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00:01:02.980 --> 00:01:18.976
यह श्री समयसार कलश नंबर २७१ के ऊपर
अध्यात्म सत्पुरुष पूज्य श्री कानजी स्वामी के 
मार्मिक प्रवचन। प्रवचन रत्नाकर भाग-११।

00:01:19.000 --> 00:01:23.576
ये ग्यारह भाग प्रकाशित हो
गये हैं न? उसमें से ही यह लिया है, अलग।

00:01:23.600 --> 00:01:30.496
उसमें अक्षर छोटे हैं ग्यारहवें भाग में।
और ये बड़े अक्षर पढ़े जा सकते हैं।
इसलिये हमने अलग से कराया है उसमें से।

00:01:30.520 --> 00:01:39.056
रत्नाकर भाग-११, पृष्ठ ५७१-५७७ तक।
यह अभी हिम्मतनगर में छपवाई है बुकलेट।

00:01:39.080 --> 00:02:03.816
<b>समयसार कलश-२७१।
ज्ञानमात्र भाव स्वयं ही ज्ञान है।</b>

00:02:03.840 --> 00:02:07.216
ज्ञानमात्र अर्थात् क्या? कि आत्मा।

00:02:07.240 --> 00:02:14.896
आत्मा का जो स्वभाव है,
आत्मा का जो भाव है वह स्वयं ही ज्ञान है।

00:02:14.920 --> 00:02:25.576
आत्मा स्वयं ही ज्ञान है।
<b>ज्ञानमात्र भाव</b> अर्थात् आत्मा <b>स्वयं ही ज्ञान है।</b>
आत्मा का दूसरा नाम ज्ञान है।

00:02:25.600 --> 00:02:30.496
आत्मा का एक नाम आत्मा तो है।
लेकिन आत्मा का दूसरा नाम ज्ञान है।

00:02:30.520 --> 00:02:36.856
आत्मा स्वयं ही ज्ञान है, ऐसा आया है न?
स्वयं ही ज्ञान है, एक।

00:02:36.880 --> 00:02:43.576
अब दूसरा, (आत्मा) <b>स्वयं ही अपना ज्ञेय है</b>।
ये (पर-पदार्थ) ज्ञेय नहीं हैं।

00:02:43.600 --> 00:02:46.176
मुमुक्षु:- ना। ज्ञान की पर्याय में
स्वयं ही ज्ञात होता है।

00:02:46.200 --> 00:02:50.816
उत्तर:- स्वयं ही ज्ञात होता है।
इसलिये स्वयं, आत्मा ही - उसका दूसरा नाम ज्ञेय है।

00:02:50.840 --> 00:02:55.976
एक नाम ज्ञान है। दूसरा नाम (ज्ञेय) है।
अब वह व्याख्या आयेगी।

00:02:56.000 --> 00:02:57.976
किसलिए ज्ञान है?
किसलिए ज्ञेय है?

00:02:58.000 --> 00:03:02.296
लेकिन आत्मा का एक नाम ज्ञान है,
दूसरा नाम स्वयं ही ज्ञेय है।

00:03:02.320 --> 00:03:08.936
अब तीसरा, और
<b>स्वयं अपना ही ज्ञाता है।</b>
इन (पर-पदार्थों का) ज्ञाता नहीं है।

00:03:08.960 --> 00:03:12.896
<b>स्वयं ही अपना ज्ञाता</b> अर्थात् जाननहार ।

00:03:12.920 --> 00:03:20.936
स्वयं अपना ही जाननेवाला है।
ऐसे अर्थ का काव्य अब कहते हैं।

00:03:20.960 --> 00:03:27.296
यह संस्कृत है। अमृतचंद्राचार्य के
समयसार में से। बोलो बहन संस्कृत:

00:03:27.320 --> 00:03:48.616
<b>योऽयं भावो ज्ञानमात्रोऽहमस्मि</b>
<b>ज्ञेयो ज्ञेयज्ञानमात्र: स नैव ।</b>

00:03:48.640 --> 00:04:08.816
<b>ज्ञेयो ज्ञेयज्ञानकल्लोलवल्गन्</b>
<b>ज्ञानज्ञेयज्ञातृमद्वस्तुमात्रः ।।२७१।।</b>

00:04:08.840 --> 00:04:14.696
उसका <b>श्लोकार्थ:-</b> जो समयसार में है न,
वह कॉपी-टु-कॉपी इसमें लिया है।

00:04:14.720 --> 00:04:20.736
<b>श्लोकार्थ:- जो यह ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ।</b>

00:04:20.760 --> 00:04:30.256
<b>जो यह ज्ञानमात्र भाव</b> अर्थात् आत्मा,
ज्ञानमय आत्मा ऐसा जो मैं, वह <b>मैं हूँ</b>।

00:04:30.280 --> 00:04:39.296
<b>वह</b>, वह अर्थात् यह आत्मा,
<b>ज्ञेयों के ज्ञानमात्र ही नहीं जानना ।</b>

00:04:39.320 --> 00:04:47.856
इसे (पर-पदार्थ को) जाननेवाला है ऐसा मैं नहीं हूँ।
मूल बात है मूल।

00:04:47.880 --> 00:04:51.216
मुमुक्षु:- अर्थात् जब ज्ञेय ज्ञात होता है
तब मैं नहीं हूँ।

00:04:51.240 --> 00:04:55.496
उत्तर:- उसका (पर का) जाननेवाला मैं नहीं।
उसका (पर का) जाननेवाला मैं नहीं।

00:04:55.520 --> 00:05:03.816
मैं कैसा हूँ? कि ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ।
लेकिन कैसा हूँ? कि (पर) ज्ञेयों को जाने ऐसा मैं नहीं हूँ।

00:05:03.840 --> 00:05:09.576
इन (पर) ज्ञेयों को जाने ऐसा मैं नहीं हूं।
इस ज्ञेय को (आत्मा को) जाने ऐसा तो हूँ।

00:05:09.600 --> 00:05:14.896
मुमुक्षु:- ऐसा ही हूँ।
मुमुक्षु:-स्वज्ञेय को जानूं ऐसा मैं हूँ।
उत्तर:- ऐसा मैं हूँ।

00:05:14.920 --> 00:05:18.040
पर ज्ञेय को जानूं ऐसा मेरा स्वभाव नहीं है।
मुमुक्षु:- मेरा स्वभाव नहीं है।
उत्तर:- मेरा स्वभाव नहीं है।

00:05:18.040 --> 00:05:23.496
मुमुक्षु:- पर का निषेध कर दिया ।
उत्तर:- अंदर में जिसे जाना हो न?

00:05:23.520 --> 00:05:26.456
जिसे आत्मदर्शन करना हो उसकी बात है।

00:05:26.480 --> 00:05:32.776
वरना तो व्यवहार की बातें तो
शास्त्र में लाखों करोड़ों आती हैं, समझ गये?

00:05:32.800 --> 00:05:36.016
मुमुक्षु:- दृष्टि कैसे करनी?
उत्तर:- दृष्टि कैसे करनी आत्मा की?

00:05:36.040 --> 00:05:42.056
आत्मा का अनुभव कैसे करना?
अनंतकाल से उसने यह काम नहीं किया।

00:05:42.080 --> 00:05:48.096
सब कुछ किया उसने लेकिन आत्मा को नहीं जाना।
जाननहार को नहीं जाना। समझ गये?

00:05:48.120 --> 00:05:53.576
वह कैसे जानने में आये?
उसकी इसमें विधि है पूरी।
अनुभव की विधि बतायी है।

00:05:53.600 --> 00:05:59.216
<b>ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ</b>
<b>वह</b> अर्थात् यह मेरा आत्मा।

00:05:59.240 --> 00:06:05.016
<b>वह ज्ञेयों के ज्ञानमात्र</b>, अर्थात् ज्ञेयों को
जाने इतना मात्र आत्मा का स्वभाव नहीं है।

00:06:05.040 --> 00:06:13.936
<b>(परंतु)</b> अब कहते हैं।
<b>(परंतु) ज्ञेयों के आकार रूप होनेवाले
ज्ञान की कल्लोलों के रूप में परिणमता हुआ वह</b>,

00:06:13.960 --> 00:06:19.936
अर्थात् जो अपने ज्ञान में ज्ञेय जानने में आते हैं
तब ज्ञेय को जाननेवाला ऐसा नहीं।

00:06:19.960 --> 00:06:25.816
लेकिन ज्ञेय जिसमें जानने में आते हैं ऐसा जो ज्ञान,
वह ज्ञान कि जिसमें आत्मा जानने में आता है।

00:06:25.840 --> 00:06:28.616
फिर उसमें आत्मा ज्ञात होता है ऐसा,
वे (पर-पदार्थ) नहीं।

00:06:28.640 --> 00:06:31.936
मुमुक्षु :- ज्ञान तो आत्मा का है।
उत्तर :- आत्मा का है न? ज्ञेय का कहाँ है?

00:06:31.960 --> 00:06:38.056
<b>ज्ञेयों के आकार से होनेवाले ज्ञान की कल्लोलों के रूप</b>
अर्थात् पर्यायोंरूप <b>परिणमित होता हुआ वह</b>,
कल्लोलें अर्थात् पर्याय।

00:06:38.080 --> 00:06:43.776
पर्याय, ज्ञान की पर्याय, परिणमन, उसका नाम
कल्लोल कहलाता है। जैसे समुद्र में तरंगें उठती हैं।

00:06:43.800 --> 00:06:46.576
मुमुक्षु:- तरंगें उठती हैं।
उत्तर:- तरंगें उठती हैं, वे कल्लोल कहलाती हैं।

00:06:46.600 --> 00:06:51.616
उसीप्रकार यह ज्ञान आत्मा को जानता है, समझ गये।
उन पर्यायों को कल्लोलें कहा जाता है।

00:06:51.640 --> 00:07:01.456
वह, <b>वह ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञातामय</b>, आहाहा!
तीनों को अभेद कर दिया।

00:07:01.480 --> 00:07:05.656
ज्ञान भी मैं, ज्ञेय भी मैं, और ज्ञाता भी मैं।
उन-मय।

00:07:05.680 --> 00:07:12.936
तीन धर्म हैं आत्मा में, उन-मय।
<b>वस्तुमात्र जानना</b>, आहाहा!

00:07:12.960 --> 00:07:17.256
ज्ञान भी मैं, ज्ञेय भी मैं,
और यह ज्ञाता भी मैं।

00:07:17.280 --> 00:07:20.416
इन तीनों की व्याख्या आयेगी। अभी संक्षिप्त में है।

00:07:20.440 --> 00:07:23.136
बाद में उसके ऊपर के गुरुदेव के प्रवचन बहुत सुंदर आयेंगे।

00:07:23.160 --> 00:07:31.296
<b>वस्तुमात्र जानना चाहिये (अर्थात् स्वयं ही ज्ञान</b>,
देखो! वह आया था न? ज्ञानमात्र?

00:07:31.320 --> 00:07:32.600
मुमुक्षु:- ज्ञानमात्र है।
उत्तर:- वह आया था न? वह।

00:07:32.600 --> 00:07:44.136
<b>(स्वयं ही ज्ञान, स्वयं ही ज्ञेय और
स्वयं ही ज्ञाता - इसप्रकार ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञातारूप</b> -मय
तीनों का एकरूप एकमय।

00:07:44.160 --> 00:07:53.720
मुमुक्षु:- अभेद!
उत्तर:- एकमय। यह तो भेद से समझाते हैं वरना
भेद उसमें है नहीं, अभेद। अभेद बताया इसप्रकार। <b>ज्ञातारूप</b>।

00:07:53.920 --> 00:08:02.336
<b>ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञातारूप तीनों भावो
युक्त वस्तुमात्र जानना )।</b>

00:08:02.360 --> 00:08:07.976
ऐसी वस्तु मेरी है।
मैं ही ज्ञान, मैं ही ज्ञेय और मैं ही ज्ञाता।
मुझे कहीं बाहर देखना रहा नहीं।

00:08:08.000 --> 00:08:10.776
मुमुक्षु:- सभी परद्रव्यों का निषेध हो गया।
उत्तर:- निषेध हो गया।

00:08:10.800 --> 00:08:15.056
मुमुक्षु:- अपने में आ गया।
उत्तर:- पर को जानने का निषेध हो गया।
अपने में आ गया, आहाहा!

