﻿WEBVTT

00:00:34.940 --> 00:00:49.696
मुमुक्षु:- ज्ञानी का जन्म होता है तब सामान्य
स्वभाव का पड़खा बाहर आता है, इसका क्या
प्रयोजन है और क्या भाव है? कृप्या समझाइये।

00:00:49.720 --> 00:00:59.148
उत्तर:- अनंत-अनंत काल बीते, आत्मा ने
अपना जो शुद्धात्मा, सामान्य पड़खा है,

00:00:59.172 --> 00:01:05.416
जो नित्य निरावरण और परिपूर्ण
परमात्म पदार्थ है, अंदर विराजमान है,

00:01:05.440 --> 00:01:16.056
सामान्य पड़खा टंकोत्कीर्ण जिसका
लक्षण परमपारिणामिकस्वभाव भाव है,
वो नित्य-ध्रुव है शाश्वत है।

00:01:16.080 --> 00:01:21.936
आत्मा, वो सामान्य पड़खा आत्मा ने जाना नहीं आज तक

00:01:21.960 --> 00:01:31.108
और विशेष पड़खा यानि पर्याय, पर्याय में १४
गुणस्थान, मार्गणास्थान, जीव-समास, राग-द्वेष-मोह,

00:01:31.132 --> 00:01:41.136
हर्ष-शोक आदि अनेक प्रकार का जो परिणाम उत्पन्न होता है,
इन्द्रियज्ञान प्रगट होता है, इससे विशेष को जाना।

00:01:41.160 --> 00:01:52.616
मगर सामान्य को जाना नहीं, सचमुच सुना भी नहीं
और सुनाने वाले का, कभी-कभी, उसका जन्म होता है।

00:01:52.640 --> 00:01:57.748
यानि जब ज्ञानी का जन्म
होता है और ज्ञानी मिलते हैं,

00:01:57.772 --> 00:02:07.376
तो विशेष के पड़खे का ज्ञान कराते-कराते (ऐसा बताते हैं कि),
उसका लक्ष्य छोड़ दे और उससे भिन्न
भगवान आत्मा है, उसका लक्ष्य कर।

00:02:07.400 --> 00:02:18.856
वो है, अनंतगुणात्मक पदार्थ विद्यमान है।
परिणाम है, तो द्रव्य होना चाहिए,
इतना तो अनुमान में आता है।

00:02:18.880 --> 00:02:29.776
सूर्य का प्रकाश है, तो सूर्य है ही।
सूर्य का प्रकाश सूर्य के बिना,
उसका विशेष सामान्य के बिना होता नहीं है।

00:02:29.800 --> 00:02:36.896
तो विशेष को सब जानते हैं,
कर्ता-भोक्ता जानते हैं।

00:02:36.920 --> 00:02:41.428
मगर आत्मा अकारक अवेदक
है, केवल ज्ञायक-ज्ञाता है,

00:02:41.452 --> 00:02:50.656
शुद्ध है, परिपूर्ण है, वो पड़खा जो सामान्य
पड़खा, उसका परिचय नहीं, उसकी बात ही सुनी नहीं है।

00:02:50.680 --> 00:03:00.176
तो जब ज्ञानी का जन्म होता है, तो एक पड़खा
का तो परिचय है सबको, काम, क्रोध, बंधन
की कथा (उसका परिचय तो है)। ये करना और ये भोगना 

00:03:00.200 --> 00:03:07.776
और कर्ता है और भोक्ता है आत्मा,
ऐसी बात तो सुनी
और अनुभव में भी वो बात आई।

00:03:07.800 --> 00:03:16.816
मगर वो परिणाम से भिन्न पृथक आत्मा,
अंदर में अनंतगुणात्मक विराजमान है,
ऐसी बात बाहर कब आती है?

00:03:16.840 --> 00:03:27.976
कि जब ज्ञानी का जन्म होता है तब 
और ज्ञानी ने ये सामान्य पड़खा अनुभव में ले लिया (है)। 
सामान्य का श्रद्धान और विशेष का ज्ञान, 

00:03:28.000 --> 00:03:40.976
सामान्य का श्रद्धान और विशेष का ज्ञान, 
ज्ञानी को दो हैं। सामान्य का अवलम्बन
और विशेष, वो जानने लायक है, बस इतना ही।

00:03:41.000 --> 00:03:50.616
तो उसमें अंदर प्रयोजन ये है, प्रयोजन अभी
कि, सामान्य स्वभाव का लक्ष्य करने से
जीव को सम्यग्दर्शन प्रगट होता है।

00:03:50.640 --> 00:03:58.656
मोक्षमार्ग प्रगट हो जाता है।
विशेष के लक्ष्य से विकल्प उत्पन्न होता है।
सामान्य शुद्धम् विशेष अशुद्धम्।

00:03:58.680 --> 00:04:05.536
सामान्य स्वभाव शुद्ध है। शुद्ध को जानता है,
तो संवर-निर्जरा शुद्ध पर्याय प्रगट हो जाती है

00:04:05.560 --> 00:04:12.136
और विशेष के लक्ष्य से अशुद्ध परिणाम रागादि
प्रगट हो जाता है। तो विशेष का लक्ष्य छोड़ दे, 

00:04:12.160 --> 00:04:24.296
विशेष को छोड़ दे नहीं। विशेष का लक्ष्य
छोड़ दे, यानि विशेष में आत्मबुद्धि छोड़ दे,
उसमें अहम्-बुद्धि छोड़ दे।

00:04:24.320 --> 00:04:30.656
देह नहीं छोड़ना है, देह में आत्मबुद्धि छूटती है।
कर्म नहीं छूटता है, कर्म में आत्मबुद्धि छूटती है।

00:04:30.680 --> 00:04:38.376
राग नहीं छूटता है, राग में अहम्-बुद्धि छूट
जाती है और स्वभाव में अहम्-बुद्धि आती है,
तो अनुभव होता है।

00:04:38.400 --> 00:04:46.136
वो सामान्य पड़खे का प्रयोजन
आश्रयभूत पदार्थ है। उसका आश्रय करो,
उसका लक्ष्य करो, ये प्रयोजन है। दूसरा प्रश्न?

00:04:46.160 --> 00:05:00.536
मुमुक्षु:- उपशम और क्षयोपशम
सम्यक्त्व होता है। इस काल में,

00:05:00.560 --> 00:05:12.696
मुमुक्षु:- उपशम और क्षयोपशम सम्यकत्व होता है,
परंतु गाथा में तो क्षय की ध्वनि है,
उससे क्या अभिप्राय है?

