﻿WEBVTT LA411

00:01:11.760 --> 00:01:35.890
२२ (वाँ) पेज पूरा हुआ। २३वाँ आता है।
बोलो।

00:01:35.915 --> 00:01:41.823
मुमुक्षु:- <b>इसलिए पर्याय की कर्ता
पर्याय स्वभाव से ही है।</b>

00:01:41.848 --> 00:01:55.551
<b>निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है
ऐसा भी नहीं लेना।
किसी नय से स्वरूप की प्राप्ति नहीं है...</b>

00:01:55.576 --> 00:02:04.729
<b>ज्ञान से स्वरूप की प्राप्ति है।
स्वभाव से स्वभाव की प्राप्ति है।</b>
इस तरफ, २३ पेज।

00:02:04.754 --> 00:02:10.640
उत्तर:- २३ पेज। २३ पेज की दूसरी लाइन।

00:02:10.665 --> 00:02:14.707
मुमुक्षु:- <b>इसलिए पर्याय की कर्ता पर्याय
स्वभाव से ही है।</b>

00:02:14.732 --> 00:02:19.307
<b>निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है
ऐसा भी नहीं लेना।</b>

00:02:19.332 --> 00:02:41.133
उत्तर:- ऐसा लेने से क्या होगा?
कि निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है तो
व्यवहारनय से आ जायेगा, प्रतिपक्ष, इसप्रकार।

00:02:41.158 --> 00:02:42.997
तो व्यवहारनय से आत्मा (पर्याय को) करता है।

00:02:43.080 --> 00:02:51.267
निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है
तो व्यवहानय से आत्मा पर्याय को करता है,

00:02:51.292 --> 00:02:59.827
ऐसा कहे बिना आ जायेगा अंदर,
अतः कर्ताबुद्धि छूटेगी ही नहीं।

00:02:59.852 --> 00:03:06.249
व्यवहार के नाम पर भी कर्ताबुद्धि पुष्ट हो जाती है।

00:03:06.274 --> 00:03:19.535
और व्यवहार से पर्याय का ज्ञाता है
उसमें ज्ञाताबुद्धि का पुष्ट हो जाती है। क्या कहा?

00:03:19.560 --> 00:03:21.760
मुमुक्षु:- व्यवहार से पर्याय का ज्ञाता है।
उत्तर:- ज्ञाता है।

00:03:21.785 --> 00:03:24.020
मुमुक्षु:- उसमें ज्ञाताबुद्धि पुष्ट हो जाती है।
उत्तर:- (उसमें ज्ञाताबुद्धि) पुष्ट हो जाती है।

00:03:24.045 --> 00:03:29.338
मुमुक्षु:- कर्ता का जहर निकल गया।
उत्तर:- निश्चयनय से, लिखते हैं,

00:03:29.363 --> 00:03:33.360
<b>निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है
ऐसा भी नहीं लेना।</b>

00:03:33.385 --> 00:03:37.609
ऐसा लोगे तो व्यवहारनय से आत्मा उसे करता है।

00:03:37.634 --> 00:03:44.520
निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है और
व्यवहारनय से, प्रतिपक्षनय तो तुम्हें लेना पड़ेगा,

00:03:44.545 --> 00:03:50.320
क्योंकि नय तो सापेक्ष होते हैं,
<b>निरपेक्षा नया मिथ्या</b> (आप्त-मीमांसा, गाथा १०८)।

00:03:50.345 --> 00:03:54.253
मुमुक्षु:- निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है
तो व्यवहारनय से आत्मा पर्याय को करता है।

00:03:54.278 --> 00:04:03.587
उत्तर:- (आत्मा) पर्याय को करता है
ऐसा आये बगैर रहेगा ही नहीं,
अतः कर्ताबुद्धि ही रही, नय के नाम पर।

00:04:03.612 --> 00:04:13.725
मुमुक्षु:- नय में कर्ताबुद्धि होती है।
उत्तर:- (हाँ)। नय जो उठता है वहाँ
नय का कर्ता बन गया, ऐसा कहते हैं।

00:04:13.750 --> 00:04:17.325
नय में कर्ताबुद्धि है। क्या कहा?
मुमुक्षु:- नय में कर्ताबुद्धि है।

00:04:17.350 --> 00:04:34.702
उत्तर:- ज्ञान में कर्ताबुद्धि नहीं होती।
काल पका होगा उसका काम हो जायेगा।

00:04:34.727 --> 00:04:40.747
<b>निश्चयनय से पर्याय पर्याय को करती है
ऐसा भी नहीं लेना।</b>
ऐसा लेने में क्या दोष आता है?

00:04:40.772 --> 00:04:49.173
कि आत्मा व्यवहार से कर्ता पर्याय का आ जायेगा,
अर्थात् कर्ताबुद्धि छूटेगी नहीं तेरी, इसप्रकार।
फिर आगे।<b>किसी नय से</b>...

00:04:49.198 --> 00:05:02.440
मुमुक्षु:- <b>किसी नय से स्वरूप की प्राप्ति नहीं है।</b>
उत्तर:- आहाहा! अर्थात् निश्चयनय से नहीं है
और व्यवहारनय से नहीं है, <b>किसी नय से</b> ऐसा कहा।

00:05:02.465 --> 00:05:07.129
नय से देखोगे तो कर्ताबुद्धि रह जायेगी।
कहा ना अभी?

00:05:07.154 --> 00:05:15.596
नय का अवलंबन लोगे तो नय का कर्ता हो जायेगा,
ज्ञान प्रगट नहीं होगा, नय प्रगट होगा।

00:05:15.621 --> 00:05:26.511
<b>श्रुतविकल्पा नया</b>
(समयसार गाथा १४९, तात्पर्यवृत्ति टीका)
श्रुतज्ञान का भेद, उसे विकल्प कहते हैं। आहाहा!

00:05:26.536 --> 00:05:34.689
<b>किसी नय से</b>, बोलो।
मुमुक्षु:- <b>किसी नय से स्वरूप की प्राप्ति नहीं है...
ज्ञान से स्वरूप की प्राप्ति है।</b>

00:05:34.714 --> 00:05:39.689
उत्तर:- <b>किसी नय से</b> ऐसा। दोनों में से <b>किसी नय</b>, ऐसा कहा।

00:05:39.714 --> 00:05:54.867
व्यवहारनय से प्राप्ति नहीं है और
निश्चयनय से प्राप्ति है, ऐसा नहीं है, ऐसा कहते हैं।
<b>किसी नय</b> ये शब्द प्रयोग किया है न?

00:05:54.892 --> 00:06:06.516
मुमुक्षु:- <b>ज्ञान से स्वरूप की प्राप्ति है।</b>
अर्थात् कि <b>स्वभाव से स्वभाव की प्राप्ति है।</b>

00:06:06.541 --> 00:06:21.293
<b>पर्याय को उसके स्वभाव से देखने पर
उसकी करने की बुद्धि छूट जाती है
और करने का उपचार भी छूट जाता है।</b>

00:06:21.318 --> 00:06:27.338
उत्तर:- मिथ्यात्व का दोष तो छूटता है
परंतु चारित्र का दोष छूटकर श्रेणी आ जाती है,
ऐसा कहते हैं।

00:06:27.363 --> 00:06:36.965
शुद्धोपयोग हो जाता है।
पहले शुद्धोपयोग और फिर आगे बढ़े तो श्रेणी।
जैसा काल, उसका स्वकाल।

00:06:36.990 --> 00:06:44.409
दो दोष निकल जाते हैं। आहाहा!
गूढ़ है गूढ़ हों, सब कुछ।

00:06:44.434 --> 00:06:51.495
फिर से <b>पर्याय को</b>...
मुमुक्षु:- <b>पर्याय को उसके स्वभाव से देखने पर।</b>
उत्तर:- <b>उसकी</b> अर्थात् पर्याय की...

00:06:51.520 --> 00:06:57.142
मुमुक्षु:- पर्याय की <b>करने की बुद्धि छूट जाती है।</b>
उत्तर:- आहाहा! होने योग्य होता है।

00:06:57.167 --> 00:07:04.965
पर्याय को उसके स्वभाव से देखो।
'मैं करता हूँ' वह निकल जायेगा।
आहाहा! बुद्धि छूट जायेगी।

00:07:04.990 --> 00:07:09.698
कर्ताबुद्धि छूटेगी तो मिथ्यात्व छूटेगा पहले।

00:07:09.723 --> 00:07:22.191
और फिर उपचार, कर्तानय,
कर्तानय से तो कर्ता है न?
'कर्तानय से तो कर्ता है न' वह शल्य रह जाता है।

00:07:22.216 --> 00:07:31.127
'कर्तानय से तो राग का कर्ता है या नहीं?'
ऐसा प्रश्न बहुत आता है मेरे सामने।

00:07:31.172 --> 00:07:39.636
<b>और करने का उपचार भी छूट जाता है</b>
और शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:07:39.661 --> 00:07:43.413
पहले कर्ताबुद्धि जाती है
तो शुद्धोपयोग में सम्यग्दर्शन,

00:07:43.438 --> 00:07:53.507
और उपचार गया तो
चारित्र का शुद्धोपयोग आता है, लीनता।
समझ में आया?

