﻿WEBVTT

00:01:05.640 --> 00:01:25.816
ज्ञायक आत्मा और जो रागादि विकृतभाव हैं,
उसके भेदज्ञान के लिए तो बहुत गाथा आती हैं।

00:01:25.840 --> 00:01:45.816
बहुत जगह पर ज्ञान भिन्न और राग भिन्न (आया है)। वो पट्टी
लगाया था ना, पहले दिन, ज्ञान भिन्न और राग
भिन्न, वो एक प्रकार का भेदज्ञान का मंत्र है।

00:01:45.840 --> 00:02:01.456
इससे ज़रा विशेष सूक्ष्म अतींद्रिय ज्ञानमय
भगवान आत्मा और ज्ञेयभूत इंद्रियज्ञान,

00:02:01.480 --> 00:02:20.576
ज्ञानमय आत्मा और ज्ञेयभूत इंद्रियज्ञान अर्थात्
अतींद्रिय ज्ञानमय आत्मा और इन्द्रियज्ञान,

00:02:20.600 --> 00:02:33.016
उन दो के बीच में भेदज्ञान की
गाथायें शास्त्र में भी कम आती हैं।
बहुत कम, बहुत कम आती हैं।

00:02:33.040 --> 00:02:50.896
वैसे तो १५ गाथा में भी आया है, थोड़ा, आविर्भाव-
तिरोभाव के रूप में, ३१ मीं गाथा में भी है
और ४९ गाथा में भी समयसार में है।

00:02:50.920 --> 00:03:01.216
ऐसे प्रवचनसार में भी इंद्रियज्ञान वो जड़ है,
अचेतन है, आकुलता को उत्पन्न करनेवाला है।

00:03:01.240 --> 00:03:07.776
वह आत्मा का त्रिकालस्वभाव भी नहीं है
और क्षणिकस्वभाव भी नहीं है

00:03:07.800 --> 00:03:28.936
और अलिंगग्रहण की १७२ गाथा में भी
प्रथम दो बोल हैं कि ये आत्मा है, वो
इंद्रियज्ञान के द्वारा पर को जानता ही नहीं है।

00:03:28.960 --> 00:03:44.536
पर को जानने के लिए इंद्रियज्ञान साधन
नहीं है। वो ही इंद्रियज्ञान आत्मा को
जानने के लिए भी साधन नहीं है।

00:03:44.560 --> 00:04:04.016
इसलिए सचमुच, सम्यक् प्रकार से देखा जाए तो,
इंद्रियज्ञान में स्वपरप्रकाशक का अभाव है,

00:04:04.040 --> 00:04:14.216
तो भी, इंद्रियज्ञान में स्वपरप्रकाशक
का प्रतिभास तो होता है।

00:04:14.240 --> 00:04:25.616
क्या कहा? जैसे पहले कहा कि शुध्दात्मा
और राग भिन्न है, वो बात तो बहुत आती है।

00:04:25.640 --> 00:04:35.496
मगर हमारे पिताजी फ़रमाते थे कि
ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान करो।

00:04:35.520 --> 00:04:49.176
ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान करो, अर्थात्
अतींद्रिय ज्ञानमय भगवान आत्मा और
भावेन्द्रिय खंडज्ञान, उसका नाम खंडज्ञान है।

00:04:49.200 --> 00:04:54.056
अखंडज्ञान और खंडज्ञान, दो भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं।

00:04:54.080 --> 00:05:10.736
सचमुच भावेन्द्रिय खंडज्ञान, वो त्रिकाली
शुद्धात्मा ही नहीं है, स्वभाव नहीं है
और आत्मा का परिणाम भी नहीं है।

00:05:10.760 --> 00:05:27.096
जैसे रागादि आत्मा का परिणाम नहीं है,
क्योंकि राग आत्मा के आश्रय से
नहीं होता है, इसलिए राग भिन्न है।

00:05:27.120 --> 00:05:37.936
वह राग आत्मा का लक्षण नहीं है
इसलिए आत्मा को प्रसिद्ध नहीं करता है,
इसलिए राग भिन्न है।

00:05:37.960 --> 00:05:49.056
और राग आत्मा से कथंचित् अभिन्न भी नहीं
होता है, इसलिए राग आत्मा से भिन्न है।

00:05:49.080 --> 00:06:12.096
ऐसे जो पराश्रित इंद्रियज्ञान प्रगट होता है, वह
आत्मा के आश्रय से प्रगट नहीं होता है, इंद्रियज्ञान।
अतींद्रियज्ञान तो आत्मा के आश्रय से प्रगट होता है।

00:06:12.120 --> 00:06:21.096
इंद्रियज्ञान का अवलंबन आत्मा नहीं है।
इन्द्रियज्ञान का अवलंबन परपदार्थ है।

00:06:21.120 --> 00:06:31.876
अंदर में द्रव्येंद्रिय है और बाहर में नोकर्म है,
इसलिए इंद्रियज्ञान आत्मा के आश्रय से नहीं होता है।

00:06:31.900 --> 00:06:43.296
इसलिए इंद्रियज्ञान आत्मा का परिणाम नहीं है।
और इंद्रियज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध नहीं करता है,

00:06:43.320 --> 00:06:59.016
इसलिए भी वह आत्मा का परिणाम नहीं है। और
इंद्रियज्ञान आत्मा से अनन्य नहीं होता है, इसलिए
भी वो इंद्रियज्ञान आत्मा का परिणाम नहीं है।

00:06:59.040 --> 00:07:13.616
ऐसे सूक्ष्म भेदज्ञान की बात...अभी तो गुरुदेव का
वियोग हो गया। उन्होंने तो सब बात बता दिया है।

00:07:13.640 --> 00:07:32.056
उनका बताया हुआ जो तत्त्व (है), हम उसको
बार-बार घूँटते हैं, चिंतवन करते हैं।
जो उनका अनंत, अपने ऊपर उनका उपकार है।

00:07:32.080 --> 00:07:49.496
सज्जन उपकार को भूलता नहीं है। आहाहा!
तो अतींद्रिय ज्ञानमय भगवान आत्मा से
इंद्रियज्ञान, शास्त्रज्ञान भिन्न है।

00:07:49.520 --> 00:07:55.816
डॉक्टर कहाँ गया? बैठा है कि नहीं? आया नहीं?

00:07:55.840 --> 00:08:10.776
यह वकालत का ज्ञान, डॉक्टर का ज्ञान,
इंजीनियर का ज्ञान, ओहो! वो तो दूर रहो,
वो तो दूर रहो, वो तो कुमति-कुश्रुत है।

00:08:10.800 --> 00:08:25.456
मगर शास्त्र के लक्ष्य से हुआ इंद्रियज्ञान,
जो आत्मा को तिरोभूत करके प्रगट होता है,
वह भी कुमति और कुश्रुत है।

00:08:25.480 --> 00:08:46.296
जो ज्ञान जिसका है, उसको प्रगट न करे और
जो ज्ञान जिसका नहीं है, उसको प्रसिद्ध करे,
तो ज्ञान नहीं है, अज्ञान है। आहाहा!

