﻿WEBVTT

00:01:29.880 --> 00:01:33.096
ऊपर का एक श्लोक भी है।
१७४ नंबर का श्लोक है।

00:01:48.640 --> 00:01:56.420
वो श्लोक प्रश्नरूप है।
उत्तर २७८ नंबर की गाथा है।
वो उत्तररूप है।

00:01:56.520 --> 00:02:01.536
प्रश्न तो इसमें है, श्लोक बोलो बेन!

00:02:01.560 --> 00:02:17.376
<b>रागादयो बन्धनिदानमुक्ता -
स्ते शुद्धचिन्मात्रमहोऽतिरिक्ता: ।</b>

00:02:17.400 --> 00:02:32.836
<b>आत्मा परो वा किमु तन्निमित्त-
मिति प्रणुन्नाः पुनरेवमाहुः ।।१७४।।</b>

00:02:33.000 --> 00:02:47.570
ये श्लोक बहुत अच्छा है!
ये रागादि को बंध का कारण कहा।

00:02:47.570 --> 00:02:54.010
राग द्वेष मोह का जो परिणाम
विकारी भाव कषाय भाव है,

00:02:54.200 --> 00:03:01.316
उसको नया बंध का कारण कहा। भावबंध है,

00:03:01.320 --> 00:03:09.956
तो भावबंध नया कर्म का निमित्त कारण होता है,
रागादि। कर्म के बंध का कारण तो कर्म जड़ है।

00:03:11.320 --> 00:03:19.256
उसका निमित्त कारण राग द्वेष मोह है।
जो जीव का विकृत परिणाम है।
तो रागादि को बंध का कारण कहा।

00:03:19.280 --> 00:03:28.256
और उसके उपरांत जिसने यानि राग द्वेष मोह को
मिथ्यात्व के परिणाम को,

00:03:29.760 --> 00:03:36.456
शुद्ध चैतन्यमात्र ज्योति से भिन्न कहा-
ये क्या बात है?

00:03:36.480 --> 00:03:42.496
आत्मा ही बंध का कारण है, नया कर्म बंध का कारण.

00:03:42.520 --> 00:03:47.336
भगवान आत्मा बंध का कारण नहीं है। कभी?

00:03:47.360 --> 00:03:50.776
कि जब मिथ्यात्व है, तभी। क्या कहा?

00:03:50.800 --> 00:03:56.896
परिणाम में मिथ्यात्व राग द्वेष मोह
कषाय भाव है,

00:03:56.920 --> 00:04:03.456
तभी भी आत्मा कर्म के बंध का
कारण नहीं होता है।

00:04:03.480 --> 00:04:07.336
किसी को भी। भव्य-अभव्य किसी को भी।

00:04:07.360 --> 00:04:11.896
तो बंध का कारण कौन? कि राग द्वेष मोह
बंध का कारण है,

00:04:11.920 --> 00:04:16.776
ऐसा कहा। ऐसा हमने स्वीकार भी किया, माना।

00:04:16.800 --> 00:04:23.096
मगर मेरा एक प्रश्न है कि बाद में
आप ऐसा कहते हैं कि
जो राग बंध का कारण है,

00:04:23.120 --> 00:04:29.296
वो राग से शुद्ध चैतन्यज्योति मात्र
से तो भिन्न है।

00:04:29.320 --> 00:04:35.256
राग बंध का कारण और बंध का कारण वो तो राग,

00:04:35.280 --> 00:04:42.096
वो राग शुद्धात्मा से तो भिन्न है,
ऐसा कहा आपने।

00:04:42.120 --> 00:04:49.496
तो तब रागादि का निमित्त आत्मा है
कि दूसरा कोई?

00:04:49.520 --> 00:04:55.520
जो राग उत्पन्न होता है, उसका
निमित्त कारण आत्मा है कि
और चीज है राग की?

00:04:57.360 --> 00:04:59.020
पहले क्या कहा कि राग नया बंध का कारण,

00:04:59.020 --> 00:05:04.776
वो राग से भगवान आत्मा भिन्न है। वो तो ठीक!

00:05:04.800 --> 00:05:09.976
अभी दूसरा प्रश्न आया कि राग उत्पन्न होता है

00:05:10.000 --> 00:05:12.760
तो आत्माश्रित होता है कि पराश्रित?

00:05:12.760 --> 00:05:20.936
राग की उत्पत्ति का निमित्त कारण कौन?
आत्मा निमित्त कारण,

00:05:20.960 --> 00:05:26.856
मिथ्यात्व की उत्पत्ति में मिथ्यात्व का
जन्मस्थल  है तो होता है,

00:05:26.880 --> 00:05:31.376
मगर उसमें कारण कोन आत्मा कारण है
कि दर्शन मोह आदि निमित्त कारण है?

00:05:31.400 --> 00:05:33.200
ऐसा पूछा। दो प्रश्न आया।

00:05:33.200 --> 00:05:39.536
एक तो राग से नया बंध होता है।
ऐसा आपने कहा वो तो ठीक। स्वीकार किया।

00:05:39.560 --> 00:05:43.936
अब बाद में आप फरमाते हैं कि
राग से आत्मा भिन्न है,

00:05:43.960 --> 00:05:48.736
एक बात। दूसरा बात यह कि
जो राग की  उत्पत्ति होती है,

00:05:48.760 --> 00:05:55.016
उसका कारण कौन यानि नियमरूप कारण कौन?

00:05:55.040 --> 00:06:03.336
यानि निमित्तरूप कारण कौन?
दो प्रश्न इसमें हैं,

00:06:03.360 --> 00:06:10.416
गर्भित। प्रश्न तो ऐसा पूछा कि
राग का ये निमित्त

00:06:10.440 --> 00:06:13.816
आत्मा है कि राग का निमित्त परद्रव्य है?

00:06:13.840 --> 00:06:18.656
ऐसा प्रश्न है। तो राग की उत्पत्ति में

00:06:18.680 --> 00:06:25.496
निमित्त कारण तो समझे मगर
उसका नियमरूप कारण क्या है?

00:06:25.520 --> 00:06:32.456
आत्मा है? ऐसा भी प्रश्न गर्भित में आयेगा।
खुलासा आयेगा।

00:06:32.480 --> 00:06:37.936
आत्मा है कि दूसरा कोई पदार्थ
राग की उत्पत्ति का?

00:06:37.960 --> 00:06:44.096
राग निमित्त है नया कर्म के लिये। वो राग उत्पन्न होता है,

00:06:44.120 --> 00:06:48.816
वो आत्मा से भिन्न है। तो राग की उत्पत्ति में

00:06:48.840 --> 00:06:52.940
कारण है किआत्मा परद्रव्य कारण है? और कोई?
ऐसा प्रश्न आया!

00:06:54.640 --> 00:07:01.976
उसमें नियमरूप कारण क्या? कि 
जो आत्मा राग का निमित्त हो

00:07:01.976 --> 00:07:06.312
मिथ्यात्व का तो कभी मिथ्यात्व का अभाव हो नहीं|

00:07:06.960 --> 00:07:13.536
और जो नियमरूप कारण कर्म का
उदय हो तो पराधीन पर्याय हो गई।

00:07:13.560 --> 00:07:18.676
भी नियमरूप कारण निश्चय कारण नहीं है। आहाहा!
व्यवहार कारण है मगर निश्चय कारण नहीं है।

00:07:18.800 --> 00:07:25.416
तो निश्चय कारण कर्म का उदय भी नहीं
और आत्मा का अस्तित्व वो भी
नियमरूप कारण नहीं है।

00:07:25.440 --> 00:07:39.656
उसका राग की उत्पत्ति का मिथ्यात्व की
उत्पत्ति का आत्मा कारण है कि परद्रव्य
कारण है- ऐसा प्रश्न आया।

00:07:39.680 --> 00:07:50.336
ऐसा शिष्य का प्रश्न से प्रेरित होकर आचार्य
भगवान फिर से उसका उत्तर देते हैं।

00:07:50.360 --> 00:07:55.856
ऊपर के प्रश्न उत्तर में आचार्य भगवान्
गाथा कहते हैं।

00:07:55.880 --> 00:08:12.456
<b>ज्यों स्फटिकमणि है शुद्ध,
आप न रक्तरूप जु परिणमे ।</b>

00:08:12.480 --> 00:08:24.456
पर अन्य रक्त पदार्थसे,
रक्तादिरूप जु परिणमे ।।२७८।।

00:08:24.480 --> 00:08:34.936
त्यों ‘ज्ञानी’ भी है शुद्ध,
आप न रागरूप जु परिणमे ।

00:08:34.960 --> 00:08:46.496
पर अन्य जो रागादि दूषण,
उनसे वह रागी बने ।।२७९।।

00:08:46.520 --> 00:08:58.976
गाथा बहुत मार्मिक है। आत्मा शुद्ध है,
और आत्मा परिणमन नहीं करता है।

00:08:59.000 --> 00:09:03.656
त्रिकाली शुद्धात्मा राग की
उत्पत्ति का कारण नहीं है।

00:09:03.680 --> 00:09:11.656
वो उसका जो परिणमन है, उत्पाद-व्यय,
उत्पाद-व्यय, उत्पाद-व्यय,
वो भी राग की उत्पत्ति का कारण नहीं है।

00:09:11.680 --> 00:09:21.536
जो उत्पाद-व्यय राग की उत्पत्ति का कारण हो,
तो सिध्द भगवान में उत्पाद-व्यय होता है,
उसमें राग की उत्पत्ति होना चाहिए।

00:09:21.560 --> 00:09:29.040
भगवान आत्मा भी राग की उत्पत्ति का कारण नहीं
और उत्पाद-व्यय जो पर्याय का स्वभाव है,

00:09:29.100 --> 00:09:33.336
पर्याय का स्वभाव भी विभाव का कारण नहीं है।

00:09:33.360 --> 00:09:42.176
ये तो समयसार गूढ है, सब इसमें लिखा है।

00:09:42.200 --> 00:09:50.936
उसका गाथा का अर्थ- जेम,
जैसे स्फटिकमणि शुद्ध होने से,

00:09:50.960 --> 00:09:56.136
अनादि अनंत स्फटिकमणि स्वभाव से शुद्ध ही है।

00:09:56.160 --> 00:10:01.616
कभी स्फटिकमणि अशुद्ध होती नहीं है।

00:10:01.640 --> 00:10:12.936
त्रिकाल शुद्ध है, त्रिकाल शुद्ध, एक बात।
शुद्ध होने से रागादिरूप से स्वयं में
परिणामित होती नहीं।

00:10:12.960 --> 00:10:17.896
यानि जो स्फटिकमणि में पर्याय
जो लालरूप होती है,

00:10:17.920 --> 00:10:22.576
वो अपने आप लालरूप होती नहीं है।

00:10:22.600 --> 00:10:27.656
लालरूप का कारण स्फटिकमणि का
शुद्ध स्वभाव नहीं है।

00:10:27.680 --> 00:10:32.416
और उसका परिणमन स्वभाव भी
लाल का कारण नहीं है।

00:10:32.440 --> 00:10:39.240
ये टीका में आयेगा। समझे? आहाहा!
दो कारण का अभाव है।

00:10:39.260 --> 00:10:43.036
शुद्ध स्फटिकमणि हो तो लाल होता,
ऐसा भी नहीं।

00:10:43.040 --> 00:10:47.656
और उत्पाद-व्यय परिणमन होता है
इसलिए लाल हो जाता है, ऐसा भी नहीं।

00:10:47.680 --> 00:10:53.456
तो क्या है? कि सामने लाल फूल है
वो उसका निमित्त कारण है।

00:10:53.480 --> 00:10:59.136
उपादान कारण तो तत्समय की पर्याय।
निमित्त कारण, आहाहा!