00:08:15.080 --> 00:08:25.096
अभी हम तो यह संक्षेप में लेते हैं।
फिर गुरुदेव के प्रवचन इसके ऊपर
विस्तार से आयेंगे। संक्षेप में लेख है।

00:08:25.120 --> 00:08:30.456
<b>भावार्थ:- ज्ञानमात्र भाव</b>,
अब ज्ञान की व्याख्या करते हैं।

00:08:30.480 --> 00:08:35.776
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, तीन शब्द थे न?
तो ज्ञान की व्याख्या, पहले शब्द की करते हैं।

00:08:35.800 --> 00:08:41.736
कि <b>ज्ञानमात्र भाव ज्ञातृक्रियारूप
होने से ज्ञानस्वरूप है।</b>

00:08:41.760 --> 00:08:48.816
आत्मा में जानने की क्रिया होती है।
जानने की क्रिया होती है
इसलिये आत्मा का नाम ज्ञान है।

00:08:48.840 --> 00:08:55.136
जिसमें जानने की क्रिया होती है, उसका नाम ज्ञान है।
इसलिये मैं ज्ञानस्वरूप हूँ।

00:08:55.160 --> 00:09:02.096
<b>ज्ञानमात्र भाव ज्ञातृक्रियारूप होने से</b>, आहाहा!

00:09:02.120 --> 00:09:08.056
करने की क्रिया नहीं होती ।
जानने की क्रिया होती है।
राग को करे और पर को करे ऐसी क्रिया नहीं।

00:09:08.080 --> 00:09:12.016
मुमुक्षु:- उसका स्वभाव ही है जानना-जानना।
उत्तर:- हाँ! जानना-जानना-जानना, वह
उसका स्वभाव है।

00:09:12.040 --> 00:09:24.456
<b>ज्ञातृक्रियारूप होने से</b>,ऐसा!
(नया) हो जाने से नहीं, (पहले से) होने से। तीनोंकाल, होने से।
(नया) हो जाता है, हो जाना और होगा ऐसा नहीं, होने से।

00:09:24.480 --> 00:09:26.936
मुमुक्षु:- सदा है।
उत्तर:- बस!

00:09:26.960 --> 00:09:30.280
मुमुक्षु:- करने से या होने से।
उत्तर:- होने से। करने से या कोई करे तो हो, ऐसा नहीं। स्वयं करे तो हो, ऐसा नहीं।

00:09:30.300 --> 00:09:33.400
स्वभाव ही है। स्वभाव ही है, बस!

00:09:33.480 --> 00:09:37.640
मुमुक्षु:- होनेरूप जाहिर कर दिया।
उत्तर:- होनेरूप जाहिर कर दिया। बस! है अनादि अनंत।

00:09:37.700 --> 00:09:39.840
मुमुक्षु:- जैसा है ऐसा जाहिर कर दिया।
उत्तर:- जैसा है ऐसा जाहिर किया!

00:09:39.840 --> 00:09:43.136
कि आत्मा कैसा है?
कि जानने के स्वभाव से भरा हुआ है।

00:09:43.160 --> 00:09:48.416
वह कहीं राग को करे और कर्म को बांधे,
ऐसा आत्मा का स्वभाव नहीं है

00:09:48.440 --> 00:09:52.536
और पर को जाने ऐसा भी (आत्मा का)
स्वभाव नहीं है।
मुमुक्षु:- अस्ति स्थापित की है कि ऐसा ही हूँ।

00:09:52.560 --> 00:09:55.896
उत्तर:- बस! यहाँ से इसमें मूल में
ऐसा कहना है, समझ गये?

00:09:55.920 --> 00:10:02.736
<b>ज्ञातृक्रियारूप होने से ज्ञानस्वरूप है</b>,
आहाहा! मैं तो ज्ञानस्वरूप हूँ।

00:10:02.760 --> 00:10:07.936
क्यों ज्ञानस्वरूप हूँ?
क्योंकि मेरे में जानने की क्रिया होती है।
इसलिये मैं ज्ञानस्वरूप हूँ।

00:10:07.960 --> 00:10:12.896
और जिनमें जानने की क्रिया नहीं होती
वे तो जड़ पदार्थ हैं, वो मैं नहीं हूँ।

00:10:12.920 --> 00:10:18.976
यह देह मेरा नहीं है, क्योंकि इसमें जानने की क्रिया
नहीं होती। इसलिये यह चीज मेरी नहीं है, इसप्रकार!

00:10:19.000 --> 00:10:22.376
और राग भी मेरी चीज नहीं है।
क्योंकि उसमें जानने की क्रिया नहीं होती।

00:10:22.400 --> 00:10:28.576
जिसमें जानने की क्रिया होती है, उसका नाम ज्ञान
और वह आत्मा का स्वरूप है, ऐसा!

00:10:28.600 --> 00:10:34.296
<b>ज्ञानमात्रभाव ज्ञातृक्रियारूप
होने से ज्ञानस्वरूप है</b>।

00:10:34.320 --> 00:10:41.536
<b>फिर</b>, अब ज्ञेय का बोल लेते हैं।
पहले ज्ञान का बोल लिया। अब ज्ञेय।

00:10:41.560 --> 00:10:49.256
<b>और, वह स्वयं ही निम्नप्रकार से ज्ञेयरूप है।</b>
आत्मा स्वयं ही ज्ञेयरूप है, वह आयेगा।

00:10:49.280 --> 00:10:56.416
<b>बाह्य ज्ञेय ज्ञान से भिन्न हैं।</b>
ये (पर) ज्ञेय जो हैं वे आत्मा से अलग हैं।

00:10:56.440 --> 00:11:01.336
और आत्मा स्वयं ही ज्ञेय है।
इसलिये तुझे बाहर जाना या देखना कहाँ रहा?

00:11:01.360 --> 00:11:04.376
तू ही जाननहार है और तू ही ज्ञात हो रहा है, इसप्रकार!

00:11:04.400 --> 00:11:08.616
<b>बाह्य ज्ञेय ज्ञान से भिन्न हैं,
ज्ञान में प्रविष्ट नहीं होते।</b>

00:11:08.640 --> 00:11:14.176
राग-द्वेष, शरीर, मकान, दुकान
कहीं इस ज्ञान में नहीं आते हैं।

00:11:14.200 --> 00:11:17.616
वे तो भिन्न हैं- भिन्न हैं।
<b>ज्ञान में प्रविष्ट नहीं होते।</b>

00:11:17.640 --> 00:11:20.936
<b>ज्ञेयों के आकार की झलक</b> अर्थात् प्रतिभास।

00:11:20.960 --> 00:11:27.856
जैसा ज्ञेय होता है, जैसे दर्पण में अग्नि सामने
हो तो अग्नि का प्रतिभास होता है स्वच्छता में,

00:11:27.880 --> 00:11:32.576
पेड़ हो तो पेड़ का प्रतिभास होता है,
मोर हो तो मोर का प्रतिभास होता है।

00:11:32.600 --> 00:11:38.616
उसीप्रकार यह ज्ञान है दर्पण के स्थान पर,
तो उसमें ज्ञेय झलकते हैं, प्रतिभासित होते हैं।

00:11:38.640 --> 00:11:42.576
उसमें प्रतिभासित होते हैं, उसमें आते नहीं हैं।
उसकी स्वच्छता में भासित होते हैं।

00:11:42.600 --> 00:11:49.576
<b>ज्ञेयों के आकार की झलक ज्ञान में
पड़ने पर ज्ञान ज्ञेयाकाररूप दिखाई देता है।</b>।
क्या कहते हैं? यह मुद्दे की बात है।

00:11:49.600 --> 00:11:57.696
कि ज्ञेय ज्ञान में जानने में आने पर, जीव को ऐसा भासित होता है
कि ज्ञान ज्ञेयाकाररूप हो गया।

00:11:57.720 --> 00:12:03.296
राग-द्वेष ज्ञात होता है, सुख-दुःख ज्ञात होता है, शरीर ज्ञात होता है,

00:12:03.320 --> 00:12:11.456
तो ज्ञान में जब ज्ञात होते हैं तब
ज्ञान ज्ञेयाकार हुआ ऐसा दिखता है, हुआ नहीं है।

00:12:11.480 --> 00:12:16.496
मुमुक्षु:- ऐसा लगता है कि एकमेक हो गया है।
उत्तर:- एकमेक हो गया, लेकिन एकमेक होता नहीं है।

00:12:16.520 --> 00:12:22.776
क्योंकि ज्ञेय भिन्न हैं और ज्ञान भिन्न है।
वे भले झलकते हों लेकिन उस-रूप होता नहीं है।

00:12:22.800 --> 00:12:28.856
जैसे कि स्फटिकमणि में लाल फूल प्रतिभासित होता है
लेकिन स्फटिकमणि लाल नहीं होता।

00:12:28.880 --> 00:12:37.016
ऐसा कहते हैं कि ज्ञान में,
ज्ञेयों के आकार के अनुरूप ही परिणमता हुआ वह
<b>ज्ञान ज्ञेयाकाररूप दिखाई देता है।</b>।

00:12:37.040 --> 00:12:41.296
वह दिखता है न जो?
वह ऊपरी दृष्टि तेरी मिथ्या है।

00:12:41.320 --> 00:12:45.136
वह तो ज्ञानाकार है, वह ज्ञेयाकार नहीं होता।

00:12:45.160 --> 00:12:51.536
वह ज्ञेय को जाननेरूप परिणमता ही नहीं है।
वे ज्ञात होते हैं वह बात सच है लेकिन
उनको जाननेरूप परिणमता नहीं है।

00:12:51.560 --> 00:12:56.056
मुमुक्षु:- ज्ञेय को जाननेरूप परिणमता नहीं है
लेकिन अपना ज्ञान ही ज्ञात होता है।
उत्तर:- अपना ज्ञान ही ज्ञात होता है।

00:12:56.080 --> 00:13:02.456
अपना आत्मा ज्ञात होता है।
भले ही (ज्ञेय) उसमें प्रतिभासें, वे ज्ञात हों,
लेकिन उनको जानता नहीं।

00:13:02.480 --> 00:13:09.656
वे ज्ञात हों, भले प्रतिभासें,
लेकिन मैं उन्हें जानता नहीं।
मैं तो मुझे जानता हूँ।

00:13:09.680 --> 00:13:14.136
मुमुक्षु:- मुझे तो मेरे ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है।
उत्तर:- पर्याय ज्ञात होती है अथवा आगे
बढ़कर कहो तो ज्ञायक ज्ञात होता है।

00:13:14.160 --> 00:13:19.336
आत्मा ज्ञात होता है।
भेद से ज्ञान की पर्याय और
अभेद से ज्ञायक ज्ञात होता है।

00:13:19.360 --> 00:13:26.336
भेद से ज्ञानी समझाते हैं कि तुझे ज्ञेय नहीं ज्ञात होते,
तेरी ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है। ऐसा कहते हैं, समझ गये?

00:13:26.360 --> 00:13:31.376
लेकिन ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है ऐसा
जहाँ आता है... वह ज्ञान की पर्याय कब कहलाती है?

00:13:31.400 --> 00:13:35.736
ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है वह कब कहलाती है?
कि ज्ञान में आत्मा जानने में आये तो।

00:13:35.760 --> 00:13:39.856
मुमुक्षु:- तो यथार्थ है।
उत्तर:- मुद्दे की बात है, समझ में आया? समझ में आया?

00:13:39.880 --> 00:13:44.616
ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है ऐसा कोई कहे।
ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है न?

00:13:44.640 --> 00:13:47.656
तो उस ज्ञान में आत्मा ज्ञात होता हो
तो उसका नाम ज्ञान

00:13:47.680 --> 00:13:50.616
और आत्मा न ज्ञात होता हो
तो उसका नाम अज्ञान है।

00:13:50.640 --> 00:13:56.496
मुमुक्षु:- तो अज्ञान हो गया वापस।
उत्तर:- भले ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है,
चलो भाई! कोई बात नहीं ।

00:13:56.520 --> 00:14:01.296
तो ज्ञान किसका नाम कहा जाता है?
कि जिसमें आत्मा ज्ञात हो तो उसका नाम ज्ञान

00:14:01.320 --> 00:14:04.416
और उस ज्ञान में आत्मा ज्ञात न हो
तो-तो अज्ञान हो गया।

00:14:04.440 --> 00:14:11.936
ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है ऐसा आयेगा न?
तो वह ज्ञायक में आ जायेगा
क्योंकि ज्ञान तो आत्मा का है।

00:14:11.960 --> 00:14:14.440
मुमुक्षु:- उस पर में से निषेध
होकर अपने में आ जायेगा।
उत्तर:- अपने में आ जायेगा।

00:14:14.440 --> 00:14:18.856
मुमुक्षु:- मैं और मेरा ज्ञान।
उत्तर:- मैं और मेरा ज्ञान बस!
उसमें आ जायेगा। नजदीक आ गया बहुत।

00:14:18.880 --> 00:14:25.736
<b>ज्ञेयाकाररूप दिखाई देता है परंतु
वे ज्ञान की ही कल्लोलें (तरंगें) हैं।</b>

00:14:25.760 --> 00:14:28.696
वह तो ज्ञान ही ज्ञात होता है, ज्ञेय नहीं ज्ञात होता।

00:14:28.720 --> 00:14:33.536
भले ही (ज्ञेय) उसमें प्रतिभासें,
लेकिन मेरा लक्ष उनके ऊपर नहीं है।
मेरा लक्ष तो आत्मा के ऊपर है।

00:14:33.560 --> 00:14:41.056
जिसके ऊपर लक्ष है वह ज्ञात होता है,
ज्ञेय के ऊपर लक्ष नहीं है मेरा
इसलिये मुझे वो ज्ञात नहीं होता, ऐसे!

