﻿WEBVTT LA408

00:01:17.760 --> 00:01:23.856
मुमुक्षु:- द्रव्य स्वभाव।
उत्तर:- इस पुस्तक का नाम
<b>द्रव्य स्वभाव</b> और <b>पर्याय स्वभाव</b>।

00:01:23.880 --> 00:01:28.936
दो विभाग हैं इसमें। उसमें से पहले
विभाग का वांचन अभी चल रहा है।

00:01:28.960 --> 00:01:34.380
पहला विभाग, दूसरा विभाग बाद में आयेगा।

00:01:34.400 --> 00:01:39.296
मुमुक्षु:- <b>एक द्रव्य स्वभाव
और एक पर्याय स्वभाव। </b>

00:01:39.840 --> 00:01:46.900
<b>दोनों स्वभाव से ही जैसे हैं वैसे हैं।</b>

00:01:46.920 --> 00:01:55.220
<b>द्रव्य स्वभाव खुद के अपने स्वभाव से ही
अनादि-अनंत जैसा है वैसा है।</b>

00:01:55.240 --> 00:02:02.596
<b>और ज्ञान की पर्याय का स्वभाव
अनादि-अनंत जैसा है वैसा है।</b>

00:02:02.600 --> 00:02:09.940
उत्तर:- एक द्रव्य स्वभाव लिया
क्योंकि आत्मा ज्ञानमय है।

00:02:10.960 --> 00:02:16.620
अर्थात् ज्ञानमय आत्मा वह द्रव्य का अपना
स्वभाव है और उसकी पर्याय में ज्ञान होता है।

00:02:16.640 --> 00:02:27.260
उस ज्ञान की पर्याय का भी अनादि-अनंत
जैसा है वैसा अपना स्वभाव है, ऐसे।

00:02:27.280 --> 00:02:33.140
मुमुक्षु:- <b>शास्त्र में अनेक प्रकार के कथन आयेंगे।</b>

00:02:33.160 --> 00:02:42.896
<b>जैसे कि आत्मा अशुद्ध निश्चयनय से राग का कर्ता
है और निश्चयनय से वीतरागभाव का कर्ता है।</b>

00:02:42.920 --> 00:02:58.620
<b>भाई! ये सभी व्यवहारनय के कथन हैं,
उनको उल्लंघ जा - आत्मा राग को नहीं करता
और वीतरागभाव को भी नहीं करता।</b>

00:02:58.640 --> 00:03:03.740
<b>आत्मा तो स्वभाव से ही अनादि-अनंत 
अकारकअवेदक है। </b>

00:03:03.760 --> 00:03:09.536
उत्तर:- जिसकी दृष्टि पर्याय के ऊपर है
उसे यह वाक्य ख्याल में नहीं आयेगा।

00:03:09.560 --> 00:03:17.980
यह त्रिकाली द्रव्य स्वभाव की बात चलती है।
Agenda (ऐजंडा, कार्यसूची) के ऊपर अभी क्या विषय है
वह उसे लक्ष में लेना चाहिए।

00:03:18.000 --> 00:03:24.420
मुमुक्षु:- द्रव्य स्वभाव।
उत्तर:- द्रव्य स्वभाव अनादि-अनंत
टंकोत्कीर्ण एक ज्ञायक जो भाव है,

00:03:24.440 --> 00:03:34.320
एक ज्ञायक भाव अनादि-अनंत, नित्य,
निरावरण-अखंड-एक-प्रत्यक्षप्रतिभासमय,
भगवान जो आत्मा - द्रव्य स्वभाव।

00:03:34.340 --> 00:03:45.376
सभी आत्माओं का ऐसा स्वभाव है, इसप्रकार!
वह ख्याल में रखे तो
द्रव्य स्वभाव ख्याल में आये। आहाहा!

00:03:45.400 --> 00:03:52.496
द्रव्य का स्वभाव, स्वभाव से ही अकारक-अवेदक है।

00:03:52.520 --> 00:03:57.536
राग को भी नहीं करता और
वीतरागभाव को भी नहीं करता।

00:03:57.560 --> 00:04:03.980
दुःख को भी नहीं भोगता
और आनंद को भी नहीं भोगता।

00:04:04.000 --> 00:04:14.096
कर्ता और भोक्तापना पर्याय का धर्म है।
अकारक और अवेदक द्रव्य का धर्म है,
द्रव्य का स्वभाव है।

00:04:14.120 --> 00:04:22.000
दो विभाग अलग-अलग हैं।
अभी बात चलती है द्रव्य स्वभाव की।

00:04:22.000 --> 00:04:35.176
पर्याय दृष्टि को गौण करना।
पर्याय है, उसे सिद्ध करनेवाला जो ज्ञान है,
उसे बंद कर देना अभी।

00:04:35.200 --> 00:04:50.776
और पर्याय से भिन्न जो
भगवान आत्मा अनादि-अनंत कैसा है,
यह उसकी बात चलती है, द्रव्य का स्वभाव।

00:04:50.800 --> 00:05:00.900
आत्मा राग को करता है और वीतरागभाव को करता है
वह द्रव्य का विभाव हो गया।

00:05:00.920 --> 00:05:09.140
क्या कहा? 'करता है' ऐसा आया न?

00:05:09.160 --> 00:05:18.496
अकर्ता को कर्ता कहना, वह विभाव हो गया न?
मुमुक्षु:- सही है।

00:05:18.520 --> 00:05:22.896
उत्तर:- नीलम, हुआ कि नहीं?
मुमुक्षु:- सही है, विभाव हुआ न।
अकर्ता को कर्ता कहना, विभाव हुआ।

00:05:22.920 --> 00:05:38.500
मुमुक्षु:- सही है हों। अकारक, अवेदक।
उत्तर:- उसे कर्ता-भोक्ता कहना वह
विभाव और कर्ता-भोक्ता मानना वह मिथ्यात्व।

00:05:38.520 --> 00:05:51.416
है अकर्ता और अभोक्ता, और मानता है कि
मैं इस परिणाम को करता हूं और भोगता हूं,
ऐसी मान्यता मिथ्यादृष्टि की है। आहाहा!

00:05:51.440 --> 00:06:02.140
यह तो त्रिकाली स्वभाव,
जीवतत्त्व का क्या स्वरूप है मूल?
वह बताते हैं।

00:06:02.160 --> 00:06:09.016
इसके ऊपर नजर जाये तो काम हो!
अकर्ता को कर्ता मानता है ...

00:06:09.040 --> 00:06:14.836
<b>चर्चा-२</b>

00:06:14.860 --> 00:06:26.096
निगोद में दुःख को नहीं भोगता आत्मा,
अभी भी हों! अभी की बात है।
और भगवान महावीर सुख को नहीं भोगते हैं!

00:06:26.120 --> 00:06:34.656
सुख को नहीं भोगते तो क्या दुःख को भोगते हैं?
अब रहने दे भाई! तू टेढ़ापन की बात मत कर, बापू!

00:06:34.680 --> 00:06:39.776
यह तो कोई ऊँचे प्रकार की बात है। शांति से। आहाहा!

00:06:39.800 --> 00:06:47.856
यह किस अपेक्षा से कथन चलता है?
यह स्वभाव की अपेक्षा से कथन चलता है।

00:06:47.880 --> 00:06:58.200
नय की विवक्षा अभी गौण है,
गौण है और अनुभव के काल में उसका अभाव है।

00:06:58.200 --> 00:07:06.016
क्या कहा? समझने के काल में,
द्रव्य स्वभाव जब समझाने में आता है
तब नय के कथन गौण हो जाते हैं।

00:07:06.040 --> 00:07:11.216
परंतु साक्षात् अनुभव करता है तब
कोई नय नहीं रहता। आयेगी यह बात।

00:07:11.240 --> 00:07:18.660
नयों की लक्ष्मी उदय को प्राप्त नहीं होती।
सब आयेगा, इसमें है।

00:07:18.660 --> 00:07:24.216
मुमुक्षु:- पच्चीस वर्ष तक
अकर्ता समझाया है आपने।
उत्तर:- हाँ, मैंने समझाया।

00:07:24.240 --> 00:07:26.096
मुमुक्षु:- आपने समझाया।
उत्तर:- सही है।

00:07:26.120 --> 00:07:31.660
मुमुक्षु:- उसके पश्चात् बहुत गहरे मंथन में से
यह बात आयी है।
उत्तर:- आती है, बिल्कुल सही है।

00:07:31.680 --> 00:07:41.536
मुमुक्षु:- उसके बाद का स्टेप, अब आया है।
उत्तर:- आ तो गया था पहले ही, परंतु भाई
ऐसा है न काल पकता है तब बाहर आता है।

00:07:41.560 --> 00:07:43.936
और यह भी आगे बढ़ता नहीं था।

00:07:43.960 --> 00:07:47.656
बहन को मैंने कहा, मैंने कहा कि भाई!
यह बात सूक्ष्म है

00:07:47.680 --> 00:07:57.740
और यह बात इतनी प्रचलित बाहर आयी नहीं है
और हमें यह बात बाहर रखनी। आहाहा!

00:07:57.760 --> 00:08:00.336
बहन ने कहा, यह बात तो रखने जैसी है।

00:08:00.360 --> 00:08:12.500
और यह शास्त्रों में है।
यह बात बीस कलश में ली है।
शास्त्र का आधार भी अभी आयेगा। आहाहा!

00:08:12.520 --> 00:08:25.336
'नयातिक्रांत बताया वह समय का सार है',
नय से आत्मा का अनुभव नहीं होता।
अनुभव के काल में नय नहीं रहते। आहाहा!

00:08:25.360 --> 00:08:30.136
'नयों की लक्ष्मी उदय को प्राप्त नहीं होती'।
निश्चयनय और व्यवहारनय,

00:08:30.160 --> 00:08:34.576
दो प्रकार के जो विकल्प थे नय के,
वे उदय को प्राप्त (नहीं) होते।

00:08:34.600 --> 00:08:46.340
प्रमाण अस्त हो जाता है, प्रमाण का विकल्प।
और निक्षेप कहाँ चले जाते हैं,
हम नहीं जानते। आहाहा!

00:08:46.360 --> 00:08:54.856
यह तो किनारे तक आया है और रह न जाये,
और अनुभव हो जाये (ऐसी बात है)। आहाहा!

00:08:54.880 --> 00:09:05.576
दूध तो कढ़ा हुआ है, अब सिर्फ जामन डाले
तो दही जम जाये और फिर
उसमें मक्खन हो, छाछ निकल जाये।

00:09:05.600 --> 00:09:10.736
मक्खन में से कचरा-मैल निकल जाये,
और घी बन जाये। आहाहा!

00:09:10.760 --> 00:09:15.896
छाछ निकल जाती है,
फिर माखन में से मैल निकल जाता है,

00:09:15.920 --> 00:09:20.696
गाध (मैल) निकल जाती है।
और अकेला शुद्ध घी (रह जाता है)। आहाहा!

00:09:20.720 --> 00:09:39.080
सौ टंच का शुद्ध,
कोई वेजीटेबल (घी) इसमें मिक्स नहीं है।
ऐसी बात है।

00:09:39.100 --> 00:09:43.456
<b>न्याय:- यदि निश्चयनय से आत्मा अकर्ता है
ऐसा तुम लक्ष में लोगे,</b>

00:09:43.480 --> 00:09:49.176
<b>तो आत्मा व्यवहारनय से कर्ता है,
वह शल्य आये बिना रहेगा ही नहीं।</b>

00:09:49.200 --> 00:09:55.416
<b>इसलिये नय से विचार ही मत करो,</b>
अब, अब <b>वस्तु नयातीत है।</b>

00:09:55.440 --> 00:10:02.896
वस्तु जो है, द्रव्य का स्वभाव
वह नयातीत है। आहाहा!

00:10:02.920 --> 00:10:10.776
उसमें नय नहीं हैं और
उसे प्रसिद्ध करनेवाला ज्ञान,
उसमें भी नय नहीं हैं।

00:10:10.800 --> 00:10:20.960
नय तो मानसिक ज्ञान का धर्म है।
वह इन्द्रियज्ञान का धर्म है, नय।
विकल्पवाले नय हैं ये।

00:10:20.980 --> 00:10:26.816
<b>द्रव्य स्वभाव नय से ख्याल में नहीं आता।
अनुभव में नहीं आता।</b>

00:10:26.840 --> 00:10:40.580
<b>क्योंकि किसी नय से अकर्ता है-ऐसा नहीं है,
स्वभाव से ही अकर्ता है।</b>
अनादि-अनंत। आहाहा!

