﻿WEBVTT LA407

00:01:04.035 --> 00:01:17.010
पेज नं. १०.
<b>द्रव्य स्वभाव पर्याय स्वभाव</b>
पेज नं. १० बोलो।

00:01:17.035 --> 00:01:32.296
<b>जितने नय हैं उतने श्रुतज्ञानरूप हैं;
श्रुतज्ञान परोक्ष है, अनुभव प्रत्यक्ष है; इसलिये</b>।

00:01:32.320 --> 00:01:38.449
उत्तर:- अर्थात् नय से आत्मा का
अनुभव नहीं होता क्योंकि नयज्ञान स्वयं परोक्ष है।

00:01:38.474 --> 00:01:49.336
और अनुभव होता है तब नयज्ञान नहीं होता,
प्रत्यक्षज्ञान, अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होता है,
अतः वह प्रत्यक्ष है। <b>इसलिये</b>…

00:01:49.360 --> 00:02:03.026
मुमुक्षु:- <b>इसलिये श्रुतज्ञान के बिना जो ज्ञान है</b>।
उत्तर:- आहाहा! इन्द्रियज्ञान के बिना जो ज्ञान है,
अतीन्द्रियज्ञान है, <b>वह प्रत्यक्ष अनुभव करता है।</b>

00:02:03.051 --> 00:02:20.416
फिर से <b>इसलिये श्रुतज्ञान के बिना</b>, अर्थात् मानसिक
ज्ञान के बिना, इन्द्रियज्ञान के बिना, <b>जो</b> अतीन्द्रिय
<b>ज्ञान है वह प्रत्यक्ष अनुभव करता है</b> आत्मा का।

00:02:20.440 --> 00:02:42.203
इन्द्रियज्ञान आत्मा का अनुभव नहीं कर सकता
क्योंकि परोक्ष है। आगे। <b>इसलिये</b>, <b>इसलिये</b>…

00:02:42.228 --> 00:02:56.498
मुमुक्षु:- <b>इसलिए प्रत्यक्षपने अनुभव करता
हुआ जो कोई शुद्ध स्वरूप आत्मा
वह ही ज्ञानपुंज वस्तु है, ऐसा कहा जाता है।</b>

00:02:56.523 --> 00:03:02.982
उत्तर:- <b>ऐसा कहा जाता है।</b> बस!
इन्द्रियज्ञान को छोड़कर अंतर्मुख होकर
अतीन्द्रियज्ञान से जो आत्मा को अनुभवता है,

00:03:03.007 --> 00:03:09.849
उसे <b>शुद्ध स्वरूप आत्मा
वह ही ज्ञानपुंज वस्तु है</b>।

00:03:09.874 --> 00:03:22.491
ज्ञान अर्थात् अतीन्द्रियज्ञानमयी
ऐसा कहा जाता है। सही है। आगे।

00:03:22.516 --> 00:03:26.576
मुमुक्षु:- <b>पूज्य भाईश्री ने
परम करुणा करके फरमाया कि,</b>

00:03:26.600 --> 00:03:36.456
<b>'हे भव्यों! हमारा आशय तो,
सब नयातीत होओ,
परमानंद को प्राप्त करो इतना है'।</b>

00:03:36.480 --> 00:03:46.887
<b>अतः स्वभाव प्राप्ति की रीति नयों से अलग है।</b>
उत्तर:- पूरी रीति ही अलग है।

00:03:46.912 --> 00:03:58.697
नय में अटक गये हों तो नय से अनुभव नहीं होता,
ज्ञान से अनुभव होता है। आगे।

00:03:58.722 --> 00:04:12.857
मुमुक्षु:- <b>श्रीमद् राजचंद्रजी ने भी
यह रहस्य पत्र नं. २०८, वर्ष २४वाँ,
मुंबई माघ कृष्ण-३० १९४७ - में दर्शाया है।</b>

00:04:12.882 --> 00:04:18.570
उत्तर:- उन्नीस सौ सैंतालीस में,
समकित शुद्ध प्रकाश्यु रे
(धन्य रे दिवस,राजपद, श्रीमद् राजचंद्रजी)।

00:04:18.594 --> 00:04:28.896
१९४७ के साल में जब उनको सम्यग्दर्शन हुआ।
सम्यग्दर्शन होने के बाद का यह लेख है।

00:04:28.920 --> 00:04:34.894
स्वयं लिखते हैं
उन्नीस सौ सैंतालीस में, समकित शुद्ध प्रकाश्यु रे!