00:05:12.720 --> 00:05:31.936
उत्तर:- इसका अभिप्राय ये है कि, होता 
तो है पंचम काल में। पंचम काल है ना,
तो इधर क्षायिक-सम्यग्दर्शन नहीं होता है।

00:05:31.960 --> 00:05:47.336
सबसे पहले उपशम, बाद में क्षयोपशम होता है, तो भी
गाथा में क्षय की ध्वनि आई। तो (इसका आशय है कि) हमेशा बात तो
ऊँची करना चाहिए, बात तो ऊँची करना चाहिए।

00:05:47.360 --> 00:05:58.456
वहाँ तक न पहुँचे तो भी बात तो ऊँची करना चाहिए
कि भाई! मैं दुकान (चालू) करूँगा
और मैं तो पाँच-पच्चीस लाख रुपया कमानेवाला हूँ।

00:05:58.480 --> 00:06:05.416
फिर बँगला लूँगा, मोटर भी लूँगा।
वो तो दृष्टान्त है, ऊँची बात करना चाहिए।

00:06:05.440 --> 00:06:14.096
ऐसे विद्यार्थी परीक्षा में बैठता है ना, 
(तो कहता है कि) मेरा पहला नंबर आनेवाला है।
वो बोलता नहीं है कि दसवाँ नंबर आयेगा।

00:06:14.120 --> 00:06:20.776
पहला नंबर बोलेगा और बाद में भले ही
ग्यारहवाँ नंबर आवे। लेकिन बोलता है
तो (ये बोलता है कि) पहला नंबर आयेगा।

00:06:20.800 --> 00:06:29.376
मुमुक्षु:- लक्ष्य तो ऊँचा ही रखना चाहिए।
उत्तर:- (लक्ष्य तो) ऊँचा ही रखना चाहिए। 
वचने किम् दरिद्रता? वचने किम् दरिद्रता?
वचन, वाणी तो ऊँची ही होनी चाहिए। 

00:06:29.400 --> 00:06:43.616
समझे? आहाहा! तो ऐसी क्षय की ध्वनि आई है,
तो क्षय है, क्षयोपशम ऐसा है कि आगे बढ़कर
क्षय ही होने वाला है, ऐसी संधिवाला वाक्य है।

00:06:43.640 --> 00:06:53.096
ऐसी बात है कि ये पंचमकाल में जिसको
सम्यग्दर्शन होता है और ज़्यादा टाइम
टिकता है ना, तो छूटता नहीं है।

00:06:53.120 --> 00:07:02.216
परंपरारूप क्षायिक हो जाता है, ऐसी संधि है।
इसलिए क्षय की ध्वनि (आई है)। ऊँची बात करते हैं, बस।

00:07:02.240 --> 00:07:07.416
भले क्षय हो नहीं तो कुछ नहीं पर 
क्षयोपशम तो हो, उपशम तो हो जाए, ऐसा। बोलो! दूसरा (प्रश्न)।

00:07:07.440 --> 00:07:22.536
मुमुक्षु:- एक समय में राग और
वीतरागता दोनों भाव साथ में होते हैं?
उत्तर:- हाँ! साथ में रहते हैं। क्या कहा?

00:07:22.560 --> 00:07:29.856
मुमुक्षु:- रहते हैं।
उत्तर:- होते हैं ऐसा नहीं, रहते हैं।
मुमुक्षु:- रह सकते हैं।
उत्तर:- रह सकते हैं।

00:07:29.880 --> 00:07:37.976
मिथ्यात्व भी हो और सम्यकत्व भी हो,
ऐसा साथ (राग और वीतरागता का) नहीं है।

00:07:38.000 --> 00:07:49.496
समझे? (राग और वीतरागता) साथ होते नहीं हैं, साथ (में) रहते हैं,
अनुभव के बाद। आत्मा के अनुभव के
पहले तो अकेला राग था, वीतरागभाव तो नहीं था।

00:07:49.520 --> 00:08:02.776
तो जब अनुभव हुआ, अनुभव हुआ, तो अनुभव
के काल में स्वरूपाचरण-चारित्र, अंश में स्थिरता,
वीतरागता (का) भाव प्रगट हो गया।

00:08:02.800 --> 00:08:10.536
और साथ में अप्रत्याख्यान आदि का राग, अस्थिरता
का राग, चारित्र का दोष भी साथ में रहता है।

00:08:10.560 --> 00:08:20.696
समय एक, पर्याय एक, भाग दो हैं।
समय एक, पर्याय एक, भाग दो।

00:08:20.720 --> 00:08:30.736
स्वसन्मुख आदि जो जितना भाग है, उतने में
तो वीतरागता प्रगट हो गयी और परसन्मुख वाली
जो पर्याय है, इतना उसमें तो राग है,

00:08:30.760 --> 00:08:36.976
क्योंकि जो वीतरागभाव न हो
और अकेला राग हो तो तो मिथ्यादृष्टी

00:08:37.000 --> 00:08:43.136
और अकेला वीतरागभाव हो और राग साथ में न हो,
तो-तो यथाख्यात-चारित्र होना चाहिए। ऐसा तो है नहीं।

00:08:43.160 --> 00:08:58.016
माने एक समय की पर्याय में मिश्र-अवस्था
रहती है। समझे? उत्पन्न दो नहीं होता है,
मगर उत्पन्न होने के बाद साथ में रहता है।

00:08:58.040 --> 00:09:03.016
साधक को, ज्ञान-चेतना और
कर्म-चेतना साथ में रहती है।

00:09:03.040 --> 00:09:10.096
उसमें विरोध नहीं है।
साथ में रहने में विरोध नहीं है।

00:09:10.120 --> 00:09:20.016
जितनी उसमें वीतरागता, उसके कारण से तो 
निर्जरा होती है। तो जितना राग होता है, उसके
कारण से अल्प-बंध भी होता है।

00:09:20.040 --> 00:09:26.016
निर्जरा भी होती है थोड़ी और बंध भी थोड़ा होता है।

00:09:26.040 --> 00:09:31.216
मुमुक्षु:- एक समय में ही साहब, दोनों कार्य होते हैं?
उत्तर:- हाँ! एक समय में दो कार्य होते हैं।

00:09:31.240 --> 00:09:37.296
जो एक समय में एक ही कार्य हो, समझो अभी तर्क,

00:09:37.320 --> 00:09:45.816
(जो) एक ही समय में एक ही कार्य हो (जैसे)
बंध ही होवे, निर्जरा न होवे, तो-तो साधक
नहीं रहता है और मोक्ष नहीं होता है।

00:09:45.840 --> 00:10:00.256
अच्छा! अकेली निर्जरा हो जाये, एक-समय में सब
और नया बंध हो ही नहीं, तो दो-चार भव भी कैसे हों?
समझे? न्याय से सब सिद्ध होता है।

00:10:00.280 --> 00:10:08.068
मुमुक्षु:- विभाव-स्वभाव का क्या अर्थ है?

00:10:08.092 --> 00:10:19.416
उत्तर:- फ़ज़ल में (पहले) बात चली थी कि
पर्याय में जो रागादि का विभाव होता है,
वो पर्याय का विभाव-स्वभाव है।

00:10:19.440 --> 00:10:31.096
पर्याय का विभाव होने का उसका धर्म है।
स्वभाव यानि धर्म। धर्म यानि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि 
मोक्षमार्गः नहीं।

00:10:31.120 --> 00:10:42.296
धर्म यानि, ये अपेक्षित धर्म है।
धर्म यानि जो राग को धारी रखती है पर्याय,
उसका नाम, उसका, पर्याय का धर्म है।

00:10:42.320 --> 00:10:48.936
तो ये विभाव हुआ,
तो विभाव भी उसका पर्याय का स्वभाव है।

00:10:48.960 --> 00:10:59.976
विभाव, द्रव्य का स्वभाव तो नहीं है, मगर जब
मिथ्यात्व की पर्याय हुई, तो विभाव हो गया,
तो विभाव भी वो पर्याय के स्वभाव से ही है।

00:11:00.000 --> 00:11:06.616
पर्याय का स्वभाव है। राग होता है,
तो राग पर्याय का स्वभाव है।

00:11:06.640 --> 00:11:13.096
तत्समय की योग्यता,
स्वभाव का अर्थ धर्म।
स्वभाव का अर्थ धर्म।

00:11:13.120 --> 00:11:18.616
ऐसा धर्म रहता है पर्याय में,
उसका नाम विभाव-स्वभाव कहते हैं।

00:11:18.640 --> 00:11:29.976
मुमुक्षु:- ज्ञानी पुण्य-पाप की क्रिया का
कर्ता-भोक्ता नहीं है, ये कैसे हो?
कृपया खुलासा करें।

00:11:30.000 --> 00:11:42.416
उत्तर:- ज्ञानी पुण्य-पाप के परिणाम का
कर्ता-भोक्ता नहीं है, तो इसका रहस्य क्या है?