00:07:53.532 --> 00:08:02.662
मुमुक्षु:- परमार्थ प्रतिक्रमण में सातवाँ
गुणस्थान आ गया उपचार का निषेध आया तो।
उत्तर:- हाँ! सातवाँ आ गया।

00:08:02.687 --> 00:08:08.796
कर्ताबुद्धि तो गई थी पहले,
तो सम्यग्दर्शन तो हो गया था।

00:08:08.821 --> 00:08:18.885
लेकिन परमार्थ प्रतिक्रमण नहीं हुआ था,
व्यवहार प्रतिक्रमण आता था-विकल्प।
आहाहा! विषकुंभ आता था।

00:08:18.910 --> 00:08:32.978
स्वयं विषकुंभ कहते हैं हों,
छठ्ठे गुणस्थान में-विकल्प को।
तीसरी भूमि आयी, अमृतकुंभ हो गया। आहाहा!

00:08:33.003 --> 00:08:39.556
प्रतिक्रमण और अप्रतिक्रमण से अलग,
तीसरी अप्रतिक्रमण। आहाहा!

00:08:39.581 --> 00:08:46.135
मिथ्यादृष्टि के अप्रतिक्रमण का तो
निषेध करते ही आये हैं,
वह तो जहर का घड़ा है ही, विषकुंभ।

00:08:46.160 --> 00:08:51.667
उसकी तो हम बात ही करते नहीं,
मिथयादृष्टि का अप्रतिक्रमण।

00:08:51.692 --> 00:09:00.360
परंतु सम्यग्दृष्टि को प्रतिक्रमण का विकल्प उठता है,
वह भी जहर का घड़ा है, विषकुंभ है।

00:09:00.385 --> 00:09:06.027
इसीलिए तीसरी भूमिका में जाने पर अमृतकुंभ,
अप्रतिक्रमण। आहाहा!

00:09:06.052 --> 00:09:09.757
मुमुक्षु:- प्रतिक्रमण विषकुंभ?
उत्तर:- प्रतिक्रमण विषकुंभ।

00:09:09.782 --> 00:09:11.600
मुमुक्षु:- अप्रतिक्रमण वह?
उत्तर:- (अप्रतिक्रमण) अमृतकुंभ।

00:09:11.600 --> 00:09:23.205
तब ऐसा प्रश्न उठता है कि 'हमारा यह अप्रतिक्रमण'?
यह मिथ्यादृष्टि का नहीं है, वह तो पाप का घड़ा है,
उसकी बात तो हम करते ही नहीं हैं। आहाहा!

00:09:23.230 --> 00:09:29.293
यह समयसार में भरा है सब हों, माल।

00:09:29.318 --> 00:09:41.387
उपचार भी छूट जाता है, उपचार को छोड़ता
नहीं है अभ, छोड़े तो कर्ताबुद्धि हो जाये!
मुमुक्षु:- सही है। छूट जाती है।

00:09:41.412 --> 00:09:49.253
मुमुक्षु:- उपचार के जो विशेषण
होने योग्य होता है।
उत्तर:- बस! आगे।

00:09:49.278 --> 00:09:58.342
मुमुक्षु:- <b>कार्य स्वयं होता हो उसमें दूसरा करे
ऐसे उपचार का अवकाश ही कहाँ है?</b>

00:09:58.367 --> 00:10:06.853
<b>कार्य स्वयं होता हो उसमें दूसरा करे
ऐसे उपचार का अवकाश ही कहाँ है?</b>

00:10:06.878 --> 00:10:14.969
उत्तर:- निर्मल पर्याय स्वयं होती है
उसे आत्मा करता है
ऐसा कहाँ रहा उसमें? अवकाश नहीं है।

00:10:14.994 --> 00:10:22.347
मुमुक्षु:- <b>बस स्वयं से होता है।
आत्मा ज्ञाता हो जाता है।</b>

00:10:22.372 --> 00:10:41.125
उत्तर:- आहाहा! माल भरा है बहन!
माल, मालामाल हो जाये। आहाहा! आगे।

00:10:41.150 --> 00:10:49.173
मुमुक्षु:- <b>नय के विकल्पों में
वह विकल्प का कर्ता बन जाता है।</b>

00:10:49.198 --> 00:10:57.618
उत्तर:- अभी कहा न?
नय के विकल्प में आत्मा कर्ता हो जाता है।
कहा था न बहन ने, यह।

00:10:57.643 --> 00:11:05.418
मुमुक्षु:- <b>नय के विकल्पों में
वह विकल्प का कर्ता बन जाता है,
राग का कर्ता बन जाता है।</b>

00:11:05.443 --> 00:11:17.751
<b>उसे पता ही नहीं चलता।
यदि विकल्प छूटे तो ज्ञान प्रगट होवे,
तो ज्ञान का कर्ता बने।</b>

00:11:17.776 --> 00:11:26.289
<b>ज्ञाता हो जाता है - यह रहस्य है।</b>

00:11:26.314 --> 00:11:34.467
<b>नय के विकल्पों में वह विकल्प का
कर्ता बन जाता है, राग का कर्ता बन जाता है।
उसे पता ही नहीं चलता।</b>

00:11:34.492 --> 00:11:40.289
उत्तर:- दो बातें आयी,
इन्द्रियज्ञान का कर्ता और राग का कर्ता।

00:11:40.314 --> 00:11:53.533
मुमुक्षु:- <b>यदि विकल्प छूटे तो ज्ञान प्रगट होवे,
तो ज्ञान का कर्ता बने।
ज्ञाता हो जाता है - यह रहस्य है।</b>

00:11:53.558 --> 00:11:55.911
उत्तर:- पहले कहा
कि ज्ञान का कर्ता बनता है।

00:11:55.936 --> 00:12:03.652
फिर कहते हैं '(ज्ञान का) कर्ता' भी नहीं,
ज्ञाता हो जाता है, ऐसा कहा।
वहाँ पूर्णविराम होता है।

00:12:03.677 --> 00:12:11.205
कर्ता का उपचार कहना पड़ा लेकिन
असल में ज्ञाता है, यह रहस्य है।

00:12:11.230 --> 00:12:27.895
कहना पड़ता है, राग का कर्ता होता था वह
ज्ञान का कर्ता हुआ अब, ऐसा कहना पड़ता है।
<b>ज्ञाता हो जाता है - यह रहस्य है।</b>

00:12:27.920 --> 00:12:34.587
यह रहस्यपूर्ण चिठ्ठी है न?
इसलिए रहस्य शब्द है।

00:12:34.612 --> 00:12:38.142
मुमुक्षु:- <b>श्री समयसार श्लोक-९५</b>।

00:12:38.167 --> 00:12:50.587
<b>श्लोकार्थ:- [विकल्पकः परं कर्ता]
विकल्प करनेवाला ही केवल कर्ता है</b>

00:12:50.612 --> 00:12:57.253
<b>और [विकल्पः केवलम् कर्म]
विकल्प ही केवल कर्म है;</b>

00:12:57.278 --> 00:13:01.187
<b>(अन्य कोई कर्ता-कर्म नहीं है;)</b>

00:13:01.212 --> 00:13:19.535
<b>[सविकल्पस्य] जो जीव विकल्प सहित है उसका
[कर्तृकर्मत्वं] कर्ताकर्मपना [जातु] कभी
[नश्यति न] नष्ट नहीं होता।</b>

00:13:19.560 --> 00:13:27.969
<b>विकल्प करनेवाला ही केवल कर्ता है
और विकल्प ही केवल कर्म है;
(अन्य कोई कर्ता-कर्म नहीं है;)</b>

00:13:27.994 --> 00:13:36.013
<b>जो जीव विकल्प सहित है
उसका कर्ताकर्मपना कभी नष्ट नहीं होता।</b>

00:13:36.038 --> 00:13:44.569
उत्तर:- कर्ता-कर्म अधिकार में
आत्मा और आस्रव - राग का भेदज्ञान कराया।

00:13:44.594 --> 00:13:53.551
आस्रव कहो या राग कहो,
आकुलतामय है, अचेतन जड़ है,
उससे भेदज्ञान कराके अनुभव कराया।

00:13:53.576 --> 00:14:03.151
और जब नयों के विकल्प में उलझ गया था
उसे फिर कर्ता-कर्म अधिकार में ही
विकल्प कर्म बनता था, नय का विकल्प।

00:14:03.176 --> 00:14:08.951
पहले शुरुआत में राग कर्म बनता था,
फिर विकल्प कर्म बना।

00:14:08.976 --> 00:14:16.640
विकल्प, अर्थात् कि इन्द्रियज्ञान, कर्म बना।
उसमें राग कर्म बनता था,
इसमें इन्द्रियज्ञान कर्म बना।

00:14:16.665 --> 00:14:19.329
<b>श्रुतविकल्पा नया</b> (समयसार गाथा १४९,
तात्पर्यवृत्ति टीका) है न, इसलिए।

00:14:19.354 --> 00:14:28.089
अर्थात् वह कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति यहाँ तक रहती थी,
नय का विकल्प, नय उठा अर्थात् विकल्प हो गया
और उसका कर्ता बन गया। आहाहा!

00:14:28.114 --> 00:14:35.822
उसे ऐसा लगता है कि मैं राग का कर्ता नहीं हूँ,
उसे ऐसा लगता है।

00:14:35.847 --> 00:14:44.111
क्योंकि जैसा स्वरूप है ऐसा मैं विचार करता हूँ,
उसमें कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति तो आती नहीं है।
आहाहा!