00:04:34.920 --> 00:04:44.091
अर्थात् व्यवहार समकित तो
हो गया था पहले - निर्णय,
परंतु प्रत्यक्ष अनुभव अब हुआ ४७ में।

00:04:44.116 --> 00:04:53.210
और सम्यग्दर्शन के बाद का यह लेख है।
यह लेख बहुत ऊँचा है, काफी ऊँचा है।

00:04:53.235 --> 00:04:58.585
इस लेख को यदि ख्याल में रखे
तो इसमें कहीं उसे विरोध नहीं लगेगा।

00:04:58.610 --> 00:05:04.816
इस लेख को मुख्य रखना चाहिए,
बहुत स्पष्ट किया है इसमें।

00:05:04.840 --> 00:05:11.382
दसवाँ पेज है मोदी साहब,
नीचे का अंतिम पैराग्राफ।

00:05:11.407 --> 00:05:20.487
मुमुक्षु:- <b>अनंत नय हैं, एक एक पदार्थ
अनंत गुण से और अनंत धर्म से युक्त है।</b>

00:05:20.512 --> 00:05:28.343
उत्तर:- सहित है। अनंत गुण से सहित है
और अनंत धर्मों से भी सहित है।

00:05:28.368 --> 00:05:32.936
गुण निरपेक्ष होते हैं और
धर्म सापेक्ष होते हैं।

00:05:32.960 --> 00:05:37.616
ज्ञान, दर्शन, चारित्र गुण होते हैं,
उनकी पर्याय होती है।

00:05:37.640 --> 00:05:46.195
और धर्म सापेक्ष हैं, वे धर्म हैं परंतु
उनकी पर्याय नहीं होती, धर्म की पर्याय नहीं होती।

00:05:46.220 --> 00:05:54.328
धर्म के दो प्रकार, एक द्रव्य अपेक्षित धर्म
जैसे कि द्रव्य नित्य है।

00:05:54.353 --> 00:06:07.228
यह एक मुद्दे की बात है। क्या कहते हैं?
किन्हीं भाईयों को जगह कम पड़ती हो

00:06:07.253 --> 00:06:16.976
तो दो-तीन भाई यहाँ आ सकते हैं।
आ सकते हैं यहाँ।
यहाँ आवें, जगह खाली है।

00:06:17.000 --> 00:06:25.039
भाईयों! जगह बहुत है जितने आयें
उतने समा जायें।

00:06:25.064 --> 00:06:29.037
सिद्ध लोक में तो, एक वहाँ अनंत।

00:06:29.062 --> 00:06:34.001
मुमुक्षु:- एक सिद्ध में सिद्ध अनंत जान।
सत्ता सबकी भिन्न-भिन्न पहचान।

00:06:34.026 --> 00:06:42.466
उत्तर:- सत्ता अलग-अलग परंतु एक में अनंत।
अरूपी हैं न? इसलिये कोई जगह नहीं चाहिये उन्हें।

00:06:42.491 --> 00:06:48.366
मुमुक्षु:- समोशरण में भी जगह कम नहीं पड़ती।
उत्तर:- समोशरण में जगह कम नहीं पड़ती।
चाहे जितने लोग आयें (उतने) समा जाते हैं।

00:06:48.391 --> 00:06:57.776
ऐसा अतिशय है न वहाँ का, तीर्थंकर का। आहाहा!
पुण्य प्रकृति है। यह एकदम मुद्दे की बात है।

00:06:57.800 --> 00:07:07.422
<b>अनंत नय हैं,</b>
नय है, वह ज्ञान का एक अंश है।

00:07:07.447 --> 00:07:13.520
नय है, वह प्रमाण ज्ञान के एक
अंश का नाम नय है।

00:07:13.545 --> 00:07:18.536
<b>एक एक पदार्थ</b>, अब,
एक एक (अर्थात्) छहों द्रव्य ले लेना, सभी।

00:07:18.560 --> 00:07:32.197
<b>एक एक पदार्थ अनंत गुण से और
अनंत धर्म से (युक्त)</b> सहित <b>है।</b>
जीव में अनंत गुण हैं और अनंत धर्म हैं।

00:07:32.222 --> 00:07:39.043
अब गुण और धर्म की व्याख्या में फर्क है।
अंतर यह है (कि) लक्षण भेद से भेद है।

00:07:39.068 --> 00:07:45.510
गुण होता है उसकी पर्याय होती है
और धर्म होता है उसकी पर्याय नहीं होती।

00:07:45.535 --> 00:07:51.651
गुण निरपेक्ष है और धर्म सापेक्ष है।
धर्म परस्पर सापेक्ष हैं।

00:07:51.676 --> 00:07:57.376
ज्ञान गुण तो निरपेक्ष है।
और नित्य और अनित्य (धर्म हैं),

00:07:57.400 --> 00:08:01.964
द्रव्य अपेक्षित नित्य धर्म,
पर्याय अपेक्षा से अनित्य धर्म।

00:08:01.989 --> 00:08:06.543
पर्याय का धर्म है अनित्य,
नित्यपना द्रव्य का धर्म है।

00:08:06.568 --> 00:08:13.336
अब द्रव्य का धर्म नित्य है वह अनादि-अनंत है।
पर्याय का धर्म अनित्य (है) वह अनादि-अनंत (है)।

00:08:13.360 --> 00:08:20.256
परंतु नित्य और अनित्य वे धर्म हैं,
कोई द्रव्य अपेक्षित, कोई पर्याय अपेक्षित।

00:08:20.280 --> 00:08:28.964
एक-अनेक नित्य-अनित्य आदि, 
परंतु उसकी पर्याय नहीं होती।
धर्म की पर्याय नहीं होती, गुण की पर्याय होती है, इसप्रकार।

00:08:28.989 --> 00:08:37.816
ऐसे गुण अनंत और धर्म भी अनंत,
उनसे सहित है एक-एक पदार्थ। आगे।

00:08:37.840 --> 00:08:41.816
<b>एक-एक गुण और एक-एक धर्म प्रति</b>

00:08:41.841 --> 00:08:49.407
एक-एक गुण को जाननेवाला एक-एक नय और
एक-एक धर्म को जाननेवाला भी एक-एक नय, अलग-अलग।

00:08:49.432 --> 00:08:55.499
गुण अनंत, तो एक-एक गुण को जाननेवाला
एक-एक नय, तो अनंत नय हो गये।

00:08:55.524 --> 00:09:01.301
धर्म अनंत, तो एक-एक धर्म को जाननेवाला
एक-एक नय, तो अनंत नय हो गये।

00:09:01.326 --> 00:09:09.924
सामने विषय अनंत तो उसे विषय करनेवाले
नय भी अनंत हैं, इसप्रकार। आहाहा!