00:14:41.080 --> 00:14:44.696
<b>वे ज्ञानतरंगें ही ज्ञान के द्वारा ज्ञात होती हैं।</b>

00:14:44.720 --> 00:14:49.896
ज्ञान की पर्यायें ही ज्ञान के द्वारा ज्ञात होती हैं।
लेकिन ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है न?

00:14:49.920 --> 00:14:58.016
तो ज्ञान की पर्याय कब कहलाती है?
नाम उसका कब पड़ता है? कि
ज्ञान आत्मा को जानता हो तो वह ज्ञान की पर्याय।

00:14:58.040 --> 00:15:04.656
शरीर को जानता हो और पर को जानता हो तो
वह ज्ञान की पर्याय नहीं, वह तो अज्ञान हो गया।

00:15:04.680 --> 00:15:12.216
कि तुम्हें तुम्हारे ज्ञान की पर्याय में क्या ज्ञात होता है?
कि पुत्री ज्ञात होती है, लंदन ज्ञात होता है, तो अज्ञान है।

00:15:12.240 --> 00:15:15.536
मुमुक्षु:- परज्ञेय से ज्ञान है, वह सब अज्ञान।
उत्तर:- अज्ञान है। आहाहा!

00:15:15.560 --> 00:15:21.416
तुम्हारे ज्ञान की पर्याय में, ज्ञान किसका नाम?
कि जो आत्मा को जाने उसका नाम ज्ञान कहा जाता है।

00:15:21.440 --> 00:15:28.576
आत्मा को जानना छोड़ दे वह तो अज्ञान हो गया।
वह तो है अनंतकाल से, तो दुःखी होता है।

00:15:28.600 --> 00:15:31.456
उसे पलटाकर अब अंदर में जाना है।

00:15:31.480 --> 00:15:39.296
<b>इसप्रकार स्वयं ही स्वत: जानने-योग्य
होने से वे ज्ञानमात्र भाव ही ज्ञेयरूप हैं।</b>

00:15:39.320 --> 00:15:43.856
यह ज्ञेय की व्याख्या। स्वयं स्वयं से ज्ञात होने योग्य।

00:15:43.880 --> 00:15:49.376
जाननहार भी स्वयं और जानने में आता भी स्वयं,
इसलिये स्वयं ज्ञेय है।

00:15:49.400 --> 00:15:56.696
जाननहार इसलिये ज्ञाता-ज्ञान और जानने में आता है स्वयं आत्मा,
पूरा आत्मा, तो स्वयं ज्ञेय हो गया, इसप्रकार!

00:15:56.720 --> 00:16:07.496
<b>और</b>, अब ज्ञाता की व्याख्या करते हैं।
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता। तीन शब्द थे न?
दो की व्याख्या हुई। अब तीसरे की व्याख्या

00:16:07.520 --> 00:16:16.696
<b>और स्वयं ही अपना जानने-वाला होने से</b>,
स्वयं ही अपना जाननेवाला हो जाने से नहीं।

00:16:16.720 --> 00:16:19.896
मुमुक्षु:- होने से।
उत्तर:- ऐसा स्वभाव ही है।

00:16:19.920 --> 00:16:28.376
प्रत्येक आत्मा, स्वयं स्वयं को ही जानता है।
मानता नहीं है। वरना जानता है तो स्वयं को।
पर को जानता ही नहीं है।

00:16:28.400 --> 00:16:32.456
मुमुक्षु:- आबाल गोपाल सबको।
उत्तर:- आबाल गोपाल सभी को बस!

00:16:32.480 --> 00:16:43.496
स्वयं का आत्मा ही ज्ञात होता है।
मानता नहीं है वह तो दुःखी होता है।

00:16:43.520 --> 00:16:47.696
मुमुक्षु:- इसलिये ही यह सब दुःख है न।
उत्तर:- इसलिये दुःख है,
वरना जाने तो सम्यग्दर्शन हो जाये।

00:16:47.720 --> 00:16:50.896
उसका नाम ही आत्मदर्शन।
मुमुक्षु:- उसका नाम ही आत्मदर्शन।
उत्तर:- बस!

00:16:50.920 --> 00:17:00.456
यह, यह जो है न? यह २७१ कलश, अपूर्व है,
अपूर्व है। इतने में समझ जाओ।

00:17:00.480 --> 00:17:07.976
इसमें अनुभव की विधि बतायी है। गुरुदेव
कहेंगे, इस अनुभव की इसमें विधि है। आहाहा!

00:17:08.000 --> 00:17:14.836
<b>स्वयं ही स्वत: जानने-वाला होने से</b>, हों!
<b>ज्ञानमात्र भाव ही</b> स्वयं <b>ज्ञाता है।</b>

00:17:14.860 --> 00:17:18.016
आत्मा ज्ञाता है, आत्मा ज्ञाता दृष्टा है।

00:17:18.040 --> 00:17:24.216
लेकिन ज्ञाता की व्याख्या क्या? कि स्वयं
स्वयं को जानता है इसलिये उसका नाम ज्ञाता है।

00:17:24.240 --> 00:17:28.816
इसे (पर को) जानता है इसलिये आत्मा का
नाम ज्ञाता है ऐसा नहीं।

00:17:28.840 --> 00:17:37.456
ज्ञाता की व्याख्या की, स्वयं स्वयं को जानता है
इसलिये स्वयं ज्ञाता है। आहाहा!

00:17:37.480 --> 00:17:50.176
<b>इसप्रकार ज्ञानमात्र भाव ही ज्ञान,
ज्ञेय और ज्ञाता-इन तीन भावों से युक्त</b>,
युक्त अर्थात् सहित, <b>सामान्य विशेष स्वरूप</b>।

00:17:50.200 --> 00:17:55.376
सामान्य तो द्रव्य और विशेष उसकी पर्याय,
ज्ञान की पर्याय - ऐसा पूरा आत्मा।

00:17:55.400 --> 00:17:58.416
ज्ञान <b>सामान्य विशेष स्वरूप वस्तु है</b>।

00:17:58.440 --> 00:18:02.176
सामान्य में भी ज्ञान और विशेष में भी ज्ञान।

00:18:02.200 --> 00:18:06.216
सामान्य में ज्ञान और विशेष में राग,
ऐसा स्वरूप नहीं है आत्मा का।

00:18:06.240 --> 00:18:10.656
वह आत्मा का स्वरूप नहीं है,
वह कल थोड़ी बात हमने की थी न? वह।

00:18:10.680 --> 00:18:17.136
<b>सामान्य विशेष स्वरूप वस्तु है।
'ऐसा ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ'</b>।

00:18:17.160 --> 00:18:27.176
जो ऊपर का ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता-
उन तीनों भावों युक्त मैं हूँ
<b>ऐसा अनुभव करनेवाला पुरुष अनुभव करता है।</b>

00:18:27.200 --> 00:18:33.376
जिसे आत्मा का अनुभव होता है
वह इसप्रकार आत्मा का अनुभव करता है।

00:18:33.400 --> 00:18:41.376
अनुभवी पुरुष ऐसा कहते हैं कि
हम आत्मा का ऐसा अनुभव करते हैं
और तुम भी ऐसा अनुभव करो।

00:18:41.400 --> 00:18:46.976
ऐसा कहते हैं कि, हम तो अनुभव कर रहे हैं
कि मैं ही ज्ञान, मैं ही ज्ञेय और मैं ही ज्ञाता हूँ।

00:18:47.000 --> 00:18:53.056
हम तो ऐसे आत्मा का अनुभव कर रहे हैं ।
तुम ऐसी आत्मा का अनुभव करो, ऐसा कहते हैं।

00:18:53.080 --> 00:18:57.816
हम पर के कर्ता नहीं और
पर के ज्ञाता भी नहीं हैं। आहाहा!

00:18:57.840 --> 00:19:04.936
ज्ञाता की व्याख्या क्या कही?
स्वयं स्वयं को जानता है इसलिए उसे
ज्ञाता कहने में आता है।

00:19:04.960 --> 00:19:11.416
पर को जानता है इसलिये ज्ञाता है- ऐसा है?
वह तो अज्ञान है।

00:19:11.440 --> 00:19:21.736
इतना भावार्थ पूरा हुआ।
समयसार का जो श्लोकार्थ और
भावार्थ है, वह पूरा हुआ।

00:19:21.760 --> 00:19:24.896
अब उसके ऊपर का प्रवचन,
गुरुदेव का अब आता है।

00:19:24.920 --> 00:19:32.976
<b>कलश २७१ श्लोकार्थ के ऊपर प्रवचन।</b>
अर्थात् पहला जो श्लोक है न, उसके ऊपर का प्रवचन।

00:19:33.000 --> 00:19:36.456
फिर भावार्थ के ऊपर का प्रवचन अलग है,
इसीमें आएगा।

00:19:36.480 --> 00:19:40.536
पहला जो श्लोक है न?
उसके ऊपर का है प्रवचन।

00:19:40.560 --> 00:19:49.536
<b>जो यह ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ
वह ज्ञेयों के ज्ञानमात्र ही नहीं जानना ।</b>

00:19:49.560 --> 00:19:55.576
ज्ञेयों को जानता है ऐसा आत्मा,
मेरा स्वभाव नहीं है, आहाहा!

00:19:55.600 --> 00:20:00.496
<b>देखो, क्या कहते हैं? जो यह ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ,</b>

00:20:00.520 --> 00:20:04.776
ये गुरुदेव के अक्षरशः
प्रवचन टेप पर से उतारे हुये हैं।

00:20:04.800 --> 00:20:13.656
<b>जो यह ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ
वह छह द्रव्यों का जाननेवाला ज्ञानमात्र नहीं समझना।</b>

00:20:13.680 --> 00:20:18.896
कि छह द्रव्यों को जाननेवाला है ऐसा
आत्मा हूँ ऐसा नहीं है, इसप्रकार!

00:20:18.920 --> 00:20:24.976
तो छह द्रव्य हैं न, कौन ना करता है? हैं।
परंतु उनका मैं जाननेवाला हूँ या इसका जाननेवाला हूँ?

00:20:25.000 --> 00:20:31.496
मुमुक्षु:- हों तो भले हों।
उत्तर:- भले हों! उसकी ना कहाँ है?
छह द्रव्य भगवान ने कहे हैं। हैं।

00:20:31.520 --> 00:20:36.136
लेकिन मेरे ज्ञान के वे विषय हैं
या मेरे ज्ञान का आत्मा विषय है?

00:20:36.160 --> 00:20:40.976
उसके ऊपर आधार है।
विषय के फर्क से फर्क है।

00:20:41.000 --> 00:20:45.096
यदि ज्ञान में परपदार्थ विषय
तुम लो, तो संसार है।

00:20:45.120 --> 00:20:50.176
और उस ज्ञान में आत्मा को विषय
बनाओ तो मोक्षमार्ग है, बस!

00:20:50.200 --> 00:20:55.456
मुमुक्षु:- बहुत संक्षिप्त व्याख्या।
उत्तर:- संक्षिप्त व्याख्या।

00:20:55.480 --> 00:20:56.760
मुमुक्षु:- पर के सामने देखो तो संसार।
उत्तर:- संसार।

00:20:56.760 --> 00:21:02.296
मुमुक्षु:- और इसके सामने देखो तो मोक्ष।
उत्तर:- मोक्ष! बस!
इसकी संक्षेप में व्याख्या इतनी ही है।

00:21:02.320 --> 00:21:07.096
अज्ञानियों ने लंबा-लंबा किया है।
अज्ञानियों ने लंबा-लंबा किया है।

00:21:07.120 --> 00:21:09.760
मुमुक्षु:- वह इतनी भूल से अनादि से भटकता है।
उत्तर:- हाँ! इतनी भूल से हों!

00:21:09.760 --> 00:21:17.616
इतनी ही भूल से अनादि से भटकता है बस!
एकदम सत्य बात है। इतनी ही भूल है, आहाहा!

00:21:17.640 --> 00:21:26.576
करने की बात तो इसमें कहीं आती ही नहीं है।
लेकिन जानने की बात भी नहीं है इसमें, गई, आहाहा!