00:11:42.440 --> 00:11:52.456
इसका कारण क्या है?
कारण कि उसको भेदज्ञान हो गया।
पुण्य-पाप से भिन्न शुद्धात्मा का अनुभव हो गया,

00:11:52.480 --> 00:12:03.856
तो पुण्य-पाप के परिणाम के साथ एकत्वबुद्धि
टूट गई। एकत्वबुद्धि छूट गई, तो कर्ताबुद्धि
भी गई और भोक्ताबुद्धि भी गई।

00:12:03.880 --> 00:12:15.616
तो वो एक ज्ञान और वैराग्य की शक्ति है।
पुण्य-पाप का कर्ता-भोक्ता क्यों नहीं है? कि
ज्ञान और वैराग्य की शक्ति प्रगट हो गई।

00:12:15.640 --> 00:12:25.656
ज्ञान क्या और वैराग्य क्या? ज्ञान का नाम
तो ये है कि पुण्य-पाप से मेरा आत्मा जुदा है
(और) वो निरंतर आत्मा को जानता है।

00:12:25.680 --> 00:12:33.416
पुण्य-पाप से भिन्न मेरा आत्मा है (और)
निरंतर ज्ञान में ज्ञायक जानने में आता है,
इसका नाम ज्ञान है।

00:12:33.440 --> 00:12:40.936
और वैराग्य (का अर्थ),
पुण्य-पाप का परिणाम मेरा नहीं है,
उसकी निरंतर उपेक्षा रहती है,

00:12:40.960 --> 00:12:46.216
इसलिए उसका स्वामी नहीं बनता है,
इसलिए कर्ता-भोक्ता नहीं होता है।

00:12:46.240 --> 00:12:52.216
हाँ! अस्थिरता से थोड़ा कर्तृत्वनय है
और भोक्तृत्वनय है।

00:12:52.240 --> 00:13:04.096
तो थोड़ा दुख का वेदन भी ज्ञानी को, जितने
भाग में, जितना उसमें राग होता है, तो
व्यवहारनय से भोक्ता कहा जाता है।

00:13:04.120 --> 00:13:12.536
मगर उस ही समय भी कर्तानय के साथ
अकर्तानय है, तो साक्षी भी है,
इसलिए कर्ताबुद्धि नहीं होती है।

00:13:12.560 --> 00:13:22.056
और भोक्तानय है तो भोक्ता है, इसलिए
उस टाइम भी अभोक्तानय भी है,
तो अभोक्तानय से ज्ञाता रहता है।

00:13:22.080 --> 00:13:26.816
इसलिए एकत्व नहीं होता है (परंतु)
परिणाम जैसा है, ऐसा ज्ञान रहता है।

00:13:26.840 --> 00:13:34.696
एकत्व नहीं होता है, इसलिए पुण्य-पाप का
भोक्ता नहीं है। अज्ञानी पुण्य-पाप का भोक्ता है,
तो (उससे) एकत्व कर लेता है।

00:13:34.720 --> 00:13:45.856
मुमुक्षु:- सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में
ज्ञान तथा चारित्र की क्या उपयोगिता है?

00:13:45.880 --> 00:13:55.056
उत्तर:- सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए ज्ञान की
उपयोगिता क्या और चारित्र की उपयोगिता क्या है?
ऐसा प्रश्न आया।

00:13:55.080 --> 00:14:08.976
तो ज्ञान की उपयोगिता तो ऐसा है, जो ज्ञान
आत्मा को जानता है जब, तब जाने हुए का
श्रद्धान हो जाता है, ये ज्ञान की उपयोगिता है।

00:14:09.000 --> 00:14:13.536
ज्ञान जिसको जानता है,
उसका श्रद्धान बन जाता है (उसका श्रद्धान कर लेता है)।

00:14:13.560 --> 00:14:20.696
ज्ञान, इन्द्रियज्ञान पर को जानता है -
तो पर मेरा है, ऐसा विपरीत श्रद्धान हो जाता है।

00:14:20.720 --> 00:14:29.616
अभी ऐसा ज्ञान अंतर्मुख होकर,
इन्द्रियज्ञान बाहर रह जाता है,
अतींद्रियज्ञान आत्माश्रित प्रगट होता है,

00:14:29.640 --> 00:14:37.776
तो अतींद्रियज्ञान में जब आत्मा जानने में
आता है, तो जाने हुये का श्रद्धानवान बन
जाता है, प्रतीति आ जाती है।

00:14:37.790 --> 00:14:47.206
जाने हुए का श्रद्धान हो जाता है। तो वो,
उसके अंदर चारित्र भी साथ में प्रगट होता है।
तीन अंश एक साथ में प्रगट होते हैं।

00:14:47.240 --> 00:14:57.776
तीन अंश हैं, मोक्षमार्ग के तीन अवयव हैं-
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र,
तीन अंश वीतरागभाव है।

00:14:57.800 --> 00:15:02.676
उससे, राग से रहित है। निश्चय-मोक्षमार्ग, 
व्यवहार-रत्नत्रय से रहित है।

00:15:02.700 --> 00:15:09.536
जोड़े भले, (साथ में) बाजू में हो तो देह भी है,
कर्म भी है, राग भी है, आहाहा! वो उसको
नड़ता (अड़ता) नहीं है।

00:15:09.560 --> 00:15:17.096
वो उसमें रहता है, परिणाम, वीतरागीभाव उसमें
रहता है और ज्ञायकभाव, ज्ञायकभाव में रहता है।
वो बँटवारा हो गया। ख़लास!

