﻿WEBVTT

00:20:36.440 --> 00:20:50.850
क्योंकि चौथे काल में केवलज्ञान होता है। 
मुमुक्षु:- साढ़े पाँच करोड़ मुनिराज और ये दो ……
उत्तर:- इस क्षेत्र से गए हैं।

00:20:50.874 --> 00:20:57.374
बराबर! ये सिद्धक्षेत्र है ना? 
समश्रेणी ऊपर विराजमान हैं।

00:20:57.474 --> 00:21:05.070
अपने सिर पर हैं, विराजमान। 
वो अपने को सबको अपने पास में बुलाते हैं-

00:21:05.094 --> 00:21:13.610
आओ! आओ! इधर आओ!
 ये स्थान आपका, तुम्हारा है। 
 ये स्थान तुम्हारा नहीं है। आहाहा!

00:21:13.634 --> 00:21:21.530
राग में रहना तुम्हारा स्थान नहीं है।
 ज्ञान, आनंद में रहना तुम्हारा स्थान है।

00:21:21.554 --> 00:21:29.189
ज्ञान, आनंद में रहकर टिक जाओ तो
 जैसे हम हैं, वैसे आपको सिद्ध अवस्था हो जायेगी।

00:21:29.213 --> 00:21:36.169
बाद में जन्म-मरण होता नहीं।
 जन्म-मरण सब मिट जाता है,
 एक दफ़े आत्म-दर्शन हुआ। आहाहा!

00:21:36.193 --> 00:21:46.929
आत्मा को जानने से संवर होता है। 
आत्मा को जाने बिना तीन काल में 
किसी को संवर, निर्जरा नहीं है।

00:21:46.953 --> 00:21:56.249
आज जाने, कल जाने, आत्मा को जानना
 संवर है, पर को जानना आश्रव, बंध है।

00:21:56.273 --> 00:22:06.728
पर को जानने से आश्रव, बंध क्यों
 होता है?  क्योंकि पर को जानने से
 जाने हुए का श्रद्धान हो जाता है।

00:22:06.752 --> 00:22:12.728
जिसको जानता है उसको अपना
 मान लेता है। अकेला जानता नहीं है।

00:22:12.752 --> 00:22:21.628
मान लेता है। ज्ञानी जानता है, अपने को
 जानते-जानते परको, पर अपना मानता नहीं है।

00:22:21.652 --> 00:22:29.428
अज्ञानी के पास अतीन्द्रियज्ञान है नहीं,
 इन्द्रियज्ञान है, इन्द्रियज्ञान से पर को जानता है,

00:22:29.452 --> 00:22:35.088
पर में अहम् करता है, ममत्व 
करता है। मेरा है, मेरा है। आहाहा!

00:22:35.112 --> 00:22:42.127
राग को जाने तो राग मेरा, 
देह को जाने तो देह मेरा, 
मकान को जाने तो मकान मेरा।

00:22:42.151 --> 00:22:51.927
मेरा-मेरा करता है, मगर आत्मा
 का कोई परपदार्थ होता नहीं।

00:22:51.951 --> 00:23:02.307
मेरा, मेरा करता है, तो मरता है।
 आहाहा! अरे! मेरा तो ज्ञायक, मेरा-मेरा
 करे तो ज़िंदा रहेगा, नहीं तो मर जाता है।

00:23:02.331 --> 00:23:11.047
भाव-मरण होता है। 
प्रथम आत्मा को जानो, आता है कि नहीं?

00:23:11.071 --> 00:23:23.786
प्रथम अपने शुद्धात्मा को जानो। 
आहाहा! ये बात है। भावलिंगी संत 
दिगंबर मुनिराज ने फ़रमाया है।

00:23:23.810 --> 00:23:30.566
सब दिगंबर मुनिराज ऐसा कहते हैं।
 प्रतिमा भी इसे कहते हैं।

00:23:30.590 --> 00:23:40.526
प्रतिमा की मुद्रा ही ऐसी है। 
 ऐसा-ऐसा नहीं करना।

00:23:40.550 --> 00:23:45.446
मुमुक्षु:- पर को जानना तेरा स्वभाव नहीं है। 
 नहीं है। 
मुमुक्षु:- स्व को जानना तेरा स्वभाव है।

00:23:45.470 --> 00:23:52.686
स्वभाव है! उसका प्रमाण क्या? 
पर को जानना स्वभाव नहीं 
और स्व को जानना स्वभाव?