00:10:40.600 --> 00:10:44.480
किसी को नय का ज्ञान न हो
तो भी अनुभव हो जाता है।

00:10:44.500 --> 00:10:52.016
निश्चयनय से अकर्ता है,
यह सुना भी ना हो और
अनुभव हो जाता है।

00:10:52.040 --> 00:10:59.360
और 'निश्चयनय से अकर्ता है'
वह सुनने के बाद अनुभव अटकता है।

00:10:59.380 --> 00:11:03.040
नहीं होता ऐसा नहीं कहा, अटकता है।

00:11:03.060 --> 00:11:24.860
वह नय छूट जाये तो अनुभव हो जाता है।
एक-एक वाक्य रहस्यमय है।

00:11:24.880 --> 00:11:27.616
<b>यह तो जो बिल्कुल अनजान शिष्य है,</b>

00:11:27.640 --> 00:11:35.700
<b>जिसे आत्मा त्रिकाल अकर्ता होने पर भी
कर्ताबुद्धि हो गई है, उसे व्यवहारनय और</b>
निश्चयनय के द्वारा

00:11:35.720 --> 00:11:51.060
<b>निश्चयनय से समझाते हैं। परंतु अब इस समय
ऐसा काल आया है कि आत्मा
निश्चयनय से अकर्ता है - ऐसा छोड़ दो। </b>

00:11:51.080 --> 00:12:00.536
नय के विकल्प अब छोड़ो। आहाहा!
निश्चयनय से अकर्ता- निश्चयनय से अकर्ता है,
परंतु उससे क्या?

00:12:00.560 --> 00:12:10.976
निश्चयनय से अकर्ता हूँ- वह तेरा विकल्प सच्चा
है, विकल्प झूठा नहीं है, परंतु उससे क्या?
आहाहा!

00:12:11.000 --> 00:12:18.580
उसमें आत्मा का आनंद नहीं आता,
इसीलिए नय को छोड़ दे, स्वभाव के समीप जा।

00:12:18.600 --> 00:12:27.780
<b>क्योंकि - यदि निश्चयनय से आत्मा अकर्ता है
ऐसा तुम लोगे तो दूसरा प्रतिपक्ष नय
तुम्हारे ज्ञान में खड़ा होगा।</b>

00:12:27.800 --> 00:12:36.616
क्योंकि नय सापेक्ष है
<b>निरपेक्षा नया मिथ्या</b>
और सापेक्ष नय सम्यक् कहलाता है,

00:12:36.640 --> 00:12:42.376
परस्पर सापेक्ष, निश्चयनय से इसप्रकार
और व्यवहारनय से इसप्रकार। आहाहा!

00:12:42.400 --> 00:12:47.936
कहते हैं <b>प्रतिपक्ष नय तुम्हारे ज्ञान में
खड़ा होगा और मिथ्यात्व रहेगा।</b>

00:12:47.960 --> 00:12:57.740
<b>परंतु स्वभाव से देखो तो
किसी नय की अपेक्षा ही नहीं है। </b> आहाहा!

00:12:57.760 --> 00:13:07.256
थोड़ा सूक्ष्म तो है।
आशीष कहता है कि इसमें हमें
कुछ दिमाग में उतरता नहीं है।

00:13:07.280 --> 00:13:16.656
यह नय का स्वरूप ही ख्याल में नहीं आता कि
निश्चयनय क्या और व्यवहारनय क्या?
फिर कल लिया था थोड़ा उसके लिए। आहाहा!

00:13:16.680 --> 00:13:24.580
<b>जैसे कि, </b> अब दृष्टांत देने में आता है।
दृष्टांत से ज्यादा समझ में आता है।

00:13:24.600 --> 00:13:36.616
<b>जैसे कि अग्नि उष्ण है। किस नय से?</b>
आहाहा! कोई कहे अग्नि उष्ण है।

00:13:36.640 --> 00:13:48.620
ज्ञानी ने कहा अग्नि उष्ण है,
तो शिष्य कहता है, साहेब किस नय से उष्ण है?
आहाहा!

00:13:48.640 --> 00:13:54.216
श्रीगुरु ने कहा अग्नि उष्ण है।
कि साहेब, किस नय से उष्ण है?

00:13:54.240 --> 00:14:03.896
ऐसी एक घटना बन गई।
ऐसी घटना हुई कि
थोड़े शिष्य अभ्यास करने के लिये आते थे।

00:14:03.920 --> 00:14:16.976
एक बार गुरु ने कहा कि पहले
'अग्नि लकड़ी को जलाती है
उसे अग्नि कहा जाता है'।

00:14:17.000 --> 00:14:21.496
दूसरे दिन दूसरा पाठ दिया,
'अग्नि उष्ण है'।

00:14:21.520 --> 00:14:26.776
वह, पहले दिन का वह पाठ तो निकल गया।
अग्नि उष्ण है।

00:14:26.800 --> 00:14:30.656
फिर तीसरे दिन ऐसा कहा-
अग्नि तो अग्नि है।

00:14:30.680 --> 00:14:38.416
इसप्रकार तीन पाठ दिये।
चौथे दिन उनका परीक्षा करने का मन हुआ।
एक शिष्य को भेजा।

00:14:38.440 --> 00:14:47.896
बराबर के कमरे में, अंगीठी एकदम लाल, कोयले की,
लकड़ी की, एकदम अंगारे लाल एकदम, हों!

00:14:47.920 --> 00:14:57.296
धुंआ नहीं था उसमें, लकड़ी भी नहीं थी।
उसे भेजा अंदर,
देख कि अंदर अग्नि है या नहीं?

00:14:57.320 --> 00:14:59.816
लकड़ी को जलाती है वह अग्नि,
लकड़ी को जलाती है वह अग्नि,

00:14:59.840 --> 00:15:04.576
लकड़ी को जलाती है वह अग्नि,
लकड़ी को जलाती है वह अग्नि,
समझे? वह ऐसा याद करते-करते गया।

00:15:04.600 --> 00:15:08.948
सिद्धांत में, ज्ञेय को जाने वह ज्ञान,
ज्ञेय को जाने वह ज्ञान,

00:15:08.972 --> 00:15:17.320
ज्ञेय को जाने वह ज्ञान,
सिद्धांत में ऐसा आयेगा।

00:15:17.340 --> 00:15:29.300
ऐसा शल्य (घुस) गया था, शल्य घुस गया था,
आया बाहर, गुरुजी वहाँ अग्नि नहीं है।

00:15:29.320 --> 00:15:39.056
क्यों अग्नि नहीं है? कारण पूछा।
कि लकड़ी को नहीं जला रही थी, आपने ही समझाया था।
ठीक है बैठ जाओ, सिट डाउन।

00:15:39.080 --> 00:15:45.616
दूसरे शिष्य को खड़ा किया, कि जा,
देख जाकर बराबर के कमरे में कि अग्नि है या नहीं?

00:15:45.640 --> 00:15:54.056
उष्ण वह अग्नि, उष्ण वह अग्नि, उष्ण वह अग्नि,
उष्ण वह अग्नि, उष्ण वह अग्नि।
वह पराश्रित व्यवहार, यह भेदरूप व्यवहार।

00:15:54.080 --> 00:16:00.896
अभ्यासी हों तो समझ जाते हैं।
उष्ण वह अग्नि। कि साहेब, वहाँ अग्नि नहीं है।

00:16:00.920 --> 00:16:12.016
क्यों नहीं है? उष्ण वह अग्नि,
उष्ण वह अग्नि, उष्ण वह अग्नि। आहाहा!
देखो, धारणा में रटा हुआ। रटनपट्टी थी।

00:16:12.040 --> 00:16:23.136
तीसरा गया, भेजा। तू देख उसमें है कुछ?
उसने अग्नि के अंगारे के ऊपर जरा सी इसप्रकार से
उँगली रखी। पूरा हाथ नहीं रखा, हों!

00:16:23.160 --> 00:16:35.256
पूरा हाथ रखने की जरूरत भी नहीं है।
ऐसे उँगली का पोरवा रखा और आया।
गुरुजी! अग्नि है।

00:16:35.280 --> 00:16:41.936
कि किसप्रकार तुम जान सके?
कि अनुभव से जाना।

00:16:41.960 --> 00:16:49.296
'लकड़ी को जलाये वह अग्नि',
लकड़ी (शल्य) - भूत निकल गया।
'उष्ण वह अग्नि' (वह) भेद भी गया। धीरज!

00:16:49.320 --> 00:16:56.616
पराश्रित व्यवहार गया, भेदाश्रित व्यवहार गया
और अभेद वस्तु अनुभव में आई। आहाहा!

00:16:56.640 --> 00:17:06.976
साहेब! किसप्रकार? क्या है?
अग्नि तो अग्नि ही है, अग्नि तो अग्नि ही है।
'ही' इसप्रकार!

00:17:07.000 --> 00:17:17.340
कथंचित् लकड़ी को जलाती है वह अग्नि
और कथंचित् उष्ण वह अग्नि
ये दोनों व्यवहारनय के शल्य (निकल गए),

00:17:17.360 --> 00:17:22.056
व्यवहार के शल्य निकल गए।
उँगली रख दी।

00:17:22.080 --> 00:17:29.776
इसप्रकार! यहाँ कहते हैं।
उसीप्रकार कौन सा शल्य घुस गया है अब?

00:17:29.800 --> 00:17:36.336
कि पर को जाने उसे ज्ञायक कहने में (आता है),
लोकालोक को जाने उसे ज्ञान कहने में आता है,

00:17:36.360 --> 00:17:39.536
देव-गुरु-शास्त्र को जाने
उसे ज्ञान कहने में आता है,

00:17:39.560 --> 00:17:43.536
छह द्रव्य को जाने उसे
ज्ञान कहने में आता है,

00:17:43.560 --> 00:17:49.056
असद्भूत व्यवहार के शल्य ऐसे
घुस गए, जल्दी से निकलते नहीं।

00:17:49.080 --> 00:17:57.900
फिर ज्ञान वह आत्मा, ज्ञान वह आत्मा,
ज्ञान वह आत्मा, ऐसे भेद का शल्य घुस गया।
आहाहा!

00:17:57.920 --> 00:18:06.340
फिर ज्ञायक तो ज्ञायक है।
दोनों शल्य निकल जाएं और
अनुभव हो जाए, ऐसा है यह।

00:18:06.360 --> 00:18:13.460
ये व्यवहार के शल्य अनादि के हैं,
आज के नहीं हैं। आहाहा!

00:18:13.480 --> 00:18:28.260
शल्य बाधा करते हैं उसे बहुत,
इसलिए यह वस्तु जल्दी से समझ में भी नहीं आती।

00:18:28.280 --> 00:18:34.920
<b>जैसे कि, अग्नि उष्ण ही है। किस नय से?
अरे! स्वभाव से ही उष्ण है।</b>

00:18:34.940 --> 00:18:42.276
<b>पानी शीतल है। किस नय से?
अरे! स्वभाव से ही शीतल है। </b> आहाहा!

00:18:42.300 --> 00:18:51.480
<b>यदि निश्चयनय से शीतल है पानी
ऐसा तुम लोगे तो
व्यवहारनय से उष्ण है ऐसा आ जायेगा।</b>

00:18:51.500 --> 00:18:59.300
पानी को पानी के स्वभाव से देखो न!
नय का क्या काम है? आहाहा!

00:18:59.320 --> 00:19:04.036
निश्चयनय सापेक्ष है न?
अतः प्रतिपक्ष- अपेक्षा आती है।

00:19:04.060 --> 00:19:10.796
इसप्रकार पानी को निश्चयनय से शीतल देखो
तो प्रतिपक्ष व्यवहारनय तो खड़ा होता ही है।

00:19:10.820 --> 00:19:20.440
क्योंकि नय सापेक्ष होता है और
स्वभाव निरपेक्ष होता है। क्या कहा? सेठीजी?