00:09:09.949 --> 00:09:14.649
<b>एक-एक गुण और एक-एक धर्म प्रति
अनंत नय परिणमते हैं;</b>

00:09:14.674 --> 00:09:23.510
अर्थात् अनंत नय, अनंत गुण और
अनंत धर्म को जानते हैं। इतना
ज्ञेय-ज्ञायक (का) उसके साथ व्यवहार है।

00:09:23.535 --> 00:09:39.176
<b>इसलिये उस पंथ से</b>, <b>इसलिये उस पंथ से
पदार्थ का निर्णय करना चाहें</b> अर्थात् कि
अनुभव करना चाहें <b>तो होता नहीं।</b>

00:09:39.200 --> 00:09:46.914
एक-एक नय के द्वारा एक-एक गुण को जानो,
एक-एक नय के द्वारा एक-एक धर्म को जानो,

00:09:46.939 --> 00:09:54.164
तो अनंतकाल चला जाये
परंतु आत्मा का अनुभव नहीं होता।

00:09:54.189 --> 00:10:04.096
<b>उसका पंथ</b> मतलब उसका मार्ग
<b>कोई दूसरा होना चाहिये।</b>
उसकी रीति कोई दूसरी होनी चाहिये।

00:10:04.120 --> 00:10:12.647
अनंत गुण और अनंत पर्याय को जानने का जो साधन
आगम में नय कहा, उससे कोई अलग साधन है।

00:10:12.672 --> 00:10:16.816
नय के द्वारा एक-एक धर्म को जानने पर
उसे विकल्प उत्पन्न होते हैं।

00:10:16.840 --> 00:10:21.701
एक को जाने (तो) दूसरा जानना रह गया,
दूसरे को जाने (तो) तीसरा जानना रह गया,

00:10:21.726 --> 00:10:28.789
तो उसमें उसे इच्छा होती है,
आकुलता उत्पन्न होती है अतः रास्ता तो दूसरा है।

00:10:28.814 --> 00:10:39.024
<b>उसका पंथ कोई दूसरा होना चाहिये।</b> 
अब दूसरा क्या पंथ है, 
रास्ता, मार्ग वह बताते हैं, पंथ या मार्ग।

00:10:39.049 --> 00:10:46.056
<b>बहुत करके इस बात को
ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं</b>,

00:10:46.080 --> 00:10:51.696
अज्ञानी नहीं जानते।
इसे इसका रास्ता क्या है?

00:10:51.720 --> 00:11:01.039
अनंत गुण और अनंत धर्म उन्हें एक समय में
कैसे जाना जा सकता है? कि एक समय में जाने जाते हैं।

00:11:01.064 --> 00:11:08.955
नय के द्वारा अनंत समय जाये तो भी पूरा नहीं होगा! 
क्योंकि अनंत गुण और 
अनंत (धर्म है इसलिए अनंत) नय (है)।

00:11:08.980 --> 00:11:14.736
काल अनंत चला जाये एक-एक समय करके
तो जानने में नहीं आयेगा। उसका पंथ कोई अलग है।

00:11:14.760 --> 00:11:22.647
इन्द्रियज्ञान से जानने में नहीं आयेगा, नयज्ञान से।
नयज्ञान कहो या इन्द्रियज्ञान
कहो (या) मानसिक ज्ञान कहो।

00:11:22.672 --> 00:11:34.296
<b>बहुत करके इस बात को ज्ञानी पुरुष ही
जानते हैं; और वे नयादिक मार्ग के प्रति</b>,

00:11:34.320 --> 00:11:41.136
इस नय से ऐसा है और इस नय से ऐसा है
आत्मा, इसप्रकार <b>नयादिक मार्ग के प्रति</b>।

00:11:41.160 --> 00:11:47.696
(उसमें) नय-निक्षेप-प्रमाण सब ले लेना,
विकल्पात्मक नय, विकल्पात्मक निक्षेप और प्रमाण।

00:11:47.720 --> 00:11:53.696
<b>नयादिक मार्ग के प्रति उदासीन वर्तते हैं;</b>
उदासीन वर्तते हैं।

00:11:53.720 --> 00:12:03.560
वे गुण अनंत हैं, अनंत धर्म हैं,
हैं परंतु उनकी उन्हें उपेक्षा वर्तती है,
उदासीन हैं उनके प्रति।

00:12:03.585 --> 00:12:06.803
क्योंकि वे (गुण और धर्म)
नय के द्वारा जाने नहीं जा सकते

