﻿WEBVTT

00:00:39.466 --> 00:00:56.478
यह एक श्री समयसार जी परमागम शास्त्र है। 
उसका कर्ता-कर्म अधिकार चलता है। 
उसकी ७३ नंबर की गाथा हमें शुरू करनी है। 

00:00:56.502 --> 00:01:09.499
अनादिकाल से आत्मा की भूल यह हुई है 
कि मैं एक चैतन्य स्वरूपी आत्मा कर्ता हूँ 

00:01:09.523 --> 00:01:19.787
और ये क्रोध, मान, माया, लोभ के परिणाम 
वह मेरा कर्म हैं अथवा राग-द्वेष-मोह के 
परिणाम होते हैं वे मेरे कर्म हैं,

00:01:19.811 --> 00:01:29.660
अथवा संकल्प और विकल्प जो उत्पन्न होते हैं 
वे मेरा कार्य और कर्तव्य हैं 
और मैं उनका कर्ता हूँ। 

00:01:29.684 --> 00:01:44.088
इसप्रकार अनादिकाल से आत्मा 
अपने स्वभाव को भूलकर आत्मा का ज्ञान,
वह आत्मा का कर्म होना चाहिए,

00:01:44.112 --> 00:01:53.087
उसके बदले अनादिकाल से राग को 
कर्म बनाता आता है। कर्म अर्थात् कार्य। 

00:01:53.111 --> 00:02:07.826
मैं रागादि का कर्ता हूँ और ये रागादि 
परिणाम मेरे कर्म हैं, मैं कर्ता हूँ और 
अशुभभाव और शुभभाव, वे मेरे कर्म हैं। 

00:02:07.850 --> 00:02:14.481
मैं कर्ता हूँ और पुण्य के और 
पाप के परिणाम वे मेरा कर्म हैं। 

00:02:14.505 --> 00:02:28.933
इसप्रकार अनादिकाल से आत्मा अपने स्वभाव को 
भूलकर, इन रागादि विकार के साथ एकताबुद्धि 
करके, कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति कर रहा है। 

00:02:28.957 --> 00:02:46.227
वह आत्मा अज्ञान से दुःखी होता है। 
राग को करना और राग का फल दुःख-आकुलता,
उसको भोगना वह आत्मा का स्वभाव नहीं है। 

00:02:46.251 --> 00:02:57.804
यदि रागादि को करना वह आत्मा का स्वभाव हो 
तो आत्मा अनादि-अनंत है 
और रागादिरूप से कर्म हुआ ही करे 

00:02:57.828 --> 00:03:06.794
और उसका कर्ता बना (ही) करे, तो किसी भी 
काल में उसकी दशा में वीतरागभाव प्रगट न हो सके। 

00:03:06.818 --> 00:03:15.754
अतः रागादि की कर्तापने की बुद्धि 
तो तब तक भासित होती है कि जब 
तक उसे स्वभाव दृष्टि नहीं है 

00:03:15.778 --> 00:03:27.863
कि मैं तो एक ज्ञानमय आत्मा हूँ, ज्ञान ही 
मेरा कर्म है कि जो कार्य स्वभावरूप है 
और आत्मा को आनंददायक है। 

00:03:27.887 --> 00:03:38.346
ऐसे आत्मा के ज्ञान को कर्म नहीं बनाता हुआ,
राग को कर्म बना-बनाकर और 
अज्ञानभाव से अनंतकाल से दुःखी हो रहा है। 

00:03:38.370 --> 00:03:48.618
ऐसी कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति का 
अभाव होकर शुद्धात्मा कर्ता 
और शुद्धात्मा का अवलंबन लेने पर,

00:03:48.642 --> 00:03:58.124
जो आत्मज्ञान होता है वह आत्मा का कर्म जब 
बने तब उसे धर्म की शुरूआत होती है। 

00:03:58.148 --> 00:04:03.178
वह विषय यहाँ कर्ता-कर्म
अधिकार में कहने में आता है। 

00:04:03.202 --> 00:04:15.708
अनादिकाल से आत्मा या तो 
ईश्वर को कर्ता मानता है या 
स्वयं को पर का कर्ता मान रहा है। 

00:04:15.732 --> 00:04:25.057
परपदार्थ से मेरे परिणाम होते हैं और मेरे से 
परपदार्थ के परिणमन होता है इसप्रकार अनादिकाल से,	

00:04:25.081 --> 00:04:37.454
अज्ञानभाव से दो द्रव्य में कर्ता-कर्म
संबंध का अभाव होने पर भी मैं करनेवाला 
और जगत के पदार्थ वे मेरे कार्य हैं, 

00:04:37.478 --> 00:04:45.750
इसप्रकार अनादिकाल से मानकर 
वह दुःखी हो रहा है परंतु आत्मज्ञान 
एक समयमात्र भी वह करता नहीं है। 

00:04:45.774 --> 00:04:52.803
जब तक आत्मा का भान नहीं है, आत्मा का 
ज्ञान नहीं है, शुद्धात्मा का श्रद्धान नहीं है,

00:04:52.827 --> 00:04:59.067
शुद्धात्मा का अनुभव नहीं होता 
तब तक आत्मा अज्ञानी रहता है। 

00:04:59.091 --> 00:05:09.176
जब उस आत्मा को राग से भिन्न 
ऐसे शुद्धात्मा का लक्ष होता है,
दृष्टि में शुद्धात्मा आता है,

00:05:09.200 --> 00:05:20.244
ध्यान का ध्येय शुद्धात्मा होता है,
ज्ञान का ज्ञेय अपना आत्मा होता है तब 
वह आत्मा सम्यक् पर्याय से परिणम जाता है। 

00:05:20.268 --> 00:05:31.790
अर्थात् कि सम्यग्दर्शन, ज्ञान,
चारित्ररूप परिणमता है उसे परमात्मा 
तीर्थंकर देवाधिदेव धर्म कहते हैं। 

00:05:31.814 --> 00:05:38.962
ऐसे शुद्धात्मा का लक्ष कैसे हो
उसके लिए एक यह गाथा है। 

00:05:38.986 --> 00:05:51.730
शिष्य का प्रश्न है, <b>अब प्रश्न करता है कि 
किस विधिसे</b> अर्थात् किस <b>विधिसे यह आत्मा 
आस्रवों से निवृत्त होता है</b>?

00:05:51.754 --> 00:06:02.549
आस्रव अर्थात् जो दुःख के कारण हैं,
राग-द्वेष-मोह के भाव,
उनसे निवृत्त कैसे हो? 

00:06:02.573 --> 00:06:13.501
उस दुःख से आत्मा का छुटकारा कैसे हो?
चारगति के दुःख भोगता है, 
भोगते-भोगते अनंतकाल गया। 

00:06:13.525 --> 00:06:25.507
अब, जब किसी लायक जीव को संसार में 
दुःख भासित होता है, कहीं आत्मिक शांति 
और आत्मिक सुख प्राप्त होता नहीं 

00:06:25.531 --> 00:06:38.278
तब वह प्राणी, वह आत्मा, लायक जीव 
श्रीगुरु को प्रश्न करता है कि 'प्रभु! ये 
अनादिकाल से चारगति के दुःख मैंने भोगे,

00:06:38.303 --> 00:06:48.770
अब दुःख सहन नहीं होते, मेरे इस दुःख की 
निवृत्ति का उपाय क्या? वह (मुझे) जानना 
है। कृपा करके आप मुझे समझाईये।'

00:06:48.794 --> 00:06:58.315
इसप्रकार जो शिष्य जिज्ञासु होकर प्रश्न करता है 
उसे आचार्य भगवान उत्तर देते हैं कि सुन,

00:06:58.339 --> 00:07:09.969
दुःख से रहित होने का, दुःख से छूटने का
उपाय मैं तुझे बताता हूँ, मुझे भी मेरे गुरु ने 
यह उपाय बताया था। 

00:07:09.993 --> 00:07:16.117
मुझे भी इस दुःख से मुक्ति हुई है 
और आत्मिक सुख की प्राप्ति हुई है। 

00:07:16.141 --> 00:07:24.139
ऐसे मुनिराज स्वयं दूसरे जीवों को समझाते हैं 
कि तुम भी आत्मा के रास्ते जाओ

00:07:24.163 --> 00:07:32.364
तो तुम्हें आत्मा की प्राप्ति होगी 
और शाश्वत सुख तुम्हें मिलेगा। 

00:07:32.388 --> 00:07:39.961
यहाँ लंदन में मैंने देखा 
कि सबके पास नक्शे होते हैं। 

00:07:39.985 --> 00:07:47.178
दूसरी जगह पर - दस मील, बीस मील,
तीस मील, चालीस मील - जाना हो 
तो नक्शा देखकर जाते हैं। 

00:07:47.202 --> 00:07:53.083
कोई-किसी से पूछता नहीं है। 
नक्शा देखकर जाते हैं। 

00:07:53.107 --> 00:08:07.714
जहाँ स्वयं जाने का ध्येय निश्चित किया 
हो वहाँ नक्शा देखकर जाते हैं। परंतु इस
आत्मा का नक्शा क्या है? उस नक्शे को खोजते नहीं हैं। 

00:08:07.738 --> 00:08:20.181
वे नक्शे सभी शास्त्रों में छपे हुए हैं। 
जैसे वे छपे हुए नक्शे मिलते हैं 
यहाँ तैयार ऐसा ये नक्शा छपा हुआ है। 

00:08:20.205 --> 00:08:29.343
कि आत्मा की ओर जाना हो, आत्मा की ओर गति 
करनी हो और यदि तेरा ध्येय आत्मा हो,

00:08:29.367 --> 00:08:37.538
जैसे दूसरी जगह पर चालीस मील जाना हो 
तो वह ध्येय कहलाता है। जहाँ पहुँचना हो 
उसे ध्येय कहते हैं। 

00:08:37.562 --> 00:08:53.106
तो उसके लिए जैसे लंदन के नक्शे हैं,
ऐसे ही ये संत, आत्मा के अनुभवी,
वीतरागी संत आत्मा का नक्शा बताते हैं 

00:08:53.130 --> 00:09:02.050
कि, भाई! दुःख से छूटने का उपाय मैं 
तुझे बताता हूँ, सुन। कोई तुझे शरण नहीं है, 

00:09:02.074 --> 00:09:11.214
कुटुंब, कबीला, परिवार, धन, धान्य,
दास, दासी कोई तुझे शरण नहीं है। 
एक आत्मा ही शरण होता है। 

00:09:11.238 --> 00:09:21.213
अतः जल्दी से जल्दी आत्मा की 
शरण लेकर, आत्मा का अनुभव करना
उसे परमात्मा धर्म कहते हैं। 

00:09:21.237 --> 00:09:28.436
उस आत्मा का अनुभव करने पर 
आत्मा दुःख से छूट जाता है। 
पहले मोह छूटता है 

00:09:28.460 --> 00:09:41.392
और फिर विशेष आत्मा में लीनता, रमणतारूप 
चारित्र अंगीकार हो तब राग-द्वेष का 
अभाव होकर परिपूर्ण परमात्म दशा प्रगट होती है। 

