﻿WEBVTT

00:01:22.675 --> 00:01:32.997
यह एक समयसारजी नामक शास्त्र है,
परमागम शास्त्र है, 

00:01:33.021 --> 00:01:41.636
जो भगवान महावीर द्वारा उपदेशित 
और गौतम गणधर द्वारा ग्रहित (है)।

00:01:41.660 --> 00:01:51.903
और उन आचार्य की परंपरा में आज से दो हजार 
वर्ष पहले एक समर्थ आचार्य भारत में हुए; 

00:01:51.927 --> 00:02:03.187
जो जमीन से चार अंगुल ऊपर चलते थे।
ऐसी उन्हें ऋद्धि प्रगट हुई थी। 

00:02:03.211 --> 00:02:11.930
उन्होंने शास्त्र की रचना करते हुए एक 
समयसार नामक परमागम शास्त्र रचा है। 

00:02:11.954 --> 00:02:20.035
जिसमें शुद्धात्मा का स्वरूप क्या है 
वह मुख्यरूप से जिसमें वर्णित है।

00:02:20.059 --> 00:02:26.143
नवतत्त्व का वर्णन करते-करते 
आचार्य भगवान फरमाते हैं - 

00:02:26.167 --> 00:02:36.611
नवतत्त्व के नाम हैं - जीव, अजीव, पुण्य,
पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष। 

00:02:36.635 --> 00:02:47.254
वे आत्मा के परिणाम के सब नाम हैं। 
आत्मा है वह अनादि-अनंत है। 

00:02:47.278 --> 00:02:58.243
किसी संयोग से जिसकी उत्पत्ति होती नहीं है। 
और किसी संयोग का वियोग हो
तो आत्मा का नाश होता नहीं है। 

00:02:58.267 --> 00:03:14.066
ऐसा अनादि-अनंत ज्ञान और आनंदमय आत्मा 
देहदेवल में देह से भिन्न,
ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार के कर्म, 

00:03:14.090 --> 00:03:21.945
उनसे भी अंदर भिन्न 
और वर्तमान पुण्य-पाप की जो वृत्ति 
उत्थान होती है, लगन (उससे भी भिन्न)। 

00:03:21.969 --> 00:03:27.840
क्षण में पाप के परिणाम, क्षण में 
पुण्य के परिणाम, उनसे भी आत्मा 

00:03:27.864 --> 00:03:37.231
अंदर में एक चैतन्यमूर्ति आत्मा भिन्न 
विराजमान है, शुद्ध, अविनाशी, शाश्वत।

00:03:37.255 --> 00:03:48.887
ऐसे शुद्धात्मा को जाने बिना,
उसको श्रद्धा में लिए बिना,
उसका अनुभव किये बिना 

00:03:48.911 --> 00:04:01.809
जगत के प्राणी चारगति में एकांत 
दुःख को भोगते हैं। चारों गति दुःखरूप हैं। 
किसी गति में सुख नहीं है। 

00:04:01.833 --> 00:04:12.498
गति अर्थात् परिणति। 
परिणति अर्थात् शुभ और अशुभभाव की 
जो परिणति, उसे गति कहने में आता है।

00:04:12.522 --> 00:04:21.217
वह गति दुःखरूप है। 
और पंचमगति, सिद्धगति वह सुखरूप है। 

00:04:21.241 --> 00:04:31.646
ऐसे पूर्णानन्द मोक्ष की प्राप्ति जीव को 
किसप्रकार हो उसका इसमें वर्णन है। 

00:04:31.670 --> 00:04:39.271
एक समयमात्र भी अपना शुद्धात्मा,
उसका स्वरूप अंदर में क्या है?

00:04:39.295 --> 00:04:50.092
उसका उसने अनुभव किया नहीं और 
उसे समझने की दरकार भी वास्तव में की नहीं। 

00:04:50.116 --> 00:05:00.877
सभी बाहर के पदार्थ समझने में रुका 
परंतु एक <b>हुँ कोण छु? क्याथी थयो? 
शु स्वरूप छे मारुं खरुं?</b> 

00:05:00.901 --> 00:05:05.100
<b>कोना संबंधे वळगणा छे? 
राखु के ए परहरु?</b> 
(राजपद, अमूल्य तत्त्वविचार)। 

00:05:05.124 --> 00:05:15.426
ऐसे निज शुद्धात्मा के भान बिना आत्मा 
अनादिकाल से अज्ञानभाव से दुःखी हो रहा है। 

00:05:15.450 --> 00:05:30.907
उस दुःख के नाश का उपाय जब आत्मा 
आत्मा से आत्मा को जाने - अनुभवे,	
आत्मा को आत्मा से जाने - अनुभवे 

00:05:30.931 --> 00:05:36.622
तब उसे आत्मदर्शन,
सम्यग्दर्शन कहने में आता है। 

00:05:36.646 --> 00:05:45.364
वह <b>सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:</b> 
(तत्त्वार्थसूत्र, प्रथम अध्याय, सूत्र १) है,
मोक्ष का मार्ग है। 

00:05:45.388 --> 00:05:56.866
पुण्य-पाप का परिणाम बंध का मार्ग है,
और सम्यग्दर्शन आदि, आत्मा आश्रित 

00:05:56.890 --> 00:06:02.485
शुद्ध वीतरागी परिणाम 
जो प्रगट होते हैं वो मोक्ष का मार्ग है। 

00:06:02.509 --> 00:06:10.642
मोक्ष का मार्ग कहो या आत्मिक सुख का
मार्ग कहो, वह एकार्थ वाचक शब्द है। 

00:06:10.666 --> 00:06:17.178
एक ही जिसका अर्थ है, 
मोक्षमार्ग कहो या सुख का मार्ग कहो।

00:06:17.202 --> 00:06:30.404
ऐसा आत्मिक सुख अनादिकाल से आज तक 
अज्ञानी प्राणी ने उस सुख का स्वाद लिया नहीं है। 

00:06:30.428 --> 00:06:40.757
चाहते हैं सुख, सर्व प्राणी सुख को चाहते 
हैं। कोई भी प्राणी दुःख को चाहता नहीं है। 

00:06:40.781 --> 00:06:43.929
फिर एकेन्द्रिय जीव हो,
दो इन्द्रिय जीव हो,

00:06:43.953 --> 00:06:48.434
तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय,
पंचेन्द्रिय, संज्ञी, असंज्ञी 
(सभी सुख को चाहते हैं)। 

00:06:48.458 --> 00:06:55.063
ऐसे जो जीव हैं,
जो जीवत्व शक्ति से जी रहे हैं 

00:06:55.087 --> 00:07:03.376
और व्यवहार से दस प्रकार के प्राण से 
जो जीते हैं, ऐसे आत्मा अनंत हैं। 

00:07:03.400 --> 00:07:14.544
सर्वज्ञ भगवान ने छह द्रव्य कहे हैं। जीव 
अनंत हैं। पुद्गल परमाणु अनंतानंत हैं। 

00:07:14.568 --> 00:07:22.076
एक धर्मास्तिकाय नाम का द्रव्य -
पदार्थ है। एक अधर्मास्तिकाय है। 

00:07:22.100 --> 00:07:26.201
एक आकाश द्रव्य है। असंख्यात् कलाणु हैं। 

00:07:26.225 --> 00:07:30.697
ऐसे सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा ने 
छह द्रव्य कहे हैं। 

00:07:30.721 --> 00:07:39.448
द्रव्य उसे कहते हैं कि जिसमें अनंत गुण होते हैं। 
एक-एक द्रव्य में अनंत गुण हैं। 

00:07:39.472 --> 00:07:44.702
और उन गुणों के परिणाम प्रगट होते हैं 
उसको पर्याय कहने में आता है। 

00:07:44.726 --> 00:07:54.902
इसप्रकार गुण और पर्याय के समुदाय को,
भगवान वीतराग देवाधिदेव सर्वज्ञ 
परमात्मा उसे द्रव्य कहते हैं। 

00:07:54.926 --> 00:08:10.212
ऐसे जाति अपेक्षा से छह द्रव्य हैं। 
जाति अपेक्षा से छह, संख्या अपेक्षा से 
अनंत पदार्थ, द्रव्य हैं। 

00:08:10.236 --> 00:08:20.954
सर्वज्ञ भगवान को जब केवलज्ञान 
प्रगट होता है तब एक समय में 
भूत, भविष्य और वर्तमान,

00:08:20.978 --> 00:08:31.338
तीनलोक - उर्ध्वलोक, अधोलोक और मध्यलोक (का) 
एक समयमात्र में उनको ज्ञान होता है। 

00:08:31.362 --> 00:08:37.499
और केवलज्ञान में जो प्रत्यक्ष 
पदार्थों के स्वरूप को जाना, देखा, 

00:08:37.523 --> 00:08:45.760
वह वाणी छूटती है दिव्यध्वनि, तब 
वो छह द्रव्य देखे वो वाणी में आये। 

00:08:45.784 --> 00:08:53.757
और उस जीव के नौ प्रकार के क्रम से परिणाम 
होते हैं। उसे भगवान नवतत्त्व कहते हैं,

00:08:53.781 --> 00:09:00.044
वह पर्याय है, और वह परिणाम है,
दशा है, हालत है। 

00:09:00.068 --> 00:09:08.904
और उसके पीछे, उसके साथ-साथ
रहता हुआ एक ध्रुवतत्त्व, परमात्मतत्त्व,
जीवतत्त्व, सामान्यतत्त्व 

00:09:08.928 --> 00:09:16.064
- (ऐसा) जो जीव, उसमें सहजज्ञान, सहजदर्शन,
सहजसुख, सहजवीर्य, प्रभुत्व, विभुत्व 

00:09:16.088 --> 00:09:22.356
ऐसी-ऐसी अनंत शक्तियों का पुंज 
अंदर में आत्मा विराजमान है। 

00:09:22.380 --> 00:09:32.873
परंतु देह दृष्टिवाले को, देह के प्रेमवाले को,
संयोग के प्रेमवाले को, पुण्य और 
पुण्य के फल की रुचिवाले को 

00:09:32.897 --> 00:09:41.627
यह अंदर आत्मा, भगवान विराजमान 
है (उसे नहीं देखता) कि जिस 
भगवान के दर्शन करने से धर्म होता है। 

00:09:41.651 --> 00:09:50.211
प्रतिमा वह भगवान है, उसके दर्शन 
करने से शुभभाव होता है, पुण्य बँधता है। 

00:09:50.235 --> 00:10:00.697
और अंदर में भगवान आत्मा 
विराजमान है शक्तिरूप से, उसके दर्शन 
करने से उसे भव का अंत होता है 

00:10:00.721 --> 00:10:04.377
और आत्मिक सुख 
उस ही समय उसे प्रगट होता है। 

00:10:04.401 --> 00:10:11.384
ऐसे एक शुद्धात्मा का स्वरूप क्या है?
वह जगत के जीव जानते नहीं हैं। 

00:10:11.408 --> 00:10:22.718
वे जगत के जीव शुद्धात्मा के स्वरूप को जानें 
- अनुभवें और सुख की प्राप्ति करें 
उस हेतु से इस शास्त्र की रचना हुई है। 

00:10:22.742 --> 00:10:32.886
पूरे जगत के प्राणी सुबह से 
शाम तक जो कुछ प्रयत्न करते हैं 
वह केवल सुख के हेतु करते हैं। 

00:10:32.910 --> 00:10:42.964
कोई भी प्रयत्न जीव करे, एकेन्द्रिय से 
लेकर संज्ञी पंचेन्द्रिय, वो कोई दुःख की 
प्राप्ति के लिए कोई प्रयत्न करता नहीं है।

00:10:42.988 --> 00:10:50.344
सभी, जगत के सभी जीव प्रयत्न 
तो करते हैं परंतु किसके लिए करते हैं?

00:10:50.368 --> 00:10:59.556
पुरुषार्थ किसके लिए करते हैं? 
केवल सुख के लिए प्रयत्न, पुरुषार्थ करते हैं। 

00:10:59.580 --> 00:11:16.271
परंतु जगत के जीवों को ज्ञान नहीं है कि 'सुख कहाँ 
है? और उस सुख की प्राप्ति मुझे कैसे
हो?' उसका उपाय जानते नहीं हैं। 

00:11:16.295 --> 00:11:24.362
सुख आत्मा में है और उस सुख की प्राप्ति,
आत्मा का अंतर्ध्यान करने पर,

00:11:24.386 --> 00:11:33.659
आत्मा में एकाग्र होने पर आत्मा को 
सुख का स्वाद आता है। सुख आत्मा में है। 

00:11:33.683 --> 00:11:48.277
सुख संयोग में नहीं है। सुख मोटर,
बंगला, धन, धान्य, परिवार, कुटुंब,
उसमें सुख नहीं है। वह तो दूर रहो। 

00:11:48.301 --> 00:11:56.598
अब उससे भी आगे यहाँ एक अधिक
सूक्ष्म बात आचार्य भगवान समझाते हैं 

00:11:56.622 --> 00:12:08.466
कि, तुम भव्य आत्माओं तुम हमारे वर्ग 
और जाति के हो परंतु तुम तुम्हारे 
स्वरूप को भूल गये हो। 

00:12:08.490 --> 00:12:16.399
तुम्हारे स्वरूप को तुम जानते नहीं,	
पहचानते नहीं। क्या तुम्हारा स्वरूप है?