00:12:06.828 --> 00:12:13.766
इसलिये नय के प्रति उदास और नय के विषय के
प्रति भी उदास हैं, उपेक्षा है उनके प्रति।

00:12:13.791 --> 00:12:19.518
और भगवान आत्मा के प्रति अपेक्षा है और
अतीन्द्रियज्ञान से एक समय में सब कुछ जानने में आता है।

00:12:19.543 --> 00:12:28.696
नय के द्वारा जो अनंतकाल जाने पर भी जानने में नहीं आता, वह अंतर्मुख
होकर अतीन्द्रियज्ञान से जहाँ आत्मा को जानता है,

00:12:28.720 --> 00:12:38.180
आत्मा का अनुभव करता है, वहाँ अनंत गुण और
अनंत धर्म एक समय में जानने में आ जाते हैं।

00:12:38.205 --> 00:12:50.668
इसलिये सविकल्प दशा में आने पर नयों के प्रति
 और नयों के विषय के प्रति उदास हैं वे। 
उपेक्षा वर्तती है, अपेक्षा नहीं है उसकी।

00:12:50.692 --> 00:12:55.896
<b>उदासीन वर्तते हैं;
जिससे किसी नय का एकांत खंडन नहीं होता</b>,

00:12:55.920 --> 00:13:02.649
नय के प्रति उदासीन हैं न, यह एकांत नय का
खंडन भी नहीं और एकांत नय का मंडन भी नहीं।

00:13:02.674 --> 00:13:19.972
नय हैं, नयों के विषय भी हैं, परंतु उसकी उपेक्षा
वर्तती है और भगवान आत्मा की अपेक्षा वर्तती है।

00:13:19.997 --> 00:13:27.272
<b>जितनी जिसकी योग्यता है, उतनी उस नय की
सत्ता ज्ञानी पुरुषों को सम्मत होती है।</b>

00:13:27.297 --> 00:13:31.072
लो, एक-एक वाक्य स्वर्णिम है।

00:13:31.097 --> 00:13:35.056
<b>उन्नीस सौ सेंतालीस में
समकित शुद्ध प्रकाश्युं रे</b>।

00:13:35.080 --> 00:13:40.016
यह सम्यग्दृष्टि होने के पश्चात्
वह नयों के प्रति उदास है।

00:13:40.041 --> 00:13:48.318
उदास अर्थात् नयों का ज्ञाता है
परंतु नय का पक्षपात नहीं है।

00:13:48.343 --> 00:13:53.224
इस नय से ही अनुभव होता है और
इस नय से ही उसका स्वरूप समझ में आता है
 ऐसा पक्षपात नहीं है।

00:13:53.249 --> 00:13:58.635
ज्ञान से जानने में आता है ऐसा कहते हैं,
नय से जानने में नहीं आता।

00:13:58.660 --> 00:14:03.197
नयज्ञान में विकल्प उत्पन्न होता है,
आकुलता उत्पन्न होती है, दुःख होता है।

00:14:03.222 --> 00:14:11.720
और आत्मज्ञान में अनाकुल आनंद भी
आता है और अनंत धर्मों और अनंत गुणों को
एक समय में जान लेता है, युगपद अक्रम से।

00:14:11.745 --> 00:14:22.393
जैसे केवली भगवान एक समय में केवलज्ञान द्वारा
अनंत अपने गुणों और अनंत धर्मों

00:14:22.426 --> 00:14:28.222
को एक समय में जानते हैं,
दो समय नहीं लगते।

00:14:28.247 --> 00:14:35.485
इसीप्रकार श्रुतज्ञानी भी जब स्वभाव के
सन्मुख होकर निर्विकल्प ध्यान में जाता है,

00:14:35.510 --> 00:14:47.718
अतीन्द्रियज्ञान द्वारा आत्मा को जानता है,
तब आत्मा में रहे हुये अनंत गुण
और अनंत धर्म एक समय में ज्ञात हो जाते हैं।

00:14:47.743 --> 00:14:54.656
एक-एक गुण को जानने जाये और
एक-एक धर्म को जानने जाये तो नय उत्पन्न होते हैं।

00:14:54.680 --> 00:14:58.964
नय उत्पन्न होने पर आत्मा का अनुभव
 नाश को प्राप्त होता है।

00:14:58.989 --> 00:15:05.930
इसीलिये (ज्ञानी) नयों के प्रति उदास हैं।
आत्मा का अनुभव करने का नय साधन नहीं है।

00:15:05.955 --> 00:15:10.007
मुमुक्षु:- एक-एक को जानने जाने पर
इन्द्रियज्ञान ही उत्पन्न होता है।
उत्तर:- उत्पन्न होता है।

00:15:10.032 --> 00:15:18.437
क्योंकि एक धर्म को जाने तो दूसरे अनंत धर्मों को
जानना रह जाता है, इच्छा उत्पन्न होती है,
इच्छा का निरोध नहीं होता।

00:15:18.462 --> 00:15:24.297
और अंतर में जाने पर, आत्मा को जानने पर
एक समय में सब ज्ञात हो जाता है,

00:15:24.322 --> 00:15:29.464
अतः जानने का कोई विषय बाकी नहीं रहा,
इसलिये इच्छा उत्पन्न नहीं होती,

00:15:29.489 --> 00:15:40.385
इसलिए अनिच्छक और अपरिग्रही कहा।
अनुभव में यह स्थिति है। आहाहा!