00:14:44.136 --> 00:14:51.000
परंतु वह राग का कर्ता और
इन्द्रियज्ञान का कर्ता बन जाता है,
दोनों साथ में हैं अविनाभाव।

00:14:51.025 --> 00:14:57.511
मुमुक्षु:- इन्द्रियज्ञान का कर्ता भी राग का
कर्ता (बन) ही जाता है। इन्द्रियज्ञान कर्म बना।
उत्तर:- बन ही जाता है। बस!

00:14:57.536 --> 00:15:03.255
इसीलिए कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति
यहाँ तक ले ली। आहाहा!

00:15:03.280 --> 00:15:11.516
पक्षातिक्रांत न होवे तब तक
विकल्प का कर्ता (होता है)। आहाहा!

00:15:11.541 --> 00:15:17.093
वह ऊपर आ गया है न?
<b>नयों के विकल्पों में वह विकल्प का कर्ता
बन जाता है, राग का कर्ता बन जाता है।</b>

00:15:17.118 --> 00:15:33.516
दोनों लिये न ऊपर।
नय का कर्ता, नय के विकल्प का
और राग का कर्ता, दोनों आ गये न!

00:15:33.541 --> 00:15:44.542
मुमुक्षु:- <b>भावार्थ:- जब तक विकल्पभाव है
तब तक कर्ताकर्मभाव है;</b>

00:15:44.567 --> 00:15:48.535
<b>जब तक विकल्पभाव है
तब तक कर्ताकर्मभाव है।</b>

00:15:48.560 --> 00:15:57.775
उत्तर:- अर्थात् अनादि से जब तक
विकल्प की लार चली आती है,
एक समय भी कट नहीं हुई, समझ गये?

00:15:57.800 --> 00:16:04.253
एक समय भी कटी नहीं है, उससे भिन्न पड़ा नहीं है,
निर्विकल्पभाव आया नहीं
और विकल्प चला करते हैं अभी।

00:16:04.278 --> 00:16:10.725
ऐसा अनादि का प्रवाह विकल्प का जो था,
वह <b>जब तक विकल्पभाव है</b>।

00:16:10.750 --> 00:16:20.436
ऐसे, अनादि से प्रवाह क्रम,
वह टूटा नहीं है <b>तब तक कर्ताकर्म भाव</b>
नय के विकल्प के साथ <b>है</b>।

00:16:20.461 --> 00:16:24.013
<b>जब विकल्प का अभाव होता है</b>, इसप्रकार।

00:16:24.038 --> 00:16:32.725
अर्थात् विकल्प के साथ एकताबुद्धि टूटकर
निविकल्प अनुभव हो
तब प्रथम सम्यग्दर्शन होता है।

00:16:32.750 --> 00:16:41.613
<b>विकल्प का अभाव हो जाता है तब
कर्ताकर्मभाव का भी अभाव हो जाता है।</b>
तब ज्ञाता-ज्ञेय अंदर में आया, बस। आहाहा!

00:16:41.638 --> 00:16:46.907
फिर बाहर में ज्ञाता-ज्ञेय व्यवहार कहा जाता है,
जाना हुआ प्रयोजनवान, वह बाद में।

00:16:46.932 --> 00:16:52.129
पहले ज्ञाता-ज्ञेय अभेद होता है यहाँ।

00:16:52.154 --> 00:16:59.129
ज्ञाता की व्याख्या ही वह कही स्वयं स्वयं को
जानता है इसलिए आत्मा का नाम ज्ञाता है
(समयसार, कलश २७१ भावार्थ)।

00:16:59.154 --> 00:17:10.218
पर को जानता है इसीलिए ज्ञाता, ऐसा नहीं।
स्व-पर को जानता है इसीलिए ज्ञाता, ऐसा नहीं।
स्वयं स्वयं को जानता है इसलिए आत्मा स्वयं ज्ञाता है।

00:17:10.243 --> 00:17:19.285
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के तीन भेद करके,
एक एक के, तीनों शब्द के
भाव भरे हैं, तीनों में, २७१ में।

00:17:19.310 --> 00:17:29.267
उसमें यह ज्ञाता की व्याख्या है,
स्वयं अपने को ही जानता है इसलिए स्वयं आत्मा,
उसका नाम ज्ञाता है।

00:17:29.292 --> 00:17:34.956
स्वयं ही ज्ञात होता है और दूसरा ज्ञात नहीं होता
इसलिए स्वयं ज्ञेय है।

00:17:34.981 --> 00:17:42.867
राग भी ज्ञात हो और ज्ञायक भी ज्ञात हो,
ऐसा ज्ञेयपना नहीं है।

00:17:42.892 --> 00:17:48.978
दो को जाने ऐसा ज्ञाता नहीं है,
दो जानने में आयें ऐसा ज्ञेय नहीं है।

00:17:49.003 --> 00:17:55.188
एकसाथ दो जानने में आ जायें,
देह और आत्मा दो जानने में आ जायें,
दो ज्ञेय हो जायें, ऐसा नहीं है।

00:17:55.213 --> 00:17:58.538
और दो का ज्ञाता हो जाये ऐसा भी नहीं है।

00:17:58.563 --> 00:18:07.738
एक का ही ज्ञाता और एक ही ज्ञेय होता है।
उसका भेद छूट जाता है तब
अनुभव होता है। २७१ में लिया है यह सब।

00:18:07.763 --> 00:18:13.295
मुमुक्षु:- ज्ञान में दो किस प्रकार से लेना?
एक तो ज्ञेय आया, और ज्ञाता आया।
ज्ञान में दो किस प्रकार लेना?

00:18:13.320 --> 00:18:19.560
उत्तर:- ज्ञान किस प्रकार लेना?
कि ज्ञान एक ही है। इन्द्रियज्ञान-दूसरा ज्ञान
और अतीन्द्रियज्ञान, दो ज्ञान, ऐसा नहीं है।

00:18:19.585 --> 00:18:24.960
ज्ञान - अतीन्द्रियज्ञानमय भगवान आत्मा
वह ही ज्ञान है।

00:18:24.985 --> 00:18:29.375
ज्ञान भी आत्मा,
ज्ञेय भी आत्मा और
ज्ञाता भी आत्मा।

00:18:29.400 --> 00:18:32.893
ज्ञान - अतीन्द्रियज्ञानमय आत्मा है।

00:18:32.918 --> 00:18:38.898
उस ज्ञान के दो भेद नहीं हैं।
जैसे ज्ञेय दो नहीं हैं,
उसीप्रकार ज्ञान दो प्रकार का उत्पन्न नहीं होता।

00:18:38.923 --> 00:18:48.009
एक ही प्रकार का ज्ञान, एक ही प्रकार का ज्ञेय,
और एक ही प्रकार का ज्ञाता।
तीनों में एक ही प्रकार है।

00:18:48.034 --> 00:18:55.876
इसप्रकार अनुभव के काल में,
अतीन्द्रियज्ञान भी हो और इन्द्रियज्ञान भी हो,
ऐसे ज्ञान के दो प्रकार नहीं हैं।

00:18:55.901 --> 00:19:02.987
और ज्ञायक ज्ञेय हो और देहादि भी ज्ञेय हों
ऐसे दो प्रकार के ज्ञेय नहीं बनते।

00:19:03.012 --> 00:19:11.015
ऐसे ज्ञाता अपना भी ज्ञाता और
छह द्रव्यों का (भी) ज्ञाता,
इसप्रकार दो का ज्ञाता नहीं बन सकता।

00:19:11.040 --> 00:19:24.769
एक का ही ज्ञाता और एक ही ज्ञेय और एक ही ज्ञान,
उसके भेद निकल जायें तो अनुभव हो जाता है।

00:19:24.794 --> 00:19:33.458
लिया है न उसमें? एक ही लिया है न?
स्वज्ञेय लिया है न। आहाहा!
परज्ञेय नहीं लिया उसमें।

00:19:33.483 --> 00:19:40.124
ज्ञान में अतीन्द्रियज्ञान लिया,
इन्द्रियज्ञान उसमें नहीं होता।

00:19:40.149 --> 00:19:55.018
अनुभव में जाता है तब ज्ञान के दो प्रकार,
ज्ञेय के दो प्रकार, और ज्ञाता के दो प्रकार?
तीनकाल में नहीं होगा।

00:19:55.043 --> 00:20:03.551
अनुभव के काल में एक ही ज्ञान,
एक ही ज्ञेय और एक ही ज्ञाता।

00:20:03.576 --> 00:20:11.062
ज्ञाता के दो प्रकार नहीं बनते,
ज्ञेय के दो प्रकार बनते नहीं और
ज्ञान के दो प्रकार बनते नहीं।

00:20:11.087 --> 00:20:20.640
अद्भुत से अद्भुत २७१ कलश है।
अनुभव की रीति बताई है उसमें।

00:20:20.665 --> 00:20:25.517
मुमुक्षु:- ज्ञान में दो प्रकार नहीं होते
वह तो समझ में आता है।
परंतु ज्ञेय में तो दो प्रकार आते हैं न?