00:09:41.416 --> 00:09:53.758
इसप्रकार ये आचार्य भगवान दुःख से छूटने का 
अथवा सुख की प्राप्ति का उपाय बताते हैं। 
७३ नंबर की गाथा है। 

00:09:53.782 --> 00:10:07.553
<b>अहमेक्को खलु सुद्धो णिम्ममओ णाणदंसणसमग्गो।</b> 
<b>तम्हि ठिदो तच्चित्तो सव्वे एदे खयं णेमि॥७३॥</b>

00:10:07.577 --> 00:10:30.862
<b>मैं एक, शुद्ध, ममत्वहीन रु, ज्ञानदर्शनपूर्ण हूँ।</b> 
<b>इसमें रहूँ स्थित, लीन इसमें, शीघ्र ये सब क्षय करूँ॥७३॥</b> 

00:10:30.886 --> 00:10:48.415
यह अपूर्व आत्मा की बात है। सर्वज्ञ भगवान
द्वारा कथित और संतों ने अपने अनुभव से 
सिद्ध करके इस शास्त्र की रचना की है। 

00:10:48.439 --> 00:11:01.319
उसमें आचार्य भगवान ने शुद्धात्मा का स्वरूप
क्या और उसका अवलंबन कैसे लिया जा सके?
उसका इसमें उपाय बताने में आया है। 

00:11:01.343 --> 00:11:07.483
<b>ज्ञानी विचार करता है कि:-</b> 
अर्थात् ज्ञानवान विचार करता है कि,

00:11:07.507 --> 00:11:15.403
अर्थात् संज्ञी पँचेन्द्रिय मनुष्य है उसके 
पास इन्द्रियज्ञान, क्षयोपशमज्ञान (है)। 

00:11:15.427 --> 00:11:25.035
मनवाला प्राणी है, अपने हित 
और अहित का विचार कर सकने की शक्ति 
सबमें प्रगट हो गई है। 

00:11:25.059 --> 00:11:33.365
परंतु कौनसा भाव हितरूप और कौनसा भाव अहितरूप?
उसका उसे बिल्कुल विवेक अर्थात् ख्याल नहीं है

00:11:33.389 --> 00:11:44.334
इसलिए अहितरूप भाव को स्वयं को हितरूप मानकर 
उसे अपनाता है और हितरूप भाव को 
अनादिकाल से छोड़ता है, लक्ष में लेता नहीं है। 

00:11:44.358 --> 00:11:53.724
ऐसे मनवाले प्राणी मनुष्य को 
उपदेश देते हैं। समझी जा सके ऐसी बात है। 

00:11:53.748 --> 00:11:59.707
समझनेवाले को समझाते हैं। 
नहीं समझनेवाले को समझाते नहीं हैं। 

00:11:59.731 --> 00:12:11.065
समझने की शक्ति सभी में वर्तमान (में) प्रगट 
है। यदि समझने की रुचि रखे, धगश रखे 
तो समझ में आये ऐसी चीज है। 

00:12:11.089 --> 00:12:18.470
अनंत आत्मायें प्रथम मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी 
थीं। वे ही आत्मायें अंतरात्मा होती हैं। 

00:12:18.494 --> 00:12:24.033
और वे ही आत्मायें विशेष लीन होकर 
परमात्म दशा को प्राप्त करती हैं। 

00:12:24.057 --> 00:12:32.063
तो <b>ज्ञानी विचार करता है कि:-</b> अर्थात् ज्ञानवान 
<b>विचार करता है कि:- निश्चयसे मैं एक हूँ</b>। 

00:12:32.087 --> 00:12:45.952
मैं अर्थात् आत्मा। यह देह सो मैं नहीं हूँ। यह राग 
वह मैं नहीं हूँ। मैं तो एक ज्ञान और दर्शनमय 
आत्मा हूँ। <b>मैं एक हूँ,</b> 

00:12:45.976 --> 00:12:58.934
मैं <b>शुद्ध हूँ</b>। जो अशुद्धता है,
वर्तमान परिणाम में जो पुण्य-पाप की 
अशुद्धता है, शुभ और अशुभभाव की 

00:12:58.958 --> 00:13:08.995
(जो) अशुद्धता है, व्रत और अव्रत के 
परिणाम की जो अशुद्धता है 
वो मैं नहीं हूँ, वो आस्रवतत्त्व है। 

00:13:09.019 --> 00:13:15.223
मैं जीवतत्त्व हूँ अतः मैं शुद्ध हूँ। 
मेरा स्वभाव शुद्ध है। 

00:13:15.247 --> 00:13:25.172
आत्मा के दो पहलू हैं। 
एक वर्तमान परिणामरूप का पहलू 
और एक द्रव्यरूप पहलू। 

00:13:25.196 --> 00:13:31.258
द्रव्य में अनंत गुण रहे हुए हैं 
और परिणाम एक समय के होते हैं। 

00:13:31.282 --> 00:13:42.412
जिसमें राग-द्वेष-मोह होता है	
वे परिणाम अशुद्ध हैं। 
मैं अशुद्ध नहीं, मैं तो शुद्ध हूँ। 

00:13:42.436 --> 00:13:49.380
देखो ये परिणाम में राग-द्वेष-मोह के 
नाश का उपाय बताते हैं। 

00:13:49.404 --> 00:13:58.082
मैं एक हूँ, मैं शुद्ध हूँ,
मेरा स्वभाव तीनोंकाल शुद्ध है। 

00:13:58.106 --> 00:14:09.729
मैं <b>ममतारहित हूँ,</b>
परिणाम में ममता होती है। 
और परिणाम में ममता होने पर दुःख भी होता है 

00:14:09.753 --> 00:14:24.914
परंतु उस परिणाम में जो ममता होती है और ममताजन्य 
जो दुःख होता है उसके नाश का उपाय क्या है?
कि मैं तीनोंकाल निर्ममत्व हूँ। 

00:14:24.938 --> 00:14:31.188
एकबार द्रव्य स्वभाव को देख। 
भाई! एकबार अपने द्रव्य स्वभाव (को देख)। 

00:14:31.212 --> 00:14:36.874
क्या द्रव्य और क्या पर्याय?
उसकी भी खबर नहीं।

00:14:36.899 --> 00:14:42.975
सोने को द्रव्य कहते हैं और उसकी 
अवस्था को परिणाम कहते हैं, पर्याय कहते हैं। 

00:14:42.999 --> 00:14:50.950
ऐसे आत्मा अनादि-अनंत है। देवगति में 
था वही का वही आत्मा मनुष्यगति में है 

00:14:50.974 --> 00:14:57.028
और मनुष्यगति में से वापस देवगति में जायेगा 
तो भी आत्मा वही का वही है। 

00:14:57.052 --> 00:15:06.059
जो आत्मा नित्य टिकता है 
उसे द्रव्य कहते हैं और परिणाम पलटते हैं 
उन्हें पर्याय कहने में आती है। 

00:15:06.083 --> 00:15:15.198
इतना कम से कम ज्ञान 
तो धर्म समझने के लिए अथवा आत्मा का 
स्वरूप समझने के लिए जरूरी है। 

00:15:15.222 --> 00:15:25.055
इतना भी ज्ञान करने के लिए यदि लापरवाह रहे 
तो उसे समझ में आयेगा नहीं। 

00:15:25.079 --> 00:15:36.453
मैं <b>ममतारहित हूँ</b>। परिणाम में ममत्व 
होता है। देह मेरा, कुटुंब मेरा, मोटर मेरी 

00:15:36.477 --> 00:15:51.825
इसप्रकार परपदार्थ में ममता होती है
तब की बात है और ममता का दुःख 
वेदन में आता है, उस समय की बात है। 

00:15:51.849 --> 00:16:01.072
कि उस ममत्वभाव और ममत्वजन्य दुःख 
उसके नाश का उपाय क्या है?
कि तू परिणाम को अब मत देख। 

00:16:01.096 --> 00:16:12.023
परिणाम में ममता होती है यह बात सही
है। परंतु परिणाम में ममता होती है 
उसकी ओर का लक्ष छोड़ दे। 

00:16:12.047 --> 00:16:17.100
और स्वभाव का लक्ष कर तो 
स्वभाव में ममता का अभाव है। 

00:16:17.124 --> 00:16:29.319
पर्याय में ममता का सद्भाव 
और द्रव्य स्वभाव में ममता का अभाव,
इसका नाम अनेकांत है। 

00:16:29.343 --> 00:16:37.987
द्रव्य में पर्याय की नास्ति है। द्रव्य में 
गुणों की अस्ति है। ज्ञान, दर्शन, सुख वगैरह

00:16:38.011 --> 00:16:39.784
द्रव्य स्वभाव में गुण हैं। 

00:16:39.808 --> 00:16:49.863
जैसे सोने में, सोना द्रव्य है,
उसमें पीलापन, चिकनापन, भारीपन, वजन 
वे उसके गुण हैं। 

00:16:49.887 --> 00:16:58.948
और समय(-समय) पर उसकी अवस्थायें होती हैं। चैन 
होती है, पौंची होती है, कड़ा, कुंडल सब होते हैं 

00:16:58.972 --> 00:17:04.993
वे उसकी अवस्थायें हैं। द्रव्य भी है 
और अवस्थायें भी होती हैं। 

00:17:05.017 --> 00:17:10.094
ऐसे ही आत्मा भी है और वर्तमान 
उसकी अवस्था भी होती है। 

00:17:10.118 --> 00:17:17.578
उस अवस्था में ये देहादि मेरे हैं 
ऐसी उसे ममता हो रही है। 

00:17:17.602 --> 00:17:24.841
जब ममता होती है और ममता 
का दुःख होता है, अनुभव में आता है

00:17:24.865 --> 00:17:36.980
उस समय, उस वक्त ही उस परिणाम से भिन्न 
आत्मा अंतर ज्ञान और आनंदमय विराजमान है,

00:17:37.004 --> 00:17:49.432
उसको देख तू, उसमें ममता के भाव का अभाव है।
परिणाम में ममता का सद्भाव और 
द्रव्य स्वभाव में ममता का अभाव। 

00:17:49.456 --> 00:18:03.860
पानी की पर्याय में उष्णता का सद्भाव और 
पानी के द्रव्य स्वभाव में शीतलता का 
सद्भाव और उष्णता का अभाव। 

00:18:03.884 --> 00:18:16.593
पानी मिट्टी के संग से, अपनी पर्याय की 
योग्यता से मलिन हुआ है। मिट्टी से हुआ 
नहीं है, मिट्टी तो निमित्तमात्र है। 

00:18:16.617 --> 00:18:24.661
उपादान तो पानी की वर्तमान पर्याय की 
तत्समय की योग्यता है। 

00:18:24.685 --> 00:18:32.496
वह मलिनभाव पानी की दशा में 
एक समयमात्र विद्यमान है तो सही। 

00:18:32.520 --> 00:18:43.650
मिट्टी तो निमित्तमात्र है,
मिट्टी से पानी मलिन हुआ नहीं है। वैसे 
निर्मल पानी के स्वभाव से मलिनता हुई नहीं है। 

00:18:43.674 --> 00:18:53.735
परंतु जब वह (पर्याय) स्वयं पानी का निर्मल 
स्वभाव छोड़कर और मलिनरूप परिणमती है तब 
मिट्टी को निमित्तमात्र कहने में आता है। 

00:18:53.759 --> 00:19:02.429
अब पानी में मलिनता हुई है 
वह हकीकत है, वह सत्य बात है। 

00:19:02.453 --> 00:19:13.505
परंतु जब पानी में मलिनता है 
तब पानी के स्वभाव में स्वच्छता 
और निर्मलता सौ प्रतिशत रही हुई है।

00:19:13.529 --> 00:19:26.066
पानी ने अपने निर्मल स्वच्छ स्वभाव को 
छोड़ा नहीं है। परिणाम ने उसके 
स्वभाव को छोड़ा है। आहाहा!