00:12:16.423 --> 00:12:22.771
तुम देह को आत्मा मान बैठे हो। 
देह आत्मतत्त्व नहीं है। 

00:12:22.795 --> 00:12:30.275
देह है वह पुद्गल की एक रचना है,
यह अनंत परमाणुओं का पिंड है। 

00:12:30.299 --> 00:12:37.236
यह जो दिखता है इन्द्रियज्ञान के द्वारा,
इन्द्रियज्ञान द्वारा रूपी पदार्थ दिखते हैं। 

00:12:37.260 --> 00:12:44.217
अरूपी आत्मा अंदर में है 
वह इन्द्रियज्ञान के द्वारा जानने में नहीं आता। 

00:12:44.241 --> 00:12:49.197
उसे जानना हो तो एक अतीन्द्रियज्ञान के 
द्वारा आत्मा जाना जा सकता है। 

00:12:49.221 --> 00:12:59.062
वर्तमानकाल में पंचमकाल में 
छोटे, बड़े, भाई, बहिन, माता
वे आत्मदर्शन कर सकते हैं। 

00:12:59.086 --> 00:13:11.140
ऐसे आत्मा के दर्शन से 
उसे सुख की प्राप्ति होती है। 
इसलिए जिसप्रकार (मृग को) पानी की तृषा लगती है 

00:13:11.164 --> 00:13:23.150
और वह तृषातुर हुआ मृग मरीचिका
जल (मृगजल) देखकर उसके पीछे दौड़ता है 
परंतु पानी का एक बिन्दु भी मिलता नहीं।

00:13:23.174 --> 00:13:29.304
पानी का बिन्दु तो मिलता नहीं अपितु 
ठंडी हवा भी आती नहीं। 

00:13:29.328 --> 00:13:40.477
और ऐसे के ऐसे वह मृगजल के पीछे,
मरीचिका के पीछे वह मर जाता है,
मृत्यु की शरण पाता है।

00:13:40.501 --> 00:13:50.678
उसीप्रकार अज्ञानी प्राणी 
पाँच इन्द्रिय के विषय, वह पाँच इन्द्रिय के 
विषय की तरफ झुक रहा है, ढल रहा है। 

00:13:50.702 --> 00:13:57.322
पाँच इन्द्रिय के जो पाँच विषय हैं 
-स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द,

00:13:57.346 --> 00:14:04.388
वे पाँच इन्द्रिय के पाँच विषय भगवान 
परमात्मा ने फरमाये हैं, उनकी तरफ वह झुकता है। 

00:14:04.412 --> 00:14:10.619
निरंतर उनकी तरफ ढल रहा है,
झुक रहे हैं। उसमें से कुछ सुख मिलेगा,	

00:14:10.643 --> 00:14:16.373
इसमें से मिलेगा, इसमें से मिलेगा,
इसमें से मिलेगा, इसप्रकार सुख के लिए 
(चारों ओर झपट्टा मारता है)। 

00:14:16.397 --> 00:14:23.713
सुख है अंदर में। अंदर में ढूँढता 
नहीं है, विश्वास नहीं आता कि 
अंदर आत्मा में सुख भरा है।

00:14:23.737 --> 00:14:36.148
विश्वास नहीं आता क्योंकि उसे अनुभव नहीं हैं, 
और दूसरा अनुभवी पुरुष का योग भी 
पंचमकाल में, बहुत विरल होता है। 

00:14:36.172 --> 00:14:43.894
उस अनुभवी पुरुष के योग बिना 
यह अंदर अनुभव की बात कोई बता नहीं सकता है। 

00:14:43.918 --> 00:14:51.094
उसका भी विरल है योग। उस प्रकार के 
जीव का पुण्य (कम हो) गया। 

00:14:51.118 --> 00:14:57.786
चतुर्थकाल में तो ज्ञानी का योग भी होता है 
और तीर्थंकर का योग भी होता है। 

00:14:57.810 --> 00:15:02.204
वर्तमानकाल में ज्ञानी का योग होना 
बहुत दुर्लभ है। 

00:15:02.228 --> 00:15:09.101
कदाचित् ज्ञानी का योग हो जाये 
तो उसकी पहचान होना दुर्लभ है। 

00:15:09.125 --> 00:15:17.449
और कदाचित् (ज्ञानी की) पहचान हो जाये 
तो उनकी देशनालब्धि सुनने का भाव आये 
वह भी दुर्लभ है। 

00:15:17.473 --> 00:15:32.109
कभी देशनालब्धि सुनने का भाव आये 
तो उनकी कही हुई बात समझने जैसी है, ऐसी 
रुचिपूर्वक उसका वह झुकाव उसकी तरफ जाता नहीं है। 

00:15:32.133 --> 00:15:35.619
इसप्रकार उसे शुद्धात्मा के स्वभाव की बात 
(विरल है)। 

00:15:35.643 --> 00:15:42.864
विभाव की बात सभी करते हैं,
स्वभाव की बात करनेवाले तो कोई 
विरले ज्ञानी धर्मात्मा (ही) होते हैं। 

00:15:42.888 --> 00:15:54.083
विभाव की बात सभी करते हैं कि पाप से दुःख होता है 
और पुण्य से सुख होता है। सौ प्रतिशत झूठी बात है। 

00:15:54.107 --> 00:16:07.476
जैसे पाप का परिणाम दुःखरूप है वैसे पुण्य का 
परिणाम भी, कषाय की मंदता, 
कषाय की जाति होने से उसका फल दुःख है। 

00:16:07.500 --> 00:16:14.458
रमणीकभाई! जरा बात समझने जैसी है।
आगे बैठे हैं वे रमणीक भाई न? रमणीकभाई। 

00:16:14.482 --> 00:16:20.072
मुमुक्षु: समझ में आया वह लिख लेता हूँ। 
पू. लालचंदभाई: हाँ, जरूर करो 
और फिर प्रश्न करना, खुशी से। 

00:16:20.096 --> 00:16:24.954
विचार करके प्रश्न जरूर करने जैसा है। 

00:16:24.978 --> 00:16:32.642
यह तो एक अपूर्व बात है। 
जो अपूर्व बात मुझे भी मिली नहीं थी जन्म से। 

00:16:32.666 --> 00:16:42.728
वह कोई मेरे भाग्य के योग से मुझे इन एक 
महापुरुष का, सोनगढ़ के संत का योग हुआ,

00:16:42.752 --> 00:16:52.592
और उनके परिचय से 
इस शुद्धात्मा का स्वरूप क्या है?
और उसका अंदर अनुभव कैसे हो?

00:16:52.616 --> 00:17:03.101
और अनुभव करने पर संसार का अंत कैसे आये?
- यह बात मैंने उनके पास से सुनी है। 

00:17:03.125 --> 00:17:14.757
मुझ पर करुणा करके उन्होंने मुझे 
कही है। मुझे अर्थात् वयक्तिगत तो नहीं 
कहते थे परंतु सबको प्रवचन में कहते थे। 

00:17:14.781 --> 00:17:26.453
ऐसे आत्मा की बात सुननी भी दुर्लभ 
और सुने तो उसके ऊपर विचार 
करने का टाइम भी जीव को नहीं। 	

00:17:26.477 --> 00:17:33.504
चौबीसों घंटे संकल्प और विकल्प, संकल्प 
और विकल्प, यह करना है और वह करना है। 

00:17:33.528 --> 00:17:36.422
यह पदार्थ प्राप्त करना है 
और उस पदार्थ को भोगना है। 

00:17:36.446 --> 00:17:43.763
पाँच इन्द्रियों के विषयों को प्राप्त करना है
सुख के लिए और फिर 
पाँच इन्द्रिय के विषय को भोगना है। 

00:17:43.787 --> 00:17:49.822
वह पाँच इन्द्रिय के विषय का भोग 
वह दाहज्वर है। 

00:17:49.846 --> 00:17:56.334
अंदर जलन उत्पन्न होती है, आकुलता उत्पन्न 
होती है, आत्मा को। कहीं उसमें शांति नहीं है। 

00:17:56.358 --> 00:18:04.139
शांति अंदर में है। 
अंदर शोधने वाले को शांति मिलती है। 

00:18:04.163 --> 00:18:11.705
छह सौ और आठ जीव, छह महीने 
और आठ समय में पूरे लोक में से,

00:18:11.729 --> 00:18:22.518
मनुष्य लोक में से छह सौ आठ जीव 
निरंतर छह महीने और आठ समय में 
सिद्धगति को प्राप्त करते हैं। 

00:18:22.542 --> 00:18:30.827
छह महीने और आठ समय में 
continuously (निरंतर), अनादिकाल से 
ऐसा चालू है, अनंतकाल रहेगा। 

00:18:30.851 --> 00:18:41.014
फिर भी (संसारी) जीव की संख्या 
खत्म होनेवाली नहीं है। प्रश्न तो होता है न कि 
तो तो फिर इस संसार का अभाव हो जायेगा?

00:18:41.038 --> 00:18:46.886
अरे भाई! संसार का अभाव होनेवाला नहीं है। 
उसने बात सुनी नहीं है। 

00:18:46.910 --> 00:19:01.176
वो कंदमूल में, आलू की कणिका या लहसन की एक कणिका,
उसके अंदर, एक कणिका के अंदर अनंत जीव हैं। 

00:19:01.200 --> 00:19:07.628
उसके (अनंतवें भाग के) जीव
सिद्ध परमात्मा की दशा को प्राप्त हुए हैं। 

00:19:07.652 --> 00:19:15.824
संसार राशि में इतने जीव हैं, कि जब
सर्वज्ञ भगवान को गौतम गणधर ने जैसे पूछा 

00:19:15.848 --> 00:19:24.863
ऐसे भावी तीर्थंकर को जब पूछेंगे 
कि इतने सिद्ध हो गये तो इस
संसार में (जीव) समाप्त हो जायेंगे या नहीं?

00:19:24.887 --> 00:19:31.008
तब उत्तर आयेगा कि कंदमूल की 
एक कणिका के अंदर अनंत जीव हैं 

00:19:31.032 --> 00:19:36.379
और उसकी अपेक्षा (अनंतवें भाग के) जीव 
सिद्ध परमात्म दशा को प्राप्त हुए हैं।

00:19:36.403 --> 00:19:43.758
किसी काल में संख्या घटती नहीं है,
इतनी जीव राशि है।

00:19:43.782 --> 00:19:49.645
ऐसे इस आत्मा में सुख है और (वह सुख) कैसे 
प्राप्त हो? ऐसा शिष्य ने एक प्रश्न किया।

00:19:49.669 --> 00:19:55.665
बहत्तर नंबर की गाथा है, कर्ता-कर्म 
अधिकार की। उसमें शिष्य प्रश्न करता है,

00:19:55.689 --> 00:20:08.136
प्रभु! इस दुःख की निवृत्ति कैसे हो?
अर्थात् क्या आत्मा के <b>ज्ञानमात्रसे 
ही बंधका</b> अभाव होता है?

00:20:08.160 --> 00:20:17.083
ऐसा शिष्य का प्रश्न है। शास्त्रज्ञान नहीं। 
शास्त्रज्ञान तो अनंतबार किया जीव ने। 

00:20:17.107 --> 00:20:28.052
शास्त्रज्ञान वह ज्ञान नहीं है। 
शास्त्रज्ञान वह भगवान मना करते हैं 
कि शास्त्रज्ञान वह ज्ञान नहीं है। 

00:20:28.076 --> 00:20:36.561 
जब शास्त्रज्ञान वह ज्ञान नहीं है 
तो यह दुकान का और जड़ का ज्ञान 
तो ज्ञान कहाँ है?