00:08:46.320 --> 00:08:59.696
तो अतींद्रिय ज्ञानमय भगवान आत्मा और
ज्ञेयभूत इंद्रियज्ञान, उन दोनों के बीच में
भेदज्ञान की यह गाथा आई है।

00:08:59.720 --> 00:09:19.816
जैसे रागादि, भावक का भाव है, ज्ञायक का भाव (नहीं)।
व्यवहार रत्नत्रय का परिणाम, वह ज्ञायक का भाव
नहीं है। जाति जुदी है। वह भावक का भाव है।

00:09:19.840 --> 00:09:36.176
भावक यानि जो कर्म है, द्रव्यकर्म, वह भावक है।
उसके संबंध से उत्पन्न होनेवाला भाव, उसका
स्वामी, भावक यानि पुद्गल उसका स्वामी है।

00:09:36.200 --> 00:09:49.656
आत्मा चैतन्यमूर्ति जड़ का स्वामी होता नहीं है।
स्व-स्वामी संबंध राग के साथ आत्मा को नहीं है।
आहाहा! वह भावक का भाव है।

00:09:49.680 --> 00:10:03.336
ऐसे इंद्रियज्ञान, पाँच इंद्रिय और छठवाँ मन,
भावेन्द्रिय, वो ज्ञेय का भाव है,
ज्ञायक का भाव नहीं है।

00:10:03.360 --> 00:10:10.576
ज्ञेय का भाव कहा, कहना पड़ा,
मगर सचमुच (तो वो) अपने आप ही ज्ञेय हैं।

00:10:10.600 --> 00:10:21.416
वो ध्येय तो नहीं है, मगर
सचमुच ज्ञेय भी नहीं है।

00:10:21.440 --> 00:10:25.776
ध्येय तो ध्रुव परमात्मा है

00:10:25.800 --> 00:10:34.016
और ज्ञेय, भेद अपेक्षा से निश्चय मोक्षमार्ग है,
अभेद अपेक्षा से तो आत्मा ही
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय है

00:10:34.040 --> 00:10:48.176
और इंद्रियज्ञान तो पराया भाव है।
जैसे राग पराया भाव है, ऐसे इंद्रियज्ञान पराया
भाव है, स्वभाव, स्वभाव भाव नहीं है।

00:10:48.200 --> 00:11:07.056
तो जहाँ तक इंद्रियज्ञान जिंदा रहता है, जीवित
रहता है अर्थात् इंद्रियज्ञान को जीव ज्ञान
मानता है, तहाँ (वहाँ) तक मोह का क्षय नहीं होता।

00:11:07.080 --> 00:11:14.216
मिथ्यात्व का नाश नहीं होता। यह छुपा चोर है।

00:11:14.240 --> 00:11:25.416
जैसे मुंबई में पहले तो सुना था कि
ऊंदर (चूहा) बहुत होता था, ऊंदर, चूहा, चूहा।

00:11:25.440 --> 00:11:32.896
तो रात को सब सो जावे ना, तो वो चूहा
उसको फूँक-फूँककर खाता है।

00:11:32.920 --> 00:11:48.016
फूँक लगावे, फूँक समझे? बाद में काटे, तो वो
जागे ही नहीं। आहाहा!....काट जाए, फजल में
उठे, यह क्या हो गया पैर में?

00:11:48.040 --> 00:12:03.136
तो चूहा काटा, मगर खबर पड़ी नहीं है। समझे? ऐसे
इंद्रियज्ञान भगवान आत्मा को तिरोभूत करके
प्रगट होता है। वह दुश्मन है, मित्र नहीं है।

00:12:03.160 --> 00:12:10.856
आहाहा!
दुश्मन को मित्र मान लेना
बहुत धोखे की बात है।

00:12:10.880 --> 00:12:24.696
राग को तो दुश्मन मानते हैं क्योंकि राग आकुलता को
उत्पन्न करनेवाला है और कर्मबंध का कारण है और
कषाय भी है उसका नाम, कषाय तीव्र और मंद।

00:12:24.720 --> 00:12:37.696
मगर यह जो, भावेन्द्रिय, खंडज्ञान है, छुपा
घर का चोर है, अंदर में घुस गया है और
मोहराजा ने उसका नाम ज्ञान रखा (है)।

00:12:37.720 --> 00:12:50.656
मोहराजा ने उसका नाम ज्ञान रखा और
सर्वज्ञ भगवान ने उसका नाम ज्ञेय रखा।
ज्ञान नहीं है, मगर ज्ञेय है।

00:12:50.680 --> 00:13:05.216
जो जिसको ख्यालमें आ जावे कि वह ज्ञान
नहीं है, नाम-निक्षेप से ज्ञान है, भाव-निक्षेप
से तो ज्ञेय ही है। हेयरूप ज्ञेय है। आहाहा!

00:13:05.240 --> 00:13:18.536
ऐसी अद्भूत बात आचार्य भगवान, भेदज्ञान
की....अतींद्रिय ज्ञानमय प्रभु, विभु,
भगवान आत्मा अंदर विराजमान है

00:13:18.560 --> 00:13:32.936
और इंद्रियज्ञान के संबंध से उत्पन्न होनेवाला
जो भावेन्द्रिय खंडज्ञान, वह
आत्मा का परिणाम भी सचमुच नहीं है।

00:13:32.960 --> 00:13:51.696
द्रव्यसंग्रह में तो, बृहदद्रव्यसंग्रह में तो ऐसा
आता है कि जैसे रागादि भावकर्म हैं, असद्भूत
व्यवहारनय का विषय, ऐसे इंद्रियज्ञान भी भावकर्म है।

00:13:51.720 --> 00:14:00.936
वो कर्म की जाति है, ज्ञान-चेतना की जाति नहीं है।
कर्मधारा है, यह ज्ञानधारा नहीं है। आहाहा!

00:14:00.960 --> 00:14:21.256
जैसे राग कर्मधारा, ऐसे इंद्रियज्ञान भी कर्मधारा।
भावकर्म में गया वो। भावकर्म है, आत्मा का
कर्म नहीं है। आहाहा! ऐसे। हें? विपरीत है।

00:14:21.280 --> 00:14:39.936
ऐसे अपूर्व बात ये ३१वीं गाथा में आचार्य
भगवान हमको समझाते हैं। हम सब
समझने की कोशिश करें, तो अपना हित हो जाए।

00:14:39.960 --> 00:15:00.056
<b>टीका:- अनादि अमर्यादरूप</b>
अनादि, अनादि, अनादिकाल गया। आहाहा!

00:15:00.080 --> 00:15:16.496
अनंत, अनंतकाल बीते भूतकाल में।
लुहाड़िया जी आ गये? अच्छा।
अनंत, अनंतकाल बीते भूतकाल में, आहाहा!

00:15:16.520 --> 00:15:32.856
<b>अनादि अमर्यादरूप</b> उसकी मर्यादा (नहीं है)। उसकी सादि
नहीं, अनादि से है, मगर अंत होवे ऐसा धर्म है उसका।
अनादि-अनंत नहीं है क्योंकि विभाव है।

00:15:32.880 --> 00:15:39.136
विभाव अनादि से होने पर भी अनादि-शांत होता है।

00:15:39.160 --> 00:15:42.936
अनादि-अनंत नहीं होता है।

00:15:42.960 --> 00:15:53.016
तो <b>अनादि अमर्यादरुप बन्धपर्यायके
वश</b> यानि इंद्रियज्ञान को ज्ञान
मानना, आहाहा! वो अज्ञान है।

00:15:53.040 --> 00:16:10.736
इंद्रियज्ञान को ज्ञान मानना, वह अज्ञान है।
आहाहा! क्योंकि वह ज्ञान है ही नहीं,
वो तो ज्ञेय है, ज्ञान नहीं है।

00:16:10.760 --> 00:16:23.016
<b>अमर्यादरुप बन्धपर्यायके वश</b>
उपादेय मान लिया, थोड़ा शास्त्र का ज्ञान
आ गया, अहम् हो जाता है। आहाहा!

00:16:23.040 --> 00:16:32.936
जैसे कषाय की मंदता से अहम् आता है,
सबको नहीं, कोई-कोई को। सबकी बात नहीं है।
समझे?

00:16:32.960 --> 00:16:40.736
कषाय की मंदता में भी अहम् आ जाता है,
तो जीवको सम्यग्दर्शन होता नहीं है,

00:16:40.760 --> 00:16:50.416
क्योंकि उससे मेरा मोक्ष हो जाएगा ऐसा
मानता है, मिथ्यात्व पुष्ट हो जाता है।

00:16:50.440 --> 00:17:00.856
ऐसे शास्त्र का ज्ञान, उघाड़ हो गया, थोड़ा न्याय,
व्याकरण, संस्कृत पढ़ लिया, आहाहा!

00:17:00.880 --> 00:17:11.536
गाथा ५, ५०, १००, २००, ५०० मुखपाठ हो गईं,
आहाहा! तो फ़रमाते हैं कि भैया!