00:19:26.090 --> 00:19:37.447
पानी की अवस्था, पर्याय, हालत,
उसने निर्मल क्षणिक स्वभाव को छोड़ा है	
और उसमें मलिनता हुई है। 

00:19:37.471 --> 00:19:48.499
पानी की अवस्था जब मलिन हुई है 
तब पानी स्वभाव से स्वच्छ और 
निर्मल सौ प्रतिशत रहा हुआ है।

00:19:48.523 --> 00:19:58.022
इस कारण फिटकरी डालने पर पानी की 
मलिन अवस्था का अभाव होता है 

00:19:58.046 --> 00:20:04.584
और पानी की स्वच्छ अवस्था का 
प्रादुर्भाव होता है, प्रगटता होती है। 

00:20:04.608 --> 00:20:16.754
ऐसे इस आत्मा इसके दो पहलू हैं। 
एक वर्तमान पहलू में पर के आश्रय से - 
लक्ष से ममत्व का भाव होता है। 

00:20:16.778 --> 00:20:28.549
मोह-राग-द्वेष, क्रोध-मान-माया-लोभ,
हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,
स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद 

00:20:28.573 --> 00:20:37.110
ऐसे-ऐसे अनेक प्रकार के विकार,
पर्याय में विपरीत भाव होते हैं। 

00:20:37.134 --> 00:20:46.991
पर्याय में विपरीत भाव बिल्कुल ना होते हों 
तो-तो उसकी दशा परमात्मारूप होती,
तो संसार ही ना होता। 

00:20:47.015 --> 00:20:56.435
संसार दशा में जीव की अवस्था में 
राग-द्वेष-मोह, ममत्व के भाव हैं तो सही।

00:20:56.459 --> 00:21:07.224
परंतु वह ममत्व, वे परिणाम दुःखदायक है। उसकी 
निवृत्ति कैसे हो? ऐसा शिष्य का प्रश्न है। 

00:21:07.248 --> 00:21:15.723
परिणाम में राग-द्वेष-मोह, ममता का स्वीकार
करके उसका दुःख मैं भोग रहा हूँ,

00:21:15.747 --> 00:21:27.683
उसका स्वीकार करके फिर, अब पूछता है कि 
यह दुःखदायक भाव (हैं तो) क्या हमें सदैव के लिए 
दुःखी ही रहना होगा? होना होगा? 

00:21:27.707 --> 00:21:36.775
क्या हमारे भाग्य में सदैव के लिए नौकरी ही करनी 		
लिखी होगी? ऐसा किसी को विचार आये। 

00:21:36.799 --> 00:21:44.032
वह तो पुण्याधीन है, वह पुरुषार्थ आधीन 
नहीं है। परंतु धर्म तो पुरुषार्थ आधीन है। 

00:21:44.056 --> 00:21:54.116
संयोग पुण्याधीन हैं
और स्वभाव, धर्म पुरुषार्थ आधीन है। 

00:21:54.140 --> 00:22:05.591
पुरुषार्थ से लक्ष्मी, संयोग नहीं मिलते,
वे तो पुण्य के निमित्त से मिलते हैं। 
और धर्म तो पुरुषार्थ से होता है। 

00:22:05.615 --> 00:22:11.840
वह धर्म कैसे होता है? उसकी बात 
उसे वास्तव में सुनने को भी मिलती नहीं है। 

00:22:11.864 --> 00:22:20.222
तो विचार कब करे, निर्णय कब करे 
और आत्मा का अनुभव कब करे?
आत्मा का नक्शा भी हाथ में नहीं आता है। 

00:22:20.246 --> 00:22:32.979
नक्शा आये तो तो देखे 
कि इसमें हम किस तरफ से जायें तो 
आत्मा में घुस सकें और राग से छूट सकें। 

00:22:33.003 --> 00:22:37.330
मुमुक्षु: पुरुषार्थ की थोड़ी व्याख्या 
कीजिए, पुरुषार्थ की। 	
पू. लालचंदभाई: पुरुषार्थ किसे कहते हैं?

00:22:37.354 --> 00:22:49.012
पुरुषार्थ दो प्रकार के हैं। एक उल्टा 
पुरुषार्थ और एक उचित पुरुषार्थ। 
पुरुषार्थ दो प्रकार के हैं। 

00:22:49.036 --> 00:22:58.300
और पुरुषार्थ करने का क्षेत्र कहाँ है?
आत्मा किस क्षेत्र में पुरुषार्थ कर सकता है?

00:22:58.324 --> 00:23:11.446
और आत्मा किस क्षेत्र में पुरुषार्थ 
नहीं कर सकता? क्षेत्र समझ में आया न?
हद। उसकी सीमा, मर्यादा। 

00:23:11.470 --> 00:23:22.523
कि आत्मा है वह अपने स्वभाव को भूलकर 
और उल्टा पुरुषार्थ करे तो 
मात्र अपने ही क्षेत्र में करता है। 

00:23:22.547 --> 00:23:32.068
राग-द्वेष, क्रोध-मान-माया-लोभ,
ऐसा उल्टा पुरुषार्थ करे तो 
अज्ञानभाव से राग की उत्पत्ति होती है। 

00:23:32.092 --> 00:23:41.932
परंतु उसका पुरुषार्थ बाह्य पदार्थ में 
कुछ काम करता है? हराम, सौ प्रतिशत झूठी बात है।

00:23:41.956 --> 00:23:48.714
कुम्हार उल्टा पुरुषार्थ करता है। 
कौनसा उल्टा पुरुषार्थ किया?

00:23:48.738 --> 00:23:56.307
कि यह जो मिट्टी में से घड़ा बनने का काल है,
वह अपनी उपस्थिति-मौजूदगी देखकर,

00:23:56.331 --> 00:24:08.024
उपादान से घड़े की अवस्था होने के काल में होती है 
उस काल में कुम्हार खड़ा है, वह अभिमान करता है 
कि घड़े का करनेवाला मैं हूँ। 

00:24:08.048 --> 00:24:15.063
तो उसका पुरुषार्थ 
अपना द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव छोड़कर 
मिट्टी तक जाता नहीं है। 

00:24:15.087 --> 00:24:28.209
क्योंकि मिट्टी का द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव
भिन्न है। उसके प्रदेश भिन्न और आत्मा के 
प्रदेश (भिन्न हैं)। प्रदेश अर्थात् क्षेत्र। 

00:24:28.233 --> 00:24:38.294
वह जीव उल्टा पुरुषार्थ करे तो उसकी मर्यादा 
कितनी? कि अज्ञानभाव से राग-द्वेष-मोह को 
करे और दुःख को भोगे। 

00:24:38.318 --> 00:24:47.614
इतनी ही उसके पुरुषार्थ की मर्यादा (है)। 
परंतु उसका पुरुषार्थ आगे बढ़कर 
किसी बाहर के पदार्थ को परिणमावे,

00:24:47.638 --> 00:24:55.442
या पुरुषार्थ से हाथ ऊँचा-नीचा करे,
कर सके, वह उसकी मर्यादा ही नहीं है। 

00:24:55.466 --> 00:25:06.705
हाँ! हाथ ऊँचा-नीचा मैं कर सकता हूँ 
ऐसा अभिमान करे। वह अभिमान
विकारी परिणाम है, वह विपरीत मान्यता है। 

00:25:06.729 --> 00:25:11.681
ऐसी विपरीत मान्यता करे तो 
वह अपने क्षेत्र में घालमेल करता है। 

00:25:11.705 --> 00:25:18.579
परंतु बाहर दूसरे पदार्थों में,
आत्मा का क्षेत्र छोड़कर,
जड़कर्म के क्षेत्र में आत्मा जाये,	

00:25:18.603 --> 00:25:27.421
देह में आत्मा जाये, देह से बाहर 
रोटी, दाल, सब्जी, चावल करे, वह 
उसके क्षेत्र की मर्यादा के बाहर है। 

00:25:27.445 --> 00:25:34.732
आज तक किसी कुम्हार ने घड़ा बनाया नहीं है 
और किसी माता ने रोटी बनाई नहीं है। 

00:25:34.756 --> 00:25:43.169
हाँ! उसने किया है क्या? अभिमान किया है। 
अज्ञानभाव से अभिमान करने की उसकी हद है। 

00:25:43.193 --> 00:25:50.535
अज्ञानभाव से करे तो क्या करे? वह पुरुषार्थ 
उल्टा करता है, संकल्प और विकल्प किया करे 

00:25:50.559 --> 00:25:54.464
तो उसके क्षेत्र में रहकर (करे, इतनी) 
कर्ता-कर्म की मर्यादा है। 

00:25:54.488 --> 00:26:02.870
अज्ञानभाव से आत्मा कर्ता बने 
और अज्ञानजन्य राग-द्वेष-मोह के परिणाम 
उसका कर्म अर्थात् कार्य बने। 

00:26:02.894 --> 00:26:09.564
इसप्रकार अपने क्षेत्र में ही (रहता है),
वह लक्ष्मण-रेखा है। 

00:26:09.588 --> 00:26:16.134
उस क्षेत्र के बाहर, कभी कोई भी आत्मा,
अज्ञानी हो या ज्ञानी हो,

00:26:16.158 --> 00:26:25.179
(वह) अपने क्षेत्र को छोड़कर बाहर,
स्वचतुष्टय में से परचतुष्टय में जाये 
ऐसा तीनकाल में बनता नहीं है। 

00:26:25.203 --> 00:26:32.695
वह पुरुषार्थ करे तो, उल्टा पुरुषार्थ करे,
कि मैं ऐसा कर डालूँ और मैं ऐ सा कर डालूँ
और ऐसा करूँ और यहाँ जाना है,

00:26:32.719 --> 00:26:40.857
यहाँ पहुँचना है और ऐसा करना है। 
ऐसी कर्तत्वबुद्धि का उल्टा पुरुषार्थ करे 
तो संकल्प और विकल्प करे। 

00:26:40.881 --> 00:26:51.192
संकल्प और विकल्प उसके क्षेत्र में होते हैं। 
संकल्प और विकल्प; बाहर क्षेत्र में नहीं होते,
उसकी पर्याय के क्षेत्र में होते हैं। 

00:26:51.216 --> 00:26:57.246
तो उसका फल वह दुःख भोगता है। 
वह उल्टा पुरुषार्थ है। 