00:20:36.585 --> 00:20:44.862
झवेरचंदभाई? ये कपड़े का ज्ञान वह 
ज्ञान नहीं है, क्योंकि ज्ञान कपड़े का नहीं है। 

00:20:44.886 --> 00:20:53.964
ज्ञान जड़ का नहीं है, ज्ञान आत्मा का है। वह 
ज्ञान अंतर्मुख होकर जब जिसका ज्ञान है,

00:20:53.988 --> 00:21:02.306
वह ज्ञान उसे जाने तब 
उसको इंद्रियज्ञान रुक जाता है,
ध्यान के काल में और 

00:21:02.330 --> 00:21:09.521
एक अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होकर आत्मदर्शन 
होता है। तब से धर्म की शुरुआत होती है। 

00:21:09.545 --> 00:21:19.849
शुद्धात्मा के प्रत्यक्ष अनुभव से धर्म की 
शुरुआत होती है, अनुभव से वृद्धि होती है 
और अनुभव से ही पूर्णता प्रगट होती है। 

00:21:19.873 --> 00:21:24.650
आदि, मध्य, अंत में शुद्धात्मा के अनुभव से 
धर्म की शुरुआत होती है। 

00:21:24.674 --> 00:21:31.249
'क्या आत्मा का अनुभव? क्या आत्मा का 
स्वरूप?' जगत के जीवों को जानने को मिलता नहीं है। 

00:21:31.273 --> 00:21:37.964
अभी भारत में तो कहीं-कहीं 
किसी कोने में जानने को मिलता है परंतु ये लंदन में 

00:21:37.988 --> 00:21:50.121
और उसमें भी यह imitation (नकली), जगमगाहट, झूठा 
सुख, सुखाभास, सुख का आभास (है), सुख नहीं है। 

00:21:50.145 --> 00:22:00.184
ऐसा कहें कि ये फलाने भाई 
बहुत सुखी दो-पाँच करोड़ की पार्टी है। 
सर्वज्ञ भगवान ना कहते हैं। आहाहा!

00:22:00.208 --> 00:22:05.977
सुख तो अंदर आत्मा में है। 
लक्ष्मी में सुख नहीं है वह तो जड़ है। 

00:22:06.001 --> 00:22:14.662
लक्ष्मी से मुझे सुख होता है ऐसी मान्यता,
मिथ्या-मान्यता वह तो आस्रवतत्त्व है। 
उसमें कहीं सुख नहीं है। 

00:22:14.686 --> 00:22:23.034
उससे आगे यहाँ कहते हैं 
कि पुण्य के परिणाम तुझे कदाचित् आये, 
वे पुण्य के परिणाम भी दुःखरूप हैं। 

00:22:23.058 --> 00:22:27.108
वह तीसरा बोल हमें लेना है, आज। 

00:22:27.132 --> 00:22:39.608
भेदज्ञान का प्रकार समझाते हैं। 
कि चैतन्यमूर्ति आत्मा, इस जड़ ऐसे देह से 
भिन्न है, अतः देह को तू अपना मत मान। 

00:22:39.632 --> 00:22:47.839
देह का वियोग हो जायेगा और आत्मा चला 
जायेगा। अतः दो तत्त्व भिन्न-भिन्न हैं। 

00:22:47.863 --> 00:22:54.800
देह तेरा नहीं है, तेरा तो अंदर ज्ञान 
तेरा है। तू ज्ञानमय है और देहमय नहीं है। 

00:22:54.824 --> 00:23:04.770
ऐसा अंदर में पुण्य और पाप की वृत्ति का 
जो उत्थान होता है, वह सर्वज्ञ भगवान 
कहते हैं कि वह मैल है। 

00:23:04.794 --> 00:23:15.712
पाप के परिणाम तो मलिन भाव अपवित्र हैं,
परंतु पुण्य के परिणाम दया, दान,
करुणा, कोमलता के परिणाम 

00:23:15.736 --> 00:23:21.825
वह भी सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा 
फरमाते हैं कि भाई वे मलिनभाव हैं। 

00:23:21.849 --> 00:23:30.798
जैसे पानी के ऊपर सेवाल है 		
ऐसे ये पुण्य और पाप के परिणाम भी 
मलिन और अपवित्र भाव हैं। 

00:23:30.822 --> 00:23:41.251
उनसे भिन्न भगवान आत्मा पवित्र अंदर में 
विराजमान है, उसे तू दृष्टि में ले, उसे 
लक्ष में ले, और पुण्य-पाप का लक्ष छोड़ दे। 

00:23:41.275 --> 00:23:46.857
पुण्य-पाप छोड़ दे ऐसा नहीं,
पुण्य-पाप का लक्ष छोड़ दे। 

00:23:46.881 --> 00:23:55.759
देह छोड़ दे ऐसा नहीं 
(परंतु) देह का लक्ष छोड़ दे। 
देह छोड़ने का उपदेश नहीं है,

00:23:55.783 --> 00:24:04.518
आठ कर्म छोड़ दे ऐसा नहीं,
पुण्य-पाप छोड़ ऐसा नहीं 
परंतु देह में आत्मबुद्धि छोड़ दे। 

00:24:04.542 --> 00:24:12.459
कर्म से लाभ माना है वह छोड़ दे और 
पुण्य के परिणाम वे धर्म का कारण हैं 
ऐसी मिथ्या मान्यता को छोड़ दे। 

00:24:12.483 --> 00:24:25.132
उनका लक्ष छोड़ दे। पदार्थ भले ही रहें परंतु 
पदार्थ मेरे हैं ऐसे ममत्व के परिणाम को 
तू छोड़ दे। उनका त्याग कर। 

00:24:25.156 --> 00:24:31.524
परंतु अब त्याग कैसे करना?
कि ग्रहणपूर्वक त्याग है। 

00:24:31.548 --> 00:24:45.876
सर्वज्ञ वीतराग भगवान के शासन में 
त्याग की बात है परंतु ग्रहणपूर्वक त्याग। 
कुछ ग्रहण करने पर कुछ विभावभाव छूटता है। 

00:24:45.900 --> 00:24:54.436
जैसे कि सम्यग्दर्शन ग्रहण होने पर मिथ्यात्व के,
मिथ्या-मान्यता के परिणाम छूट जाते हैं। 

00:24:54.460 --> 00:25:05.640
ऐसे जैसे-जैसे वीतरागभाव का अंतर्मुख होकर 
ग्रहण होता है वैसे-वैसे उतने प्रमाण में 
राग का त्याग होता है। 

00:25:05.664 --> 00:25:10.722
ऐसे वीतरागभाव का विशेष,
विशेष ग्रहण होते-होते-होते,

00:25:10.746 --> 00:25:18.001
राग का अभाव होते-होते एक समय ऐसा आता 
है कि परिपूर्ण वीतराग दशा प्रगट होती है। 

00:25:18.025 --> 00:25:26.791
वह यहाँ आचार्य भगवान बहत्तरवीं 
गाथा में फरमाते हैं कि <b>आस्रव</b>। 

00:25:26.815 --> 00:25:39.370
अभी (तो) नवतत्त्व के नाम भी नहीं पता। 
नहीं तो नवतत्त्व की बात है, 
नवतत्त्व की परिधि में यह सब रहता है।

00:25:39.394 --> 00:25:52.179
नवतत्त्व (से) बाहर कुछ कहना नहीं हैं। 
कि जो नवतत्त्व सर्व मान्य हैं,
नवतत्त्व सर्व सम्मत हैं। 

00:25:52.203 --> 00:25:57.767
नौ के दस तत्त्व नहीं, नौ के आठ नहीं,
अनादि-अनंत (हैं)। 

00:25:57.791 --> 00:26:02.813
ऋषभदेव भगवान के समय में भी 
उनकी दिव्यध्वनि में नवतत्त्व आये। 

00:26:02.837 --> 00:26:07.235
भगवान महावीर की वाणी में भी 
नवतत्त्व का स्वरूप आया है। 

00:26:07.259 --> 00:26:22.614
परंतु उन नवतत्त्व में क्या उपादेय है,
क्या हेय है और क्या ज्ञेय है? उसका विचार 
एक समयमात्र भी आत्मा करता नहीं है। 

00:26:22.638 --> 00:26:37.310
अपने घर की बात, परंतु वह जैन हुआ 
किंतु नवतत्त्व का स्वरूप भगवान ने क्या कहा 
वह समझने की दरकार भी करता नहीं है। 

00:26:37.334 --> 00:26:43.907
उसमें, नवतत्त्व में एक आस्रवतत्त्व है। 
जीवतत्त्व, अजीवतत्त्व। 

00:26:43.931 --> 00:26:55.908
पुण्यतत्त्व, पापतत्त्व 
वे दो मिलकर भगवान आस्रवतत्त्व कहते हैं। 
आस्रव अर्थात् आगंतुक नये-नये भाव। 

00:26:55.932 --> 00:27:05.970
आस्रव नये-नये आगंतुक भाव, मेहमान,
आकर चले जायें, आकर जायें, आकर जायें। 

00:27:05.994 --> 00:27:14.381
ऐसे आस्रव (कि) जिनके निमित्त से 
आठ प्रकार के कर्म का बंध जीव को होता है। 

00:27:14.405 --> 00:27:22.166
ऐसे जो आस्रव उन आस्रवों के 
दो भेद, पुण्य आस्रव और पाप आस्रव। 

00:27:22.190 --> 00:27:29.674
पाप आस्रव है वह लोहे की बेड़ी है 
और पुण्य आस्रव है वह सोने की बेड़ी है। 

00:27:29.698 --> 00:27:35.639 
परंतु दोनों बंध साधक भाव हैं। 
दोनों का फल - जीव बंधता है। 

00:27:35.663 --> 00:27:46.120
पाप से भी बंधता है और पुण्य के परिणाम से 
भी जीव बंधता है, जीव छूटता नहीं है। 

00:27:46.144 --> 00:27:51.749
ऐसे आस्रव भगवान ने कहे 
उसके दो भेद, पुण्य आस्रव और पाप आस्रव। 

00:27:51.773 --> 00:27:58.555
अब उसका लक्षण बताते हैं 
कि उसका लक्षण क्या है? दो लक्षण तो कहे। 

00:27:58.579 --> 00:28:06.449
एक अपवित्र अशुचि लक्षण कहा,
दूसरा आस्रव का लक्षण जड़ कहा। 

00:28:06.473 --> 00:28:12.553
चेतन तो स्व-पर को जानता है। 
परंतु आस्रव, पुण्य-पाप के परिणाम,

00:28:12.577 --> 00:28:18.846
परिणाम परिणाम को भी ना जाने और 
परिणाम परिणामी ऐसे आत्मा को भी जाने नहीं। 

00:28:18.870 --> 00:28:30.797
इसलिए उसे जड़ और अचेतन कहा। 
दो बोल हुए। अब आज तीसरा विशेषण है। 
आस्रव का विशेषण अर्थात् आस्रव का लक्षण। 

00:28:30.821 --> 00:28:42.227
स्व और पर उसके लक्षण जानकर 
स्व को स्वपने ग्रहण करना 
और पर को परपने दृष्टि में से छोड़ना। 

00:28:42.251 --> 00:28:47.389
रुचि छोड़ देना। 
ऐसा भेदज्ञान करने से धर्म होता है। 

00:28:47.413 --> 00:28:58.694
तो <b>आस्रव आकुलताके उत्पन्न करने वाले हैं</b>, 
आकुलता अर्थात् एकांत दुःख,
दुःख को (उत्पन्न करनेवाले) उसका फल दुःख है।

00:28:58.718 --> 00:29:06.948
पाप के परिणाम - हिंसा, झूठ, चोरी, आदि 
जो पाप के परिणाम (हैं) उनका फल तो दुःख है,

00:29:06.972 --> 00:29:16.792
वर्तमान में भी दुःख और भावीकाल में भी 
दुःख के निमित्त मिलें ऐसा कर्म का बंध होता है। 

00:29:16.816 --> 00:29:30.387
और पुण्य के परिणाम वर्तमान में अहिंसा,
सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह,
दया, दान, करुणा, कोमलता के परिणाम,

00:29:30.411 --> 00:29:43.712
भगवान की पूजा का भाव, यात्रा का भाव,
भगवान के दर्शन करने का भाव वे सब परिणाम 
हैं, उन परिणाम को भगवान पुण्यतत्त्व कहते हैं। 

00:29:43.736 --> 00:29:53.302
वे पुण्य के परिणाम भी आकुलता को 
उत्पन्न करनेवाले हैं। आत्मिक शांति 
बिल्कुल उसमें प्राप्त होती नहीं है। 

00:29:53.326 --> 00:30:02.835
<b>आस्रव</b> अर्थात् पुण्य और पाप के 
आत्मा के परिणाम वे विभाव परिणाम हैं, 
वे स्वभाव भाव नहीं हैं। 