00:17:11.560 --> 00:17:23.496
तू इससे ठगा गया है।
छेतराणो छुं क्या? ठगा गया है।
वो तेरा स्वरूप नहीं है।

00:17:23.520 --> 00:17:34.656
<b>बन्धपर्यायके वश</b> यानि भाव-बंध के वश
यानि इन्द्रियज्ञान (को) उपादेय माना, उसका नाम भाव-बंध है।

00:17:34.680 --> 00:17:41.176
शुद्धात्मा उपादेय होने के बाद
इंद्रियज्ञान हो, तो-तो वो भिन्न जानते हैं।

00:17:41.200 --> 00:17:50.176
अंतर्मुख होकर अतींद्रियज्ञान के द्वारा शुद्धात्मा
को जाना और इंद्रियज्ञान भी रहा,
इंद्रियज्ञान भी (रहा)।

00:17:50.200 --> 00:18:00.336
आहाहा! मगर निर्जीव हो गया वो,
उसमें जीवन, प्राण नहीं रहा।
वो तो मुर्दा हो गया। आहाहा!

00:18:00.360 --> 00:18:20.016
अभिप्राय का सहयोग खिसक गया उसमें से। अभिप्राय का
दोष था ना। अभिप्राय का दोष, श्रद्धा का दोष बड़ा
दोष है। राग होने पर भी अभिप्राय सही हो जाता है।

00:18:20.040 --> 00:18:36.256
राग मेरा स्वभाव नहीं है, मैं तो चिदानंद आत्मा हूँ,
ऐसे भेदज्ञान करने के बाद भी राग तो थोड़े काल
आता भी है, मगर अपना स्वभाव जानता नहीं है।

00:18:36.280 --> 00:18:55.856
ऐसे एक दफ़े अतींद्रिय ज्ञानमय भगवान आत्मा और
इंद्रियज्ञान, उसके बीच में प्रज्ञाछैनी डाले... प्रज्ञा यानि
अतींद्रियज्ञान एक नया प्रगट होता है, वो जात्यान्तर ज्ञान है।

00:18:55.880 --> 00:19:04.496
अनादिकाल से प्रगट हुआ नहीं, अनादि
मिथ्यादृष्टि के लिए यह बात है,
सादि मिथ्यादृष्टि की बात तो (है नहीं)।

00:19:04.520 --> 00:19:09.776
अनादि मिथ्यादृष्टि, अनादि लिया ना। आहाहा!

00:19:09.800 --> 00:19:22.176
अनादि मिथ्यादृष्टि जीव की बात चलती है
कि भेदज्ञान करके अनुभव किया और
इंद्रियज्ञान और अतींद्रियज्ञान को जुदा जान लिया,

00:19:22.200 --> 00:19:32.176
जुदा अनुभव कर लिया। अनुभव करने के
बाद सविकल्पदशा आती है और
शास्त्र तरफ लक्ष्य जाता है। आहाहा!

00:19:32.200 --> 00:19:36.016
आत्मा का लक्ष्य नहीं जाता है (शास्त्र पर),
इंद्रियज्ञान का लक्ष्य जाता है।

00:19:36.040 --> 00:19:42.656
शास्त्र का लक्ष्य करनेवाला आत्मा नहीं है।
आत्मा तो आत्मा का लक्ष्य करनेवाला है।

00:19:42.680 --> 00:19:49.776
जो आत्मा का लक्ष्य करे, वो परिणाम आत्मा का है,
जो शास्त्र का लक्ष्य करे, वह परिणाम आत्मा का
(नहीं है)। आहाहा!

00:19:49.800 --> 00:19:59.216
ऐसे भेदज्ञान हो जाता है,
इंद्रियज्ञान भी रह जाता है,
शास्त्रज्ञान भी रह जाता है।

00:19:59.240 --> 00:20:08.496
जैसे राग रहता है, ऐसे इंद्रियज्ञान भी रह जाता है
क्योंकि जहाँ तक केवलज्ञान नहीं हो, तहाँ  तक (इंद्रियज्ञान है)।
आहाहा!

00:20:08.520 --> 00:20:16.856
एक समय की ज्ञान की पर्याय, पर्याय एक,
समय एक, इसका दो भाग पड़ जाता है।

00:20:16.880 --> 00:20:26.696
स्वाश्रित में अतींद्रियज्ञान और परावलंबी इंद्रियज्ञान।
समय एक, पर्याय एक, एक पर्याय का दो भाग पड़ता है।

00:20:26.720 --> 00:20:35.456
तो भले इंद्रियज्ञान रहे,
ज्ञान का ज्ञेयरूप भले रहे,
मगर यह मेरा भाव (नहीं है)।

00:20:35.480 --> 00:20:42.376
जैसे राग मेरा स्वभाव भाव नहीं है।
आहाहा! बँटवारा हो गया, क्या कहा?

00:20:42.400 --> 00:20:58.376
जैसे दो भागीदार हों, जहाँ तक बँटवारा न हो, तहाँ
तक चिंता रहती है। क्या होगा? क्या होगा? समझे? हाँ!
बँटवारा। आहाहा! स्टैम्प के कागज़ पर बँटवारा हो गया।

00:20:58.400 --> 00:21:07.496
आहाहा! कि राग भिन्न और आत्मा भिन्न।
ऐसे इंद्रियज्ञान भिन्न और अतींद्रियज्ञानमय
प्रभु, विभु, भगवान आत्मा भिन्न है।

00:21:07.520 --> 00:21:16.576
ऐसा अतींद्रियज्ञान के द्वारा, अतींद्रियज्ञान छैनी है,
प्रज्ञाछैनी। वो इंद्रियज्ञान और अतींद्रियज्ञान से
जुदा पाड़ती है। आहाहा!

00:21:16.600 --> 00:21:27.976
तो (जुदा) पाड़ने के बाद, इंद्रियज्ञान तो रहता है थोड़े टाइम,
केवलज्ञान न हो तहाँ तक। ऐसे राग, यथाख्यात चारित्र न हो,
तहाँ तक रहता है। आहाहा!

00:21:28.000 --> 00:21:33.056
वो सम्यग्दर्शन में बाधक नहीं है,
सम्यग्दर्शन में बाधक नहीं है।

00:21:33.080 --> 00:21:44.616
ज्ञान, केवलज्ञान में बाधक है। इंद्रियज्ञान केवलज्ञान में
बाधक है और राग यथाख्यात चारित्र में (बाधक है)।
है तो बाधक ही, दोनों हैं तो बाधक, साधक नहीं हैं।

00:21:44.640 --> 00:22:00.336
क्या कहा? अनुभव के बाद इंद्रियज्ञान रहता है, थोड़े टाइम के लिए।
उसका आयुष्य तो अभी अल्प रहा है, पर (लेकिन) रहा है।

00:22:00.360 --> 00:22:06.336
जहाँ तक केवलज्ञान न हो, तहाँ तक
वो केवलज्ञान में बाधक तत्त्व है।

00:22:06.360 --> 00:22:32.896
ऐसे थोड़ा राग अल्प रहता है, अस्थिरता का, साधक को भी।
आहाहा! वो राग यथाख्यात चारित्र में बाधक है, मगर सम्यग्दर्शन में
बाधक होता (नहीं है)। आहाहा! ऐसा स्वरूप है। आहाहा!

00:22:32.920 --> 00:22:49.256
सम्यग्दर्शन, वो (उसको) कोई बाधक नहीं है।
जो विपरीत दृष्टि आवे, तो बाधक है।
अविपरीत दृष्टि रहती है, तो बाधक (नहीं है)। आहाहा!

00:22:49.280 --> 00:23:06.696
सम्यग्दर्शन में बाधक नहीं है। इंद्रियज्ञान और राग,
राग और इंद्रियज्ञान का जो प्रेम आ जावे, अधिकता आ जावे
तो बाधक हो जाता है, तो सम्यग्दर्शन टिकता नहीं है।

00:23:06.720 --> 00:23:13.296
शुद्धनय ग्रहण करे (तो) मोक्ष, तजे (तो) बंध है। आहाहा!