00:15:40.410 --> 00:15:44.718
किसी (नय) का खंडन नहीं करता,
किसी नय का मंडन नहीं करता।

00:15:44.743 --> 00:15:56.815
नयों का ज्ञाता है तथापि उदास है,
उसे साधन नहीं मानता।

00:15:56.840 --> 00:16:05.401
<b>जितनी जिसकी योग्यता है, उतनी उस
नय की सत्ता ज्ञानी पुरुषों को सम्मत होती है।</b>

00:16:05.426 --> 00:16:13.007
नयों का ज्ञाता है और नयों का जो विषय है
उसका भी ज्ञाता हो गया।

00:16:13.032 --> 00:16:23.443
नय का ज्ञाता है, नय का ज्ञाता है अर्थात्? जो
मानसिक ज्ञान है न, वह नय है, उसका ज्ञाता है।

00:16:23.468 --> 00:16:28.810
उसके प्रति भी उपेक्षा है,
उसे वह ज्ञान नहीं मानता।

00:16:28.835 --> 00:16:34.368
और उसके द्वारा जो धर्म जानने में आते हैं
उनके प्रति भी उदास है।

00:16:34.393 --> 00:16:42.536
है सबकुछ, नय भी हैं और उनके विषय हैं, अनंत
गुण हैं, अनंत धर्म हैं परंतु उदास है उनके प्रति।

00:16:42.560 --> 00:16:46.936
ज्ञान और वैराग्य दो शक्ति प्रगट हो गई हैं।

00:16:46.960 --> 00:16:51.216
ज्ञानशक्ति अर्थात् आत्मा को
अनुभवता है ज्ञानी, वह ज्ञान शक्ति।

00:16:51.240 --> 00:17:06.435
और जितने धर्म (और) गुण हैं उन्हें
जानता है तटस्थपने, तटस्थता, वीतरागता,
उसका नाम उदासीनता, कोई पक्षपात नहीं। आहाहा!

00:17:06.460 --> 00:17:16.435
<b>मार्ग जिन्हें प्राप्त नहीं हुआ ऐसे मनुष्य
'नय' का आग्रह करते हैं</b>, वे आग्रही हैं। आहाहा!

00:17:16.460 --> 00:17:20.601
वह नयों के प्रति उदास है, अनुभवी।

00:17:20.626 --> 00:17:27.468
<b>और इसीलिये विषमफल की प्राप्ति होती है,</b>
अज्ञानी जीव को। विकल्प अर्थात् दुःख होता है।

00:17:27.493 --> 00:17:30.776
<b>कोई नय जहाँ आहत नहीं होता</b>,
कहाँ से आहत हो?

00:17:30.800 --> 00:17:41.748
एक समय में अनंत गुण और अनंत धर्म, 
उन्हें विषय करनेवाला एक-एक नय, 
उन्हें एक समय में जान लिया। आहाहा!

00:17:41.772 --> 00:17:47.841
नयज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हुई, 
अतीन्द्रियज्ञान की उत्पत्ति हुई,

00:17:47.866 --> 00:17:56.114
उसमें नयों के स्वरूप को और उसके धर्मों को
जान लिया उसने अंदर जाकर। आहाहा!

00:17:56.139 --> 00:18:01.301
एक गुण के प्रति (भी) उपयोग जाता नहीं है
उसीप्रकार एक धर्म के प्रति (भी) उपयोग जाता नहीं है,

00:18:01.326 --> 00:18:16.672
धर्मी के प्रति उपयोग लगा हुआ है,
उसमें धर्म जानने में आ जाते हैं। आहाहा!

00:18:16.697 --> 00:18:23.016
एक-एक धर्म के प्रति उपयोग नहीं जाता,
एक-एक गुण भेद के प्रति उपयोग नहीं जाता। आहाहा!

00:18:23.040 --> 00:18:29.856
सामान्य के ऊपर जहाँ उपयोग लगा, वहाँ
सामान्य-विशेष समस्त पूरा ज्ञेय, अनंत गुणात्मक

00:18:29.880 --> 00:18:37.166
और अनंत धर्मात्मक पूरा ज्ञेय,
ध्येय पूर्वक ज्ञेय हो जाता है,
जानने में आ जाता है। आहाहा!

00:18:37.191 --> 00:18:42.355
ध्येय का ध्यान और ज्ञेय का ज्ञान,
समय एक।

00:18:42.380 --> 00:18:51.466
ज्ञेय अर्थात् अंदर का यह आत्मा ज्ञेय,
ये छह द्रव्य ज्ञेय नहीं हैं, छह द्रव्य ज्ञेय नहीं हैं।

00:18:51.491 --> 00:18:57.574
छह द्रव्य ध्येय भी नहीं हैं और
छह द्रव्य ज्ञेय भी नहीं हैं। आहाहा!