00:26:57.270 --> 00:27:07.534
अब देखो! वह आत्मा सीधा पुरुषार्थ भी कर
सकता है। कि राग-द्वेष-मोह का कर्तव्य,
कार्य विभावभाव है, मेरा स्वभाव नहीं है। 

00:27:07.558 --> 00:27:19.135
मेरा स्वभाव तो अपनी आत्मा को जानकर 
उसमें स्थिर हो जाना (है) कि जिससे मुझे 
शांति का अनुभव हो। वह सीधा पुरुषार्थ है। 

00:27:19.159 --> 00:27:24.564
श्रीमद् ने भी कहा है,
<b>करो सत्य पुरुषार्थ</b> 
(आत्मसिद्धि गाथा १३०)। 

00:27:24.588 --> 00:27:27.990
सत्यपुरुषार्थ अर्थात् सम्यक् पुरुषार्थ। 

00:27:28.014 --> 00:27:37.503
सम्यक् पुरुषार्थ अर्थात् 
जैसे आत्मा का स्वभाव है 
ऐसे स्वभाव की रचना जिसके द्वारा होती है 

00:27:37.527 --> 00:27:41.432
ऐसे वीर्यगुण को पुरुषार्थ कहने में आता है। 

00:27:41.456 --> 00:27:49.360
आत्मा में एक आत्मबल, वीर्य नाम का गुण है,
और उसका कार्य स्वभाव की रचना करना है,

00:27:49.384 --> 00:27:58.616
ज्ञान की, दर्शन की, चारित्र की, सुख की,
वीतरागता की। ऐसे साम्य परिणाम को,
विषम परिणाम को छोड़कर,

00:27:58.640 --> 00:28:07.654
साम्य परिणाम की रचना करना, 	
वह सत्य पुरुषार्थ है। 
और वह अपने क्षेत्र में स्वयं कर सकता है। 

00:28:07.678 --> 00:28:13.953
परंतु उल्टा पुरुषार्थ करे 
तो मात्र मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र के
ही परिणाम कर सकता है। 

00:28:13.977 --> 00:28:24.495
परंतु जड़कर्म को करे और शरीर को करे 	
और बाह्य के काम करे वह तीनकाल,
तीनलोक में वस्तु के स्वरूप में नहीं है। 

00:28:24.519 --> 00:28:31.108
वह अज्ञानी के घर की सब बातें हैं, कल्पना की। 
वह बात (झूठी है), स्वरूप ऐसा नहीं है। 

00:28:31.132 --> 00:28:39.946
और उस कारण अभिमान करता है,
उल्टा पुरुषार्थ (करता है)। कर सकता हूँ,
ऐसी मिथ्या मान्यता करता है। 

00:28:39.970 --> 00:28:45.484
हाथ को हिला सकता हूँ,
ऐसी मिथ्या मान्यता कर सकता (है)। 

00:28:45.508 --> 00:28:52.257
परंतु मिथ्या मान्यता को भी करे और हाथ को 
भी हिलाये, ऐसा तीनकाल में बनता नहीं है। 

00:28:52.281 --> 00:29:02.873
कुम्हार अभिमान कर सकता है कि इस घड़े की 
अवस्था का करनेवाला मैं हूँ। इसप्रकार मिथ्या 
पुरुषार्थ से मिथ्या अभिमान कर सकता है। 

00:29:02.897 --> 00:29:09.184
परंतु वह घड़े को बना सके (ऐसा) तीनकाल,
तीनलोक में वह वस्तु-स्थिति में वह है नहीं। 

00:29:09.208 --> 00:29:20.331
जीव निमित्त से देखते हैं,
ज्ञानी उपादान से देखते हैं। 
क्या उपादान और क्या निमित्त? आहाहा!

00:29:20.355 --> 00:29:28.994
ज्ञानी धर्मात्मा वस्तु के - पदार्थ के 
स्वभाव से देखते हैं, उपादान से देखते हैं। 

00:29:29.018 --> 00:29:37.872
अज्ञानी प्राणी निमित्त से देखते हैं 
इसलिए उन्हें दो द्रव्य के बीच कुछ 
कर्ता-कर्म संबंध की भ्रांति हो जाती है। 

00:29:37.896 --> 00:29:42.293
मुमुक्षु: उपादान क्या और निमित्त क्या?
पू. लालचंदभाई: उपादान क्या और निमित्त क्या?

00:29:42.317 --> 00:29:52.830
कि माटी है वह उपादान है 
और उसकी अवस्था प्रगट होती है, घड़े की,
वह उपादान - स्वशक्ति से होती है।

00:29:52.854 --> 00:30:00.665
उसके स्वभाव से घट की अवस्था होती है। 
ये माटी आदि-मध्य-अंत में परिणमकर 
घटरूप से परिणमती है। 

00:30:00.689 --> 00:30:04.407
कुम्हार बिल्कुल उसमें प्रवेश कर सकता नहीं। 

00:30:04.431 --> 00:30:11.193
उसके (मिट्टी के) द्रव्य, क्षेत्र, काल, 
भाव भिन्न (और) कुम्हार की आत्मा के द्रव्य,
क्षेत्र, काल, भाव भिन्न हैं। 

00:30:11.217 --> 00:30:23.371
कुम्हार (उसमें) निमित्त है 
और माटी उपादान है। कार्य उपादान से होता है। 
कार्य तीनकाल में निमित्त से हो सकता नहीं। 

00:30:23.395 --> 00:30:26.839
<b>कारणानुविधायीनि कार्याणी</b> 
(समयसार गाथा ६८ टीका),

00:30:26.863 --> 00:30:34.751
<b>कारणानुविधायीनि कार्याणी</b>, 
कारण को अनुसरण करके कार्य होता है। 

00:30:34.775 --> 00:30:44.719
कारण अर्थात् माटी, उस माटी में अंतर्गर्भित 
शक्ति, पर्याय के घट होने की योग्यता, 	
थी (वह) अपने स्वकाल से प्रगट होती है। 

00:30:44.743 --> 00:30:51.703
<b>कारणानुविधायीनि कार्याणी</b> 
कारण जैसा है वैसा ही कार्य प्रगट होता है। 

00:30:51.727 --> 00:31:01.374
परंतु कुम्हार निमित्त है, उस निमित्त से 
घट की अवस्था होती है ऐसा वस्तु के 
स्वभाव में नहीं है। वह अज्ञानी मानता है। 

00:31:01.398 --> 00:31:12.028
अज्ञानी क्यों मानता है? कि उसकी मिट्टी के ऊपर 
नजर नहीं है, उसकी नजर कुम्हार के ऊपर है कि 
कुम्हार आया अतः घड़े की अवस्था हुई। 

00:31:12.052 --> 00:31:18.558
(अज्ञानी मानता है कि) कर्म का उदय आया 
अतः क्रोध हुआ।
कर्म के उदय से क्रोध नहीं होता। 

00:31:18.582 --> 00:31:27.799
वह अपने स्वभाव को भूलकर 
अज्ञानभाव से क्रोध करता है तब होता है। 
कर्म उसका कर्ता नहीं है, कर्म निमित्तमात्र है। 

00:31:27.823 --> 00:31:37.071
कर्म को निमित्त कहते हैं। 
और क्रोध की अवस्था प्रगट हुई 
वह उपादान, अपनी स्वशक्ति से हुई है। 

00:31:37.095 --> 00:31:47.126
क्या उपादान? क्या निमित्त?
क्या निश्चय? क्या व्यवहार? क्या नवतत्त्व?
क्या हेय? क्या उपादेय? क्या ज्ञेय? 

00:31:47.150 --> 00:31:53.179
बहुत कम है परंतु कम को 
समझने का भी प्रयत्न नहीं। आहाहा!

00:31:53.203 --> 00:31:59.804
जिसमें शाश्वत सुख मिले 
उसके लिए घंटा, दो घंटा दिन में न मिले 

00:31:59.828 --> 00:32:07.567
और आठ-आठ, दस-दस घंटे 
इन संयोगों के पीछे प्राप्त करने के लिए (मिले)। 

00:32:07.591 --> 00:32:13.367
प्राप्त तो होता है, उसे राग प्राप्त होता है,
(परंतु) पैसा तो किसी को प्राप्त नहीं होता। 

00:32:13.391 --> 00:32:19.803
पैसा किसी के पास आता नहीं है। 
पैसा मेरा, ऐसी ममता आती है 

00:32:19.827 --> 00:32:26.435
और दूसरे भव में ममता लेकर जाता है,
परंतु पैसा लेकर नहीं जाता। 

00:32:26.459 --> 00:32:33.911
पैसा यदि उसका हो तो पैसा भी (उसके)
साथ जाना चाहिए। परंतु उसके साथ क्या जाता है? 

00:32:33.935 --> 00:32:43.354
यह पैसा मेरा है, मकान मेरा है,
ऐसी ममता लेकर अज्ञानभाव से जाता है। 

00:32:43.378 --> 00:32:51.405
और ज्ञानी धर्मात्मा (ऐसा मानते हैं कि)
जगत के कोई पदार्थ मेरे नहीं हैं,
मेरा तो एक ज्ञान है। 

00:32:51.429 --> 00:33:00.958
इसप्रकार निर्ममत्वभाव से परिणमते हुए, 
वीतरागभाव से परिणमते हुए वे वीतरागभाव को 
विग्रहगति में साथ में लेकर जाते हैं। 

00:33:00.982 --> 00:33:10.902
विग्रहगति उसे कहते हैं कि यहाँ से जब 
शरीर छूटता है तब तीन समय के अंदर वह दूसरे 
भव में जहाँ उपजने वाला हो वहाँ उपज जाता है। 

00:33:10.926 --> 00:33:19.424
उसे विग्रहगति कहते हैं। विग्रहगति में उसे 
दो शरीर होते हैं कर्माण शरीर और तेजस शरीर। 
यह औदारिक शरीर यहाँ पड़ा रहता है। 

00:33:19.448 --> 00:33:27.509
परंतु किसी प्रकार का कुछ अभ्यास नहीं
और उसमें भी यह लंदन। आहाहा!

00:33:27.533 --> 00:33:36.114
सत् की बात सुनने को न मिले। 
किस दिन विचार करे? किस दिन निर्णय करे?
और किस दिन अनुभव करे?

00:33:36.138 --> 00:33:42.630
आत्मा का नक्शा भी हाथ में नहीं आता। 
नक्शा हाथ में आये तो पता चले 

00:33:42.654 --> 00:33:47.590
कि हमें यहाँ से यहाँ जाना 
और यहाँ से यहाँ जाना और 
यहाँ से अंत में आत्मा में जाना है। 

00:33:47.614 --> 00:33:51.262
परंतु आत्मा का नक्शा भी नहीं मिलता। आहाहा!