00:19:20.460 --> 00:19:31.340
नय है वह सापेक्ष है,
पानी निश्चयनय से शीतल है
तो व्यवहारनय से उष्ण आ जायेगा।

00:19:31.360 --> 00:19:40.400
परंतु वह सापेक्ष नय को छोड़कर,
पानी के मूल स्वभाव से देखो,
तो वह तो निरपेक्ष शीतल, शीतल और शीतल।

00:19:40.420 --> 00:19:46.956
उसे नय की अपेक्षा लागू नहीं पड़ती, इसप्रकार।

00:19:46.960 --> 00:19:53.080
<b>स्वभाव से शीतल है।
यदि निश्चयनय से शीतल है ऐसा तुम लोगे
तो व्यवहारनय से उष्ण आ जायेगा।</b>

00:19:53.100 --> 00:20:03.480
<b>निश्चयनय तो मात्र स्वभाव का इशारा करता है।</b>
निश्चयनय तो मात्र स्वभाव का इशारा करता है।

00:20:03.500 --> 00:20:11.400
व्यवहारनय में तो स्वभाव का इशारा करने की
शक्ति भी नहीं है। आहाहा!

00:20:11.420 --> 00:20:17.200
व्यवहारनय तो अभूतार्थ और
असत्यार्थ है, उल्टा कथन करता है।

00:20:17.220 --> 00:20:26.860
<b>निश्चयनय तो मात्र स्वभाव का इशारा करता है।
निश्चयनय को चिपक जाओगे तो
स्वभाव दृष्टि में नहीं आयेगा।</b>

00:20:26.880 --> 00:20:33.696
<b>निश्चयनय से देखो तो ऐसा तेरा स्वभाव है,
इसप्रकार नय मात्र स्वभाव का इशारा करता है।</b>

00:20:33.700 --> 00:20:45.636
<b>परंतु निश्चयनय की पहुँच स्वभाव तक नहीं है
क्योंकि वस्तु नयातीत है। </b> नय से अनुभव नहीं होता।

00:20:45.660 --> 00:21:02.000
<b>अकारक, अवेदक वस्तु का स्वभाव है।
स्वभाव नय से सिद्ध नहीं होता,
स्वभाव स्वभाव से ही सिद्ध होता है।</b>

00:21:02.020 --> 00:21:06.956
अब यह एक पैराग्राफ है,
टाइम हो गया है परंतु ले लेता हूँ यह।

00:21:06.980 --> 00:21:15.516
<b>आत्मा पर्याय मात्र से भिन्न है,
इसलिए उसे अनादि-अनंत
कर्तापना लागू ही नहीं पड़ता</b>, द्रव्य को।

00:21:15.540 --> 00:21:21.996
द्रव्य पर्याय को नहीं करता क्योंकि
पर्याय भिन्न है। भिन्न, भिन्न को कैसे करे?

00:21:22.020 --> 00:21:42.980
एक में दूसरे की नास्ति है, तो पर्याय को कैसे करे?
कि व्यवहारनय से करता है, ऐसा। नीरज!
व्यवहारनय से तो रखने दो। आहाहा!

00:21:43.000 --> 00:21:50.796
<b>इसीलिए उसे अनादि-अनंत कर्तापना लागू नहीं पड़ता।
आत्मा बंध का भी कर्ता नहीं है,
और मोक्ष का भी कर्ता नहीं है। किस नय से?</b>

00:21:50.820 --> 00:21:55.556
बंध का कर्ता नहीं और मोक्ष का भी कर्ता नहीं,
तो किस नय से कर्ता नहीं है?

00:21:55.580 --> 00:22:03.916
<b>अरे! स्वभाव से ही वह तो अकर्ता है।
कोई नय लागू नहीं पड़ती।
यह द्रव्य स्वभाव की बात हुई।</b>

00:22:03.940 --> 00:22:08.476
अब यह पर्याय स्वभाव की बात कल आयेगी।
समय हो गया। दो बज गये हैं।

00:22:08.500 --> 00:22:20.596
मुमुक्षु:- आज थोड़ी देर से शुरू हुआ था।
उत्तर:- देर से?

00:22:20.620 --> 00:22:25.636
मुमुक्षु:- आज देर से शुरू हुआ था, ऐसा कहते हैं।
उत्तर:- तो पाँच मिनिट ज्यादा ले लेते हैं।
पाँच मिनिट, ले लेते हैं चलो।

00:22:25.660 --> 00:22:33.916
मुमुक्षु:- पहले पैराग्राफ में जरा।
मुमुक्षु:- फिर से लेते हैं।
उत्तर:- फिर से, अंतिम पैराग्राफ।

00:22:33.940 --> 00:22:47.116
आत्मा, यह त्रिकाली ज्ञायकमूर्ति,
चैतन्यमूर्ति भगवान आत्मा है न?
उसकी दृष्टि कैसे हो? और अनुभव कैसे हो?

00:22:47.140 --> 00:22:52.876
और इस संसार का अभाव,
पर्याय में से कैसे निकल जाये?

00:22:52.900 --> 00:22:57.956
और पर्याय में उसका अनुभव, आनंद कैसे आये?
उसकी विवक्षा की बात चलती है।

00:22:57.980 --> 00:23:07.740
<b>आत्मा पर्याय मात्र से भिन्न है, </b> आहाहा!

00:23:07.760 --> 00:23:19.556
पर्याय मात्र से भिन्न है तो सर्वथा भिन्न है
या कथंचित् भिन्न-अभिन्न है, पर्याय?
कि सर्वथा भिन्न है।

00:23:19.580 --> 00:23:26.796
<b>इसलिये उसे अनादि-अनंत
कर्तापना लागू नहीं पड़ता।</b>
पर्याय यदि भिन्न है...

00:23:26.820 --> 00:23:33.156
यह पुस्तक भिन्न है आत्मा से,
तो आत्मा इसका 'कर्ता है' वह लागू नहीं पड़ता।

00:23:33.180 --> 00:23:41.756
इसप्रकार पर्याय द्रव्य को अड़ती नहीं,
द्रव्य पर्याय को नहीं अड़ता।
सत्ता एक है और सत् दो हैं।

00:23:41.780 --> 00:23:47.596
सत्ता एक है और सत्, उसमें दो हैं।

00:23:47.620 --> 00:23:56.076
इस प्रकार, <b>उत्पाद व्यय ध्रौव्ययुक्त्तं सत्त्</b>,
सत्ता एक, परंतु सत् उसमें तीन हैं
- उत्पाद सत्, व्यय सत् और ध्रुव सत् है।

00:23:56.100 --> 00:24:00.116
उस सामान्य-विशेष में दो सत् हैं,
ये तो तीन। आहाहा!

00:24:00.140 --> 00:24:05.476
<b>आत्मा पर्याय मात्र से भिन्न है।</b>

00:24:05.500 --> 00:24:07.568
पर्याय में पर्याय मात्र अर्थात्
कुछ बाकी नहीं रहा,

00:24:07.592 --> 00:24:11.156
बंध-मोक्ष की पर्याय आ गई,
नौतत्त्व उसमें आ गये।

00:24:11.180 --> 00:24:18.660
नौतत्त्व से अत्यंत भिन्न है,
ऐसा शास्त्र में वर्णन है।

00:24:18.680 --> 00:24:25.676
<b>अनादि-अनंत कर्तापना लागू ही नहीं पड़ता।
आत्मा बंध का कर्ता नहीं है</b>।

00:24:25.700 --> 00:24:36.956
आत्मा पहले बंधन करे और
फिर बंध को छोड़े और फिर मोक्ष को करे?
ऐसे बाद में या पहले कुछ है नहीं।

00:24:36.980 --> 00:24:42.580
वह तो प्रथम से ही अकारक है। आहाहा!

00:24:42.600 --> 00:24:55.476
पहले बंध को करे - मिथ्यात्व को, और
फिर उस मिथ्यात्व को छोड़े, छोड़ने के बाद क्या करे?
सम्यग्दर्शन को करे, ऐसा कुछ है नहीं। आहाहा!

00:24:55.500 --> 00:25:04.036
यह तो द्रव्य स्वभाव की,
अकारक, अवेदक, निष्क्रिय परमात्मा की,
दृष्टि के विषय की बात चलती है।

00:25:04.060 --> 00:25:15.116
दृष्टि के विषय में कर्तापना नहीं है।
<b>आत्मा बंध का कर्ता नहीं है।</b>
बंध अर्थात् मिथ्यात्व (अर्थात्) भावबंध का कर्ता नहीं है।

00:25:15.140 --> 00:25:21.280
तो द्रव्यकर्म का बंध तो, बंध कहाँ से करे उसे,
द्रव्यकर्म को तो? भावबंध का भी कर्ता नहीं है।

00:25:21.300 --> 00:25:28.756
<b>और मोक्ष का</b>, केवलज्ञान का <b>भी कर्ता नहीं है।</b>
आहाहा!

00:25:28.780 --> 00:25:41.020
केवलज्ञान की पर्याय होती है वह बात सच है,
परंतु उसके षट्कारक से होती है,
आत्मा करता है इसलिये होती है ऐसा है नहीं। आहाहा!

00:25:41.040 --> 00:25:46.580
<b>कौनसे नय से? अरे! स्वभाव से ही वह तो अकर्ता है।</b>

00:25:46.600 --> 00:25:53.416
अरे! अकर्ता ऐसे ज्ञायक को दृष्टि में ले,
तेरा काम हो जायेगा।

00:25:53.440 --> 00:25:59.456
स्वभाव ही अकारक, अवेदक है।
करे और भोगे ऐसा त्रिकाली स्वभाव में (नहीं है),

00:25:59.480 --> 00:26:05.136
क्योंकि निष्क्रिय है परमात्मा,
क्रिया के कारक उसमें नहीं हैं। आहाहा!

00:26:11.040 --> 00:26:18.300
<b>चर्चा ३</b>
यह <b>द्रव्य स्वभाव पर्याय स्वभाव</b> की पुस्तिका है।

00:26:18.320 --> 00:26:31.780
अनादिकाल से आत्मा अनंतबार जैन हुआ,
श्रावक नाम से, नाम से जैन।

00:26:31.800 --> 00:26:39.416
और द्रव्यलिंगी मुनि भी हुआ अनंतबार,
नवमें ग्रैवेयक में भी गया।

00:26:39.440 --> 00:26:51.896
तब उसने नय के द्वारा 'पर्याय का स्वभाव क्या?
द्रव्य का स्वभाव क्या?'
अर्थात् नय के द्वारा विचार में लिया।

00:26:51.920 --> 00:26:58.616
नय हैं, वे मन के धर्म हैं।
नय हैं, वे ज्ञान के धर्म नहीं हैं।

00:26:58.640 --> 00:27:05.376
अतीन्द्रियज्ञान जो है न?
उसमें नय के विकल्प नहीं होते।

00:27:05.400 --> 00:27:12.656
परंतु नय के विकल्प उठते हैं,
वे मन के संग से उठते हैं।

00:27:12.680 --> 00:27:24.576
अतः नयज्ञान है वह स्वयं खंडज्ञान है,
विकल्परूप है।
और नय हैं वे बंध के कारण हैं।

00:27:24.600 --> 00:27:36.736
व्यवहारनय का विकल्प भी बंध का कारण।
निश्चयनय का विकल्प है वह भी (बंध का कारण)।
विकल्प मात्र बंध का कारण है।

00:27:36.760 --> 00:27:48.296
फिर विकल्प में कोई दो भेद मत करना,
कि यह अशुभ का विकल्प और शुभ विकल्प।
विकल्प मात्र बंध का कारण है।

00:27:48.320 --> 00:27:57.656
इसप्रकार, जेसे शुभाशुभ भाव बंध के कारण हैं,
उसीप्रकार नयों के विकल्प भी (बंध के कारण हैं)।

00:27:57.680 --> 00:28:04.980
व्यवहारनय से ऐसा है और
निश्चयनय से जीव ऐसा है
ऐसे जो विकल्प उठते हैं वे भी बंध के कारण हैं।

00:28:05.000 --> 00:28:16.336
बंध का कारण होने पर भी
आत्मा के द्रव्य और पर्याय का
निर्णय करने के लिये, प्राथमिक भूमिका में,

00:28:16.360 --> 00:28:24.496
उसे व्यवहारनय से साधन भी कहने में आता है
कि जिससे उल्टा-सीधा निर्णय ना करे।

00:28:24.520 --> 00:28:29.376
जैसा वस्तु का स्वभाव है, द्रव्य का और पर्याय का,

00:28:29.400 --> 00:28:39.176
उस प्रकार निर्णय करने का उसका काल हो
तब उसे विकल्प उसी प्रकार के उठते हैं,
नयों के विकल्प।