00:23:13.320 --> 00:23:23.856
ऐसे <b>अनादि अमर्यादरूप बन्धपर्यायके वश
जिसमें समस्त स्व-परका विभाग अस्त हो गया है।</b>

00:23:23.880 --> 00:23:38.936
"मैं अतींद्रिय ज्ञानमय भगवान आत्मा हूँ" और "ये
इंद्रियज्ञान वो मेरा है" वो दो के बीच में भिन्नता
होने पर भी, उसका विभाग अस्त हो गया है।

00:23:38.960 --> 00:23:49.576
इंद्रियज्ञान की अधिकता से, प्रेम से, उपादेयबुद्धि से,
कर्ता का कर्म मानने से, कर्ता का कर्म नहीं है,
वो तो ज्ञान का ज्ञेय है।

00:23:49.600 --> 00:23:54.616
मगर कर्ता का कर्म मानता है, तो भेदज्ञान अस्त हो जाता है।

00:23:54.640 --> 00:24:05.856
है तो भिन्न-भिन्न, अतींद्रिय ज्ञानमय भगवान आत्मा
और इंद्रियज्ञान खंडज्ञान,
अखंड और खंड भिन्न-भिन्न ही हैं।

00:24:05.880 --> 00:24:10.896
अखंड, खंड में नहीं आता और
खंड, अखंड में नहीं आता है। आहाहा!

00:24:10.920 --> 00:24:21.536
तो <b>जिसमें समस्त स्व-परका विभाग</b> यानि जुदाई,
<b>विभाग</b> यानि जुदाई <b>अस्त हो गया है,</b> दिखाई नहीं देता है।

00:24:21.560 --> 00:24:33.296
इंद्रियज्ञान का, शास्त्रज्ञान का प्रेम अहम् हो गया,
ज्ञान का मद हो जाता है। मद का प्रकार है ना।
आहाहा! हें? ज्ञानमद है भैया!

00:24:33.320 --> 00:24:56.456
कषाय की मंदतावाला तो कभी बच जाता है, कोई ज्ञानी
मिले तो कि भाई! ये तेरा स्वभाव (नहीं है)। मगर, आहाहा!
पंडित हो गया, "मैं जानता हूँ" (ऐसा मानता है), वह मर जाता है।

00:24:56.480 --> 00:25:10.336
भाई! हमारे पास पहले नहीं (था),
अभी तो ज्ञान बहुत बढ़ गया है।
अरे! ज्ञान का उत्पाद ही नहीं हुआ तो बढ़ता कहाँ से है?

00:25:10.360 --> 00:25:20.656
बढ़ने की बात कहाँ आई?
तू क्या बोलता है? क्या बकता है तू?

00:25:20.680 --> 00:25:37.176
अतींद्रियज्ञान जब प्रगट होता है, वो बढ़ते-बढ़ते
केवलज्ञान होता है, वो तो बराबर है।
मगर इंद्रियज्ञान वो ज्ञान ही नहीं है। आहाहा!

00:25:37.200 --> 00:25:43.856
वो उत्पन्न ही नहीं हुआ, तो
बढ़ने की बात (कहाँ से आई)? आहाहा!

00:25:43.880 --> 00:25:59.656
जैसे लक्ष्मी का ढेर हो गया, अभिमान हो जाता है।
ऐसे ज्ञेय का ढेर हो गया, ज्ञान का नहीं ज्ञेय का ढेर
हो गया। उसमें अभिमान करके ये भव हार जाता है।

00:25:59.680 --> 00:26:07.656
आहाहा! मनुष्य भव (हार जाता है), परिग्रह है।
आहाहा! इंद्रियज्ञान परिग्रह है। आहाहा!

00:26:07.680 --> 00:26:16.496
मूर्छा परिग्रहः मूर्छा (परिग्रहः)।
ये इन्द्रियज्ञान मेरा है, मूर्छित हो गया,
वो परिग्रह है।

00:26:16.520 --> 00:26:26.416
उसने इंद्रियज्ञान को पकड़ लिया और
भगवान आत्मा को छोड़ दिया।
अपमान कर दिया आत्मा का।

00:26:26.440 --> 00:26:40.056
ऐसे <b>स्व-परका विभाग अस्त हो गया है</b>।
अनादि से अस्त तो विभाग हो गया है,
मगर भेदज्ञान से आत्मा का उदय होता है।

00:26:40.080 --> 00:26:58.496
<b>(अर्थात् जो आत्माके साथ ऐसी
एकमेक हो रही है कि भेद दिखाई नहीं देता)</b>,
द्रव्येंद्रियकी बात पहले करते हैं।

00:26:58.520 --> 00:27:07.056
पहले बात द्रव्येंद्रिय (कि)। द्रव्येंद्रिय और आत्मा
एकमेक जैसा लगता है, भेद अस्त हो गया है।

00:27:07.080 --> 00:27:25.576
द्रव्येंद्रिय, ये स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द,
छठवाँ मन, ऐसे जो द्रव्येंद्रिय पुद्गल की रचना है,
वो चेतन की रचना, ये नहीं है। प्योर (pure) पुद्गल है,

00:27:25.600 --> 00:27:34.496
प्योर। समझे ना? कोई मिलावट (नहीं),
थोड़ा चेतन और थोड़ा जड़, मिश्र हुआ, ऐसा नहीं है।

00:27:34.520 --> 00:27:45.776
ये द्रव्येंद्रिय जड़ है, जड़ परमाणु से बना
हुआ पिंड है। वो दो के बीच में भेदज्ञान
नहीं है, तो अस्त हो गया है।

00:27:45.800 --> 00:28:02.496
द्रव्येंद्रिय भिन्न और आत्मा भिन्न, मालूम नहीं होता है। तो <b>अर्थात् जो आत्माके
साथ ऐसी एकमेक हो रही है</b> यानि भ्राँति हो रही है। एकमेक हो रही नहीं है,
एकमेक जैसी लगती है, वह तो भ्राँति है।

00:28:02.520 --> 00:28:14.816
जड़-चेतन एक होता नहीं है
<b>कि भेद दिखाई नहीं देता।</b>
जुदाई होने पर भी उसकी जुदाई मालूम नहीं होती है

00:28:14.840 --> 00:28:22.016
क्योंकि कान हो तो सुन सकते हैं,
आँख हो तो देख सकते हैं।
अच्छा!

00:28:22.040 --> 00:28:32.976
जो आँख न हो और कान न हो तो कोई देख सके नहीं,
जान सके नहीं। तो सिद्ध भगवान के पास तो द्रव्येंद्रिय
है ही नहीं, तो क्या वे जानते नहीं हैं? आहाहा!

00:28:33.000 --> 00:28:49.856
ये जानने का साधन ही नहीं है।
इंद्रियज्ञान पर को जानने के लिए साधन नहीं है।
स्व और पर को जानने के लिए अतींद्रियज्ञान साधन है।

00:28:49.880 --> 00:29:05.296
तो-तो सब व्यवहार का लोप हो जाएगा।
व्यवहार का पक्ष चले जाएगा और व्यवहार आ जाएगा।
घबराना नहीं, घबराने की बात नहीं है। आहाहा!

00:29:05.320 --> 00:29:13.856
समस्त ऐसे भेद दिखाई नहीं देता,
<b>ऐसी शरीरपरिणामको प्राप्त।</b>

00:29:13.880 --> 00:29:21.176
ये अव्यवी है ना, सारा शरीर, उसका एक अव्यव है,
भाग है। आँख है ना ये स्पेयर पार्ट (spare part) है।

00:29:21.200 --> 00:29:31.296
जैसे मोटर है, उसका स्पेयर पार्ट जुदा-जुदा होता है ना।
ऐसे अव्यवी पदार्थ है, सारा शरीर। उसका एक अव्यव,
अव्यव है। तो एक भाग है।

00:29:31.320 --> 00:29:44.016
जैसे स्पर्शइंद्रिय, रसइंद्रिय, द्रव्येंद्रिय, अभी
द्रव्येंद्रिय की बात, घ्राणइन्द्रिय, चक्षुइन्द्रिय और ये
श्रोतइन्द्रिय। ये पाँच द्रव्येंद्रियाँ हैं और छठवाँ मन, इधर।

00:29:44.040 --> 00:29:53.056
वो (मन) मनोवर्गणा से बना हुआ है।
ऑपरेशन से भी दिखाई देता (नहीं है)। ऐसा सूक्ष्म है!