00:10:59.160 --> 00:11:05.456
वो जो लाल जो उपादान कारण हुआ,
वो तो निमित्त कारण,

00:11:05.480 --> 00:11:08.400
लाल फूल तो। लाल फूल तो निमित्त कारण।

00:11:08.400 --> 00:11:13.416
मगर उसका जो क्षणिक उपादानलालरंग
हुआ ना? लालरंग? पर्याय में लाल रंग।

00:11:13.440 --> 00:11:18.056
एक तो लाल रंग फूल में है और
ये लाल रंग इधर आया।

00:11:18.080 --> 00:11:26.096
तो ये जो लाल रंग आया पर्याय का दोष,
पर्याय में, तो उसका नियमरूप कारण क्या है?

00:11:26.120 --> 00:11:29.736
कि स्फटिकमणि अपनी पर्याय
स्वभाव से च्युत हो गयी।

00:11:29.760 --> 00:11:35.256
पर्याय में जो सफेदरूप परिणमन करती थी,
वो लालरूप से परिणमन करती है।

00:11:35.280 --> 00:11:39.616
आहाहा! ऐसा आता है। आएगा।

00:11:39.640 --> 00:11:44.616
परन्तु, अन्य रक्त आदि द्रव्यों के
द्वारा लाल करनेमे आता है!

00:11:44.640 --> 00:11:47.696
ऐसे ज्ञानी अर्थात आत्मा,
ज्ञानी का अर्थ आत्मा।

00:11:47.720 --> 00:11:55.696
ज्ञानी का अर्थ आत्मा। ज्ञानी आता है ना
बहुत बार। ज्ञानी। आहाहा!

00:11:55.720 --> 00:12:10.696
अमितगति आचार्य में आता है ना?
ज्ञान से जानता ज्ञानी,
जानने में आ जाता है।

00:12:10.720 --> 00:12:19.416
ज्ञानी अर्थात आत्मा। ये इधर से निकला।
ज्ञानी अर्थात आत्मा। ज्ञानी अर्थात
आत्मा शुद्ध होने से,

00:12:19.440 --> 00:12:23.856
त्रिकाल शुद्ध है आत्मा तो,
कभी अशुद्ध होता नहीं है,

00:12:23.880 --> 00:12:27.136
रागादिरूप अपने आप परिणमता नहीं है!

00:12:27.160 --> 00:12:30.080
अकेला अकेला आत्मा है और
रागरूप से परिणमित होता है,

00:12:30.080 --> 00:12:33.816
मिथ्यात्वरूप से परिणमित होता है।
ऐसा होता नहीं। नहीं तो वो स्वभाव हो जाए।

00:12:33.820 --> 00:12:42.920
और पर (द्रव्य) परिणमित करावे
तो तो पराधीन हो जाए। ऐसा भी नहीं है। आएगा।
बहुत मार्मिक बात है। मार्मिक बात है।

00:12:43.000 --> 00:12:50.416
उत्पाद व्यय राग का कारण नहीं और
ध्रुव भी राग का कारण नहीं है। आहाहा!

00:12:51.600 --> 00:12:59.896
निमित्त कारण नहीं है। समझे? शुद्धभाव
रागादिरूप अपने आप, यहाँ निमित्त सिद्ध
करना है!

00:13:00.080 --> 00:13:04.176
अपनेसे अपने आप| आहाहा! परिणमता नहीं है,

00:13:04.200 --> 00:13:07.416
परंतु अन्य रागादी दोषों के द्वारा
रागादि करनेमे आता है!

00:13:07.440 --> 00:13:12.376
निमित्तरूप, निमित्त कर्ता, निमित्त। आहाहा!

00:13:12.400 --> 00:13:20.016
निमित्त कर्ता तो कर्म का उदय।
उपादान कर्ता राग की तत्समय की पर्याय।

00:13:20.040 --> 00:13:26.456
वो राग का परिणमन होता है,
उसमें निमित्त कारण तो कर्म है।

00:13:26.480 --> 00:13:32.616
मगर राग की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है?
कि अपने स्वभाव से च्युत हो गया।

00:13:32.640 --> 00:13:39.896
वो राग की उत्पत्ति का नियमरूप कारण है।

00:13:39.920 --> 00:13:41.240
अपने स्वभाव को भूल गया।

00:13:41.240 --> 00:13:47.256
समय समय जाननेवाला जानने में आता है
तो भी मेरे को जानने में आता नहीं है।

00:13:47.280 --> 00:13:53.096
वो च्युत हो गया आत्मा।
आत्मा स्वभाव से च्युत हो गया।

00:13:53.120 --> 00:13:59.136
तो राग की उत्पत्ति नियमरूप कारण है।
और निमित्त  वो है, निमित्तकारण
कारण कर्म का उदय है।

00:13:59.160 --> 00:14:00.760
अभी आएगा सब। खुलासा इसमें आयेगा!

00:14:00.760 --> 00:14:11.256
टीका- आहाहा! नई बात है। नई बात है।
भाई साहब! समझने जैसी बात है। आहाहा!

00:14:11.280 --> 00:14:16.416
माल भरा है।

00:14:16.440 --> 00:14:21.616
जो परिणमन स्वभाव हो तो बंध का
कारण हो तो सिध्द में होना चाहिए।

00:14:21.640 --> 00:14:26.776
और परिणमन स्वभाव जो सरखा
(एक जैसा ) हो तो सरखा (एक जैसा )
बंध होना चाहिए।

00:14:26.800 --> 00:14:32.096
आत्मा भी कारण नहीं और परिणमन
स्वभाव भी कारण नहीं। आहाहा!

00:14:32.120 --> 00:14:38.456
और कर्म का उदय तो व्यवहार निमित्त
कारण है। वो निश्चय कारण नहीं है।

00:14:38.480 --> 00:14:43.496
उसमें से निकलता है।

00:14:43.520 --> 00:14:52.936
इस रीते से वास्तव में अकेला स्फटिकमणि,
अकेला स्फटिकमणि पड़ा है।

00:14:52.960 --> 00:14:56.776
अकेला-अकेला लाल रूप से परिणमता नहीं है।

00:14:56.800 --> 00:15:02.336
स्वयं परिणमन स्वभाववाला होने से,
जुओ! दो लिया। दो लिया कि नहीं?

00:15:02.400 --> 00:15:06.176
टीकाकार ने निकाला उसमें से।

00:15:06.200 --> 00:15:08.120
मूल में नहीं है,

00:15:08.120 --> 00:15:10.840
परिणमन स्वभाव मूल में नहीं है।

00:15:10.840 --> 00:15:18.256
इसमें ये आता है। आहाहा!

00:15:18.280 --> 00:15:23.296
उत्पाद-व्यय तो स्वभाव है
पर्याय का। दोष नहीं है।

00:15:24.640 --> 00:15:28.536
उत्पाद-व्यय तो स्वभाव है|
ध्रुव भी स्वभाव उत्पाद-व्यय तो स्वभाव है।

00:15:28.560 --> 00:15:31.856
आहाहा!

00:15:31.880 --> 00:15:34.240
उत्पाद व्यय में जो उपाधि आती है,

00:15:34.240 --> 00:15:38.456
वो बंध का कारण है। वो बंध का कारण।

00:15:38.480 --> 00:15:42.816
एक निमित्त कारण और एक च्युत होता है
दो बंध का कारण।

00:15:42.840 --> 00:15:45.560
प्रश्न:- स्वभाव विभाव वही हुआ?

00:15:45.560 --> 00:15:50.256
उत्तर:- हाँ! वही हुआ। वो ही पर्याय।

00:15:50.280 --> 00:15:53.240
परिणमन स्वभाववाला होने पर भी, दो बात ली।

00:15:53.240 --> 00:15:57.456
अपना शुद्ध स्वभाववाला होने से,

00:15:57.480 --> 00:15:59.440
स्फटिकमणि तो शुद्ध है।

00:15:59.440 --> 00:16:02.240
उसका स्वभाव अशुद्ध होना नहीं है

00:16:02.240 --> 00:16:05.856
अशुद्ध पर्याय में अशुद्ध होना,
वो उसका कारण नहीं है।

00:16:05.880 --> 00:16:07.960
अशुद्ध का कारण शुद्ध नहीं होता है।

00:16:07.960 --> 00:16:12.376
पर्याय में लाल रंग होता है ना,
नैमित्तिक|

00:16:12.400 --> 00:16:15.896
वो नैमित्तिक भाव का कारण निमित्त है।

00:16:15.920 --> 00:16:29.136
नैमित्तिक का कारण त्रिकाल स्वभाव भी नहीं है,
परिणमन स्वभाव भी नहीं है।

00:16:29.160 --> 00:16:32.616
त्रिकाल स्वभाव तो नहीं मगर वो
परिणमन स्वभाव,

00:16:32.640 --> 00:16:39.456
उत्पाद-व्यय वो भी राग का
कारण नहीं है। आहाहा!

00:16:39.480 --> 00:16:43.376
अपने शुद्ध स्वभाव के कारण भी
रागादिरूप परिणमित नहीं होने से।

00:16:43.400 --> 00:16:47.496
राग की उत्पत्ति में ये स्फटिकमणि
भी निमित्त नहीं

00:16:47.840 --> 00:16:52.296
और उसका उत्पाद व्यय निमित्त
कारण नहीं है। आहाहा!

00:16:52.320 --> 00:16:56.336
तो निमित्त कारण कौन? ऐसा प्रश्न आयेगा।

00:16:56.360 --> 00:17:00.136
अर्थात स्वयं अपनी लालास आदिरूप
परिणमन वो निमित्त नहीं होने से,

00:17:00.440 --> 00:17:01.640
नहीं तो वो तो स्वभाव हो जायेगा।

00:17:01.640 --> 00:17:05.296
स्फटिकमणि अपने आप अकेला-अकेला
लालरूप में परिणमे

00:17:05.320 --> 00:17:07.520
तो वो तो स्वभाव हो जायेगा।

00:17:07.520 --> 00:17:11.136
तो कभी स्वभाव और विभाव का अभाव होता नहीं है।

00:17:11.160 --> 00:17:14.976
विभाव में निमित्त कारण है, दूसरा।

00:17:15.000 --> 00:17:20.256
नैमित्तिक में निमित्त है, स्वभाव में
निमित्त नहीं होता है।

00:17:20.280 --> 00:17:23.240
त्रिकाल स्वभाव में निमित्त नहीं और

00:17:23.240 --> 00:17:34.496
उत्पाद-व्यय का निमित्त कोई
जगत में नहीं होता है।

00:17:34.520 --> 00:17:39.256
निमित्त तो नैमित्तिक में,
निमित्त का भाव आता है।

00:17:39.280 --> 00:17:47.216
नैमित्तिक कब होता है? कि
अपने स्वभाव से च्युत होता है, तब।

00:17:47.240 --> 00:17:51.736
मार्मिक गाथा है। बंध सिद्ध
करने की गाथा है, बंध।

00:17:51.760 --> 00:17:55.776
बंध तत्व, बंध अधिकार है ना, आहाहा!