00:28:39.200 --> 00:28:47.700
अर्थात् नयों के विकल्प द्वारा
वह गृहीत मिथ्यात्व का त्याग करता है,

00:28:47.720 --> 00:28:57.896
क्योंकि अन्यमत में कोई नय विवक्षा नहीं है,
जैनधर्म में नय विवक्षा है।

00:28:57.920 --> 00:29:03.096
इसलिये गृहीत मिथ्यात्व गया
और अगृहीत मिथ्यात्व रहा।

00:29:03.120 --> 00:29:21.900
और अगृहीत में भी,
अब अगृहीत था परंतु, अगृहीत में भी
वह नय के द्वारा स्वभाव का विचार करता है।

00:29:21.920 --> 00:29:27.256
व्यवहारनय को गौण करके
निश्चयनय के विकल्प द्वारा

00:29:27.280 --> 00:29:39.016
वह जब स्वभाव का निर्णय करता है
तब अगृहीत मिथ्यात्व भी गलने लगता है।
टलता नहीं है, परंतु गलता है।

00:29:39.040 --> 00:29:43.496
जैसे कि मैं कर्म के संबंधवाला और बंधवाला हूँ,

00:29:43.520 --> 00:29:52.456
कर्म को करता और भोगता हूँ,
ऐसा जो व्यवहारनय का पक्ष
उसमें तो मिथ्यात्व दृढ़ होता था।

00:29:52.480 --> 00:30:02.976
परंतु अब वह व्यवहारनय को दूर करके
निश्चयनय के विकल्प में आता है,
कि मेरा आत्मा तो त्रिकाल अबद्ध है।

00:30:03.000 --> 00:30:13.816
कर्म का संबंध मुझे हुआ नहीं और
कर्म के बंध में मेरा आत्मा पूर्व में
निमित्त कारण भी हुआ नहीं,

00:30:13.840 --> 00:30:19.600
कर्म के बंध में निमित्त होना,
वह भी मेरा स्वभाव नहीं है।

00:30:19.620 --> 00:30:27.636
इसप्रकार निश्चयनय के विकल्प द्वारा
अबद्ध स्वभाव को निर्णय में लेता है।

00:30:27.660 --> 00:30:34.076
मैं तो त्रिकाल मुक्त हूँ,
इसप्रकार त्रिकाल अकारक-अवेदक हूँ।

00:30:34.100 --> 00:30:40.836
इसप्रकार स्वयं का जो आत्मा जैसा है
उस आत्मा को विकल्प द्वारा,

00:30:40.860 --> 00:30:52.300
मन के संग द्वारा,
राग के संबंधवाले ज्ञान द्वारा,
जिस ज्ञान का लक्ष राग के ऊपर है अभी,

00:30:52.320 --> 00:30:58.856
ऐसे ज्ञान द्वारा,
वह विचार करता है वस्तु का,

00:30:58.880 --> 00:31:06.336
तो उसका मिथ्यात्व तो गलता है परंतु
मिथ्यात्व टलकर सम्यग्दर्शन नहीं होता।

00:31:06.360 --> 00:31:16.776
कि यहाँ तक आने के बाद उसे
नयों के विकल्प कैसे छूटें और
साक्षात् अनुभव कैसे हो?

00:31:16.800 --> 00:31:22.056
इस हेतु से इस पुस्तिका में सारा विस्तार आया है।

00:31:22.080 --> 00:31:28.456
उसमें द्रव्य स्वभाव की बात हो गई।
अब पर्याय स्वभाव की बात आती है।

00:31:28.480 --> 00:31:36.260
तीसरा पेज है। <b>ज्ञान की पर्याय का स्वभाव</b>।

00:31:36.280 --> 00:31:54.540
<b>आत्मा ज्ञाता है। किस नय से </b> ज्ञाता है <b>?</b>
ऐसा एक प्रश्न उठता है कि 'ज्ञाता तो है आत्मा,
परंतु किस नय से ज्ञाता है?', ऐसे!

00:31:54.560 --> 00:32:09.496
<b>अरे! स्वभाव से ही ज्ञाता है।</b>
ज्ञाता होता है या ज्ञाता है?
ज्ञाता है।

00:32:09.520 --> 00:32:14.696
किस नय से ज्ञाता है?
कि स्वभाव से ही ज्ञाता है।

00:32:14.720 --> 00:32:22.100
<b>व्यवहारनय से ज्ञान पर को जानता है और
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को जानता है-</b>,

00:32:22.120 --> 00:32:29.296
क्योंकि भगवान ने दो नय कहे हैं
और कोई एक नय छोड़ा जाये,
छोड़ा भी नहीं जाता।

00:32:29.320 --> 00:32:40.816
दो नय हैं, व्यवहारनय से पर को जानता है,
निश्चयनय से स्व को जानता है,
<b>ऐसा नहीं है।</b>

00:32:40.840 --> 00:32:51.420
व्यवहारनय से पर को जानता है ऐसा नहीं
और निश्चयनय से स्व को जानता है ऐसा भी नहीं है।

00:32:51.440 --> 00:33:04.576
मुश्किल से निश्चयनय तक आया,
व्यवहार का निषेध करते-करते,
कि निश्चयनय से ज्ञान मेरी आत्मा को जानता है।

00:33:04.600 --> 00:33:17.856
तो कहते हैं उसमें अनुभव नहीं होता।
आहाहा! अब, तो फिर क्या है?

00:33:17.880 --> 00:33:23.576
<b>अनादि-अनंत</b>, देखो! आहाहा!

00:33:23.600 --> 00:33:44.660
सम्यग्ज्ञान प्रगट होता है तब आत्मा को जानता है,
उससे पहले आत्मा को नहीं जानता, ऐसा नहीं है।
'अनादि-अनंत' शब्द का प्रयोग किया है।

00:33:44.680 --> 00:33:57.900
<b>अनादि-अनंत ज्ञान की पर्याय
आत्मा को जाननेरूप ही परिणमती है।</b>

00:33:57.920 --> 00:34:10.620
अनादि-अनंत आत्मा जैसे द्रव्यरूप है,
ऐसी उसकी एक स्वभावरूप पर्याय
जिसे उपयोग लक्षण कहा जाता है,

00:34:10.640 --> 00:34:14.400
जिसे चैतन्य अनुविधायी
परिणाम कहा जाता है,

00:34:14.420 --> 00:34:22.996
ऐसी ज्ञान की पर्याय, दशा, हालत,
परिणाम अनादि-अनंत प्रगट होती है।

00:34:23.020 --> 00:34:39.660
और वह पर्याय प्रगट होती है वह
<b>आत्मा को जाननेरूप ही परिणमती है।</b>
पर को जाननेरूप परिणमती नहीं है।

00:34:39.680 --> 00:34:47.716
<b>वह ज्ञान आत्मा को ही प्रसिद्ध करता है।</b>
'ही' लगाया है।

00:34:47.740 --> 00:35:03.380
वह जो ज्ञान उत्पादरूप होता है
वह उत्पादरूप पर्याय
ध्रुव को ही प्रसिद्ध करती है, पर को नहीं।

00:35:03.400 --> 00:35:08.540
और वह पर्याय, उत्पाद-व्यय को
भी प्रसिद्ध नहीं करती।

00:35:08.560 --> 00:35:18.376
वह पर्याय ध्रुव को ही प्रसिद्ध करती है,
ज्ञायक को ही प्रसिद्ध करती है।

00:35:18.400 --> 00:35:29.256
जाननहार त्रिकाली भगवान आत्मा
उसे ही जानती हुई उदय होती है
और उसे जानते जानते अस्त होती है।

00:35:29.280 --> 00:35:33.640
जानती हुई उदय होती है और जानती जानती ही अस्त होती है।

00:35:33.660 --> 00:35:37.996
जहाँ एक पर्याय अस्त हुई
वहाँ दूसरी पर्याय का उत्पाद होता है।
आहाहा!

00:35:38.020 --> 00:35:40.540
उसे और सिर्फ उसे ही जानती है
-उसे और सिर्फ उसे ही जानती है।

00:35:40.580 --> 00:35:45.220
पहली पर्याय ने जिसे जाना, फिर दूसरी पर्याय,
पहली पर्याय तो व्यय हो गई,

00:35:45.240 --> 00:35:52.340
फिर दूसरी पर्याय ने दूसरे को जाना,
तीसरी पर्याय अपने को जाने,
इसप्रकार पलटते हुये कुछ होगा न पर्याय में?

00:35:52.360 --> 00:35:57.100
पर्याय, उसका विषय बदलता होगा या नहीं?

00:35:57.120 --> 00:36:03.776
ज्ञान की पर्याय, उसका विषय बदलता नहीं है।
आहाहा!

00:36:03.800 --> 00:36:18.660
यह ज्ञान की पर्याय के स्वभाव की बात चल रही है।
यह सम्यग्ज्ञान-मिथ्याज्ञान की बात नहीं है।

00:36:18.680 --> 00:36:23.900
ज्ञान की पर्याय का अनादि-अनंत ऐसा स्वभाव है,

00:36:23.920 --> 00:36:37.616
कि वह ज्ञान जो उत्पन्न होता है
वह अपने आत्मा को ही जानता प्रगट होता है,
क्योंकि उपयोग से आत्मा अनन्य है।

00:36:37.640 --> 00:36:47.416
और उस उपयोग में उपयोग ही है
और उपयोग में कोई क्रोधादि नहीं है
(समयसार गाथा १८१)। आहाहा!

00:36:47.440 --> 00:36:55.016
इसीलिए क्रोध को तो प्रसिद्ध करती ही नहीं
क्योंकि उपयोग में क्रोधादि नहीं है।

00:36:55.040 --> 00:37:00.336
तो छह द्रव्य (उपयोग में) नहीं हैं,
तो छह द्रव्यों को कहाँ से प्रसिद्ध करे?

00:37:00.360 --> 00:37:11.896
लेकिन उस उपयोग में तादात्म्यपने,
अनन्यपने आत्मा विराजमान है,
उसे प्रसिद्ध करती हुई प्रगट होती है।

00:37:11.920 --> 00:37:20.376
दूसरे समय दूसरी पर्याय,
तीसरे समय तीसरी पर्याय,
परंतु प्रगट तो वह सामान्य को ही करती है।

00:37:20.400 --> 00:37:42.736
जिसका विशेष हो, जो सामान्य का विशेष हो,
वह विशेष उसके ही सामान्य को प्रसिद्ध करता है,
दूसरे को (नहीं करता)। आहाहा! सिद्धांत।

00:37:42.760 --> 00:37:47.820
मुमुक्षु:- सभी गुणों की पर्याय?
उत्तर:- क्या?
मुमुक्षु:- सभी गुणों की पर्याय?

00:37:47.840 --> 00:37:58.100
उत्तर:- ज्ञान की पर्याय आत्मा को प्रसिद्ध करती है,
ऐसा ख्याल में आता है तो
सभी पर्यायें अंतर्मुख हो जाती हैं।

00:37:58.120 --> 00:38:05.260
ज्ञान की पर्याय पर को जानती है
तो सभी पर्यायें अंतर्मुख नहीं होती।

00:38:05.280 --> 00:38:09.580
ज्ञान पर्याय सरदार है, सरदार।

00:38:09.600 --> 00:38:13.576
एक सेना का नियम है, सेना का।

00:38:13.600 --> 00:38:20.216
सेना का ऐसा नियम है कि
सेना ऐसे जाती हो पूर्व दिशा में,

00:38:20.240 --> 00:38:27.536
और उसका जो commander (कमांडर, सेनापति) होता है,
chief (चीफ, सेनापति), पूर्व दिशा की तरफ ही
उसका मुख होता है, पूर्व दिशा तरफ।

00:38:27.560 --> 00:38:38.216
फिर उसे, उत्तर दिशा की तरफ जाने का विचार हो
उसकी योजना के अनुसार, तो सेना को कुछ कहता नहीं।

00:38:38.240 --> 00:38:46.616
अपना मुख मोड़ता है और जैसे ही अपना मुख मोड़ता है,
वहाँ तो सभी अपना मुख मोड़ लेते हैं।

00:38:46.640 --> 00:38:51.256
मुख मोड़ते हैं परंतु वे चलते नहीं हैं,
तब तक चलते नहीं हैं।

00:38:51.280 --> 00:38:59.680
जैसे ही वह (सेनापति) चलने लगता है,
तो पूछे बिना (सभी) चलने लगते हैं, समझे?