00:33:51.286 --> 00:34:03.846
नक्शा तो है परंतु उस नक्शे को खरीदता
भी नहीं और उसको देखता भी नहीं है। 
तो-तो उसे रास्ता मिल जाये। 

00:34:03.870 --> 00:34:12.117
निमित्त और उपादान 
यह वस्तु खास समझने जैसी है। 
अनादिकाल से जीव को कर्ताबुद्धि है। 

00:34:12.141 --> 00:34:19.023
इससे यह होता है और इससे यह होता है, यह 
हो तो यह हो और यह न हो तो यह न हो। 

00:34:19.047 --> 00:34:25.287
इसप्रकार वह संयोग से देखता है परंतु 
उसके स्वभाव से नहीं देखता है। 

00:34:25.311 --> 00:34:34.310
मिट्टी के स्वभाव से देखे तो मिट्टी स्वयं 
आदि-मध्य-अंत में परिणमती, परिणमती,
परिणमती घटरूप से परिणम जाती है। 

00:34:34.334 --> 00:34:40.676
परंतु कुम्हार के ऊपर नजर है जो कि (उस) मिट्टी के 
स्वभाव को नहीं देखता (परंतु) संयोग को देखता है,

00:34:40.700 --> 00:34:48.440
संयोगाधीन दृष्टिवाला जीव निमित्त को 	
देखता है कि कुम्हार था तो घड़ा हुआ। 

00:34:48.464 --> 00:34:54.501
ऐसे सभी पदार्थों के अंदर,
यदि एक पदार्थ दूसरे पदार्थ का कर्ता हो,

00:34:54.525 --> 00:35:02.313
तो दूसरे पदार्थ के लिए तीसरा पदार्थ 
कर्ता चाहिए और तीसरे पदार्थ के परिणमन 
के लिए चौथा पदार्थ कर्ता चाहिए। 

00:35:02.337 --> 00:35:08.203
इसप्रकार एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के आधीन,
दूसरा पदार्थ तीसरे पदार्थ के आधीन 

00:35:08.227 --> 00:35:12.889
तो <b>अनवस्था</b> 
(पंचाध्यायी पूर्वार्ध गाथा ११) नामक 
बड़ा <b>दोष</b> उत्पन्न हो जाये। 

00:35:12.913 --> 00:35:18.310
<b>अनवस्था</b> क्या है?	
वह भी खबर नहीं कुछ। न्याय समझ में आता है?

00:35:18.334 --> 00:35:28.185
घड़ा बने वह कुम्हार से बने, 
तो (कुम्हार) के परिणाम करने के लिए 
दूसरा कोई पदार्थ चाहिए,

00:35:28.209 --> 00:35:37.731
और उस तीसरे पदार्थ के परिणमन के लिए 
चौथा पदार्थ चाहिए। तो सभी पदार्थ पराधीन 
हो जायेंगे और उसका अंत कहीं आयेगा नहीं। 

00:35:37.755 --> 00:35:43.707
उसे <b>अनवस्था</b> नाम का दोष 
कहने में आता है। बड़ा दोष लगता है उसमें। 

00:35:43.731 --> 00:35:50.057
उसमें अधर्मबुद्धि होती है। 
धर्म की प्रगटता होती नहीं है। 

00:35:50.081 --> 00:36:01.774
ऐसे निश्चय और व्यवहार। 
निश्चय किसको कहना? कि यथार्थ का नाम 
निश्चय और उपचार का नाम व्यवहार। 

00:36:01.798 --> 00:36:08.133
घड़ा होता है, मिट्टी में से होता है, 
वह निश्चयनय का कथन है। 

00:36:08.157 --> 00:36:15.327
और निमित्त देखकर, कुम्हार ने घड़ा बनाया,		
वह उपचार का कथन है। 

00:36:15.351 --> 00:36:19.131
यथार्थ का नाम निश्चय 
और उपचार का नाम व्यवहार। 

00:36:19.155 --> 00:36:26.638
कुम्हार से घड़ा हुआ ऐसा जो उपचार आया
उसे व्यवहार कहने में आता है। 

00:36:26.662 --> 00:36:35.980
ऐसा स्वरूप निमित्त-उपादान,
निश्चय-व्यवहार, छह द्रव्य, नवतत्त्व क्या?
कर्ता-कर्म क्या? ज्ञाता-ज्ञेय क्या? 

00:36:36.004 --> 00:36:42.503
है तो थोड़ा ही परंतु समझने की 
जिज्ञासा रखनी चाहिए। 

00:36:42.527 --> 00:36:47.471
इसकी छोटी, छोटी पुस्तकें भी 
शब्दकोष के लिए प्रकाशित हो गई हैं। 

00:36:47.495 --> 00:36:54.502
बहुत बहनें और भाई कहते हैं कि 
हमें द्रव्य, गुण और पर्याय के 
नाम भी नये लगते हैं। 

00:36:54.526 --> 00:36:59.423
और द्रव्य-गुण-पर्याय के नाम नये लगें। 
उपादान क्या? निमित्त क्या? 

00:36:59.447 --> 00:37:05.064
हमने कभी नाम (भी) सुना नहीं है। 
उनका स्वरूप क्या? भाई!

00:37:05.088 --> 00:37:13.469
यदि जिज्ञासा हो 
तो उसके लिए जैन-सिद्धांत-प्रवेशिका 
नामक एक छोटी पुस्तिका है। 

00:37:13.493 --> 00:37:19.327
उसके अंदर सब खुलासा है। एक-एक शब्द की
व्याख्या क्या उसका सब खुलासा है।

00:37:19.351 --> 00:37:28.553
वह थोड़ा अभ्यास करना चाहिए। आधा घंटा,
घंटा किसी के पास सीखना चाहिए या 
स्वयं पढ़े तो भी समझ में आये ऐसा है। 

00:37:28.577 --> 00:37:33.956
उसमें पराधीनता नहीं, स्वयं घर पर मननपूर्वक 
एक बार, दो बार, तीन बार पढ़े 

00:37:33.980 --> 00:37:38.823
तो उसे सब कुछ समझ में आये ऐसा है। 
इसमें दृष्टांत भी दिये हैं। 

00:37:38.847 --> 00:37:44.126
अतः यहाँ आचार्य भगवान
फरमाते हैं, शिष्य का प्रश्न है,

00:37:44.150 --> 00:37:52.289
प्रभु परिणाम में ममता,
मोह-राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ 
समय-समय हुआ ही करते हैं। 

00:37:52.313 --> 00:37:59.898
विकृतभाव, पुण्य और पाप (के)
दुःखदायक भाव अटकते ही नहीं हैं। 
और उनका दुःख मैं भोगता हूँ। प्रभु!

00:37:59.922 --> 00:38:08.193
उस दुःख के नाश का उपाय क्या? कि सुन!
तेरे परिणाम में ममता होती है हमें पता है। 

00:38:08.217 --> 00:38:16.348
और उससे तू दुःखी हो रहा है 
वह भी हमें पता है। और उसके 
नाश का उपाय भी हमें जानना चाहिए। 

00:38:16.372 --> 00:38:20.691
वह उपाय तुझे बताते हैं कि 
परिणाम के ऊपर से लक्ष छोड़ दे। 

00:38:20.715 --> 00:38:28.471
परिणाम है उसका स्वीकार किया,
अब परिणाम के ऊपर से लक्ष छोड़ दे। 

00:38:28.495 --> 00:38:37.220
आत्मा में दो पहलू हैं। उसमें वर्तमान 
एक चलते हुए परिणाम का पहलू (है),
पर्याय का, दशा का, हालत का,

00:38:37.244 --> 00:38:41.196
वहाँ ही देखा करता है परंतु 
इस (ध्रुव) की ओर देखता नहीं है। 

00:38:41.220 --> 00:38:45.445
वे ऐसा कहते हैं कि तू यहाँ (पर्याय को)
देखता है तो अब यहाँ (ध्रुव को) देख। 

00:38:45.469 --> 00:38:47.469
यहाँ (ध्रुव) देखकर फिर 
यहाँ (पर्याय को) देख,

00:38:47.493 --> 00:38:50.625
यहाँ (पर्याय) देखकर 
फिर यहाँ (ध्रुव) देख और 
यहाँ (ध्रुव की तरफ) ऐसा कर दे,

00:38:50.649 --> 00:39:00.561
कि भगवान आत्मा निर्ममत्व है, मेरा 
द्रव्य परमात्मा स्वभाव ममता से रहित है। 

00:39:00.585 --> 00:39:06.459
परिणाम में ममता है 
तब जीवतत्त्व ममत्व रहित है। 

00:39:06.483 --> 00:39:14.402
आस्रवतत्त्व में ममता है और जीवतत्त्व में 
ममता नहीं है। ममत्व रहित जीवतत्त्व है। 

00:39:14.426 --> 00:39:22.901
ऐसी जीवतत्त्व और आस्रवतत्त्व की जुदाई 
जब जाने तब एकताबुद्धि टूटे 
और दृष्टि द्रव्य के ऊपर आ जाये 

00:39:22.925 --> 00:39:30.869
और आत्मा का अनुभव हो
और परिणाम में जो ममता के परिणाम थे 
उन परिणाम में निर्ममत्व प्रगट हो। 

00:39:30.893 --> 00:39:40.492
द्रव्य स्वभाव निर्ममत्व है उसका अवलंबन 
लेने पर, शुद्ध का अवलंबन लेने पर, परिणाम में 
अशुद्ध परिणाम का नाश हो जाता है,

00:39:40.516 --> 00:39:48.992
परिणाम में शुद्धता प्रगट होती है, परिणाम में 
निर्ममत्व दशा प्रगट होती है, वीतरागी दशा। 

00:39:49.016 --> 00:39:57.131
एक आत्मा उसके दो पहलू। आहाहा! यदि दो 
पहलू ना हों तो नवतत्त्व की सिद्धि नहीं होती। 

00:39:57.155 --> 00:40:05.443
दो पहलू ना हों तो संसार 
और मोक्ष की सिद्धि नहीं होती। 
दो पहलूवाला एक आत्म पदार्थ है। 

00:40:05.467 --> 00:40:15.839
उसमें एक पहलू पलटता हुआ नाशवान है,
कर्म सापेक्ष है; और दूसरा पहलू 
नित्य, ध्रुव, टिकता हुआ और निरपेक्ष है। 

00:40:15.863 --> 00:40:20.377
वह (नित्य पहलू) शुद्ध है। 
वर्तमान पर्याय का पहलू अशुद्ध है। 

00:40:20.401 --> 00:40:24.479
द्रव्य का पहलू निर्ममत्व है,
पर्याय में ममता है। 

00:40:24.503 --> 00:40:34.829
अब पर्याय में ममता का अभाव कैसे हो?
कि मैं द्रव्य स्वभाव से निर्ममत्व हूँ 
उसका अवलंबन लेने पर, उसमें एकाग्र होने पर,

00:40:34.853 --> 00:40:42.172
उपयोग को उसमें जोड़ने पर, उसका ध्यान करने पर 
धर्मध्यान प्रगट होकर ममता का अभाव होता है। 

00:40:42.196 --> 00:40:50.639
और ममत्व के स्थान पर निर्ममत्व 
वीतरागी पर्याय प्रगट होती है 
- सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की। 

00:40:50.663 --> 00:40:55.295
और <b>ज्ञानदर्शनसे पूर्ण हूँ</b>। 
चार बोल से आत्मा का स्वरूप वर्णन करते हैं। 