00:17:55.800 --> 00:17:58.600
मिथ्यात्व सिध्द करने की गाथा है।

00:17:58.600 --> 00:18:01.656
मिथ्यात्व का ख्याल आ जाये तो
मिथ्यात्व चला जाये।

00:18:01.680 --> 00:18:05.616
मिथ्यात्व की उत्पत्ति का
कारण ख्याल में आवे,

00:18:05.640 --> 00:18:08.976
तो मिथ्यात्व की उत्पत्ति होती नहीं है।

00:18:09.000 --> 00:18:12.856
मिथ्यात्व की उत्पत्ति क्या? मूल कारण क्या?

00:18:12.880 --> 00:18:15.280
दर्शनमोह तो निमित्त कारण है।

00:18:15.320 --> 00:18:20.816
भूल तो इधर से होती है
मिथ्यात्व की उत्पत्ति,

00:18:20.840 --> 00:18:23.040
तो मिथ्यात्व की उत्पत्ति का कारण क्या है?

00:18:23.040 --> 00:18:25.920
कि जो अपने ज्ञान में ज्ञायक
भगवानआत्मा

00:18:25.920 --> 00:18:29.976
जानने में आने पर भी,
मैं आत्मा को नहीं जानता हूं।

00:18:30.000 --> 00:18:32.920
वो मिथ्यात्व का नियमरूप कारण हो गया।

00:18:32.920 --> 00:18:44.976
तब दर्शनमोह का निमित्त कारण कहेगा।

00:18:45.000 --> 00:18:48.376
अकेला-अकेला आत्मा
मिथ्यात्वरूप से परिणमता नहीं।

00:18:48.400 --> 00:18:52.176
और उसका उत्पाद व्यय रूप भी कारण नहीं है

00:18:52.200 --> 00:18:54.520
और दर्शनमोह का उदय वो तो निमित्त कारण है।

00:18:54.520 --> 00:18:57.696
वो तो बहिरंग कारण है। अंतरंग कारण क्या है

00:18:57.760 --> 00:18:59.480
कि स्वभाव से च्युत हो गया।

00:18:59.480 --> 00:19:03.336
स्वभाव से च्युत होकर ज्ञाता होने पर भी,
कर्ता मानता है।

00:19:03.360 --> 00:19:09.056
ज्ञाता होने पर भी अपने आप कर्ता माना।
वो स्वभाव से च्युत हो गया।

00:19:09.080 --> 00:19:13.656
वो नियमरूप कारण हुआ। उसमें अपवाद नहीं।

00:19:13.680 --> 00:19:17.936
कर्म का उदय होने पर भी,

00:19:17.960 --> 00:19:20.880
आत्मा वहाँ से हटकर आत्मा में जा सकता है।

00:19:20.880 --> 00:19:22.960
तो उदय नियमरूप कारण नहीं रहा।

00:19:24.000 --> 00:19:28.296
राग की उत्पत्ति में जयसेनाचार्य
भगवान ने लिखा है कि

00:19:28.320 --> 00:19:32.056
कर्म का उदय नियमरूप कारण नहीं है।

00:19:32.080 --> 00:19:34.640
शुद्ध स्वभाव से च्युत होना नियमरूप कारण है।

00:19:34.640 --> 00:19:42.056
इसमें अपवाद नहीं है।
अपने को भूल गया।
स्वभाव से च्युत हो गया।

00:19:42.080 --> 00:19:47.736
मैं ज्ञाता हूँ, माना कर्ता,
स्वभाव से च्युत हो गया।

00:19:47.760 --> 00:19:57.776
ज्ञाता नहीं रहा। मैं ज्ञाता हूँ
होना चाहिए, रहना चाहिए।
मगर मैं कर्ता हूँ, आहाहा!

00:19:57.800 --> 00:20:01.576
अर्थात स्वयं अपनेको ललाई
आदिरूप परिणमनका  निमित न होने से,

00:20:01.600 --> 00:20:03.800
अपने आप रागादिरूप नहीं परिणमता,

00:20:03.800 --> 00:20:07.416
स्फटिकमणि की बात चलती है,

00:20:07.440 --> 00:20:11.776
किन्तु जो अपने आप रागादि
भाव को प्राप्त होने से, आहाहा!

00:20:11.800 --> 00:20:12.840
दूसरा पदार्थ लिया अभी।

00:20:13.880 --> 00:20:19.416
नैमित्तिक पर्याय स्वभाव से च्युत होता है,
तो नैमित्तिक पर्याय होती है।

00:20:19.440 --> 00:20:24.136
नैमित्तिक होती है तो उसमें
निमित्त कारण आत्मा नहीं होता है

00:20:24.160 --> 00:20:30.816
और परिणमन भी निमित्त नहीं है।
परद्रव्य निमित्त होता है।

00:20:30.840 --> 00:20:34.536
दो निमित्त का निषेध किया।
त्रिकाल स्वभाव निमित्त नहीं होता है

00:20:34.560 --> 00:20:39.896
और उत्पाद व्यय भी निमित्त
नहीं होता है। आहाहा!

00:20:39.920 --> 00:20:44.976
और नैमित्तिक होता तो है और
उसमें कर्म के कारण से राग होता है

00:20:45.000 --> 00:20:46.680
ऐसा भी नहीं है।

00:20:47.040 --> 00:20:50.176
और नैमित्तिक हो भी, हुआ तो सही।

00:20:50.200 --> 00:20:55.976
उसका नियमरूप कारण तो
ज्ञाता होने पर भी कर्ता मानता हैं। आहाहा!

00:20:56.000 --> 00:20:59.856
अकर्ता होने पर भी कर्ता मानता है।

00:20:59.880 --> 00:21:03.936
अपना उपयोग में भगवान आत्मा
जानने में आ रहा है,

00:21:03.960 --> 00:21:07.256
उसको निषेध करता है कि मैं
आत्मा को जानता नहीं हूँ।

00:21:07.280 --> 00:21:11.216
वो स्वभाव से च्युत हुआ तो बंध हो गया
मिथ्यात्व की पर्याय प्रगट हो गई।

00:21:11.240 --> 00:21:16.136
मिथ्यात्व की पर्याय प्रगट हुई तो
दर्शनमोह का कर्म का निमित्त
कारण कहा जाता है।

00:21:16.160 --> 00:21:20.376
इधर से शुरू होता है, इधर से।
वहां से नहीं होता है।

00:21:20.400 --> 00:21:24.136
कर्म के उदय से शुरूआत नहीं होती है।
इधर से शुरू होता है।

00:21:24.160 --> 00:21:41.336
बंध की शुरुआत भी इधर से,
मोक्ष की शुरुआत भी इधर से।

00:21:41.360 --> 00:21:46.536
ज्ञाता को कर्ता माना तो बंध हो गया,
मिथ्यात्व हो गया।

00:21:46.560 --> 00:21:51.216
शुद्ध को अशुद्ध मानना,
परिपूर्ण को अपूर्ण मानना,

00:21:51.480 --> 00:21:56.576
अबन्ध को बंध मानना, स्वभाव से च्युत हो गया। आहा!

00:21:56.600 --> 00:21:59.320
जैसा स्वभाव है, वैसा नहीं मानना,

00:21:59.320 --> 00:22:04.616
उसका नाम भाव बंध है।
वो भावबन्ध होता है तो निमित्त कारण होता है।

00:22:04.640 --> 00:22:09.576
भावबंध नहीं हो तो निमित्त
का प्रश्न ही नहीं होता है।

00:22:09.600 --> 00:22:14.136
स्वभाव में निमित्त नहीं होता है।
विभाव में निमित्त होता है।

00:22:14.160 --> 00:22:19.736
वो विभाव में निमित्त होने पर भी
वो जो नैमित्तिक कर्म का उदय,

00:22:19.760 --> 00:22:22.120
वो नियमरूप कारण नहीं है।

00:22:22.120 --> 00:22:28.616
नियमरूप कारण स्वभाव से च्युत होना है।

00:22:28.640 --> 00:22:30.400
(श्रोता:- तजे शुद्धनय बंध,
ग्रहे शुद्धनय मोक्ष) बस!

00:22:30.400 --> 00:22:38.096
वो बात चलती है!

00:22:38.120 --> 00:22:41.656
(मुमुक्षु:- स्वभाव से च्युत होना वो ही नियमरूप 
कारण है) बस, नियमरूप कारण विभाव हो गया।

00:22:41.680 --> 00:22:46.336
जब विभाव हो गया तब विभाव में
परपदार्थ निमित्त होता है। 'पर संग एव'

00:22:46.360 --> 00:22:51.456
पर पदार्थ निमित होता है,
आत्मा निमित्त नहीं होता है।

00:22:51.480 --> 00:22:55.496
विभाव में आत्मा निमित्त नहीं होता है।

00:22:55.520 --> 00:22:59.656
और विभाव की उत्पत्ति का नियमरूप कारण
कर्म का उदय भी नहीं है।

00:22:59.680 --> 00:23:13.296
स्वभाव से च्युत होना नियमरूप कारण है।

00:23:13.320 --> 00:23:13.880
इसमें है सब।

00:23:23.240 --> 00:23:26.416
किन्तु जो अपने आप रागादि
भाव को प्राप्त होने से

00:23:26.440 --> 00:23:29.320
स्फटिकमणि को रागादि का निमित होता है,

00:23:29.320 --> 00:23:31.800
रागादि की लाल पर्याय होती है ना,

00:23:31.800 --> 00:23:34.200
उसका निमित्त कारण कौन?

00:23:34.200 --> 00:23:38.976
कि जो स्वयं फूल अपने आप
अपने स्वभाव से लाल है।

00:23:39.000 --> 00:23:41.520
वो तो लाल उसका स्वभाव से है।

00:23:41.520 --> 00:23:43.440
वो तो उसका स्वभाव है।

00:23:43.520 --> 00:23:46.320
इधर का लाल, वो तो विभाव है।

00:23:46.320 --> 00:23:49.000
उधर का लाल, वो तो स्वभाव है।

00:23:49.000 --> 00:23:51.280
इधर का लाल विभाव है।

00:23:51.280 --> 00:23:57.176
तो इधर का लाल विभाव हुआ उसका
निमित्त कारण नियमरूप कारण वो नहीं है।

00:23:57.200 --> 00:24:01.056
वो कारण हो तो लाल ही होना चाहिए। होता नहीं है।

00:24:01.080 --> 00:24:05.216
समझे? और जो लाल पर्याय उत्पन्न होती है,

00:24:05.240 --> 00:24:07.280
उसका निमित्त कारण लाल फूल है,

00:24:07.280 --> 00:24:09.640
मगर उपादान कारण कौन?