00:15:17.120 --> 00:15:27.136
ऐसी स्थिति होती है, तो ज्ञान का प्रयोजन आत्मा को
जानकर श्रद्धान करना, इतना ज्ञान का प्रयोजन है।

00:15:27.160 --> 00:15:37.176
और उस टाइम जब ज्ञान, भेदज्ञान का विचार करता है,
तब चारित्र की क्या होती है बात,
कि, (तब) एक गर्भित-शुद्धता प्रगट हो जाती है।

00:15:37.200 --> 00:15:45.856
गर्भित-शुद्धता का क्या अर्थ है कि भेदज्ञान का
बार-बार विचार करना, सो व्यवहार है।

00:15:45.880 --> 00:15:53.216
भेदज्ञान का बार-बार विचार करना, सो व्यवहार है।
अभेद का अनुभव करना, वो तो निश्चय है।

00:15:53.240 --> 00:15:59.536
मगर निश्चय के पहले भेदज्ञान का विचार जो
जीव करता है, तब गर्भित शुद्धता प्रगट होती है।

00:15:59.560 --> 00:16:08.536
यानि कषाय की मंदता उस टाइम हो जाती है,
अपने-आप। कषाय की मंदता हुई
इसलिए चारित्र हो गया, ऐसा नहीं।

00:16:08.560 --> 00:16:19.936
पर पूर्व-भूमिका में ऐसा बनाव बन जाता है। 
अंतर्मुख होता है, तो स्वरूपाचरण-चारित्र
प्रगट हो जाता है। तो तीनों साथ में अविनाभाव हैं।

00:16:19.960 --> 00:16:28.696
मगर सामान्य  रीति  से चौथे-पाँचवे 
गुणस्थान वाले (को) चारित्र अंश है,

00:16:28.720 --> 00:16:36.096
मगर चारित्र सचमुच तो छठवे-सातवे गुणस्थान (वाले)
मुनिराज को, चारित्र कहा जाता है।
शुद्धोपयोग को चारित्र कहा जाता है।

00:16:36.120 --> 00:17:02.096
मुमुक्षु:- सम्यग्दर्शन तो प्रगट हुआ नहीं और
व्रत भी पाँचवे गुणस्थान में धारण कर सकता है।
तो फिर धर्म की शुरुआत कैसे करें जीवन में?

00:17:02.120 --> 00:17:15.696
उत्तर:- देखो प्रश्न आया कि सम्यग्दर्शन तो
प्रगट हुआ नहीं। और सम्यग्दर्शन प्रगट हुआ नहीं,
तो प्रगट होगा, अभी छोड़ो वो बात।

00:17:15.720 --> 00:17:21.976
अभी तो थोड़ा व्रत-तप कर लेवें, तो
सम्यग्दर्शन तो बाद में हो जाएगा।

00:17:22.000 --> 00:17:33.136
ऐसा कोई करता है, तो वो लाइन-फरक है।
लाइन-फरक क्या है?
कि आस्रव के अभाव में क्रम पड़ता है।

00:17:33.160 --> 00:17:47.496
आस्रव यानि मिथ्यात्व, अव्रत, कषाय, योग।
हैं ना? चार भी आता है नाम (और अगर)
प्रमाद ले लो, तो पाँच नाम आता है।

00:17:47.520 --> 00:17:59.976
अभी संक्षेप में करो, तो मिथ्यात्व, अव्रत,
कषाय और योग, (ऐसा) उसके अभाव का क्रम है।
वो क्रम-भंग नहीं होता है।

00:18:00.000 --> 00:18:09.056
मिथ्यात्व रह जावे और अव्रत छूट
जावे और व्रत हो जावे, ऐसा आता नहीं है।

00:18:09.080 --> 00:18:20.336
मिथ्यात्व, अव्रत, कषाय और योग।
मिथ्यात्व श्रद्धा गुण की पर्याय का पाप है,
अव्रत चारित्र गुण की पर्याय का पाप है। समझे?

00:18:20.360 --> 00:18:27.736
अव्रत यानि पाप का त्याग नहीं है, अभी तो
पाप ही है। तो ऐसा क्रम-भंग नहीं होता है।

00:18:27.760 --> 00:18:35.696
पहले सम्यग्दर्शन होता है, बाद में देशव्रत,
बाद में ये महाव्रत होता है, ऐसा क्रम है।

00:18:35.720 --> 00:18:47.576
तो अभी कोई क्रम-भंग करे, तो इसमें दोष आ
जाता है। दोष क्या आ जाता है? कि व्रतादि-भाव 
कर्ताबुद्धि से करता है।

00:18:47.600 --> 00:19:00.016
तो एक तो, वो बंध का कारण है और
उसको चारित्र का कारण मान लिया। चारित्र का
मल, वो मैल है, उसको चारित्र मान लिया, वो दोष है।

00:19:00.040 --> 00:19:11.696
हाँ! ऐसा है, कोई प्रैक्टिस करे तो कषाय की
मंदता है, ऐसा समझना चाहिए।
व्रत नहीं है मगर कषाय की मंदता है।

00:19:11.720 --> 00:19:22.576
मेरे परिणाम में कषाय की मंदता है, तो कोई
दोष नहीं है। मगर उसको व्रत माने और
निर्जरा का कारण माने, तो-तो दोष है।

00:19:22.600 --> 00:19:28.336
संवर-निर्जरा रूप नहीं है वो। उदयभाव है।
उदयभाव बंध का कारण है।

00:19:28.360 --> 00:19:40.216
ज्ञानी का देशव्रत का परिणाम भी बंध का कारण,
तो अज्ञानी देशव्रत की प्रेक्टिस करे,
तो बंध का कारण है ही,

00:19:40.240 --> 00:19:50.156
उसमे तो कोई शंका नहीं है। उसका अर्थ ये
नहीं है, उल्टा नहीं लेना कि पाप करने
की छूट है। पाप करने की तो (छूट नहीं है)।

00:19:50.180 --> 00:20:01.616
अन्यमति पाप का उपदेश नहीं देते तो, जैनदर्शन
में कोई पुण्य छोड़ो और पाप करो, ऐसा उपदेश
तो नहीं है। ऊँचे-ऊँचे जाने का उपदेश है।

00:20:01.640 --> 00:20:12.616
एक दफ़े ऐसा हुआ भैया! कि राजकोट में
गुरुदेव पधारे थे। तो एक मुंबई वाली
पार्टी है, छोटुभाई विराणी,

00:20:12.640 --> 00:20:20.616
वो राजकोट के ही हैं। तो व्याख्यान
में भी आवें, रात्रि-चर्चा में भी आवें।

00:20:20.640 --> 00:20:34.656
तो उसने एक प्रश्न किया कि हे गुरुदेव!
आप फ़रमाते हैं कि आत्मा के अनुभव से
ही धर्म की शुरुआत होती है।

00:20:34.680 --> 00:20:40.696
आत्मा के अनुभव के बिना धर्म की
शुरुआत होती नहीं है।

00:20:40.720 --> 00:20:51.496
तो मेरा एक प्रश्न है। मेरा एक प्रश्न है
कि मैं अनुभव तक तो पहुँचता नहीं
और पाप तो करना ही नहीं,

00:20:51.520 --> 00:20:56.336
तो बाकी रहा पुण्य। 
तो पुण्य करना कि नहीं करना?

00:20:56.360 --> 00:21:08.388
फिर से, आप फ़रमाते हैं यानि सर्वज्ञ भगवान
फ़रमाते हैं, कुंदकुंद आचार्य भगवान फ़रमाते हैं

00:21:08.412 --> 00:21:21.456
कि आत्मा के अनुभव से ही धर्म की शुरूआत
होती है और लीनता से वृद्धि होती है और
पूर्ण लीनता से मोक्ष होता है।

00:21:21.480 --> 00:21:28.576
ऐसी स्थिति तो हम कर सकते नहीं हैं,
वहाँ तक (तो) हम पहुँचते नहीं हैं।
हमारी पहुँच नहीं है अभी। समझे?

00:21:28.600 --> 00:21:37.056
और पाप तो करना नहीं है। क्योंकि पाप करने से
तो निगोद में, नरक में, त्रिर्यंच में (जाना पड़ता है)।
त्रिर्यंच में हमको जाना नहीं है।

00:21:37.080 --> 00:21:45.096
पाप करना नहीं है, अनुभव तक पहुँचते
नहीं है, तो पुण्य करना कि नहीं करना?