00:38:59.700 --> 00:39:07.700
ऐसे ही ज्ञान है न?
वह कमांडर है, चीफ कमांडर है।

00:39:07.720 --> 00:39:17.740
क्योंकि जीता जागता देव,
अथवा जो प्रगट लक्षण है,
वह ज्ञान की पर्याय का प्रगट लक्षण है।

00:39:17.760 --> 00:39:25.176
श्रद्धा की पर्याय प्रगट नहीं है, सम्यग्दर्शन नहीं है।
चारित्र की वीतराग पर्याय प्रगट नहीं है।

00:39:25.200 --> 00:39:31.940
सुख-दु:ख की, अतीन्द्रिय सुख की
पर्याय प्रगट नहीं है। आहाहा!

00:39:31.960 --> 00:39:39.020
परंतु यह ज्ञान की पर्याय तो स्वभाव का अंश है,
मोक्षमार्गप्रकाशक में लिया है।

00:39:39.040 --> 00:39:43.844
क्योंकि जिसप्रकार सूर्य का प्रकाश है,

00:39:43.868 --> 00:39:54.164
वह बादलों के विघटन से जितना प्रकाश उदय होता है
वह स्वभाव का अंश है
और वह सूर्य को ही प्रसिद्ध करता है।

00:39:54.188 --> 00:40:03.324
ऐसे ही आत्मा, उसका ज्ञान जो है,
स्वभाव का अंश प्रगट होता है,
वह आत्मा को प्रसिद्ध करता है।

00:40:03.348 --> 00:40:07.844
वह बंध का कारण नहीं है,
राग-द्वेष-मोह बंध के कारण हैं।

00:40:07.868 --> 00:40:18.568
नवीन बंध का कारण क्या?
ऐसा (२६) पेज के ऊपर (२६-२७) पेज पर लिया है।
(२६) पेज पर शीर्षक है और (२७) में उसका जवाब है।

00:40:18.580 --> 00:40:28.436
इसप्रकार यह भगवान आत्मा है,
वह समय नाम का पदार्थ है।

00:40:28.460 --> 00:40:43.436
वह समय नाम का पदार्थ पूरा कब कहा जाता है?
कि द्रव्य-गुण से तो समानता है परंतु
उसकी पर्याय में जानने की दशा प्रगट होती है।

00:40:43.460 --> 00:40:48.396
समय का वर्णन करते हुये
समयसार की दूसरी गाथा में कहा,

00:40:48.420 --> 00:40:57.076
कि युगपत् एक साथ जानता भी है
और जाननेरूप परिणमता भी है।

00:40:57.100 --> 00:41:04.500
ऐसा पदार्थ का स्वरूप ही है,
स्वयं सिद्ध। आहाहा!

00:41:04.520 --> 00:41:11.700
वह किसी नय से आत्मा को जानता है और
किसी नय से ज्ञान प्रगट होता है, ऐसा है नहीं।

00:41:11.720 --> 00:41:15.096
कोई कर्म मार्ग दे
तो प्रगट हो ऐसा नहीं (है)।

00:41:15.120 --> 00:41:22.096
स्वभाव निरपेक्ष होता है, भाई!
स्वभाव को किसी की अपेक्षा नहीं होती। आहाहा!

00:41:22.120 --> 00:41:32.096
ऐसे, ज्ञान सत् अहेतुक है, उसका कोई हेतु नहीं है।

00:41:32.120 --> 00:41:43.536
(ज्ञान) स्वयं, स्वयं प्रगट होता है और
वह स्वयं प्रगट होता हुआ, कि जिसका वह विशेष है
उसे ही वह प्रगट करता है।

00:41:43.560 --> 00:41:53.176
सामान्य आत्मा है और
उसका विशेष उपयोग है,
राग उसका विशेष नहीं है। आहाहा!

00:41:53.200 --> 00:42:02.376
तो वह उपयोग जो है,
उस उपयोग से आत्मा अनन्य है।
उपयोग और आत्मा भिन्न नहीं हैं।

00:42:02.400 --> 00:42:09.456
इसलिये वह उपयोग आत्मा को प्रसिद्ध करता है,
वह पर्याय का अपना स्वभाव है, इसप्रकार!

00:42:09.480 --> 00:42:19.420
ज्ञान की पर्याय का स्वभाव ही ऐसा है
कि वह आत्मा को प्रसिद्ध करे। आहाहा!

00:42:19.440 --> 00:42:34.460
<b>अनादि-अनंत</b> कहा न?
<b>अनादि-अनंत ज्ञान की पर्याय
आत्मा को जाननेरूप ही परिणमती है।</b>

00:42:34.480 --> 00:42:40.776
यहाँ अतीन्द्रियज्ञान या इन्द्रियज्ञान
या मतिज्ञान, श्रुतज्ञान कुछ नहीं लेना।

00:42:40.800 --> 00:42:53.540
सामान्य उपयोग है यह, स्वभाव का अंश है।

00:42:53.560 --> 00:42:56.900
यह हरीशचंद्रभाई आने लगे हैं वह अच्छा हुआ।

00:42:56.920 --> 00:43:01.576
और मुझे विचार आया था,
आपने कहा कि मैं तो आ नहीं सकूँगा,
दो दिन बाद आऊंगा,

00:43:01.600 --> 00:43:05.336
लेकिन एक टिकिट केन्सल नहीं कराते।
मैंने कहा अच्छी बात है,

00:43:05.360 --> 00:43:14.176
इतना भी अच्छा है। आहाहा!
तुम जहाँ-तहाँ जाते हो न?
उस बात मे कुछ माल नहीं है। 

00:43:14.200 --> 00:43:22.016
कुंदकुंद भगवान के पास जाओ।
वहाँ सारा माल मिलेगा,
बाकी कहीं है नहीं।

00:43:22.040 --> 00:43:33.976
कुंदकुंद भगवान को जिन्होंने जाना
ऐसे गुरुदेव के पास जाओ।
बाकी तो भटकना ही है, जिंदगी पूरी हो जायेगी।

00:43:34.000 --> 00:43:41.816
मुमुक्षु:- गुरुदेव के पास से
आपके पास आये हैं।
उत्तर:- हम तो डाकिया हैं।

00:43:41.840 --> 00:43:46.336
उनकी जो डाक है
वह लाकर सबको देते हैं,
गुरुदेव ने ऐसा कहा है।

00:43:46.360 --> 00:43:51.848
गुरुदेव ने ऐसा कहा है,
हम को बैठा (समझ में आया) है
इसलिये हम कहते हैं। आहाहा!

00:43:51.872 --> 00:43:56.620
मुमुक्षु:- गुरुदेव के प्रतिनिधि आप ही होता है।
उत्तर: ठीक है।

00:43:56.640 --> 00:44:08.180
 देखो, यह आता है तत्त्वार्थसूत्र में
<b>उपयोगो लक्षणम्</b> (अध्याय २, सूत्र ८)
जो दिगंबर का मूल शास्त्र। आहाहा!

00:44:08.200 --> 00:44:15.340
अब उन्हें भी पता नहीं कि यह उपयोग क्या है?
किसे जानता है और क्या करता है उपयोग?

00:44:15.360 --> 00:44:20.056
उपयोग की क्रिया क्या? और उसका विषय क्या?
वह भी जानकारी नहीं है।

00:44:20.080 --> 00:44:26.240
उपयोग में जानने की क्रिया होती है,
और वह आत्मा को जानती है, पर को नहीं जानती।

00:44:26.260 --> 00:44:32.536
लक्ष्य को प्रसिद्ध करती है और
अलक्ष्य को प्रसिद्ध नहीं करती,
उसे लक्षण कहने में आता है।

00:44:32.560 --> 00:44:39.296
यह परिभाषा है लक्षण की,
लक्ष्य को प्रसिद्ध करे और
अलक्ष्य को प्रसिद्ध न करे।

00:44:39.320 --> 00:44:43.656
वह तो ठीक है न? आहाहा!
उसका नाम लक्षण कहा जाता है।

00:44:43.680 --> 00:44:47.896
वह राग को प्रसिद्ध नहीं करता। आहाहा!

00:44:47.920 --> 00:45:02.860
वह न करे तो कुछ नहीं,
परंतु व्यवहार से तो राग को जानता है न?
आहाहा! बहुत बड़ी भूल हो गई, प्रभु!

00:45:02.880 --> 00:45:08.260
<b>अनादि-अनंत ज्ञान की पर्याय
आत्मा को जाननेरूप ही परिणमती है।</b>

00:45:08.280 --> 00:45:16.896
<b>वह ज्ञान आत्मा को ही</b>
सम्यक्एकांत, आत्मा को ही <b>प्रसिद्ध करता है</b>
और पर को प्रसिद्ध नहीं करता।

00:45:16.920 --> 00:45:26.256
तो स्वपरप्रकाशक उसका स्वभाव कहाँ गया?
कि उसमें रह गया।
ज्ञान की पर्याय में रह गया, उड़ा नहीं है।

00:45:26.280 --> 00:45:34.816
तुमने तो कहा, मात्र आत्मा को जानता है
और पर को नहीं जानता,
तो-तो स्वपरप्रकाशक में, पर को तुमने उड़ा दिया?

00:45:34.840 --> 00:45:45.360
कि हमने उड़ाया नहीं है, तुझे ऐसा लगता है कि
ज्ञान की पर्याय ऐसे-ऐसे (पर लक्ष से)
जानती है तब उसे परप्रकाशक कहते हैं।

00:45:45.380 --> 00:45:55.280
ऐसा है नहीं। तेरी मान्यता उल्टी है।
ज्ञान की पर्याय को इसप्रकार
(पर का लक्ष) नहीं करना पड़ता।

00:45:55.300 --> 00:46:03.516
ज्ञान की पर्याय आत्मा को जानते-जानते,
उसमें लोकालोक का प्रतिभास होता है।

00:46:03.540 --> 00:46:11.356
इस प्रतिभास को परप्रकाशक कहा जाता है।
पर का लक्ष करे तो उपयोग रहता नहीं।

00:46:11.380 --> 00:46:20.476
मुमुक्षु:- बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!
उत्तर:- बहुत अच्छा! सत्य है न?
वह appeal (अपील, आकर्षण) करता है अंदर।

00:46:20.500 --> 00:46:33.300
सत्य है न? आत्मा बैठा है न अंदर?
वह आकर्षण करता है, अंदर से हकार आता है,
 हकार आता है। आहाहा!

00:46:33.320 --> 00:46:40.900
<b>ज्ञान आत्मा को ही प्रसिद्ध करता है</b>,
पर को नहीं, इसप्रकार।
वह अस्ति-नास्ति अनेकांत है।

00:46:40.920 --> 00:46:46.776
<b>किस नय से ज्ञान में आत्मा जानने में आये </b>!
लो! दूसरा पैराग्राफ आया।

00:46:46.800 --> 00:46:54.656
<b>किस नय से ज्ञान में आत्मा जानने में आये
और किस नय से जानने में न आये?</b>

00:46:54.680 --> 00:47:02.096
किस नय से जानने में आये और
किस नय से आत्मा उसमें न जानने में आये, इसप्रकार।

00:47:02.120 --> 00:47:19.760
<b>व्यवहारनय से जानने में नहीं आता और
निश्चयनय से जानने में आता है-ऐसा नहीं है।</b>
यह तो ज्ञान की पर्याय के स्वभाव की बात है।

00:47:19.780 --> 00:47:27.100
कि नय से तो ऐसा ही सुना है?
अब नय से आगे की बात चलती है।

00:47:27.120 --> 00:47:32.960
तेरी धारणा को अंदर अभी
deposit (डिपोजिट, जमा) करके रख दे। आहाहा!

00:47:32.980 --> 00:47:44.980
और अनुभव होता है तब ऐसा लगता है कि
इस नय का ज्ञान भी झूठा,
अनुभव से प्रमाण करना।

00:47:45.000 --> 00:47:50.900
<b>व्यवहारनय से जानने में नहीं आता</b>,
ज्ञान में आत्मा <b>व्यवहारनय से नहीं जाना जाता</b>

00:47:50.920 --> 00:48:00.380
<b>और निश्चयनय से जानने में आता है</b>,
सर्वज्ञ भगवान ने दो नय कहे हैं, स्पष्ट बात है!