00:24:09.640 --> 00:24:12.200
कि ये तत्समय की पर्याय।

00:24:12.200 --> 00:24:15.416
और पर्याय का कारण पर्याय नहीं है।

00:24:15.440 --> 00:24:22.776
अपने स्वभाव से च्युत हुआ।

00:24:22.800 --> 00:24:29.536
सूक्ष्म है।

00:24:29.560 --> 00:24:33.040
(मुमुक्षु:-ख्याल में आवे ऐसा
सूक्ष्म है) ख्याल मे आवे| बराबर! ख्याल मे आवे|
बुद्धिगम्य  है।

00:24:33.360 --> 00:24:40.016
जैनदर्शन आगम से, युक्ति से,
अनुमान से, अनुभव से सिध्द होता है।

00:24:40.040 --> 00:24:44.776
ऐसा हम कहे और तुम मान लो
आचार्य भगवान ना कहते हैं।

00:24:44.800 --> 00:24:49.296
मैं कहूंगा मगर तेरे अनुभव से प्रमाण करना।

00:24:49.320 --> 00:24:53.656
मैं तो कहूंगा कि शक्कर मीठी है।
मीठी बोलते है ना, मीठी है|

00:24:53.680 --> 00:24:57.976
मगर शक्कर मीठी है ऐसे नहीं मानना।

00:24:58.000 --> 00:25:02.816
जीभ पर चखकर परीक्षा कर के प्रमाण करना।

00:25:02.840 --> 00:25:07.256
नहींतर तो कोई फिटकरी दे तो
फिटकरी को शक्कर मान लेगा।

00:25:07.280 --> 00:25:10.280
मगर जीभ पर रखने के बाद
फिटकरीवाला बेचने को  आवे,

00:25:10.280 --> 00:25:13.896
शक्कर के भाव में, ठहरो ठहरो चख लूँ।

00:25:13.920 --> 00:25:15.280
अरे! भाई चखने की जरूरत नहीं है।

00:25:15.320 --> 00:25:18.040
जो कहो तो मानता है, चखले तो लेगा नहीं।

00:25:18.040 --> 00:25:23.016
समझे? आहाहा!

00:25:23.040 --> 00:25:24.360
चखने की क्या जरूरत है?

00:25:24.360 --> 00:25:26.880
ऐसी शक्कर सफ़ेद है, ऐसे ही ये भी सफेद है।

00:25:26.880 --> 00:25:31.216
नहीं, वो सफ़ेद लक्षण नहीं है।

00:25:31.240 --> 00:25:40.176
अतिव्याप्ति दोष है उसमें। आहाहा!

00:25:40.200 --> 00:25:41.560
मैं बहुत प्रयोग नहीं करता,

00:25:41.560 --> 00:25:43.560
अव्याप्ति अतिव्याप्ति असंभव का।

00:25:43.560 --> 00:25:51.096
सादी भाषा एकदम। समझ में आती है।

00:25:51.120 --> 00:25:54.656
एक भाई ने मेरे से कहा,
मैं बहुत खुश खुश हो गया।

00:25:54.680 --> 00:25:58.016
युगल जी साहब बैठे थे एक भाई आया|

00:25:58.040 --> 00:26:02.456
उसने कहा अपनी बात, अपनी बीती कथा कही।

00:26:02.480 --> 00:26:12.936
आप-बीती। तो उसने कहा

00:26:13.040 --> 00:26:15.920
मैंने यहाँ आने का प्रोग्राम बना लिया,
भिण्ड में।

00:26:17.400 --> 00:26:19.760
मगर एक भाई ने कहा कि वहाँ
जाने जैसा नहीं है,

00:26:19.760 --> 00:26:24.816
क्योंकि लालचंदभाई की बात तो
एकदम सूक्ष्म इतनी आती है
कि कोई समझ नहीं सके,

00:26:24.840 --> 00:26:28.936
तू तो तेरी ताकत नहीं है।

00:26:28.960 --> 00:26:31.920
वहां तो तेरे को नींद आयेगी, सुनते-सुनते।

00:26:33.000 --> 00:26:36.976
और दूसरे दिन भाग जायेगा। अच्छा!

00:26:37.000 --> 00:26:40.016
उसने तो निर्णय किया था कि मेरे को
जाना है। समजे!

00:26:40.040 --> 00:26:43.096
आया। सुनते सुनते सुनते सुनते, आहाहा!

00:26:43.120 --> 00:26:45.440
(भाव)विभोर हो गया। आहाहा!

00:26:45.440 --> 00:26:48.496
बाद में आया। मैं तो भाईसाहब!

00:26:48.520 --> 00:26:51.616
आज मेरे घर में आ गया।

00:26:51.640 --> 00:26:55.376
सब बात मेरे पल्ले पड़ गई।

00:26:55.400 --> 00:26:59.336
कोई नहीं समझ में आवे ऐसी कोई कड़क भाषा

00:26:59.360 --> 00:27:03.096
कोई संस्कृत भाषा, कोई माघदी भाषा,
कोई व्याकरण,

00:27:03.120 --> 00:27:06.816
कोई अतिव्याप्ति, असंभव दोष, कोई नहीं।

00:27:06.840 --> 00:27:11.256
अनेकान्त, हेत्वाभास, वो विचार
आता है कोई दोष की बात नहीं है।

00:27:11.280 --> 00:27:21.096
इधर गुणी और गुण की बात है।

00:27:21.120 --> 00:27:24.816
सब पढ़ा है। सब जानते हैं।
नहीं जानते हैं, ऐसा नहीं।

00:27:24.840 --> 00:27:29.296
पर प्रयोग नहीं करते।

00:27:29.320 --> 00:27:33.536
सामान्य जन समुदाय को ख्याल में नहीं आता।

00:27:33.560 --> 00:27:36.696
अभ्यासी को तो ख्याल में आवे।

00:27:40.040 --> 00:27:41.440
(मुमुक्षु):- सही समजानेवाला कोई नहीं था|
इसलिए नहीं . .

00:27:41.440 --> 00:27:47.976
लेकिन जब सुनी है तो आनंद से
विभोर हो जाता है|

00:27:48.000 --> 00:27:51.816
(उत्तर):- अपनी बात है ना, विकथा तो नहीं है।

00:27:51.840 --> 00:27:55.976
विकथा तो मना है वहाँ। बोर्ड लगा था,

00:27:56.000 --> 00:28:07.256
मैंने तो पढ़ा। आहाहा!

00:28:07.280 --> 00:28:09.840
नहीं समझ में आवे ऐसी बात नहीं है।

00:28:09.880 --> 00:28:12.896
आत्मा सर्वतज्ञशक्ति से भरा हुआ है।

00:28:12.920 --> 00:28:15.360
अनंत-अनंत शक्ति से विराजमान आत्मा है।

00:28:15.360 --> 00:28:16.520
अनंत शक्ति सम्पन्न है।

00:28:16.520 --> 00:28:20.176
अपनी बात समझ में नहीं आवे? आहाहा!

00:28:20.200 --> 00:28:24.256
अपने बैंक बैलेंस में कुछ किसी को पूछना पड़े?

00:28:24.280 --> 00:28:29.016
अपने बैंक बैलेंस में किसी
और को पूछे तो तकलीफ  है।

00:28:29.040 --> 00:28:38.896
मैं क्या हूँ उसको जानने में
क्या तकलीफ? आहाहा!

00:28:39.000 --> 00:28:40.240
किन्तु जो अपने आप रागादि भाव को
प्राप्त होने से,

00:28:40.240 --> 00:28:41.840
स्फटिकमणि को रागादि का निमित होता है,

00:28:41.840 --> 00:28:45.856
ऐसे पर द्रव्य के द्वारा ही शुद्ध स्वभाव से
च्युत होता हुआ ही, देखो!

00:28:47.640 --> 00:28:48.960
आहाहा! मैन चीज वो है।

00:28:48.960 --> 00:28:54.696
स्फटिकमणि अपने स्वभाव से
यानि पर्याय स्वभाव से च्युत होता है।

00:28:54.720 --> 00:29:02.376
द्रव्य स्वभाव से कभी च्युत होता
नहीं है। क्या कहा?

00:29:02.400 --> 00:29:07.176
अपना जो त्रिकाली शुद्ध स्वभाव
सामान्य स्फटिकमणि का,

00:29:07.200 --> 00:29:11.536
उसका अभाव होकर लाल होता नहीं है।

00:29:11.560 --> 00:29:17.536
मगर पर्याय में जो स्वच्छता है,

00:29:17.560 --> 00:29:23.016
उस स्वच्छता को वो स्वयं छोड़ देता है।

00:29:23.320 --> 00:29:26.280
वो त्रिकाली जो शुद्ध है स्फटिकमणि,

00:29:26.280 --> 00:29:30.816
वो उसको छुड़ाता नहीं है
और पर भी उसको छुड़ाता नहीं है।

00:29:30.840 --> 00:29:35.696
वो पर्याय की योग्यता से स्वयं
स्वच्छता को छोड़कर

00:29:35.720 --> 00:29:39.496
लाल रंग रूप परिणमती है। आहाहा!

00:29:39.520 --> 00:29:42.160
तो स्वभाव से च्युत हो गई वो पर्याय।

00:29:42.160 --> 00:29:45.336
पर्याय अपने स्वच्छ स्वभाव से च्युत हो गई।

00:29:45.360 --> 00:29:52.136
यानि जो पर्याय का संबंध शुद्ध
स्फटिकमणि के साथ था,

00:29:52.160 --> 00:29:56.576
वो संबंध तोड़ दिया तो शुद्धि आ गई।

00:29:56.600 --> 00:29:58.320
क्या कहा?

00:29:58.320 --> 00:30:01.416
उसको संबंध हुआ तो लाल हुआ ऐसा नहीं है।

00:30:01.440 --> 00:30:05.656
इसके साथ संबंध पर्याय का था, उसने तोड़ दिया।

00:30:05.680 --> 00:30:09.056
तोड़ दिया तो वहां जोड़ दिया
तो वहां लाल हो गया।

00:30:09.080 --> 00:30:27.136
इधर तोड़ा तो लाल हुआ,
बाद में वो जोड़ा (ऐसा) कहा जाता है।

00:30:27.160 --> 00:30:31.336
जो पर्याय स्वच्छ थी, वो स्वच्छ पर्याय,

00:30:31.360 --> 00:30:35.416
स्फटिकमणि के साथ संबंध रखती थी।

00:30:35.440 --> 00:30:39.336
समझे? स्वतंत्र हैं ना,

00:30:39.360 --> 00:30:39.600
स्फटिकमणि की पर्याय भी स्वतंत्र है ना।

00:30:39.600 --> 00:30:45.016
उसका साथ संबंध स्फटिकमणि
शुद्धता के साथ संबंध था।

00:30:45.040 --> 00:30:48.096
वो संबंध पर्याय ने वहाँ से च्युत हो गई,

00:30:48.120 --> 00:30:52.536
खिसक गयी, हट गई, अभेद में भेद कर दिया।

00:30:52.560 --> 00:30:54.880
अभेद में भेद कर दिया।

00:30:54.880 --> 00:30:58.896
स्फटिकमणि और स्फटिकमणि की पर्याय,

00:30:58.920 --> 00:31:06.936
वो स्फटिकमणि ही था, अभेद ही था।

00:31:06.960 --> 00:31:10.136
वहां से वो छूटी हो गई,

00:31:11.720 --> 00:31:12.600
वहां से वो छूटी हो गई, समझे?