00:40:55.319 --> 00:41:02.239
एक हूँ, शुद्ध हूँ, निर्मम हूँ 
और ज्ञानदर्शन से पूर्ण हूँ। 

00:41:02.263 --> 00:41:11.636
वर्तमान में ज्ञान-दर्शन की अल्पज्ञ 
अवस्था है तो सही, पर्याय में, हालत में 
ज्ञान क्षयोपशमभाव से है। 

00:41:11.660 --> 00:41:16.956
अर्थात् अल्प उघाड़ है,
जानना-देखना पूरा प्रगट हुआ नहीं है। 

00:41:16.980 --> 00:41:23.338
जैसे केवली परमात्मा को पूर्ण ज्ञान 
और पूर्ण दर्शन उपयोग प्रगट हो गया है,

00:41:23.362 --> 00:41:30.516
ऐसा छद्मस्थ को, संसारी जीवों को, अज्ञानी 
जीवों को उस प्रकार की उघाड़ की दशा नहीं है। 

00:41:30.540 --> 00:41:38.969
उसकी दशा में थोड़ा जानना 
और देखना उतना उघाड़ है तो सही। 

00:41:38.993 --> 00:41:48.749
वह अपूर्णता, ज्ञान और दर्शन की अपूर्णता 
पर्याय में, दशा में, हालत में है तो सही। 

00:41:48.773 --> 00:42:00.153
परंतु उस पहलू को गौण करके, आहाहा!
उस पहलू का लक्ष छोड़कर जब आत्मा 
आत्मा के स्वभाव की ओर देखता है,

00:42:00.177 --> 00:42:04.168
तब मैं तो ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण हूँ। 

00:42:04.192 --> 00:42:15.674
ऐसा जब ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण हूँ 
ऐसा श्रद्धा-ज्ञान में आता है तब उसे 
अतीन्द्रियज्ञान द्वारा आनंद का अनुभव होता है। 

00:42:15.698 --> 00:42:21.189
मुमुक्षु: दूसरे पहलू का लक्ष छूटता
 नहीं है तो क्या करना?
पू. लालचंदभाई: छोड़ देना। 

00:42:21.213 --> 00:42:27.501
छूटता नहीं है तो कौन छुड़ावे? 
दूसरा कोई छुड़ायेगा? उसमें उसे प्रेम है। 

00:42:27.525 --> 00:42:35.079
उस पहलू में उसे प्रेम चढ़ा है उसको। 
उस पहलू की महिमा है। 

00:42:35.103 --> 00:42:39.406
उसे त्रिकाली सामान्य भगवान 
आत्मा की महिमा आती नहीं है। 

00:42:39.430 --> 00:42:52.077
पुण्य और पुण्य के फल में प्रेमवाला,
प्रीतिवाला, आहाहा! व्यभिचारी है। 
कषाय का संग करता है (और) दुःखी होता है। 

00:42:52.101 --> 00:42:58.920
प्रेम छोड़ दे, पुण्य और पुण्य के फल की 
प्रीति, रुचि, प्रेम उसकी महिमा छोड़ दे। 
उसमें कुछ नहीं है,

00:42:58.944 --> 00:43:03.349
वे दुःख के भाव हैं, वे दुःखदायकभाव हैं। 

00:43:03.373 --> 00:43:11.841
तेरा स्वभाव पूर्णानन्द की मूर्ति 
अंदर ज्ञान और आनंद 
चैतन्य स्वभाव से विराजमान है। 

00:43:11.865 --> 00:43:23.192
चिद्घन आत्मा है। आत्मा चिद्रूप है,
आत्मा चिद्घन, चिद्रूप है,
ज्ञान उसका रूप है। 

00:43:23.216 --> 00:43:30.987
ॐ <b>शुद्धचिद्रूपकोऽहं</b> (तत्त्वज्ञान 
तरंगिणी, द्वितीय अध्याय, गाथा ८),
मैं तो एक चिद्रूप आत्मा हूँ। आहाहा!

00:43:31.011 --> 00:43:41.845
मैं तो एक ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण आत्मा 
हूँ। वह कब विचार करना? कि वर्तमान में 
ज्ञान की अल्पज्ञ अवस्था है, तब। 

00:43:41.869 --> 00:43:48.945
परंतु अल्पज्ञ अवस्था है वह पूर्ण नहीं है,
पर्याय में अपूर्णता है। 

00:43:48.969 --> 00:43:55.780
वह पर्याय की अपूर्णता रूपवाला जो ज्ञान 
वह अपने भाव को लक्ष में से छोड़कर 

00:43:55.804 --> 00:44:03.936
द्रव्य स्वभाव से विचार करता है कि मैं तो 
ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण हूँ। आहाहा!

00:44:03.960 --> 00:44:12.084
<b>ज्ञानदर्शनसे पूर्ण हूँ;
उस स्वभावमें रहता हुआ,</b> ऐसा जो मेरा 
त्रिकाली सामान्य स्वभाव है 

00:44:12.108 --> 00:44:16.301
उसमें रहता हुआ, उसमें लक्ष करता हुआ,
उसमें लीन होता हुआ ...

00:44:16.325 --> 00:44:26.112
लीन होता है वह चारित्र। लक्ष करना वह 
सम्यग्दर्शन और ज्ञान। उसमें लीनता करना 
उसका नाम चारित्र है। 

00:44:26.136 --> 00:44:34.923
उस स्वभाव में रहता हुआ, 
विभाव से हटता हुआ; और स्वभाव में 
रहता हुआ, विभाव से बुद्धि हटाता है।

00:44:34.947 --> 00:44:40.360
विभाव के ऊपर प्रेम था, पुण्य और पुण्य के 
फल ऊपर प्रीति और रुचि थी,

00:44:40.384 --> 00:44:49.476
उसे छोड़कर भगवान आत्मा की रुचि 
और प्रेम और महिमा लगती है,
तब संसार का अंत आयेगा। 

00:44:49.500 --> 00:44:55.304
अन्यथा पुण्य और पुण्य के फल में,
रुचि में, जगत के जीव मग्न होते हैं। 

00:44:55.328 --> 00:44:59.991
अज्ञानी कहता है कि 
ये सब (ज्ञानी) मूर्ख हैं, पागल हैं। 

00:45:00.015 --> 00:45:04.209
ज्ञानी अज्ञानी को पागल कहता है; 
और अज्ञानी ज्ञानी को पागल कहता है

00:45:04.233 --> 00:45:09.123
कि 'कुम्हार से घड़ा नहीं होता', कहता (है कि) 
'पागल लगते हैं'! अज्ञानी ऐसा कहता है।

00:45:09.147 --> 00:45:20.652
अज्ञानी ज्ञानी को पागल कहता है। यह तो 
अनादि का है, यह कोई नया नहीं हैं। 
यह तो अनादिकाल से चला आता है। 

00:45:20.676 --> 00:45:29.308
परंतु ज्ञानी को वह अज्ञानी पागल कहे न,
तो भी उन्हें उसके प्रति द्वेष आता नहीं,
करुणा आती है। 

00:45:29.332 --> 00:45:37.103
उसे पता नहीं है न, उसे स्वभाव की खबर नहीं है 
न, वस्तु स्वभाव क्या है वह जानता नहीं है न,
इसलिए वह कहता है। 

00:45:37.127 --> 00:45:43.313
वह भी भगवान स्वभाव से है। आज भूला है 
और कल परमात्मा भी हो जाये। 

00:45:43.337 --> 00:45:48.898
ऐसा जानकर उसके प्रति करुणा है,
ज्ञानी को किसी के प्रति द्वेष होता नहीं है। 

00:45:48.922 --> 00:45:53.069
उनके विरोधियों के प्रति भी 
द्वेष होता नहीं है। आहाहा!

00:45:53.093 --> 00:45:59.584
विरोधी कौन? विरोधी तो राग-द्वेष के 
परिणाम वे विरोधी तत्त्व हैं। 

00:45:59.608 --> 00:46:04.911
अन्य कोई विरोधी इस जगत में नहीं है। 
कोई-किसी का विरोध करनेवाला नहीं है। 

00:46:04.935 --> 00:46:13.403
दुश्मन हो तो रागादि परिणाम हैं। उसका यदि
मित्र हो तो वीतरागी पर्याय उसका मित्र है। 

00:46:13.427 --> 00:46:17.964
बाकी जगत में कोई मित्र नहीं है 
और कोई दुश्मन नहीं है। 

00:46:17.988 --> 00:46:22.652
ऐसा ज्ञानी जानता हुआ आत्मा का 
अवलंबन लेता हुआ, स्वभाव में स्थिर होता हुआ,

00:46:22.676 --> 00:46:30.127
अल्पकाल में परिपूर्ण अवस्था प्रगट करके 
केवलज्ञान प्राप्त करते हैं। आहाहा!

00:46:30.151 --> 00:46:37.337
<b>उस स्वभावमें रहता हुआ, उसमें 
(-उस चैतन्य-अनुभवमें) लीन होता हुआ</b>, आहाहा!

00:46:37.361 --> 00:46:42.555
जो राग में लीनता थी,
लीन तो कहीं न कहीं रहता (ही) है। 

00:46:42.579 --> 00:46:51.335
या राग में लीन हो और 
या स्वभाव में लीन हो। या विभाव में 
मग्न हो या स्वभाव में मग्न हो। 

00:46:51.359 --> 00:46:58.038
<b>उसमें लीन होता हुआ (मैं) इन क्रोधादिक 
सर्व आस्रवोंको क्षयको प्राप्त कराता हूँ।</b> 

00:46:58.062 --> 00:47:05.202
ऐसा विचार करके, निर्णय करके,
वह आत्मा प्रयोग करता है। पहले 
theory (सिद्धांत) जानता है। 

00:47:05.226 --> 00:47:10.998
Theory जानने के बाद 
प्रैक्टिकल (क्रियात्मक प्रयोग) करता है। 
तब उसे आत्मा का अनुभव होता है। 

00:47:11.022 --> 00:47:18.824
मात्र सुनने से, मात्र पढ़ने से,
मात्र धारणा करने से किसी आत्मा को 
अनुभव हो सकता नहीं। 

00:47:18.848 --> 00:47:23.986
ऐसा तो ग्यारह अंग तक जीव अभ्यास कर ले, 
उसमें कुछ नहीं है, वह तो अज्ञान है।

00:47:24.010 --> 00:47:31.621
शास्त्र का ज्ञान वह ज्ञान नहीं है,
आत्मा का ज्ञान वह ज्ञान है। 

00:47:31.645 --> 00:47:38.370
मुमुक्षु: ग्यारह अंग अर्थात् क्या?
पू. लालचंदभाई: ग्यारह अंग अर्थात् सर्वज्ञ 
भगवान की वाणी में बारह अंग आते हैं 

00:47:38.394 --> 00:47:43.584
उसकी गणधर भगवान अंतर्मुहूर्त में 
उस द्रव्यश्रुत की रचना करते हैं। 

00:47:43.608 --> 00:47:52.286
उसमें लाखों, करोड़ों, अरबों श्लोक होते हैं। 
बारह अंग के अंदर लाखों,
करोड़ों, अरबों श्लोक होते हैं। 