00:20:25.542 --> 00:20:38.822
उत्तर:- बिल्कुल नहीं आते। ज्ञायक ही ज्ञेय होता है।
राग या देह या देव-गुरु-शास्त्र ज्ञेय होते ही नहीं।

00:20:38.847 --> 00:20:41.556
उसमें व्याख्या की है ज्ञेय की।

00:20:41.581 --> 00:20:52.556
स्वयं 'ही' ज्ञात होने योग्य होने से। पर ज्ञात
होने योग्य (नहीं), स्व-पर ज्ञात होने योग्य (नहीं),
ऐसे दोनों को निकाल दिया।

00:20:52.581 --> 00:21:02.938
ज्ञेय की व्याख्या, स्वयं ही ज्ञात होने योग्य है।
आहाहा!

00:21:02.963 --> 00:21:14.427
ध्येय, ज्ञेय होता है और फिर फल में,
ज्ञेय - सामान्य-विशेषात्मक पूरा आत्मा,
ज्ञेय हो जाता है। परंतु एक ज्ञेय है, इसप्रकार।

00:21:14.452 --> 00:21:20.093
वह किसी ने प्रश्न किया था हमसे, पता है न?
कि ज्ञेय में तो द्रव्य-पर्याय दोनों ज्ञात होते हैं?
कि नहीं! एक ही है, अभेद।

00:21:20.118 --> 00:21:23.871
एक ही ज्ञेय है, ज्ञेय दो नहीं हैं। आहाहा!

00:21:23.896 --> 00:21:35.542
एक त्रिकाली ज्ञेय और
आनंद आया (वह दूसरा) ज्ञेय,
ऐसा नहीं है। आहाहा! कोई बात है!

00:21:35.567 --> 00:21:39.742
उपादेयरूप से भी एक ज्ञेय, ज्ञायक - सामान्य।

00:21:39.767 --> 00:21:50.120
और जानने की अपेक्षा से भी अभेद
ज्ञानपर्याय-परिणत पूरा आत्मा,
सामान्य-विशेष दोनों, वह ज्ञेय। आहाहा!

00:21:50.145 --> 00:22:02.898
एक ज्ञेय में अनंत गुण हैं और
दूसरा ज्ञेय नया होता है, उसमें आनंद पर्याय
सहित पूरा आत्मा ज्ञान का ज्ञेय हो जाता है।

00:22:02.923 --> 00:22:13.013
अपरिणामी ज्ञेय और परिणामी ज्ञेय,
ऐसा भेद नहीं है। समझाने के लिए है।

00:22:13.038 --> 00:22:22.769
एक ही ज्ञान, एक ही ज्ञेय और एक ही ज्ञाता।
ज्ञाता दो का नहीं, दो प्रकार के ज्ञेय नहीं
और दो प्रकार के (ज्ञान नहीं)।

00:22:22.794 --> 00:22:28.947
वे कहते हैं कि 'ज्ञान के दो प्रकार या एक प्रकार?'
- वह रह गया था।

00:22:28.972 --> 00:22:43.191
थोड़ा इन्द्रियज्ञान और थोड़ा अतीन्द्रियज्ञान,
दो के द्वारा आत्मा ज्ञात होता है? क्या कह रहे हो?
मुमुक्षु:- अतीन्द्रियज्ञान एक ही ज्ञान है।

00:22:43.216 --> 00:22:47.951
उत्तर:- इन्द्रियज्ञान के द्वारा आत्मा जानने में नहीं आता?
मुमुक्षु:- नहीं जानने में आता,
किसी भी तरह से जानने में नहीं आता।

00:22:47.976 --> 00:22:51.935
उत्तर:- लेकिन अकेले इन्द्रियज्ञान से
जानने में नहीं आता, प्रेमचंदजी।

00:22:51.960 --> 00:22:58.935
अकेले इन्द्रियज्ञान से आत्मा जानने में नहीं आता
परंतु साथ में अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होता है
तब दो मिलकर आत्मा को जानते हैं न?

00:22:58.960 --> 00:23:02.998
मुमुक्षु:- नहीं।
उत्तर:- मना करते हैं। तुम बोलो मत कुछ।
मना करते हैं।

00:23:03.040 --> 00:23:06.596
मुमुक्षु:- अकेले अतीन्द्रियज्ञान में।
उत्तर:- अकेला अतीन्द्रियज्ञान?
मुमुक्षु:- अकेला।

00:23:06.621 --> 00:23:17.662
उत्तर:- तो एकांत नहीं हो जायेगा?
मुमुक्षु:- सम्यक् एकांत।
उत्तर:- शाबाश! अब ठीक है, सही है।

00:23:17.687 --> 00:23:25.289
बहन, अभी-अभी आये
तब आप को बात की,
कि शुद्धनय का उपदेश विरल है।

00:23:25.314 --> 00:23:31.378
यदि उपदेश बाहर आता है
तो उसे ग्रहण करनेवाले होते ही हैं।

00:23:31.403 --> 00:23:38.600
शारदाबहन ने कहा,
लिफ्ट में आ रहे थे ऊपर
'स्वभाव से शुद्ध हूँ'।

00:23:38.625 --> 00:23:45.689
मैंने कहा ' निश्चयनय से शुद्ध है आत्मा'।
कि 'नहीं! तो व्यवहारनय से अशुद्ध आ जायेगा'
ऐसा कहा।

00:23:45.714 --> 00:23:50.845
तो अशुद्धता आ जायेगी, व्यवहारनय से अशुद्ध।
निश्चयनय से शुद्ध तो व्यवहारनय से अशुद्ध।

00:23:50.870 --> 00:23:58.938
स्वभाव से शुद्ध तो? आहाहा!
शुद्ध की दृष्टि हो जायेगी।

00:23:58.963 --> 00:24:01.747
अशुद्धता कहाँ गई वह हम नहीं जानते!

00:24:01.772 --> 00:24:13.782
फिर मिथ्यात्व की अशुद्धता ढूँढने जायेंगे
तो (भी) नहीं मिलेगी।
अवस्तु, मिथ्यात्व जैसी वस्तु नहीं है। आहाहा!

00:24:13.807 --> 00:24:23.405
परंतु स्याद्वाद से, अतीन्द्रियज्ञान से और इन्द्रियज्ञान
(से), दो ज्ञान के द्वारा एक आत्मा ज्ञात होता है?
मुमुक्षु:- नहीं, नहीं ज्ञात होता।

00:24:23.430 --> 00:24:28.516
वह ज्ञान ही नहीं है, इन्द्रियज्ञान ज्ञान ही नहीं है।
उत्तर:- ज्ञान एक, तो ज्ञेय तो दो रखो?
मुमुक्षु:- नहीं-नहीं।

00:24:28.541 --> 00:24:37.831
ज्ञान एक तो ज्ञेय भी एक ही है।
उत्तर:- अच्छा! और ज्ञाता?
मुमुक्षु:- ज्ञाता भी एक ही है। एक का ही ज्ञाता है।

00:24:37.856 --> 00:24:45.587
उत्तर:- यह २७१ कलश का खुलासा। अच्छा। चलो।

00:24:45.612 --> 00:24:57.276
विकल्प आया न, उसमें निकला सब।
अरे! एक बार निर्विकल्प अनुभव तो कर ले!
आहाहा!

00:24:57.301 --> 00:25:04.520
स्वप्रकाशक लक्षण के द्वारा भगवान आत्मा को
एक बार जान ले न, भाई!
भव का अंत आयेगा बापू!

00:25:04.545 --> 00:25:07.476
<b>जब तक विकल्पभाव है तब
तक कर्ताकर्मभाव है;</b>

00:25:07.501 --> 00:25:14.947
<b>जब विकल्प का अभाव होता है तब
कर्ताकर्मभाव का भी अभाव होता है</b>।
२४ पेज, अंतिम।

00:25:14.972 --> 00:25:26.191
आहाहा! एक विचार आया था भरतभाई,
तुम्हारे से पूछने का कि इस भरतक्षेत्र में चौबीस
तीर्थंकर होते हैं, भरतक्षेत्र में।

00:25:26.216 --> 00:25:30.125
और ऐरावत में तीर्थंकर होते हैं उस समय,
यहाँ होते हैं तब?
मुमुक्षु:- हाँ! उस ही समय होते हैं।

00:25:30.150 --> 00:25:32.658
वहाँ भी २४ का क्रम होता है।
उत्तर:- वहाँ भी २४?