00:31:12.600 --> 00:31:15.776
छूटी क्या कहेते है? हट गई|

00:31:15.800 --> 00:31:19.416
वहां से पर्याय हट गई और यहां से जुड़ गई

00:31:19.440 --> 00:31:37.896
तो लाल रूप में परिणमती है पर्याय।

00:31:37.920 --> 00:31:40.400
इधर से हटी तब लाल हुआ,

00:31:40.400 --> 00:31:43.400
लाल जब हुआ तो वहां जुड़ती है।

00:31:43.400 --> 00:31:47.896
इधर से संबंध तोड़ा उससे संबंध जोड़ा।

00:31:47.920 --> 00:31:50.936
मगर वहां से संबंध जोड़ा- वहां से नहीं लेना।

00:31:50.960 --> 00:31:55.616
इधर से संबंध तोड़ा-वहाँ से लेना।

00:31:55.640 --> 00:32:02.096
ये मूल कारण है। ये गाथा सरस है।

00:32:02.120 --> 00:32:06.256
स्वभाव से च्युत हुआ। इसका अर्थ है।

00:32:06.720 --> 00:32:08.400
(मुमुक्षु):- है तो अभेद ही स्वभाव उसका

00:32:08.400 --> 00:32:11.320
वो अभेद स्वभाव को छोड़कर भेद में आ गया|
(उत्तर):- हं..

00:32:11.320 --> 00:32:16.816
यहाँ से ज़रा छूटी पड़ी तो कहीं तो जुड़ेगी ना।

00:32:16.840 --> 00:32:18.680
प्रश्न:- क्योंकि पर्याय किसी न किसी
से तो अभेद रहेगी ही।

00:32:18.680 --> 00:32:20.560
उत्तर:- हाँ! यहाँ से अभेद हुई,

00:32:20.600 --> 00:32:23.600
यहाँ से छूटी, तो फूल से अभेद हो गयी।

00:32:24.240 --> 00:32:33.776
समजी गया? तो लाल रंग रूप से
परिणामित हो गयी।

00:32:33.800 --> 00:32:35.200
ये अभी सिद्धांत में आयेगा।

00:32:35.200 --> 00:32:38.256
अभी स्फटिकमणि की बात चलती है।

00:32:38.280 --> 00:32:40.440
स्फटिकमणि में तो ज्ञान नहीं है,

00:32:40.440 --> 00:32:45.376
तो जोड़ना-तोड़ना वो बात तो एक
सामान्य समझाने के लिये।

00:32:45.400 --> 00:32:46.960
इधर से तोड़ना वहां से जोड़ना,

00:32:46.960 --> 00:32:48.320
उसमें तो नहीं है।

00:32:48.320 --> 00:32:52.296
मगर ज्ञान की पर्याय में तो तोड़ना
और जोड़ना बन जाता है।

00:32:52.320 --> 00:32:57.496
इधर से तोड़ना वहां से जोड़ना,
संसार हो गया वो तो।

00:32:57.520 --> 00:33:09.216
अभी सिद्धांत में आयेगा।
सिद्धांत में सब आएगा।

00:33:09.240 --> 00:33:12.376
शुद्ध स्वभाव से च्युत होने पर
रागादि रूप में परिणमित होता है।

00:33:12.400 --> 00:33:14.320
यहाँ कहा ना, शुद्ध स्वभाव से च्युत हो गया,

00:33:14.320 --> 00:33:17.160
स्फटिकमणि का बिम्ब।

00:33:17.160 --> 00:33:22.696
उसकी जानकारी नहीं है,
ज्ञान नहीं है तो भी च्युत होता है।

00:33:22.720 --> 00:33:25.520
जैसे जल है ना जल, गरम होता है ना,

00:33:25.520 --> 00:33:29.096
तो शीतल स्वभाव से च्युत हो गई पर्याय।

00:33:29.120 --> 00:33:35.736
शीतल स्वभाव का संबंध तोड़ा
और अग्नि का संबंध जोड़ा,

00:33:35.760 --> 00:33:37.520
तो उष्ण हुआ।

00:33:37.520 --> 00:33:45.896
वहाँ से संबंध जोड़ती नहीं है पर्याय,
इधर से तोड़ती है पहले।

00:33:47.560 --> 00:33:49.360
(मुमुक्षु):- अग्नि के संग से गरम
नहीं हुआ है|
(उत्तर):- ना ना बिल्कुल नहीं|

00:33:49.360 --> 00:33:58.936
वो तो सेकेंडरी है वो तो सेकेंडरी है। आहाहा!

00:33:58.960 --> 00:34:03.216
पानी का द्रष्टांत से, समझ में आया?

00:34:03.240 --> 00:34:05.480
शीतल स्वभाव पानी था दल।

00:34:05.480 --> 00:34:07.720
उसकी पर्याय भी शीतल थी।

00:34:07.720 --> 00:34:11.856
और शीतल जो पर्याय थी
वो शीतल स्वभाव से हट गई,

00:34:11.880 --> 00:34:14.360
खसक गई, तोड़ दिया संबंध।

00:34:14.360 --> 00:34:18.536
संबंध तोड़ा, तो अग्नि में जोड़ा,
तो उष्ण हो गया।

00:34:18.560 --> 00:34:23.456
उष्ण का मूल कारण अग्नि नहीं है।

00:34:23.480 --> 00:34:27.816
अपना संबंध तोड़ना, स्वाभाव से,
त्रिकाल स्वभाव से संबंध तोड़ना,

00:34:27.840 --> 00:34:31.136
पर के साथ संबंध जोड़ना आहाहा!

00:34:31.160 --> 00:34:41.256
वो ही उष्ण की पर्याय का कारण नियम है।

00:34:41.280 --> 00:34:56.416
उस रीति से वास्तव में (गहराई में चले गयी)

00:34:56.440 --> 00:35:01.616
ऐसा विषय, अद्भुत, समयसार
तो लगे हमको प्यारा।

00:35:01.640 --> 00:35:04.160
पूरा ब्रह्माण्ड इसमें भरा है।

00:35:04.160 --> 00:35:12.856
जितनी ताकत, इसमें से निकाल सके।

00:35:12.880 --> 00:35:16.856
पेतीस साल पहले मैं ईसरी गया था।

00:35:16.880 --> 00:35:19.936
तब गणेशप्रसादजी वर्णी को 1९ प्रश्न किया था।

00:35:19.960 --> 00:35:24.096
बाद में वो आहार के लिये चला गया।

00:35:24.120 --> 00:35:26.280
बाद में पाँच सात पंडित त्यागी वहां बैठे थे।

00:35:26.280 --> 00:35:31.776
मैंने कहा कि ये राग की उत्पत्ति का
नियमरूप कारण क्या है, बताओ?

00:35:31.800 --> 00:35:33.440
कि कर्म के उदय से राग होता है।

00:35:33.440 --> 00:35:35.760
नहीं नियमरूप कारण नहीं है वो।

00:35:35.760 --> 00:35:39.056
राग की उत्पत्ति का नियमरूप कारण
कर्म का उदय हो,

00:35:39.080 --> 00:35:41.440
तो वो पराधीन हो गई पर्याय।

00:35:41.440 --> 00:35:42.680
तो स्वाधीन रही नहीं पर्याय।

00:35:42.680 --> 00:35:46.416
बहुत चर्चा हुई मगर किसी से जवाब नहीं आया।

00:35:46.440 --> 00:35:49.696
बाद में एक पंडित आया- भाईसाहब!
आप कहो ना क्या नियमरूप कारण?

00:35:49.720 --> 00:35:53.456
स्वभाव से च्युत होना नियमरूप कारण है।

00:35:53.480 --> 00:35:54.800
स्वभाव को भूल जाना,

00:35:54.800 --> 00:35:59.656
अपने को आप भूले कि हैरान हो गया। आहाहा!

00:35:59.680 --> 00:36:05.216
जो स्वरूप समझे बिना पामे दुःख अनन्त।

00:36:05.240 --> 00:36:08.496
अनंत दुःख का कारण अपने स्वभाव को भूल गया।

00:36:08.520 --> 00:36:17.536
ज्ञाता को कर्ता माना, अबन्ध को
बंध माना। आहाहा।

00:36:17.560 --> 00:36:22.536
वास्तव में अकेला आत्मा, अकेला आत्मा,

00:36:22.560 --> 00:36:26.816
एकाकी, एकाकी है, पर का संग नहीं है उसको।

00:36:26.840 --> 00:36:30.736
कभी हुआ नहीं है।

00:36:30.760 --> 00:36:35.736
अपने परिणमन स्वभाववाला होने पर भी,

00:36:35.760 --> 00:36:39.656
एक तो अकेला है और दूसरा परिणमन स्वभाव भी है,

00:36:39.680 --> 00:36:45.056
तो भी वो मिथ्यात्व का कारण
होता नहीं है। आहाहा!

00:36:45.080 --> 00:36:48.000
बंध कहो कि मिथ्यात्व कहो।

00:36:48.000 --> 00:36:51.056
अपने शुद्ध स्वभाव के कारण।

00:36:51.080 --> 00:36:52.760
आत्मा तो त्रिकाल शुद्ध है।

00:36:52.760 --> 00:36:57.376
वो अशुद्धता का कारण होता नहीं है।

00:36:57.400 --> 00:37:00.456
रागादि का निमित्तपना नहीं होने से,

00:37:00.480 --> 00:37:03.536
राग का निमित्त कारण वो नहीं है।

00:37:03.560 --> 00:37:05.920
राग का निमित्त कारण आत्मा हो तो,

00:37:05.920 --> 00:37:08.680
आत्मा तो त्रिकाल है। त्रिकाल रहनेवाला है।

00:37:08.680 --> 00:37:13.656
तो रागी होने लगे। तो आत्मा
राग का कारण नहीं है।

00:37:13.680 --> 00:37:20.856
राग का उपादान कारण भी
आत्मा नहीं है और निमित्त कारण
भी आत्मा नहीं है।

00:37:20.880 --> 00:37:27.216
और उसका उपादान कारण उपादेय भी नहीं है।

00:37:27.240 --> 00:37:30.696
परिणमन स्वभाव, परिणमन स्वभाव तो सब में है।

00:37:30.720 --> 00:37:34.336
तो सब में एक जैसा मिथ्यात्व होना चाहिए।

00:37:34.360 --> 00:37:38.096
परिणमन स्वभाव नहीं है। आहाहा!

00:37:39.546 --> 00:37:42.002
अपनेको शुद्ध स्वभावपने  के
कारण रागादिका निमितपनान होनेसे,

00:37:42.100 --> 00:37:46.100
स्वयं अपनेको स्वयं अपने को,
अपने आप, अपने आप

00:37:46.800 --> 00:37:50.216
रागदीरूप परिणमन का निमित न होनेसे,

00:37:50.240 --> 00:37:53.456
अपने आप ही  अपने आप अकेला अकेला

00:37:53.520 --> 00:37:57.496
सूर्यकांत मणि का द्रष्टान्त  देते है,
आहाहा! आगे आयेगा,

00:37:57.520 --> 00:38:00.896
अपने आप अकेला अकेला, आहाहा!