00:30:02.859 --> 00:30:06.558
वीतरागता है वह स्वभावभाव है। 

00:30:06.582 --> 00:30:15.468
और ये पुण्य और पाप के परिणाम, 
बहिर्मुख परिणाम, पराश्रित परिणाम, 
जड़ आश्रित परिणाम,

00:30:15.492 --> 00:30:23.820
कर्म आश्रित परिणाम, वे दो प्रकार के परिणाम 
परमात्मा ने कहा कि तुझे दुःखरूप हैं। 

00:30:23.844 --> 00:30:31.355
वे <b>आकुलताके</b> अर्थात् दुःख के 
<b>उत्पन्न करने वाले हैं</b>, अनादि-अनंत 

00:30:31.379 --> 00:30:38.890
जब-जब नवतत्त्व का स्वरूप 
सर्वज्ञ भगवान की वाणी में आता है 

00:30:38.914 --> 00:30:46.699
तब-तब यह बात आती है कि आस्रव 
दुःख के कारण हैं, आस्रव सुख के कारण नहीं हैं। 

00:30:46.723 --> 00:30:53.903
संवर, निर्जरा और मोक्ष 
वे आत्मा के परिणाम वे सुख के कारण हैं। 

00:30:53.927 --> 00:31:03.196
और पुण्य-पाप, आस्रव और बंध वे आत्मा के 
विकृत परिणाम, विकारी परिणाम,
विभाव परिणाम, कषाय के परिणाम 

00:31:03.220 --> 00:31:11.079
- वे आत्मा को वर्तमान दुःख का कारण (हैं) और 
परंपरा से भी उसके निमित्त से जो कर्म का बंधन होता है 

00:31:11.103 --> 00:31:18.927
और उसमें उदय आता है और उदय में जुड़े तो 
उसे दुःख का निमित्त कारण कहने में आता है। 

00:31:18.951 --> 00:31:29.997
परिणाम को वर्तमान दुःख का कारण कहा जाता है 
और परिणाम के निमित्त से कर्म बंधते हैं 
उन्हें दुःख के निमित्त कहने में आता है। 

00:31:30.021 --> 00:31:39.614
वर्तमान किसी भी प्रकार का परिणाम हो 
वह फल के बिना नहीं होता। परिणाम का फल 
आता है, आता है और आता है। 

00:31:39.638 --> 00:31:48.311
पाप के परिणाम का फल भी वर्तमान में आता है,
पुण्य के परिणाम का फल भी 
वर्तमान में आता है, (दोनों) आस्रवों का। 

00:31:48.335 --> 00:31:59.656
और संवर और निर्जरा; संवर 
अर्थात् शुद्धात्मा का अनुभव, स्वानुभव,
अनुभूति उसका फल भी वर्तमान में आता है;

00:31:59.680 --> 00:32:08.742
निर्जरा अर्थात् शुद्धि की वृद्धि,
वीतरागता की वृद्धि हो उसका फल 
अनाकुल आनंद वर्तमान में आता है। 

00:32:08.766 --> 00:32:16.271
और मोक्ष, परिपूर्ण आनंद की प्राप्ति 
ऐसे जो परिणाम, उसका फल भी वर्तमान में आता है। 

00:32:16.295 --> 00:32:23.126
परिणाम फल बिना नहीं होता। 
परिणाम का फल होता है, होता है और होता ही है। 

00:32:23.150 --> 00:32:31.642
जैसे-जैसे जीवों के परिणाम, 
वैसे-वैसे फल को वह वर्तमान में भोगता है 

00:32:31.666 --> 00:32:37.943
और निमित्तपने वह भविष्य में लक्ष करे 
तो भोगता है। 

00:32:37.967 --> 00:32:48.016
<b>आस्रव आकुलताके उत्पन्न करने वाले हैं</b>, 
तो ऐसा होता है कि अब इस पाप को छोड़ना 
और पुण्य को छोड़ना तो करना क्या? 

00:32:48.040 --> 00:32:56.751
छोड़ने की, लेने की, रखने की कोई बात नहीं है। 
उसका जैसा स्वरूप है उसके स्वरूप को जानकर,

00:32:56.775 --> 00:33:06.564
उसका लक्ष छोड़कर,
पाप और पुण्य के परिणाम का 
लक्ष छोड़कर, पुण्य का प्रेम छोड़कर,

00:33:06.588 --> 00:33:12.161
पुण्य के परिणाम की रुचि छोड़कर,
पुण्य फल की रुचि छोड़कर,

00:33:12.185 --> 00:33:20.142
अंतर एक आत्मा भगवान विराजमान है,
उसका रुचिपूर्वक अवलंबन लेने पर
उसे धर्म की शुरुआत होती है। 

00:33:20.166 --> 00:33:25.568
करने योग्य तो यह है। 
आत्मा को पहचानने योग्य है। 

00:33:25.592 --> 00:33:34.064
आत्मा को पहचाने बिना 
सभी क्रिया संसार के फल का कारण हैं। 

00:33:34.088 --> 00:33:41.369
एक आत्मा का भान नहीं है, आत्मा को पहचाना नहीं। 
मेरा वास्तविक, original (वास्तविक) क्या स्वरूप है? 

00:33:41.393 --> 00:33:49.022
भाई! यह तो स्वांग है, यह मनुष्य की पर्याय 
वह तो स्वांग है, (ये) कोई आत्मा का स्वभाव नहीं है।

00:33:49.046 --> 00:33:58.502
आठ कर्म का बंध होता है वह स्वांग है। 
पुण्य-पाप के परिणाम का उत्थान होता है 
वह भी स्वांग है, वह तो निकल जाता है। 

00:33:58.526 --> 00:34:04.971
जब मोक्ष पंचमगति प्रगट होती है तब 
पुण्य-पाप के परिणाम छूट जाते हैं, संयोग,

00:34:04.995 --> 00:34:13.866
आठ कर्म का भी अभाव होता है 
और देह का भी वियोग होता है। 
अतः ज्ञान का कभी वियोग नहीं होता। 

00:34:13.890 --> 00:34:25.694
ज्ञान वह आत्मा की स्वभावभूत क्रिया है। 
आत्मा को जानना, आत्मा को अनुभवना ऐसा जो 
आत्मज्ञान वह आत्मा की स्वभावभूत क्रिया है। 

00:34:25.718 --> 00:34:33.639
वह स्वभावभूत क्रिया सुखरूप है 
और पुण्य-पाप की बहिर्मुख क्रिया 
वह दुःख का कारण है

00:34:33.663 --> 00:34:40.447
ऐसा जानकर उसका लक्ष छोड़कर 
आत्मा का लक्ष करने जैसा है। 

00:34:40.471 --> 00:34:48.029
<b>आस्रव आकुलताके</b>, दुःख के 
<b>उत्पन्न करने वाले हैं इसलिये दु:खके कारण हैं</b>। 

00:34:48.053 --> 00:34:56.545
जो कोई परिणाम होता है उस परिणाम का 
फल है। फल क्या है? कि उसका फल दुःख है। 

00:34:56.569 --> 00:35:02.031
<b>दुःख के कारण हैं</b>,
वे आत्मा को आत्मिक सुख के कारण नहीं हैं। 

00:35:02.055 --> 00:35:12.649
कदाचित् शुभभाव करे कर्ताबुद्धि से 
(तो) पुण्य बंधता और बाहर का कुछ 
दिखावा अच्छा हो, परंतु उसमें कोई सुख नहीं है। 

00:35:12.673 --> 00:35:19.033
वे सभी पदार्थ यहाँ पड़े रहते हैं 
और स्वयं परलोक में चला जाता है। 

00:35:19.057 --> 00:35:26.388
या स्वयं जीवित हो और पुण्य समाप्त हो जाये 
तो संयोग का वियोग हो जाता है,

00:35:26.412 --> 00:35:35.330
और स्वयं ऐसा का ऐसा बैठा-बैठा देखा करे 
परंतु कोई उस संयोग को रोक सकता नहीं। 

00:35:35.354 --> 00:35:41.060
जाते हुए संयोग को रोक सकता नहीं,
आते हुए संयोग को ला सकता नहीं,

00:35:41.084 --> 00:35:47.526
परंतु अभिमान करता है कि मेरे पुरुषार्थ से मैंने 
लक्ष्मी प्राप्त की, वह तो अभिमान है। 

00:35:47.550 --> 00:35:53.359
'मैं करूँ, मैं करूँ वह ही अज्ञानता, 
शकट का भार जैसे श्वान ताने,

00:35:53.383 --> 00:36:00.047
सृष्टि मंडाण एनी पेरे,
कोई योगी योगीश्वरा जाने।' 

00:36:00.071 --> 00:36:08.567
ऐसे उसे अभिमान हो गया है कि मैं हूँ 
तो यह सब होता है परंतु जो होता है 
उसका मैं जाननहार हूँ,

00:36:08.591 --> 00:36:21.497
होता है उसका जाननहार वह मैं, 
उसका करनेवाला मैं नहीं। ऐसा यदि उसे ममकार और 
अहंकार छूट जाये तो आत्मभान हो जाये। 

00:36:21.521 --> 00:36:31.232
<b>आस्रव आकुलताके उत्पन्न करने वाले 
हैं इसलिए दुःख के कारण हैं</b>। 
यह सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा कही हुई बात है। 

00:36:31.256 --> 00:36:42.638
संतों ने अनुभव करके ये शास्त्र लिखे हैं। 
भावलिंगी संत जंगलवासी नग्न दिगंबर मुनि थे। 

00:36:42.662 --> 00:36:51.901
चौबीस घंटे में एक बार आहार लें। 
एक ही बार पानी लें, फिर पानी का 
एक बूंद भी जो इच्छते नहीं। 

00:36:51.925 --> 00:37:01.604
एक सौ बीस डिग्री का ताप हो,
गला सूखता हो, प्राण जायें अपितु पानी का 
(बूंद भी) लेने का जिन्हें विकल्प उठता नहीं। 

00:37:01.628 --> 00:37:12.527
दिन के दौरान तो उन्हें नींद होती नहीं,
रात्रि के अंतिम पहर में एक साथ नींद आये 
तो पौने सेकंड नींद होती है। 

00:37:12.551 --> 00:37:20.664
एक सेकंड नींद आये तो मुनिपद चला 
जाये। ये पौने सेकंड से नींद बढ़ती नहीं,

00:37:20.688 --> 00:37:31.109
इतनी जागृत अवस्था है और आनंद के घूँट 
ऐसे भरते हैं कि उन्हें प्रमाद रहता नहीं। 
प्रमाद छूट जाता है। 

00:37:31.133 --> 00:37:43.328
आनंद के स्वाद में और स्वाद में प्रमाद छूट 
जाता है। प्रमाद के ऊपर जिन्होंने विजय प्राप्त 
की है ऐसे मुनिराज ने शास्त्र लिखा है। 

00:37:43.352 --> 00:37:49.535
सुनो भव्य प्राणियों!
तुम्हारे स्वरूप की ही मैं बात कहता हूँ। 

00:37:49.559 --> 00:37:56.531
मैं विकथा नहीं कहूँगा,
मैं आत्मकथा कहूँगा, धर्मकथा कहूँगा। 	

00:37:56.555 --> 00:38:03.988
आत्मा का, तुम्हारा क्या स्वरूप (है वह) तुम 
जानते नहीं हो। तुम्हारे स्वरूप को हम जानते हैं।

00:38:04.012 --> 00:38:19.727
तुम्हारे स्वरूप को तुम पहचानते नहीं। 
तुम कौन हो उसकी तुम्हें खबर नहीं है। 
परंतु तुम कौन हो वह हम जानते हैं। 

00:38:19.751 --> 00:38:24.223
तो हमारे स्वरूप की खबर आपको कैसे हो गई? 

00:38:24.247 --> 00:38:31.469
आप हमारे स्वरूप में तो प्रवेश करते नहीं और 
हमारा स्वरूप क्या है वह आपको कैसे पता चला?

00:38:31.493 --> 00:38:37.934
कि भाई हमें ऐसे पता चला कि 
हमारे शुद्धात्मा के हमने दर्शन किये 

00:38:37.958 --> 00:38:48.634
तब हमें ऐसा भासित हुआ, भान हुआ,
ज्ञान हुआ कि जैसा मेरा आत्मा है 
ऐसे जगत के सभी प्राणी भगवान हैं। 

00:38:48.658 --> 00:38:56.466
हम सभी को भगवान के रूप में देखते हैं। 
हम किसके प्रति राग और 
किसके प्रति द्वेष करें? 