00:25:32.683 --> 00:25:37.813
मुमुक्षु:- जिसप्रकार यहाँ होते हैं
उसीप्रकार वहाँ होते हैं।
उत्तर:- ठीक, समझ में आ गया।

00:25:37.838 --> 00:25:46.146
हेतुवश विचार आया था वह, ऐरावत का।

00:25:46.171 --> 00:25:50.902
हालांकि मैंने सुना था कि जैसा यहाँ होता है
ऐसा वहाँ होता है, सिमीलरली
(similarly-उसके जैसा)।

00:25:50.927 --> 00:25:53.835
मुमुक्षु:- जब यहाँ काल होता है
तब वहाँ भी काल होता है।

00:25:53.860 --> 00:25:59.613
उत्तर:- यहाँ पाँचवा आरा
तो वहाँ भी पाँचवा आरा?
मुमुक्षु:- हाँ जी।

00:25:59.638 --> 00:26:04.591
उत्तर:- ठीक! ऐरावत क्षेत्र है,
वह जंबूद्वीप का।
मुमुक्षु:- पाँच ऐरावत हैं।

00:26:04.616 --> 00:26:10.835
उत्तर:- पाँच ऐरावत।
हमारे पिताजी को भूगोल का बहुत ज्ञान था।

00:26:10.860 --> 00:26:21.587
ऐसे ही खीमचंदभाई को भी बहुत ज्ञान था।
उनकी विरासत इन्हें मिली है इसीलिए इनसे
हम पूछ लेते हैं। चलो आगे।

00:26:21.612 --> 00:26:35.720
मुमुक्षु:- <b>नय से वस्तु की सिद्धि करता है</b>,
<b>नय से वस्तु की सिद्धि करता है
तो विकल्पों का कर्ता बनता है।</b>

00:26:35.745 --> 00:26:42.542
उत्तर:- पदार्थ की सिद्धि।
वस्तु अर्थात् पदार्थ की सिद्धि (नय से) करता है
तो विकल्पों का कर्ता बनता है।

00:26:42.567 --> 00:27:01.013
मुमुक्षु:- <b>नयों से भिन्न स्वभाव से वस्तु को सिद्ध
करो तो नय के विकल्प रहित ज्ञान प्रगट होता है।</b>
अक्षरशः परम सत्य है।

00:27:01.038 --> 00:27:07.791
मुमुक्षु:- स्वभाव से निश्चयनय का निषेध,
निश्चयनय से व्यवहार का निषेध।
उत्तर:- हाँ!

00:27:07.816 --> 00:27:15.169
निश्चयनय से व्यवहार का निषेध और
स्वभाव से निश्चयनय के विकल्प का निषेध हो गया,
अनुभव, ज्ञान प्रगट होता है।

00:27:15.194 --> 00:27:19.369
वह अज्ञान था, नय ज्ञान है
वह वस्तुतः अज्ञान है, ज्ञान नहीं है।

00:27:19.394 --> 00:27:31.885
क्योंकि नय के द्वारा आत्मा का अनुभव नहीं होता,
इसलिए वह ज्ञान नहीं है अपितु अज्ञान है, अज्ञान।

00:27:31.910 --> 00:27:40.618
मुमुक्षु:- <b>नयों से भिन्न
स्वभाव से वस्तु को सिद्ध करो तो
नय के विकल्प रहित ज्ञान प्रगट होता है,</b>

00:27:40.643 --> 00:27:49.040
<b>जो द्रव्य स्वभाव को तो जानता है परंतु पर्याय स्वभाव
भी जैसा है वैसा उसमें जानने में आ जाता है।</b>
उत्तर:- <b>जानने में आ जाता है।</b>

00:27:49.065 --> 00:27:54.929
द्रव्य को जानने पर पर्याय जैसी है वैसी ज्ञात होती है।
दोनों का ज्ञाता, यह आ गया है अपने (वांचन में) तो।

00:27:54.954 --> 00:27:59.929
मुमुक्षु:- <b>ज्ञान विकल्प से रहित
'मध्यस्थ' हुआ।</b>

00:27:59.954 --> 00:28:05.889
<b>ज्ञान विकल्प से रहित 'मध्यस्थ' हुआ।</b>
उत्तर:- <b>'मध्यस्थ' हुआ</b> अर्थात् वीतरागता हुई,

00:28:05.914 --> 00:28:13.696
मध्यस्थता में राग-द्वेष का द्वंद निकल गया,
वीतरागता है। और <b>विकल्प में</b>...

00:28:13.721 --> 00:28:19.273
मुमुक्षु:- <b>विकल्प में पक्षपात था</b>।
उत्तर:- था, अर्थात् कि विधि-निषेध के
विकल्प थे उसमें राग-द्वेष।

00:28:19.298 --> 00:28:24.829
निषेध में द्वेषबुद्धि, विधि में रागबुद्धि थी।

00:28:24.854 --> 00:28:28.385
मुमुक्षु:- <b>विकल्प में पक्षपात था
अर्थात् कि राग-द्वेष था।</b>

00:28:28.410 --> 00:28:36.118
उत्तर:- देखो आया! उसमें मध्यस्थता,
राग-द्वेष रहित वीतरागता।

00:28:36.143 --> 00:28:39.651
मुमुक्षु:- <b>राग-द्वेष था,
क्रम क्रम से जानता था।</b>

00:28:39.676 --> 00:28:42.493
उत्तर:- राग-द्वेष होने का कारण,
अक्रम से नहीं - क्रम क्रम से जानता था।

00:28:42.518 --> 00:28:50.671
द्रव्य को जाने, क्षण में पर्याय को जाने,
एक को जाने तो दूसरे का जानना न रहे, इसप्रकार।
राग-द्वेष हुआ करता है।

00:28:50.696 --> 00:29:01.960
मुमुक्षु:- <b>नयों से भिन्न पड़ा हुआ ज्ञान</b>,
<b>नयों से भिन्न पड़ा हुआ ज्ञान
द्रव्य-पर्याय के स्वभाव को अक्रम जानता है।</b>

00:29:01.985 --> 00:29:12.138
उत्तर:- अक्रम, एक समय में।
सामान्य-विशेष को एक समय में जान लेता है। आहाहा!

00:29:12.163 --> 00:29:22.960
यह पक्षातिक्रांत की बात चल रही है न?
दो नयों के विषय को जानता है।
इसमें नीचे आधार आयेगा फिर। सही है।

00:29:22.985 --> 00:29:41.982
मुमुक्षु:- <b>दोनों नयों का ज्ञाता है, किसी
नयपक्ष को ग्रहण नहीं करता।</b> परम निर्दोष बात है।
उत्तर:- पल थे, पल!

00:29:42.007 --> 00:29:47.382
मुमुक्षु:- <b>नयों से भिन्न पड़ा हुआ ज्ञान
द्रव्य-पर्याय के स्वभाव को अक्रम जानता है।</b>

00:29:47.407 --> 00:29:56.693
उत्तर:- दूसरी बार पढ़ा उन्होंने,
बड़े अक्षर थे न, खुद की पसंद की बात थी न।

00:29:56.718 --> 00:30:03.048
मुमुक्षु:- <b>अक्रम जानता है।
दोनों नयों का ज्ञाता है,
किसी नयपक्ष को ग्रहण नहीं करता।</b>

00:30:03.073 --> 00:30:04.877
उत्तर:- अर्थात् कोई विकल्प उत्पन्न नहीं होता।

00:30:04.902 --> 00:30:12.782
विकल्प बिना का ज्ञान द्रव्य को भी जानता है
और पर्याय को भी, युगपद्,
एक समय में जानता ही है, बस! स्वभाव है उसका।

00:30:12.807 --> 00:30:24.987
मुमुक्षु:- नय से भिन्न पड़ा हुआ।
उत्तर:- नय से भिन्न पड़ा हुआ।
अंदर में स्वपरप्रकाशक स्वभाव है। आगे।

00:30:25.012 --> 00:30:30.320
मुमुक्षु:- <b>द्रव्य से पर्याय नहीं होती,
पर्याय के स्वभाव से पर्याय होती है।</b>

00:30:30.345 --> 00:30:37.920
<b>उत्पाद-व्यय प्रति समय हुआ ही करता है।
यह दो स्वभावों की बात अंतिम है।</b>

00:30:37.945 --> 00:30:40.298
उत्तर:- 'द्रव्य स्वभाव पर्याय स्वभाव' की
बात अंतिम है।

00:30:40.323 --> 00:30:50.809
मुमुक्षु:- <b>जिसका मर्म प्राप्त होने पर पक्षातिक्रांत होकर
अनुभव होता है; साक्षात् ज्ञाता होता है।</b>

00:30:50.834 --> 00:30:57.458
उत्तर:- अंतिम, पूर्णाहुति है न?
मुमुक्षु:- <b>समयसार गाथा १४३।</b>

00:30:57.483 --> 00:31:18.013
<b>पक्षातिक्रांत का (पक्ष को जो उलंघ
गया हो उसका) स्वरूप क्या है?
इस प्रश्न के उत्तरस्वरूप गाथा अब कहते हैं:-</b>

00:31:18.038 --> 00:31:54.557
<b>नयद्वयकथन जाने ही केवल समयमें प्रतिबद्ध जो।
नयपक्ष कुछ भी नहीं ग्रहे, नयपक्षसे परिहीन सो।।१४३।।</b>

00:31:54.640 --> 00:32:06.015
उत्तर:- यह (गाने का ) राग बहुत अच्छा है।
इस राग में ही ४१५ गाथा रेकॉर्ड कर लेंगे।
यह राग भी अच्छा है।

00:32:06.040 --> 00:32:19.415
४१५ गाथायें जैसे इंदुबेन धानक की हैं न, ऐसे।
बहुत अच्छा है यह राग।

00:32:19.440 --> 00:32:29.148
मुमुक्षु:- <b>गाथार्थ:- [नयपक्षपरिहीन:]
नयपक्ष से रहित जीव,</b>
उत्तर:- अर्थात् विकल्प से रहित।

00:32:29.173 --> 00:32:45.081
मुमुक्षु:- <b>[समयप्रतिबद्ध:]
समय से प्रतिबद्ध होता हुआ
(अर्थात् चित्स्वरूप आत्मा का अनुभव करता हुआ)</b>,

00:32:45.106 --> 00:32:51.181
देखो इसमें कितना अच्छा क्रम लिया है।
उत्तर:- अच्छा क्रम लिया है।
मुमुक्षु:- <b>नयपक्षपरिहीनः।</b>

00:32:51.206 --> 00:32:55.486
उत्तर:- हाँ, अर्थात् विकल्प से रहित।
विकल्प छूटा, विकल्प छूटा तब क्या फल आया?