00:21:26.600 --> 00:21:43.576
<b>देखो, क्या कहते हैं? कि जो यह ज्ञानमात्रभाव मैं हूँ
वह छह द्रव्यों के ज्ञानमात्र ही नहीं समझना।</b>

00:21:43.600 --> 00:21:50.536
<b>क्या कहा? लोक में जितने द्रव्य हैं-अनंतों
सिद्ध और अनंतों निगोद के जीवों सहित जीव,</b>

00:21:50.560 --> 00:21:59.456
<b>आनंतनंत पुद्गल-देह, मन, वाणी, कर्म आदि,
और धर्म, अधर्म, आकाश, काल-इसप्रकार छह द्रव्य</b>

00:21:59.480 --> 00:22:10.096
<b>- उनके द्रव्य</b>, उनके <b>गुण</b>, उनकी <b>पर्याय वे मेरे
ज्ञेय और मैं उनका ज्ञायक, ऐसा कहते हैं, नहीं जानना।</b>

00:22:10.120 --> 00:22:13.176
मुमुक्षु:- सब कुछ निकाल दिया।
उत्तर:- निकाल दिया। एक रखा।

00:22:13.200 --> 00:22:17.616
मुमुक्षु:- तीर्थंकर भगवान को निकाल दिया।
उत्तर:- निकाल दिया। तीर्थंकर,
सिद्धों को निकाल दिया।

00:22:17.640 --> 00:22:28.056
उन्हें जानने के लिए रुकेगा न तो
आत्मा को किस दिन जानेगा?

00:22:28.080 --> 00:22:29.440
मुमक्षु:- आत्मा नहीं दिखेगा।
उत्तर:- नहीं दिखेगा आत्मा।

00:22:29.440 --> 00:22:35.376
उपकारी भगवान, तीर्थंकर साक्षात्
विराजमान हों न, वे तेरे ज्ञेय नहीं हैं।

00:22:35.400 --> 00:22:42.496
तू उनको जानने रुकेगा तो तुझे शुभभाव होगा।
संसार में भटकना मिलेगा।

00:22:42.520 --> 00:22:45.216
मुमुक्षु:- दुःख का कारण बनेगा।
उत्तर:- दुःख का कारण बनेगा।

00:22:45.240 --> 00:22:57.496
<b>ऐसा नहीं जानना। अब उसका कर्तापना तो कहीं गया।</b>

00:22:57.520 --> 00:23:03.696
परपदार्थ का कर्ता, वह तो यहाँ
बात एजेंडा पर है ही नहीं,
वह तो बात निकल गई।

00:23:03.720 --> 00:23:11.496
और वह ही शल्य जिसे छूट गया और
ज्ञाता-ज्ञेय के व्यवहार में अटका है,
उसे अब अंदर में ले जाते हैं।

00:23:11.520 --> 00:23:15.016
जिसकी कर्ताबुद्धि है उसे तो यह (बात) बैठनेवाली नहीं है।

00:23:15.040 --> 00:23:21.856
उसे तो बैठनेवाली नहीं है क्योंकि आत्मा ज्ञाता है
और मानता है कर्ता इसलिये
कर्ताबुद्धिवाले को तो यह नहीं बैठेगी।

00:23:21.880 --> 00:23:28.676
अब, ज्ञाता में आया लेकिन ज्ञाता पर का है,
उसमें था, वह निकालकर अंदर में (स्वयं में) हाँ।

00:23:28.800 --> 00:23:36.096
यह दूसरा पाठ है। दो ही पाठ हैं।
कर्ताबुद्धि और ज्ञाताबुद्धि छुड़ाते हैं। बस!

00:23:36.120 --> 00:23:40.576
पाठ दो ही हैं। तीसरी बात है ही नहीं।
यह दो का ही विस्तार है।

00:23:40.600 --> 00:23:44.416
मुमुक्षु:- पर का (कर्ता) और पर का जाननेवाला भी नहीं।
उत्तर:- नहीं।

00:23:44.440 --> 00:23:49.456
मुमुक्षु:- इतना निर्णय कर ले जीव।
इतना ही निर्णय करना रहा है अब।
उत्तर:- इतना ही निर्णय करना है।

00:23:49.480 --> 00:23:58.896
यदि यह यथार्थ निर्णय होवे तो उसे
ज्ञान आत्मसन्मुख होकर अनुभव हो जाये।
इतनी ही बात है। दो ही बात हैं।

00:23:58.920 --> 00:24:04.536
जगत के पदार्थ स्वयं परिणमते हैं।
स्वयं के परिणाम भी होने योग्य होते हैं।

00:24:04.560 --> 00:24:11.416
अपने परिणाम का भी कर्ता नहीं है,
तो बाहर की बात करने की कहाँ बात रही। हें?

00:24:11.440 --> 00:24:15.656
अपने परिणाम को जानना बंद
करने को कहते हैं, वे ज्ञेय नहीं हैं।

00:24:15.680 --> 00:24:32.416
आत्मा ज्ञेय है ऐसा कहते हैं। राग ज्ञेय नहीं है।
राग होता है न वह जानने लायक नहीं है।
मुमुक्षु:- सब कुछ निकाल ही देते हैं। टुकड़े!

00:24:32.440 --> 00:24:49.896
उत्तर:- <b>उसका कर्तापना तो कहीं गया।
यहाँ तो कहते हैं - उनके (छह द्रव्य के)
जानने मात्र मैं हूँ ऐसा नहीं जानना।</b>

00:24:49.920 --> 00:24:54.496
उनका जाननेवाला हूँ ऐसा शल्य मत रख अब।
निकाल दे तू!

00:24:54.520 --> 00:25:00.136
<b>गजब बात है। भाई!</b> यह गजब बात है,
यह साधारण बात नहीं है।

00:25:00.160 --> 00:25:13.216
ऐसा कहते हैं कि यह ऐसी सूक्ष्म बात है कि जिसका
काल पक गया है, जिसके ज्यादा भव नहीं हैं,
निकट भव्य जीव है, उसे ही यह बात बैठती है।

00:25:13.240 --> 00:25:17.616
वरना बैठनेवाली नहीं है। क्योंकि
कर्ताबुद्धि और ज्ञाताबुद्धि का शल्य है, पड़ा है,

00:25:17.640 --> 00:25:23.136
और तर्क करता है कि केवली लोकालोक को
जानते हैं और मैं पर को जानता हूँ।
जानने में क्या दोष है?

00:25:23.160 --> 00:25:28.896
है दोष, मानता है गुण।
मानता है गुण वह कहाँ से वापस पलटे?

00:25:28.920 --> 00:25:31.656
मुमुक्षु:- नहीं पलटेगा।
जानना-जानना लेकिन पर को जानना वह कहाँ से (आया)?

00:25:31.680 --> 00:25:37.896
उत्तर:- पर को जानते हुये अनंतकाल गया।
सुख आया? आया कहीं?

00:25:37.920 --> 00:25:42.696
मुमुक्षु:- क्योंकि यहाँ कहा न कि
जानना तेरा स्वभाव है बस। वह पकड़ लिया।
उत्तर:- पकड़ लिया। वह पकड़ लिया।

00:25:42.720 --> 00:25:50.656
जानना स्वभाव है, पकड़ लिया। और
व्यवहार के वाक्य बहुत आते हैं शास्त्र में,
कि शास्त्र को यदि आगे करे, समझ गये?

00:25:50.680 --> 00:25:53.696
और निश्चय के वाक्य को पीछे रखे।
तो हो गया।

00:25:53.720 --> 00:26:01.376
टोडरमल साहेब ने ये वाक्य लिखे हैं दो

00:26:01.400 --> 00:26:09.216
कि <b>व्यवहारनय द्वारा जो निरूपण किया हो
उसे असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोड़ना</b>।

00:26:09.240 --> 00:26:14.776
आत्मा पर को जानता है वह व्यवहार का कथन है।
वह श्रद्धान में से निकाल देना।

00:26:14.800 --> 00:26:18.976
श्रद्धान में रखेगा तो उपयोग
तेरा बाहर ही भटका करेगा।

00:26:19.000 --> 00:26:25.856
भटका करेगा। यहाँ-वहाँ। यहाँ-वहाँ।
यहाँ किस दिन जानेगा तू।
ये स्टीकर तुम्हारे पास आ गये हैं? नहीं आये होंगे?

00:26:25.880 --> 00:26:27.600
मुमुक्षु:- आ गये हैं।
उत्तर:- आ गये हैं, टोडरमलजी के?

00:26:27.600 --> 00:26:28.976
मुमुक्षु:- हाँ।
उत्तर:- तो अच्छा है।

00:26:29.000 --> 00:26:36.656
<b>निश्चयनय द्वारा जो निरूपण किया हो
उसको तो सत्यार्थ मानकर
उसका श्रद्धान अंगीकार करना तथा</b>।

00:26:36.680 --> 00:26:46.096
<b>व्यवहारनय द्वारा जो निरूपण किया हो
उसको असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोड़ना।</b>
ये दो सूत्र हैं उसमें।

00:26:46.120 --> 00:26:51.616
मुमुक्षु:- व्यवहारनय का विषय
स्थान-स्थान पर भरा हुआ दिखता है।
उत्तर:- हाँ, और वह सच्चा लगता है।

00:26:51.640 --> 00:26:54.696
घड़ी के सामने देखो न तो यह घड़ी दिखती है न?

00:26:54.720 --> 00:27:01.336
बोलो! अब इसका क्या करना? इसका करना क्या?
अज्ञान का पोषण करते हैं सभी इकट्ठे होकर।

00:27:01.360 --> 00:27:06.776
मुमुक्षु:- इतना तो हमें करना चाहिए न?
उत्तर:- इतना...जानने में क्या दोष है?
जानना तो स्वभाव है।

00:27:06.800 --> 00:27:09.280
मुमुक्षु:- इतना तो हम करें न?
दूसरा कुछ नहीं करते ।
उत्तर:- नहीं करते।

00:27:09.280 --> 00:27:14.416
घड़ी मेरी है ऐसा नहीं, लेकिन
घड़ी में कितने बजे हैं
वह तो मेरी शक्ति है न जानने की?

00:27:14.440 --> 00:27:22.336
मुमुक्षु:- वह भूल हो गई।
उत्तर:- बड़ी भूल। साधारण भूल नहीं है यह, समझ गये?

00:27:22.360 --> 00:27:24.536
पढ़े-लिखों की भूल है विद्वानों की।

00:27:24.560 --> 00:27:30.776
यह जो विरोध किया, वह विद्वानों ने किया है।
सामान्य व्यक्ति को तो इसमें पता ही न चले।

00:27:30.800 --> 00:27:35.416
मुमुक्षु:- उसकी समझ में न आए।
उत्तर:- समझ में न आए कि किसका
यह विरोध चलता है? विरोध की खबर नहीं पड़ती।

00:27:35.440 --> 00:27:48.416
<b>गजब बात है भाई!
परद्रव्य के साथ ज्ञेय-ज्ञायकपने का
संबंध भी निश्चय से नहीं है</b>

00:27:48.440 --> 00:27:53.376
शब्द पढ़ो तो जरा!
गुरुवाणी है न ये तो। हें!

00:27:53.400 --> 00:27:59.456
मैं ज्ञाता और यह ज्ञेय,
निश्चय से तेरा ज्ञाता-ज्ञेय का संबंध
पर के साथ नहीं है, आहाहा!

00:27:59.480 --> 00:28:09.816
<b>व्यवहारमात्र ऐसा संबंध है</b>।
कथनमात्र। व्यवहार अर्थात् कथन, झूठा।

00:28:09.840 --> 00:28:14.136
मुमुक्षु:- व्यवहारमात्र आया तो बस!
व्यवहार से तो हमारा संबंध है न।
उत्तर:- संबंध है न, बस वह पकड़ लिया।

00:28:14.160 --> 00:28:18.096
लेकिन निश्चय से नहीं है ऐसा जो कहा वह भूल गया।

00:28:18.120 --> 00:28:21.080
मुमुक्षु:- वह (बात) चूक गई।
और यह व्यवहार-व्यवहार तो होता है न?
उत्तर:- व्यवहार तो होता है न?

00:28:21.080 --> 00:28:25.136
व्यवहारी वह जीव है और देखो यह दरवाजा है।

00:28:25.160 --> 00:28:32.496
यह दरवाजा है, इसे जानते हैं तो
इसमें से निकला जाता है, इसमें दीवार में से
नहीं निकला जाता, उसमें तो माथा टकरा जाता है।

00:28:32.520 --> 00:28:36.136
इसलिए तू जानता है दरवाजे को।
यह तर्क करता है तर्क, तर्क, समझ गये?

00:28:36.160 --> 00:28:46.096
ये सब तर्क हैं। इंद्रियज्ञान के पक्षपातवाले
जीव तर्क करते हैं। उसमें रह जायेगा,
आहाहा! ऐसा का ऐसा रह जायेगा, आहाहा!