00:38:00.920 --> 00:38:04.536
अपने आप रागदीरूप से परिणमन नहीं करता है|

00:38:04.560 --> 00:38:09.496
आत्मा मिथ्यात्व रूप से अकेला-अकेला
अपने आप परिणमन नहीं करता है।

00:38:09.520 --> 00:38:11.920
उसमें परसंग से उत्पन्न होता है।

00:38:11.920 --> 00:38:13.640
मगर परसंग निमित्त कारण है।

00:38:13.640 --> 00:38:15.120
निमित्त का प्रश्न पूछा।

00:38:15.120 --> 00:38:19.496
निमित्त का कारण पूछने पर
उसको उपादान कारण लगा दिया।

00:38:19.520 --> 00:38:21.000
शुद्ध स्वभाव से च्युत हुआ,

00:38:25.960 --> 00:38:26.120
इधर से तोड़ा संबंध उधर से जोड़ा। क्या तोड़ा?

00:38:26.120 --> 00:38:29.176
उपयोग में आत्मा जानने में आने पर भी,

00:38:29.200 --> 00:38:33.936
उपयोग में प्रत्येक जीव को प्रत्येक समय पर

00:38:33.960 --> 00:38:38.736
भगवान आत्मा जानने में आने पर भी,

00:38:38.760 --> 00:38:43.416
वो उपयोग में आत्मा जानने में नहीं आता है।

00:38:43.440 --> 00:38:49.536
ऐसा माना, तो ज्ञान ने ज्ञायक से
अभेद होने पर वहां से संबंध तोड़ दिया।

00:38:49.560 --> 00:38:54.896
द्रव्य के साथ पर्याय का संबंध
समय-समय तोड़ता है।

00:38:54.920 --> 00:38:57.600
समय-समय तोड़ता है और पर से जोड़ता है।

00:38:57.600 --> 00:39:05.896
समय-समय अभेद होने पर भी
भेद कर के तोड़ता है। आहाहा!

00:39:05.920 --> 00:39:11.416
उपयोग में आत्मा जानने में
आने पर भी समय-समय पर,

00:39:11.440 --> 00:39:13.960
मेरे को, ज्ञानी को आत्मा जानने में आता है,

00:39:13.960 --> 00:39:17.936
हम तो अज्ञानी हैं। ऐसा है नहीं।

00:39:17.960 --> 00:39:21.136
प्रत्येक जीव को प्रत्येक समय पर

00:39:21.160 --> 00:39:26.736
अपना भगवान आत्मा जानने में आ रहा है।

00:39:26.760 --> 00:39:35.016
न बोले तो भी जानने में आ रहा है,
हां बोले तो भी जानने में आ रहा है। आहाहा!

00:39:35.120 --> 00:39:37.120
हाँ ही बोले, क्यूं  न बोले? आहा!

00:39:37.120 --> 00:39:41.056
..तो ऐसे अपनी ज्ञान की पर्याय में

00:39:41.080 --> 00:39:43.920
ज्ञायक आत्मा जानने में आ रहा है।

00:39:43.920 --> 00:39:50.776
वो अभेदरूप जानने में आ रहा है।
वो भी अभेदरूप अनन्यरूप जानने में आ रहा है।

00:39:50.800 --> 00:39:53.240
ज्ञान की पर्याय उधर और ज्ञायक इधर,

00:39:53.240 --> 00:39:55.800
वो ज्ञान की पर्याय इसको जानता है
- ऐसा नहीं है,

00:39:55.800 --> 00:39:58.040
ऐसा नहीं है।

00:39:58.040 --> 00:40:01.216
वो उपयोग आत्मा से अनन्य है।

00:40:01.240 --> 00:40:06.496
आत्मा से अनन्य होकर अनन्यरूप जानता है।

00:40:06.520 --> 00:40:11.056
ऐसा अनन्य स्वभाव होने पर भी,

00:40:11.080 --> 00:40:14.656
उसको पर्याय को वो भेद करके
तोड़ देता है, संबंध।

00:40:14.680 --> 00:40:17.160
कि पर जानने में आता है।

00:40:17.160 --> 00:40:21.016
तो स्व जानने में आने पर भी संबंध तोड़ा इधर

00:40:21.040 --> 00:40:25.136
और पर के साथ संबंध जोड़ा
कि पर जानने में आया,

00:40:25.160 --> 00:40:30.176
उसका नाम अज्ञान है, मिथ्यात्व है।

00:40:30.200 --> 00:40:34.776
अभेद में भेद करे तो इधर से संबंध टूटता है

00:40:34.800 --> 00:40:37.560
और पर के साथ संबंध जुड़ता है।

00:40:37.560 --> 00:40:40.000
अभेद में अभेद नहीं रहता है आत्मा तो,

00:40:40.000 --> 00:40:42.600
अभेद ही रहता है, उपयोगमयी आत्मा है।

00:40:42.600 --> 00:40:46.696
उपयोग में उपयोग है,
उपयोग में राग है ही नहीं।

00:40:46.720 --> 00:40:50.136
उपयोग में जो उपयोग दिखाई देवे,
तो सम्यग्ज्ञान है

00:40:50.160 --> 00:40:56.016
और उपयोग में राग दिखाई देवे,
तो मिथ्याज्ञान हो गया।

00:40:56.040 --> 00:40:57.920
इधर से संबंध तोड़ दिया ना।

00:40:57.920 --> 00:41:01.576
यानि राग जानने में आता है इसलिए बंध नहीं।

00:41:01.600 --> 00:41:07.856
आत्मा को नहीं जानता है
इसलिए बंध है।

00:41:07.880 --> 00:41:11.736
क्या कहा?

00:41:11.760 --> 00:41:13.440
क्योंकि उसमें नियम नहीं रहा।

00:41:13.440 --> 00:41:18.056
क्योंकि ज्ञानी तो राग को जानता है
तो भी बंध होता नहीं है।

00:41:18.080 --> 00:41:21.256
क्योंकि स्वभाव से च्युत होता नहीं है।

00:41:21.280 --> 00:41:24.160
राग को जानता है तो भी बंध होता नहीं है।

00:41:24.160 --> 00:41:26.200
आता है ने ७५ वी गाथा में रागी तो पुद्गल है।

00:41:26.200 --> 00:41:28.560
जाना कि नहीं उसने?

00:41:28.560 --> 00:41:31.240
तो राग को जानने से भावबन्ध होता नहीं है।

00:41:31.240 --> 00:41:38.576
अपने स्वभाव से च्युत होता है,
तो भावबंध होता है-

00:41:38.600 --> 00:41:43.936
मूल बात है।

00:41:50.120 --> 00:41:55.016
ज्ञायक जानने में नहीं आता है,
मुझे ये बंध हो गया।

00:41:55.040 --> 00:41:58.896
अरे! ज्ञायक जानने में आता नहीं
तो सेकन्डेरी में  क्या आया?

00:41:59.200 --> 00:41:59.680
कि पर जानने में आता है।

00:41:59.680 --> 00:42:02.360
तो पर जानने में आता है,
जिससे इसलिए बंध होता है

00:42:02.360 --> 00:42:04.280
- ये निमित्त प्रधान कथन है

00:42:04.280 --> 00:42:15.536
उपादान प्रधान कथन तो यहाँ से
छूटा तो ही बंध का कारण है।

00:42:15.560 --> 00:42:24.416
ये संध्या का घर है ना।

00:42:24.440 --> 00:42:33.256
शिकोहाबाद भाग्यशाली है। संध्या का घर है।

00:42:33.280 --> 00:42:35.160
क्या कहते हैं? फरमाते हैं।

00:42:35.160 --> 00:42:38.416
शुद्ध स्वभाव से च्युत बस ये
नियमरूप कारण हुआ।

00:42:38.440 --> 00:42:41.576
पर को जानने से बंध होता नहीं है।

00:42:41.600 --> 00:42:44.200
क्योंकि व्यवहारनय जाना हुआ प्रयोजनवान है,

00:42:44.200 --> 00:42:45.760
तो बंध होना चाहिए।

00:42:45.760 --> 00:42:48.440
पर को जानने से बंध नहीं होता है।

00:42:48.440 --> 00:42:51.040
स्व को नहीं जानने से बंध होता है।

00:42:51.040 --> 00:42:53.120
स्व को नहीं जानना वो बंध का कारण,
निमित्त हुआ।

00:42:53.120 --> 00:42:57.096
तो पर को जानने से बंध  होता, अध्यवसान होता है।

00:42:57.120 --> 00:43:00.080
धर्मास्तिकाय को जानने से अध्यवसान होता है।

00:43:00.080 --> 00:43:02.200
वो दूसरी बात है।

00:43:02.200 --> 00:43:04.120
वो धर्मास्तिकाय को जब जानते हैं,

00:43:04.120 --> 00:43:06.560
तब अपने को जानने को भूल गया

00:43:06.560 --> 00:43:09.080
वो मिथ्यात्व का नियमरूप कारण है।

00:43:09.080 --> 00:43:28.976
वो तो निमित्त कारण है।

00:43:29.000 --> 00:43:36.216
सब गुरुदेव का प्रताप है।

00:43:36.240 --> 00:43:39.776
अपनेको शुद्ध स्वभाव के कारण
रागादिका निमितत्व न होनेसे, आहा!

00:43:39.800 --> 00:43:42.240
अकेला-अकेला आत्मा राग का निमित्त कारण हो,

00:43:42.240 --> 00:43:46.256
तो मिथ्यात्व होना ही,
अनादि अनंत, छूटे ही नहीं।

00:43:46.280 --> 00:43:49.376
और (जो) कर्म के उदय से
मिथ्यात्व हो तो पराधीन हो जाये।

00:43:49.400 --> 00:43:51.400
और परिणमन स्वभाव मिथ्यात्व हो तो

00:43:51.400 --> 00:43:52.600
परिणमन स्वभाव तो स्वभाव है।

00:43:52.960 --> 00:43:58.976
(मुमुक्षु):- वो तो सिध्द में भी है।
(उत्तर):- वो तो सिध्द में भी है। आहाहा!

00:43:59.000 --> 00:44:00.040
त्रिकाल स्वभाव कारण नहीं,

00:44:00.040 --> 00:44:03.656
उत्पाद-व्यय कारण नहीं,
परपदार्थ भी नियमरूप कारण नहीं,

00:44:03.680 --> 00:44:05.360
कारण हैं, मगर नियमरूप नहीं।

00:44:05.360 --> 00:44:10.216
कारण तो है- निमित्त कारण।

00:44:10.240 --> 00:44:14.376
हाँ! अभी एजेंडा पर ये है। नियमरूप कारण।

00:44:14.400 --> 00:44:19.016
राग को जाननेसे बंध होता नहीं, होता है? नहीं। आहाहा!

00:44:19.040 --> 00:44:26.776
स्वभाव से च्युत हुआ तो बंध हो जाता है। बस|

00:44:26.800 --> 00:44:29.080
हां! वो ही निमित्त कारण को जानता है।

00:44:29.080 --> 00:44:30.640
निमित्त कारण कौन जानता है?