00:32:55.511 --> 00:33:00.055
मुमुक्षु:- क्या फल आया? कि
<b>समय से प्रतिबद्ध हुआ</b>
अर्थात् चित्स्वरूप आत्मा का अनुभव हुआ।

00:33:00.080 --> 00:33:14.335
उत्तर:- अनुभव हुआ।
उसमें, नय में अनुभव रुकता था, बाधक था।
नय बाधक हैं, साधक नहीं। जो जो साधक तेऊ. ..

00:33:14.360 --> 00:33:20.065
मुमुक्षु:- जे जे वस्तु साधक है तेऊ तहां बाधक है।
(समयसार नाटक, जीवद्वार गाथा १०)
उत्तर:- बाधक है।

00:33:20.090 --> 00:33:25.665
मुमुक्षु:- <b>[नयपक्षपरिहीन:] नयपक्ष से रहित जीव,</b>
उत्तर:- <b>जीव</b>।

00:33:25.690 --> 00:33:35.131
मुमुक्षु:- <b>[समयप्रतिबद्ध:]
समय से प्रतिबद्ध होता हुआ
(अर्थात् चित्स्वरूप आत्मा का अनुभव करता हुआ),</b>

00:33:35.156 --> 00:33:45.565
<b>[द्वयो:अपि] दोनों ही [नययो:] नयों के
[भणितं] कथन को</b> अर्थात् कि स्वरूप को
उत्तर:- स्वरूप को।

00:33:45.590 --> 00:33:57.291
मुमुक्षु:- <b>[केवलं तु] मात्र
[जानाति] जानता ही है [तु] परंतु
[नयपक्षं] नयपक्ष को</b>

00:33:57.316 --> 00:34:01.157
<b>[किञ्चित् अपि] किंचित् मात्र भी
[न गृह्यति] ग्रहण नहीं करता।</b>

00:34:01.182 --> 00:34:09.791
उत्तर:- क्योंकि अतीन्द्रिय ज्ञान से
द्रव्य-पर्याय को जानता है तो उसे विकल्प
उत्पन्न ही नहीं होते और जाने बिना रहता नहीं।

00:34:09.816 --> 00:34:13.625
जानने में आते हैं और विकल्प उत्पन्न नहीं होता।

00:34:13.650 --> 00:34:19.335
क्योंकि द्रव्य का अवलंबन लेने पर अतीन्द्रियज्ञान
प्रगट हुआ न! उस अतीन्द्रियज्ञान ने द्रव्य-पर्याय
दोनों को जाना। समझ गये?

00:34:19.360 --> 00:34:27.258
द्रव्य के आश्रय से ज्ञान प्रगट होता है
उसमें विकल्प नहीं होता। मन के आश्रय से,
पर के आश्रय से हो उसमें विकल्प होता है।

00:34:27.283 --> 00:34:31.625
पहले विकल्प छूट गया, ऐसा।

00:34:31.650 --> 00:34:35.558
अर्थात् विकल्प के द्वारा दो नयों
का ज्ञाता नहीं हो सकता (और)

00:34:35.583 --> 00:34:42.055
विकल्प रहित अतीन्द्रियज्ञान, अनुभव होता है
तब दो नयों का साक्षात् ज्ञाता है। आहाहा!

00:34:42.080 --> 00:34:48.055
केवली पर घटित किया है और फिर
साधक पर घटित किया है, टीका में। सही है।

00:34:48.080 --> 00:34:54.735
मुमुक्षु:- अर्थात् कि पहले विकल्प छूट गये,
व्यवहार का पहले छूटा, फिर निश्चयनय का भी छूटा।
उत्तर:- छूटा, हाँ।

00:34:54.760 --> 00:34:57.280
मुमुक्षु:- फिर उसे चित्स्वरूप
आत्मा का अनुभव हुआ।
उत्तर:- हुआ।

00:34:57.305 --> 00:35:00.655
मुमुक्षु:- अर्थात् कि द्रव्य-दृष्टि हुई
और आत्मा का अनुभव हुआ।
उत्तर:- सही है। हुआ।

00:35:00.680 --> 00:35:03.688
मुमुक्षु:- और अनुभव में वह दोनों
नयों के विषय को जान लेता है।

00:35:03.713 --> 00:35:07.288
उत्तर:- अनुभव और
अनुभव का विषय दोनों ज्ञात हो जाते हैं।

00:35:07.313 --> 00:35:20.354
अनुभव का विषय और अनुभव हुआ वह,
दोनों का ज्ञाता हो गया और
उसमें विकल्प बिल्कुल है नहीं, इसप्रकार।

00:35:20.379 --> 00:35:31.132
अनुभव का विषय और अनुभव, समझ गये?
भेद करो तो दोनों को जानता है, अभेद से एक को जानता है
और प्रमाण से भेदाभेद को जानता है।

00:35:31.157 --> 00:35:36.443
वह कुछ नहीं है, एक ज्ञान की पर्याय ज्ञात होती है, बस!
फिर तीनों को निकाल दो।

00:35:36.468 --> 00:35:46.400
विवक्षा से तीन, भेद को जानता है,
भेदाभेद को जानता है,
अभेद को जानता है। आहाहा!

00:35:46.425 --> 00:35:59.422
<b>समय से प्रतिबद्ध हुआ</b>।
चित्स्वरूप आत्मा को निर्विकल्प ध्यान में अनुभवता हुआ
विकल्पातीत, मनातीत, वचनातीत। आहाहा!

00:35:59.447 --> 00:36:04.067
<b>नयपक्ष को किंचित् मात्र भी ग्रहण नहीं करता।</b>
अर्थात् कोई विकल्प उत्पन्न नहीं होता।

00:36:04.092 --> 00:36:16.855
द्रव्य को जानने के लिये द्रव्यार्थिकनय का विकल्प नहीं है।
पर्याय को जानने पर पर्यायार्थिक नय का विकल्प नहीं है।
ऐसा कहा न? किसी नयपक्ष को ग्रहण नहीं करता।

00:36:16.880 --> 00:36:22.238
द्रव्य को द्रव्य स्वभाव से जानता है,
पर्याय को पर्याय स्वभाव से जानता है।

00:36:22.263 --> 00:36:28.135
द्रव्य को द्रव्यार्थिकनय से नहीं जानता,
पर्याय को पर्यायार्थिकनय से नहीं जानता।

00:36:28.160 --> 00:36:34.181
अर्थात् किसी भी प्रकार का विकल्प
उत्पन्न हुए बिना दोनों का ज्ञाता हो गया।

00:36:34.206 --> 00:36:40.548
पहले नय से ज्ञाता था, जानपना,
(अब) नयातीत हुआ। आहाहा!

00:36:40.573 --> 00:36:50.381
समयसार तो समयसार है।
'समयसार लगे हमको प्यारा', वह आज बुलवाना है,
पूर्णाहुति होने के (पश्चात्), आज बुलवाना।

00:36:50.406 --> 00:37:01.224
और एक गुरुभक्ति,
दोनों का आज जरा - प्रोग्राम का मन हुआ है।
अब एक अंतिम, पढ़ लो, अंतिम है।

00:37:01.249 --> 00:37:06.958
मुमुक्षु:- <b>श्री पंचाध्यायी भाग - १</b>।
उत्तर:- बहुत इम्पोर्टन्ट है यह।
मुमुक्षु:- <b>गाथा ५०६</b>।

00:37:06.983 --> 00:37:14.608
<b>अन्वयार्थ:- (ज्ञान विकल्प:)
ज्ञान के विकल्प का नाम (नयः) नय है,</b>

00:37:14.633 --> 00:37:23.608
<b>तथा (सः विकल्प अपि) वह विकल्प भी
(अपरमार्थ: अस्ति) परमार्थभूत नहीं है।</b>

00:37:23.633 --> 00:37:34.818
उत्तर:- ये नयों के विकल्प
<b>परमार्थभूत नहीं है</b>,
अहित का कारण है, नुकसान का कारण है।

00:37:34.843 --> 00:37:40.184
जैसा है ऐसा विचार हों, वापस।
उससे विपरीत हो तो-तो नय ही नहीं है।

00:37:40.209 --> 00:37:48.551
सर्वज्ञ भगवान ने जिस नय के द्वारा जो स्वरूप कहा
उस नय के द्वारा ऐसे स्वरूप का विचार करता है,
मानसिक ज्ञान में।

00:37:48.576 --> 00:38:02.578
वह अपरमार्थभूत है, <b>परमार्थभूत नहीं है</b>।
मुमुक्षु:- <b>(यतः) क्योंकि वह
ज्ञानविकल्परूप नय (शुद्धं ज्ञानं गुण इति)</b>

00:38:02.603 --> 00:38:06.294
उत्तर:- अब <b>परमार्थभूत नहीं है</b>,
हित का कारण नहीं है उसका कारण दर्शाते हैं।

00:38:06.319 --> 00:38:19.178
मुमुक्षु:- <b>ज्ञानविकल्परूप नय
शुद्ध ज्ञानगुण (च) तथा (ज्ञेयं) ज्ञेय भी (न) नहीं है।</b>
ज्ञान भी नहीं है और वो ज्ञेय भी नहीं है।

00:38:19.203 --> 00:38:23.071
उत्तर:- एई प्रेमचंदजी!
वह ज्ञान भी नहीं है, ऐसा कहते हैं।

00:38:23.096 --> 00:38:26.735
ज्ञान एक प्रकार का होता है,
अतीन्द्रियज्ञान एक ही प्रकार का होता है।

00:38:26.760 --> 00:38:37.371
एक अतीन्द्रियज्ञान और एक इन्द्रियज्ञान,
नयज्ञान - ऐसा नहीं है। उसीप्रकार ज्ञेय भी नहीं है, आहाहा!