00:29:53.080 --> 00:29:58.336
आहाहा! विचार इधर से (जहाँ मन है, वहाँ से) चलता है।
इधर से (ऊपर से) नहीं चलता है।

00:29:58.360 --> 00:30:08.836
मानसिक जो विचार उत्पन्न होता है, उसका निमित्त
का स्थान यहाँ (मन) है। निमित्त का स्थान इधर(मगज नहीं है)।

00:30:08.860 --> 00:30:20.536
मगज में ऐसा आया, मगज में से विचार आया,
मगज में से विचार आया। आहाहा!
वो निमित्तरूप है। द्रव्येंद्रिय निमित्तरूप है।

00:30:20.560 --> 00:30:28.336
मगर जहाँ तक वो निमित्त देखता है, तहाँ तक अज्ञानी है।
उसको ज्ञेय देखे, तो अज्ञान टल जाता है।

00:30:28.360 --> 00:30:35.376
क्या कहा? ये जगत में कोई निमित्त नहीं है।
जगत में सब ज्ञेय (ही) हैं।

00:30:35.400 --> 00:30:42.976
दृष्टांत तो दिया था आठकर्म निमित्त नहीं हैं।
बोलो! दृष्टांत नहीं दिया था? हें? आहाहा!

00:30:43.000 --> 00:30:51.016
सोनगढ़ का संत तो सबको ज्ञेय,
ज्ञेयरूप से जानता है,
निमित्तरूप से जानता नहीं है।

00:30:51.040 --> 00:30:55.696
अरे! निमित्त (को) नहीं माने तो
संसार का अभाव हो जाएगा।
हमको इष्ट है।

00:30:55.720 --> 00:31:08.136
वो तो इष्ट है इसलिए तो समयसार की रचना है।
(और) के ये चारगति की सिद्धि करने के लिए, पुष्टि करने के
लिए ये समयसार की रचना नहीं है। आहाहा!

00:31:08.160 --> 00:31:20.256
<b>ऐसी शरीरपरिणामको प्राप्त द्रव्येन्द्रियोंको तो</b>
जो जड़-इंद्रिय, द्रव्येंद्रिय है, उसको
तो, भेदज्ञान की बात चलती है।

00:31:20.280 --> 00:31:33.736
ज्ञायक प्रभु आत्मा और द्रव्येंद्रिय।
द्रव्येंद्रिय है, द्रव्येंद्रिय का अस्तित्व है। नहीं है,
ऐसा उसको काटकर अलोक में नहीं भेजना है।

00:31:33.760 --> 00:31:45.576
उसको उसके स्थान पर रहने दो। अपने को कोई अड़चन
है नहीं। मगर ये कान मेरा है, वो अज्ञानी हो गया। आहाहा!

00:31:45.600 --> 00:31:54.696
आत्मा को कान नहीं होता है,
आत्मा को द्रव्यचक्षु होता नहीं है। आहाहा!

00:31:54.720 --> 00:32:12.856
आत्मा को कान होवे तो कान से सुने, मगर कान है नहीं।
नाक भी नहीं है, नाक से सूँघता नहीं है पदार्थ।
ये जीभ नहीं है आत्मा को, तो रस चखता नहीं है।

00:32:12.880 --> 00:32:18.176
अभी ४९ गाथा के अनुसंधान में लेना है,
द्रव्येंद्रिय जीतने के लिये।

00:32:18.200 --> 00:32:29.776
<b>द्रव्येन्द्रियोंको तो निर्मल भेदाभ्यासकी प्रवीणतासे</b>
यानि द्रव्येंद्रिय भिन्न है और उसको
जाननेवाला भावेंद्रिय भी भिन्न है।

00:32:29.800 --> 00:32:34.056
उसके अलावा में त्रिकाल, त्रिकाल ज्ञानानंद परमात्मा हूँ,

00:32:34.080 --> 00:32:47.416
ऐसे निर्मल जुदाई करने के प्रयोग से
<b>भेदाभ्यासकी प्रवीणतासे प्राप्त अन्तरङ्गमें
प्रगट अतिसूक्ष्म चैतन्यस्वभावके</b>,

00:32:47.440 --> 00:33:07.296
आहाहा! अंदर भगवान प्रभु, विभु, प्रगट है
और प्रगट अतिसूक्ष्म। संवर, निर्जरा और मोक्ष तो
सूक्ष्म है, मगर ज्ञायकदेव अतिसूक्ष्म है।

00:33:07.320 --> 00:33:12.656
एक-एक शब्द की कीमत है, भावलिंगी संत की। आहाहा!

00:33:12.680 --> 00:33:31.896
<b>अतिसूक्ष्म चैतन्यस्वभावके अवलम्बनके बलसे
सर्वथा अपनेसे अलग किया</b>; सर्वथा, कथंचित् भिन्न
और कथंचित् अभिन्न, ऐसा है नहीं। सर्वथा भिन्न है।

00:33:31.920 --> 00:33:46.696
द्रव्येंद्रिय जब अंर्तमुख होकर (के) अपने अतिसूक्ष्म चैतन्य
प्रभु का लक्ष्य किया, अवलंबन लिया, तो अवलंबन लेते ही
ये मैं हूँ और ये मैं नहीं हूँ, ऐसा भेदज्ञान हो जाता है।

00:33:46.720 --> 00:33:57.176
एकत्वबुद्धि टूट जाती है। द्रव्येंद्रिय रह जाती है,
मगर द्रव्येंद्रिय में अहम् छूट जाता है
और जानने का साधन है, ऐसी मिथ्याभ्राँति टल जाती है।

00:33:57.200 --> 00:34:07.736
जानने का निमित्त कारण तो चाहिए ना! आहाहा!
निमित्ताधीन दृष्टिवाला निमित्त को शोधता है।
उपादान की स्वशक्ति को पहचानता नहीं है। आहाहा!

00:34:07.760 --> 00:34:21.856
आज तक कान से कोई ने देशनालब्धि सुनी ही नहीं है,
आहाहा! क्योंकि कान ही नहीं है। कहाँ से सुने?
वो तो ज्ञानमय पुंज आत्मा है।

00:34:21.880 --> 00:34:27.816
इससे भी सूक्ष्म थोड़ा आएगा
अभी भावेन्द्रिय में, इससे भी सूक्ष्म। आहाहा!

00:34:27.840 --> 00:34:40.936
मगर द्रव्येंद्रिय की जुदाई जिसको लगे,
उसको, ये भावेन्द्रिय जुदी ही है,
ये समझने के लिए उसका मिथ्यात्व गलता है,

00:34:40.960 --> 00:34:47.536
थोड़े ज्ञान की अंदर निर्मलता आती है
तो दूसरे नंबर का भेदज्ञान उसको जच जाता है।

00:34:47.560 --> 00:35:00.656
द्रव्येंद्रिय भिन्न है, आत्मा से। आहाहा!
वो जानने का साधन नहीं है। वो भिन्न साधन है।
भिन्न साधन, भेद साधन और अभेद साधन।

00:35:00.680 --> 00:35:16.816
भिन्न साधन, भेदरूप साधन और अभेदरूप साधन,
साधन के तीन प्रकार हैं। वो तो भिन्न है, तो
जानने का साधन द्रव्येंद्रिय (नहीं है)। आहाहा!