00:47:52.310 --> 00:48:00.848
वे श्लोक कंठस्थ हो जाते हैं। 
सर्वज्ञ भगवान की वाणी सुनकर,
गौतम गणधर ने, दो घड़ी के अंदर,

00:48:00.872 --> 00:48:08.135
ऐसी धारणा शक्ति होती है कि बारह अंग का 
उघाड़ उन्हें द्रव्यश्रुत का ज्ञान होता है। 

00:48:08.159 --> 00:48:13.038
धारणा, पहले के काल में 
धारणा थी, शास्त्र नहीं थे।

00:48:13.062 --> 00:48:20.314
फिर जैसे-जैसे स्मरण शक्ति घटती गई 
वैसे-वैसे आचार्य भगवान को ख्याल आया 

00:48:20.338 --> 00:48:27.001
कि अब स्मरण शक्ति घटती जाती है 
अतः ताड़पत्र के ऊपर शास्त्र लिखने शुरू हुए। 

00:48:27.025 --> 00:48:33.461
वे ताड़पत्र भी वर्तमान में हैं। दो हजार वर्ष 
पहले के ताड़पत्र भी वर्तमान में हैं। 

00:48:33.485 --> 00:48:41.249
गिरनार के ऊपर एक धरसेन आचार्य हो गये हैं,
जिन्होंने षट्खंडागम की रचना की है। 

00:48:41.273 --> 00:48:48.412
षट्खंडागम वह आगम है, बड़ा जबरदस्त।
उसके अनेक बड़े शास्त्रों के volume (भाग) हैं। 		

00:48:48.436 --> 00:48:59.904
वे धरसेन आचार्य भगवान, गिरनार के ऊपर
चंद्रगुफा है, वहाँ ध्यान में मग्न थे,
ध्यान में मस्त थे। 

00:48:59.928 --> 00:49:09.529
उन्हें अपना आयुष्य, अब अल्पकाल में 
पूर्ण होगा, ऐसा ख्याल आया। 
अतः किसी श्रावक से बात की 

00:49:09.553 --> 00:49:18.634
और श्रावक ने दक्षिण में दूत भेजे 
और दो साधु वहाँ से ज्ञान 
प्राप्त करने के लिए आते हैं। 

00:49:18.658 --> 00:49:30.482
तब वे विनयपूर्वक नमस्कार करते हुए आते हैं। 
वहाँ से, दक्षिण में से भूतबलि और 
पुष्पदंत दो आचार्य आते हैं। 

00:49:30.506 --> 00:49:39.553
और उन दोनों (आचार्य) को अलग-अलग मंत्र देते हैं। 
उन मंत्र में (एक) के मंत्र में अधिक 
लिख दिया और दूसरे को कम लिखा। 

00:49:39.577 --> 00:49:45.863
और कहा कि इसकी तुम साधना करो 
और साधना करके आओ तो 
मेरे पास (जो) ज्ञान है वो तुम्हें दूँगा। 

00:49:45.887 --> 00:49:51.461
उनकी परीक्षा करने के लिए (ऐसा कहा),
कि ये ग्रहण कर सकें ऐसा है या नहीं? 

00:49:51.485 --> 00:50:00.522
तब तीन उपवास करके उन्होंने मंत्र की 
साधना की तब कुरूपी देवियाँ आईं। 

00:50:00.546 --> 00:50:05.852
एकदम दाँत बड़े और कान बड़े 
और पूँछ और सींग और ऐसे। 

00:50:05.876 --> 00:50:14.740
देव आये उपस्थित हुए, तो कहा (कि) यह देव 
शासन-देवता नहीं है। फिर उन्होंने स्वयं मंत्र में 
संशोधन किया, गुरु के पास नहीं गये। 

00:50:14.764 --> 00:50:23.529
मंत्र में हीनाधिक मात्रा थी, वह मात्रा 
ठीक की और पुनः मंत्र की साधना की 
और शासनदेव उपस्थित हुए। 

00:50:23.553 --> 00:50:28.829
उसके बाद धरसेन आचार्य भगवान 
के पास जाते हैं और उनके सामने बैठते हैं 

00:50:28.853 --> 00:50:38.551
और हजारों, लाखों श्लोक धरसेन आचार्य 
भगवान मुखपाठ करते हैं और ये (मुनि) 
श्रवण करके ग्रहण कर लेते हैं, धारणा में।

00:50:38.575 --> 00:50:48.121
वहाँ तक तो अभी मुखपाठ था। 
वहाँ तक लिपिबद्ध नहीं थी। 
(अभी) ताड़पत्र के ऊपर शास्त्र लिखे नहीं गये थे। 

00:50:48.145 --> 00:50:55.099
उस गिरनार पर से जब दक्षिण में जाते हैं 
तब बीच में अंकलेश्वर आता है, भरूच के पास।

00:50:55.123 --> 00:51:02.890
वहाँ वे दोनों मुनिराज पहुँचते हैं 
और उनको विचार आता है कि अब 
यह धारणा शक्ति क्रमशः-क्रमशः घटती जायेगी। 

00:51:02.914 --> 00:51:09.869
हम इसे ताड़पत्र के ऊपर लिख डालें। 
अतः वहाँ शास्त्रों की रचना होती है 
और शास्त्र लिखते हैं। 

00:51:09.893 --> 00:51:15.776
कुंदकुंदाचार्य भगवान दो हजार वर्ष
पहले हुए, उनके पहले धरसेन आचार्य हुए हैं। 	

00:51:15.800 --> 00:51:23.579
उनके शास्त्र भी वर्तमान में ताड़पत्र के ऊपर 
विद्यमान हैं। मूडबद्री में हैं। 

00:51:23.603 --> 00:51:33.332
वे सब नक्शे हैं, आत्मा में कहाँ जाना 
उसके नक्शे। ये जयेश और राजेश
अपने, ऐसे नक्शा देखते हैं। 

00:51:33.356 --> 00:51:36.917
मैंने कहा तू पूछ तो सही (कि) भाई,
इसमें कहाँ जाना है?

00:51:36.941 --> 00:51:43.148
तो कहा, भाई पूछने की जरूरत नहीं है, इसमें 
नक्शे में सब कुछ है, कुछ पूछने की जरूरत नहीं है। 

00:51:43.172 --> 00:51:53.094
यह कदाचित् किसी काल में ज्ञानी का योग 
न हो, प्रत्यक्ष ज्ञानी का योग न हो 
तो ये नक्शे सब बनाकर गये हैं। 

00:51:53.118 --> 00:52:05.021
आत्मा का स्वरूप क्या? कहाँ जाना?
किसमें स्थिर होना? वह सब इसमें लिखा हुआ है,
परंतु वह नक्शा खोलने की फुरसत (नहीं है)। आहाहा! 

00:52:05.045 --> 00:52:09.457
मुमुक्षु: इस नक्शे के अतिरिक्त 
दूसरा कोई रास्ता नहीं है?
पू. लालचंदभाई: कोई दूसरा रास्ता नहीं है। आहाहा!

00:52:09.481 --> 00:52:14.915
यदि आत्मा की प्राप्ति करनी हो 
और दुःख से छूटना हो 

00:52:14.939 --> 00:52:22.603
तो यह एक ही रास्ता है, आत्मा का अवलंबन,
धर्म की शरण के (अलावा) कोई दूसरी 
जगत में शरण नहीं है। आहाहा!

00:52:22.627 --> 00:52:27.820
करोड़ों अरबों रुपये पड़े रहते हैं 
और तड़प-तड़पकर मरकर जाता है हों!

00:52:27.844 --> 00:52:36.065
छटपटाहट, ऐसा रोग आता है कठोर, कोई 
बचा नहीं सकता। कि भाई ढेर करो, आहाहा!

00:52:36.089 --> 00:52:44.511
पैसों का ढेर करता है, सोने-चाँदी के ढेर करे 
तो भी कोई बचा सकता नहीं। 
फट से आयुष्य छूट जाता है। 

00:52:44.535 --> 00:52:49.102
कोई शरण इस जगत में नहीं है। (एकमात्र)
शरण हो तो अपना शुद्धात्मा शरण है। 

00:52:49.126 --> 00:52:54.723
उसका अवलंबन लेने से दुःख टलता है और सुख की 
प्राप्ति होती है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। 

00:52:54.747 --> 00:53:04.008
<b>एक होय त्रण कालमां, परमारथनो पंथ; 
प्रेरे ते परमार्थने, ते व्यवहार समंत।</b> 
(आत्मसिद्धि शास्त्र गाथा ३६),

00:53:04.032 --> 00:53:15.769
कि ज्ञान वह आत्मा, दर्शन वह आत्मा, इतना 
अभेद का जो भेद, जो भेद अभेद को 
प्रसिद्ध करता है, इतना व्यवहार सम्मत है। 

00:53:15.793 --> 00:53:24.882
शुभभाव करना वह अज्ञान है,
व्यवहार नहीं है। आहाहा!

00:53:24.906 --> 00:53:29.219
<b>इन क्रोधादिक सर्व आस्रवोंको 
क्षयको प्राप्त कराता हूँ।</b>

00:53:29.243 --> 00:53:41.726
<b>टीका:-</b> टीका अर्थात् विस्तार।
दो हजार वर्ष पहले कुंदकुंद आचार्य भगवान हुए,
उन्होंने प्राकृत में इस श्लोक की रचना की है। 

00:53:41.750 --> 00:53:49.460
उनके बाद, एक हजार वर्ष के बाद,	
अर्थात् आज से एक हजार वर्ष पूर्व,
एक समर्थ (अमृतचंद्र) आचार्य हो गये हैं, 

00:53:49.484 --> 00:53:57.662
जो अध्यात्म की मस्ती परिपूर्ण जिनकी है और 
जिन्होंने अकेले न्याय से शास्त्रों की रचना की है 

00:53:57.686 --> 00:54:06.264
कि जीव मध्यस्थ होकर यदि अभ्यास करे,
मध्यस्थ होकर सुने, तो उसे अंतर में से 
हकार आये, हकार आये ऐसी बात है।

00:54:06.288 --> 00:54:09.979
मध्यस्थ होना चाहिए। 
अपना पक्ष छोड़ना चाहिए। 

00:54:10.003 --> 00:54:13.529
सत्य वह मेरा,
मेरा वह सत्य ऐसा नहीं। 

00:54:13.553 --> 00:54:20.570
सच्चा वह मेरा, ऐसे उसका मन यदि थोड़ा 
खुल्ला रखे तो उसे आत्मा की प्राप्ति हो। 

00:54:20.594 --> 00:54:26.446
बाकी पक्ष में पड़ जाये, यह कोई पक्षपात का 
विषय नहीं है, यह तो आत्मा की बात है। 

00:54:26.470 --> 00:54:32.019
इसमें कहीं किसी पक्ष की या संप्रदाय की बात नहीं है। 
पदार्थ के स्वरूप की यह बात है। 

00:54:32.043 --> 00:54:37.626
वीतराग-विज्ञान है यह। 
इस जड़ के विज्ञान की बात तो भटकने के लिए है। 

00:54:37.650 --> 00:54:44.227
यह तो वीतराग-विज्ञान है कि जिसका 
अवलंबन लेने पर आत्मा को भव का अंत आ जाये। 

00:54:44.251 --> 00:54:49.357
भव का अंत कहो या दुःख का अंत कहो। 
भव है वह दुःखरूप है। 

00:54:49.381 --> 00:54:54.400
भव का अंत कहो या दुःख का अंत कहो,
उसका उपाय इसमें लिखा है। 

00:54:54.424 --> 00:55:00.562
उसकी टीका अर्थात् विस्तार अमृतचंद्राचार्य 
भगवान (की) आत्मख्याति नाम की टीका है। 

00:55:00.586 --> 00:55:07.433
(आत्मख्याति) अर्थात् आत्मा की 
प्रसिद्धि कैसे हो, अज्ञानी प्राणियों को
आत्मा की उपलब्धि, प्राप्ति कैसे होवे

00:55:07.457 --> 00:55:10.385
उसके लिए शास्त्र की रचना की है। 

00:55:10.409 --> 00:55:28.015
<b>टीका:- मैं यह आत्मा-प्रत्यक्ष अखंड अनंत 
चिन्मात्र ज्योति-अनादि-अनंत नित्य-उदयरूप 
विज्ञानघनस्वभावभावत्वके कारण एक हूँ;</b> आहाहा!