00:38:56.490 --> 00:39:04.321
कौन मित्र और कौन शत्रु? ऐसी जिनकी 
वैराग्यवान दृष्टि प्रगट हो गई है। 

00:39:04.345 --> 00:39:10.388
<b>ऐसे मुनिवर देखे वन में,
जाके राग-द्वेष नहीं मन में</b>
(जिनेन्द्र अर्चना, पृ ३२९),

00:39:10.412 --> 00:39:19.826
ऐसे मुनिराजों ने ये शास्त्र
अनुभव करके लिखे हैं। स्वयं कहते हैं कि 
प्रचुर आनंद का भोजन करनेवाले हैं। 

00:39:19.850 --> 00:39:31.818
सम्यग्दृष्टि और श्रावक 
उन्हें आनंद का भोजन होता है परंतु 
प्रचुर नहीं, बहुत अधिक नहीं, मात्रा कम 

00:39:31.842 --> 00:39:39.589
और सिद्ध परमात्मा 
सौ प्रतिशत मात्रा (में) आनंद का भोजन करते हैं। 
अरिहंत परमात्मा अभी विराजमान हैं। 

00:39:39.613 --> 00:39:48.527
सीमंधर भगवान अभी 
महाविदेहक्षेत्र में साक्षात् विराजमान हैं। 
बीस तीर्थंकर अभी विराजमान हैं। 

00:39:48.551 --> 00:39:58.596
परंतु आज के युवानों को समय नहीं
कि यह क्या है? क्या समझने जैसा है?
क्या करने जैसा है? क्या नहीं करने जैसा है?

00:39:58.620 --> 00:40:02.049
व्यवहार में भी अभी 
कोई विवेक का ठिकाना नहीं। 

00:40:02.073 --> 00:40:13.654
क्या खाद्य और क्या अखाद्य 
उसका भी अभी विवेक नहीं, 
वहाँ धर्म की बात तो कोई अपूर्व है। आहाहा!

00:40:13.678 --> 00:40:25.020
दुःख के कारण को छोड़। दुःख के कारण का 
तू सेवन मत कर। यदि दुःख के कारण का सेवन करेगा,
दुःख के कारण की रुचि रखेगा,

00:40:25.044 --> 00:40:35.941
पुण्य और पुण्य के फल की रुचि रखेगा तो 
वर्तमान में तो तू दुःखी है वह हम जानते 
हैं, मगर भाविकाल में भी दुःख आ पड़ेगा। 

00:40:35.965 --> 00:40:46.620
यह मनुष्यभव तो मुश्किल से किसी बार प्राप्त होता 
है। सर्वज्ञ भगवान के ज्ञान में ऐसा आया है

00:40:46.644 --> 00:40:55.140
कि एकेन्द्रिय जीव निगोद में से निकलकर 
दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय 
उसे त्रस कहते हैं।

00:40:55.164 --> 00:41:03.423
एकेन्द्रिय को स्थावर कहते हैं,
दो इन्द्रिय जीवों को (जिसको) दो इन्द्रिय का उघाड़ 
(है) उसे त्रस जीव कहते हैं। 

00:41:03.447 --> 00:41:16.719
ऐसी त्रस राशि में जीव जब आता है
तब उत्कृष्ट में उत्कृष्ट दो हजार सागर मात्र, 
वह त्रस में रहता है। 

00:41:16.743 --> 00:41:24.261
और उसमें यदि आत्मभान करके मोक्ष हो गया 
तो छूट गया, और नहीं तो फिर से 
वह निगोद में चला जाता है।

00:41:24.285 --> 00:41:35.915
निगोद अर्थात् आलू और कंदमूल में 
रहे हुए जीव, जिन्हें जीवरूपसे कोई स्वीकार करने को 
तैयार नहीं इतना उनका ज्ञान संकुचित हो जाता है।

00:41:35.939 --> 00:41:40.477
आत्मबल उनका संकुचित हो जाता है।
वह बहुत दुःखी है। 

00:41:40.501 --> 00:41:53.849
नारकी के दुःख की अपेक्षा से भी एकेन्द्रिय 
निगोद के जीव का दुःख अनंतगुना है। वह भोगे 
वह जाने और दूसरे सर्वज्ञ केवली जानें। 

00:41:53.873 --> 00:42:06.512
अतः यह एक मनुष्यभव मिला वह तो एक 
मौका है, काम कर लेने का एक अवसर आया है। 

00:42:06.536 --> 00:42:19.854
यदि वह अवसर गया, वह अवसर चूक गया (तो)
आँख मिंच जायेंगी और कहाँ फैंक दिया जायेगा 
कुछ पता नहीं लगेगा, खो जायेगा। 

00:42:19.878 --> 00:42:24.682
इस लोक के अंदर वह कहाँ जाये 
कहाँ उसका पता लगे?

00:42:24.706 --> 00:42:34.767
जैसे एक सड़ा हुआ तिनका हो, तूफान आये 
और तिनका उड़े, अब वह तिनका कहाँ 
जाकर गिरेगा उसका कुछ पता नहीं।

00:42:34.791 --> 00:42:46.679
ऐसे एक बार एक घटना घटी,
राजकोट में गुरुदेव पधारे थे 

00:42:46.703 --> 00:42:59.145
तब जेल के अंदर जो कैदी थे,
उन कैदियों को पता चला कि 
सोनगढ़ के संत राजकोट में पधारे हैं। 

00:42:59.169 --> 00:43:05.394
उन्होंने मिलकर विचार किया कि 
हमें संत के दर्शन करना हैं। 

00:43:05.418 --> 00:43:14.244
इसलिए जेलर से अनुरोध किया कि हमें 
दर्शन करना हैं, आप जाकर अनुरोध करो। 

00:43:14.268 --> 00:43:23.711
जेलर को भी करुणा आ गई 
कि भाई संत के दर्शन करते हों तो भले करें,
ऐसे कोमल परिणाम उसे हुए। 

00:43:23.735 --> 00:43:32.211
तो जेलर जैसे ही आता है गुरुदेव के पास,	
याचना करता है कि हमारे कैदियों की 
भावना हुई है आपके दर्शन करने की। 

00:43:32.235 --> 00:43:36.874
(गुरुदेव ने) कहा हाँ खुशी से,
कल सुबह आयेंगे। 

00:43:36.898 --> 00:43:43.944
उस सुबह हम सब साथ में थे,		
वहाँ जेल के अंदर गये। 

00:43:43.968 --> 00:43:54.192
उसमें खूनी और सब बहुत थे। 
जेल खुल्ली हों, खुल्ली जेल (थी) और 
अंदर में गये (और) सब उनके दर्शन करते हैं।

00:43:54.216 --> 00:44:01.488
ऐसा होने पर बाहर निकले, जेल के बाहर 
(वहाँ) दूसरी एक जेल की कोठरी थी, 

00:44:01.512 --> 00:44:16.594
उसके अंदर एक बाईस साल का लड़का जिसने एक 
लड़की का खून किया था, स्त्री का, बाहर की कन्या का, 
और उसे फाँसी की सजा मिल गयी थी। 

00:44:16.618 --> 00:44:26.203
तो वहाँ हम ऐसे गये तब वह खुला दरवाज़ा,
एक सिर्फ़ चड्डी पहने था और वह बैठा था।

00:44:26.227 --> 00:44:33.311
उसके सामने जेलर ने कहा कि, कि देखो 
यह है न, इसे फाँसी की सजा मिल गई है। 

00:44:33.335 --> 00:44:41.364
अब इसे कुछ खाना नहीं भाता है,
पीना नहीं भाता है, इसे नींद नहीं आती है। 

00:44:41.388 --> 00:44:48.387
फाँसी का हुकुम हो गया, तारीख निश्चित हो गई।
हमें तो सिद्धांत में घटित करना है। 

00:44:48.411 --> 00:44:57.409
फाँसी की तारीख निश्चित हो गई। उसे कुछ भी 
अनाज देते हैं तो मुँह में से वापस निकालता है।

00:44:57.433 --> 00:45:09.853
पानी पीता नहीं, सोता नहीं, ऐसी उसे 
देह के ऊपर ममता है न? मोहजन्य दुःख है न?

00:45:09.877 --> 00:45:21.530
तब गुरुदेव ने कहा, आहाहा!
वास्तव में तो सबको फाँसी का हुकुम तो 
हो गया है। सिर्फ़ तारीख का पता नहीं है। 

00:45:21.554 --> 00:45:27.498
फाँसी अर्थात् मृत्यु, मरण अवश्य आनेवाला है। 

00:45:27.522 --> 00:45:37.518
और आजकल तो छोटी उमर के भाइयों का 
भी मुंबई में हार्टफेल हो जाता है। 
मुंबई में तो आजकल बहुत घटना घटती हैं। 

00:45:37.542 --> 00:45:43.798
अभी हम इंदौर गये थे तब टिकट 
मुंबई की air (हवाई जहाज) की ली थी। 

00:45:43.822 --> 00:45:51.546
अपने मुमुक्षु भाई थे उन्होंने (कहा) 
मैं कल टिकिट दे जाऊँगा,
टिकिट ले ली है कल दे जाऊँगा। 

00:45:51.570 --> 00:45:56.726
तो सुबह के पहर में उनका हार्टफेल
हो गया। बावन, तिरपन वर्ष की आयु (थी)। 

00:45:56.750 --> 00:46:06.732
अर्थात् कहने का आशय यह है कि प्रत्येक का 
हुकमनामा तो लिखा जा चुका है, सुनवाई बाकी है। 

00:46:06.756 --> 00:46:12.864
सभी को, कोई तीस, कोई चालीस, कोई पन्नास,
कोई साठ-सत्तर, ज्यादा से ज्यादा सौ वर्ष। 

00:46:12.888 --> 00:46:20.477
आज के काल में average (औसत), 
सौ ऊपर तो कोई ही पहुँचता है, एक सौ पाँच,
बाकी सौ के अंदर सब चले जाते हैं। 

00:46:20.501 --> 00:46:27.783
अतः यह एक मनुष्यभव मिला 
वह चिंतामणि रत्न मिला है। 

00:46:27.807 --> 00:46:34.393
एक 'छहढाला' बनाई है दौलतरामजी ने। 
उन्होंने तो वहाँ तक कहा है,

00:46:34.417 --> 00:46:42.884
अरे निगोद में से त्रस राशि में आया,
दो इन्द्रिय हुआ तो भी जैसे चिंतामणि 
रत्न प्रगट हुआ ऐसा मानना चाहिए। 

00:46:42.908 --> 00:46:50.390
तो यह मनुष्यभव मिला और उसमें कुछ धर्म की 
बात सुनने का रस भी नहीं, प्रेम भी नहीं। 

00:46:50.414 --> 00:46:58.015
क्या आत्मा? क्या धर्म? आहाहा!
भव हार जायेगा। कोई शरण नहीं होगा, 

00:46:58.039 --> 00:47:07.373
सभी घर के लोग खड़े-खड़े देखेंगे,
खड़े-खड़े देखेंगे परंतु कोई उसे बचा नहीं सकेगा। 

00:47:07.397 --> 00:47:13.138
डॉक्टर के पिता हों (तो) डॉक्टर स्वयं (भी)
बचा नहीं सकता अपने पिता को, माँ-बाप को। 

00:47:13.162 --> 00:47:19.356
कोई नहीं बचा सकता।
कौन शरण है?
एक आत्मा को आत्मा की शरण है। 

00:47:19.380 --> 00:47:24.589
यदि उसकी पहचान हुई 
तो अल्पकाल में मुक्ति होगी। 

00:47:24.613 --> 00:47:32.947
और यदि आत्मा की पहचान के बिना गया,
आयुष्य पूरा हुआ तो चाहे कोई भी 
चार गति में वह दुःख को भोगेगा। 

00:47:32.971 --> 00:47:35.439
इसलिए आचार्य भगवान कहते हैं, फरमाते हैं,	

00:47:35.463 --> 00:47:43.716
भाई! हम तेरे स्वरूप की बात कहते हैं,
हम दूसरे की बात तुझे सुनाते नहीं हैं। 

00:47:43.740 --> 00:47:53.603
तुझे तेरे स्वरूप की, तेरे आत्मा के 
स्वरूप की बात कहते हैं। तू शांति से सुन!
तेरे हित के लिए कहते हैं। 

00:47:53.627 --> 00:47:56.969
हमें हमारे लिए कुछ नहीं चाहिए। आहाहा!

00:47:56.993 --> 00:48:08.038
नग्न दिगंबर मुनि उन्हें कुछ भी स्पृहा नहीं है। 
श्रीमद्जी तो वहाँ तक फरमाते हैं 

00:48:08.062 --> 00:48:12.675
कि <b>वंदे चक्री तथापि न म‌‌ळे मान जो</b> 
(अपूर्व अवसर, राजपद)। 

00:48:12.699 --> 00:48:21.940
मुनिराज को चक्रवर्ती वंदन करते हैं,
परंतु उन्हें मान की अपेक्षा नहीं है 
कि कोई हमें वंदन करे तो ठीक। आहाहा!