00:18:57.599 --> 00:19:05.693
यह तो निर्विकल्प ध्यान में जाता है आत्मा,
तब सामान्य आत्मा ध्येय होता है।

00:19:05.718 --> 00:19:12.393
सामान्य-विशेष पूरा आत्मा अनंत गुण का पिंड
और अनंत धर्मों का पिंड (जानने में आ जाता है)।

00:19:12.418 --> 00:19:21.943
धर्म भी जिस प्रकार, जिस समय, जिस पर्याय के,
जहाँ जैसे हैं वैसे जान लेता है।

00:19:21.968 --> 00:19:29.168
अधूरी पर्याय का धर्म है तो अधूरी पर्यायपने
जानता है वह, परंतु उसके प्रति लक्ष नहीं है।

00:19:29.193 --> 00:19:38.289
यह बात कोई अपूर्व है, अपूर्व है।
समझ गये? आहाहा!

00:19:38.314 --> 00:19:47.674
निर्विकल्प ध्यान की बात, 
सविकल्प में आकर ये धर्मात्मा कहते हैं। 
एकावतरी पुरुष हो गये।

00:19:47.699 --> 00:19:52.136
१९४७ के वर्ष का है यह।
उस वर्ष में उन्हें अनुभव हुआ।

00:19:52.160 --> 00:19:56.776
अनुभव पश्चात् की यह बात है,
कि नयों का ज्ञाता, दो नयों का ज्ञाता है।

00:19:56.800 --> 00:20:10.896
(यह) आ गया है अपनी (चर्चा में) कल दो नयों में,
फिर अनंत नय आ गये। आहाहा!

00:20:10.920 --> 00:20:17.101
<b>कोई नय जहाँ आहत नहीं होता</b>
अर्थात् खंडन-मंडन नहीं है। नयों का ज्ञाता हो गया।

00:20:17.126 --> 00:20:22.296
<b>ऐसे</b> <b>ज्ञानी के वचन को
हम नमस्कार करते हैं।</b> आहाहा!

00:20:22.320 --> 00:20:30.960
नयों का ज्ञाता हुआ है, नय का पक्षपात नहीं है।
पक्षपात नहीं है, नय का ज्ञाता है। आहाहा!

00:20:30.984 --> 00:20:40.301
नय का ज्ञाता है परंतु 
नय सन्मुख होकर नहीं,
यह खूबी है।

00:20:40.326 --> 00:20:45.066
एक-एक नय तो खंडज्ञान है, 
उसके सन्मुख नहीं है।

00:20:45.091 --> 00:20:54.130
<b>जिसने ज्ञानी के मार्ग की इच्छा की हो, 
ऐसे प्राणी को</b> अर्थात् जिसे ज्ञानी होना हो
 <b>ऐसे प्राणी को</b>

00:20:54.155 --> 00:21:00.397
<b>नयादिक में उदासीन रहने का
अभ्यास करना</b>। नय का पक्षपात छोड़ देना।

00:21:00.422 --> 00:21:08.468
नय हैं, एक-एक नय एक-एक धर्म को
विषय करता है। ठीक है, बस! आहाहा!

00:21:08.493 --> 00:21:22.153
परंतु एक-एक गुण और एक-एक धर्म के प्रति
 मुड़कर उसे मैं जानूँ, 
यह मेरा स्वभाव नहीं है। आहाहा!

00:21:22.178 --> 00:21:26.274
<b>ऐसे प्राणी को नयादिक में उदासीन</b>
(अर्थात्) नय, निक्षेप और प्रमाण,

00:21:26.299 --> 00:21:31.441
उसमें उदासीन होना चाहिये, रहना चाहिये।
उसे साधन नहीं मानना।

00:21:31.466 --> 00:21:41.336
<b>रहने का अभ्यास करना;
किसी नय में आग्रह करना नहीं और 
किसी प्राणी को उसके द्वारा आहत करना नहीं</b>।

00:21:41.360 --> 00:21:47.449
उस नय से जो स्वरूप कहा हो
वह स्वरूप समझकर उसके प्रति उदास होकर

00:21:47.474 --> 00:21:51.982
और उस धर्म का लक्ष छोड़कर धर्मी को जानो, बस!

00:21:52.007 --> 00:21:55.697
धर्म का लक्ष छोड़कर (धर्मी को जानो)। आहाहा!

00:21:55.722 --> 00:22:03.656
अर्थात् धर्म रखा, धर्म का लक्ष छुड़ाया
और धर्मी का लक्ष कराया, और
धर्मी का लक्ष होने पर धर्मों का ज्ञान हो गया।

00:22:03.680 --> 00:22:15.235
धर्मों के सन्मुख हुये बिना,
धर्मों के सन्मुख हुये बिना
धर्मों का ज्ञान धर्मी के आश्रय से होता है। आहाहा!

00:22:15.260 --> 00:22:24.070
जैसे, आता है दृष्टांत, ठंडाई होती है न,
ठंडाई कहते हैं न? ठंडाई में तो बहुत सी वस्तुएँ
होती हैं, इलायची, केसर, बादाम आदि।

00:22:24.095 --> 00:22:28.103
तो वह पीयें तो १०० चीज डाली हों,
तो १०० (चीज) का उसमें ज्ञान हो जाता है।

00:22:28.128 --> 00:22:34.936
स्वाद सभी का आता है, परंतु वह यदि स्वाद के समय
विचार करने जाये, कि (यह) इलायची का स्वाद

00:22:34.960 --> 00:22:43.856
और (यह) केसर का स्वाद, तो उसमें अनुभव नहीं आयेगा।
परंतु अनुभव में सब आ जाता है। आहाहा!