00:21:45.120 --> 00:21:51.336
ऐसा प्रश्न नहीं किया कि पुण्य से धर्म होता है
(कि नहीं होता है), ऐसा प्रश्न नहीं किया।
पुण्य करना कि पुण्य नहीं करना?

00:21:51.360 --> 00:22:02.560
अनुभव-क्रिया (तक) पहुँच सकते नहीं है, पाप की
क्रिया करना नहीं है, तो बाकी तो रह गया पुण्य,
तो पुण्य करना कि नहीं करना? ऐसा प्रश्न आया

00:22:02.700 --> 00:22:11.748
तो गुरुदेव ने क्या कहा प्रश्न के उत्तर (में)?
जब-जब पुण्य का परिणाम आवे,
पाप का परिणाम आवे,

00:22:11.772 --> 00:22:21.776
तभी-तभी ऐसे विचारना कि पुण्य-पाप के परिणाम
जो आस्रव-तत्त्व हैं, उससे मेरा आत्मा भिन्न है,
ऐसे बार-बार विचार करना।

00:22:21.800 --> 00:22:31.956
पुण्य करना, ऐसा भी नहीं कहा और नहीं करना,
(ऐसा) भी नहीं कहा। पुण्य करना, ऐसा भी नहीं
कहा और नहीं करना, ऐसा भी नहीं कहा।

00:22:31.980 --> 00:22:41.816
तो क्या कहा? कि जो आत्मा कर सकता है वो
कहा। आत्मा ज्ञान करनेवाला है। क्या कहा?

00:22:41.840 --> 00:22:52.416
कि पुण्य-पाप से भिन्न मेरा आत्मा है,
ऐसा बार-बार आत्मा का विचार करना।
भेदज्ञान का विचार करना। बोलो!

00:22:52.440 --> 00:22:58.576
पुण्य करना, ये भी नहीं कहा और
नहीं करना, ये भी नहीं कहा।
ऐसी बात बताते हैं।

00:22:58.600 --> 00:23:02.936
मुमुक्षु:- उसने तो ऐसा (प्रश्न) रखा था (जैसे) मुँह फाड़ कर ही बैठा
था कि अभी बोलेगा गुरु कि बाँध दिया गुरु को।

00:23:02.960 --> 00:23:13.936
उत्तर:- हाँ! गुरु को बाँध दिया। उसकी (शिष्य की)
आशा ऐसी थी, लेकिन जवाब दूसरा आया।

00:23:13.960 --> 00:23:23.976
मुमुक्षु १:- दूसरा ही आवे ना। मुमुक्षु  २:- भली होनहार है!
उत्तर:- दूसरा ही आवे ना।
पुण्य करना, ऐसे उपदेश का अर्थ क्या है?

00:23:24.000 --> 00:23:32.576
कि (जाओ) तुम दुःखी होओ। इसका अर्थ क्या हुआ?
ऐसा आशीर्वाद ज्ञानी देते नहीं है। क्यों?

00:23:32.600 --> 00:23:40.176
वो तो सब शास्त्र की बात कहता हूँ मैं कि
पुण्य और पाप आस्रव-तत्त्व हैं,
उसमें आकुलता होती है।

00:23:40.200 --> 00:23:46.616
पुण्य भी आकुलता और पाप भी आकुलता
क्योंकि आस्रव-तत्त्व का लक्षण ही दुख है।

00:23:46.640 --> 00:23:56.160
तो पुण्य करो, तो इसका अर्थ कि तुम दुःखी होओ।
ऐसा उपदेश ज्ञानी का होता नहीं है।
पुण्य-पाप से भिन्न तेरे आत्मा का ज्ञान कर ले।

00:23:53.080 --> 00:24:07.136
मुमुक्षु:- बहुत सरस! बहुत स्पष्ट!
बहुत अच्छी बात है! भूल निकाल दी।

00:24:07.160 --> 00:24:15.296
उत्तर:- ये अनादि का प्रश्न ऐसा होता है,
आजकल का नहीं है।
अनादि का ऐसा (ही) प्रश्न है।

00:24:15.320 --> 00:24:18.896
मुमुक्षु:- ज्ञानी भी ऐसा ही जवाब देते हैं।
उत्तर:- (ज्ञानी) ऐसा ही जवाब देते हैं।

00:24:18.920 --> 00:24:30.816
पुण्य-पाप से भिन्न तेरे आत्मा का ध्यान कर,
ज्ञान कर, ध्यान कर, उसका श्रद्धान कर ले।
आहाहा! सुखी होने का ही रास्ता बताते हैं।

00:24:30.840 --> 00:24:42.616
दुःखी होने का रास्ता बतावें ही नहीं (ज्ञानी)।
जो पुण्य करो तो कल्याण होगा, आहाहा!
ये ज्ञानी का उपदेश नहीं है।

00:24:42.640 --> 00:24:48.096
वाणी के द्वारा उनको ख्याल आ जाता है,
सुननेवालों को। आहाहा!

00:24:48.120 --> 00:24:58.136
क्योंकि पुण्य भी सोने की बेड़ी, पाप लोहे की
बेड़ी, पुण्य सोने की बेड़ी, सोने की बेड़ी।

00:24:58.160 --> 00:25:09.176
अच्छा! कोई तुमको लोहे की बेड़ी से बाँधना नहीं है,
आज सोने की बेड़ी से बाँधना है।
भाई साहब! मेरे को बंधना नहीं है।

00:25:09.200 --> 00:25:14.656
अरे भाई! सोने की बेड़ी! बेड़ी में बंधन है ना।

00:25:14.680 --> 00:25:27.776
पुण्य के परिणाम भी भाव-बंध और पाप के
परिणाम भी भाव-बंध हैं। भाव-मोक्ष नहीं है। आहाहा!

00:25:27.800 --> 00:25:41.256
मुमुक्षु:- दौलतराम जी ने छहढाला में
लिखा है कि 'राग आग दहे सदा'।

00:25:41.280 --> 00:25:46.536
मुमुक्षु:- इसमें भेद नहीं किया कि, पाप-राग 
आग है और पुण्य-राग आग नहीं है,
ऐसा भेद नहीं पाड़ा।

00:25:46.560 --> 00:25:56.456
उत्तर:- ऐसा भेद नहीं पाड़ा (क्योंकि) भेद है ही नहीं।
पुण्य-पाप में जो भेद करता है,
वो घोर संसार में रखड़ता (भटकता) है,

00:25:56.480 --> 00:26:06.136
ऐसा कुंदकुंद भगवान का वचन है।
पुण्य-पाप एक कोटि का
दुखदायक (परिणाम), बंध का कारण (है)। आहाहा!

00:26:06.160 --> 00:26:14.656
हेय तत्त्व है। पाप हेय है और पुण्य
उपादेय है, ऐसा है नहीं। आहाहा!

00:26:14.680 --> 00:26:22.536
हेय का अर्थ द्वेष-वाचक नहीं, उपेक्षा-वाचक (है)।
मेरा स्वभाव नहीं है, बस इतना ही।

00:26:22.560 --> 00:26:54.936
राग-द्वेष करने की बात तो जिनागम में है
ही नहीं। आहाहा! 