00:48:21.964 --> 00:48:32.478
वीतरागी संत वे तो आत्मध्यान में लीन 
और मस्त हैं, उन्हें तो पर के सामने 
देखने का भी उन्हें समय नहीं है। 

00:48:32.502 --> 00:48:40.884
वे तो क्षण में और पल में अंदर में डुबकी 
लगाते हैं। ऐसे मुनिराज को जगत के 
जीवों के ऊपर करुणा आयी है,

00:48:40.908 --> 00:48:46.945
वे करुणा करके शास्त्र लिख गये हैं,
कि तुम अपने स्वरूप को पहचानो,

00:48:46.969 --> 00:48:55.176
अपने स्वरूप को तुम अंतर ध्यान से लक्ष में 
लेकर अनुभव करो तो सुख का रस्ता अंदर में है। 

00:48:55.200 --> 00:49:02.147
वे कहते हैं कि <b>दुःखके कारण हैं</b> पुण्य 
और पाप के परिणाम दोनों (दुःख के कारण हैं)। 

00:49:02.171 --> 00:49:07.951
ये पाप के परिणाम वे दुःख के कारण (हैं) परंतु 
पुण्य के परिणाम से तो सुख है या नहीं? 

00:49:07.975 --> 00:49:15.169
कि बूंद भी सुख नहीं है, भ्रांति हुई है तुझे।
<b>और भगवान आत्मा तो</b>, 

00:49:15.193 --> 00:49:21.214
एक तरफ पुण्य और पाप के परिणाम और 
दूसरी तरफ भगवान आत्मा भी विद्यमान है। 

00:49:21.238 --> 00:49:28.354
दो तत्त्व विद्यमान हैं। 
जीवतत्त्व भी है और पुण्य-पाप के 
परिणाम वे आस्रव तत्त्व भी हैं। 

00:49:28.378 --> 00:49:31.939
दो तत्त्व हैं। 
दोनों में तुझे पसंद करना है। 

00:49:31.963 --> 00:49:40.439
कि मैं कौन हूँ? मैं ज्ञानमय भगवान आत्मा 
हूँ या पुण्य-पाप के परिणाम मेरे हैं? 

00:49:40.463 --> 00:49:44.665
मेरा क्या है? वह तुझे पसंद करना है। 

00:49:44.689 --> 00:49:52.812
<b> भगवान आत्मा तो, सदा ही 
निराकुलता-स्वभावके कारण किसी का कार्य 
तथा किसी का कारण न होनेसे,</b>

00:49:52.836 --> 00:49:59.008
क्या फरमाते हैं? कि पुण्य और
पाप के परिणाम (को) दुःख का कारण कहा 

00:49:59.032 --> 00:50:04.460
तब पुण्य-पाप से भिन्न अंदर में 
ज्ञानमयी आत्मा विराजमान है। 

00:50:04.484 --> 00:50:14.225
ये <b>सदा ही</b>, तीनोंकाल, हमेशा के लिए,
<b>निराकुलता</b> अर्थात् अनाकुल आनंद के 

00:50:14.249 --> 00:50:22.568
<b>स्वभावके कारण</b> कारण <b>किसी का कार्य 
तथा किसी का कारण न होनेसे,</b>

00:50:22.592 --> 00:50:30.715
कोई परपदार्थ आये तो आत्मा का कार्य हो
और दूसरा कार्य हो उसमें आत्मा कारण हो 

00:50:30.739 --> 00:50:36.831
ऐसा कार्य कारण के व्यवहार का 
तीनोंकाल अभाव है। 

00:50:36.855 --> 00:50:46.580
आत्मा को धर्म हो उसमें पुण्य हो, पुण्य 
कारण हो और धर्म के परिणाम कार्य हों 

00:50:46.604 --> 00:50:59.001
इसप्रकार किसी का कार्य हो ऐसा 
आत्मा का स्वभाव नहीं है। आत्मा निरपेक्ष है। 
पुण्य के परिणाम की भी जिसे अपेक्षा नहीं है, 

00:50:59.025 --> 00:51:06.765
ऐसा अंदर परमात्मा विराजमान है इसलिए 
पुण्य से भी धर्म हो वह पुण्य का कारण,

00:51:06.789 --> 00:51:14.429
पुण्य कारण हो और धर्म के परिणाम कार्य हों
ऐसा कारण-कार्य संबंध पुण्य के साथ नहीं है। 

00:51:14.453 --> 00:51:26.724
और आत्मा कारण होवे और पुण्य के परिणाम 
उसका कार्य होवें ऐसा कारण होने का भी स्वभाव 
नहीं और कार्य होने का भी स्वभाव नहीं। 

00:51:26.748 --> 00:51:34.301
अब ये नये शब्द जरा कठिन पड़ते हैं। 
कारण क्या और कार्य क्या?

00:51:34.325 --> 00:51:42.659
दुकान में दो सौ, तीन सौ चीजें हों वह याद 
रहे। पाँच सौ-पाँच सौ, हजार-हजार चीजें हों,	
वे मोटर के स्पेयर पार्ट्स होते हैं न? 

00:51:42.683 --> 00:51:51.806
उसमें एक-एक हजार वस्तुएँ पड़ी हों,	
वे सभी याद रहती हैं। परंतु ये छह द्रव्य 
और नवतत्त्व ये याद नहीं रहते। 

00:51:51.830 --> 00:51:59.454
क्यों याद नहीं रहते? रुचि नहीं है। 
रुचि नहीं है इसलिए वे याद नहीं रहते। 

00:51:59.478 --> 00:52:10.991
परंतु परीक्षा देकर पास होना है,
तो पूरी किताबें की किताबें मौखिक याद कर लेता है,
क्योंकि उसमें पास होने की उसे रुचि है।

00:52:11.015 --> 00:52:15.896
और इसमें कुछ पैसे मिलते नहीं। 
अरे इसमें (क्या) मिले, तुझे खबर क्या पड़े? 

00:52:15.920 --> 00:52:23.660
इसमें लक्ष्मी मिले। कौनसी लक्ष्मी? ज्ञानरूपी 
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और अल्पकाल में 

00:52:23.684 --> 00:52:34.410
उसके ये चार गति के जन्म, जरा और मरण 
उसके दुःखों से आत्मा छूट जाता है,
ऐसा धर्म का लाभ होता है। 

00:52:34.434 --> 00:52:40.198
<b> किसी का कार्य तथा किसी का 
कारण न होनेसे,</b>

00:52:40.222 --> 00:52:49.338
आत्मा पुण्य का कारण होवें और पुण्य के 
परिणाम कार्य होवे ऐसा आत्मा का स्वभाव नहीं है। 

00:52:49.362 --> 00:53:00.719
और पुण्य के परिणाम कारण होवें 
और आत्मा की अनुभूति कार्य हो ऐसा 
कारण-कार्य का संबंध - स्वभाव आत्मा में नहीं है। 

00:53:00.743 --> 00:53:09.867
तू मान बैठा है। मान तो मान,
परंतु वस्तु स्वरूप ऐसा, (जैसा) अज्ञानी मानता है 
वैसा वस्तु स्वरूप नहीं है। 

00:53:09.891 --> 00:53:17.246
सर्वज्ञ भगवान कहते हैं और संतों ने (जैसा)
अनुभव किया ऐसा आत्मा का स्वरूप है। 

00:53:17.270 --> 00:53:30.548
साढ़े तीन और पाँच हो (गये),
कब तक चलाना है? पाँच मिनट। हमें 
तो यहाँ टाइम (पर) है, बराबर टाइमसर,

00:53:30.572 --> 00:53:38.414
ढाई से साढ़े तीन तो 
ढाई से साढ़े तीन। यह तो जरा 
पाँच मिनिट देर हुई इसलिए, एक घंटा। 

00:53:38.438 --> 00:53:46.069
<b>भगवान आत्मा तो, सदा ही</b>,
हमेशा, तीनोंकाल,
<b>निराकुलता-स्वभावके कारण किसी का कार्य</b>, 

00:53:46.093 --> 00:53:55.349
<b>तथा किसी का कारण न होनेसे,</b> 
तुझे पर के सामने नजर करने का काम क्या है?

00:53:55.373 --> 00:54:04.094
क्योंकि कोई पर पदार्थ तुझे धर्म का 
परमार्थ से कारण होता नहीं है; और कोई 
कार्य होवे, उसका कारण मैं नहीं हूँ। 

00:54:04.118 --> 00:54:10.642
इसलिए तू अपने स्वभाव को संभाल। 

00:54:10.666 --> 00:54:15.202
<b>दुःखका अकारण ही है</b>,
दुःख का कारण आत्मा यदि हो,

00:54:15.226 --> 00:54:20.869
पुण्य-पाप के परिणाम का कारण यदि 
आत्मा हो तो आत्मा अनादि-अनंत है। 

00:54:20.893 --> 00:54:27.399
पुण्य-पाप के परिणाम का कारण (यदि)
आत्मा हो, ख्याल रखना! न्याय है। 

00:54:27.423 --> 00:54:36.820
कि पुण्य और पाप के जो परिणाम होते हैं 
उसका कारण आत्मा हो तो 
आत्मा तो अनादि-अनंत है,

00:54:36.844 --> 00:54:41.374
तो पुण्य और पाप के परिणाम भी 
अनादि-अनंत होने चाहिए। 

00:54:41.398 --> 00:54:45.764
परंतु अनादि-अनंत होते हुए पुण्य के 
परिणाम देखने में आते नहीं हैं। 

00:54:45.788 --> 00:54:50.206
पुण्य और पाप के परिणाम का अभाव होकर 
परमात्म दशा प्रगट होती है। 

00:54:50.230 --> 00:55:02.117
अतः पुण्य और पाप के परिणाम का कारण 
भगवान आत्मा नहीं है। यदि हो तो 
नित्य कर्तापने का दोष आये। 

00:55:02.141 --> 00:55:05.164
<b> दुःखका अकारण ही है 
(अर्थात् दुःखका कारण नहीं)।</b>

00:55:05.188 --> 00:55:14.709
यह भगवान आत्मा सुख स्वभावी आत्मा,
वे पुण्य-पाप के परिणाम जो दुःखरूप हैं 
उनका कारण आत्मा में नहीं है। 

00:55:14.733 --> 00:55:20.888
वे तो अज्ञान से पुण्य और पाप उत्पन्न होते हैं,
स्वभाव से उत्पन्न नहीं होते। 

00:55:20.912 --> 00:55:29.247
स्वभाव कारण नहीं है, अज्ञान कारण है। अज्ञान 
अर्थात् ये पुण्य और पाप के परिणाम मेरे हैं

00:55:29.271 --> 00:55:36.457
इसप्रकार राग में आत्मबुद्धि करना ऐसा अज्ञानभाव,
अज्ञान की खान में से ये सभी भाव उत्पन्न होते हैं।

00:55:36.481 --> 00:55:43.300
<b>इस प्रकार विशेष (-अन्तर) को देखकर 
जब यह आत्मा, विशेष</b> 
अर्थात् <b>अन्तर</b> दो का। 

00:55:43.324 --> 00:55:52.472
आत्मा और आस्रव का अन्तर, जुदाई, भिन्नता 
<b>देखकर जब यह आत्मा, आत्मा और आस्रवोंके</b>, 

00:55:52.496 --> 00:56:00.745
यह आत्मा, ज्ञानमय आत्मा और पुण्य-पाप के 
परिणाम जो आस्रव मलिन भाव, जड़भाव, उनके

00:56:00.769 --> 00:56:05.753
<b>भेद को जानता है</b>,
भेद अर्थात् जुदाई जानता है। 

00:56:05.777 --> 00:56:13.133
<b>उसी समय</b> उस ही समय 
<b>क्रोधादि आस्रवोंसे निवृत होता है</b>। 

00:56:13.157 --> 00:56:21.355
<b>क्योंकि उनसे जो निवृत नहीं है 
उसे आत्मा और आस्रवोंके पारमार्थिक 
(यथार्थ) भेदज्ञानकी सिद्धि ही नहीं हुई।</b> 

00:56:21.379 --> 00:56:27.425
केवल, मात्र बातें करे कि पुण्य-पाप के 
परिणाम भिन्न हैं और आत्मा भिन्न है,

00:56:27.449 --> 00:56:35.729
इसप्रकार मात्र बातें करे, ऐसे मात्र विकल्प उठाये 
उसमें कोई आस्रव की निवृत्ति नहीं होती है।