00:22:43.880 --> 00:22:47.216
१०० हैं, उनके प्रति, 
एक-एक धर्म के प्रति ज्ञान नहीं मुड़ता।

00:22:47.240 --> 00:22:55.991
मुमुक्षु:- नहीं-नहीं, उसका लक्ष नहीं है।
उत्तर:- लक्ष नहीं है तो स्वाद लेता होगा?
(नहीं, अभेद का) स्वाद लेता है वह तो बस!

00:22:56.016 --> 00:23:00.012
अतीन्द्रियज्ञान और आनंद के
स्वाद में पड़ा है, सब कुछ जानने में आ जाता है।

00:23:00.037 --> 00:23:07.776
सब कुछ जानने में आ जाता है,
जानता नहीं है परंतु जानने में आ जाता है।

00:23:07.800 --> 00:23:12.543
<b>ऐसे प्राणी को नयादिक में उदासीन रहने का
अभ्यास करना; किसी नय में आग्रह करना नहीं</b>

00:23:12.568 --> 00:23:20.536
<b>और किसी प्राणी को उसके द्वारा आहत करना नहीं,
और यह आग्रह जिसे मिटा है,</b> आहाहा!

00:23:20.560 --> 00:23:25.776
आग्रह मिटा (अर्थात्) नय का पक्षपात (मिटा)।
आग्रह अर्थात् पक्षपात।

00:23:25.801 --> 00:23:36.936
<b>मिटा है, वह किसी प्रकार भी प्राणी को
आहत करने की इच्छा करता नहीं।</b> चलो आगे।

00:23:36.960 --> 00:23:44.696
मुमुक्षु:- <b>आगम का मर्म ज्ञानी के हृदय में होता है।
श्री पंचाध्यायीकार ने भी कहा है कि,</b>

00:23:44.720 --> 00:23:53.457
<b>निश्चयनयावलंबी भी मिथ्यादृष्टि है,
इस बात का रहस्य महनीय गुरु ही समझा सकते हैं,</b>

00:23:53.482 --> 00:24:02.224
<b>इस बात का धन्य पल में हुई 
पूज्य भाईश्री के श्रीमुख से हुई चर्चा द्वारा
 प्रत्यक्ष अनुभव होता है।</b>

00:24:02.249 --> 00:24:11.312
<b>जो अति निकट भव्य जीव 
इन परम वीतरागतामयी उत्तम वचनों को 
शिरोधार्य करेगा और हृदय में धारण करेगा</b>

00:24:11.337 --> 00:24:18.993
<b>वह अवश्यमेव पक्षातिक्रांत होकर
साक्षात् ज्ञाता होकर परमानंद का अनुभव करेगा</b>

00:24:19.018 --> 00:24:29.656
<b>और अल्पकाल में पूर्णानंदमयी मुक्ति का
महापात्र होगा। भरतकुमार खीमचंद सेठ, राजकोट।</b>

00:24:29.680 --> 00:24:36.387
उत्तर:- अब आगे।
मुमुक्षु:- <b>'द्रव्यस्वभाव'।</b>

00:24:36.412 --> 00:24:41.016
उत्तर:- यहाँ तक तो प्रस्तावना
हो गई। क्या आनेवाला है इसमें,

00:24:41.040 --> 00:24:47.616
उसकी भूमिका- क्षेत्र-विशुद्धि। 
अर्थात् वह यदि ख्याल में आयेगा 
तो आगे (का) ख्याल में आयेगा।

00:24:47.640 --> 00:24:51.555
नहीं तो वह ख्याल में (नहीं आयेगा),
उसे प्रवेशद्वार कहा न?

00:24:51.580 --> 00:24:59.948
इसमें प्रवेश करने का एक द्वार कहा,
क्षेत्र-विशुद्धि। आहाहा!

00:24:59.972 --> 00:25:15.957
उसमें श्रीमद् का वाक्य बहुत सुंदर! आहाहा! 
ज्ञानी नयों के प्रति उदास है, नय का आग्रह नहीं है

00:25:15.982 --> 00:25:24.536
अर्थात् इन्द्रियज्ञान का आग्रह नहीं है,
मानसिक ज्ञान का आग्रह नहीं है,
खंडज्ञान का आग्रह नहीं है।

00:25:24.560 --> 00:25:33.976
नय है वह खंडज्ञान है।
नयज्ञान है न, वह खंडज्ञान है।
(वह) एक-एक धर्म को विषय करता है।

00:25:34.001 --> 00:25:45.526
एक नय एक धर्म को विषय करता है,
एक नय सभी धर्मों को विषय नहीं कर सकता,
आवृत नहीं कर सकता सभी धर्मों को। आहाहा!