00:38:37.396 --> 00:38:48.165
क्यों नहीं है ज्ञेय? वह है ही नहीं।
अनुभव के काल में नय का विकल्प ही नहीं है,
अवस्तु है इसलिए ज्ञेयरूप से ज्ञात नहीं होता।

00:38:48.190 --> 00:38:55.115
मुमुक्षु:- ज्ञेय भी नहीं है।
वह भी मार्मिक व्याख्या है।
उत्तर:- मार्मिक व्याख्या है।

00:38:55.140 --> 00:38:57.598
ज्ञेय भी नहीं है, वह मार्मिक है।

00:38:57.623 --> 00:39:03.698
मुमुक्षु:- जानने में नहीं आता इसलिए ज्ञेय नहीं है।
उत्तर:- क्योंकि अवस्तु है,
व्यय हो गई, नय का व्यय हो गया।

00:39:03.723 --> 00:39:07.665
इन्द्रियज्ञान का व्यय और
अतीन्द्रियज्ञान का उत्पाद।

00:39:07.690 --> 00:39:15.241
नय का विकल्प ही नहीं है।
विकल्प हो तो ज्ञान का ज्ञेय होवे,
हेयरूप ज्ञेय, उपादेयरूप ज्ञेय, उपेक्षारूप ज्ञेय।

00:39:15.266 --> 00:39:20.658
बहन को पूछा था कि
ये पर्यायार्थिक चक्षु बंद करने के लिये कहते हैं।

00:39:20.683 --> 00:39:26.591
मैंने उनसे पूछा, कि 'हेयरूप जाने तो?
उपादेयरूप न जाने, हेयरूप जाने तो?'
(उन्होंने कहा) नहीं।

00:39:26.616 --> 00:39:33.041
(मैंने पूछा) तो ज्ञेयरूप जाने?
तो कहा, नहीं। यदि ज्ञेयरूप जाने तो बंद कहाँ की?

00:39:33.066 --> 00:39:41.775
वह ११४ (गाथा प्रवचनसार) के साथ मेल किया।
अवस्तु, विकल्प का अभाव ही हो गया है। आहाहा!

00:39:41.800 --> 00:39:46.383
मिथ्यात्व गया, तो मिथ्यात्व
ज्ञान का ज्ञेय होता है या नहीं,
सम्यग्दर्शन होता है जब?

00:39:46.408 --> 00:39:50.441
अरे! मिथ्यात्व की तुम क्या बात करते हो?
मुमुक्षु:- है ही नहीं तो ज्ञेय कहाँ से होगा?

00:39:50.466 --> 00:39:56.291
उत्तर:- बुखार नॉर्मल (normal) हो गया।
कि साहेब! १०४ डिग्री ज्ञान का ज्ञेय
तो हुआ कि नहीं? परंतु है ही नहीं।

00:39:56.316 --> 00:40:01.735
पूछो (डॉक्टर) मोदी साहब को। अवस्तु।

00:40:01.760 --> 00:40:09.581
वह शुद्धज्ञान नहीं है क्योंकि वह अशुद्ध ज्ञान है,
नयज्ञान है, इन्द्रियज्ञान,
मानसिक ज्ञान, अज्ञान है।

00:40:09.606 --> 00:40:12.431
वह शुद्धज्ञान नहीं है, शुद्ध शब्द प्रयोग किया है।

00:40:12.456 --> 00:40:21.515
और <b>ज्ञेय भी नहीं है</b>,
ज्ञान तो नहीं है और ज्ञेय भी नहीं है।
आहाहा! पंचाध्यायी (कर्ता ने) क्या गजब किया है!

00:40:21.540 --> 00:40:24.398
मुमुक्षु:- यह तो इन्द्रियज्ञान
ज्ञान नहीं है वह आ गया।
उत्तर:- आ गया न!

00:40:24.423 --> 00:40:30.314
मुमुक्षु:- और इन्द्रियज्ञान ज्ञेय भी नहीं है।
उत्तर:- ज्ञेय भी नहीं है।

00:40:30.339 --> 00:40:39.308
मुमुक्षु:- क्योंकि जो ज्ञान है न वही तो ज्ञेय है।
उत्तर:- हाँ! ज्ञान ज्ञान भी है
और ज्ञान स्वयं ज्ञेय भी है।

00:40:39.333 --> 00:40:49.158
नयज्ञान ज्ञान भी नहीं है और
नयज्ञान ज्ञेय भी नहीं है।

00:40:49.183 --> 00:40:56.295
समापन है न, आज तो, हें? आहाहा!
पूर्णाहुति है न? पूर्णाहुति में यह ही होता है न?

00:40:56.320 --> 00:41:01.015
मुमुक्षु:- आपने तीन हटाकर
ज्ञान ही रखा था एक, एक ज्ञान लो।

00:41:01.040 --> 00:41:09.635
उत्तर:- ज्ञान भी एक, ज्ञेय भी एक और
ज्ञाता भी एक। कहा या नहीं? आहाहा!
वह ज्ञान ही नहीं है, नयज्ञान ज्ञान नहीं है।

00:41:09.660 --> 00:41:18.618
मुमुक्षु:- बहुत ऊँची व्याख्या। इन्द्रियज्ञान (की
मौजूदगी) ही नहीं है तो फिर ज्ञेय कहाँ रहा?
ज्ञान ही नहीं है तो फिर ज्ञान ही नहीं रहा।

00:41:18.643 --> 00:41:27.185
उत्तर:- उसका व्यय हो गया विकल्प का। आहाहा!
द्रव्यार्थिकनय से शुद्ध और पर्यायार्थिकनय से अशुद्ध,
इन दो प्रकार के नयों के विकल्प ही नहीं हैं।

00:41:27.210 --> 00:41:35.728
तो वे ज्ञेय कहाँ से हों?
तो ज्ञेय एक रह गया, आत्मा भगवान। आहाहा!

00:41:35.753 --> 00:41:43.478
ज्ञान हो गया और ज्ञेय भी रह गया आत्मा,
भगवान ज्ञायक आत्मा। आहाहा!

00:41:43.503 --> 00:41:50.661
शुद्धज्ञान भी प्रगट हो गया,
अशुद्ध ज्ञान का व्यय हो गया और
उस ज्ञेय का भी व्यय हो गया, विकल्प का।

00:41:50.686 --> 00:41:57.355
भगवान आत्मा ज्ञेय हो गया।
ज्ञान भी एक, ज्ञेय भी एक और ज्ञाता भी एक।

00:41:57.380 --> 00:42:07.305
ज्ञेय दो, ज्ञान दो और ज्ञाता दो का?
मुमुक्षु:- ऐसा नहीं है।

00:42:07.330 --> 00:42:22.538
उत्तर:- चलो अब आज बहन से
भक्ति सुनते हैं। एक समयसार की और फिर
एक गुरुभक्ति। बस दो ले लो।

00:42:22.563 --> 00:42:26.175
मुमुक्षु:- एक लाइन रह गई है।
उत्तर:- रह गई लाइन? अच्छा! करो, पूरा करो।

00:42:26.200 --> 00:42:35.071
मयमुक्षु:- <b>(किंतु) परंतु (तद्योगात) ज्ञेय के
संबंध से होनेवाले ज्ञान के विकल्प का नाम नय है।</b>
उत्तर:- <b>नय है</b>।

00:42:35.096 --> 00:42:43.405
परज्ञेय है न? उसके संबंध में जो
ज्ञान जाता है न, उसमें वह खंडज्ञान,
इन्द्रियज्ञान होता है उसका नाम विकल्प, ऐसे।

00:42:43.430 --> 00:42:51.831
एक राग को विकल्प कहा जाता है और
एक नय के संबंध से होनेवाला खंडज्ञान,
उसका नाम भी विकल्प, नय विकल्प है।

00:42:51.856 --> 00:42:57.448
परज्ञेय के संग से हों!
स्वज्ञेय के संग से तो विकल्प उत्पन्न ही नहीं होता।

00:42:57.473 --> 00:43:06.848
<b>ज्ञेय के संबंध से</b>
अर्थात् ज्ञेय के लक्षवाला हुआ ज्ञान,
कहा जानेवाला ज्ञान, ज्ञान नहीं है लेकिन कहा जानेवाला ज्ञान।

00:43:06.873 --> 00:43:18.041
<b>होनेवाले ज्ञान के विकल्प का नाम नय है।</b> आहाहा!

00:43:18.066 --> 00:43:25.408
ज्ञेय के लक्षवाला ज्ञान- उसे आचार्य भगवान ने
व्यभिचारिणी बुद्धि कहा है। आहाहा!