00:28:46.120 --> 00:28:51.536
<b>व्यवहारमात्र ऐसा संबंध है,
समझ में आता है कुछ?
जैन तत्त्वज्ञान बहुत सूक्ष्म है भाई!</b>

00:28:51.560 --> 00:29:01.216
जैन तत्त्वज्ञान सूक्ष्म है, आहाहा!
वह तो पात्र जीव को पल्ले पड़ता है।
दुर्भवी को पता नहीं चलता, आहाहा!

00:29:01.240 --> 00:29:06.736
<b>भाई! यह व्यवहार रत्नत्रय का
राग होता है न धर्मात्मा को?</b>

00:29:06.760 --> 00:29:14.456
<b>यहाँ कहते हैं -भगवान आत्मा ज्ञायक,
और व्यवहार रत्नत्रय का राग
उसका ज्ञेय ऐसा वास्तव में है नहीं।</b>

00:29:14.480 --> 00:29:22.176
व्यवहार रत्नत्रय के जो परिणाम होते हैं न,
देव-गुरु-शास्त्र की भक्ति का राग,
वह ज्ञेय नहीं है तेरा!

00:29:22.200 --> 00:29:31.776
तेरे कर्ता का कर्म तो नहीं है लेकिन
ज्ञान का ज्ञेय भी नहीं है।
तेरे ज्ञान का वो ज्ञेय नहीं है, आहाहा!

00:29:31.800 --> 00:29:35.536
मुमुक्षु:- यह बात बहुत आगे ले जाती है।
उत्तर:- आगे ले जाती है।

00:29:35.560 --> 00:29:38.736
मुमुक्षु:- दृष्टि करानी है न?
उत्तर:- दृष्टि करानी है।

00:29:38.760 --> 00:29:40.936
मुमुक्षु:- अनादि से इसमें तो पड़ा है।
उत्तर:- पड़ा है।

00:29:40.960 --> 00:29:45.296
पर को जानने का पक्ष तुझे है।
है, वह तो अज्ञान है।

00:29:45.320 --> 00:29:49.216
वह तो अनादि का अज्ञान है।
वह कोई नया नहीं है।

00:29:49.240 --> 00:29:52.656
पर को जानने पर तुझे आनंद आया?
मुमुक्षु:- नहीं।

00:29:52.680 --> 00:29:59.056
उत्तर:- आता ही नहीं, तो पीछे मुड़ न?
थोड़ी देर के लिए पीछे मुड़ कि
पर को जानता नहीं, जाननहार जानने में आता है।

00:29:59.080 --> 00:30:06.936
कर न, ट्राय (try) तो कर।
कोशिश तो कर तुझे आनंद आयेगा।
दर्शन होंगे भगवान के।

00:30:06.960 --> 00:30:13.696
<b>राग उसका ज्ञेय ऐसा वास्तव में है नहीं।</b> लो।

00:30:13.720 --> 00:30:17.616
व्यवहार रत्नत्रय के परिणाम
कर्ता का कर्म तो नहीं, बहन!

00:30:17.640 --> 00:30:28.096
लेकिन ज्ञान के ज्ञेय भी नहीं हैं,
आहाहा! तो ज्ञान का ज्ञेय कौन है?
मुमुक्षु:- आत्मा, स्वयं।

00:30:28.120 --> 00:30:32.296
उत्तर:- <b>बारहवीं गाथा में
व्यवहार 'जाना हुआ' प्रयोजनवान कहा</b>,

00:30:32.320 --> 00:30:39.856
समयसार का आधार देते हैं,
<b>वह तो व्यवहार से बात है।</b>
निश्चय से ऐसा नहीं है।

00:30:39.880 --> 00:30:48.520
व्यवहार रत्नत्रय के परिणाम को, निश्चय से आत्मा
उसे जानता ही नहीं है। जाने तो उसमय हो जाये,
उस रागमय हो जाये, आत्मा।

00:30:48.760 --> 00:30:55.056
वास्तव में जाने तो, निश्चय से जाने तो,
उसमय हो जाये। समझ गये?
इसलिए वह झूठ है।

00:30:55.080 --> 00:31:01.936
<b>निश्चय से तो स्वपर को प्रकाशित करनेवाली
अपनी ज्ञान की दशा ही अपना ज्ञेय है।</b>

00:31:01.960 --> 00:31:10.736
देखो! ज्ञान की पर्याय अपना ज्ञेय है।
ज्ञान तो ज्ञान है, लेकिन ज्ञान में ज्ञान ज्ञात होता है,
ज्ञान की पर्याय, वह पर्याय ज्ञेय है।

00:31:10.760 --> 00:31:16.896
वह पर्याय कैसी?
कि स्वपर का अंदर प्रतिभास होता है ऐसी।
स्वपर को जाने ऐसी नहीं।

00:31:16.920 --> 00:31:21.656
स्व और पर दोनों जिसमें प्रतिभासित होते हैं
ऐसी जो ज्ञान की पर्याय,

00:31:21.680 --> 00:31:26.856
वह ज्ञान की पर्याय, ज्ञान की पर्याय भी है
और वह ज्ञान की पर्याय ज्ञान का ज्ञेय भी है।

00:31:26.880 --> 00:31:31.536
ज्ञेय भी वह और ज्ञान भी वह।
एक पर्याय के दो नाम।

00:31:31.560 --> 00:31:39.936
ज्ञान की पर्याय ज्ञान भी है
और ज्ञान की पर्याय ज्ञेय भी है,
अर्थात् यह (पर) ज्ञेय नहीं है, ऐसा।

00:31:39.960 --> 00:31:44.736
मुमुक्षु:- अर्थात् पर्याय में
अपने को ही जानता है इसलिए वह ज्ञेय है।
उत्तर:- वह ज्ञेय है।

00:31:44.760 --> 00:31:48.776
पर्याय ही ज्ञात होती है। पर्याय में जो (पर)
जानने में आता है वह (पर) नहीं जानने में आता।

00:31:48.800 --> 00:31:53.456
पर्याय में जो (पर) जानने में आता है वह (पर) नहीं जानने में आता।
ज्ञान की पर्याय जानने में आती है, वह बात सत्य है।

00:31:53.480 --> 00:32:02.016
मुमुक्षु:- सब कुछ निकाल देते हैं, कहीं का कहीं।
उत्तर:- एक आत्मा रखा।

00:32:02.040 --> 00:32:03.828
मुमुक्षु:- स्वयं और स्वयं की पर्याय।
उत्तर:- बस!

00:32:03.852 --> 00:32:09.296
बस! इतने में ही खेल है।
खेल इतने में ही है। अन्यत्र कहाँ है?

00:32:09.320 --> 00:32:16.496
ज्ञानमय आत्मा और उसकी पर्याय में उपयोग होता है।
उस उपयोग में आत्मा ज्ञात होता है, अनन्य होकर।

00:32:16.520 --> 00:32:21.656
ज्ञात हो रहा है बालगोपाल सभी को, बस!
तो काम हो जाये।

00:32:21.680 --> 00:32:32.508
<b>रागादि परवस्तु-परद्रव्यों को उसके ज्ञेय कहना
वह व्यवहार से है।</b> व्यवहार अर्थात् खोटा, झूठा।

00:32:32.532 --> 00:32:38.336
<b>निश्चय से उसका पर के साथ ज्ञेय ज्ञायक
संबंध भी नहीं है।</b> निकाल दिया।

00:32:38.360 --> 00:32:40.120
मुमुक्षु:- ज्ञेय-ज्ञायक का संबंध भी
निकाल दिया।
उत्तर:- आहाहा!

00:32:40.120 --> 00:32:48.296
उसके साथ यह (पर) ज्ञेय और यह ज्ञान
- ऐसा व्यवहार, ऐसा नहीं है। निश्चय से
तो स्वयं ही ज्ञान और स्वयं ही ज्ञेय है, इसप्रकार।

00:32:48.320 --> 00:32:59.396
<b>अब पर के साथ उसका मेरेपने का
-स्वामित्व का और कर्तापने का संबंध होने की
बात तो कहीं उड़ गई</b>, आहाहा!

00:32:59.420 --> 00:33:07.456
वह तो कहीं गई। राग मेरा स्व और
मैं उसका कर्ता और वह मेरा कर्म,
वह बात तो कहीं गई! आहाहा!

00:33:07.480 --> 00:33:16.936
यह दुकान मेरी और पुत्री मेरी और
लंदन का घर मेरा, वह तो कहीं का कहीं गया।
यह देह तेरी नहीं है। परिणाम तेरे नहीं हैं। आहाहा!

00:33:16.960 --> 00:33:22.696
ममता छोड़ दे। परिणाम रह जाये, देह रह जाये।
सब रह जाए भले लेकिन ममता छूट जाती है।

00:33:22.720 --> 00:33:27.216
मुमुक्षु:- मेरापना छूट जाता है।
उत्तर:- मेरापना छूटता है।
यह जैनदर्शन का मर्म है। समझ गये?

00:33:27.240 --> 00:33:36.296
मेरापना छूट जाता है। करोड़ों रूपये रह जाते हैं,
चक्रवर्ती का राजपाट रह जाता है।
मेरापना छूटा। बस!

00:33:36.320 --> 00:33:40.736
मेरापना यहाँ आया न?
मुमुक्षु:- जैसा है ऐसा ही है।
उत्तर:- है ऐसा का ऐसा!

00:33:40.760 --> 00:33:42.720
मुमुक्षु:- मेरापना था...
उत्तर:- वह खींच लिया।

00:33:42.720 --> 00:33:47.776
मेरापना ऐसे तूने खींचा और मेरापना कहाँ स्थापित किया?
मुमुक्षु:- अपने में!
उत्तर:- बस!

00:33:47.800 --> 00:33:52.856
मुमुक्षु:- वहाँ से खींचकर यहाँ ले गया।
उत्तर:- बस! इतना ही है। मेरापना छूटता है।

00:33:52.880 --> 00:33:56.216
संयोगों में फेरफार करने की शक्ति आत्मा में नहीं है।

00:33:56.240 --> 00:34:04.056
राग रह जाता है, राग के निमित्त रह जाते हैं,
कुटुंब कबीले रह जाते हैं, देह रह जाती है,
आठ कर्मों का संयोग रह जाता है, समझ गये?

00:34:04.080 --> 00:34:08.376
राजपाट भी रह जाता है, हो तो।
न हो तो करोड़ रूपया भी रह जाता है।

00:34:08.400 --> 00:34:13.176
भले रहे उसमें। ममता छूट गई।
मेरे नहीं हैं, आहाहा!

00:34:13.200 --> 00:34:17.136
शुभाशुभ भाव मेरे नहीं हैं। शुभाशुभ भाव रह जाते हैं।

00:34:17.160 --> 00:34:20.136
मुमुक्षु:- भाव होते हैं।
उत्तर:- भाव होते हैं लेकिन मेरापना?

00:34:20.160 --> 00:34:24.136
मुमुक्षु:- मेरापना छूट गया।
उत्तर:- भाव तो होते हैं। क्योंकि वीतराग तो हुआ नहीं।

00:34:24.160 --> 00:34:27.256
यथाख्यात चारित्र हुआ नहीं।
अरिहंत हुआ नहीं।

00:34:27.280 --> 00:34:31.376
मुनि हुआ नहीं। इसलिए गृहस्थ के योग्य
पाप और पुण्य के परिणाम आते हैं।

00:34:31.400 --> 00:34:39.016
लेकिन वे परिणाम मेरे, वह गया।
वह गया और फिर वह मेरा ज्ञेय वह भी गया।

00:34:39.040 --> 00:34:42.016
मुमुक्षु:- वह भी गया!
उत्तर:- (हाँ)।

00:34:42.040 --> 00:34:53.376
कर्ता का कर्म तो नहीं लेकिन ज्ञान का ज्ञेय भी नहीं है,
आहाहा! ऐसी ऊंची बात इसमें है।

00:34:53.400 --> 00:34:55.800
मुमुक्षु:- बहुत ऊंची बात है।
मुमुक्षु:- चरम सीमा की।
उत्तर:- पराकाष्ठा की।

00:34:55.800 --> 00:35:00.696
यह पहले में पहली इकाई है,
सम्यग्दर्शन होने की।

00:35:00.720 --> 00:35:06.976
यह सम्यग्दर्शन कैसे हो अनादि मिथ्यादृष्टि
जीव को? ज्ञान बाहर में भ्रमता है न?

00:35:07.000 --> 00:35:16.016
वह भटकता हुआ ज्ञान अंदर में मुड़ जाये।
उपकार किया है, गुरुदेव ने।
बहुत उपकार किया है। ऐसे प्रवचन!

