मुमुक्षु, जघन्य नहीं, मध्यम नहीं। उत्कृष्ट।

00:53:10.165 --> 00:53:11.189