00:56:35.753 --> 00:56:43.430
परंतु दोनों को भिन्न करके, पुण्य-पाप का लक्ष 
छोड़कर, जब आत्मा आत्मा का 
प्रत्यक्ष अनुभव करता है

00:56:43.454 --> 00:56:45.977
तब वह आस्रवों से निवर्त जाता है। 

00:56:46.001 --> 00:56:51.921
अर्थात् दुःख के कारण छूट जाते हैं। 
पुण्य-पाप के परिणाम रह जाते हैं, थोड़े टाइम 

00:56:51.945 --> 00:56:55.639
परंतु उनमें आत्मबुद्धि छूट जाती है,
उनकी रुचि छूट जाती है। 

00:56:55.663 --> 00:57:02.630
फिर पुण्य-पाप के परिणाम भी 
जैसे-जैसे स्वरूप में लीन होता है वैसे(-वैसे)
पुण्य-पाप के परिणाम का भी (अभाव होता है)। 

00:57:02.654 --> 00:57:08.715
पहले पाप के परिणाम का अभाव होता है। फिर 
अंत में पुण्य के परिणाम का भी अभाव होता है। 

00:57:08.739 --> 00:57:14.488
और परिपूर्ण वीतराग दशा प्रगट होकर,
अरिहंत पद की प्राप्ति करके 

00:57:14.512 --> 00:57:24.432
तेरहवाँ गुणस्थान अरिहंत परमात्मा 
केवलज्ञान प्रगट करके, वह ही आत्मा अशरीरी 
होकर वह सिद्धगति-पंचमगति को प्राप्त करता है। 

00:57:24.456 --> 00:57:37.594
आत्मा की पहचान करने जैसी है। 
आत्मा को पहचाने बिना कुछ (भी) धर्म की 
बिल्कुल शुरुआत होती नहीं। समय हो गया। 

00:57:37.618 --> 00:57:42.949
मुमुक्षु: धर्म अर्थात् क्या?
पू. लालचंदभाई: धर्म शब्द ऐसा है कि 
खास शब्द समझने जैसा है शब्द। 

00:57:42.973 --> 00:57:46.933
प्रश्न अच्छा आया है कि धर्म अर्थात् क्या?

00:57:46.957 --> 00:57:57.556
धर्म का पहले शब्दार्थ 
और फिर उसका भावार्थ। 
धर्म शब्द है उसका पहले शब्दार्थ क्या?

00:57:57.580 --> 00:58:06.587
धर्म शब्द का शब्दार्थ है, धर्म 
अर्थात् स्वभाव, स्वभाव को धर्म कहते हैं। 

00:58:06.611 --> 00:58:11.907
धर्म अर्थात् स्वभाव, 
वस्तु का जो स्वभाव होता है उसे धर्म कहते हैं। 

00:58:11.931 --> 00:58:18.976
<b>वत्थुसहावो धम्मो</b> 
(कार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा ४७६ अन्वयार्थ),
वस्तु का जो स्वभाव होता है उसे धर्म कहते हैं। 

00:58:19.000 --> 00:58:23.445
अब उसका एक दृष्टांत देता हूँ,
फिर हमें आत्मा में घटित करना है। 

00:58:23.469 --> 00:58:32.131
जैसे कि शक्कर है उसका स्वभाव मिठास,
तो मिठास है वह शक्कर का स्वभाव है। 

00:58:32.155 --> 00:58:38.177
स्वभाव होने से शक्कर का वह धर्म है, 
शक्कर का धर्म। स्वभाव को धर्म कहते हैं। 

00:58:38.201 --> 00:58:43.559
अभी हमें आत्मा में घटित करना है। 
यह तो दृष्टांत है। 

00:58:43.583 --> 00:58:51.159
ऐसे ही नींबू है, उसका स्वभाव खटास (है)। 
तो खटास है वह नींबू का स्वभाव (है) 

00:58:51.183 --> 00:58:57.525
इसलिए उस स्वभाव को नींबू का धर्म कहते हैं,
नींबू का धर्म। स्वभाव को धर्म कहते हैं। 

00:58:57.549 --> 00:59:02.579
अब यह तो दृष्टांत हुआ। 
अब हमें घटित करना है आत्मा के ऊपर। 

00:59:02.603 --> 00:59:11.133
कि आत्मा है उसका स्वभाव क्या?
कि उसका स्वभाव वीतरागता। 

00:59:11.157 --> 00:59:21.272
वीतरागभाव प्रगट हो, वह आत्मा का 
स्वभाव है। और स्वभाव होने से 
वीतरागभाव को भगवान धर्म कहते हैं। 

00:59:21.296 --> 00:59:29.302
<b>वत्थुसहावो धम्मो</b> 
वस्तु का जो स्वभाव होता है उसे धर्म कहते हैं। 

00:59:29.326 --> 00:59:38.417
आत्मा एक वस्तु है,
आत्मा में अनंत गुण बसते हैं। ज्ञान,
दर्शन, सुख, वीर्य, प्रभुत्व, विभुत्व 

00:59:38.441 --> 00:59:42.596
(ऐसे) अनंत-अनंत गुणों से भरा हुआ
अरूपी भगवान आत्मा है। 

00:59:42.620 --> 00:59:52.049
उसका जो स्वभाव, जानना और देखना। 
आत्मा का ज्ञान, आत्मा का श्रद्धान 
और आत्मा का आचरण, चारित्र,

00:59:52.073 --> 01:00:02.227
ऐसे वीतरागी जो परिणाम प्रगट होते हैं 
वे आत्मा का स्वभाव हैं और स्वभाव 
होने से आत्मा का धर्म कहने में आते हैं। 

01:00:02.251 --> 01:00:15.101
पुण्य और पाप के परिणाम, वे 
आत्मा का स्वभाव नहीं हैं परंतु विभाव हैं,
विकृतभाव हैं, कषाय के परिणाम हैं। 

01:00:15.125 --> 01:00:29.897
अतः वे स्वभाव नहीं होने से 
उनको धर्म नहीं कहते परंतु स्वभाव से विरूद्ध 
उनको अधर्म कहने में आता है। 

01:00:29.921 --> 01:00:36.311
मुमुक्षु: पाप अर्थात् क्या?
पू. लालचंदभाई: पाप अर्थात् तीव्र कषाय के परिणाम। 

01:00:36.335 --> 01:00:46.552
तीव्र कषाय के परिणाम अर्थात् हिंसा, झूठ,
चोरी आदि के जो कषाय के परिणाम होते हैं 
उन्हें भगवान तीव्र कषाय कहते हैं। 

01:00:46.576 --> 01:00:51.068
उन तीव्र कषाय के परिणाम को 
पाप के परिणाम कहने में आता है। 

01:00:51.092 --> 01:01:02.318
और पुण्य के परिणाम, वह कषाय की मंदता
जो होती है क्रोध की, मान की, माया की, लोभ की 
जो मंदता होती है, मंदता (को भगवान पुण्यतत्त्व कहते हैं)।

01:01:02.342 --> 01:01:07.473
तीव्र और मंद, तीव्र और मंद। 
ऐसी मंदता हो ऐसे आत्मा के 

01:01:07.497 --> 01:01:17.230
विकृत परिणाम को, विभाव परिणाम को 
भगवान पुण्यतत्त्व कहते हैं। दोनों कषाय की 
जाति हैं। जाति दोनों एक ही हैं। 

01:01:17.254 --> 01:01:24.979
जैसे कि जहर है, जहर। कुछ जहर ऐसे होते हैं 
कि जैसे ही खायें वैसे तुरंत ही मर जायें,

01:01:25.003 --> 01:01:34.042
और कुछ जहर ऐसा होता है कि घंटे,	
दो घंटे के बाद मरें। उसकी मात्रा में 
थोड़ा अंतर, परंतु वह मृत्यु को प्राप्त करता है।

01:01:34.066 --> 01:01:38.799
ऐसे ही पुण्य और पाप के परिणाम 
दोनों कषाय की जाति हैं। 

01:01:38.823 --> 01:01:48.919
आत्मा के स्वभाव की जाति के वे परिणाम नहीं हैं। 
आत्मा के स्वभाव से विरूद्ध भाव हैं वे। 

01:01:48.943 --> 01:01:55.952
अतः वे पाप के परिणाम कषाय की तीव्रता 
और पुण्य के परिणाम वे कषाय की मंदता। 

01:01:55.976 --> 01:01:59.811
शुभभाव को पुण्य कहते हैं,
अशुभभाव को पाप कहते हैं।

01:01:59.835 --> 01:02:08.769
खाना, पीना, कमाना, उपार्जन करना, ये सब पाप के 
परिणाम हैं। दुकान में जाना, व्यापार करना 
वे सब पाप के परिणाम हैं।

01:02:08.793 --> 01:02:20.236
दया, दान, करुणा, कोमलता के परिणाम, 
आत्मा का विचार करना, स्वाध्याय करना,
तत्त्व का विचार करना, वे पुण्य के परिणाम हैं। 

01:02:20.260 --> 01:02:29.110
मुमुक्षु: व्यापार करना वह भी 
पाप का परिणाम है?
पू. लालचंदभाई: हाँ, भाई! पाप का परिणाम है, बापू। 

01:02:29.134 --> 01:02:45.310
बापू, पाप के परिणाम हैं। भाई, बात सच्ची है।
परंतु गृहस्थों को व्यापार का विकल्प उठता तो है।

01:02:45.334 --> 01:02:50.856
गृहस्थ जीवन में व्यापार का विकल्प उठता है,
वह कहीं हाथ लंबा करने नहीं जाता। 

01:02:50.880 --> 01:03:01.526
इसलिए गृहस्थ जीवन में इतने पाप के परिणाम 
आते तो हैं, परंतु उन परिणामों की जाति क्या है वह 
तो समझनी पड़ेगी न हमें? उसकी जाति। 

01:03:01.550 --> 01:03:08.369
पाप के परिणाम छूटते नहीं, गृहस्थ को ऐसे 
पाप के परिणाम अभी उसकी कमजोरी से छूटते नहीं हैं, 

01:03:08.393 --> 01:03:13.876
परंतु उसे उनका स्वरूप तो देखना पड़े ना? कि 
ये पाप के परिणाम हैं, ये धर्म के परिणाम नहीं हैं। 

01:03:13.900 --> 01:03:19.078
दुकान पर जाकर व्यापार करना 
वे पुण्य के परिणाम नहीं, पाप के परिणाम हैं। 

01:03:19.102 --> 01:03:24.616
वह दुकान छोड़कर 
अथवा तो दुकान पर बैठा हो और ग्राहक न हो 

01:03:24.640 --> 01:03:31.132
और नवतत्त्व का विचार करे, आत्मा का विचार 
करे, तो उस समय उसे पुण्य के परिणाम हैं। 

01:03:31.156 --> 01:03:38.123
ये कोई आठ घंटे पाप के परिणाम नहीं हैं। 
परिणाम का समय-समय का हिसाब है। 

01:03:38.147 --> 01:03:45.756
एक-एक समय के परिणाम का हिसाब है,
सर्वज्ञ भगवान की कोर्ट में। एक-एक समय के परिणाम। 

01:03:45.780 --> 01:03:52.411
ऐसे जहाँ ग्राहक आया, उसे समझाता है 
वहाँ वे पाप के परिणाम। ग्राहक चला गया,

01:03:52.435 --> 01:04:04.183
अरे! मैं तो एक ज्ञानमय आत्मा हूँ,
मैं तो एक जाननहार-देखनहार हूँ, यह दुकान 
भी मेरी नहीं है, और यह पैसा भी मेरा नहीं है - 

01:04:04.207 --> 01:04:11.733
ऐसा विचार आ जाये दुकान पर बैठे, गद्दी के ऊपर,
कुर्सी के ऊपर तो उसे पुण्य का परिणाम कहते हैं। 

01:04:11.757 --> 01:04:17.857
और उस दुकान की कुर्सी के ऊपर बैठकर, वह 
पुण्य-पाप के परिणाम से भिन्न मेरा आत्मा है,

01:04:17.881 --> 01:04:24.590
ऐसे अंदर लक्ष करके 
यदि आत्मा में डुबकी मारे, तो वे धर्म के 
परिणाम वहाँ प्रगट हों 

01:04:24.614 --> 01:04:32.728
वहाँ उस स्थान पर, मंदिर में जाने की जरूरत न पड़े, 
वहाँ दुकान पर बैठे-बैठे (धर्म के परिणाम प्रगट होवें)। 

01:04:32.752 --> 01:04:43.274
मुमुक्षु: यह आप सब वीतराग की 
बातें करते हो परंतु मुझे पता नहीं चलता 
आप क्या कहना चाहते हो? 