00:35:16.040 --> 00:35:25.376
<b>निश्चय से पर के साथ उसे ज्ञेय-ज्ञायक संबंध भी नहीं है।</b>

00:35:25.400 --> 00:35:33.216
<b>अब पर के साथ उसका मेरेपने का-स्वामित्व का
और कर्तापने का संबंध होने की
बात तो कहीं उड़ गई।</b> दूर चली गई।

00:35:33.240 --> 00:35:38.096
<b>समझ में आया?</b> आहाहा! अब पैराग्राफ बदलते हैं।

00:35:38.120 --> 00:35:48.536
<b>आहाहा! कहते हैं -
जो यह ज्ञानमात्र भाव मैं हूँ वह
ज्ञेयों के ज्ञानमात्र ही नहीं जानना। तो किस तरह से है?</b>

00:35:48.560 --> 00:35:56.056
ज्ञेय का ज्ञाता नहीं है वह आत्मा,
परज्ञेय का ज्ञाता नहीं है,
तो आत्मा का स्वरूप क्या है? वह समझाते हैं।

00:35:56.080 --> 00:36:07.376
<b>ज्ञेयों के आकाररूप होती ज्ञान की कल्लोलें</b>
अर्थात् पर्यायरूप <b>परिणमित होता हुआ वह
ज्ञान- ज्ञेय-ज्ञातामय वस्तुमात्र जानना।</b>

00:36:07.400 --> 00:36:17.016
<b>(अर्थात् स्वयं ही ज्ञान, स्वयं ही ज्ञेय और
स्वयं ही ज्ञाता - इसप्रकार ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञातारूप
तीनों भावयुक्त वस्तुमात्र जानना चाहिये)।</b>

00:36:17.040 --> 00:36:19.296
यह इतने शास्त्र के शब्द हैं।

00:36:19.320 --> 00:36:29.376
अब, उसके ऊपर का प्रवचन।
उसके ऊपर का प्रवचन आता है।
चौथा पेज है-चौथा पेज है न? ऊपर चार है।

00:36:29.400 --> 00:36:38.056
<b>'ज्ञेय के आकाररूप होनेवाले ज्ञान की
कल्लोलरूप से परिणमित'</b>

00:36:38.080 --> 00:36:44.936
इसमें ऐसा समझाया है कि
<b>ज्ञेय के आकाररूप</b> अर्थात् परपदार्थ वे ज्ञेय हैं,

00:36:44.960 --> 00:36:51.216
उनके आकाररूप अर्थात् जैसा उनका स्वरूप होता है,
काला, सफेद, खट्टा, मीठा,
वह ज्ञेयों का स्वरूप कहलाता है।

00:36:51.240 --> 00:36:52.816
आकार अर्थात् स्वरूप।

00:36:52.840 --> 00:36:59.936
वह जो स्वरूप इसमें झलकता है, उसके
<b>आकाररूप होनेवाली ज्ञान की</b> पर्यायें,
<b>कल्लोलें</b> अर्थात् पर्यायें,

00:36:59.960 --> 00:37:10.976
उनके संबंधवाला ज्ञान,
ज्ञेय के संबंधवाला जो ज्ञान, पर्याय, वह
<b>परिणमित होता हुआ यह व्यवहार से कहा है, हों!</b>

00:37:11.000 --> 00:37:23.976
उसके साथ उसका संबंध नहीं है। निमित्त देखकर
वह ज्ञात होता है, ऐसा व्यवहार से कहा
लेकिन ऐसा है नहीं। देखो, निषेध करेंगे।

00:37:24.000 --> 00:37:31.936
मुमुक्षु:- वह काला-सफेद जानने में आता है वह स्वयं नहीं है।
उत्तर:- वह काला-सफेद तो वह स्वयं नहीं है लेकिन

00:37:31.960 --> 00:37:36.616
काला-सफेद जिसमें ज्ञात होता है
ऐसा ज्ञान भी स्वयं का नहीं है।

00:37:36.640 --> 00:37:39.136
वह संबंध हटाना है।

00:37:39.160 --> 00:37:51.696
उसे बाहर का संबंध उसके साथ का, ज्ञेय के
संबंध से होता है ज्ञान, वह उसे जानता है ऐसा
कथन में कहने में आता है, लेकिन ऐसा है नहीं।

00:37:51.720 --> 00:37:55.216
देखो! इसमें है। <b>यह व्यवहार से कहा है हों!</b>

00:37:55.240 --> 00:38:02.816
<b>वस्तुतः तो ज्ञेयों का, छह द्रव्यों का जैसा स्वरूप है
उनको जानने के विशेषरूप से परिणमना।</b>

00:38:02.840 --> 00:38:10.296
पर्यायरूप से परिणमना।
वे जिसमें ज्ञात होते हैं ऐसी पर्यायरूप से स्वयं
परिणमता है <b>वह ज्ञान की स्वयं की दशा है।</b>

00:38:10.320 --> 00:38:13.536
<b>और वह ज्ञान के स्वयं के सामर्थ्य से है।</b>

00:38:13.560 --> 00:38:16.936
वे छह द्रव्य हैं इसलिए
उनका ज्ञान होता है ऐसा नहीं।

00:38:16.960 --> 00:38:21.936
छह द्रव्य का जानना भी अपनी
सामर्थ्य से, अंदर में से आता है, ऐसा!

00:38:21.960 --> 00:38:29.656
वह स्व का या पर का, उसका जो जानना आता है,
वह ज्ञान की शक्ति में से आता है।
सामर्थ्य, शक्ति है।

00:38:29.680 --> 00:38:34.476
<b>'ज्ञेयों के आकाररूप होता हुआ ज्ञान'</b>
देखो, ऊपर कहा था न?

00:38:34.500 --> 00:38:43.656
ज्ञेयों के स्वरूप, जैसे ज्ञेय हैं, कोयला हो
तो कोयला, सोना, चांदी, घोड़ा, हाथी
जिस प्रकार से पदार्थ हों उस संबंधित होता हुआ ज्ञान।

00:38:43.680 --> 00:38:52.216
<b>'ज्ञेय के आकाररूप होता हुआ ज्ञान'
यह तो कथनमात्र है।</b> कथनमात्र है।

00:38:52.240 --> 00:38:57.856
<b>'ज्ञेय के आकाररूप होता हुआ ज्ञान'</b> कथनमात्र है।

00:38:57.880 --> 00:39:01.456
मुमुक्षु:- अर्थात् ज्ञेयाकाररूप हुआ ही नहीं?
उत्तर:- हुआ ही नहीं। ऐसा कहना चाहते हैं।

00:39:01.480 --> 00:39:04.360
मुमुक्षु:- ज्ञेयाकाररूप ज्ञान हुआ ही नहीं।
उत्तर:- (ज्ञेयाकाररूप ज्ञान) हुआ ही नहीं है।
वह तो ज्ञानाकाररूप है।

00:39:04.360 --> 00:39:10.376
वह तो ज्ञानाकार छोड़ा नहीं उसने।
और ज्ञेयाकार हुआ नहीं। होनेवाला भी नहीं है।

00:39:10.400 --> 00:39:15.416
लेकिन ज्ञेय को देखकर ज्ञेयाकार हुआ
ऐसा कहने में आता है।

00:39:15.440 --> 00:39:19.216
मुमुक्षु:- आरोप है?
उत्तर:- आरोप, बस!
ऐसा व्यवहार से कहने में आता है।

00:39:19.240 --> 00:39:25.856
कथनमात्र, अर्थात् उसमें कुछ नहीं है।
कथनमात्र अर्थात्?
मुमुक्षु:- मात्र कहने के लिए है।

00:39:25.880 --> 00:39:29.616
उत्तर:- (कथनमात्र अर्थात्)
कहनेमात्र मामा, वह ननिहाल की पूर्ति नहीं करता।

00:39:29.640 --> 00:39:36.576
तुम्हारे गाँव का, तुम्हारी पुत्री का विवाह होगा,
समझ गये? तो उसके गाँव के होते हैं न?

00:39:36.600 --> 00:39:40.776
उसके मामा के गाँव के कोई व्यक्ति आवें,
तो मामा आओ-आओ ऐसा कहते हैं।

00:39:40.800 --> 00:39:44.176
गाँव में, हमारे गाँव में ये रिवाज है।
ऐसा कि मामा आओ।

00:39:44.200 --> 00:39:48.276
मुमुक्षु:- गाँव के सभी मामा कहते हैं।
उत्तर:- लेकिन वह मामा कहीं ननिहाल की पूर्ति करता है? (नहीं)।

00:39:48.300 --> 00:39:58.576
इसलिए कहनेमात्र का मामा, कथनमात्र।
कहनेमात्र मामा, इसप्रकार हमारे यहाँ कहा जाता है।
कहनेमात्र मामा, मात्र कहने के लिए, सच्चा मामा नहीं।

00:39:58.600 --> 00:40:05.336
ऐसे कहते हैं
<b>'ज्ञेय के आकाररूप हुआ ज्ञान' - यह तो कथनमात्र है।</b>

00:40:05.360 --> 00:40:14.656
नीलम, 'ज्ञेयों के आकाररूप हुआ ज्ञान'
वह तो कथनमात्र, कहनेमात्र है।
ऐसा है नहीं, आहाहा!

00:40:14.680 --> 00:40:16.016
कितनी स्पष्टता करते हैं।

00:40:16.040 --> 00:40:19.736
मुमुक्षु:- क्योंकि पर जानने में आता ही नहीं
अतः ज्ञेयाकाररूप होता ही नहीं।
उत्तर:- होता ही नहीं।

00:40:19.760 --> 00:40:24.976
मुमुक्षु:- ज्ञायक ही ज्ञात होता है इसलिए ज्ञानाकाररूप...
उत्तर:- वह ज्ञानाकाररूप ही रहा है,
ज्ञेयाकार होता नहीं है।

00:40:25.000 --> 00:40:29.936
लेकिन निमित्त को देखकर उपचार से,
व्यवहार से ऐसा कहते हैं,कथनमात्र है।

00:40:29.960 --> 00:40:33.896
अन्यथा वास्तविक ऐसा नहीं है।
ऐसा वास्तविक ऐसा नहीं है।

00:40:33.920 --> 00:40:43.936
यह अलमारी ज्ञान में जब ज्ञात होती है तब
अलमारी को जानता है - ज्ञेयाकार हुआ,
ऐसा कथनमात्र है, लेकिन ऐसा नहीं है।

00:40:43.960 --> 00:40:51.176
क्योंकि उस समय ज्ञान है न ज्ञान!
तो ज्ञान की व्याख्या हमने क्या की?
कि ज्ञायक को जाने उसका नाम ज्ञान।

00:40:51.200 --> 00:40:54.336
तो ज्ञान तो ज्ञायक को ही जानता है।
इसको (पर को) नहीं जानता।

00:40:54.360 --> 00:40:58.896
फिर भी उसे (पर को) निमित्त देखकर उसे
(पर को) जानता है,
ऐसा उपचार से कहने में आता है।

00:40:58.920 --> 00:41:04.416
कथनमात्र है। इस बात में कुछ माल नहीं है,
सौ प्रतिशत झूठा है वह कथन।

00:41:04.440 --> 00:41:09.376
मुमुक्षु:- ज्ञान का ज्ञेय बदलता नहीं है।
उत्तर:- बदलता ही नहीं है।

00:41:09.400 --> 00:41:12.336
ज्ञान का विषय बदलता ही नहीं।
ज्ञान विषय पलटता ही नहीं।

00:41:12.360 --> 00:41:17.136
प्रश्न:- ज्ञान में किसी समय आत्मा जानने में आये
और किसी समय अलमारी जानने में आये?
मुमुक्षु:- ऐसा नहीं है।

00:41:17.160 --> 00:41:23.296
प्रश्न:- ज्ञान में किसी समय आत्मा जानने में आये और किसी
समय सीमंधर भगवान की प्रतिमा जानने में आये? ज्ञान में?
मुमुक्षु:- कभी भी नहीं।

00:41:23.320 --> 00:41:25.456
मुमुक्षु:- ऐसा बनता नहीं।
उत्तर:- ऐसा बनता नहीं है।

00:41:25.480 --> 00:41:32.936
मुमुक्षु:- इतना बिठाना पड़ेगा।
उत्तर:- (हाँ!) बहन! देखा ! इतना बिठाना पड़ेगा।

00:41:32.960 --> 00:41:38.056
वह कठिन है ऐसा (वे) कहते हैं,
यह बात जरा थोड़ी कठिन है
इसलिए बिठानी पड़ेगी।

00:41:38.080 --> 00:41:45.336
यदि बैठ गई कि ज्ञान का विषय पलटता ही नहीं है,
(ज्ञान का विषय) एक आत्मा ही है।

00:41:45.360 --> 00:41:49.176
प्रत्येक समय, किसी भी द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव,
चाहे जहाँ जाओ,