00:44:30.640 --> 00:44:32.400
कि जो नियमरूप कारण जानता है।

00:44:32.400 --> 00:44:35.976
ये लिखा है ना कि शुद्ध स्वभाव से च्युत होता हुआ,

00:44:36.000 --> 00:44:38.920
वो जानता है उसने लिखा।

00:44:38.920 --> 00:44:41.400
कोहिनूर का हीरा रख दिया।

00:44:41.400 --> 00:44:47.136
श्रोता:- ये मूल कारण की खबर
पड़े तो ये बंध रहे ही नहीं।

00:44:47.160 --> 00:44:48.920
उत्तर:- रहे ही नहीं।

00:44:48.920 --> 00:44:52.096
अरे! मेरे ज्ञान में आत्मा
जानने में आ रहा है,

00:44:52.120 --> 00:44:53.240
मैं ना कैसे कहूँ?

00:44:53.240 --> 00:44:58.656
ना कहूँ तो मिथ्यात्व का दोष आ जाये।

00:44:58.680 --> 00:45:02.216
पर को जानता है इसलिए
मिथ्यात्व है, वो नियम नहीं।

00:45:02.240 --> 00:45:05.816
इधर (स्व) को नहीं जाना तो अध्यवसान हुआ।

00:45:05.840 --> 00:45:07.960
और अध्यवसान कब हुआ?

00:45:07.960 --> 00:45:10.320
कि पर को जानने से हुआ।

00:45:10.320 --> 00:45:12.280
वहाँ से समझाया जाता है।

00:45:12.280 --> 00:45:15.000
है तो मूल उदभव स्थान यहाँ।

00:45:15.000 --> 00:45:23.616
उदभव स्थान तो अंदर में है।

00:45:23.640 --> 00:45:30.816
शॉर्ट में कहना पड़े कि धर्मास्तिकाय
को जानता हूँ तो अध्यवसान हो गया।

00:45:30.840 --> 00:45:33.600
मगर अध्यवसान का मेन कारण तो
अपने स्वभाव से च्युत हुआ।

00:45:33.600 --> 00:45:37.216
जाननहार को नहीं जाना और जो
जिसका ज्ञान का नहीं है,

00:45:37.240 --> 00:45:39.120
उसको जानने में गया।

00:45:39.120 --> 00:45:46.296
इधर से छूटा और वहाँ से जुड़ा तो बंध हो गया।

00:45:46.320 --> 00:45:51.776
निमित्त कारण की सिद्धि करते करते भी
शुद्ध स्वभाव से च्युत होता है।

00:45:51.800 --> 00:45:53.400
मूल कारण ले लिया। आहाहा!

00:45:53.400 --> 00:46:00.216
ये तो समयसार है। आहाहा!

00:46:00.240 --> 00:46:03.256
गूढ़ है। गुरुगम से जाननेमे आता है।

00:46:03.280 --> 00:46:08.016
श्रीमद जी ने लिखा है कि
द्रव्यानुयोग अति सूक्ष्म है।

00:46:08.040 --> 00:46:12.896
वो अपनी योग्यता और गुरुगम से
ख्याल में आता है।

00:46:12.960 --> 00:46:14.280
थाके अति मति मान| क्या?

00:46:14.280 --> 00:46:17.936
(मुमुक्षु):- जिन प्रवचन गुरुगम्यता,
थाके अति मतिमान।

00:46:17.960 --> 00:46:23.056
अबलम्बन श्री सद्गुरु, सुगम अने सुखधाम ।

00:46:23.080 --> 00:46:30.656
आगम का मर्म ज्ञानी के हृदय में है।

00:46:30.680 --> 00:46:32.640
अपनेको शुद्ध स्वभाव के कारण
रागादिका निमितत्व न होनेसे,

00:46:32.640 --> 00:46:37.136
(अर्थात स्वयं अपनेको  रागादिरूप
परिणमन का निमित न होनेसे)

00:46:37.200 --> 00:46:42.576
आहाहा! राग का निमित्त कारण
आत्मा नहीं और परिणमन स्वभाव भी नहीं।

00:46:42.840 --> 00:46:46.216
कर्म का उदय नियमरूप कारण,
ये तो निमित्त कारन है।

00:46:46.240 --> 00:46:48.680
तो नियमरूप कारण कौन?

00:46:48.680 --> 00:46:54.416
कि शुद्ध स्वभाव से च्युत हुआ कि
मेरा आत्मा मेरे को जानने में आता नहीं है।

00:46:54.440 --> 00:46:55.920
बस, वो अज्ञान हो गया!

00:46:55.920 --> 00:46:59.536
मेरा आत्मा मेरे को जानने में नहीं आता है।

00:46:59.560 --> 00:47:03.016
वो तो ज्ञानी को जानने में
आवे मैं तो अज्ञानी हूँ।

00:47:03.040 --> 00:47:06.056
नहीं तू अज्ञानी नहीं है।

00:47:06.080 --> 00:47:12.256
तेरे अंदरमें  समय समय पर
उत्पाद व्यय उपयोग लक्षण प्रगट होता है।

00:47:12.280 --> 00:47:13.720
ज्ञान प्रगट होता है।

00:47:13.720 --> 00:47:18.056
वो ज्ञान ज्ञायक से अनन्य होने से, आहाहा!

00:47:18.080 --> 00:47:20.280
निरंतर जानने में आ रहा है।

00:47:20.280 --> 00:47:23.080
नकार न कर, नकार न कर।

00:47:23.080 --> 00:47:26.896
हकार कि जाननेवाला जानने में आता है।

00:47:26.920 --> 00:47:29.840
जाननहार जानने में आ रहा है।

00:47:30.560 --> 00:47:34.216
जाननहार जानने में आ रहा है।

00:47:34.240 --> 00:47:41.976
जानना नहीं है जानने में आ रहा है।

00:47:42.000 --> 00:47:45.776
उपयोग में आत्मा जानने में आ रहा है।

00:47:45.800 --> 00:47:48.200
उसमें पुरुषार्थ की जरूरत नहीं।

00:47:48.200 --> 00:48:04.656
स्वीकार करे, उसका नाम पुरुषार्थ है।

00:48:04.680 --> 00:48:05.360
उसमें पुरुषार्थ क्या?

00:48:05.360 --> 00:48:08.536
उपयोग में तो आत्मा जानने में सबको आ रहा है,

00:48:08.560 --> 00:48:09.400
वो तो स्वभाव है।

00:48:09.400 --> 00:48:13.896
स्वीकार करना, उसका नाम पुरुषार्थ है।

00:48:13.920 --> 00:48:16.520
नकार करना स्वभाव से च्युत हो गया

00:48:16.520 --> 00:48:22.416
मिथ्यात्व और दर्शनमोह के उदय
को निमित्त कारण कहा जाता है।

00:48:22.440 --> 00:48:24.400
वो बाद की बात है।

00:48:24.400 --> 00:48:27.280
प्रश्न:- निमित्त कारण की चर्चा करना नियमरूप कारण नहीं।

00:48:27.280 --> 00:48:30.416
उत्तर:- हाँ! यहाँ प्रश्न पूछा है निमित का,

00:48:30.440 --> 00:48:35.576
नैमित्तिक कब होता है कि
स्वभाव से च्युत हो तब।

00:48:35.600 --> 00:48:38.400
नैमित्तिक का कारण स्वभाव से च्युत।

00:48:38.400 --> 00:48:47.376
नैमित्तिक का कारण स्वभाव से
च्युत होना वो नियमरूप कारण है।

00:48:47.400 --> 00:48:55.256
निमित्त की बात बाद में करो।

00:48:55.280 --> 00:49:02.296
गुरुदेव फरमाते थे कि ऐसी टीका
न भूतो न भविष्यती।

00:49:02.320 --> 00:49:15.096
भविष्य में भी ऐसी टीका, आहाहा!

00:49:15.120 --> 00:49:23.096
गुरुकृपा है।

00:49:23.120 --> 00:49:25.720
अपनेको शुद्ध स्वभाव के कारण
रागादिका निमितत्व न होनेसे,

00:49:25.720 --> 00:49:28.896
अर्थात स्वयं अपनेको रागदीरूप
परिणमन का निमित न होनेसे,

00:49:28.920 --> 00:49:30.800
निमित्त कारण नहीं है आत्मा|

00:49:30.800 --> 00:49:33.800
अपने आप ही रागादीरूप परिणमता नहीं|

00:49:33.800 --> 00:49:37.456
अपने आप रागरूप परिणमन नहीं होता है|

00:49:37.480 --> 00:49:43.216
यानि ये आत्मा राग का निमित्त
कारण नहीं होता है।

00:49:43.240 --> 00:49:45.920
राग का निमित्त कारण पर है

00:49:45.920 --> 00:49:51.096
और राग नैमित्तिक, कर्म का उदय निमित्त,

00:49:51.120 --> 00:49:53.120
मगर नैमित्तिक का कारण क्या?

00:49:53.120 --> 00:50:01.056
कि अपने स्वभाव से च्युत होना है।

00:50:01.080 --> 00:50:03.360
अपने आप ही रागादीरूप नहीं परिणमता,

00:50:03.360 --> 00:50:08.216
परंतु जो अपने आप रागादि भाव
को प्राप्त होने से

00:50:08.240 --> 00:50:10.760
आत्माकों रागादिका निमित्त होता है।

00:50:10.760 --> 00:50:14.896
पर निमित्त होता है कभी?

00:50:14.920 --> 00:50:17.440
कि नैमित्तिक प्रगट हो तभी।

00:50:17.440 --> 00:50:19.520
नैमित्तिक कब प्रगट होता है?

00:50:19.520 --> 00:50:22.616
कि स्वभाव से च्युत होता है तभी।

00:50:22.640 --> 00:50:24.200
मैं मेरे को नहीं जानता हूँ,

00:50:24.200 --> 00:50:27.200
मैं मेरे को नहीं जानता हूँ,

00:50:27.200 --> 00:50:30.160
मैं मेरे को नहीं जानता हूँ, उसका नाम अज्ञान,

00:50:30.160 --> 00:50:31.600
उसका नाम नैमित्तिक,

00:50:31.600 --> 00:50:34.200
उसका नाम मिथ्यात्व।

00:50:34.200 --> 00:50:39.216
तब दर्शनमोह का कर्म का निमित्त
कारण कहने में आता है।

00:50:39.240 --> 00:50:41.640
मत बोल मैं मेरे को नहीं जानता हूँ, मत बोल।
आज से बंद कर दे।

00:50:41.640 --> 00:50:44.736
जाननहार को जनता हु, बस|

00:50:44.760 --> 00:50:51.376
ठराव पास हो गया| आहाहा!

00:50:51.440 --> 00:50:54.496
जाननहार जानने में आ रहा है समय-समय पर।

00:50:54.520 --> 00:51:00.696
ये चील को भी हिरण मेंढक साँप, आहाहा!