00:23:52.710 --> 00:24:00.005
तो उसका कोई सबूत होना चाहिए ना, 
चिन्ह, कि पर को जानने से दुःख होता है

00:24:00.029 --> 00:24:05.845
और स्व को जानने से आनंद, 
अतीन्द्रिय आनंद होता है। आहाहा!

00:24:05.869 --> 00:24:18.085
वो उसका प्रमाण-पत्र है। आहाहा! 
Certificate. प्रमाण-पत्र। आत्मा को 
जान तो तेरे को आनंद आयेगा।

00:24:18.109 --> 00:24:28.885
आत्मा को जानना छोड़ दिया,
 ऐसा-ऐसा करता है। ऐसा नहीं करता है। 
एक दफे ऐसा कर ले। आहाहा!

00:24:28.909 --> 00:24:41.204
बाहुबली भगवान को देखकर ऐसा
 विचार आया। वीर्यवान पुरुष था।

00:24:41.228 --> 00:24:51.344
आत्मा का वीर्य यानि वीर्य नाम का 
आत्मा में गुण है। त्रिकाली गुण।

00:24:51.368 --> 00:25:01.724
जो स्वभाव की रचना करे,
 वो वीर्यवान है।  शुभाशुभभाव की
 रचना करे, वो नपुंसक है। आहाहा!

00:25:01.748 --> 00:25:07.324
जिसको मोक्षमार्ग न प्रगट हो,
 उसका मोक्ष ही नहीं होता है।

00:25:07.348 --> 00:25:16.403
मोक्षमार्ग भी अंदर, मोक्ष भी 
अंदर और उसका कारण भी अंदर।

00:25:16.427 --> 00:25:25.403
कारण भी अंदर और कार्य भी
 अंदर ही अंदर है। बाहर कुछ
 है ही नहीं। सब अंदर है।

00:25:25.427 --> 00:25:33.263
ध्येय भी आत्मा, साधक भी आत्मा,
 साध्य भी आत्मा। आत्मा ही आत्मा है।

00:25:33.287 --> 00:25:39.423
आत्मा ही साध्य और आत्मा ही साधक।
 साध्यरूप भी आत्मा ही परिणमता है

00:25:39.447 --> 00:25:43.323
और साधकरूप भी आत्मा
 ही परिणमता है। आहा!

00:25:43.347 --> 00:25:48.522
उसमें राग-द्वेष है ही नहीं।
 राग से रहित आत्मा द्रव्य है।

00:25:48.546 --> 00:25:55.042
उपयोग में तो उपयोग है, 
उपयोग में तो ज्ञायक है। 
रागादि तो हैं ही नहीं।

00:25:55.066 --> 00:26:03.142
हैं ही नहीं तो दिखते ही नहीं। 
मुमुक्षु:- और फिर रहते भी नहीं। 
रहते भी नहीं।

00:26:03.166 --> 00:26:14.482
देखने के लिए भी रहते नहीं।
 तो व्यवहारनय से देखने के लिए रहेते नहीं! 
मुमुक्षु:- हैं नहीं तो देखेगा क्या?

00:26:14.506 --> 00:26:18.802
उपयोग में तो एक है। 
एक शुद्धात्मा है। वो ही एक ही दिखता है।

00:26:18.826 --> 00:26:24.242
है ही नहीं उसमें राग, 
 तो दिखेगा कैसे? आहाहा!

00:26:24.266 --> 00:26:29.521
राग को देखता है, वो आत्मा को
 नहीं देखता है। अँधा हो गया है।

00:26:29.545 --> 00:26:35.481
आत्मा को देखता है, वो राग को
 देखता नहीं है। आहाहा!  ऐसी चीज़ है।

00:26:35.505 --> 00:26:42.761
आत्मा को जानने से संवर होता है।
 पर को जानने से बंध होता है। आहाहा!