00:48:00.400 --> 00:48:14.580
<b>-ऐसा नहीं है। </b> निश्चयनय से जानने में आता है और
व्यवहारनय से ज्ञान आत्मा को नहीं जानता,
निश्चयनय से जानता है, <b>ऐसा नहीं है</b>।

00:48:14.600 --> 00:48:23.900
तू नय लगायेगा तो
वह ज्ञान ही प्रगट नहीं होगा,
जानने की बात तो दूर रही। आहाहा!

00:48:23.920 --> 00:48:29.536
जानने की बात तो दूर रही।
वह तो विकल्प उत्पन्न हुआ।

00:48:29.560 --> 00:48:37.180
<b>-ऐसा नहीं है। ज्ञान आत्मा को</b>,
देखो, उसका जवाब आया ऊपर की दो लाइनों का।

00:48:37.200 --> 00:48:46.456
<b>ज्ञान आत्मा को स्वभाव से ही
अनादि-अनंत प्रसिद्ध करता है। </b> आहाहा!

00:48:46.480 --> 00:48:52.460
अनादि-अनंत, माने तो भी ठीक और
न माने तो भी ठीक।

00:48:52.480 --> 00:49:02.780
सूर्य का प्रकाश मकान को प्रसिद्ध करता है,
सूर्य को प्रसिद्ध नहीं करता
-ऐसा कोई कहे पागल तो?

00:49:02.800 --> 00:49:12.040
तो सूर्य को प्रसिद्ध नहीं करेगा उसका प्रकाश?
अंधेरा हो जायेगा प्रकाश में? नहीं होगा।

00:49:12.060 --> 00:49:18.500
वह ज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध किया करता है,
समय-समय।

00:49:18.520 --> 00:49:32.616
यह अनुभव का आसान उपाय है।
अनुभव का आसान में आसान उपाय है।
सबसे सरल यह है।

00:49:32.640 --> 00:49:39.576
कितनी यात्रा करनी? कितने उपवास करने?
कितने व्रत करने? और कितने मंदिर बनवाने?
आहाहा!

00:49:39.600 --> 00:49:48.620
कितने शास्त्र पढ़ने?
कितने नय-निक्षेप-प्रमाण?
कितनी डिग्रियाँ प्राप्त करनी? आहाहा!

00:49:48.640 --> 00:49:57.896
ज्ञान आत्मा को जानता हुआ ही प्रगट होता है,
प्रसिद्ध करता हुआ ही प्रगट होता है।
आहाहा!

00:49:57.920 --> 00:50:04.660
<b>अनादि-अनंत प्रसिद्ध करता है।
उसे नय की अपेक्षा ही नहीं है।</b> आहाहा!

00:50:04.680 --> 00:50:11.656
नय बीच में डालेगा तो?
तो ज्ञान आत्मा को जानता है
वह तुझे ख्याल में नहीं आयेगा।

00:50:11.680 --> 00:50:21.456
नय को बीच में मत रख भाई! आहाहा!
नय तो बाधक है, अनुभव के लिये बाधक है।

00:50:21.480 --> 00:50:29.980
वह आया था, जो-जो साधन वह-वह बाधक।

00:50:30.000 --> 00:50:36.380
<b>उसे नय की अपेक्षा ही नहीं है</b>, स्वभाव को।
<b>स्वभाव में नय नहीं होते</b>।

00:50:36.400 --> 00:50:45.856
ज्ञान की पर्याय आत्मा को जानती है।
किस नय से?
प्रश्न ही नहीं है, ज्ञान की पर्याय का स्वभाव ही है।

00:50:45.880 --> 00:50:54.976
वह सामान्य का विशेष है तो
वह विशेष सामान्य को प्रसिद्ध करे, करे और करे।

00:50:55.000 --> 00:51:03.860
आहाहा! सामान्य-विशेष तो ख्याल में आया न?

00:51:03.880 --> 00:51:15.900
<b>उसे नय की अपेक्षा ही नहीं है।
स्वभाव में नय नहीं होते और स्वभाव की सिद्धि के लिये,
'नय' मात्र अंगुली निर्देश करते हैं</b>।

00:51:15.920 --> 00:51:21.056
अनुमान करके कहते हैं, 
जो व्यवहारनय में फंसा हुआ था उसे ऐसा कहते हैं,

00:51:21.080 --> 00:51:26.136
कि निश्चयनय से तो
ज्ञान आत्मा को ही जानता है,
पर को नहीं जानता।

00:51:26.160 --> 00:51:31.216
इतने व्यवहार का निषेध करने के लिये
निश्चयनय से उसे इशारा किया।

00:51:31.240 --> 00:51:37.896
<b>अनुमान तक ले जाते हैं, बस-</b>
बस, उनकी मर्यादा इतनी।

00:51:37.920 --> 00:51:45.416
अनुमान ज्ञान में ऐसा आया कि मेरा
ज्ञान तो मेरी आत्मा को ही जानता है,
पर को नहीं जानता।

00:51:45.440 --> 00:51:50.616
ऐसा अपने ख्याल में पहले लेता है, नय के द्वारा।

00:51:50.640 --> 00:51:59.216
<b>तू निश्चयनय से अकर्ता है या
स्वभाव से ही अकर्ता है?</b>
कि साहेब! निश्चयनय से अकर्ता है।

00:51:59.240 --> 00:52:04.976
शुद्ध द्रव्यार्थिकनय से देखा जाए तो
अकारक और अवेदक है
ऐसा शास्त्र में लिखा है।

00:52:05.000 --> 00:52:12.776
उससे आगे की बात है यह।
लिखा है वह सत्य है परंतु
वह विकल्प है, उसमें अनुभव नहीं होता।

00:52:12.800 --> 00:52:18.096
<b>मैं तो स्वभाव से ही अकर्ता हूँ, प्रभु। </b> आहाहा!

00:52:18.120 --> 00:52:23.908
अब, तेरे कहे हुये इंद्रजाल,
नय को मैं उल्लंघता हूँ

00:52:23.932 --> 00:52:34.380
और मैं अपने स्वभाव के समीप जाकर देखता हूँ
तो मुझे नय की अपेक्षा नहीं है। आहाहा!

00:52:34.400 --> 00:52:44.580
<b>बस, तो नयों के विकल्प छूट जायेंगे
और तुझे अनुभव हो जायेगा।
अनुभव की यह विधि है।</b>

00:52:44.600 --> 00:52:51.496
जिसे अनुभव करना हो न?
उसे यह विधि बताई जाती है।

00:52:51.520 --> 00:53:03.180
<b>ज्ञान की पर्याय निश्चयनय से आत्मा को जानती है
या स्वभाव से जानती है?</b>

00:53:03.200 --> 00:53:08.660
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को जानता है
या स्वभाव से जानता है?
मुमुक्षु:- स्वभाव से जानता है।

00:53:08.680 --> 00:53:19.376
उत्तर:- स्वभाव से जानता है।
तो निश्चयनय से तो झूठा हो जायेगा? झूठा ही है।
आहाहा! हो जायेगा क्या? वह तो झूठालाल है।

00:53:19.400 --> 00:53:26.136
विकल्प है न वह तो?
निश्चयनय का विकल्प भी वस्तु का स्वभाव नहीं है।

00:53:26.160 --> 00:53:29.416
वह तो प्राथमिक शिष्यों को समझाने के लिये होता है।

00:53:29.440 --> 00:53:33.656
यह तो एकदम अंदर जाने की बात है।
समझे? आहाहा!

00:53:33.680 --> 00:53:42.000
आठ वर्ष का बालक भी अनुभव कर सकता है।
तू तो दस-बारह वर्ष का हो गया होगा, या नहीं?

00:53:42.000 --> 00:53:49.700
धीरज नाम है, धीरज उसका,
एक नीरज और एक धीरज।

00:53:49.720 --> 00:54:01.816
अकलंक और निकलंक दो भाई थे न? हाँ, ऐसे ये।
Powerful (पावररफुल, शक्तिशाली) है, हों! हाँ!
उस दिन बोलता था, ओहोहो! गजब है!

00:54:01.840 --> 00:54:04.020
मुमुक्षु:- बड़े पंडितों को
शर्म आये ऐसा है।
उत्तर:- हाँ! ऐसा है।

00:54:04.040 --> 00:54:12.816
मुमुक्षु:- आत्मा में से आये ऐसा।
उत्तर:- Spirit (स्पीरीट, जोश)से बोलता है हों,
आत्मा है न? आहाहा!

00:54:12.840 --> 00:54:25.940
अनंत गुण से भरपूर आत्मा, भगवान आत्मा है।
कौन बालक, कौन युवा और कौन वृद्ध?
उसमें कुछ है नहीं।

00:54:25.960 --> 00:54:33.020
<b>बस, तो नय के विकल्प छूट जायेंगे
और तुझे अनुभव (हो जायेगा)</b>,
ऐसा कहते हैं।

00:54:33.040 --> 00:54:45.700
यदि तू नय को छोड़ देगा तो तुझे अनुभव हो जायेगा।
नय को पकड़ेगा तब तक अनुभव नहीं होगा। आहाहा!

00:54:45.720 --> 00:54:49.940
सोगानीजी ने एक दृष्टांत दिया, सोगानीजी ने।

00:54:49.960 --> 00:54:57.860
एक तोता था, उड़ते-उड़ते
एक नली को पकड़ लिया, घूमती हुई नली।

00:54:57.880 --> 00:55:03.056
ऐसे-ऐसे घूमती थी, नली घूमी
तो सिर उल्टा हो गया उसका।

00:55:03.080 --> 00:55:08.336
नली को पकड़ा और उसका सिर उल्टा हो गया।

00:55:08.360 --> 00:55:19.336
तो दूसरे तोते,
उसको उसकी भाषा में समझाते हैं, छोड़ दे।
इस नली को तू छोड़ दे तो तू उड़ जायेगा।

00:55:19.360 --> 00:55:28.056
तो तोता कहता है कि मैं मर जाऊँगा।
कि तू मरेगा नहीं बल्कि उड़ जायेगा।

00:55:28.080 --> 00:55:35.056
उसकी जाति के कहने लगे न?
इसीलिये उसे समझ में आया,
यदि कौए ने कहा होता तो न छोड़ता।

00:55:35.080 --> 00:55:46.096
समझ में आया?
या किसी बिल्ली ने आकर कहा होता तो?
मुमुक्षु:- तो न छोड़ता।

00:55:46.120 --> 00:55:57.580
उत्तर:- परंतु उसकी जाति के,
उसकी जाति वालों ने कहा कि छोड़ दे, तू उड़ जायेगा।

00:55:57.600 --> 00:56:04.340
एक तोता, दो तोते, तीन तोतो ने,
एक के बाद एक (कहा)। ये सब मेरी ही जाति के हैं,
इसलिये अपने को सच्ची सलाह देते हैं। समझ गये?

00:56:04.360 --> 00:56:07.820
तो उसने इसप्रकार छोड़ दिया, छोड़ते ही उड़ गया।

00:56:07.840 --> 00:56:13.740
इसप्रकार नय को पकड़कर रखा है, छोड़ दे!
अनुभव हो जायेगा तुझे, ऐसा कहते हैं।

00:56:13.760 --> 00:56:32.420
यह नली है, नली (को पकड़कर)
तेरा सिर उल्टा हो गया है।
यह सोगानीजी ने दृष्टांत दिया था।

00:56:32.440 --> 00:56:36.820
<b>बस, तो नय के विकल्प छूट जायेंगे और
तुझे अनुभव हो जायेगा। यह अनुभव की विधि है।</b>

00:56:36.840 --> 00:56:44.216
<b>ज्ञान की पर्याय निश्चयनय से आत्मा को जानती है या
स्वभाव से जानती है?
-स्वभाव से ही जानती है, प्रभु।</b>

00:56:44.240 --> 00:56:47.176
आहाहा! उसे नय की जरूरत नहीं है।

00:56:47.200 --> 00:56:58.020
<b>अनादि-अनंत ज्ञान स्वभाव से ही
आत्मा को जानता हुआ प्रगट होता है। </b> आहाहा!