00:26:54.960 --> 00:27:01.016
आत्मा का हित करने की बात है।
बाकी जानने का विषय तो
बहुत है, हज़ारों आगम हैं।

00:27:01.040 --> 00:27:13.256
आयुष्य कम, प्रवृत्ति ज्यादा, निवृत्ति कम,
बुद्धि कम। समझे? उसमें तो प्रयोजनभूत
अपना काम कर लेना चाहिए।

00:27:13.280 --> 00:27:37.616
मुमुक्षु:- बहुत बढ़िया साहब!
मुमुक्षु:- उनका प्रश्न है बाबूजी का।
उत्तर:- बहुत अच्छा! कोई भी प्रश्न कर सकते हैं।

00:27:37.640 --> 00:27:45.576
मुमुक्षु:- बहुत पुराना प्रश्न है इनका।
हम लोग पढ़ते थे, तब का प्रश्न है।
उत्तर:- बहुत अच्छा! ठीक है! 

00:27:45.600 --> 00:27:54.736
प्रश्न तो होता है और प्रश्न करने से अपना
समाधान करने की भावना होती है।

00:27:54.760 --> 00:28:00.656
प्रश्न करनेवाले को मूंझवण (असमंजस)
होती है, तो प्रश्न तो होता है।

00:28:00.680 --> 00:28:07.576
तो उसक सही उत्तर मिले, तो उसको मार्गदर्शन
मिल जाता है। प्रयोजन तो यही है।

00:28:07.600 --> 00:28:10.216
मुमुक्षु:- सही उत्तर मिलेगा
आज, इसलिए प्रश्न आ गया।
उत्तर:- अच्छा!

00:28:10.240 --> 00:28:15.336
मुमुक्षु:- श्रीमान् जी! श्री रामचंद्र जी
क्षायिक-सम्यग्द्रष्टि थे।

00:28:15.360 --> 00:28:22.256
मुमुक्षु:- जब क्षायिक-सम्यग्द्रष्टि थे, तब उन्होंने
बड़ी-बड़ी लड़ाईयाँ (लड़ीं), महीनों तक लड़ते रहे,

00:28:22.280 --> 00:28:32.736
मुमुक्षु:- जिसमें लाखों पाँच-इन्द्रिय जीवों को
मौत के घाट उतारते रहे। इतना बड़ा पाप तो
साधारण मनुष्य भी नहीं कर सकता है।

00:28:32.760 --> 00:28:38.816
मुमुक्षु:- तब वो तो क्षायिक-सम्यग्द्रष्टि (थे)।
तब क्षायिक सम्यकत्व का क्या महत्व रहा?

00:28:38.840 --> 00:28:57.936
उत्तर:- पहले तो रामचंद्रजी क्षायिक-सम्यग्द्रष्टि
थे, एक बात और पुरुषोत्तम पुरुष (थे)। उस (ही)
भव में जिनका मोक्ष हो गया, उस ही भव में। समझे?

00:28:57.960 --> 00:29:01.736
मोक्षमार्ग में तो थे और मोक्ष हो गया।

00:29:01.760 --> 00:29:14.176
तो ऐसे रामचंद्रजी (ने) क्षायिक-सम्यग्द्रष्टि होने पर
भी, ऐसी लड़ाई क्यों किया (लड़ी) कि जिसमें हजारों-लाखों 
संज्ञी पंचेंद्रिय मनुष्यों का घात हो गया?

00:29:14.200 --> 00:29:24.456
समझ गए? मनुष्य का घात हो गया,
घात किया नहीं उन्होंने। घात हो गया,
तो उन्होंने किया नहीं।

00:29:24.480 --> 00:29:35.136
कर्ताबुद्धि वाले को ऐसा लगता है कि रामचंद्रजी
ने किया। मगर रामचंद्रजी ने (घात) जाना,
मगर (घात) किया नहीं है।

00:29:35.160 --> 00:29:44.976
आत्मा को जानते-जानते वो जो होता है,
वो काम होता है, उसको जानते हैं।
उन्होंने किया-विया नहीं है।

00:29:45.000 --> 00:29:55.736
और दूसरी बात कि सचमुच तो उपादानरूप से
तो किया नहीं, मगर निमित्त-कर्ता भी वो नहीं है।

00:29:55.760 --> 00:30:03.456
और ये निमित्त होता है उसमें, वो तो
पर (द्रव्य) के घात में पर(द्रव्य) निमित्त होता है।

00:30:03.480 --> 00:30:09.616
आत्मा और आत्मा के आश्रय से हुआ परिणाम,
संवर-निर्जरा, उसमें निमित्त होता नहीं है।

00:30:09.640 --> 00:30:17.256
हाँ! इतनी बात है, थोड़ा अस्थिरता का राग है,
थोड़ा अस्थिरता का राग है। चारित्र का दोष लगता है।

00:30:17.280 --> 00:30:25.296
श्रद्धा का दोष लगता नहीं है
क्योंकि उसमें कर्ताबुद्धि छूट गई,
एकत्वबुद्धि छूट गई है।

00:30:25.320 --> 00:30:32.816
वो अंदर की रमत है और बाहर से देखो
तो कर्ता लगता है, रामचंद्र जी। समझे?

00:30:32.840 --> 00:30:40.536
मगर अंदर का जो तपास (खोज) करे, तो ख्याल
में आवे। अंतर की बात है, अंदर की रमत है।

00:30:40.560 --> 00:30:52.736
भेदज्ञानी को कर्ता-भोक्ता की बात छूट गई है।
होता है, उसको जानता है।
हाँ! इतना सही है कि थोड़ा चारित्र का दोष है।

00:30:52.760 --> 00:30:59.976
स्वरूप में लीन नहीं रह सकता है तो चारित्र
का ज़रा दोष (आता है), थोड़ा आता है।
अल्प-दोष, वो अल्प-दोष है।

00:31:00.000 --> 00:31:12.656
अनंत संसार का कारण नहीं है। एक बात।
दूसरा, एक द्रव्य को दूसरा द्रव्य कोई मार
सकता नहीं है और जीवित कर सकता नहीं है।

00:31:12.680 --> 00:31:23.496
वो मैन (मुख्य) चीज़ जैनदर्शन की है। आहाहा!
वो उसने ये मारा और मेरे को वो मारता है,
वो एक दूसरे को कोई मार सकता नहीं है।

00:31:23.520 --> 00:31:32.896
उसके आयुष्य का क्षय होने का काल था,
तब बाह्य-निमित्त कैसा है, (बस) ऐसा ज्ञान कराया है।

00:31:32.920 --> 00:31:46.696
बाकी किया-विया नहीं है, ऐसी अंदर की बात है।
आहाहा! हाँ! राग है इतना, इतना दोष तो है। ज्ञानी को
भी छूट नहीं है, थोड़ा दोष तो लगता है।

00:31:46.720 --> 00:31:55.856
जानता है कि ये दोष है। मगर स्वरूप में
लीन नहीं रहता है, तो दोष आ जाता है।
वो निर्जरा का हेतु है। आहाहा!

00:31:55.880 --> 00:32:03.016
क्या? वो बात अलौकिक है।
ज्ञानी की बात ज्ञानी जाने।
दूसरा कौन जाने?

00:32:03.040 --> 00:32:10.776
क्षायिक-सम्यग्द्रष्टि है वो तो बराबर,
तद्भव (में) ही मोक्ष होनेवाला था। बराबर! आहाहा!