00:26:42.785 --> 00:26:55.841
पर को जानना बंद हो गया, 
तो ममत्व छूट गया। जाने तो मेरा माने ना?

00:26:55.865 --> 00:27:01.241
जाने पर को तो मेरा माने ना?
 जानता ही नहीं है। आहाहा!

00:27:01.265 --> 00:27:07.340
आत्मा का स्वभाव ज्ञान और
 ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना।

00:27:07.364 --> 00:27:11.500
द्रव्य, गुण, पर्याय, उत्पाद,
 व्यय, ध्रुव सब आ गया।

00:27:11.524 --> 00:27:17.960
आत्मा का स्वभाव ज्ञान और 
ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना।

00:27:17.984 --> 00:27:23.520
पहला शब्द आया आत्मा, 
पहला शब्द आया क्या? 
आत्मा- उसका नाम द्रव्य है।

00:27:23.544 --> 00:27:30.040
आत्मा, पहला द्रव्य हो गया।
 आत्मा का स्वभाव ज्ञान है, 
तो ज्ञान गुण आ गया।

00:27:30.064 --> 00:27:35.680
ज्ञान गुण त्रिकाली। और ज्ञान 
का स्वभाव आत्मा को जानना।

00:27:35.704 --> 00:27:44.959
आत्मा का स्वभाव ज्ञान, 
वो गुण है, और  ज्ञान का स्वभाव 
आत्मा को जानना, वो पर्याय है। आहाहा!

00:27:44.983 --> 00:27:53.479
मुमुक्षु:- द्रव्य, गुण, पर्याय तीनों आ गया। 
आत्मा है, है और है तो उसका
 कोई स्वभाव होना चाहिए।

00:27:53.503 --> 00:28:03.719
आत्मा त्रिकाली तो उसका स्वभाव भी त्रिकाली। 
ज्ञान गुण त्रिकाली है, 
परमपारिणामिकभाव परिपूर्ण ज्ञान।आहाहा! गुण है।

00:28:03.743 --> 00:28:14.959
आत्मा का स्वभाव ज्ञान, वो गुण है। 
आत्मा का लक्षण ज्ञान है और ज्ञान का लक्षण 
आत्मा को जानना है। क्या कहा?

00:28:14.983 --> 00:28:19.158
मुमुक्षु:- आत्मा का स्वभाव ज्ञान है 
और ज्ञान का लक्षण आत्मा को जानना है।

00:28:19.182 --> 00:28:29.598
उत्तर:- आत्मा का स्वभाव ज्ञान है, वो गुण है। 
ये सामान्य का विशेष है। 
ये सामान्य का विशेष है।

00:28:29.622 --> 00:28:42.798
जब ज्ञान सामान्य होता है, तो उसका विशेष 
अतीन्द्रियज्ञान की पर्याय होती है। 
जब द्रव्य को सामान्य कहें, तो उसका विशेष क्या?

00:28:42.822 --> 00:28:50.878
गुण। ज्ञान गुण उसका विशेष। 
बस इतना ही। 
अभी जो ज्ञान है, उसको सामान्य लो,

00:28:50.902 --> 00:28:58.157
तो उसका विशेष आत्मा को जाने,
ऐसी ज्ञान की पर्याय वो ज्ञान का विशेष है। 
आहाहा!

00:28:58.181 --> 00:29:01.837
मुमुक्षु:- आत्मा का विशेष ज्ञान गुण, 
ज्ञान का विशेष आत्मा को जानना।
उत्तर:- जानना।

00:29:01.861 --> 00:29:04.857
द्रव्य, गुण, पर्याय तीनों आ गया।

00:29:04.881 --> 00:29:14.037
बीच में कोई जगह पर आत्मा में राग नहीं है, 
गुण में राग नहीं है, आत्मा को जाननेवाली 
ज्ञान की पर्याय में राग नहीं है।

00:29:14.061 --> 00:29:22.517
आदि, मध्य, अंत में द्रव्य, गुण, 
पर्याय में राग है ही नहीं। द्रव्य में नहीं, 
गुण में नहीं और पर्याय में भी नहीं। राग नहीं है।

00:29:22.541 --> 00:29:32.557
राग की जो पर्याय है, वो अन्य द्रव्य की है। 
उसका लक्षण जुदा है। 
चेतन लक्षण उसमें नहीं है। आहाहा!