00:56:58.040 --> 00:57:09.580
सूर्य का प्रकाश सूर्य को
प्रसिद्ध करते हुये ही उदय होता है।

00:57:09.600 --> 00:57:16.300
<b>स्वभाव से ही जानता हो,
उसमें नय की अपेक्षा नहीं होती।
नय तो मात्र स्वभाव का उँगली निर्देश करता है।</b>

00:57:16.320 --> 00:57:21.416
नहीं जानता - समझता उसे इशारे से समझाते हैं।

00:57:21.440 --> 00:57:28.056
<b>पहले व्यवहारनय का पक्ष था
उसे निश्चयनय द्वारा समझाते हैं</b>।

00:57:28.080 --> 00:57:32.576
व्यवहारनय का पक्ष छुड़ाने के लिये
उसे निश्चयनय का अवलंबन दिया,

00:57:32.600 --> 00:57:36.256
कि निश्चयनय से तू विचार कर,
व्यवहारनय से विचार करना छोड़ दे अब।

00:57:36.280 --> 00:57:43.456
कि व्यवहारनय अन्यथा कथन करता है और
निश्चयनय तो वस्तु का जैसा स्वभाव है
वैसा प्रतिपादन करता है।

00:57:43.480 --> 00:57:48.016
इसलिये निश्चयनय सत्यार्थ है, ऐसे।
व्यवहारनय असत्यार्थ है।

00:57:48.040 --> 00:57:52.576
अर्थात् व्यवहार का पक्ष छुड़ाने के लिये
उसे निश्चयनय का अवलंबन दिया।

00:57:52.600 --> 00:57:56.816
<b>तो व्यवहार का पक्ष छूट जाता है
और निश्चय के पक्ष में आता है।</b>

00:57:56.840 --> 00:58:04.216
निश्चय के पक्ष में आता है अब।
व्यवहार का पक्ष छूटता है और
निश्चय के पक्ष में आता है।

00:58:04.240 --> 00:58:08.696
<b>अब कोई तो स्वभाव तक पहुँचकर </b> कोई,

00:58:08.720 --> 00:58:12.336
<b>पहुँचकर पक्षातिक्रांत होकर अनुभव कर लेता है</b>

00:58:12.360 --> 00:58:32.900
<b>और कोई निश्चयनय के पक्ष में</b>
अर्थात् विकल्प में
<b>अटक जाता है, अनुभव नहीं कर सकता</b>।

00:58:32.920 --> 00:58:43.300
<b>अब जो निश्चयनय के द्वारा
स्वभाव का अनुमान करके</b>,
जो कि निश्चयनय तक जो आया है

00:58:43.320 --> 00:58:50.260
वह <b>निश्चयनय द्वारा स्वभाव का अनुमान करके,
अनुभव में चला जाता है।</b>

00:58:50.280 --> 00:58:54.136
अनुमान में आ कर, अनुमान में
अटकता नहीं है अब। आहाहा!

00:58:54.160 --> 00:59:01.856
निश्चयनय द्वारा,
मन द्वारा वस्तु का निर्णय होता है,
अनुमान, अनुमान होता है। आहाहा!

00:59:01.880 --> 00:59:08.136
मैं तो जाननहार हूँ,
अभेद टंकोत्कीर्ण शुद्ध चैतन्यमूर्ति हूँ।

00:59:08.160 --> 00:59:14.136
इसप्रकार व्यवहार का पक्ष छोड़कर,
और निश्चयनय जैसा स्वरूप कहता है

00:59:14.160 --> 00:59:19.696
ऐसे स्वरूप को पहले
मन के द्वारा वह ख्याल में लेता है।

00:59:19.720 --> 00:59:30.216
उसे ख्याल में आता है,
आ सकने योग्य है, ऐसे।
परंतु मन के द्वारा अनुभव नहीं हो सकता।

00:59:30.240 --> 00:59:38.456
मुमुक्षु:- अनुमान द्वारा नहीं होता?
अनुमान द्वारा भी नहीं होता?
उत्तर:- नहीं, अनुभव नहीं होता।

00:59:38.480 --> 00:59:48.376
मुमुक्षु:- अनुमान द्वारा तो
वह उस तक पहुँचता है।
उत्तर:- कहाँ तक पहुँचता है?

00:59:48.400 --> 00:59:53.296
मुमुक्षु:- स्वभाव तक।
दृष्टि में लेता है, अनुमान द्वारा।
उत्तर:- नहीं-नहीं।

00:59:53.320 --> 01:00:05.456
अनुमान द्वारा, मन के विकल्प द्वारा,
परोक्ष ज्ञान द्वारा, आत्मा ऐसा है,
ऐसा ख्याल में लेता है, तब तक दुःखी है।

01:00:05.480 --> 01:00:12.380
तब तक?
मुमुक्षु:- दुःखी है, सही है! सही है!

01:00:12.400 --> 01:00:21.828
उत्तर:- बाद में अनुमान छूट जाता है
और प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है।

01:00:21.852 --> 01:00:26.260
अनुमान में कुछ हाथ में नहीं आया।

01:00:26.280 --> 01:00:29.496
मुमुक्षु:- अनुमान के द्वारा
निश्चय का निर्णय कर लेता है।

01:00:29.520 --> 01:00:34.080
उत्तर:- निर्णय कर लेता है,
मगर जो निर्णय है न, वह दुःखदायक दशा है।

01:00:34.100 --> 01:00:46.220
मुमुक्षु:- वह विकल्पात्मक है।
उत्तर:- हा, वह विकल्पात्मक है।
वह अनंतानुबंधी की कषाय है, अभी।

01:00:46.240 --> 01:00:54.060
नहीं तो उसे ऐसा लगता है कि
मैं अब निर्णय में आ गया।

01:00:54.080 --> 01:01:07.456
निर्णय में आ गया ऐसा जो मानता है,
वह तो निर्णय में भी नहीं है।
निर्णय को आगे करता है उसे निर्णय नहीं होता।

01:01:07.480 --> 01:01:11.296
निर्णय में ज्ञायक तत्त्व आगे होता है,
उसे निर्णय होता है।

01:01:11.320 --> 01:01:14.856
निर्णय पीछे रह जाता है और
ज्ञायक आगे आ जाता है।

01:01:14.880 --> 01:01:31.176
निर्णय की बात कोई अपूर्व है,
साधारण बात नहीं है।
शांतिसागर कहते हैं 'अपूर्व बात है'। आहाहा!

01:01:31.200 --> 01:01:43.496
निर्णयवाला निर्णय को आगे (नहीं) करता।
उसे ख्याल आ जाता है कि
अब सम्यग्दर्शन जरूर होगा।

01:01:43.520 --> 01:01:59.736
वह व्यवहारनय से निशंक हो गया है,
निश्चयनय से अभी निशंक नहीं हुआ।

01:01:59.760 --> 01:02:08.416
क्या कहते हैं शोभनाबेन?
मुमुक्षु:- व्यवहारनय से निशंक अर्थात्?

01:02:08.440 --> 01:02:11.616
उत्तर:- क्या कहा?
मुमुक्षु:- व्यवहारनय से निशंक अर्थात्
- आपने कहा न?

01:02:11.640 --> 01:02:23.736
उत्तर- व्यवहारनय से निशंक हुआ है अर्थात्
कि निशंक नहीं हुआ है, ऐसे। व्यवहारनय लगाया न!

01:02:23.760 --> 01:02:35.296
मुमुक्षु:- निश्चयनय से तो निशंक हो गया।
उत्तर:- निशंक का फल नहीं आया न?
तो क्या निशंक हुआ? निशंक का फल तो...

01:02:35.320 --> 01:02:41.696
मुमुक्षु:- निशंक होकर आगे बढ़ गया।
उत्तर:- आगे बढ़े तब न?
वहाँ रुक जाये तो?

01:02:41.720 --> 01:02:46.816
निर्णय हो गया-निर्णय हो गया,
ऐसे अटक जाता है वह तो। आहाहा!

01:02:46.840 --> 01:02:54.296
निर्णयवाले, मैंने कहा कि निर्णयवाले
निर्णय को आगे नहीं करते।

01:02:54.320 --> 01:03:03.536
निर्णय का विषय उसे आगे हो गया है,
मुख्य हो गया है, निर्णय गौण हो गया है।

01:03:03.560 --> 01:03:17.496
ओहो! मगर रात-दिन उसे
एक ज्ञायक ही स्मरण में आता रहता है। आहाहा!

01:03:17.520 --> 01:03:25.000
यह बात ऐसी है, कोई वचनातीत है,
वचन से कही जा सके ऐसी नहीं है।

01:03:25.020 --> 01:03:33.556
पंचाध्यायी कर्ता ने तीन प्रकार इसमें किये हैं-
(१) वचनातीत है, (२) निर्विकल्पवत् है,
(३) केवल अनुभवगम्य है।

01:03:33.580 --> 01:03:36.008
वह कही नहीं जा सकती।

01:03:36.032 --> 01:03:44.420
सम्यग्दर्शन कहा जा सकता है परंतु
निर्णय नहीं कहा जा सकता। आहाहा!

01:03:44.440 --> 01:03:49.140
क्योंकि सम्यग्दर्शन का लक्षण तो आनंद आया,
वह तो प्रगट हो गया।

01:03:49.160 --> 01:03:52.496
कहा जा सकता है उसके द्वारा, कहना चाहे तो।

01:03:52.520 --> 01:04:01.136
किसी को कहना हो तो,
न कहना हो तो कोई पूछे तो भी जवाब न दे।
तुम्हारा विषय है, हमारा विषय नहीं। आहाहा!

01:04:01.160 --> 01:04:03.416
यह तुम नक्की करो बस!

01:04:03.440 --> 01:04:18.180
परंतु यह जो निर्णय आता है वह तो कहा भी नहीं जा सकता।
परंतु एक अपेक्षा से उसे नैगमनय लागु पड़ गया।

01:04:18.200 --> 01:04:28.380
'चिरम अचिरम' थोड़े या ज्यादा समय में,
उसे प्रत्यक्ष अनुभव होगा, होगा और होगा।

01:04:28.400 --> 01:04:34.256
वह स्वयं निशंक हो गया है,
परंतु अभी व्यवहार से निशंक है,
निश्चय से निशंक नहीं हुआ है,

01:04:34.280 --> 01:04:41.300
क्योंकि आनंद नहीं आया। शोभनाबहन!

01:04:41.320 --> 01:04:52.500
अनुभव से निशंक (हुआ वह) अलग बात है
और निर्णय में आया और निशंक
वह बात अलग प्रकार की है। आहाहा!

01:04:52.520 --> 01:05:01.020
वह तो एक,
एक ज्ञायक की कोई अंदर में धारा उठती है।
समझ गये? उसकी मुख्यता की।

01:05:01.040 --> 01:05:10.380
जैसे सम्यग्दृष्टि को परिणति प्रगट होती है न?
परिणति, अनुभव के बाद चालू रहती है परिणति,

01:05:10.400 --> 01:05:19.180
वैसे इस निर्णयवाले को, प्रकाश(भाई),
एक परिणति अंदर में प्रगट होती है। आहाहा!

01:05:19.200 --> 01:05:34.860
वह परिणति धरावाही रहती है नींद में भी।
उसका व्यय कब हो कि जब प्रत्यक्ष होता है तब,
फिर उसका व्यय हो जाता है।

01:05:34.880 --> 01:05:43.900
यह तो कोई गुप्त रखने की बात तो है नहीं।
खुल्ले रूप में कहने में आती है।

01:05:43.920 --> 01:05:51.540
मुमुक्षु:- स्वयं को ही अंदर
पता चलता है कि ऐसा हो सकता है।
उत्तर:- दूसरे किसी को नहीं। दूसरे का विषय ही नहीं है।

01:05:51.560 --> 01:05:55.896
दूसरा कोई जान सकता नहीं
और जिसे हुआ वह कह सकता नहीं।

01:05:55.920 --> 01:06:01.820
दूसरा जान नहीं सकता और
जिसे हुआ हो वह वाणी द्वारा कह सकता नहीं।

01:06:01.840 --> 01:06:07.016
वह वचनातीत,
निर्विकल्पवत्,
केवल स्वानुभवगम्य।

01:06:07.040 --> 01:06:17.940
वह स्वयं जानता है। बस! दूसरा कोई जान नहीं सकता।

01:06:17.960 --> 01:06:25.840
और लगभग उसका काल दिखाई देता है, लगभग।
बाकी तो कितनी ही बातें तो केवली गम्य हैं।

01:06:25.960 --> 01:06:30.700
परंतु छह महीने से ज्यादा लंबा समय नहीं होता,
छह महीने के अंदर उसे अनुभव हो जाता है।

01:06:30.720 --> 01:06:40.416
या घंटों, या दिनों,
या थोड़े महीनों में बस,
उसमें अनुभव उसे आता है।

01:06:40.440 --> 01:06:48.056
वह भी होने योग्य होता है,
उसे आत्मा करता नहीं है। आहाहा!