00:41:49.200 --> 00:41:57.536
लंदन में जाओ, राजकोट में जाओ, नैरोबी में जाओ,
जामनगर जाओ, गाँव में जाओ, जहाँ देखो,
वहाँ तुम्हारे ज्ञान में ज्ञायक ही ज्ञात होता है।

00:41:57.560 --> 00:41:59.336
आत्मा ज्ञात होता है।

00:41:59.360 --> 00:42:05.096
ऐसी एक घटना घटी। जंगल था।

00:42:05.120 --> 00:42:16.976
मुनिराज ध्यान कर रहे थे गुफा में और
अन्य पाँच-सात मुनि वहाँ से निकले,
समवशरण में जाने के लिए।

00:42:17.000 --> 00:42:22.096
समवशरण तीर्थंकर भगवान का था वहाँ
जाने के लिए विहार करके जा रहे थे।

00:42:22.120 --> 00:42:27.736
उसमें मुनियों को ख्याल आया कि
हमारे मुनि हैं, हमारे संघ के।

00:42:27.760 --> 00:42:32.456
और हम उन्हें भी कहें कि हमारे साथ,
हम जा रहे हैं समवशरण में, आप भी आओ।

00:42:32.480 --> 00:42:39.256
अतः दो मुनियों को भेजा अंदर गुफा में
और अन्य मुनि प्रस्थान कर गये।

00:42:39.280 --> 00:42:42.336
उनको तुम साथ में लेते आना,
हम जाते हैं। तो कहा कि ठीक है।

00:42:42.360 --> 00:42:52.936
उन्होंने मुनिराज को विनती की, उनके चरण छुए। वे
जबरदस्त मुनि थे आचार्य, महान समर्थ ज्ञानी।

00:42:52.960 --> 00:43:02.936
उनके चरणों में ढोक दी और कहा साहेब! हमारे गुरु
साथ में थे वे उस तरफ आगे गये हैं और हमें यहाँ
आपसे विनती करने के लिए छोड़ गये हैं।

00:43:02.960 --> 00:43:08.776
कहा, क्या है बोलो?
कि हमारा पूरा संघ समवशरण में जा रहा है।

00:43:08.800 --> 00:43:11.496
वे हमारे मूल सर्वज्ञदेव गुरु कहलाते हैं।

00:43:11.520 --> 00:43:16.336
दिव्यध्वनि सुनने के लिए जा रहे हैं
और आप भी हमारे साथ पधारिये।

00:43:16.360 --> 00:43:19.976
इसलिए विनती करने के लिए आपके (पास) आया हूँ।

00:43:20.000 --> 00:43:24.816
तो उन्होंने कहा बैठो जरा!
वे बैठ गये।

00:43:24.840 --> 00:43:32.056
कि देखो, मैं समवशरण में आऊँ
उसमें तो मेरी ना होवे नहीं ।

00:43:32.080 --> 00:43:38.976
लेकिन समवशरण में तो मैं आऊँ, तब भी मेरा
आत्मा जानने में आयेगा, मुझे समवशरण तो जानने में आयेगा नहीं।

00:43:39.000 --> 00:43:43.976
मुझे तीर्थंकर प्रभु जानने में नहीं आयेंगे,
मुझे तो मेरे ज्ञान में आत्मा ही जानने में आयेगा,
वहाँ बैठा होऊँगा तब।

00:43:44.000 --> 00:43:48.696
यहाँ बैठा हूं तो ज्ञान में आत्मा जानने में आता है।
तो फिर मुझे वहाँ जाने का क्या अर्थ?

00:43:48.720 --> 00:43:59.456
यदि विषय बदलता हो, मेरे ज्ञान का विषय इस समय आत्मा,
और फिर मेरे ज्ञान का विषय सीमंधर भगवान हो
जायें, वे मुझे जानने में आ जायें तो तो तुम्हारे साथ आऊँ।

00:43:59.480 --> 00:44:06.056
(ये सुनकर) वे शांत हो गये, वे शांत हो गये, ओहोहो!
इसमें तो अपना काम हो गया !

00:44:06.080 --> 00:44:10.536
उनकी समझ गहरी उतर गई।
और वे यहाँ जम गये।

00:44:10.560 --> 00:44:13.856
वे दोनों मुनि भी समवशरण में नहीं गये।

00:44:13.880 --> 00:44:20.296
और जहाँ थोड़ी देर हुई, दो-चार घंटे,
वहाँ तीनों को केवलज्ञान हो गया।

00:44:20.320 --> 00:44:25.016
और वहाँ पता चला कि मुनि गये थे न,

00:44:25.040 --> 00:44:29.496
कि उन दो मुनियों को हम छोड़कर
आये थे वे अरिहंत हो गये

00:44:29.520 --> 00:44:34.456
और जिन्हें वो लेने के लिए गये थे वे अरिहंत हो गये हैं।
यह हुआ क्या? यह क्या चमत्कार हुआ? समझ गये?

00:44:34.480 --> 00:44:37.736
तब सीमंधर भगवान को पूछा कि यह क्या हुआ?

00:44:37.760 --> 00:44:40.976
तो कहा, इस तरह उन्हें लेने के लिए गये थे
और उन्होंने जवाब दिया

00:44:41.000 --> 00:44:44.496
कि मैं तीर्थंकर भगवान के यहाँ जाऊंगा
तो भी मेरा आत्मा ही जानने में आयेगा।

00:44:44.520 --> 00:44:50.936
ज्ञेय बदलेगा नहीं। और यहाँ हूँ, तो भी मेरा?
मुमुक्षु:- ज्ञेय, ज्ञेय, वही का वही रहनेवाला है।

00:44:50.960 --> 00:44:53.096
उत्तर:- लंदन में हो तो भी आत्मा ज्ञेय,

00:44:53.120 --> 00:44:55.656
राजकोट में आओ तो?
मुमुक्षु:- तो भी आत्मा ज्ञेय।
उत्तर:- बस!

00:44:55.680 --> 00:45:04.816
इसलिए मैं अब तुम्हारे साथ नहीं आता।
वे दोनों भी बैठ गये। ध्यान में मग्न हो गये।
केवलज्ञान का भड़का हो गया।

00:45:04.840 --> 00:45:11.256
उनको पछतावा हुआ कि देखो हमने
उनको छोड़ा लेकिन उनका तो काम हो गया।
समझ गये!

00:45:11.280 --> 00:45:15.216
ज्ञेय बदलता नहीं। ज्ञेय बदले तो ज्ञान नहीं कहलाता।

00:45:15.240 --> 00:45:21.896
ज्ञेय बदलता हो तो इन्द्रियज्ञान कहलाता है
लेकिन ज्ञान नहीं कहा जाता, अज्ञान कहा जाता है।

00:45:21.920 --> 00:45:24.376
इंद्रियज्ञान = अज्ञान।

00:45:24.400 --> 00:45:29.296
इन्द्रियज्ञान अर्थात्? इन्द्रियज्ञान तो विषय बदलता है न?

00:45:29.320 --> 00:45:33.456
स्पर्श, रस, गंध, वर्ण प्रत्येक का
उसका विषय अलग-अलग है न?

00:45:33.480 --> 00:45:38.536
स्पर्शनेन्द्रिय का विषय ठंडी गरम अवस्था।
रस का विषय खट्टे-मीठे को जानना ।

00:45:38.560 --> 00:45:41.256
(घ्राणेन्द्रिय) सुगंध-दुर्गंध को जानता है।
आँख रूप को जानती है।

00:45:41.280 --> 00:45:45.896
कान सुनता है आवाज को।
अर्थात् विषय बदलता है पाँच इन्द्रियों का।

00:45:45.920 --> 00:45:50.536
ज्ञान का विषय बदलता नहीं।
ज्ञान का विषय अभेदरूप से ज्ञायक ही (है)।

00:45:50.560 --> 00:45:55.256
ज्ञेयाकार अवस्था में अभेद ज्ञायक ही ज्ञात होता है।
ज्ञात हुआ ही करता है।

00:45:55.280 --> 00:45:58.736
उसे सविकल्पदशा या निर्विकल्प कुछ अड़ता (बाधक) नहीं है।

00:45:58.760 --> 00:46:03.416
आहार करते हों मुनिराज तो भी
ज्ञान में आत्मा जानने में आता है, आहाहा!

00:46:03.440 --> 00:46:06.936
ऐसा, इसका नाम ज्ञान है।

00:46:06.960 --> 00:46:10.776
विषय पलटे, ज्ञेय पलटे (तो वह ज्ञान नहीं है)।

00:46:10.800 --> 00:46:15.536
कि तुम भले, आये हो कहाँ से आये हो?
कि हम जूनागढ़ से आये हैं।

00:46:15.560 --> 00:46:19.176
तो गिरनार तुमने देखा था?
कि हाँ गिरनार दर्शन किये।

00:46:19.200 --> 00:46:21.456
फिर अब इस समय?
कि आपको देखते हैं।

00:46:21.480 --> 00:46:27.016
तो हम पूछते हैं। तो ज्ञेय बदला
न तुम्हारे ज्ञान में?
तो कहा कि हाँ! बदलता ही है न ज्ञेय तो?

00:46:27.040 --> 00:46:37.280
वहाँ थे तो गिरनार जानने में आता था,
अब यहाँ आये तो आप जानने में आते हो।
झूठ है! मार्मिक बात है यह।

00:46:37.540 --> 00:46:47.056
ऐसी गहरी और ऊँची बात, आहाहा!
यह गुरुदेव कर गये हैं।

00:46:47.080 --> 00:46:54.816
गुरुदेव का कहा हुआ ही कहते हैं,
हमारे घर की बात नहीं करते, आहाहा!

00:46:54.840 --> 00:46:59.256
है तो घर की (आत्मा की) बात लेकिन
गुरुदेव का नाम लेकर ही कही जाती है न?

00:46:59.280 --> 00:47:01.536
उनका नाम लेकर कही जाती है न?
है तो हमारी (आत्मा की) बात।

00:47:01.560 --> 00:47:03.320
मुमुक्षु:- यह तो आत्मा की बात है।
उत्तर:- आत्मा की ही बात है।

00:47:03.320 --> 00:47:05.520
मुमुक्षु:- घर की अर्थात् आत्मा की ही बात है।
उत्तर:- आत्मा की ही बात है।

00:47:05.520 --> 00:47:12.376
है तो आत्मा की बात। लेकिन गुरुदेव का नाम
लेते हैं तो श्रद्धा बैठती है दूसरों को, ऐसा! आहाहा!

00:47:12.400 --> 00:47:18.840
गजब के पुरुष हो गये हैं, गजब के पुरुष!
"न भूतो न भविष्यति" कि ऐसे पुरुष होंगे? कि नहीं।

00:47:18.860 --> 00:47:25.696
मुमुक्षु:- कौनसा पुण्य पका हमारा कि
ये पुरुष आत्मा की बात जाहिर करके गये!
उत्तर:- हमने पूर्व में आत्मा को याद किया था।

00:47:25.720 --> 00:47:34.216
इसलिए उसमें शुभभाव हुआ। उसमें पुण्य बंध गया।
उसमें महापुरुष का, ज्ञानी का योग होता है, समझ गये?

00:47:34.240 --> 00:47:39.176
और उसमें यदि रुचि जागे,
पुण्य ने तो फल दिया, संयोग दिया।

00:47:39.200 --> 00:47:49.736
उसने तो संयोग दिया। गुरुदेव मिले।
अब उसमें आत्मा की रुचि करके
अपना काम करो तो काम का है। वरना किस काम का?

00:47:49.760 --> 00:47:56.136
मुमुक्षु:- वरना तो यह ... हो गया, नहीं तो...
मुमुक्षु:- तब गुरुदेव को
निमित्त कहते हैं। नहीं तो...

00:47:56.160 --> 00:48:04.496
उत्तर:- तब उन्हें निमित्त कहा जाता है,
उन्हें जाना कहा जाता है, इसे (अपने को) जानूं तो।
गुरुदेव को जानो, तो वह जानना नहीं है।

00:48:04.520 --> 00:48:10.776
गुरुदेव मना करते हैं वह।
उन मुनि ने नहीं कहा कि
मैं तुम्हारे साथ आऊँ, मुझे दिक्कत नहीं है।

00:48:10.800 --> 00:48:15.616
वहाँ आऊँगा ना तो भी मुझे तो
ज्ञायक ही जानने में आयेगा, मेरे उपयोग में।

00:48:15.640 --> 00:48:20.896
मेरे उपयोग में तो तीर्थंकर हैं नहीं।
वे जानने में आते हैं, वह कहाँ से (आया)?
वे जानने में नहीं आएंगे मुझे।

00:48:20.920 --> 00:48:27.096
कहते हैं ऐसा? तो कहते हैं हाँ! तुम कहते हो तो आऊं,
यदि तीर्थंकर भगवान ज्ञात हो जायें मेरे ज्ञान में।

00:48:27.120 --> 00:48:29.296
तो वे भी मुनि ही थे, वे कहाँ से कहें?