00:32:10.800 --> 00:32:21.056
मगर थोड़ा राग ऐसा आता है।
राग का चाला है, स्वांग है। जानता है (कि)
वो लम्बे टाइम टिकनेवाला नहीं है।

00:32:21.080 --> 00:32:34.856
ऐसे शांतिनाथ भगवान, अरहनाथ, कुंथुनाथ -
चक्रवर्ती, कामदेव और तीर्थंकर। समझे?
चक्रवर्ती को तो ९६००० रानियाँ होती हैं।

00:32:34.880 --> 00:32:41.176
अरे! चक्रवर्ती को ९६००० रानियाँ है ही नहीं।
उसके पास तो ज्ञान है। आहाहा!

00:32:41.200 --> 00:32:49.096
आत्मा का ज्ञान और रानी है, उसका भी ज्ञान।
और रानी मेरी है, ऐसा अभिप्राय में है ही नहीं।

00:32:49.120 --> 00:32:57.656
जल कमलवत् जैसी स्थिति होती है, ज्ञानी की,
ऐसी अंदर की बात है। बचाव नहीं करता है।

00:32:57.680 --> 00:33:05.496
मुमुक्षु:- भोगता क्यों है फिर उसको? 
जब राग नहीं है तो फिर भोगता क्यों है?

00:33:05.520 --> 00:33:13.456
उत्तर:- राग, आत्मदृष्टि वालों को राग
होता है, मगर भोक्ता नहीं है
क्योंकि उसके अंदर एकत्वबुद्धि नहीं है।

00:33:13.480 --> 00:33:21.976
आनंद का भोक्ता है और दुःख का ज्ञाता है।
क्या कहा?
आनंद का तो भोक्ता है और दुःख का ज्ञाता है।

00:33:22.000 --> 00:33:26.216
आनंद का भी भोक्ता और
दुःख का भी भोक्ता, ऐसा है नहीं।

00:33:26.240 --> 00:33:36.336
अज्ञानी दुःख का भोक्ता है, ज्ञानी आनंद का
भोक्ता है और दुःख का ज्ञाता रहता है।
भोक्ता बनता नहीं है।

00:33:36.360 --> 00:33:42.936
मुमुक्षु:- रहस्यमयी बात है!
उत्तर:- रहस्यमयी बात है। अंदर की बात है।

00:33:42.960 --> 00:33:50.856
वो सब सर्वज्ञ भगवान ने बताई,
शास्त्र में भी सब है। शास्त्र में
भी सब, सब बात (का) है, शास्त्र में खुलासा।

00:33:50.880 --> 00:33:57.576
चारों अनुयोगों में, सबमें खुलासा है।

00:33:57.600 --> 00:34:07.176
प्रथमानुयोग में तो ऐसी बात आती
है कि कोई सहन न कर सके।
ऐसी-ऐसी बात भी आती है। आहाहा!

00:34:07.200 --> 00:34:23.936
देखो! माघनंदी आचार्य हो गए। समर्थ। समझे?
आहाहा! तो जब कुम्हार ने उनको बताया कि
ज़रा ख्याल करना (रखना, ऐसा कहा) उसको, लड़की को,

00:34:23.960 --> 00:34:32.856
मैं अभी आता हूँ। वो, उसका पिताजी गया गाँव में
और लड़की वहाँ रही ध्यान रखने के लिए।
कच्चा होता है ना मिट्टी का (उसका ध्यान रखने)।

00:34:32.880 --> 00:34:38.936
इस (बीच) में क्या हुआ? कि आँधी आ गई
एकदम, बादल, एकदम घनघोर हो गया।

00:34:38.960 --> 00:34:44.456
तो वो पिताजी ने घर पर देखा आहाहा! 
अभी बरसात टूट जाएगा, टूट पड़ेगा

00:34:44.480 --> 00:34:51.696
और वो सब हमारे (मिट्टी के) बर्तन सब
ख़तम (हो जायेंगे), पानी हो जायेंगे। समझे?

00:34:51.720 --> 00:34:57.416
वो वहाँ चिंता करते थे। वो वहाँ रोने लगी
छोकरी, बहुत रोने लगी, बहुत रोने लगी।

00:34:57.440 --> 00:35:05.936
तो माघनंदी आचार्य गुफा में बैठे थे और
उधर का आवाज़ आया। आहाहा!
देखो! बनाव कैसे बना?

00:35:05.960 --> 00:35:14.256
तो उसके (लड़की के) पास आये, (बोले कि) क्या है?
कि मेरे पिताजी मेरे को ध्यान रखने को
बोल गए, मगर मैं कैसे ध्यान रखूँ?

00:35:14.280 --> 00:35:20.576
अभी तो बरसात टूट पड़ेगा
इसलिए मैं रोती हूँ। हमारी
मेहनत सब बेकार हो जाएगी

00:35:20.600 --> 00:35:28.336
और मेरे पिताजी मेरे को डाँटेंगे, मारेंगे। समझे?
अच्छा! ऐसा है? तो कोई करुणा आ गई।

00:35:28.360 --> 00:35:32.256
बनाव बनने वाला था, बनाव बनने वाला था।

00:35:32.280 --> 00:35:42.416
उन्होंने पिच्छी ऐसे फेरी तीन-बार। निंभाड़ा होता
है ना, उसके आजु-बाजू। और फिर बरसात-आँधी 
फटी, एक बूँद पानी की उसमें नहीं पड़ी।

00:35:42.440 --> 00:35:50.296
आज-बाजू से पानी निकल गया।
वो पिताजी दौड़कर इधर आया।
देखा तो ओहो! कि ये क्या चमत्कार है?

00:35:50.320 --> 00:36:00.136
लड़की को पूछा क्या हो गया?
कि एक योगी महाराज धर्मात्मा आये थे।
तो उन्होंने ये बचा दिया, ये अपना काम (बन गया)।

00:36:00.160 --> 00:36:12.376
अभी मेरी प्रतिज्ञा है कि लगन (शादी) करूँ तो उनके
साथ करूँ। अरे! वो तो ब्रह्मचारी, साधु,
भावलिंगी-संत, आनंद को भोगनेवाले। आहाहा!

00:36:12.400 --> 00:36:19.296
लड़की ने तो प्रतिज्ञा कर ली कि
लगन (शादी) करूँ, तो उसके साथ।
समझे? 

00:36:19.320 --> 00:36:26.776
तो पिताजी वहाँ गए।
उनको विनती की कि (शादी करो, नहीं तो) 
हमारी लड़की मर जायेगी। (आचार्य माघनंदी) 
क्या है? क्या है? कि अभी तो तू बच गया ना।

00:36:26.800 --> 00:36:33.016
(पिता कहे) कि नहीं, ऐसा नहीं। कि अभी उसने प्रतिज्ञा कर
लिया है कि आपके साथ लगन करना है। 

00:36:33.040 --> 00:36:41.056
बोलो! चारित्रवंत धुरंधर भावलिंगी-संत, वो तो सिद्ध-नगरी 
में जानेवाले हैं। तो बनाव क्या बना?

00:36:41.080 --> 00:36:51.856
कि वो होनेवाला था। होनेवाला होता है।
नहीं होनेवाला हो गया, ऐसा है नहीं।
कर्ताबुद्धिवालों को ऐसा लगता है
(कि नहीं होनेवाला हो गया)।

00:36:51.880 --> 00:37:00.096
ज्ञाताबुद्धिवालों को ऐसा लगता है कि होनहार
होता है। आहाहा! होने योग्य होता है।
उसके साथ लगन (शादी) किया। समझे?