00:29:32.581 --> 00:29:40.476
मुमुक्षु:- फिर कहाँ से खड़ा हो गया? 
उत्तर:- मैं आत्मा हूँ- ऐसा नहीं जाना। 
देह मेरा है, ऐसा जाना। यहाँ से खड़ा हो गया अंदर।

00:29:40.500 --> 00:29:50.836
कहाँ से जाना जाये? देह को आत्मा जाना, माना और 
शुभभाव की क्रिया से धर्म माना, 
तो ज्ञान प्रगट ही नहीं होता।

00:29:50.860 --> 00:30:02.996
मुमुक्षु:- स्वयंकृत। 
उत्तर:- स्वयंकृत। अज्ञान स्वयंकृत है। 
अपने को आप भूलकर हैरान हो गया।

00:30:03.020 --> 00:30:10.916
मुमुक्षु:- आदि, मध्य, अंत तीनों द्रव्य ही है। 
उत्तर:- द्रव्य ही है।

00:30:10.940 --> 00:30:20.795
द्रव्य है और द्रव्य को प्रसिद्ध करनेवाली जाति, 
द्रव्य की जाति की पर्याय प्रगट होती है, 
अतीन्द्रिय। द्रव्य अतीन्द्रिय ज्ञानमय है।

00:30:20.819 --> 00:30:26.955
उसमें इन्द्रियज्ञान नहीं है। 
और अतीन्द्रियज्ञान का पिंड है 
और आनंद का पिंड है।

00:30:26.979 --> 00:30:33.955
तो उसको प्रसिद्ध करनेवाली उसकी जाति की 
पर्याय परिणमती है, प्रगट होती है। 
वो आत्मा को प्रसिद्ध करती है।

00:30:33.979 --> 00:30:37.915
यानि आत्मा का अनुभव होता है। 
आत्मा का दर्शन होता है।

00:30:37.939 --> 00:30:42.915
इन्द्रियज्ञान में दर्शन नहीं होता है। 
राग में दर्शन करने की बात है ही नहीं।

00:30:42.939 --> 00:30:54.674
हाँ! एक है, 
मानसिकज्ञान में परोक्ष दर्शन होता है। 
जब सम्यग्दर्शन का काल पका, किसी जीव को समझो!

00:30:54.698 --> 00:31:06.874
मर्यादा में आ गया। छह महीने की मर्यादा में आ गया। 
तो उसको मानसिकज्ञान के द्वारा निर्णय के 
काल में परोक्ष अनुभूति होती है।

00:31:06.898 --> 00:31:16.254
और बाद में प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। 
इतना मन काम करता है। वहाँ तक ले जाता है।

00:31:16.278 --> 00:31:24.314
मुमुक्षु:- मन को अंदर को छूता चला आता है, 
बाहर में जो फैला था वो अंदर में। उत्तर:- अंदर में 
अपना जो जाननेवाला ही जानने में आता हैं (जाणनारो जणाय छे),

00:31:24.338 --> 00:31:34.433
ज्ञायक जानने में आता है, ऐसा आता है, 
तो परोक्ष अनुभूति होती है। 
निर्णय के काल में कोई अपूर्व-निर्णय आता है।

00:31:34.457 --> 00:31:40.953
साधारण निर्णय नहीं। 
धारणा की बात तो है ही नहीं। 
ऊपर-ऊपर के निर्णय की बात है नहीं

00:31:40.977 --> 00:31:47.593
और निर्णय को आगे करता है, 
उसको निर्णय ही नहीं है। 
आत्मा को आगे रखता है, तो निर्णय है।