01:06:48.080 --> 01:06:56.656
वह तो जाननहार को ही जानता है बस!
उसे तो धुन लगती है 'मैं तो ज्ञायक हूँ,
चिदानंद आत्मा हूँ'। आहाहा!

01:06:56.680 --> 01:07:04.936
निर्णय का मेरे में अभाव है। क्या कहा?
निर्णयवाला ऐसा जानता है, त्रंबकभाई!

01:07:04.960 --> 01:07:15.420
इस अपूर्व निर्णय का मेरे में
अभाव है क्योंकि वह पर्याय है। आहाहा!

01:07:15.440 --> 01:07:25.220
मुमुक्षु:- उसे छह महीने भी नहीं लगते।
उत्तर:- नहीं लगते। वह तो अंतर्मुहूर्त में हो जाता है,
किसी-किसी को तो। आहाहा!

01:07:25.240 --> 01:07:33.776
सोगानीजी को एक रात में हो गया था।
एक रात में 'ज्ञान भिन्न और राग भिन्न'
धुन चढ़ गई।

01:07:33.800 --> 01:07:40.976
रात को बैठ गये समीति के कमरे में।
सवेरे रत्नत्रय जेब में लेकर उठे।

01:07:41.000 --> 01:07:53.420
तीन रत्न, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र।
आहाहा! एक रात में।

01:07:53.440 --> 01:07:59.420
<b>अनुभव नहीं कर सकता।
अब जो निश्चयनय के द्वारा
स्वभाव का अनुमान करके,</b>

01:07:59.440 --> 01:08:07.176
<b>अनुभव में चला जाता है, पक्षातिक्रांत होता है,
उसने निश्चयनय का पक्ष भी छोड़ा
तब अनुभव हुआ।</b>

01:08:07.200 --> 01:08:10.176
पक्ष छोड़े तब अनुभव होता है।

01:08:10.200 --> 01:08:21.256
<b>'नय से ऐसा हूँ' ऐसा विकल्प छूट जाता है।
अनुभव के लिये नय साधन ही नहीं है</b>।
निर्णय के लिये होता है, अनुभव के लिये नहीं होता।

01:08:21.280 --> 01:08:25.896
<b>नय मात्र अनुमान तक ले जाता है,
वह अनुभव नहीं करा सकता।</b>

01:08:25.920 --> 01:08:30.628
नय के विकल्प हैं वे
अनुभव नहीं करा सकते,
क्योंकि परोक्ष हैं,

01:08:30.652 --> 01:08:42.456
नय हैं वे परोक्ष हैं
और ज्ञान है वह प्रत्यक्ष है। बड़ा अंतर है।
लो, यह चौथे पेज का पहला पैराग्राफ हुआ।

01:08:42.480 --> 01:08:58.256
<b>ज्ञान की पर्याय निश्चयनय से आत्मा को जानती है
ऐसा विचारने पर व्यवहारनय से
वह पर को जानता है, ऐसा आ गया।</b>

01:08:58.280 --> 01:09:02.896
वह प्रमाण में आ गया।
नय में कहाँ आया है वह?

01:09:02.920 --> 01:09:09.456
नय में आया कब कहलाता है,
कि व्यवहारनय का निषेध करे
तो निश्चयनय में आया।

01:09:09.480 --> 01:09:20.976
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को जानता है और व्यवहारनय से
पर को जानता है, वह तो प्रमाण के पक्ष में खड़ा है।
वह निश्चयनय के पक्ष में नहीं आया।

01:09:21.000 --> 01:09:29.096
निश्चयनय के पक्ष में तो व्यवहार का निषेध करे,
तब वह निश्चयनय के पक्ष में आया कहलाता है अभी,

01:09:29.120 --> 01:09:34.416
कि 'जाननहार जानने में आता है,
वास्तव में पर जानने में नहीं आता'।

01:09:34.440 --> 01:09:43.548
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को जानता है और
व्यवहारनय से पर को जानता है, वह तो प्रमाण का
विकल्प है, नय का विकल्प भी नहीं है।

01:09:43.572 --> 01:09:48.176
वह तो बहुत दूर दिखता है। आहाहा!

01:09:48.200 --> 01:10:00.376
परंतु एक जीव उसमें से निकालता है कि
निश्चयनय से आत्मा जानने में आता है
और वास्तव में पर जानने में नहीं आता,

01:10:00.400 --> 01:10:03.376
व्यवहार का निषेध करे उसका ही
नाम निश्चयनय कहलाता है।

01:10:03.400 --> 01:10:10.576
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को जानता है
और व्यवहारनय से पर को जानता है,
वह निश्चयनय के पक्ष में नहीं आया,

01:10:10.600 --> 01:10:17.336
वह प्रमाण के पक्ष में खड़ा है। आहाहा!
वह विधि-निषेध में भी नहीं आया है अभी।

01:10:17.360 --> 01:10:26.180
वह निश्चयनय के पक्ष में भी नहीं आ सकता।
उसे निश्चय के पक्ष में आया ऐसा नहीं कह सकते।

01:10:26.200 --> 01:10:30.900
यह एक भूल का प्रकार है

01:10:30.920 --> 01:10:36.860
'हम दो नयों से विचारते हैं,
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को जानता है और
व्यवहारनय से पर को जानता है'। आहाहा!

01:10:36.880 --> 01:10:45.180
वह प्रमाण में अटका है।
प्रमाण के दो अंश हैं,
निश्चयनय और व्यवहारनय।

01:10:45.200 --> 01:10:57.416
उसमें से प्रमाण में से निश्चयनय के पक्ष में आता है कि
'जाननहार जानने में आता है, वास्तव में पर जानने में नहीं आता'
ऐसे विधि-निषेध में आता है।

01:10:57.440 --> 01:11:11.260
फिर (निषेध) के विकल्प भी छूटने लगते हैं,
निषेध के विकल्प छूटने लगते हैं,
और विधि के विकल्प का बल आता है। आहाहा!

01:11:11.280 --> 01:11:18.620
निषेध का पक्ष छूटता जाता है
तब उसे द्वेष घटता जाता है, और

01:11:18.640 --> 01:11:25.856
'जाननहार जानने में आता है' ऐसे निश्चय के पक्ष में आये
तब यहाँ शुभराग, राग के पक्ष में आया,
द्वेष का पक्ष छूटा।

01:11:25.880 --> 01:11:33.176
फिर अनुभव करे तो
राग-द्वेष दोनों छूटकर अनुभव होता है। आहाहा!

01:11:33.200 --> 01:11:38.376
'दो नय भगवान ने कहे हैं' -
वह प्रमाण के पक्ष में खड़ा है। आहाहा!

01:11:38.400 --> 01:11:44.736
दो नय कहे हैं परंतु
एक में, निश्चयनय के द्वारा
व्यवहार का निषेध करने को कहा है।

01:11:44.760 --> 01:11:55.220
स्वआश्रित निश्चयनय के द्वारा तू व्यवहार का
निषेध करना, दया मत रखना, 'अदयम' पाठ है।

01:11:55.240 --> 01:12:00.740
<b>ज्ञान की पर्याय निश्चयनय से आत्मा को जानती है
ऐसा विचारने पर व्यवहारनय से वह पर को जानती है,
ऐसा आ गया।</b>

01:12:00.760 --> 01:12:08.060
<b>अरे! निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को नहीं जानता</b>।
बोलो! आहाहा!

01:12:08.080 --> 01:12:17.420
पर को नहीं जानता उसमें व्यवहार का निषेध हुआ।
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को नहीं जानता उसमें
निश्चयनय का निषेध आया।

01:12:17.440 --> 01:12:21.896
हाय-हाय! निश्चयनय का निषेध यह क्या?
यह बात तो सुनी नहीं है कभी।

01:12:21.920 --> 01:12:27.376
व्यवहारनय का निषेध तो ठीक है,
परंतु निश्चयनय का निषेध?

01:12:27.400 --> 01:12:32.856
कि निश्चयनय के विकल्प का निषेध है,
उसके विषय का निषेध नहीं है।

01:12:32.880 --> 01:12:40.136
<b>जहाँ जहाँ जो जो योग्य है, वहाँ समझना तेह;
वहाँ वहाँ वही वही आचरे आत्मार्थी जन वह</b>
(श्री आत्मसिद्धिशास्त्र, गाथा ८)।

01:12:40.160 --> 01:12:46.416
किस अपेक्षा से कहने में आता है?
यहाँ क्या प्रयोजन सिद्ध करना है?

01:12:46.440 --> 01:12:53.340
वह समझना चाहिये।
यहाँ नयातिक्रांत का विषय चलता है।

01:12:53.360 --> 01:12:59.180
<b>व्यवहारनय से पर को जानता है,
ऐसा आ गया। अरे!
निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को नहीं जानता।</b>

01:12:59.200 --> 01:13:08.056
अरे! निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को नहीं जानता?
तो क्या व्यवहारनय से जानता है
ऐसा आप कहना चाहते हो?

01:13:08.080 --> 01:13:12.856
अरे भाई! यह तो ऊँचे-ऊँचे चढ़ने की बात है।
कहाँ नीचे उतर गया वापस?

01:13:12.880 --> 01:13:30.460
वह व्यवहार के पक्ष की गंध है न!
नरेनभाई, यह तो भाग्यशाली हो
उसके कान में बात आती है। पक्षातिक्रांत की बात है।

01:13:30.480 --> 01:13:35.420
<b>ज्ञान आत्मा को नहीं जानता।
स्वभाव से ही जानता है।</b>
नय की क्या जरूरत है?

01:13:35.440 --> 01:13:39.216
<b>तो कोई नय ही नहीं रहा, स्वभाव हाथ में आ गया।</b>

01:13:39.240 --> 01:13:44.016
कोई विकल्प नहीं रहा और
स्वभाव (की) दृष्टि, अनुभव हो गया निर्विकल्प।

01:13:44.040 --> 01:13:55.376
<b>यह बात कोई अपूर्व है</b>।
यह बात 'निश्चयनय से आत्मा को नहीं जानता?
कि हाँ! नहीं जानता।' वह बात अपूर्व है।

01:13:55.400 --> 01:13:59.068
'निश्चयनय से आत्मा को जानता है ज्ञान'
वह बात सुनी है,

01:13:59.092 --> 01:14:17.860
परंतु 'निश्चयनय से ज्ञान आत्मा को नहीं जानता'
वह बात तूने सुनी नहीं। आहाहा!
शांतिसागर ऐसी बात है।

01:14:17.880 --> 01:14:23.140
<b>तो कोई नय ही नहीं रही
स्वभाव हाथ में आ गया।
यह बात कोई अपूर्व है।</b>

01:14:23.160 --> 01:14:26.616
<b>नयातीत होने के लिये यह बात है।</b>

01:14:26.640 --> 01:14:32.576
विकल्पातीत होकर अनुभव कैसे हो,
उसकी मुख्यता से बात चलती है।

01:14:32.600 --> 01:14:36.816
<b>स्वभाव से ही स्वभाव जानने में आता है।</b>
नय से जानने में नहीं आता।

01:14:36.840 --> 01:14:42.860
<b>-नय से स्वभाव की प्रसिद्धि ही नहीं हुई।</b>

01:14:42.880 --> 01:14:51.976
अनंतबार नय तक आ गया,
नवमें ग्रैवेयक में गया परंतु अनुभव नहीं हुआ।
<b>नय साधन ही नहीं है। </b> लो!

01:14:52.000 --> 01:14:58.580
व्यवहारनय तो साधन नहीं
परंतु निश्चयनय भी (साधन नहीं)।

01:14:58.600 --> 01:15:05.260
साधन नहीं किंतु बाधक है।

01:15:05.280 --> 01:15:14.820
<b>यदि नय साधन हो तो तो पक्षातिक्रांत
होने के काल में नय रहनी चाहिये</b>, साधन हो तो!

01:15:14.840 --> 01:15:23.020
<b>परंतु तब तो कोई नय रहता नहीं।
इसलिये नय स्वभाव की सिद्धि
के लिये साधन ही नहीं है।</b>

01:15:23.040 --> 01:15:27.632
विकल्पात्मक ज्ञान स्वभाव को
अनुभव करने का साधन (ही नहीं है)।

01:15:27.656 --> 01:15:28.656