00:55:28.039 --> 00:55:36.296
चौबीस घंटों में आत्मा याद नहीं आता। 
आठ दिवस में भी याद नहीं आता, महीना हो जावे,
छः महीने हो जावें, आत्मा याद ही नहीं आवे। 

00:55:36.320 --> 00:55:43.838
आत्मा भूल गया है। जिसे याद 
करना चाहिए उसे समय-समय भूलता है। 

00:55:43.862 --> 00:55:51.473
और जिसका विस्मरण करने जैसा है,
जिसे याद करने जैसा नहीं है 
उसे समय-समय याद करता है। 

00:55:51.497 --> 00:55:58.947 
નજર ત્યાં બહારમાં છે. 
બહારમાં જુએ છે પણ અંતરમાં જોતો નથી.
नजर वहाँ बाहर में है। 
बाहर में देखता है परंतु अंतर में नहीं देखता है। 

00:55:58.971 --> 00:56:08.998
<b>मैं यह आत्मा-प्रत्यक्ष</b>,
परोक्ष वह मति-श्रुतज्ञान है,
भगवान आत्मा तो तीनोंकाल प्रत्यक्ष है। 

00:56:09.022 --> 00:56:14.753
प्रत्यक्ष होने का ही उसका स्वभाव है। 
परोक्ष रहने का उसका मूल स्वभाव नहीं है। 

00:56:14.777 --> 00:56:23.941
जो नजर करे उसे दर्शन देता है। 
जो नजर करे उसे दर्शन दे,
ऐसा उसका प्रत्यक्ष होने का स्वभाव है। 

00:56:23.965 --> 00:56:29.418
<b>मैं यह आत्मा</b>, यह आत्मा की बात है हों? 

00:56:29.442 --> 00:56:38.025
<b>प्रत्यक्ष</b> फिर <b>अखंड</b>,
यह खंडज्ञान वह मैं नहीं, मैं तो 
अनादि-अनंत अखंड एक वस्तु हूँ। 

00:56:38.049 --> 00:56:45.854
<b>अनंत चिन्मात्र-ज्योति</b>,
जो परिणाम एक समय की मर्यादावाला, 
(जिसका) अंत आ जाये, वह मैं नहीं।

00:56:45.878 --> 00:56:56.006
मैं तो <b>अनादि-अनंत</b>, <b>अनंत चिन्मात्र</b>,
अनंत बेहद सामर्थ्य ज्ञान और दर्शन 
ऐसी सामर्थ्य से भरा हुआ <b>मैं आत्मा हूँ</b>, 

00:56:56.030 --> 00:57:02.551
और <b>अनादि-अनंत</b>, परिणाम 
सादि-सांत है और आत्मा अनादि-अनंत है। 

00:57:02.575 --> 00:57:09.694
संसार अनादि-सांत, मोक्ष की अवस्था 
सादि-अनंत और आत्मा अनादि-अनंत है। 

00:57:09.718 --> 00:57:19.433
आत्मा अनादि-अनंत, संसार अनादि-सांत,
अनादि का होते हुए भी संसार का अभाव हो जाता है। 
और मोक्ष सादि-अनंत। 

00:57:19.457 --> 00:57:27.297
मोक्ष की शुरूआत होती है और किसी काल में अंत 
आता नहीं उसे सादि-अनंत कहालाता है। 

00:57:27.321 --> 00:57:34.180
और भगवान आत्मा अनादि-अनंत है। 

00:57:34.204 --> 00:57:37.859
<b>अनादि-अनंत</b> इसमें शब्द हैं 
उसका अर्थ होता है हों!

00:57:37.883 --> 00:57:48.205
<b>अनादि-अनंत</b> आत्मा है। 
<b>अनादि-अनंत</b> अर्थात् किसी काल में भी 
जिसकी भूतकाल में उत्पत्ति नहीं हुई है। 

00:57:48.229 --> 00:57:57.249
वे पाँच प्रकारों के पदार्थ इकठ्ठे मिलें 
और जीव की उत्पत्ति हो वह बात 
सौ प्रतिशत झूठी है। आहाहा!

00:57:57.273 --> 00:58:07.388
जैनदर्शन के ऊपर जब तक अनन्य 
श्रद्धा नहीं है तब तक वह सम्यग्दर्शन 
होने का भी पात्र नहीं है। आहाहा!

00:58:07.412 --> 00:58:15.638
जो सर्वज्ञ भगवान ने पदार्थों का स्वरूप कहा 
है ऐसा स्वरूप कोई कह नहीं सका, 
कोई कह सकता ही नहीं। 

00:58:15.662 --> 00:58:23.138
इसलिए <b>अनादि-अनंत</b> आत्मा (है), भूतकाल में 
किसी संयोग से जिसकी उत्पत्ति नहीं हुई है, 

00:58:23.162 --> 00:58:28.788
और किसी वियोग से जिसका नाश नहीं होता 
ऐसा <b>अनादि-अनंत</b> आत्मा है। 

00:58:28.812 --> 00:58:37.242
ये श्रीमद् राजचन्द्रजी में भी यह बात आती 
है। ज्ञानी तो सभी बात कह गये हैं। 

00:58:37.266 --> 00:58:44.585
<b>अनादि-अनंत</b>, जिसकी आदि नहीं और जिसका 
अंत नहीं। संयोग की आदि और संयोग का अंत। 

00:58:44.609 --> 00:58:50.592
यह मनुष्य पर्याय मिली, उसकी शुरूआत हुई 
और फिर आयुष्य पूरा होता है तो फिर अंत। 

00:58:50.616 --> 00:59:03.073
संयोग की शुरूआत भी है और अंत भी है। 
ऐसे आठ कर्मों की अनादि है परंतु उनका अंत आ 
जाता है। ऐसे ही राग उसकी आदि और अंत। 

00:59:03.097 --> 00:59:08.170
राग आया, क्रोध आया और क्रोध गया। 
क्रोध की आदि और क्रोध का अंत। 

00:59:08.194 --> 00:59:17.768
परंतु क्रोध को जाननेवाला जो आत्मा है 
उसका किसी काल में अंत आता नहीं है। 
वह तो अनादि-अनंत वस्तु है। 

00:59:17.792 --> 00:59:24.469
<b>नित्य-उदयरूप</b>, नित्य प्रगटरूप है। 
आहाहा! भगवान आत्मा हमें दिखता नहीं है? 

00:59:24.493 --> 00:59:31.566
अरे भाई! देखा नहीं इसलिए दिखता नहीं। 
जो होवे तो कैसे नहीं दिखे? 

00:59:31.590 --> 00:59:34.716
ऐसे श्रीमद् में (आत्मसिद्धि गाथा ४७) भी
छह प्रश्न-उत्तर किये हैं। 

00:59:34.740 --> 00:59:40.450
उसमें भी आया है 'यह घट-पट दिखाई देते हैं इसलिए 
वह है; आत्मा हमें दिखाई नहीं देता इसलिए नहीं है'। 

00:59:40.474 --> 00:59:48.390
ऐसे बहुत प्रश्नों का आत्मसिद्धि शास्त्र में,
छह पद का खुलासा बहुत है उसमें। आहाहा!

00:59:48.414 --> 00:59:54.804
परंतु तत्त्व के अभ्यास के बिना 
वह श्रीमद् के हृदय को भी पहचान नहीं सकता। 

00:59:54.828 --> 01:00:01.948
जैनदर्शन के ऊपर अनन्य श्रद्धा चाहिए। 
जैनदर्शन परिपूर्ण दर्शन है। 

01:00:01.972 --> 01:00:07.746
दूसरे किसी दर्शन में सम्यग्दर्शन हो 
नहीं सकता, तीनकाल में नहीं होता। आहाहा!

01:00:07.770 --> 01:00:18.956
भगवान आत्मा <b>नित्य-उदयरूप है</b>, नित्य 
प्रगटरूप है। <b>अनादि-अनंत</b> और नित्य प्रगटरूप। 
है, है और है, उसका किसी दिन नाश नहीं होता। 

01:00:18.980 --> 01:00:26.134
<b>नित्य-उदयरूप विज्ञानघनस्वभावभावत्वके 
कारण एक हूँ;</b> आहाहा! क्या कहते हैं?

01:00:26.158 --> 01:00:35.873
आत्मा का स्वभाव विशेष ज्ञान से घन, ठोस 	
वह परमात्मा सघन ऐसा रहा हुआ है,
इस कारण से मैं एक हूँ। 

01:00:35.897 --> 01:00:39.293
यह अनेकपना वह मेरा स्वभाव नहीं है। 

01:00:39.317 --> 01:00:45.881
यह क्रोध और मान और माया और लोभ 
और देव पर्याय और मनुष्य पर्याय 
ऐसी जो अनेकता है 

01:00:45.905 --> 01:00:49.630
वह अनेकता वह मेरा स्वभाव नहीं है, 
मैं तो <b>एक हूँ</b>। 

01:00:49.654 --> 01:00:57.251
एक होने के कारण मेरा स्वभाव <b>विज्ञानघन</b> 
है। <b>अनादि-अनंत</b> हूँ, चिन्मयमूर्ति हूँ, 

01:00:57.275 --> 01:01:02.317
<b>प्रत्यक्ष</b> हूँ, <b>अखंड</b> हूँ,
<b>नित्य-उदयरूप</b> होने के कारण मैं <b>एक हूँ</b>। 

01:01:02.341 --> 01:01:09.443
इस एक के ऊपर लक्ष कर 
और अनेक का लक्ष छोड़ दे। अनेक का 
अवलंबन छोड़ और एक का अवलंबन कर। 

01:01:09.467 --> 01:01:19.162
एक का अवलंबन लेने से एकाग्रता 
होती है, और एकाग्रता में, ध्यान में 
सम्यग्दर्शन प्रगट हो जाता है। 