00:35:16.840 --> 00:35:31.056
<b>सर्वथा अपनेसे अलग किया;
सो वह द्रव्येन्द्रियोंको जीतना हुआ।</b>
ये ज्ञेय के तीन विभाग हैं,

00:35:31.080 --> 00:35:38.096
द्रव्येंद्रिय, भावेन्द्रिय और भावेन्द्रिय का
विषय, तीनों को इंद्रियाँ कहा।

00:35:38.120 --> 00:35:47.616
इंद्रिय, तीनों का नाम इंद्रियों अर्थात् तीनों ज्ञेय हैं।
ज्ञेय यानि परज्ञेय हैं,आहाहा! स्वज्ञेय नहीं हैं।

00:35:47.640 --> 00:35:55.936
जाति आत्मा की नहीं है, तीनों में।
तीनों में कोई जाति,
लक्षण आत्मा का दिखाई देता नहीं है।

00:35:55.960 --> 00:36:01.896
ऐसे उसका ४९वीं गाथा का थोड़ा आधार ले लेवें।

00:36:01.920 --> 00:36:14.856
अपने को थोड़ा टाइम है ना, टाइम है। थोड़ा
टाइम अपने को ज़्यादा मिला एक दिन का,
तो स्वाध्याय करें। उसमें क्या है?

00:36:14.880 --> 00:36:22.136
४९ गाथा है। उसका मथाला (शीर्षक) है।

00:36:22.160 --> 00:36:32.416
<b>अब शिष्य पूछता है कि यह अध्यवसानादि
भाव जीव नहीं हैं तो वह एक, टंकोत्कीर्ण,
परमार्थस्वरूप जीव कैसा है?</b>

00:36:32.440 --> 00:36:47.376
प्रश्न है, शुद्धात्मा कैसा है और
उसका लक्षण क्या है? दो प्रश्न आया। उसका लक्षण क्या है?
इस प्रकार इस प्रश्न का उत्तर आचार्य भगवान फ़रमाते हैं।

00:36:47.400 --> 00:36:59.016
<b>जीव चेतनागुण, शब्द-रस-रूप-गन्ध-व्यक्तिविहीन है,</b>
<b>निर्दिष्ट नहिं संस्थान उसका, ग्रहण नहिं है लिंगसे ।।४९।।</b>

00:36:59.040 --> 00:37:13.696
<b>टीका:- जीव निश्चयसे पुद्गलद्रव्यसे अन्य है</b>।
पुद्गलद्रव्य है, एक जीवद्रव्य और एक पुद्गलद्रव्य।

00:37:13.720 --> 00:37:26.216
ये आत्मा है, वह पुद्गलद्रव्य से भिन्न है।
कभी भिन्न होता (है)? सिद्ध होवे तब? अभी,
तीनोंकाल, तीनोंकाल (भिन्न है)। आहाहा!

00:37:26.240 --> 00:37:32.376
पुद्गलद्रव्य से भिन्न है।
भिन्न होगा ऐसा नहीं लिखा है, भिन्न है।

00:37:32.400 --> 00:37:45.416
<b>इसलिये उसमें रसगुण विद्यमान नहीं है</b>।
रस नाम का जो गुण है, वो आत्मा में नहीं है।
<b>अतः वह अरस है।१।</b>

00:37:45.440 --> 00:37:54.816
आत्मा चैतन्यरस तो है, मगर पुद्गल का रस,
खट्टा-मीठा रस उसमें नहीं है।

00:37:54.840 --> 00:38:07.696
<b>पुद्गलद्रव्यके गुणोंसे भी भिन्न होनेसे स्वयं भी
रसगुण नहीं है</b>। पुद्गलद्रव्य से भिन्न और पुद्गलद्रव्य
का रस नाम का गुण, उससे भी आत्मा भिन्न है।

00:38:07.720 --> 00:38:23.776
वो रस नामका जो गुण है, वो पुद्गल में है,
आत्मा में है नहीं, <b>इसलिए अरस है।२।</b> आहाहा!
द्रव्य से भिन्नता, गुण से भिन्नता, पर्याय से भिन्नता। आहाहा!

00:38:23.800 --> 00:38:32.256
ये तो भेदज्ञान की बंसी बजती है। आहाहा!
भेदज्ञान का मंत्र है।

00:38:32.280 --> 00:38:47.256
<b>परमार्थसे पुद्गलद्रव्यका स्वामित्व भी उसके नहीं है</b>।
आत्मा ऐसा तू देख, जो इस पुद्गल का स्वामी कभी हुआ नहीं है।

00:38:47.280 --> 00:38:53.776
<b>इसलिये वह द्रव्येन्द्रियके आलम्बनसे भी
रस नहीं चखता अतः अरस है।३।</b>

00:38:53.800 --> 00:39:02.776
ये जीभ का अवलंबन लेकर रस का ज्ञान
करनेवाला आत्मा नहीं है, क्योंकि आत्मा अरस है।

00:39:02.800 --> 00:39:13.576
ये द्रव्येंद्रिय का स्वामी नहीं है।
वो रस को जानने का ये साधन नहीं है।
साधन माना तो एकता हो गई। आहाहा!

00:39:13.600 --> 00:39:24.976
जानने का साधन तो ज्ञान है। आहाहा!
ये द्रव्येंद्रिय साधन नहीं है। आहाहा!
जीभ साधन नहीं है। आहाहा!

00:39:25.000 --> 00:39:36.336
<b>इसलिए वह द्रव्येंद्रियके आलंबनसे भी
रस नहीं चखता।</b> द्रव्येंद्रिय का आलंबन
लेनेकी ज़रूरत आत्मा को नहीं है।

00:39:36.360 --> 00:39:44.176
रस का ज्ञान करने के लिए, तेरे को
रस का, पुद्गल के रस का ज्ञान करना
हो ना, तो आत्मा को जान।

00:39:44.200 --> 00:39:52.016
तो पुद्गल का, रस का, लोकालोक का ज्ञान
भावश्रुत में अभी हो जाएगा। आहाहा!

00:39:52.040 --> 00:40:07.256
केवलज्ञान तो होगा तभी प्रत्यक्ष होगा, लेकीन अभी
लोकालोक का ज्ञान भावश्रुत में आ जाता है।
सब ज्ञेय उसमें (आ जाते हैं)। आहाहा! प्रतिभास होता है।

00:40:07.280 --> 00:40:14.296
आत्माको जाना उसने सबको जाना।
<b>नहीं चखता, इसलिए अरस है।४।</b>

00:40:14.320 --> 00:40:24.496
<b>अपने स्वभावकी दृष्टिसे देखा जाये तो</b>,
अभी वो दूसरा पॉइंट अभी इधर से भी लेंगे।
भावेन्द्रिय जब आवे ना, तब वो लेना है।

00:40:24.520 --> 00:40:30.536
वो भावेन्द्रिय का बोल इसमें है और
भावेन्द्रिय का बोल अभी इसमें आएगा।
बाद में मिलान करेंगे।

00:40:30.560 --> 00:40:42.096
अभी द्रव्येंद्रिय का भेदज्ञान हुआ। ३१वीं गाथा के
माध्यम से भेदज्ञान हुआ और ४९वीं गाथा के माध्यम से
भी द्रव्येंद्रिय का भेदज्ञान आचार्य भगवान ने कराया।

00:40:42.120 --> 00:40:54.296
अभी एक सूक्ष्म भावेन्द्रिय से भेदज्ञान (कराते हैं)।
भेदज्ञान एक जुदा, वो थोड़ा सूक्ष्म है।

00:40:54.320 --> 00:41:06.896
द्रव्येंद्रिय से वो थोड़ा सूक्ष्म है क्योंकि
द्रव्येंद्रिय तो मात्र बहिर्निमित्तभूत है।
वो तो प्योर  (pure) पुद्गल की रचना है।

00:41:06.920 --> 00:41:10.960
मगर अंदर में जो क्षयोपशमज्ञान है,

00:41:10.960 --> 00:41:23.576
क्षयोपशमज्ञान, वो जो द्रव्येंद्रिय का अवलंबन
लेता है, तो भावेन्द्रिय बन जाती है और
आत्मा का अवलंबन लेवे, तो अतींद्रिय बन जाए।

00:41:23.600 --> 00:41:36.016
दो ही क्षयोपशमज्ञान हैं।
ज्ञान का दो भेद, क्षयोपशम और क्षायिक।
मोह के चार भेद हैं। उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम।

00:41:36.040 --> 00:41:42.096
मगर ज्ञान का भेद या तो क्षयोपशम हो और या क्षायिक हो।

00:41:42.120 --> 00:41:50.536
और क्षयोपशमज्ञान के भी दो भेद,
एक अतींद्रियज्ञान, क्षयोपशम और
एक इंद्रियज्ञान भी क्षयोपशम। आहाहा!