01:04:43.298 --> 01:04:51.568
परंतु आपके पास कोई फैक्टरी 
या कुछ हो और दो सौ, तीन सौ लोगों को 
आपने नौकरी पर रखा हो,

01:04:51.592 --> 01:04:58.005
उन लोगों को आप वेतन देते हो 
इसलिए तो उनका गुजारा चलता है,
तो उसे पुण्य कहना या पाप कहना? 

01:04:58.029 --> 01:05:01.668
व्यापार एक तरफ पाप कहलाये,
परंतु यह पुण्य कहलाये या पाप कहलाये?

01:05:01.692 --> 01:05:08.691
पू. लालचंदभाई: देखो! हाँ, भले!
प्रश्न हो गया। बराबर है। देखो!

01:05:08.715 --> 01:05:15.534
वह उनके ऊपर दया करके पैसे नहीं देता,
उनसे काम निकलवाकर पैसा कमाना है। 

01:05:15.558 --> 01:05:18.727
उसका आशय यह है 
इसलिए पाप का परिणाम है। 

01:05:18.751 --> 01:05:25.397
हाँ, फैक्टरी बंद करके और फिर 
तुम महीने का राशन उसके घर भेजो,
दया के लिए, तो वह पुण्य है। 

01:05:25.421 --> 01:05:33.200
वो तो तुम पाँचसौ (रूपये) पगार दो	
और तुमको हजार का काम कराना (है ऐसा) 
तुम्हारा आशय (है)। आशय के ऊपर (आधारित) है। 

01:05:33.224 --> 01:05:40.081
मुमुक्षु: ये बात आपकी सही है परंतु 
दुनिया में सब फैक्टरी वाले मालिक हैं सब 
इस प्रकार विचार करें कि 

01:05:40.105 --> 01:05:43.620
वो पाप कहलाये 
तो फिर पूरी दुनिया की जनसंख्या करेगी क्या? 		

01:05:43.644 --> 01:05:55.447
पू. लालचंदभाई: भाई! (बात) ऐसी है 
कि कोई-कोई जीव अपने स्वरूप को समझकर 
और बाहर निकल जाता है। 

01:05:55.471 --> 01:06:01.392
सभी जीव एक साथ समझने की योग्यतावाले 
किसी काल में नहीं आयेंगे। 

01:06:01.416 --> 01:06:07.125
(ऐसा) कोई काल नहीं आयेगा कि सभी जीव 
एक साथ समझ जायें लाखों, करोड़ों, अरबों 

01:06:07.149 --> 01:06:11.156
और एक साथ मोक्ष में चले जायें 
ऐसा कोई काल आनेवाला नहीं है। 

01:06:11.180 --> 01:06:19.266
इसलिए संसार ऐसे के ऐसे चलनेवाला है। 
संसार की तुम चिंता मत करो,
संसार संसार के कारण से चलता है। 

01:06:19.290 --> 01:06:25.734
हमें मात्र अपनी एक आत्म-साधना करके 	
और हमें इस संसार में से छूटने जैसा है। 

01:06:25.758 --> 01:06:30.170
हम दूसरे को कुछ समझा सकें 
ऐसी अपने में शक्ति नहीं है। 

01:06:30.194 --> 01:06:39.762
एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ कर सकता 
नहीं। मात्र स्वयं स्वयं के स्वरूप को समझकर 
और बाहर निकल जाये तो वह बच जाये ऐसा है। 

01:06:39.786 --> 01:06:45.719
बाकी तो यह संसार किसी दिन (रुकनेवाला नहीं है)। 
तुम चिंता मत करो कि यह संसार रुकनेवाला 
(है)। अनादि-अनंत संसार है। 

01:06:45.743 --> 01:06:54.984
उसमें मात्र थोड़े जीव, कोई विरले,
कोई विरले अपनी आत्म-साधना करके और
संसार के बाहर निकल जाते हैं, तिर जाते हैं। 

01:06:55.008 --> 01:06:57.546
समुद्र से पार चले जाते हैं। 

01:06:57.570 --> 01:07:02.568
अरे! संसार तो अनादि-अनंत चलनेवाला है,
कहीं अटकनेवाला नहीं है,
किसी दिन संसार बंद नहीं होता। 

01:07:02.592 --> 01:07:11.106 
हमारे बाप-दादा कर्ताबुद्धि रखकर 
चले गये। अब बाप-दादा (तो) चले गये 
बाद में यह संसार चलता है या बंद हो गया? 

01:07:11.130 --> 01:07:16.480
चलता है न? हें? ऐसे हम इसमें से 
निकल जायें, हम इसमें से निकल जायें। 

01:07:16.504 --> 01:07:21.362
अपना मोक्ष हो जाये आत्म साधना से 
तो यह सब अटक जानेवाला है? चलनेवाला ही है। 

01:07:21.386 --> 01:07:31.774
जड़ और चेतन के परिणाम समय-समय पर,
परिणाम स्वभावी होने से हुआ ही करते हैं।

01:07:31.798 --> 01:07:38.273
बोलो। बोलो, बोलो कोई बात नहीं। 
मुमुक्षु: पैसे से सुख नहीं मिलता 
वह तो सब जानते हैं। 

01:07:38.297 --> 01:07:43.725
(मगर) पैसे बगैर चलता भी नहीं है; 
उसमें मुझे समझ नहीं आता। 

01:07:43.749 --> 01:07:54.029
पैसे से सुख मिलता नहीं है, 
पैसा साथ भी नहीं आता 
फिर भी पैसा प्राप्त करने के लिए सब करते हैं। 

01:07:54.053 --> 01:08:00.958
पू. लालचंदभाई: वह जो पैसा प्राप्त करने का (जो) 
लोभ होता है न? वह लोभभाव वह पापभाव है। 

01:08:00.982 --> 01:08:11.339
अब पैसे से ही यदि जीवन जिया जाता हो 
तो इन कौए और कबूतर के पास एक पैसा 
बैंक बेलेन्स नहीं है और जीते हैं या नहीं?

01:08:11.363 --> 01:08:18.440
यह तो समझने जैसी (बात) है। 
यह टीका टिप्पणी की बात नहीं है। 
यह तो एक स्वरूप समझने जैसा है। 

01:08:18.464 --> 01:08:27.526
जो अपनी मान्यता है कि परपदार्थ हो 
तो मेरा जीवन है, परंतु परपदार्थ के बिना
भी जीवन जीनेवाले अनंत जीव हैं, 

01:08:27.550 --> 01:08:35.065
जिनके पास कोई पैसा नहीं है, मकान नहीं है,
कोई मोटर नहीं है, बंगला नहीं है। 

01:08:35.089 --> 01:08:55.734
मुमुक्षु: पाँच मिनिट हैं। हम चलते हैं 
तो जीव-जन्तु मरते होंगे तो भी हमें 
चलना तो पड़ता है। तो उसमें भी पाप है?

01:08:55.758 --> 01:09:05.208
पू. लालचंदभाई: देखो भाई! जितनी असावधानदशा से चलता है,	
असावधानदशा, इतना तो उसे दोष लगता ही है। 

01:09:05.232 --> 01:09:08.403
दोष तो दोष ही है, असावधानदशा। 

01:09:08.427 --> 01:09:20.820
परंतु यदि नीचे देखकर चले जरा सावधानी से कि 
कोई जीव मरे नहीं, इतनी सावधानी से चले,
ध्यान रखकर, तो उसे पुण्यतत्त्व हो। 

01:09:20.844 --> 01:09:23.655
उसे धर्म नहीं होता अपितु शुभभाव,
पुण्य बंधता है। 

01:09:23.679 --> 01:09:28.724
जीव-जन्तु ऐसे चले जाते हों तो हम 	
ऐसे जरा देखकर चलें तो वे बच जायें। 

01:09:28.748 --> 01:09:34.373
बचता तो है अपने कारण से,
परंतु हम थोड़ी सी सावधानी रखें,
ऐसे ऊँचा देखकर न चलते (जायें), 

01:09:34.397 --> 01:09:42.230
और नीचे देखकर चलें तो इतने जीव बचें 
तो उनको करुणा के भाव कहते हैं,
उनको शुभभाव कहते हैं। 

01:09:42.254 --> 01:09:58.476
देखकर चलना चाहिए। कोई जीव मरे 
वह कर्तव्य नहीं है। बन सके उतनी सावधानी 
गृहस्थ अवस्था में रखनी चाहिए। 

01:09:58.500 --> 01:10:08.135
बाकी गृहस्थ अवस्था में पाप के भाव 
तो (होते हैं), ऐसी ही उसकी चर्या, दिनचर्या है।

01:10:08.159 --> 01:10:19.555
मुमुक्षु: आत्मा में सब (ज्ञानी) सुख दिखाते हैं,
और वहाँ ढूँढो तो मिलेगा,
परंतु किस प्रकार ढूँढना..?

01:10:19.579 --> 01:10:23.609
पू. लालचंदभाई: बराबर है। वह मुद्दे का प्रश्न है। 

01:10:23.633 --> 01:10:31.968
कि सभी ज्ञानी धर्मात्मा कह गये 
कि तुम्हारा सुख तुम्हारी आत्मा में है 
और वहाँ ढूँढो तो तुम्हें मिलेगा। 

01:10:31.992 --> 01:10:38.069
बराबर न? ऐसा कहते हैं।
परंतु उसकी खोज कैसे करना? ऐसा प्रश्न है न?

01:10:38.093 --> 01:10:43.624
कि यदि हमारे अंदर में सुख हो तो 
प्राप्त करना है परंतु किस प्रकार खोजना? 

01:10:43.648 --> 01:10:51.559
तो ज्ञानी फरमाते हैं कि तुम्हारी परिणति,
तुम्हारा उपयोग बाहर जाता है न? ऐसे बाहर,

01:10:51.583 --> 01:10:56.699
बाहर देखते हो न तुम?
तुम्हारा उपयोग अर्थात् ज्ञान का व्यापार 
निरंतर बाहर जाता है न?

01:10:56.723 --> 01:11:01.988
यह है और यह है और यह है, जानने में 
जाता है न ज्ञान उपयोग बाहर?

01:11:02.012 --> 01:11:07.635
तो जानते तो आता है। आत्मा को 
जानने का काम तो आता है। बराबर न?

01:11:07.659 --> 01:11:14.879
अब पर को जानता है वह ज्ञान अंदर में मुड़कर 
आत्मा को जाने, तो आत्मा का अनुभव हो। 

01:11:14.903 --> 01:11:19.800
तुम्हें जानते तो आता है न?	
यह पदार्थ खट्टा है, मीठा है,

01:11:19.824 --> 01:11:27.455
यह लंबा है, छोटा है, सफेद है,
यह मकान है, बंगला (है), जानने का काम 
तो तुम करते ही हो निरंतर। 

01:11:27.479 --> 01:11:33.223
ज्ञान बिना का आत्मा नहीं होता। आत्मा यदि 
ज्ञान बिना का हो तो जड़ हो जाये। 

01:11:33.247 --> 01:11:41.613
अब जो बहिर्मुख 
परपदार्थ को जानने जाता है उसकी बजाय 
उस इन्द्रियज्ञान के व्यापार को रोककर,

01:11:41.637 --> 01:11:46.494
वह अपने ज्ञान को अंदर में मोड़े,	
जिसका ज्ञान जहाँ से आता है ...

01:11:46.518 --> 01:11:50.564
ज्ञान कहाँ से आता है?
ज्ञान तो आत्मा में से आता है। 

01:11:50.588 --> 01:11:56.400
ज्ञान ज्ञेय में से नहीं आता। 
यह दिवाल है सामने,
उस दिवाल का ज्ञान तुम्हें हुआ अभी,

01:11:56.424 --> 01:12:00.579
तो वह ज्ञान दिवाल में से आता है 
या ज्ञान आत्मा में से आया?

01:12:00.603 --> 01:12:10.617
तुम्हें भ्रांति हो गई है कि लालुभाई के सामने 
मैं देखूँ तो लालुभाई का ज्ञान हो। 
वह ज्ञान तुम्हारे आत्मा में से आया है। 

01:12:10.641 --> 01:12:16.953
वह ज्ञान जहाँ से आता है, उस ज्ञान को अंदर में 
जाकर पकड़े तो उसे सुख की प्राप्ति हो। 

01:12:16.977 --> 01:12:29.170
ऐसी वस्तु है। थोड़ा अभ्यास जरूरी है। 
सूक्ष्म बात है। बात सुनने को मिले नहीं। 

01:12:29.194 --> 01:12:39.281
हाँ, पुंजाभाई और हरखचंदभाई!
हाँ, ठीक-ठीक अच्छा। 
मैं नैरोबी गया था, पाँच वर्ष पहले। 