00:51:00.760 --> 00:51:02.920
कीड़े-मकोड़े सबको

00:51:02.920 --> 00:51:06.976
भगवान आत्मा जानने में आ रहा है।

00:51:07.000 --> 00:51:09.240
बिना पुरुषार्थ जानने में आ रहा है।

00:51:09.240 --> 00:51:11.240
ना कहे तो भी जानने में आवे,

00:51:11.240 --> 00:51:13.280
हाँ कहे तो भी जानने में आ रहा है।

00:51:13.280 --> 00:51:17.336
जानना छूटता नहीं, जानना छूटता नहीं,

00:51:17.360 --> 00:51:19.680
और जानने में आना भी छूटता नहीं।

00:51:19.680 --> 00:51:21.320
जानना भी नहीं छूटता,

00:51:21.320 --> 00:51:28.816
जानना भी नहीं छूटता,

00:51:30.120 --> 00:51:35.496
हं.. जानने में जो आ रहा है,
वो भी छूटता नहीं है।

00:51:35.520 --> 00:51:38.320
जानन क्रिया जानने को छोड़ता नहीं है

00:51:38.320 --> 00:51:41.536
और जनानेवाला छोड़ता नहीं है।

00:51:41.560 --> 00:51:45.256
ऐसा संबंध है, ऐसा संबंध है।

00:51:45.280 --> 00:51:49.816
तात्विक संबंध है, वो छूटता नहीं है।

00:51:49.840 --> 00:52:02.056
ज्ञायक से ज्ञान जो छूटा हो जाये तो
ज्ञायक भी न रहे और ज्ञान भी नहीं रहे।

00:52:02.080 --> 00:52:04.040
अपने आप ही रागादीरूप नहीं परिणमता,

00:52:04.040 --> 00:52:11.236
परंतु जो अपने आप, अपने आप
रागादि भाव को प्राप्त होने से,
कर्म की बात है|

00:52:11.240 --> 00:52:12.760
कर्म में राग है।

00:52:12.760 --> 00:52:17.096
जड़ कर्म है उसमें राग का
अनुभाग है, निमित्त में।

00:52:17.120 --> 00:52:19.480
ईधर नैमित्तिक रागरूप होता है।

00:52:19.480 --> 00:52:20.800
नैमित्तिक रागरूप कब होता है?

00:52:20.800 --> 00:52:23.360
कि स्वभाव से च्युत होवे तब।

00:52:23.360 --> 00:52:25.280
तो राग उत्पन्न हुआ नैमित्तिक।

00:52:25.280 --> 00:52:28.336
तो नैमित्तिक राग होये तो उसमें
आत्मा निमित्त नहीं है,

00:52:28.360 --> 00:52:31.576
'परसंग एव' पर पदार्थ निमित्त होता है।

00:52:31.680 --> 00:52:32.640
पर पदार्थ का लक्ष्य होता है।

00:52:32.640 --> 00:52:39.976
राग में पर का लक्ष्य जाता है,
वीतराग भाव में स्व का लक्ष्य।

00:52:40.000 --> 00:52:42.800
परंतु जो अपने आप रागादि भाव
को प्राप्त होने से,

00:52:42.800 --> 00:52:45.080
आत्माको रागादि का निमित्त होता है|

00:52:45.080 --> 00:52:48.816
रागादी का निमित्त होता है वो|

00:52:48.840 --> 00:52:51.280
उपादान कारण नहीं है। निमित्त कारण है।

00:52:51.280 --> 00:52:53.600
उपादान कारण तो अशुद्ध उपादान,

00:52:53.600 --> 00:52:56.936
क्षणिक पर्याय, नैमित्तिक,

00:52:56.960 --> 00:53:01.296
नैमित्तिक का कारण मैं
मेरे को नहीं जानता हूँ,

00:53:01.320 --> 00:53:02.520
मैं मेरे को नहीं जानता हूँ।

00:53:02.520 --> 00:53:05.776
ज्ञानी को आत्मा जानने में आवे,
मैं तो अज्ञानी हूँ।

00:53:06.240 --> 00:53:08.200
मैं तो पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।

00:53:08.560 --> 00:53:13.336
हमारा माता बहिन कहें कि मैं तो
क ख ग घ को जानता नहीं हूँ,

00:53:13.360 --> 00:53:16.240
A B C D भी जानता नहीं हूँ।

00:53:16.240 --> 00:53:18.000
मेरे को आत्मा का ज्ञान, अरे!

00:53:18.000 --> 00:53:21.976
मेरा आत्मा ही ज्ञान में जानने में आ रहा है।

00:53:22.000 --> 00:53:23.920
ना मत कहो। ना मत कहो।

00:53:23.920 --> 00:53:28.616
सर्वज्ञ भगवान का फरमान है कि
सब जीवों के ज्ञान में

00:53:28.640 --> 00:53:35.096
भगवान आत्मा जानने में आ रहा है।

00:53:35.120 --> 00:53:37.360
सीमंधर भगवान की वाणी में आया है।

00:53:37.360 --> 00:53:40.976
जाननेवाला ही जानने में आता है। आहाहा!

00:53:41.000 --> 00:53:44.216
जाननहार जानने में आएगा ऐसा नहीं आया।

00:53:44.240 --> 00:53:48.416
जानने का प्रयत्न करो ऐसा भी नहीं।

00:53:48.600 --> 00:53:50.240
बिना प्रयत्न। आहाहा!

00:53:50.240 --> 00:53:56.576
सूर्य के प्रकाश में सूर्य प्रसिद्ध हो रहा है।

00:53:56.600 --> 00:54:00.216
सूर्य के प्रकाश में सूर्य अनन्य
प्रसिद्ध हो रहा है।

00:54:00.240 --> 00:54:03.776
तो कोई कहे कि ये प्रकाश आया
तो अभी मकान दिखा दिया,

00:54:03.800 --> 00:54:07.136
मकान, तो ये जो पर्याय है, च्युत हो गई।

00:54:07.160 --> 00:54:12.456
तो सूर्य के त्रिकाल स्वभाव से च्युत हो गई।

00:54:12.480 --> 00:54:17.856
इससे संबंध तोड़ा और घड़े से सम्बन्ध जोड़ा।

00:54:17.880 --> 00:54:23.176
तो सूर्य भी नहीं रहा और प्रकाश भी नहीं रहा।

00:54:23.200 --> 00:54:25.400
मगर ऐसा बनता तो नहीं है।

00:54:25.400 --> 00:54:27.040
पीछे हट पीछे हट पीछे हट,

00:54:27.040 --> 00:54:37.936
हट पीछे हट कि ज्ञान में आत्मा
जानने में आ रहा है। आहाहा!

00:54:37.960 --> 00:54:39.360
धर्म तो सरल है,

00:54:39.360 --> 00:54:42.496
अज्ञानी ने गड़बड़(कर दी) ऐसा करो ऐसा करो।

00:54:42.520 --> 00:54:46.056
ये छोड़ो, ये ग्रहण करो, ये छोड़ो, आहाहा!

00:54:46.080 --> 00:54:51.456
करो करो करो करो में ही मर जाता है।

00:54:51.480 --> 00:54:53.840
और कार्य सिद्धि होती नहीं है।

00:54:53.840 --> 00:54:55.320
जानूँ जानूँ जानूँ जानूँ ऐसा ले ले ना।

00:54:55.320 --> 00:54:58.040
जानूँ जानूँ ले। किसको जानूँ?

00:54:58.040 --> 00:55:00.200
जाननहार को जानूँ। बस हो गया।

00:55:04.120 --> 00:55:07.536
बस, जो जानने में आ रहा है उसको जानूँ आहाहा!

00:55:07.560 --> 00:55:10.616
जो जानने में आ रहा है उसको जानूँ

00:55:10.640 --> 00:55:14.496
ये उपदेश कथन है। उपदेश कथन है।

00:55:14.520 --> 00:55:17.360
बाकि तो जानने में आ ही रहा है।

00:55:17.360 --> 00:55:18.240
स्वीकार कर ले,

00:55:18.240 --> 00:55:20.840
हाँ कर, तो हालत हो जाएगी।

00:55:20.840 --> 00:55:24.496
हाँ तो पाड़, हालत हो जाएगी।

00:55:24.520 --> 00:55:25.560
इतनी देर है।

00:55:25.560 --> 00:55:29.816
तेरी देर की देर है, तेरी देर की देर है। आहाहा!

00:55:29.840 --> 00:55:31.880
ऐसी कहावत है हमारे

00:55:31.880 --> 00:55:34.040
इधर भी होगा|

00:55:36.600 --> 00:55:40.536
हाँ तो पाड़। आहाहा!

00:55:41.640 --> 00:55:45.536
हम तो तैयार हैं।

00:55:45.560 --> 00:55:47.600
दर्शन देने के लिये तैयार हैं।

00:55:47.600 --> 00:55:49.600
लेनेवाला चाहिए।

00:55:49.600 --> 00:55:51.120
लेता है तो भगवान हो जाता है।

00:55:51.120 --> 00:55:53.600
भगवान के दर्शन से धर्म होता है।

00:55:53.600 --> 00:55:58.456
ये भगवान का। आहाहा!

00:55:58.480 --> 00:56:03.656
परंतु जो अपने आप रागादि
भाव को प्राप्त होने से,

00:56:03.680 --> 00:56:05.480
आत्माको रागादि का निमित्त होता है,

00:56:05.480 --> 00:56:07.080
ऐसे परद्रव्य के द्वारा ही,

00:56:07.080 --> 00:56:10.496
निमित प्रधान कथन है,
कर्ता-कर्म संबंध नहीं है।

00:56:10.520 --> 00:56:13.480
निमित्त कर्ता। इसमे वड़े ज|

00:56:13.480 --> 00:56:14.720
यानि इससे नहीं|

00:56:14.720 --> 00:56:16.640
आत्मा से नहीं।

00:56:16.640 --> 00:56:19.400
इतना बताने के लिये उसके द्वारा कहा,

00:56:19.400 --> 00:56:23.576
उसमें मर्म है।

00:56:23.600 --> 00:56:26.520
ऐसे परद्रव्य के द्वारा ही, शुद्ध स्वभाव से
च्युत होता हुआ ही,

00:56:26.520 --> 00:56:29.400
कोहिनूर का हीरा है।आहाहा!

00:56:29.400 --> 00:56:30.680
कोहिनूर का हीरा है।

00:56:30.680 --> 00:56:36.216
शुद्ध स्वभाव से च्युत होना यानि
मेरा आत्मा मेरे को जानने में नहीं आया,

00:56:36.240 --> 00:56:39.976
वो शुद्ध स्वभाव से च्युत हो गया,
भ्रष्ट हो गया।

00:56:40.000 --> 00:56:46.216
च्युत यानि भ्रष्ट हो गया, बाहर निकल गया।

00:56:46.240 --> 00:57:03.296
रागदीरूप परिणमित किया जाता है!
ऐसा वस्तु स्वभाव है!

00:57:03.320 --> 00:57:15.936
ऐसी बात है| समझ में आ जाये।
भिण्ड का सार है।

00:57:15.960 --> 00:57:19.936
वो तो समझाने की बात है।

00:57:19.960 --> 00:57:22.640
परसन्मुख उपयोग है, आत्मसन्मुख करो।

00:57:22.640 --> 00:57:36.816
उपदेश बहुत ऐसा ज्ञानी ने दिया। मूल बात है।

00:57:36.840 --> 00:57:42.196
जिनवाणी की स्तुति बोलो!

00:57:42.360 --> 00:57:45.360