00:41:50.560 --> 00:41:56.536
इससे अभी भावेन्द्रिय के साथ
भेदज्ञान का प्रकरण आता है।

00:41:56.560 --> 00:42:00.536
बाबूजी:- ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान।
उत्तर:- ज्ञान से ज्ञान का भेदज्ञान।

00:42:00.560 --> 00:42:19.456
हमारे पिताजी ने एक दफ़े, हमारे, अपने मुमुक्षु को पत्र मैंने
लिखा। तो मेरे पिताजी ने कहा कि मेरे ओर से लिखो कि
भाई साहब! ज्ञान से ज्ञान जुदा है, ऐसा भेदज्ञान करो।

00:42:19.480 --> 00:42:28.576
तो मैंने कहा वो समझेगा नहीं।
तो कहे नहीं समझेगा तो प्रश्न तो आएगा ना
कि ज्ञान से ज्ञान के भेदज्ञान की बात क्या है?

00:42:28.600 --> 00:42:37.696
ज्ञान से राग का भेदज्ञान तो सुना।
मगर ज्ञान से ज्ञान के भेदज्ञान की क्या बात है,
(ऐसा) पत्र तो आएगा ना। आहाहा!

00:42:37.720 --> 00:42:46.656
पत्र नहीं आया। यानि समझ में आवे तो प्रश्न करे।

00:42:46.680 --> 00:42:55.456
नहीं समझे, समझने की दरकार नहीं है, वो
भी प्रश्न नहीं करता है और समझ गया, वो
भी प्रश्न नहीं करता है। आहाहा!

00:42:55.480 --> 00:43:01.336
समझने की जिज्ञासा है और समाधान नहीं हो,
वो प्रश्न करता है। आहाहा!

00:43:01.360 --> 00:43:14.576
अभी आचार्य भगवान... आहाहा!
शास्त्रज्ञान भैया! ज्ञान नहीं है।
प्रभु! भूल गया तू।

00:43:14.600 --> 00:43:29.896
ये तेरा कपड़े का व्यापार का उघाड़
और ये हीरा के व्यापार का उघाड़, मधुभाई,
वो आत्मा का ज्ञान नहीं है

00:43:29.920 --> 00:43:47.736
और यह दाल का जो व्यापार है, ये मूँग की दाल,
ये चने की दाल है। समझे? इसका जो उघाड़ है ना,
आहाहा! वो ज्ञान नहीं है, भैया!

00:43:47.760 --> 00:43:55.336
वो तो ज्ञान नहीं है, उसके साथ
तो पाप का संबंध हो जाता है

00:43:55.360 --> 00:44:08.136
और शास्त्रज्ञान के साथ तो थोड़ा कषाय की मंदता,
पुण्य भी (होता है)। तो भी वो ज्ञान नहीं है। वो तो
पुण्य और पाप तो बाजु में रह जाता है। आहाहा!

00:44:08.160 --> 00:44:13.216
वो तो बाजु में पड़ोसी तरीके (से) रहता है। आहाहा!

00:44:13.240 --> 00:44:29.016
मगर जो शास्त्रज्ञान, इंद्रियज्ञान...
पाँच इंद्रिय का ज्ञान स्थूल है।
मगर जो मानसिक ज्ञान है, वो सूक्ष्म है।

00:44:29.040 --> 00:44:42.736
मन, भाव-मन कहें ना, भाव-मन, वो सूक्ष्म है।
ऐसे आँख से तो मूर्तिक पदार्थ
दिखते हैं, वो तो स्थूल हैं।

00:44:42.760 --> 00:44:51.000
भावेन्द्रिय, खंडज्ञान, उसको जाना,
तो उसको अपना मान लेता है।

00:44:51.040 --> 00:44:58.856
इंद्रियज्ञान का यह धर्म है।
जिसको जाने, उसको अपना मान लेता है,
अपनापन कर लेता है।

00:44:58.880 --> 00:45:09.936
ऐसे, एक बंध अधिकार है, समयसार का। उसमें
भाव-बंध की पराकाष्ठा की एक बात आई है।

00:45:09.960 --> 00:45:22.696
जैसे मैं पर को जिंदा रख सकूँ, सुखी-दु:खी कर
सकता हूँ, वो तो भाव-बंध मिथ्यात्व-अध्यवसान है ही।

00:45:22.720 --> 00:45:36.856
समझे? बचाने का भाव और मारने का भाव,
हिंसा या अहिंसा दो ही, उसमें अपनापन
करे तो, तो अध्यवसान है ही।

00:45:36.880 --> 00:45:50.156
मगर एक मन है इधर, भाव-मन, उसमें भगवान ने
कहा हुआ छहद्रव्य, वो धर्मास्तिकाय को मैं
जानता हूँ, अधर्मास्तिकाय को जानता हूँ,

00:45:50.280 --> 00:46:00.656
आकाश को मैं जानता हूँ। आहाहा! पाप हो गया,
अध्यवसान हो गया, भाव-बंध हो गया,

00:46:00.680 --> 00:46:10.936
उसके साथ एकत्वबुद्धि हो गई क्योंकि भाव-मन (में)
भेदज्ञान करने की शक्ति, उसमें नहीं है। एकत्व कर लेता है।

00:46:10.960 --> 00:46:29.096
भाव-मन जिसको जाने, चिंतवन करें, आहाहा! चौबीस
तीर्थंकर का मैं स्मरण करता हूँ। आहाहा! क्या कहा?
ठीक है! उस टाइम बाजु में शुभभाव, भक्ति का राग है।

00:46:29.120 --> 00:46:38.656
मगर अभी तो ये बात चलती है भाव-मन की,
भाव-मन में परपदार्थ का चिंतवन किया तूने,

00:46:38.680 --> 00:46:44.136
तो वो भाव-मन उसके साथ एकत्व करता है,
भाव-बंध हो जाता है, अध्यवसान हो जाता है।

00:46:44.160 --> 00:46:57.136
बाबूजी:- ज्ञायक दिखाई नहीं देता।
उत्तर:- ज्ञायक दिखाई नहीं दिया, तिरोभूत हो गया, तो
अन्य के साथ एकत्व करता ही है, भाव-मन। आहाहा!

00:46:57.160 --> 00:47:09.736
बहुत सूक्ष्म बात है, मगर समझने जैसी है।
सूक्ष्म का अर्थ, नहीं समझ में आवे, ऐसा नहीं।
समझने जैसी है, थोड़ा उपयोग लगाना। समझे?