00:31:47.617 --> 00:31:50.793
मुमुक्षु:- निर्णय को आगे रखता है। 
उत्तर:- हाँ! निर्णय को आगे नहीं करना।

00:31:50.817 --> 00:32:02.033
निर्णय का विषय आगे होना चाहिए। 
निर्णय आगे नहीं करना। निर्णय का जो विषय 
शुद्धात्मा, उसको आगे करना है।

00:32:02.057 --> 00:32:13.072
आओ साहब! आओ इधर आओ! आगे, आओ 
आप तो वृद्ध हैं ना? मंत्री साहब है, 
शिवलालजी पाटनी जी।

00:32:13.096 --> 00:32:22.292
इधर आओ! मेरे पास आओ। 
नहीं,  सुनने में ठीक पड़ेगा। हमारे पास आओ।

00:32:22.316 --> 00:32:42.192
आत्मा का स्वभाव ज्ञान और ज्ञान का स्वभाव 
आत्मा को जानना।

00:32:42.216 --> 00:32:52.431
शक्कर पदार्थ है। शक्कर नाम का पदार्थ है। 
उसका स्वभाव मीठापना है, वो गुण है।

00:32:52.455 --> 00:33:02.911
वो मीठापने की जो अवस्था होती है 
उसका स्वाद आता है, मीठा। पर्याय का स्वाद 
मीठा आता है, क्योंकि उसमें गुण मीठा है।

00:33:02.935 --> 00:33:09.431
सारा द्रव्य मीठा ही है। खारा नहीं, कड़वा नहीं, 
कुछ स्वाद आता नहीं है। 
शक्कर को रखो इधर (मुँह की तरफ़)।

00:33:09.455 --> 00:33:17.231
तो शक्कर द्रव्य है, उसका मिठास गुण है और 
गुण का वेदन नहीं आता है, 
द्रव्य का वेदन नहीं आता है,

00:33:17.255 --> 00:33:24.910
पर उसकी पर्याय प्रगट होती है मिठास, 
खटास नहीं, खट्टा नहीं, कड़वा नहीं। 
जैसा द्रव्य-गुण है,

00:33:24.934 --> 00:33:33.870
वैसा उसका परिणाम है… 
जो उसकी पर्याय कही जाती है। कड़वी पर्याय हो और 
शक्कर मीठी हो, ऐसा है नहीं।

00:33:33.894 --> 00:33:43.390
शक्कर मीठी हो तो उसका गुण मीठा और 
परिणाम भी मीठा। तो जब वेदन आता है, 
परिणाम मीठा का स्वाद आता है।

00:33:43.414 --> 00:33:48.350
मिठास कहते हैं ना? 
मुमुक्षु:- हाँ! मीठा-मीठा मिश्री ही है।

00:33:50.394 --> 00:33:59.429
उत्तर:- मीठा का स्वाद आया, 
तो ऐसा भान हो गया कि 
उसका गुण और द्रव्य मिठाई से भरा है।

00:33:59.453 --> 00:34:06.909
कड़वे की कोई जगह नहीं, कोई क्षेत्र में, 
शक्कर का कोई क्षेत्र में कड़वास नहीं है, 
खटास नहीं है, तिखास नहीं है।

00:34:06.933 --> 00:34:13.989
सारे क्षेत्र में शक्कर का है। 
शक्कर का सारा क्षेत्र, क्षेत्र समझे ना? प्रदेश।

00:34:14.013 --> 00:34:22.309
जितने भाग में पदार्थ रहता है, 
उसका नाम क्षेत्र कहा जाता है। जितने भाग में 
द्रव्य, गुण, पर्याय रहता है, उसका क्षेत्र।

00:34:22.333 --> 00:34:26.589
तो पर्याय के द्वारा अनुभव के द्वारा 
ख्याल आता है, शक्कर का।

00:34:26.613 --> 00:34:38.988
ऐसे मीठा, मधुर, ज्ञान और 
आनंद की मूर्ती आत्मा है। वो आनंदमयी है
 ऐसा कैसे ख्याल में आवे कि...........

00:34:39.012 --> 00:34:40.012