00:37:00.120 --> 00:37:12.696
और घड़ा बनाया, मटका बनाने लगा। क्योंकि
बनाना चाहिए कि नहीं? लेकिन मोर-पिच्छी
और कमंडल वहाँ रखा था। समझे?

00:37:12.720 --> 00:37:22.016
तो ऐसा हुआ, कोई संघ के अंदर
प्रायश्चित का प्रश्न आया। मुनि को कोई
दोष लगे, अतिचार (लगे), अनाचार नहीं।

00:37:22.040 --> 00:37:28.896
कोई अतिचार लगे, तो दोष हो, तो प्रायश्चित
ले लेते हैं। तो वो प्रायश्चित का पाठ
किसी को ख्याल नहीं।

00:37:28.920 --> 00:37:39.416
तो आपस-आपस में चर्चा हुई कि एक माघनन्दि
आचार्य (हैं), उनके पास ये विद्या है, पाठ है।
तो किसी ने कहा कि वो तो हो गया कुम्हार,

00:37:39.440 --> 00:37:46.856
वो तो गृहस्थ हो गया। सम्यग्दर्शन तो रह गया।
सम्यकत्व नहीं गया था, ध्यान रखना। हाँ!

00:37:46.880 --> 00:37:57.056
सम्यग्दर्शन का घातक वो परिणाम नहीं है।
चारित्र का घातक जरूर है।
चारित्र गया और सम्यग्दर्शन रहा।

00:37:57.080 --> 00:38:06.296
तो आया मुनि कि एक हमारी विनती है कि
प्रायश्चित का पाठ हम नहीं जानते। अच्छा!

00:38:06.320 --> 00:38:21.056
आज तक हमारा नाम (चलता है)? बस! वैराग्य आ गया।
मोर-पिच्छी, कमंडल लेकर भागे। छोकरी रोने लगी।
अभी हमारा राग पूरा हो गया, ख़तम। समझे?

00:38:21.080 --> 00:38:28.016
यानि दो विभाग अलग हैं। वो दो विभाग
जीव को ख्याल में नहीं आता है।

00:38:28.040 --> 00:38:34.576
श्रद्धा का गुण और चारित्र का दोष,
ये साथ में ही रहते हैं,

00:38:34.600 --> 00:38:40.840
साथ में ही रहते हैं। एकत्व नहीं होता है।
साथ-साथ में श्रद्धा का गुण और चारित्र
का दोष, साथ में ही रहता हैं।

00:38:40.940 --> 00:38:48.256
दो गुण अलग हैं, दो गुण की योग्यता अलग है,
दो गुण का निमित्त भी अलग-अलग है। आहाहा!

00:38:48.280 --> 00:39:01.296
एक दफ़े गुरुदेव बैठे थे और तो एक भाई आया
और (कहा) कि आप पुण्य नहीं करने का कहते हो,
तो सब पाप में चले जायेंगे।

00:39:01.320 --> 00:39:09.136
मैं बैठा था, साथ में, पास में। मैंने उस भाई
को कहा कि पुण्य से धर्म मानना छुड़ाते हैं।

00:39:09.160 --> 00:39:20.136
पुण्य छोड़ने की बात इधर है ही नहीं।
पुण्य से धर्म मानने की मान्यता को छुड़ाते हैं।
विपरीत-श्रद्धा का त्याग कराते हैं।

00:39:20.160 --> 00:39:29.416
पुण्य छोड़ो, ऐसा उपदेश नहीं है।
(पुण्य को) करता (ही) नहीं है, तो छोड़े कौन?
करता भी नहीं ,है तो छोड़ता कौन है? आहाहा!

00:39:29.440 --> 00:39:40.776
जानता है। आता है, तो जानता है और जाता है, तो 
जानता है और आत्मा टिकता है, उसको भी जानता है।

00:39:40.800 --> 00:39:50.056
टिकनेवाले को ही जानता है। कोई आवे और 
कोई जावे, उसको भी जानता है। 
आत्मा में रहता है ज्ञानी तो, ऐसी बात है।

00:39:50.080 --> 00:39:58.176
कोई जैनदर्शन में छूट नहीं है। पुण्य 
छोड़कर पाप का उपदेश तो है ही नहीं।

00:39:58.200 --> 00:40:06.776
पुण्य से धर्म मानना छोड़ दो। पुण्य तो 
साधक को भी, मुनिराज को, पाँच 
महाव्रत आता है, वो पुण्य-तत्त्व है।

00:40:06.800 --> 00:40:12.416
वो पुण्य-तत्त्व है कि नहीं? मगर वो पाँच-महाव्रत 
बंध का कारण है, ऐसा जानता है।

00:40:12.440 --> 00:40:16.616
वो संवर-निर्जरा का कारण नहीं है, 
ऐसा जानता है। समझे?

00:40:16.640 --> 00:40:21.576
मुमुक्षु:- तीर्थंकर को क्यों नहीं आता 
पाँचवा गुणस्थान? तीर्थंकर को पाँचवा 
गुणस्थान क्यों नहीं आता?

00:40:21.600 --> 00:40:29.616
उत्तर:- तीर्थंकर को? पाँचवा गुणस्थान 
आ जाता है, उसमें क्या है? चौथा, पहले चौथा आता है, 
बाद में पाँचवे में ही रहते हैं।

00:40:29.640 --> 00:40:33.296
मुमुक्षु:- नहीं पाँचवे में नहीं रहते?
मुमुक्षु:- नहीं आठ वर्ष के बाद पाँचवा हो जाता है।

00:40:33.320 --> 00:40:41.616
उत्तर:- आठ वर्ष के बाद पाँचवा हो 
जाता है। आठ वर्ष तक तो चौथा 
रहता है, अविरत सम्यग्द्रष्टि।

00:40:41.640 --> 00:40:51.576
तीर्थंकर आठ वर्ष (के) हुये, आठ वर्ष के 
बाद (उनको) पंचम गुणस्थान आ जाता है।

00:40:51.600 --> 00:41:01.176
मुमुक्षु:- पुराण पढ़कर देखो। पुराण में आता है।
मुमुक्षु:- पुराण में लिखा है, चौथे में आकर जम्प 
मारते हैं, छट्ठे में सीधे निकल जाते हैं। महान 
पुरुषों की महानता है, पाँचवें में नहीं आते हैं।

00:41:01.200 --> 00:41:12.016
उत्तर:- ये तो किसी-किसी को ऐसा होता है।
मुमुक्षु:- तीर्थंकर के बारे में ऐसा लिखा है और 
किसी के बारे में नहीं।

00:41:12.040 --> 00:41:20.376
उत्तर:- तीर्थंकर! कोई जीव, सामान्य जीव, चौथा में से चढ़कर छठवें-सातवें 
में आ सकता है, कोई उसमें बाधा नहीं है।

00:41:20.400 --> 00:41:27.896
बाकी तीर्थंकर को आठवें वर्ष के बाद 
पंचम गुणस्थान आता है, ऐसा 
प्रथमानुयोग में लिखा है। पढ़ लेना।

00:41:27.920 --> 00:41:35.856
मुमुक्षु:- परम कृपालु श्री सद्गुरुदेवनो जय हो!