00:48:29.320 --> 00:48:36.056
ना! यह बात आपकी सत्य है, आत्मा ही जानने में आयेगा।
वहाँ जाओगे तो भी और यहाँ बैठे तो भी
आत्मा। तो फिर यहीं पर स्थिरता करो न।

00:48:36.080 --> 00:48:45.816
ध्यान में बैठ जाओ न, आहाहा!
ऐसी बात है।

00:48:45.840 --> 00:48:50.616
यह मार्मिक बात है।

00:48:50.640 --> 00:48:54.616
आत्मा का दर्शन कैसे करना? उसकी यह बात है।

00:48:54.640 --> 00:48:59.576
और दर्शन में रुकावट यह है 'मैं पर को जानता हूँ',
वह रुकावट है।

00:48:59.600 --> 00:49:06.656
बड़ी रुकावट है। एक कर्ता,
है जाननेवाला और मानता है कर्ता, वह रुकावट बड़ी ।

00:49:06.680 --> 00:49:13.656
उसमें से वह खिसका तो
इसमें पर का जाननेवाला ।
हो गया, वही का वही रहा, अज्ञान।

00:49:13.680 --> 00:49:24.256
लेकिन यह है न, यह विषय उसे ग्रासपिंग (grasping)
करनेवाले, ग्रहण करनेवाले, वे कम हैं।

00:49:24.280 --> 00:49:26.616
कम ही होते हैं, तीनोंकाल कम होते हैं।

00:49:26.640 --> 00:49:33.840
सूक्ष्म बात समझनेवाले कम होते हैं।
होते हैं अवश्य, संख्या कम होती है, बस!

00:49:34.040 --> 00:49:49.336
चिंतवन का विषय है।
चिंतवन करके बिठाने का विषय है अंदर में।

00:49:49.360 --> 00:49:52.896
अंदर में बिठाने का है।
अपना हित कैसे हो?

00:49:52.920 --> 00:49:58.776
पर को जानते हुये अनंतकाल गया,
हित हुआ नहीं, आनंद आया नहीं।

00:49:58.800 --> 00:50:13.996
स्व को जानने पर आनंद आयेगा।
वह प्रूफ (proof) है। वह तो प्रमाण है।

00:50:14.020 --> 00:50:17.496
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर बात है!
ज्ञान का विषय पलटता नहीं है।

00:50:17.520 --> 00:50:22.856
उत्तर:- और विषय पलटे तो
ज्ञान नहीं है किन्तु अज्ञान है।

00:50:22.880 --> 00:50:31.736
खाते-पीते-चलते-बैठते,
जाननहार ही जानने में आता है।

00:50:31.760 --> 00:50:40.576
साधक को दो ज्ञान प्रगट हुए हैं।
एक तो था इन्द्रियज्ञान और दूसरा आत्मज्ञान,
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट हुआ।

00:50:40.600 --> 00:50:49.896
अज्ञानी के पास एक ही प्रकार का ज्ञान।
केवली के पास भी एक ही प्रकार का ज्ञान।
साधक के पास दो प्रकार के ज्ञान।

00:50:49.920 --> 00:50:55.136
अज्ञानी के पास एक प्रकार का- अज्ञान,
ज्ञान अर्थात् इन्द्रियज्ञान।

00:50:55.160 --> 00:50:59.416
उसके पास इन्द्रियज्ञान और
केवली के पास अकेला अतीन्द्रियज्ञान।

00:50:59.440 --> 00:51:02.616
(केवली के पास) अकेला अतीन्द्रियज्ञान,
उसके (अज्ञानी) पास अकेला इन्द्रियज्ञान।

00:51:02.640 --> 00:51:10.016
और साधक हुआ सम्यग्दृष्टि, दो प्रकार का ज्ञान।
एक इन्द्रियज्ञान भी है ही
और अतीन्द्रियज्ञान भी है।

00:51:10.040 --> 00:51:13.096
थोड़ा राग भी है, थोड़ा वीतरागभाव भी है।

00:51:13.120 --> 00:51:16.776
थोड़ी शुद्धता भी प्रगट हुई है,
थोड़ी अशुद्धता भी है।

00:51:16.800 --> 00:51:34.496
अपूर्व बात है। इसमें समय लगाने जैसा है।

00:51:34.520 --> 00:51:46.976
इसमें पुरुषार्थ खिलाने जैसा है, आहाहा!
ज्ञान उसका नाम कि (जिसका) विषय बदले नहीं।

00:51:47.000 --> 00:51:54.976
मुमुक्षु:- अर्थात् ज्ञान ज्ञेयाकाररूप होता नहीं।
ज्ञान, ज्ञानाकाररूप ही रहता है।
क्योंकि विषय बदलता नहीं है न उसका।

00:51:55.000 --> 00:51:59.496
उत्तर:- इसलिये ज्ञानाकार रहता है।
ज्ञेयाकार होता नहीं।
उसे ज्ञेयाकार हुआ (ऐसा कहना) कथनमात्र है।

00:51:59.520 --> 00:52:02.456
मुमुक्षु:- वह तो भाई!
निमित्त का ज्ञान कराया है उसे।
उत्तर:- निमित्त देखकर व्यवहार से,

00:52:02.480 --> 00:52:10.296
उपचार से कहा जाता है।
कथनमात्र अर्थात् कुछ नहीं, आहाहा!

00:52:10.320 --> 00:52:16.776
ज्ञान में विषय बदलता नहीं है,
उसका कारण क्या है, पता है?

00:52:16.800 --> 00:52:20.856
उसका कारण क्या है?
कि ज्ञान आत्मा का है।

00:52:20.880 --> 00:52:33.296
क्या कहा?
ज्ञान में विषय बदलता नहीं है, उसका कारण क्या?
कि ज्ञान आत्मा का है इसलिए विषय बदलता नहीं।

00:52:33.320 --> 00:52:43.696
सुनना !
अब, यदि ज्ञान पर का हो तो तो विषय बदले।
ख्याल आया कुछ?

00:52:43.720 --> 00:52:51.696
यदि ज्ञान पर का हो, पर ज्ञेय का,
पर ज्ञेय से ज्ञान होता हो,
पर का हो तो-तो विषय पलटा करे।

00:52:51.720 --> 00:52:56.496
लेकिन विषय पलटता है वह ज्ञान ही नहीं है।

00:52:56.520 --> 00:53:02.456
एक को जाना, तृप्ति नहीं,
दूसरे को जानने की इच्छा हुई,
इसप्रकार चक्कर मारता रहता है।

00:53:02.480 --> 00:53:08.016
ज्ञेय से ज्ञेयांतर, ज्ञेय से ज्ञेयांतर,
ज्ञेय से ज्ञेयांतर, वह ज्ञान ही नहीं है, आहाहा!

00:53:08.040 --> 00:53:13.776
जिस ज्ञान में विषय बदले वह ज्ञान नहीं है।

00:53:13.800 --> 00:53:19.776
जिस ज्ञान में विषय बदले नहीं,
आत्मा आया वह आया दृष्टि में,
अनुभव में आया वह आया ज्ञायक कि ज्ञायक हूँ।

00:53:19.800 --> 00:53:24.936
फिर सोते-बैठते-चलते-फिरते
भी ज्ञान का विषय बदलता नहीं है।

00:53:24.960 --> 00:53:29.376
तब विषय बदलता है, कौन बदलता है?
कि इन्द्रियज्ञान।

00:53:29.400 --> 00:53:34.336
वह ज्ञान मेरा नहीं है, इन्द्रियज्ञान मेरा नहीं है।
इन्द्रियज्ञान (विषय) पलटा करेगा।

00:53:34.360 --> 00:53:40.096
जब तक परमात्मा नहीं होता
तब तक एक अंश विषय नहीं बदलता।

00:53:40.120 --> 00:53:48.416
और दूसरा अंश जो है, इन्द्रियज्ञान का,
वह (विषय) बदलता रहेगा, लेकिन वह ज्ञान ही नहीं है मेरा,
वह तो ज्ञेय है।

00:53:48.440 --> 00:53:55.616
मुमुक्षु:- किसी के संग के बिना,
वह मन का संग हो तब तक।
उत्तर:- वह ज्ञेय है। वह इन्द्रियज्ञान है, आहाहा!

00:53:55.640 --> 00:54:03.416
ज्ञान आत्मा का है इसलिए
आत्मा को निरंतर जाना करता है।

00:54:03.440 --> 00:54:10.416
निरंतर जाना करता है इसलिए
उसका विषय नहीं बदलता, आहाहा!

00:54:10.440 --> 00:54:19.456
और जो ज्ञान विषय बदलता है इसे जानूं
इसे जानूं, उसे जानूं, उसे जानूं,
वह ज्ञान ही नहीं है, वह इन्द्रियज्ञान है।

00:54:19.480 --> 00:54:27.816
उघाड़ है वह तो, आहाहा!
कि अब क्या जानने में आता है? प्रवचनसार।
अब क्या जानने में आता है? नियमसार।

00:54:27.840 --> 00:54:36.896
अब क्या जानने में आता है? कि समयसार।
ऐसा नहीं है, विषय बदलता नहीं उसका।

00:54:36.920 --> 00:54:42.216
मुमुक्षु:- जो जिसका हो वह उसे प्रसिद्ध करे।
उत्तर:- उसे ही प्रसिद्ध करे न!
ज्ञान तो आत्मा का है।

00:54:42.240 --> 00:54:43.720
मुमुक्षु:- आत्मा का है,
इसलिए आत्मा को प्रसिद्ध करता है।

00:54:43.720 --> 00:54:46.536
उत्तर:- समय-समय आत्मा को
प्रसिद्ध करता है इसलिए विषय बदलता नहीं है।

00:54:46.560 --> 00:54:53.256
यदि ज्ञान पर का हो तो-तो विषय बदले,
लेकिन पर का या पर से तो होता नहीं।

00:54:53.280 --> 00:55:00.336
और पर का विषय बदलता है तो वह ज्ञान नहीं,
अज्ञान है, इन्द्रियज्ञान है।
इन्द्रियज्ञान ज्ञान ही नहीं है।

00:55:00.360 --> 00:55:07.136
एक पुस्तक बाहर प्रकाशित होने वाली है अभी।
२६० पृष्ठ की छपती है, अहमदाबाद में।

00:55:07.160 --> 00:55:10.096
एक सप्ताह में यहाँ आ जायेगी।

00:55:10.120 --> 00:55:16.416
उसका नाम है 'इन्द्रियज्ञान... ज्ञान नहीं है'।

00:55:16.440 --> 00:55:28.736
'इन्द्रियज्ञान.... ज्ञान नहीं है'
सभी शास्त्रों के आधार उसमें रखकर पुस्तक
तैयार हुई है। बहन ने खास मेहनत की है।

00:55:28.760 --> 00:55:33.656
पुस्तक छप गई है लगभग।
दो चार छह दिनों में छप जायेगी।
एक सप्ताह में आ जायेगी।

00:55:33.680 --> 00:55:40.136
ज्यादा में ज्यादा यदि ठगा हुआ हो जीव,
तो वह पुण्य से धर्म मानता है।

00:55:40.160 --> 00:55:48.216
और पंडित ज्ञान से आत्मा का ज्ञान मानते हैं,
शास्त्र से ज्ञान मानते हैं।
शास्त्रज्ञान को ज्ञान मानते हैं।

00:55:48.240 --> 00:55:54.376
शास्त्रज्ञान ज्ञान नहीं है,
वह तो ज्ञेय का ज्ञान हुआ।
आत्मा का ज्ञान कहाँ है?

00:55:54.400 --> 00:56:02.216
मुमुक्षु:- ज्ञेय का ज्ञान होने से वह ज्ञेय ही है।
उत्तर:- वह ज्ञेय ही है। वह ज्ञेय ही हो गया।

00:56:02.240 --> 00:56:06.896
ज्ञेय के सन्मुखवाला जो ज्ञान
वह स्वयं ज्ञेय हो गया।

00:56:06.920 --> 00:56:10.016
और आत्मा की सन्मुखतावाला ज्ञान वह ज्ञान है।

00:56:10.040 --> 00:56:17.776
जिसमें आत्मा प्रसिद्ध हो,
आत्मा जानने में आये, वह ज्ञान है।

00:56:17.800 --> 00:56:25.216
जिसमें आत्मा तिरोभूत हो जाये,
आत्मा जानने में नहीं आये और पर जानने में आया करे,
तो वह ज्ञान कहाँ है? वह तो अज्ञान है।

00:56:25.240 --> 00:56:28.312
वह तो संसार का कारण है।
चारगति में (भटकने का कारण है)।