00:47:09.760 --> 00:47:21.616
गुरुदेव, कभी सूक्ष्म बात आती थी, तब ऐसा बोलते थे
कि जितना समझ में आये उतना समझो,

00:47:21.640 --> 00:47:26.456
जितना समझ में आये उतना समझो,
जितना समझ में आये उतना समझो।

00:47:26.480 --> 00:47:33.856
कि बात तो ये समझे बिना भव का अंत आनेवाला नहीं है।
सूक्ष्म करके छोड़ देने जैसी चीज़ नहीं है।

00:47:33.880 --> 00:47:47.776
आत्मा ही सूक्ष्म है, तो उसको उपयोग भी सूक्ष्म
करना पड़े। इंद्रियज्ञान स्थूल है, इन्द्रियज्ञान स्थूल है,
स्थूल ज्ञान से आत्मा का अनुभव होता नहीं।

00:47:47.800 --> 00:47:53.816
अतींद्रियज्ञान सूक्ष्म है। उस सूक्ष्म ज्ञान से
सूक्ष्म भगवान आत्मा का दर्शन होता है।

00:47:53.840 --> 00:48:19.536
दूसरा पॉइंट आता है अभी भावेन्द्रिय का।
<b>भिन्न-भिन्न अपने-अपने विषयोंमें</b>, 
इंद्रियज्ञान का विषय भिन्न-भिन्न होता है।

00:48:19.560 --> 00:48:27.736
जैसे स्पर्श इंद्रियका विषय ठंडा-गर्म होता है, 
रस इंद्रिय का, भावेन्द्रिय की बात चलती है, 
उसका विषय खट्टा-मीठा।

00:48:27.760 --> 00:48:35.816
ये (चक्षु इन्द्रिय का विषय) सफेद-काला। समझे?
ऐसे सुगंध-दुर्गंध, ऐसे कर्कश आवाज़,
मीठा आवाज़, ये सब पुद्गल की पर्याय।

00:48:35.840 --> 00:48:45.976
उसका जो भाव, भाव है, भावेन्द्रिय, उसका विषय, 
<b>भिन्न-भिन्न अपने-अपने विषयोंमें</b>, 
अपने-अपने विषयों में प्रवृत्ति करती है।

00:48:46.000 --> 00:49:00.296
इधर (स्पर्श इंद्रिय से) ठंडा लगता है मगर खट्टा-मीठा 
का स्वाद आता नहीं है। इसकी योग्यता है,
योग्यता के साथ इतना ही संबंध रहता है। आहाहा!

00:49:00.320 --> 00:49:09.856
लिमिटेड (limited) है, भावेन्द्रिय।
अतिंद्रीयज्ञान अनलिमिटेड (unlimited) है।
पाँच इंद्रिय का विषयों को एक समय में जान लेता है।

00:49:09.880 --> 00:49:19.616
पाँच इंद्रिय के विषयों को एक समय में जान लेता है
और इंद्रिय के सन्मुख नहीं करना पड़ता है।

00:49:19.640 --> 00:49:28.176
उस विषय के सन्मुख भी नहीं करता है उपयोग।
उपयोग आत्मसन्मुख होता है, तो सब जानने
में आ जाता है। अलौकिक चीज़ है।

00:49:28.200 --> 00:49:42.376
<b>भिन्न-भिन्न अपने-अपने विषयोंमें व्यापारभावसे</b>,
व्यापारभाव से देखो, व्यापार लिखा। समझे? जो इंद्रियज्ञान
भावेन्द्रिय है ना, वो लब्ध रूप उपयोग होता है। समझे?

00:49:42.400 --> 00:49:48.416
तो जब उपयोग होता है, उसका नाम व्यापार। 
दूसरी इंद्रियज्ञान का उघाड़ लब्धरूप होता है।

00:49:48.440 --> 00:49:56.096
एक इन्द्रियका व्यापार होता है, तो दूसरी चार 
इंद्रिय का व्यापार लब्ध हो जाता है। आहाहा!

00:49:56.120 --> 00:50:05.496
अभाव नहीं होता है, अभाव (नहीं होता है)। उसकी 
शक्ति रहती है जानने की। जानने का व्यापार बंद हो गया,

00:50:05.520 --> 00:50:11.536
पर जानने की शक्ति तो रहती है।
क्षयोपशम तो इतना रहता है, जाता नहीं है।

00:50:11.560 --> 00:50:18.136
<b>अपने-अपने विषयोंमें व्यापारभावसे जो विषयोंको
खंडखंड ग्रहण करती हैं।</b> आहाहा!

00:50:18.160 --> 00:50:27.856
जो इंद्रियज्ञान है ना, एक-एक विषय को जानता 
है, तो ज्ञान ही खंड हो गया, अखंड नहीं रहा।

00:50:27.880 --> 00:50:33.616
जैसे ज्ञेय से ज्ञेयान्तर, ज्ञेय से ज्ञेयान्तर, बार-बार
ऐसे घूमता है, इंद्रियज्ञान। आहाहा!

00:50:33.640 --> 00:50:48.176
इंद्रियज्ञान में स्थिरता नहीं आती है।
उसका स्वभाव ही अस्थिर है, चंचल है। क्या कहा?
इंद्रियज्ञान, भावेन्द्रिय का स्वभाव ही चंचल है। आहाहा!

00:50:48.200 --> 00:51:08.296
इधर बैठे और ये चलता है ३१ गाथा और कभी परदेश का
व्यापार का विचार आ जावे, कभी कुटुंब का, कभी उघराणी का,
कभी क्या, कभी क्या, ऐसा-ऐसा ये चंचल है इंद्रियज्ञान। आहाहा!

00:51:08.320 --> 00:51:14.456
अतींद्रियज्ञान तो स्थिर है, चंचलता उसमें नहीं है।

00:51:14.480 --> 00:51:29.056
भगवान आत्मा तो अचल है, स्थिर है, मगर उसके आश्रय से
हुआ जो अतींद्रियज्ञान, सम्यग्ज्ञान, स्वसंवेदनज्ञान
वो भी स्थिर है, क्योंकि उसका विषय स्थिर है।

00:51:29.080 --> 00:51:34.496
उसका विषय (स्थिर है) और
भावेन्द्रिय का विषय अस्थिर है।

00:51:34.520 --> 00:51:44.736
भावेन्द्रिय का विषय (अस्थिर है)। तो अस्थिर के
लक्ष्य से इधर भी अस्थिरता हो जाती है, ऐसा
निमित्त-नैमित्तिक संबंध बनता है।

00:51:44.760 --> 00:51:54.696
है अपनी योग्यता से, है तो अपनी स्वतंत्र योग्यता से।
उधर फेरफार हुआ तो इसके कारण से (यहाँ)
फेरफार होता है, ऐसा नहीं है। आहाहा!

00:51:54.720 --> 00:52:05.576
<b>विषयोंको खण्डखण्ड ग्रहण करती हैं
(ज्ञानको खण्डखण्डरूप बतलाती हैं)।</b> 
ज्ञान को खंड-खंडरूप बतलाती है।

00:52:05.600 --> 00:52:18.588
इसका क्या अर्थ है? कि पहले इसको जाना,
तो ये खंडज्ञान हो गया। बाद में इसको जाना,

00:52:18.612 --> 00:52:31.976
बाद में इसको जाना, तो ये ज्ञान-ज्ञेय खंड-खंडरूप
अनेक है, ज्ञान-ज्ञेय अनेक है, तो अनेक के लक्ष्य से 
ज्ञान की पर्याय भी खंड-खंड होती है। आहाहा!

00:52:32.000 --> 00:52:44.736
ऐसे ज्ञान, ज्ञेय 'ज्ञान खंड-खंड है,'
ऐसी प्रसिद्धि करती है। 
<b>(ज्ञानको खण्डखण्डरूप बतलाती हैं),</b> ज्ञेय के संबंध से।

00:52:44.760 --> 00:52:52.296
<b>ऐसी भावेन्द्रियोंको, प्रतीतिमें आनेवाली,</b>
अभी प्रतीति का विषय आया,

00:52:52.320 --> 00:53:12.616
श्रद्धा का विषय आया। खंडज्ञान, जितने में श्रद्धा
बलवान होती है। जब श्रद्धा बलवान होती है,
अंदर में से, तब खंडज्ञान जीता जाता है।

00:53:12.640 --> 00:53:25.176
कैसे जीता जाए?
कि मैं परको जानता नहीं हूँ, ऐसा अंदर में से,
अंदर में से श्रद्धा का बल आता है।

00:53:25.200 --> 00:53:35.816
पहले विकल्पात्मक बल आता है,
व्यवहार श्रद्धा प्रगट होती है
कि मैं पर को जाननेवाला (नहीं)। आहाहा!

00:53:35.840 --> 00:53:46.616
तो वो जो उपयोग बाहर घूमता था, वो वहाँ से
व्यवृत्त हो जाता है। व्यावृत्त समझे? लौट जाता है।

00:53:46.640 --> 00:53:56.976
ऐसा एक दफ़े ये शांतिभाई का लड़का है,
तत्त्व का अभ्यासी, रुचिवाला,
पंकज उसका नाम है। आहाहा! उसके साथ चर्चा हुई।