00:25:45.551 --> 00:25:56.296
और अतीन्द्रियज्ञान?
एक समय में आवृत कर लेता है,
कुछ जानना बाकी नहीं रहता।

00:25:56.320 --> 00:26:03.597
खंडज्ञान और अखंडज्ञान में बड़ा अंतर है।
नयज्ञान में और अतीन्द्रियज्ञान में बड़ा अंतर है।

00:26:03.622 --> 00:26:11.201
नय का विषय एक-एक है, ज्ञान का विषय अनंत है।
एक समय में कवलित कर जाता है ज्ञान।

00:26:11.226 --> 00:26:15.136
ध्येय पूर्वक ज्ञेय होता है न,
कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता।

00:26:15.160 --> 00:26:28.496
और स्वयं की जिस प्रकार से योग्यता
 वर्तमान में धर्मों की चल रही है, 
उन धर्मों को भी जान लेता है।

00:26:28.520 --> 00:26:36.415
अबद्ध को भी जानता है और बद्ध को भी जानता है,
अकर्ता को जानता है और कर्ता को (भी) जानता है,
सबको जानता है।

00:26:36.440 --> 00:26:45.480
धर्म हैं न? कर्ता-भोक्ता धर्म हैं।

00:26:45.505 --> 00:26:49.296
यह ऐसे योग्यता अनुसार
जैसी जिसकी योग्यता हो धर्मों की...

00:26:49.320 --> 00:26:51.416
मुमुक्षु:- वे सभी सम्मत होती हैं।
उत्तर:- हाँ, सम्मत।

00:26:51.440 --> 00:26:56.936
मुमुक्षु:- जिस प्रकार से हो उस प्रकार से।
उत्तर:- उस प्रकार से ज्ञान में
स्वीकार है उसे। आहाहा!

00:26:56.960 --> 00:27:13.400
अपूर्णता है, वह अपूर्णता धर्म को जानता है
और द्रव्य का पूर्ण धर्म है,
उसे भी जानता है, एक समय में।

00:27:13.424 --> 00:27:19.612
द्रव्यदृष्टि से पूर्ण हूँ और
पर्याय धर्म से देखने पर मैं अपूर्ण हूँ। आहाहा!

00:27:19.637 --> 00:27:27.476
द्रव्य से देखने पर आनंद का कंद हूँ
 और पर्याय धर्म से देखने पर 
थोड़ा आनंद है और थोड़ा दुःख भी है।

00:27:27.501 --> 00:27:32.343
उसकी तरफ लक्ष नहीं है, जानने में आ जाता है।

00:27:32.368 --> 00:27:46.376
कोई अचिंत्य, निर्विकल्पध्यान के काल में
इसप्रकार ज्ञेय होता है वह अचिंत्य बात है।

00:27:46.400 --> 00:28:00.751
अर्थात् ज्ञान सच्चा रहता है,
पर्याय में सिद्ध हो गया 
ऐसा नहीं जानता साधक। आहाहा!

00:28:00.785 --> 00:28:10.296
पर्याय में अपूर्णता है, तो अपूर्ण है
वह धर्म है, वह पर्याय का धर्म है,
वह पर्याय ने धर्म धारण करके रखा है, अपूर्णता।

00:28:10.320 --> 00:28:14.247
थोड़ी वीतरागता और थोड़ा राग,
वे पर्याय के धर्म हैं।

00:28:14.272 --> 00:28:22.770
पर्याय के जैसे धर्म हैं उन्हें ज्ञान जानता है।

00:28:22.795 --> 00:28:25.303
धर्म अलग चीज और गुण अलग चीज।

00:28:25.328 --> 00:28:31.696
गुण में राग नहीं होता।
पर्याय में वीतरागभाव और पर्याय में राग होता है।

00:28:31.720 --> 00:28:36.980
समयवर्ती पर्याय है, गुण त्रिकालवर्ती है।

00:28:37.005 --> 00:28:43.201
सबकुछ आ गया, अनंत गुण और अनंत पर्याय,
आ गया सब। सबकुछ ले लिया। आहाहा!

00:28:43.226 --> 00:28:52.264
नयों के प्रति उदास है। किसी नय का 
एकांत खंडन या किसी (नय का) एकांत मंडन,
 ज्ञानी करता नहीं है। आहाहा!

00:28:52.289 --> 00:29:05.847
क्योंकि नय में कथंचित् है।
कथंचित् का ज्ञाता है। आहाहा!

00:29:05.872 --> 00:29:11.936
नयों का ज्ञाता है। दो नयों का ज्ञाता है परंतु
किसी (नय का) पक्षपात ग्रहण नहीं करता।

00:29:11.960 --> 00:29:23.576
आग्रह नहीं है उसे, मध्यस्थ है,
उदासीन है अर्थात् मध्यस्थ है।
राग रहित का ज्ञान है वह।

00:29:23.600 --> 00:29:32.151
अतीन्द्रियज्ञान है न?
वह राग रहित का ज्ञान है।

00:29:32.176 --> 00:29:36.736
यह तो स्वयं जरा स्थिर मन से
विचार करे न तो बैठे ऐसा है।

00:29:36.760 --> 00:29:51.456
वरना है अच्छा, श्रीमद्जी का बहुत अच्छा।
१९४७ का है, बोलो!

00:29:51.480 --> 00:29:57.735
जिस वर्ष में सम्यग्दर्शन हुआ उस वर्ष में
उन्होंने लिखा, नयातिक्रांत होकर लिखा।

00:29:57.760 --> 00:30:09.792
मुमुक्षु:- वह ही लिख सकता है न?
उत्तर:- ढूंढ-ढूंढकर
सब इसमें (रखा है)। आहाहा!