00:43:25.433 --> 00:43:44.951
संत के अलावा कौन कह सकता है, हें?
पर के संग में गया न ज्ञान?
वह ज्ञान था आत्मा का।

00:43:44.976 --> 00:44:00.901
बोलो। ठीक है न तबियत तो? तो बोलो (भक्ति)।

00:44:00.926 --> 00:44:39.289
मुमुक्षु:- समयसार हमको लागे प्यारा, (२)
लागे प्यारा, हमे लागे प्यारा। (२)
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:44:39.314 --> 00:45:04.135
समयसार ही सम्यक् दर्शन, (२)
ज्ञान-चारित्र यही सुखकारा। (२)

00:45:04.160 --> 00:45:16.845
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:45:16.870 --> 00:45:41.911
समयसार ही प्राण हमारा, (२)
ये जीवन आधार हमारा। (२)

00:45:41.936 --> 00:45:53.298
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:45:53.323 --> 00:46:17.542
द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित है, (२)
समयसार शुद्धात्म हमारा। (२)

00:46:17.567 --> 00:46:29.276
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:46:29.301 --> 00:46:53.567
चिदानंद चैतन्य प्रभु है, (२)
स्वानुभूति में शोभे अपारा। (२)

00:46:53.592 --> 00:47:05.038
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:47:05.063 --> 00:47:29.350
प्रमत्त नहीं अप्रमत्त नहीं जो, (२)
एक शुद्ध ज्ञायक ही हमारा। (२)

00:47:29.375 --> 00:47:40.855
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:47:40.880 --> 00:48:05.615
ज्ञानादि के गुण भेद न जिसमें, (२)
निर्भेद शुद्ध ज्ञायक हमारा। (२)

00:48:05.640 --> 00:48:17.895
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:48:17.920 --> 00:48:48.004
ज्ञानमयी ज्ञायक ही सार है।
कुंदकुंद प्रभु को वंदन हमारा। (२)
अमृत प्रभु को वंदन हमारा। (२)

00:48:48.029 --> 00:49:20.705
कहान गुरु को वंदन हमारा। (३)
लाल प्रभु को वंदन हमारा। (२)

00:49:20.730 --> 00:49:56.831
समयसार हमको लागे प्यारा। (४)
कोटि कोटि वंदन कर प्रभु को। (२)

00:49:56.856 --> 00:50:21.091
हो जाऊँगा मैं भाव से पारा। (२)
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:50:21.116 --> 00:50:45.825
अमृत पीकर अमर होंये अब। (२)
सिद्धालय में हो वास हमारा। (२)

00:50:45.850 --> 00:50:58.458
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:50:58.483 --> 00:51:23.676
समयसार जयवन्त रहो नित। (४)

00:51:23.701 --> 00:51:48.575
गूँजती रहे जय जय जय कारा। (४)

00:51:48.600 --> 00:52:24.003
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)
लागे प्यारा, हमें लागे प्यारा। (२)
समयसार हमको लागे प्यारा। (२)

00:52:24.028 --> 00:52:30.625
मुमुक्षु:- हे गुरुवर तुम हो निधि की विधि,
सच्ची शिव विधि दरशाई है,

00:52:30.650 --> 00:52:50.982
हे प्रभु आपका हृदय समझ,
मैंने मेरी निधि पाई है।

00:52:51.007 --> 00:53:11.471
ऐसा लगता बस मुक्त हुआ,
नहीं करना कुछ भी शेष रहा,

00:53:11.496 --> 00:53:29.338
निज में ही लीन रहूँ गुरुवर,
बस ये ही भाव विशेष रहा।

00:53:29.363 --> 00:53:48.458
मेरा मिथ्याभ्रम दूर हुआ,
मैं दुःखी नहीं सुखमय ही हूँ,

00:53:48.483 --> 00:54:15.624
बंधन बाधा अति भिन्न सदा,
मैं मुक्त स्वरूप सदा ही हूँ।
मैं मुक्त स्वरूप सदा ही हूँ।

00:54:15.649 --> 00:54:32.293
भोगों की किंचित् चाह नहीं,
भव बाधायें सब ही विघटी,

00:54:32.318 --> 00:54:47.960
मुक्ति की भी अब चाह नहीं,
मुक्ति की चिंता भी विघटी।

00:54:47.985 --> 00:55:22.542
निष्काम नमन है प्रभु तुमको, दृष्टि आनंदमयी प्रगटी। (२)

00:55:22.567 --> 00:55:41.613
मैं ज्ञायक पर ज्ञेय हैं मेरे,
ऐसी भ्रांति मिटा डाली।
उत्तर:- आहाहा! भव का अंत (है) इसमें।

00:55:41.638 --> 00:55:56.791
मैं ज्ञायक पर ज्ञेय हैं मेरे,
ऐसी भ्रांति मिटा डाली।

00:55:56.816 --> 00:56:13.125
ज्ञायक का ज्ञायक रहने की,
अपूर्व विधि बता डाली।

00:56:13.150 --> 00:56:25.191
पर की तो क्या बात करूँ,
निज पर्यय का कर्तृत्व अहो,

00:56:25.216 --> 00:56:39.858
एक क्षण मे दूर हुआ मुझसे,
निष्क्रिय ज्ञायक प्रगटा मेरे।
उत्तर:- वाह!

00:56:39.883 --> 00:56:51.655
मुमुक्षु:- होने योग्य ही कार्य जगत में,
होता देखा जाता है।

00:56:51.680 --> 00:57:03.024
ना होने वाले को कोई,
कभी नहीं कर पाता है।

00:57:03.049 --> 00:57:24.440
ध्याने योग्य ही ध्येय आपने, (२)
गुरुवर हमें दिखाया है।

00:57:24.465 --> 00:57:46.173
ध्येय ध्यान की हुई अभेदता,
उत्तर:- ध्याता बन गया।
मुमुक्षु:- अपूर्व आनंद छाया है। (२ )

00:57:46.198 --> 00:58:00.517
मुक्ति मार्ग का सब रहस्य,
प्रभु आपने ही बतलाया है।

00:58:00.542 --> 00:58:16.345
केवल बतलाया ही नहीं,
परिणत भी हमें कराया है।

00:58:16.370 --> 00:58:32.445
मम् हृदयरूप घट में रे,
हर्ष नीर छलकाता है,

00:58:32.470 --> 00:58:48.445
तव चरणों के प्रक्षालन हेतु,
ये उमड़ उमड़ कर आता है।

00:58:48.470 --> 00:59:01.320
मम् हृदयरूप घट में रे,
जब नहीं समाने पाया है,

00:59:01.345 --> 00:59:15.942
मन-वचन-काय की सीमा को,
ये लांघ बाहर यूँ आया है।

00:59:15.967 --> 00:59:30.495
पर पूर्ण सफल ना होगा ये,
आपकी सुमहिमा गाने में।

00:59:30.520 --> 00:59:45.769
फिर भी हठ पूर्वक उद्यत है,
ये अपना स्वाँग दिखाने में।
उत्तर:- अब ग्रहण करेगा।

00:59:45.794 --> 00:59:59.858
मुमुक्षु:- इस स्वाँग को आप जानते हैं,
उत्तर:- मैं भी स्वांग जानता हूँ।
मुमुक्षु:- मैंने भी इसे स्वाँग जाना।

00:59:59.883 --> 01:00:17.091
तुम सम ज्ञायक वृत्ति द्वारा,
निज ज्ञायक को अब पहिचाना।

01:00:17.116 --> 01:00:57.175
द्रव्य दृष्टि का दान दिया, मैं सुखी रहूँ वरदान दिया। (२)

01:00:57.200 --> 01:01:13.556
हो सच्चे अनुपम दानवीर,
मैं भाव आपका सफल किया।

01:01:13.581 --> 01:01:42.278
सागर के अमाप जल को क्या, अंजुली से मापा जाता है। (२)

01:01:42.303 --> 01:02:00.711
गुरुवर की अपार महिमा को,
क्या शब्दों से गाया जाता है।

01:02:00.736 --> 01:02:15.491
है अलभ्य दर्शन आज गुरु, फिर भी नित दर्शन देते हो।

01:02:15.515 --> 01:02:28.545
है अलभ्य दर्शन आज प्रभु, फिर भी नित दर्शन देते हो।

01:02:28.570 --> 01:02:43.845
अंतः ज्ञायक गुरु की महिमा में,
मग्न हमें कर देते हो।

01:02:43.870 --> 01:02:59.165
मम हृदयरूप सिंहासन पर,
मेरे प्रभुवर जयवंत रहो।

01:02:59.190 --> 01:03:12.276
मम हृदयरूप सिंहासन पर,
मेरे गुरुवर जयवंत रहो।

01:03:12.301 --> 01:03:26.347
जयवंत रहो जयवंत रहो,
श्री कहान गुरु जयवंत रहो।

01:03:26.372 --> 01:03:39.413
जयवंत रहो जयवंत रहो,
श्री लाल प्रभु जयवंत रहो।

01:03:39.438 --> 01:03:52.391
जयवंत रहो जयवंत रहो,
श्री कहान गुरु जयवंत रहो।

01:03:52.416 --> 01:04:07.055
जयवंत रहो जयवंत रहो,
श्री लाल प्रभु जयवंत रहो।

01:04:07.080 --> 01:04:19.469
जयवंत रहो जयवंत रहो,
श्री कहान-किरण जयवंत रहो।

01:04:19.552 --> 01:04:20.552
श्री कहान-किरण जयवंत रहो।